Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 691–694

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 691–694

पृष्ठ 691

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / -भाष्य / सं ० / पंक्ति - संख्या २६८ श्र ०११७ 33 श्र ०११८.. २७१ अ ०।१४ २७५ • भा ०1५ भा १।६ २७६ २८१ भा ०।२७ २८६ भा ०।२ २६१ भा ०१४ भा ० १६ २६३ 22 " भा ०।१६ २६५ २६६ भा ०।११ २६७ भा ०1७ ३०३ श्र ०१० भा ० १३. ३१० कं ० १६ ३२० ३२७ उ ०।१७ 17 भा ० २६ ३३० उ ०1१ भा ०१३ ३३८ भान्तिपूर्व " 11 ३४२ अ ०११ ३५० भा ०।२ ३५३ उ ०१६ ३५५ ३५६ सं ० उ ०१६ " " भा ०।१० ३६४ भा ० १६ " 13 २२ ३७६ अ ०११८ अ ०।१६ ३७७ अशुद्ध मुद्रित पाठ उच्छीय १ ९ १ ९ यूप ज्योतिष्टोम प्रेरको तेज ' यमजान " अथपर्यषति त्वयं सम्बन्ध यप दुःसाहस उत्तरदिक स्थ अर्थात् नियोजनस्यव भविष्यान्त इसा तानेतद्वेवा आनषोम पश मनुष्यों को ' पर्युग्नमेऽ... ". ( जुहुभृतौ ) " सर्वेणव ". " " पग्नययेनुब्रू हि " खड़ा निकालती रश्मिवति वायुभूत्वा विद्यत् [ ५. ] शुद्धि पत्र ( द्वितीय खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ उच्छी यूप की ज्योतिष्टोम प्रेरको. ' तेज ' यजमान " प्रथपर्यपति " स्वयं बेचैनी सम्बद्ध: आधिपत्य यूप दुस्साहस उत्तरदिकस्थित तथा नियोजनस्यैव भविष्यत्ति इसी तानेतद्देवा अग्नीषोम पशु मनुष्यों का ' पर्यग्येऽ... " ( जुहूपभृतौ ) " सर्वेणेव.... " " पग्नुब्रूहि खड़ी निकलती रश्मिवली विद्युत्

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / सं ० / पंक्ति - संख्या भा ० | १६ ३६५ भा ० | १६ ४०३ भा ०।१२ ४०६ भा ० सं ० १५ ४०८ भा ० | १२ ४१३ पाद टि ४२० ४२३ प्र ०१४ भा ०1८ ४३३ ४३४ भा ०१५ भा ०।१५ 13 भा ० | ३० ४३५ भा ० | ६ ४३८ भा ०1७ भा ० | २४ 21 पाद टि ० ४४७ ४६३ भा ०1१० ४६७ भा ० | १८ टि ० १२ पाद ४७२ भा ०१३ ४७८ पाद टि ०११ ४८४ भा ० ११ ४६० ५०६ भा ० / २२ भाग २६ ५०८ भा ० | ६ ५१० कं ० ११७ ५१७ भा ० | १० ५३३ ५३४ उ ०१२ ५३५ उ ० / २३ भा ०1७ ५३७ " उ ०१२१ उ ०1१६ ५४३ अशुद्ध मुद्रित पाठ ( मूलमग्र च ) माग होत: स्वाकृतिभ्यः युव बूतान्न ऐसा कर गेहूँ अधरा जात बनाने लिए " नु निरुध्यते प्रचारिण तद्यश्वतं श्री ० उदनत्यश्व निर्मातृ त्वष्ट प्रारणामात्रा को ० बनाने से परमेष्ठि पूँछ पूछ ..... मात्मनः सत्यनाश रितः ..... यावत प्रजनीयत देवना भूमात [ ६ ] शुद्धि पत्र ( द्वितीय खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ ( मूलमग्रात् ) मार्गों होता स्वाहा कृतिभ्यः युक्त ब्रूतान ऐसा कह कर जो - चावल अधूरा जाता बनाने के लिए ऽनुनिरूप्यते: प्रचराणि तं श्री ० उदानत्यश्व निर्मातृत्वत्वष्टः! प्रारणमात्रा ह कौषी ० बनाने के पारमेष्ठय पोंछ पोंछ ..... मात्मना सत्यानाश रिक्तः ... ' यावत् प्रजनयिता देवानां भूमात

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / सं ० / पंक्ति - संख्या अ ०११ ५५० ५५२ अ ०।१३ I भा ० / २२ ५५७ उ ०१२८ चित्रस्थ ५६८ ५७० भा ०1७ " उ ०1११ ५७६ उ ०१२ 33 श्र ०।१६ ५८४ अ ०१२८ ५८६ अ ० / ४ ५८७ अ ०१६ भा ०१६ ५६० भा ०1६ ५६१ भा ० २१ ५६३ भा ० २० ५६४ भा ०१६ 37 भा ० १२४ भा ०।१५ ५६५ ६११ भा ०।२५ " भा ०।२६ ६१२ भा ० १२३ ६१२ भा ०।१७ ६१३ भा ० | ३ " भा ० | ४ 31 भा ०1६ कं ० १५ भा ० | १४ ६२४ ६३० 17 भा ० | २३ ६३१ भा ० / ६ ६४० भा ० / २५ 1 अशुद्ध मुद्रित पाठ प्रतिस्विक उत्तरावेदि को पौराणविक पञ्चभिरेवचं तैत्तरीय यद्जरं मन से अयान्नपापादिति करववाता अत्याग्निष्टोम जमीन पर पर ..... विक्षया प्रत्येक का भाग विश्वास्तत्वं नहीं फिरता फिरता प्रथिय ( सू ) कहने के तय्यार हैं " " हविष्यि इति " शुक्रयेभ्यः आहूयजमान सत्ययेभ्यः ऊभि चक्षुर्भे अन्तरिक्ष्य सरहित यदुद्यवन्तरिक्षे जसे [ ७. ] शुद्धि पत्र ( द्वितीय खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ प्रातिस्विक उत्तरावेदि की पौराणिक पञ्चभिरेव च तैत्तिरीय स्थेत्येव यदजरं मनसे अपान्नपादिति करवाता अत्यग्निष्टोम जमीन पर .... विपक्षया प्रत्येक भाग विश्वास्त्वं नहीं फिरता प्रथयिते ( सु ) कहने के लिए तय्यार हैं । ..... हविष्य इति " शुक्रपेभ्यः आहूयमान शुक्रपेभ्यः सत्येभ्यः ऊर्भि चक्षु आन्तरिक्ष्य से रहित यद्यावन्तरिक्षे जैसे

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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / सं ० / पंक्ति संख्या शुद्धि - पत्र ( द्वितीय खण्ड ) शुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ ६४२ भा ० २२. ६५१ भा ० ११३ भा ० | १६ पश्चाघा पारमेष्ठी इन्द से इन्द्र के पञ्चधा " ६६० भा ०1५ अभ्यः ६६२ भा ०1१० ६६७ भा ०1७ कल्याणकारिणी सादेश्यात् पारमेष्ठ्य श्रम्भः कल्याणकारी सादृश्यात् ॥ इति शतपथब्राह्मणे अध्वरं नाम तृतीयं काण्डं समाप्तम् ॥ [ = ]