Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman — पृष्ठ 1–10
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1–10
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शुक्लयजुर्वेदीय- माध्यन्दिन शतपथब्राह्मण विज्ञानभाष्य " श्रध्वरनाम " तृतीय काण्डान्तर्गत [ प्रथम खण्ड ] पं मोतीलाल शास्त्री वेदवीथी - पथिक ब्रह्मवच राजस्थान मानवाश्रम शोध संस्थान -23 विद्यापीठ जयपुर , मूल्य: १०० )
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प्रकाशकः राजस्थान पत्रिका प्रा ० लिमिटेड, केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर । © सर्वाधिकार लेखकाधीन मुद्रक: श्री बालचन्द्र यन्त्रालय, " मानवाश्रम ", दुर्गापुरा रोड, जयपुर - १५
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॥ श्रीः ॥ समर्पण दिवंगत - महानात्म - स्वर्गीय पितुःश्री वेदवाचस्पति पं ० मोतीलालजी शास्त्री [ निधन - तिथि आश्विन अमावस्या, वि. सम्वत् २०१७ ] की २८ वीं पुण्यतिथि के अवसर पर श्राद्धकर्त्ता की ओर से श्रद्धापूर्वक समर्पित - कृष्णचन्द्र शर्मा
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वेदवाचस्पति पं ० मोतीलालजी शास्त्री 1908-1960
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प्रकाशकीय ( स्व ० ) पण्डित मोतीलाल शास्त्री प्रणीत शतपथ ब्राह्मण विज्ञानभाष्य के बृतीय काण्ड के प्रथम खण्ड का प्रकाशन करते हुए मेरे हर्ष का पारावार नहीं है । एक लम्बे अरसे से यह लिखित सामग्री उपेक्षित पड़ी रही । शतपथब्राह्मण विज्ञानभाष्य को शास्त्री जी ने अठारह हजार पृष्ठों में लिखा है, यह बात उन्होंने स्वयं प्रथम काण्ड के प्रथम भाग में लिखी है । इस विपुल सामग्री का अधिकांश भाग आज उपलब्ध नहीं है । शास्त्री जी के सुपुत्र श्री कृष्णचन्द्र शर्मा, जिनको कि अपने पिता की सम्पूर्ण लिखित सामग्री के संरक्षण का श्रेय है, कहते हैं कि उनके पास भी इस भाष्य के लगभग छः हजार पृष्ठ ही उपलब्ध हैं । शेष सामग्री कभी उनकी दृष्टि में नहीं आई । उनका अनुमान है कि पंडित मोतीलाल जी के जीवन - काल में ही उनके सम्पर्क में आने वाले विद्या प्रेमियों में से ही किसी ने उक्त सामग्री हस्तगत कर ली होगी । शतपथब्राह्मण विज्ञानभाष्य के प्रथम काण्ड के दो विशालकाय खण्ड तो शास्त्री जी स्वयं ही प्रकाशित कर गये थे । दूसरे काण्ड का प्रकाशन उदासीन सम्प्रदाय के प्राचार्य पूज्यपाद स्वामी गंगेश्वरा-नन्द जी ने अपनी संस्था की ओर से करवाया, परन्तु उस प्रकाशन में देखा गया कि ग्रन्थ के नाम में ' विज्ञान - भाष्य ' के स्थान पर ' समन्वयभाष्य ' लिख दिया गया और ग्रन्थ के रचयिता पं ० मोतीलाल जी शास्त्री के अलावा स्वामी गंगेश्वरानन्द जी का नाम भी जोड़ दिया गया । इस ग्रन्थ का संपादन शास्त्री जी के गुरुभाई स्वामी सुरजनदास जी महाराज ने किया जिसका प्रकाशन संवत् २०२६ वि ० मेंहुआ । इसके आगे प्रकाशन कार्य बन्द ही रहा । राजस्थान पत्रिका ने पं ० मधुसूदन ओझा और पं ० मोतीलाल शास्त्री के अप्रकाशित ग्रन्थों के प्रकाशन का महत् कार्य प्रारम्भ किया तो कुछेक प्रकाशनों के बाद यह सोचा गया कि अधिक आग्रह शतपथ ब्राह्मण पर रखा जाय । इसी निश्चय का परिणाम है कि प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रकाशन संभव हो सका । यह काण्ड भी आकार में लगभग १५०० पृष्ठों का हो जाने के कारण दो भागों में बाँट दिया गया है ताकि पाठकों को पढ़ने में असुविधा न हो । प्रस्तुत ग्रन्थ में सोम के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है । वेद में जगत् को अग्नि- सोमात्मक माना गया है । सोम को अन्न का रूप दिया गया है और अन्न ही सृष्टि के निर्वाह का आधार है । इस अन्न रूपी सोम का स्वरूप क्या है, उसकी उपलब्धि कहाँ और किस तरह होती है, यज्ञ - कर्म में इसका व्यवहार किस तरह किया जाता है और सृष्टि की उत्पत्ति में सोम किस तरह भागीदार होता है, इन सभी बातों का विशद विवेचन प्रस्तुत ग्रन्थ में किया गया है । [ ५ ]
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ग्रन्थ की कण्डिका f वस्तृत अनुवाद को दुष्कर कार्य स्वामी सुरजनदास जी महाराज ने किया । स्वामी जी के अतिरिक्त इस कार्य को इतनी सुचारुता से क्रिया जा सकता था, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती । वेद विज्ञान पर श्रोझाजी और शास्त्री जी ने जो कार्य किया है उसके संपादन में आज सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि उसके जानकार नहीं हैं । सौभाग्य से स्वामी जी हमें उपलब्ध हैं, जिन्होंने बरसों तक अपने गुरुवर प्रोझा जी महाराज के श्री चरणों की सेवा की है । पत्रिका ने जब यह कार्य शुरू किया तो स्वामी जी महाराज ने आगे बढ़ कर हमारा उत्साह वर्द्धन किया और सक्रिय रूप से स्वयं इस काम में जुट गये । प्रस्तुत ग्रंथ में प्रथम अध्याय के प्रारम्भिक तीन ब्राह्मणों की मूल कण्डिकानों का हिन्दी में उत्कृष्ट अनुवाद डॉ ० श्रीमती उर्मिला देवी शर्मा ( संस्कृत विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय ) ने किया है | महाराज संस्कत कॉलेज के प्राचार्य श्री कैलाश चतुर्वेदी ने पृष्ठ सं. ६७ से पृष्ठ सं. ३३६ पर्यन्त सम्पादन एवं प्रूफ संशोधन का भार वहन किया । पृष्ठ सं. ३३७ से प्रारम्भ कर शेष सम्पूर्ण ग्रन्थ ( पू. सं. ६७२ पर्यन्त ) के भाषा - सम्पादन एवं प्रूफ संशोधन के दायित्व का निर्वाह डॉ ० मदनगोपाल शर्मा ( सेवानिवृत्त, एसो. प्रोफेसर, राजस्थान . विश्वविद्यालय ) ने किया है । स्वर्गीय पं ० मोतीलाल जी शास्त्री के सुपौत्र श्री प्रद्युम्नकुमार शर्मा ने पृष्ठ सं. ३३७ से ग्रंथान्त पर्यन्त मनोयोग एवं श्रमपूर्वक इस ग्रन्थ में प्राये संस्कृत उद्धरणों के स्रोत ढूंढ कर सन्दर्भ अंकित किए हैं तथा मुद्रण कार्य को त्वरा से सम्पन्न किया है । श्री अश्विनीकुमार ने शुद्धि-पत्र के निर्माण में सराहनीय सहयोग प्रदान किया है । मैं उक्त सभी सज्जनों के प्रति समादर एवं हार्दिक शुभाशंसाएँ व्यक्त करता हूँ । इस ग्रन्थ का आगामी द्वितीय खण्ड मुद्रणाधीन है । इसकी अपेक्षा उसकी प्रस्तुति और भी सुष्ठु एवं समुन्नत स्तर की हो, यही हम सबका प्रयास रहेगा । ( ६ ) - कर्पूरचन्द्र ' कुलिश '
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शतपथब्राह्मण हिन्दी विज्ञानभाष्य तृतीयकाण्डानुगत प्रथमखण्ड विषय - सूची विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या अथ प्रथम अध्याय १ - देवयजन ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण ( मूल ) सूर्य्य- रश्मियाँ १४ देवयजन भूमि १५ देवयजन भूमि - वर्ष्म और सम भाव १५ ३ देवयजन भूमि - प्राक् प्रवरण १६ देवयजन ब्राह्मण ( हिन्दी अनुवाद ) ५ महाशाला का विधान १६ हिन्दी विज्ञानभाष्य प्रारम्भ ७ सर्पों की दिक् व्यवस्था २० अध्वर र चित्या यज्ञ ७ मानुषी दिक् व्यवस्था Ro सर्वात्मक और एकात्मक यज्ञ ८ यज्ञ में यज्ञिय मनुष्य का प्रवेश २२ संम्वत्सराग्नि ८ ऋक् - यजुः - साम २३ अग्न्याधान ६ २- दीक्षा ब्राह्मण चातुर्मास्य ६ ब्रीहियव श्यामाक ε दीक्षा ब्राह्मण ( मूल ) सम्वत्सर के तीन खण्ड १० दीक्षा ब्राह्मण ( हिन्दी अनुवाद ) सोमयाग के - सुत्या और ग्रह - दो भेद १० हिन्दी विज्ञानभाष्य प्रारम्भ २६ २६ ३२ पाँच मण्डलों के मनोता ११ केश और नाखून काटने की आवश्यकता क्यों? ३४ ज्योतिष्टोम - गोष्टोम - आयुष्टोम १२ भृगु मनोता ज्योतिष्टोम के सात प्रकार १२ प्राप्य वायव्य और सौम्य जीव पाकयज्ञ और वितानयज्ञ १३ १४ प्रकार के भूतसर्ग ३४ ३४ ३४ [ ७ ]
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प्रर्तिपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) विषय सूची ( प्रथम खण्ड ) विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या पानी ( प्रापः ) वायु- सोम से चेतना का सम्बन्ध ३५ क्रान्तिवृत्त का परिसर ७४ पानी और वज्र ३७ चन्द्रमा के लिहाज से तीन मार्गों की कल्पना ७५ स्नान करने की उपपत्ति ३६ अहोरात्र वृत्त ७८ अग्नि के तीन अवस्था - भेद ४१ सूर्य्य के सात घोड़े ७६ ४२ सूर्य के ताप से यच्चयावत पदार्थों की उत्पत्ति ८० ऋताग्नि ४२ अदिति - दिति मण्डल ८१ श्रङ्गिरा ४२ मर्त्य और अमृत ८३ वैश्वानराग्नि ४३ त्वष्टा वायु ८४ एषवराह ४३ मन्वन्तर ८५ सावित्री II आवृत् ( पद्धति ) ६० कुमाराग्नि के माठ उप - भेद ४५ अञ्जन विधिः प्रारम्भ ६४ पशु - अग्नि ४६ असुर समष्टि ( वृत्र ) सप्तपुरुष प्रजापति ४७ त्रककुद प्रञ्जन ६६ ३ - प्राग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मण नाष्ट्रा प्रारण १०१ अञ्जन लगाने की उपपत्ति १०२ श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण ( मूल ) ५३ यज्ञ की पाँच अवयवों में विभक्ति १०३ आग्नावष्णवेष्टि ब्राह्मण ( हिन्दी अनुवाद ) ५७ सप्तपुरुष १०५ हिन्दी विज्ञानभाष्य प्रारम्भ ६२ श्रात्मा स्वरूप चतुः प्राण समष्टि युक्त घड़ २०६ ब्रह्म और यज्ञ ६४ सप्तसंस्था का स्वरूप ११० पाँच विकारक्षर ६४ पाँच पश्वीकृत यज्ञक्षर ११३ पांच यज्ञक्षर ६५ ऋत सत्य का स्वरूप ११३ पानी से मानसी सृष्टि की उत्पत्ति ६६ यज्ञ का मुष्टिकरण ११६ पदार्थ के दो प्रकार ६७ यज्ञो वै स्वाहाकार ११७ ब्रह्म - विष्णु - इन्द्र समष्टि ( हृदय ) ६७ सर्वव्यापी वाक् - तत्त्व ११७ अग्नि के घन तरल - विरल अवस्था भेद ६८ वाक् - संयमन ११८ षड्ब्रह्म ६८ सृष्टि के दो प्रकार ११८ त्रिलोकी व्यवस्था ६६ प्रजापति की सात व्याहृतियाँ ४ — श्रौद्ग्रभण ब्राह्मण ६६ वषटकार मण्डल का स्वरूप ७० औद्भण ब्राह्मण ( मूल ) १२ ९ आहवनीय ७१ ओभर ब्राह्मण ( हिन्दी अनुवाद ) १२४ [ " ]