Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 461–470
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 461–470
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण स्विष्टकृद्याग और उपयट् - वे कर्म्म इन नामों से प्रसिद्ध हैं । प्रधान याग जुहू से होता है, स्विष्टकृयाग उपभृत् से होता है, एवं उपयट्याग वसाहोमहवनी से होता है । इन तीनों के अलावा एक इडा कम और होता है । तीनों में से जरा जरा सा हिस्सा ले कर एक चौथी " समवत्तधानी " नाम की इडापात्री में रक्खा जाता है एवं उसे ऋत्विक् लोग खाते हैं । इस प्रकार चार अवदान हो जाते हैं । हृदय, जिह्वा, क्रोड ( भुजान्तर मांस ) दोनों पार्श्व सव्यसक्थिका मांस ( बाएँ हाथ का मांस ) --( पशु के श्रागे के जो दोनों पैर हैं, वे हस्तस्थानापन्न हैं- इनमें से बाएँ हाथ का मांस ) पूर्वनडक - ( कंधे से नीचे का मांस ), यकृत् दोनों वृक्क ( कुक्षस्थ बड़े आमलकाकार के दो गोलक ) गुदा के तीन हिस्सों में जो मध्य का हिस्सा ( न छोटा न बड़ा ) है वह एवं दक्षिण श्रोणि का मांस - इतने अवयव जुहू में रक्खे जाते हैं जिनका विवेचन याज्ञवल्क्य स्वयं करने वाले हैं । इतने अवयवों से प्रधान याग होता है-दाहिने हाथ का मांस, पूर्वनडक, गुदा के तीनों हिस्सों में से सबसे छोटा हिस्सा, एवं बाएँ श्रोणि का मांस - इतने अवयव उपभृत् में रक्खे जाते हैं, एवं इन से स्विष्टकृत् याग किया जाता है । एवं गुदा का जो सबसे बड़ा हिस्सा है उसे वसाहोमहवनी में रक्खा जाता है एवं उससे उपयट् याग होता है अतएव " वषिष्ठ उपयभ्यः ' १ यह कहा जाता है । एवं तीनों श्रवदानों में से जरा - जरा सा ले कर सम-वित्तधानी नाम की इडापात्री में रक्खा जाता है । इन चारों पात्रों में इस प्रकार चारों अवदान रख दिये जाते हैं । यह देवताओं का अन्न है । प्रश्न के दोनों ओर अमृतोपस्तरण और अमृतापिधान होता है | मनुष्य कम्मं में पानी का ही अमृतोपस्तरण और प्रमृतापिधान होता | अन्न खाने से पहले जो आचमन किया जाता है - वह प्रमृतोपस्तरण है एवं भोजनानन्तर कृत आचमन अमृतापिधान है । इसी प्रकार देवताओं को जो अन्न दिया जाता है, उसमें भी अमृतोपस्तरण और प्रमृतापिधान दोनों काम होते हैं । अन्तर इतना है कि मनुष्य कार्य में पानी का अमृतोपस्तरणादि होता है एवं देवकार्य में आज्य का ही मृतोपस्तरण होता है एवं प्राज्य का ही अमृतापिधान होता है । चारों अवदान तय्यार हैं एवं अव-दानों को रखने लिए ' जुहू ', ' उपभृत् ', ' वसा होमहवनी ', समवत्तधानी - चारों पात्र भी तय्यार हैं । चूँकि अवदान से पहले अमृतोपस्तरण होता है, अतएव अवदान रखने से पहले प्रध्वर्यु - जुहू में प्रधानयाग के लिए, उपभृत् में स्विष्टकृत् के लिए, वंसाहोमहवनी में बसाहोम के लिए ( उपयड्याग के लिए ) एवं समवत्तधानी नाम की इडापात्री में इडाप्राशन कर्म के लिए प्राज्योपस्तरण करता है एवं जुहू और उप-भृत् इन दो पात्रों में सोने की टिकड़ी रखता है-" श्रथाज्यमुपस्तृणीते - जुह्वां ( प्रधानावदानार्थ ) चोपभूति च ( स्विष्ट-कृदर्थम् ) वसाहोमहवन्याम् ( बसा होमार्थम् ) समवत्तधान्यां ( इडाप्राशनार्थम् ) । अथ हिरण्यशकलाववदधाति - जुह्वां चोपभृति च ॥१३ ॥
१. ' का ० श्रो ० सू ० ६।७।८ ' | [ ४४७ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० 5 ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण इस प्रकार चारों में आज्योपस्तरण करके एवं जुहू और उपभृत् में हिरण्यशकल रख कर - प्रव-दीयमान जो हवि है - तत् सम्बन्धिनी जो मनोता देवता है, उसके लिए अनुवाक्या मन्त्र बोलने के लिए अध्वर्यु होता को प्रैष करता है- अर्थात् हे होता! मनोतादेवता के लिए तुम अनुवाक्या करो ( अनुवाक्या मन्त्र बोलो ) होता को यह आज्ञा देता है-" प्रथ मनोतायै हविषोऽनुवाच श्राह - ( श्रवदीयमानस्य हविषः सम्बन्धिन्ये मनोतादेवतायै - अनुवचनार्थं होतारमाह ) " यहाँ पर वास्तव में तो श्रग्नीषोमीय पशु है - अतः श्रग्निषोम देवता के लिए अनुवाक्या करनी चाहिए । ऐसा न कर अध्वर्यु जो कि मनोता देवता के लिए अनुवाक्या मन्त्रार्थ होता को प्रेष करता है-इसका कारण बतलाते हैं-" तत् ( तत्र ) यत् ( यस्मात् ) मनोतायै हविषोऽनुवाच प्राह - ( तस्य काररणमुच्यते - इति शेषः ) " । जिस समय पशु का आलम्भन किया जाता है, उस समय सारे देवता श्रालम्भमान पशु की ओर मुखातिब हो जाते हैं । सब के मन में यह लगी रहती है कि अब अध्वर्यु मेरा नाम लेगा - अब मेरा नाम लेगा - अर्थात्- मुझे इसकी आहुति देगा । इस प्राशा से सारे देवता वहाँ उपस्थित हो जाते हैं । होना भी ऐसा ही चाहिए । चूंकि श्रालम्भन के समय किसी खास देवता का नाम नहीं लिया गया है, अतः सारे ही देवता आ जाते हैं एवं सब आशामुखी बन कर वहीं उसी यज्ञ में स्थित हो जाते हैं । जब तक किसी खास देवता का नाम नहीं लिया जाता है तब तक वह पशु सारे देवताओं का हवि रहता है । उन सारे देवताओं का मन ( चित्तवृत्ति ) उस पशु में ओत - प्रोत रहते हैं । सारे देवताओं के मन उधर लगे रहते हैं । बस इन सब मनों का जो एक योग है, वही मनोता देवता हैं । तो बस इस मनोता देवता के लिए जो अनुवाक्या मन्त्र बोला जाता है, उससे यह प्रध्वर्यु उन सारे मनों को तृप्त कर देता है । एवं ऐसा करने पशु में उपसंगत जो देवताओं के मन हैं, वे प्रमोध के लिए हो जाते हैं- प्रर्थात् अयातयाम नहीं होते हैं । वे देवता जिन्हें कि पशु - प्राहुति नहीं मिलेंगी निराश नहीं होते हैं, वे भी तृप्त हो जाते हैं । " दक्षिणा दी जाती । यज्ञ में कार्य्यकर्त्ताओं के अलावा जो दर्शक ब्राह्मण श्र एतन्मूलक ही " भूयसी जाते हैं, उन्हें भी यज्ञ समाप्त्यनन्तर स्वल्प दक्षिणा दी जाती है ताकि वे अप्रसन्न न हों - हमारे यज्ञ से निराश हो न लौटें । इस दक्षिणा का विज्ञान प्रथम काण्ड में दक्षिणा ब्राह्मण में विस्तृतरूपेण बतलाया ग्रागत देवताओं के मन को करने समझ लेना पर्याप्त होगा कि तृप्त गया है । यहाँ पर केवल इतना ही के लिए मनोता देवता के लिए अनुवाक्या की जाती है जिससे कि वे निराश न हो जाएँ । इसी अभिप्राय से कहते हैं -" सर्वा ह वै देवताः पशुमालभ्यमानमुपसंगच्छन्ते- - I मम नाम ग्रहीष्यति मम नाम ग्रहीष्यतीति । सर्वासां हि देवतानां हविः पशुः । तासां सर्वासां देव-[ ४४८ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण तानां पशौ मनांस्योतानि भवन्ति । तान्येवैतत् प्रीणाति । तथा हामोघाय देव-तानां मनांस्युपसंगतानि भवन्ति । तस्मान्मनोताय हविषोऽनुवाच ग्राह " ॥१४ ॥
" हमने बतलाया है कि जुहू से प्रधानयाग होता है, एवं उसमें हृदयादि पूर्वोक्त पश्ववयव रक्खे जाते हैं । उन अवयवों में सबसे पहला नम्बर जिह्वा का श्राता है, बाद में क्रोड का आता है; इस प्रकार हृदयावदान का नम्बर चौथी पाँचवीं बार प्राता है । इस प्रकार क्रमानुसार हृदयावदान के चौथे क्रम पर I आने पर भी वह श्रध्वर्यु सब अवदानों से पहले हृदय का ही अवदान करता है - अर्थात् जिह्वा से भी पहले जुहू में हृदय ही रखता हैं-" स हृदयस्यैवाग्रेऽवद्यति " । इस प्रकार मध्य में होने वाले - मध्य क्रम में होने वाले हृदय का - मध्य में अवदान न कर किस लिए सबसे पहले ही अवदान किया जाता है - इसका कारण बतलाते हैं-“ तत् यत् मध्यतः सतो हृदयस्याग्रेऽवद्यति ( तदुच्यते - इति शेषः ) " । इसी ब्राह्मण की आठवीं कण्डिका में हमने बतलाया है कि हृदय में ही प्रज्ञामन प्रतिष्ठित रहता है एवं प्रजा प्राणयुक्ता रहती है । अतएव हम हृदय को प्रारण और मन दोनों कहने के लिए तय्यार हैं । वास्तव में हृदय ही प्राण है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि हम जो प्राण व्यापार करते हैं अर्थात् श्वास लेते हैं, वह इसी हृदय से उठता है । प्रारण का श्वास का उत्पत्ति स्थान यही हृदय । बस, उत्पत्ति स्थानत्वेनैव हृदय को ' प्राण ' कहा जाता है । एवं प्रारण ही पशु है । अर्थात् हम जिसे पशु कहते हैं, उसमें यदि कोई पशु व्यवहार का कारण है तो वह एकमात्र प्राण ही है । पशु ही क्या, मनुष्य, पक्षी, कृमि, कीट- ये सब प्राण पर निर्भर हैं । जब तक शरीर में प्राण है तभी तक मनुष्य, मनुष्य कह-लाता है; पशु, पशु कहलाता है, पक्षी, पक्षी कहलाता है । मनुष्य का मनुष्यपना प्राण पर अवलम्बित है, पशु का पशुपना प्राण पर अवलम्बित है; अतएव हम प्रारण ही को पशु कहने के लिए तय्यार हैं, प्राण ही को मनुष्य कहने के लिए तय्यार हैं । प्राणसत्ता में ही पशु व्यवहार होता है, अतएव हम प्राण को ही पशु कहने के लिए तय्यार हैं । इसी का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं - पशु जब तक प्राण से प्राणन करता रहता है- श्वास लेता रहता है, तभी तक वह ' पशु ' कहलाता है । जिस समय इस पाञ्चभौतिक शरीर में से प्रारण निकल जाता है, उस समय यह पशु, पशु नाम से खारिज होता हुम्रा सूखे लक्कड़ की तरह मुर्दा हो कर सदा के लिए निद्रा की गोद में चला जाता है । चूँकि प्रारण ही से वह पशु, पशु कहलाता है, अतएव हम प्राण ही को ' पशु ' कहने के लिए तय्यार हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर कहते हैं-" प्राणो व हृदयम् । प्रतो ह्ययमूर्ध्वः प्राणः संचरति । प्राणो वै पशुः । यावद्ध्येव प्राणेन प्रारिणति तावत् पशुः । अथ यदस्मात् प्राणोऽपक्रामति दावेव तहि भूतोऽनर्थ्यः शेते " ॥१५ ॥
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण " अथ यथापूर्वम् " ॥१६ ॥
[ ४५० ] पशुपुरोडाशं ब्राह्मणं २ - ' जिह्वा ' ' ३- ' वक्षसः ' चूंकि प्रारण हृदय में प्रतिष्ठित रहता है, अतएव हम हृदय को भी पशु कहने के लिए तय्यार हैं । हृदय ही पशु है, पशु का पशुपना उसके हृदय पर अवलम्बित है । हृदय ही पशु का आत्मा है । तो बस, यह अध्वर्यु सबसे पहले " हृदय " का ही, आत्मा का ही अवदान करता है । हृदय ही पशु है । हृदय के अवदान से पशु का अवदान हो जाता है । अतएव प्रमादवश, यदि जिह्वादि आगे के अवदान रह भी जाएँ तब भी कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिए । क्यों कि जो ऋत्विक और और अवदानों से पहले हृदय का अवदान करता है, उससे सारे ही पशु का अवदान हो जाता है । हृदय ही सर्वस्व है । हृदयावदान से कृत्स्त पश्ववदान हो जाता है । अतएव प्रमाद से कोई रह भी जाता है तब भी कोई अनिष्ट नहीं होता । बस - प्रमादवशात् छूटे हुए अवदान से उत्पन्न जो अनिष्ट है, वह न हो इसलिए श्रौर और अवदानों से पहले " हृदय " का ही अवदान किया जाता है-" हृदयम् वै पशुः । तदस्यात्मन एवाग्रेऽवद्यति । तस्माद् यदि किञ्चि-taari हीयेत न तदाद्रियेत । सर्वस्य हैवास्य तत् पशोरवत्तं भवति यद् हृदय-स्याग्रेऽवद्यति । तस्मान्मध्यतः सतो हृदयस्यैवाग्रेऽवद्यति " । १ - ' हृदय ' केवल हृदयावदान में ही व्यत्यास है, बाकी के जितने भी अवदान हैं, वे सब यथापूर्व यथाक्रमा-नुसार ही होने चाहिए । हृदयानन्तर पहले जिह्वा का अवदान होना चाहिए, बाद में क्रोड का अवदान होना चाहिए । इस प्रकार यथापूर्व श्रवदान होना चाहिए जैसा कि क्रम याज्ञवल्क्य स्वयं बतलाते हैं ---हृदय के अन्तर जिह्वा का अवदान करता है । हमने बतलाया था कि शिरोभाग चूंकि वमन है, अतः उसका प्रवदान नहीं होता । चूंकि शिरोभाग नेत्र से ऊपर माना जाता है, अतएव उसके नीचे सुख में रहने वाली ' जिह्वा ' ले ली जाती है । चूंकि यह जिह्वा शरीर के पूर्वार्द्ध में भी प्रतिष्ठित रहती है, अर्थात् शिर के अनन्तर शरीर पूर्व भाग में पहला नम्बर जिह्वा का ही है, अतएव क्रमानुसार पहले इसी का अवदान करना चाहिए-" थ जिह्वायै । सा हीयं पूर्वार्द्धात् प्रतितिष्ठति " । इसके बाद भुजान्तर का जो मांस है जिसे कि क्रोड कहते हैं - उसका अवदान करता है | चूँकि जिह्वा के अनन्तर उसी कोड ( भुजान्तर मांस ) का नम्बर है, अतः क्रमानुसार जिह्वा के अनन्तर इसी का अवदान होना चाहिए-“ अथ वक्षसः । तद्धि ततः ( जिह्वानन्तरम् ) ” ।
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तृतीय काण्ड ( अ ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण इसके बाद एक तरफ के ( बाएँ तरफ के ) हाथ के मांस का अवदान करता है, क्योंकि वक्ष के बाद उसी का नम्बर आता है -" अथैकचरस्य ( एक तरफ के सव्यस्य ) दोष्णः " । इसके बाद दोनों पावों को अवदान करता है-४ -- ' सव्यस्य दोष्णः ' " अथ पार्श्वयोः " # इसके बाद यकृत् का अवदान करता है । दो यकृत् होते हैं- ( १ ) एक का नाम एक का नाम प्लीहा ( तिल्ली ) है । ये दोनों ही चूंकि अति कोमल होते हैं - बहुत ही श्रतएव इन्हें " तनिमा " कहा जाता है । पार्श्वनन्तर इन्हीं का अवदान होता है-" श्रथ तनिम्नः ( यकृतः ) " । ५- ' पार्श्वे ' जिगर है - ( २ ) मुलायम होते हैं, इसके बाद कुक्षि में रहने वाले आमलकाकार दोनों वृक्कों का अवदान करता है-" थ वृक्कयोः ” । इस यथापूर्व क्रम को बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं-६- ' यकृत् ' ७- ' वृक् ' " अथ जिह्वायै । सा होयं पूर्वार्द्धात् प्रतिष्ठति । श्रथ वक्षसः - तद्धि
ततः । श्रथैकचरस्य दोष्णः । अथ पार्श्वयोः । अथ तनिम्नः । प्रथ वृक्कयोः " ।
॥१७ ॥
इसके बाद पशु की जो गुदा है - उसके तीन खण्ड करता है । एक खण्ड सबसे बड़ा करता है, दूसरा उससे छोटा करता है, तीसरा बहुत ही छोटा करता है । हमने बतलाया है कि प्रकृत में प्रधान, स्विष्टकृत्, उपयट् ये तीन कर्म्म होते हैं । इन तीनों में जो उपयट् याग है, उसके लिए गुदा का सबसे बड़ा हिस्सा होता है, एवं प्रधान याग की साधक जुहू में मध्य का खण्ड रक्खा जाता है एवं जो सबसे छोटा हिस्सा है, उसे स्विष्टकृत् में रक्खें । जुहू में गुदा का मध्यखण्ड रखना चाहिए । उपभृत में सबसे छोटा रखना चाहिए एवं वसा होमहवनी में सबसे बड़ा खण्डं रखना चाहिए । अभी प्रधान याग के अनन्तर इस जुहू में गुदा का मध्य खण्ड रखते हैं । तदनन्तर बस प्रधान याग के लिए जुहू में लिए अवदान हो रहा है, अतः - वृक्क के एक तरफ की ( दाहिने तरफ की ) श्रोणि के मांस का अवदान रखते हैं । पूर्वो अवदान रखता है -" गुदं त्रेधा करोति । स्थविमोपयभ्यः ( यदतिस्थूलं तदुपयाजार्थमव-वद्यतीत्यर्थः ) - मध्यं जुह्वां द्वेधा कृत्वावद्यति - ( प्रधान होमार्थ - मध्यं जुह्वां द्विधा-[ ४५१ ] 1
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) ' वा ० सं ० ६।१८ ' | १ पशुपुरोडाश ब्राह्मणं शतपथ ब्राह्मण [ ४५२ ] कृत्वाऽवद्यतीत्यर्थः ) - प्रणिम त्र्यङ्गेषु ( स्विष्टकृधागर्थ वसाहोमहवन्यां - प्रणिम अवद्यतीत्यर्थः ) - श्रर्थक चरायै श्रो: - एतावन्तु जुह्वामवद्यति ॥ १८ ॥
इसके बाद उपभृत् में त्र्यङ्ग पशु का जो दाहिना हाथ है, उसका अवदान करता है । एवं गुदा के तीनों हिस्सों में जो सबसे छोटा हिस्सा है, उसे दो भागों में विभक्त कर उसका अवदान करता है, के मांस का अवदान करता है । इस प्रकार जुहू और उपभृत् में ( जिनमें कि आज्योपस्त-रण हो रहा है, एवं जिन दोनों में सोने की टिकड़ी रक्खी हुई है ) पूर्वोक्त अवदान रख कर ऊपर से दोनों में ही फिर सोने की टिकड़ी रखते हैं । सोने की टिकड़ियों के ऊपर ग्राज्य का अभिघार करते हैं । तात्पर्य यही है कि - जुहू और उपभृत में पहले श्राज्योपस्तरण कर सोने की टिकड़ी रख - ऊपर से यथापूर्व अवदान रखने चाहिए । बाद में फिर सोने की टिकड़ियाँ रखनी चाहिए एवं ऊपर से आज्या-भिघार करना चाहिए-" थोपभृति । त्र्यङ्गयस्य ( पशोः ) दोष्णो गुदं द्वेधा कृत्वावद्यति । त्र्यङ्गायै श्रोणः । अथ हिरण्यशकलाववदधाति । प्रथोपरिष्टादाज्यस्याभि-घारयति " ॥१६ ॥
इस प्रकार जुहू और उपभूत् में पूर्वोक्त अवदान ग्रहण करने के अनन्तर वह अध्वर्यु वसाहोम-हवनी में हवन द्रव्य ( मांस रस ) रखता है । वसा होमहवनी में हवन द्रव्य ग्रहण करता है, एवं साथ ही मन्त्र बोलता है-" रेडसीति " " - इस वसाहोमहवनी में माँस का जो रस है, वह रक्खा जाता है, एवं गुदा का वर्षिष्ठ ( सबसे बड़ा खण्ड ) रक्खा जाता है । इन दोनों को वसाहोमहवनी में रक्खा जाता है । जिस समय इस वसा द्रव्य को ( मांस रस- शोरबे को ) उस वसाहोमवनी में रखते हैं, उसी समय मन्त्र बोलता है - ' रेडसीति " । हे वसा द्रव्य! आप रेट् हैं । ( यह मांस रस द्रव द्रव्य होने के कारण इधर - उधर हिलता रहता है, अतएव " रेडसि " कहा । लत्व से यही लेलया बन जाता है । हे वसा द्रव्य अर्थात् मांस रस! आप “ रेट् ” हैं । अर्थात् हिलते हुए हैं- " रेडसि " का यही तात्पर्य है । इसी अभिप्राय से कहते हैं-" थ वसाहोमं गृह्णाति रेडसीति । लेलयेव हि यू: ( यूषशब्देन मांसेन सह पक्वं जलमुच्यते - ते ० सं ० १ । ३ । १० - श्री सायरणभाष्य ) तस्मादाह रेडसीति " ।
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तृतीय काण्ड ( प्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण " अग्निष्ट्वा श्रीणातु " । ( वा ० सं ० ६।१८ ) हिलते हुए जो आप ( मांस रस ) हैं, उन्हें अग्नि पकाए । इस मांस का परिपाक श्रग्नि ही करते हैं अतएव - " श्रग्निष्ट्वा श्रीणातु " यह कहा गया है । " अग्नितच्छ्रपयति । तस्मादाह - " श्रग्निष्ट्वा श्रीणात्विति । " प्राप-स्त्वा समरिन् " । हे मांस रस! पानी आपको मांस में से खींच कर बाहर निकाल ले । मांस रस का नाम यूष है । यह तब तक नहीं बनता जब तक कि मांस में पानी नहीं डाला जाता । मांस में यदि पानी नहीं डाला जाएगा एवं उसे यों ही अग्नि पर चढ़ा दिया जाएगा तो शोरवा तो बनना दूर रहा, मांस जल कर खाक हो जाएगा । मांस के श्रङ्ग - प्रत्यङ्ग में से मांस रस को बाहर निकालने का काम पानी ही करता है । पानी सारे मांस रस को मांस में से बाहर निकाल देता है । पानी ही इस रस को मांस के अङ्गों में से इकट्ठा कर बाहर निकाल लेता है, अतएव " आपस्त्वा समरिन् " " यह कहा गया है— " आपो ह्येतं श्रङ्गेभ्यो रसं सम्भरन्ति तस्मादाह - आपस्त्वा समरिण -निति " ॥२० ॥
" वातस्य त्वा प्राज्ये " इति । हे वसा द्रव्य! मैं वायु की गति के लिए अर्थात् वायु में जाने के लिए तुम्हारा ग्रहण करता हूं । यह जो प्रवहमान वायु बह रहा है - वह अन्तरिक्ष में ( खाली स्थान में ) ही बह रहा है । जिस समय इस वसाद्रव्य की अग्नि में आहुति डाली जाएगी उस समय यह आहुति वाष्प बन कर - अन्तरिक्ष- स्थानीयवायु में ही जाएगी । मांस रस की प्रतिष्ठा वायुदेवता ही बनेंगे । अतएव ' वातस्यत्वा ' इत्यादि कहा है--" अन्तरिक्षं वाऽयमनुपवते । योऽयं पवते । श्रन्तरिक्षाय वै गृह्णाति । तस्मादाह - " वातस्य त्वा ध्राज्या ( ध्राज्ये - गत्यै - गृह्णामि - इति शेषः ) " ॥ २१ ॥
" पूष्णो रंह्या " इति हे वसाद्रव्य! पूषा के वेग के लिए मैं तुम्हारा ग्रहण करता हूं । द्वादश प्रारण - समष्टि का नाम सूर्य्य है । वे ही बारह ( १२ ) प्रारण - बारह ( १२ ) श्रादित्य कहलाते हैं । इनमें एक आदित्य का नाम जो कि पृथिवी - पिण्ड का निर्माण करता है - " पूषा " कहा जाता है । जैसे वायु-• अन्तरिक्ष में रहता है - तथैव पूषा ( आदित्य ) भी अन्तरिक्ष में ही रहता है । यह जो वेग दिखलाई पड़ रहा है, वह इसी पूषा का है । इसी वेग के लिए अर्थात् जैसे प्रतिवेग से पूषा अन्तरिक्ष पर शासन कर १. ' वा ० सं ० ६१८ ' । २. ' वा ० सं ० ६।१८ ' । ३. ' वा ० सं ० ६।१८ ' | [ ४५३ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण रहा है तथैव तुम ( यूष ) भी अग्नि द्वारा अन्तरिक्ष में जा कर शासन करो, इसलिए तुम्हारा ग्रहण करता हूं-" एष वै पूष्णो रहिः । एतस्मा उ हि गृह्णाति । तस्मादाह - पूष्णो ह्या - इति " ॥२२ ॥
" ऊमरणो व्यथिषत् " इति ' वसाद्रव्य! आप अन्तरिक्ष की ऊष्मा के साथ मिलने वाले हो ऐसे आपका मैं ग्रहण करता हूं । यह जो अन्तरिक्ष है - इसमें ऊष्मा भी रहती है, श्रतएव इसे ऊष्मा कहा जाता है | चूँकि यह वसा द्रव्य इसी ऊष्मा से अर्थात् अन्तरिक्ष से जा कर मिलने वाला है, अतएव -" ऊष्मणो " इत्यादि कहा गया है -" एष ( अन्तरिक्षः ) वा s ऊष्मा । एतस्माऽउ हि गृह्णाति तस्मादाह-ऊष्मणो व्यथिषत् - इति । " इस प्रकार वह अध्वर्यु — " रेडस्याग्निष्ट्वा श्रीणात्वापस्त्या समरिणन् वास्तस्य त्वा ध्राज्ये पूष्णो ह्या ऊष्मणो व्यथिषत् " । ( वा ० सं ० ६।१८ ) -( हे वसा द्रव्य! आप हिलते हुए हैं - ऐसे आपका श्रग्नि परिपाक करे एवं पानी आपको मांस में से निकाल ले | हम वायु की गति के लिए पूषा के वेग के लिए ही ऊष्मा में मिलने वाले प्रापका ग्रहण करते हैं ) इस मन्त्र से वसा होमहवनी पात्र में उस वसा द्रव्य को और गुदा के स्थूल खण्ड को रख लेता है एवं ऊपर से उस वसा द्रव्यावदान पर दो बार घृत का आधार कर देता है दो बार घृत ढार
देता है ।
" उपरिष्टाद् द्विराज्यस्याभिघारयति " ॥२३ ॥
इसके बाद पशु के पार्श्व की हड्डी से अथवा धुरी से उस वसाद्रव्य को विभक्त करता है, जिससे कि वह अच्छी तरह जल जाए और साथ ही मन्त्र बोलता है- " प्रयुतं द्वेषः " इति । यज्ञ में आने वाले जो अनिष्ट हैं, मेरे इस विभाग करण से, वे सब यज्ञ से प्रयुत हो जाते हैं अर्थात् पृथक् हो जाते हैं-तात्पर्य्य यही है कि उस वसा द्रव्य को धुरी से अथवा पार्श्वोस्थि से हटाता हुआ - शत्रु को हटाने की भावना करता है । एवं " प्रयुतं द्वेष: " - इस मन्त्रशक्ति से वह प्रध्वर्यु इस यज्ञ में से सारे असुरों को मार गिराता है-१. ' वा ० सं ० ६।१८ ' । २. ' वा ० सं ० ६।१८ ' । [ ४५४ ]
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तृतीय काण्ड ( ०८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मण " थ पार्श्वेन ( वस्थिना ) वा असिना वा प्रयौति ( गृहीतां वसां विभजति ) । " प्रयुतं द्वेषः " इति ( मन्त्रेण ) तन्नाष्ट्रा एवैतद् रक्षांस्यतोऽप-हन्ति " || २४ || साहोमहवनी में जो यूष ( वसा - द्रव्य - मांस रस ) डाल लिया जाता है, उससे बाकी बचा हुआ जो वसा द्रव्य है - यूष है - उसे अध्वर्यु समवत्तधानी नाम की इडापात्री में ले लेता है । हमने बतलाया था कि इडा कर्म में - प्रधान, स्विष्टकृत् अवदानों का भी जरा - जरा सा हिस्सा लिया जाता है । प्रधानाव-शिष्ट जो हृदय है - उसे भी इडापात्री में डालते हैं, जिह्वा का हिस्सा भी डालते हैं, वक्ष ( भुजान्तर मांस ) का हिस्सा भी डालते हैं, तनिम का ( यकृत् को ) हिस्सा भी डालते हैं एवं मतस्न का ( वृक्क का ) हिस्सा भी डालते हैं । गरज यह है कि जो - जो द्रव्य प्रधानावशिष्ट होते हैं, उन सब को और वसा होमहवनी में गृहीतावशिष्ट वसा को - इस इडापात्री में ले लेता है । इस प्रकार सब द्रव्य ले कर उस पर ऊपर से दो बार घृत डाल देता है-" अथ यद्यपरिशिष्यते - तत् समवत्तधान्यामानयति । तत् ( तत्र पात्र्यां ). हृदयं प्रास्यति । जिह्वां । वक्षः । तनिमः । मतस्ने । वनिष्टुम् । प्रथोपरिष्टाद् द्विराज्यस्याभिघारयति " इति ॥ २५ ॥
इस प्रकार जुहू, उपभृत, वसाहोमहवनी, समवत्तधानी - चारों में चार अवदान तय्यार कर लिए गए हैं । हमने बतलाया है कि इन चारों में से जुहू - प्रौर उपभृत् - इन दोनों पात्रों में प्रवदान के नीचे और ऊपर दोनों ओर हिरण्य - शकल रक्खे जाते हैं । जौहव अवदान के भी नीचे ऊपर दोनों ओर सोने की टिकड़ी रक्खी जाती है एवं औपभूतावदान के भी दोनों ओर सोने की टिकड़ी रक्खी जाती है - इस पर प्रश्न होता है कि इन दोनों प्रवदानों के दोनों ओर सोने की टिकड़ी रखने की क्या आवश्यकता है? इसी का उत्तर देते हैं-" तत् ( तत्र ) यद्धिरण्यशकलावभितो भवतः " - ( तदुच्यते ) " । पशुको जो ऋत्विक लोक अग्नि में डालते हैं वे पशु को मारते हैं - प्रर्थात् अग्नि में देवताओं के लिए पशु की आहुति देनी पड़ती है । इसके पहले उस पशु को मारना पड़ता है । उसका आलम्भन और निशासन ( चीरना- फाड़ना ) करना पड़ता है । देवता लोग अमृत हैं, वे अमृत हवि की ही प्राहुति लेते हैं न कि मृत हवि की । चूँकि यह पशु मृत हो गया है - ऐसी अवस्था में देवता इसे न लेंगे । बस, इस दोष को दूर करने के लिए - पशु को पुनर्जीवित करने के लिए उसमें आयु का प्राधान करने के लिए श्रवदानभूत पशु के दोनों ओर सुवर्ण का सम्बन्ध कर देते हैं । सुबर्ण सौरतेज होने के कारण प्रायु है, अतएव अमृतपदवाच्य है । " सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च " १ से हम सौरतेज को ' श्रायु ' कहने के लिए तय्यार हैं । वही सौरतेज सुवर्ण बना हुआ है, अतएव सुवर्ण को हम आयु एवं अमृत कहने के लिए १ ऋग्वेद मं ० १।११५ । १ । [ ४५५ ]
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ८ ) शतपथ ब्राह्मण पशुपुरोडाश ब्राह्मणे तय्यार हैं । ऐसे आयु - स्वरूप सुवर्ण - शकल का अवदान के दोनों ओर सम्बन्ध कर देने से वह मृत पशु आयु में प्रतिष्ठित हो जाता है एवं उठ खड़ा होता है - जीवित हो जाता है- प्रमृतत्व को प्राप्त हो जाता है । जब यह हिरण्यशकल सम्बन्ध से अमृत बन जाता है तो देवता इसे ग्रहण कर लेते हैं । बस, दोनों और इसीलिए हिरण्यशकल का सम्बन्ध किया जाता है । लोक में किंवदन्ती है कि यज्ञ में जो पशु मारा जाता है, उसे वापस जिन्दा कर दिया जाता है । इसका यही रहस्य है । सचमुच जी कर खड़ा नहीं हो जाता - देवतानों के लिए जीवित हो जाता है । सुवर्ण सम्बन्धेन उसमें से आसुर भांव निकल जाता है । बस, ' उदेति ' - ' संजीवति ' का यही तात्पर्य है ---" घन्ति वा एतत् पशुं यदग्नौ जुह्वति । श्रमृतमायुहिरण्यम् । तदमृत प्रायुषि प्रतितिष्ठति । तथात ( पृथिवी लोकादुदेति ) - तथा संजीवति । तस्मा द्विरण्यशकलावभितो भवतः " ॥ २६ ॥
जुहू में जो अवदान रक्खा जाता है - उससे प्रधान याग होता है एवं उपभृत् में जो अवदान रक्खा जाता है, उससे स्विष्टकृद्याग होता है । हमने बतलाया है कि प्रधान याग के लिए जुहू में - पशु के बाएँ हाथ का और दक्षिण पैर का मांस रक्खा जाता है एवं स्विष्टकृद्याग के लिए उपभृत् में दाहिने हाथ का और बाएँ पैर का मांस रक्खा जाता है । इस प्रकार जुहू और उपभृत् में प्रक्ष्या क्रम से अवदान रक्खा जाता है । ईशान से नैऋत कोरण की ओर एक रेखा ले जाइए एवं अग्नि से वायव्य कोण की ओर ले जाइए - इसी रेखा क्रम को - " अक्ष्णया " कहते हैं । पशु के मांस का अवदान इसी ' अक्ष्णया ' क्रम से किया गया है । जुहू में बाएँ हाथ का ( आगे के बाएँ पैर का ) और दक्षिण पैर का मांस रक्खा गया है, एवं उपभृत् में दाहिने पैर का ( आगे के दाहिने पैर का ) एवं बाएँ पैर का मांस रक्खा गया है । यहाँ पर स्वतः ही प्रश्न होता है कि अक्ष्णया क्रम से मांसावदान करने की क्या श्रावश्यकता है? क्यों नहीं बाएँ हाथ और बाएँ पैर का अवदान किया गया एवं उपभृत् में दाहिने पैर और दाहिने हाथ का किया गया? इसी का उत्तर देते हैं-" अथ यदक्षरणयावद्यति - सव्यस्य ( वामस्य ) च दोष्णः ( भुजस्य ) दक्षि-पायाश्च श्रोणेः " ( प्रधानावदानसमये जुह्वाम् ) " । एवं " दक्षिणस्य च दोष्णः - सव्यायश्च श्रोणे: ( उपभृति ) ( तस्य कारण-मुच्यते - इति शेषः ) " । भगवान् याज्ञवल्क्य प्रकृति यज्ञ की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि प्रकृति - यज्ञ में जो पशु का निर्माण होता एवं पशु - निर्माण के लिए देवता प्राण पशु का अवदान करते हैं, वे अक्ष्णया क्रम से ही [ ४५६ ]