Tritiya Kand Dwitiya Khand Satpath Brahaman — पृष्ठ 681–690
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 681–690
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तृतीय काण्ड ( श्र ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण अधिषवण ब्राह्मण यह अध्वर्यु -" प्रागपागुदगधराक् सर्वतस्त्वा दिश श्राधावन्तु । श्रम्ब निष्पर समरी-विदाम् " । ( वा ० सं ० ६।३६ ) इस मन्त्र से निग्राभोपायन करता है । है ० सोम! उन सारे सुरक्षित स्थानों में से तुम्हें दिशाएँ ले आएँ । इस यज्ञ में सारा सोम आ जाए - यही तात्पर्य है । हे अम्ब! हे योषे निष्पर! अम्ब नाम पानी का है, यह पानी योषा रूप है एवं ये दिशाएँ भी योषा ही हैं एवं इन में यह अम्ब भरा रहता है, अतः स्थान सादेश्यात् दिशानों के लिए " अम्ब " प्रयोग कर दिया गया है । अपिच है अम्ब! सारी प्रजा श्रापको पहचान जाए । किसी को दिग्भ्रम न हो । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि प्रकृति - यज्ञ में इसी भाव को लिए हुए निग्राभोपायन हुआ करता है, अतएव चाहे अपनी प्रजा कितनी ही दूर चली जाए, फिर भी वह अपने घर को स्थान को - भाई बन्धुनों को भूलती नहीं । " योषा वाऽम्बा | योषा दिशः । तस्मादाह- अम्ब निष्परेति । सभरी-विदामिति । प्रजा वारीः । संप्रजा जानतामित्येवैतदाह । तस्माद्या अपि विदूर-मिव प्रजा भवन्ति समेव ता जानते । तस्मादाह - समरीविदामिति ” ॥२१ ॥
' इसका नाम " सोम " क्यों हुआ? ' - यह बतलाते हैं-" अथ यस्मात् सोमो नाम - ( तदुच्यते ) " । जिस समय यह सोम देवताओं का हवि बना, उस समय इसने विचार किया कि " मैं सर्वात्मना ही - सब का सब ही- देवताओं का हवि बन जाऊँ - इस डर से उसने जो अत्यन्त प्रियतम तनू थीं- उन्हें छुपा दिया । देवता सोम की इस कारस्तानी को जान गए । पहचान कर देवताओं ने कहा कि हे सोम! तुम अपने प्रिय तनू को अपनी ओर बुला लो एवं उसके साथ हमारी इस हवि को समृद्ध करो । सोम ने दूर ही से उसे बुलाया और कहा कि देखो! यह तनू मेरी स्वा तनू है । चूंकि सोम ने " स्वा मे " यह कहा, अतएव उसका नाम ' सोम ' हो गया । तात्पर्य यही है कि महर्षि लोगों ने अर्थांश के अनुसार तत् तत् पदार्थों के नाम रक्खे हैं । सोम चारों ओर व्याप्त रहता है- एवं थोड़ा सा प्राण - देवताओं के पास भी रहता है । इस सोम की वह दिक् सोम - स्वा तनू है | बस इसी अर्थ को ले कर - " स्वा मे " यह व्युत्पत्ति कर इस आहुति द्रव्य का नाम ' सोम ' रख दिया । अपिच - इस सोम का नाम ' यज्ञ ' क्यों हुआ? -यह बतलाते हैं । जो ऋत्विक् लोग इसे काटते हैं - वे इसे मारते ही हैं । काट कर रस निकाल कर - आहुति द्वारा इस सोम को सूर्य्यं तक वितत करते हैं-एवं वितत कर इसे दिव्यात्मरूप से - यज्ञात्म रूप से उत्पन्न करते हैं । पृथिवी से ऊपर की ओर वितत ' [ ६६७ ]
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तृतीय काण्ड ( अ ० ६ ) शतपथ ब्राह्मण विवरण ब्राह्म अर्थात् जाते हुए सोम को प्रात्म - रूप से उत्पन्न करते हैं । यह सोम ऊपर जाता हुआ दिव्यात्म-रूपेण उत्पन्न होता है, अतएव " यन् गच्छन् जायते " - इस व्युत्पत्ति से हम इसे " यञ्ज " कहने के लिए तय्यार हैं । ' यञ्ज ' ही बिगड़ते - बिगड़ते " यज्ञ " हो गया है ।
" स यन्- ( गच्छन् ) जायते ( दिव्यात्मरूपेणोत्पन्नो भवति - इति यञ्जः ।
यञ्ज एव परोक्षत्वाद् यज्ञः ) ” ॥२३ ॥
सोमाभिषवानन्तर अध्वर्यु - इस वाक् से कहता है अर्थात् सोमाभिषवानन्तर अध्वर्यु निम्नलिखित मन्त्र से इन्द्र की स्तुति करता है -" तत्रैतामपि वाचमुवाद " । " त्वमङ्ग प्रशंसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम् । न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मतेन्द्र ब्रवीमि ते वचः " इति । ( वा ० सं ० ६।३७ ) हे प्रङ्ग - हे इन्द्र! मरणधर्म्मा मुझ सोम को ( यजमान को ) प्रशस्त बनाइए । अर्थात् मेरे से खरीदा हुआ मेरा सम्पत् रूप ( यावद् वित्तं तावदात्मा के अनुरूप ) मुझ स्वरूप इस सोम को प्राहुति-रूपेण विस्तृत कर इसे देवतात्म - रूपेण फिर उत्पन्न कीजिए । इस सोम का प्रशस्तपना यही है कि यह दिव्यात्मा रूप में परिणत हो जाए । हे मघवन्! श्राप से अतिरिक्त सुख देने वाला दूसरा कोई है ही नहीं । अतएव मैं आप ही के लिए प्रार्थना वाक् बोलता हूं । " इन्द्र ही श्रात्मा है - यही हिततम है । इसीलिए कौषीतकी श्रुति कहती है-" एतदेवाहं मनुष्याय हिततमं मन्ये यन्मां विजानीयात् " इति । यह यजमान सामान्य मनुष्य हो कर इन्द्र से प्रार्थना करता है कि हे इन्द्र! आप ही प्रजनयिता हैं । मनुष्यों का हित चाहने वाला श्राप के अलावा कोई दूसरा नहीं है । यही मन्त्र का तात्पर्य है । " मयों हैवैतद्भवन्नुवाच - त्वमेवेतो जनयितासि - नान्यस्त्वदिति ॥२४ ॥
सोम कूटते समय - सोम में निग्राभ्या डाला जाता है । पात्र ४० ( चालीस ) होते हैं - रस थोड़ा निकलता है । अतः इसे बढ़ाने के लिए निग्राभ्या पानी डाला जाता है । बस, सोममिश्रित इन निग्राभ्या पानियों को ही होतृचमस द्वारा ४० ( चालीस ) ग्रह - पात्रों में ग्रहण करते हैं । होतृचमस से निग्राभ्या ले - ले कर पात्रों में डालते हैं - यही तात्पर्य है --" अथ निग्राभ्याभ्यो ( अद्द्भ्यो ) ग्रहान् विगृह्णते " । [ ६६८ ]
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तृतीय काण्ड ( ० ) इसकी उपपत्ति बतलाते हैं-शतपथ ब्राह्मण अधिषवण ब्राह्मण पानी ने वृत्रासुर को मार डाला । उसी वीर्य्यं के कारण पानी बहते रहते हैं । उनसे निग्राभ्या लेते हैं । निग्राभ्यों से ग्रहों में डालते हैं । इस प्रकार निग्राभ्या से डालना - उसी यज्ञ वीर्य से - इन्द्रवीर्य से इन्हें युक्त करना है । ऋक् योषा स्वरूप है । ऋग्वेदी होने के कारण होता ऋक् है, अतएव योषारूप है । योषा से ही प्रजा उत्पन्न होती है । हमें सोम से प्रजा उत्पन्न करनी है । अतः योषासम्बन्धी होतृचमस से ही - ग्रहों-में - निग्राभ्या डालते हैं || २५ || ॥ इति अधिषवणब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति नवमाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणं समाप्तम् ॥ ॥ इति तृतीयकाण्डे नवमोऽध्यायश्च समाप्तः ॥ [ ६६ ]
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इति शतपथस्य तृतीय काण्डस्य द्वितीयो भागः समाप्तः ॥
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" [ आधार पर भी आकार की दृष्टि से हैं । प्रत्येक कण्डिका - श्रं अंकित हैं । ( भाष्य ) भा पृष्ठ संख्य 2 २ ३ १० १२ १३ १४ " १६ १७ २२ ३२ ३४ ३५ ३६ ४० ४१
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शुद्धि - पत्र [ प्रस्तुत शुद्धि पत्र में शुद्धियों की प्रविष्टियाँ पृष्ठसंख्या एवं पृष्ठगत पंक्तियों की संख्या के आधार पर की गयी हैं । पंक्ति की गणना प्रत्येक पृष्ठ में समाहित पंक्तियों के क्रम के अनुसार है । किसी भी प्रकार के टाइप में मुद्रित हो, और कितनी ही छोटी - बड़ी दीर्घता में हो; प्रत्येक पंक्ति, संख्या- गणना की दृष्टि से, पूर्ण पंक्ति मानी गई है । उद्धरणों के नीचे मुद्रित सन्दर्भ - पंक्तियाँ गणना में सम्मिलित नहीं हैं । प्रत्येक पृष्ठ पर शुद्धियाँ क्रमश: ( १ ) मूलकण्डिका ( २ ) अनुवाद - भाग ( ३ ) व्याख्या - भाग तथा afuser - अंश के अतिरिक्त उस पृष्ठ के अन्तर्भुक्त ( ४ ) संस्कृतनिष्ठ अंश- इस क्रम से चार चरणों में अंकित हैं । शब्दों के संक्षिप्त रूप ये हैं- क ० = कण्डिका, उ ० = उद्धरण, अ ० = अनुवाद - भाग, भां ० = व्याख्या ( भाष्य ) भाग तथा सं ० = संस्कृतनिष्ठ अंश ( कण्डिका - इतर ) | सम्पादक ] पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित शुद्ध पाठ भाष्य / सं ० / पंक्ति संख्या कं ०११११ स्थणाराजो २ कं ०।१५।१५ ३ कं ० | २५ | २३ यद्दाति यद्ददाति १० ०/२२ जिसक जिसके १२ अ ०।३२ भू बहिर्भूत १३ श्र ० ४ हविवेदि १४ 15018 अध्वर्य हविर्वेदि अध्वर्यु श्र ० २६ 11 क्रूद्ध १६ श्र ० ३ १७ भा ०।२६ २२ सं ० २० ३२ भा ० / ६ ३४ भा ० / २१. उ ०१२८ " ३५ भा ०1३ ३६ भा ० ११० ४० ४१ भा ० / २६. भा ० । १ हृस्वता विक्रमान्ताविदो बतालाया गोरिवीताः आद्भ्यः. ' अपोलोकः ' अन्तरिक्ष्य सौर प्रारण के क्रुद्ध ह्रस्वता विक्रमान्तबिन्दौ बतलाया गौरिवीताः अद्भ्यः ' अपालोकः ' अन्तरिक्ष्य सौर प्रारण से सम्बन्ध से सम्बन्ध से सम्बन्ध से [ १ ] वागाग्नि 1
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / सं ० / पंक्ति संख्या ४१ भा ० १२० ४२ भा ० ११० ४३ भा ० | २३ ४६ भा ०१२३, २४ ४७ भा ० | १६ ४६ भा ० / २० भा ० / २५ " 1 भा ० | ४ ५० सं ० | ४ ५१ भा ० | ६ " } भा ० | १६ ५.२ सं ० २६ ५४ सं ०।१७ ५५ ५६ भा ० ११ ६० भा ०।१२ भा ० अंतिम ६१ ६४ भा ०1६ ६५ भा ० १६ सं ०।१५ " } सं ०1१ ६७ ६८ भा ०१४ सं ०।१० } } ७१ भा ० २१ भा ० १२५ 13 ७३ श्र ०१४ ७४ अ ०१३ ०।१२ " सं ०1२ ७६ भा ० | ४ | ६ | ११ 50 = १ भा ० १५।१४ भा ० १२० " 1 अशुद्ध मुद्रित पाठ ब्राह्मणस्पत्य मिल वालों को प्रशस्त्रा महयज्ञ संग्रहीत मानता ग्रहीत यज्ञ को श्रानृशंशा .... नौ ' प्रश्वाने देववाहन ' आवश्यकता: यच्ययावत् त्रिवत् मिट्टी अश्वा ' अर्ध्व.... " विराट् यज्ञः " । वागाग्नि .... भवतिः । उपग्र स्त्रुक् दि दोनों करणों रामस्पोष उपयभ्यते यभ्यतः याश्वा गुलगुल सम्वतसराग्नि [ २ ] शुद्धि पत्र ( द्वितीय खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ ब्राह्मणस्पत्य मिला वालों के प्रशस्या महायज्ञ मानना गृहीत एतेनान्येन यज्ञ सोम को आनुशंसा ..... नौ ' अश्वानि देववाहनानि ' आवश्यकता यच्चयावत् त्रिवृत् मिट्टी अश्म ' ऊर्ध्व.... " विराट् वै यज्ञः ” । ... " भवति । उपगृह्यते स्र ुक् वेदि दोनों कोणों रायस्पोष उपयम्यते ' यम्यतः याच्छा गुग्गुल सम्वत्सराग्नि
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या: कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / सं ० / पंक्ति संख्या ८७ अ ०१२३ ६१ अ ० / २८ ६४ भा ० | १६ १०० भा ०।५ भा ० | २३ " } उ ० | अंतिम १०२ १०३ उ ०१६ सं ०।१३ १०४ भा ० | अंतिम " " भाग १०५ भा ०1१ १११ ०/१५ ११२ भा ० १११ 13 भा ० | १३ उ ० | अंतिम ११४ ११७ उ ०१४ उ ० १६ 13 ११६ कं ० ह १२२ अ ०।२४ १२४ अ ०११८ १२७ अ ०।१७ १३१ उ ०।२४ ' १३२ भा ०1६. १३३ भा ० | १२ १३५ भा ० / १६ १३६ भा ० २० १३८ भा ०।१५ १५० अ ० / ३० १५७ भा ०1६ १६७ भा ०।१५ भा ० | १६ १६६ अशुद्ध मुद्रित पाठ सन्तृरणः याज्ञिकों कथन प्ररणा चिह्ना आध्यात्म .... हरिणां चतुर्गुहीत १० याद बस लाए याद पाद... बाद हविर्धानों लाते रखने निकलना एतादृश्यस्य छन्दषि ग्रन्थि कश्चिद्विषन् .... का को प्रउग फका ' रक्षहरणौ... " ग्रावभिहत्य ' ' ' ' खोदने चलना करने लिए ने गाड़ी थी कृत्या की भी ( जो ) उदम्बर श्रागत्वात् श्रादुति [ ३ ] शुद्धि पत्र ( द्वितीय खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ सन्तृपणः याज्ञिकों का कथन प्राण जिह्वा अध्यात्म ..... दक्षि वेणुः चतुगृहीत वाद बतलाए: वाद वाद ' ' ' ' वाद हविर्धानों को लाते रखना निकलनी एतादृशस्य छदींषि ग्रन्थि कश्चिद्विषन् का जो प्रउग फेंका ' रक्षोहणो ग्रावभिर्हन्य: खोदना चलाना करने के लिए गाड़ा था कृत्या को भी ( जी ) उदुम्बर श्रागतत्वात् ति
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शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / सं ० / पंक्ति - संख्या भा ० | १३ १७१ " उ ० / १६ अ ० | अंतिम १८० अ ०।२१ १८२ १८६ भा ० | २२ १६० भा ०15 भा ०।१२ १६१ पाद टिप्पणी | २ " भा ० | १ १६२ भा ० | ३ | ४ " उ ०१११ १६६ टेबिल २ " अन्तिम १६६ भा ०१२ २०० भा ०।१४ २०५ कं ० ११० २१० श्र ० २६ २१४ अ ० / २५ २१५ श्र ०1१४ २१६ २१७ अ ०।१२ भा ० | १४ २२३ भा ० / २२ " भा ० / २५ 33 भा ० | २३ २२५ सं ०1२७ २२७ २३० उ ०१३ भा ० / १६ २४६ भा ०1१८ २५५ श्र ० । अन्तिम २६६ अ ०११ २६८ 39 श्र ०१५ अशुद्ध मुद्रित पाठ निषेद एतद्वै.... अग्नये क सोम को एक नाम ३३ ( ग्रहण ) ही प्रज्ञाप्रणा ...... नोऽतु ' ब्राह्मणच्छंसी प्रकृतिक सोमनृदन्यं... श्रजिह्य वाग्नेय सर्वन्तरिक्षम् अनुवाक्य अधारिण ( गावा ) अग्नेय अग्निधीय सम्मिधन कनीयासं ... परिधीन्ः (...... अनन्तरा जाए । यशकल यप से यध्य अनिष्ठा [ ४ 1 शुद्धि पत्र ( द्वितीय खण्ड ) वांछित शुद्ध पाठ निषेध एतद्वै.... आग्नेय कद्रू. धिष्ण्यों सोम की दूसरी का नाम ३३ ( अहर्गण ) की सीमा ही प्रज्ञाप्रारण कालावच्छेदेन ...... नोऽस्तु ' ब्राह्मच्छंसी प्राकृति सोमशून्य अजिह्म रुर्वान्तरिक्षम् अनुवाक्या धोरण ( ग्रावा ) आग्नेय: आग्नीध्रीय समिन्धन कनीयांस "... परिधीन्-अनन्तर जाएँ । यूपशकल यूप से मध्य अग्निष्ठा