शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - ३-१ - मोतीलाल शास्त्री
Tritiya Kand Pratham Khand satapathabrahman · 714 पृष्ठ · 72 खण्ड
विषय सूची
- शुक्लयजुर्वेदीय- माध्यन्दिन शतपथब्राह्मण विज्ञानभाष्य " श्रध्वरनाम " तृतीय काण्डान्तर्गत [ प्रथम खण्ड ] पं मोतीलाल शास्त्री वेदवीथी - पथिक ब्रह्मवच… 1–10
- शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) विषय - सूची ( प्रथमं खण्ड ) विषय पृ ० सं ० विषय पृष्ठ संख्या हिन्दी विज्ञानभाष्य प्रारम्भ १३२ मृगचम्मों का सम्बद्धत्व १७३… 11–20
- श्रो ३ म् तत् सब्रह्मणे नमः अथ तृतीयकाण्डे प्रथमः प्रपाठकः प्रथमोऽध्यायः प्रारभ्यते तत्र प्रथमं ब्राह्मणम् । श्रथ देवयजनब्राह्मणम्… 21–30
- तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण देवयजन ब्राह्मण ज्योतिष्टोम शब्द से भी व्यवहृत किया जाता है । इसी का प्रारम्भ किया जायगा… 31–40
- तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणं " एष उ तत्र ( सोमयागे ) दीक्षितस्योपचारः ” । १० । देवयजनं ब्राह्मणं जिस प्रकार से विद्या- ग्रहण के लिए शिष्य दोनों हाथों… 41–50
- तृतीय काण्ड अ ० १ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षा ब्राह्मण दीक्षाकर्म में ही प्रविष्ट होना है । यह यजमान मनुष्य है— तब तक यह सोमयाग का अधिकारी नहीं बन सकता जब तक… 51–60
- तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण दोक्षा ब्राह्मणं जिसे कि " रथन्तरसाम " कहते हैं, वैसे ही इस सूर्य का भी एक सोलर सिष्टम है… 61–70
- अथ तृतीयकाण्डे प्रथमः प्रपाठकः प्रथमोऽध्यायः तत्र तृतीयं ब्राह्मणम् । श्रथ श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मणम् । [ मूल ] -| - श्रपः प्ररणीय… 71–80
- तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण प्रखर पंडित हो जाय ' इसलिए इसके अतिरिक्त और किसी की वाञ्छा न थी अतः उसके मुँह से निकल पड़ा कि… 81–90
- तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मणे श्राग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण ब्रह्म और यज्ञ यह दो ही तत्त्व हैं - यह हम इस ब्राह्मण के प्रारम्भ में बतला आए हैं… 91–100
- तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मरण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण पर ही पूर्ण दृष्टि पड़ती है । पूर्णक्षिजित जिसे कि वेद में ' हरित - जन ' और पाश्चात्य… 101–110
- तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण अतः दोनों इसमें बने रहें, मनुष्य भाव भी बना रहे, देव भाव भी बना रहे… 111–120
- तृतीय काण्ड ( ०१ ) प्रतिपथ ब्राह्मण श्रग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मी “ तदुत्तरमेवैतदुत्तराबत् करोति - इति । १६… 121–130
- तृतीय काण्ड ( ० १ ) शतपथ ब्राह्मण आग्नावैष्णवेष्टि ब्राह्मण फिर यजमान मन्त्र बोलता है- " वाक्पतिमनातु " । वाक्पति मुझे पवित्र करे… 131–140
- तृतीय काण्ड ( श्र ० १ ) शतपथ ब्राह्मण श्रद्ग्रभण ब्राह्मण अथ यद्ध वायामाज्यं परिशिष्टं भवति । तज्जुह्वामानयति त्रिःस्त्र वे-राज्य विलापन्याऽधिजुह्वां… 141–150
- तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभरण ब्राह्मण अग्नि अमर है इसलिए देवता ' अमरा ' " निर्जरा " कहलाते हैं… 151–160
- तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण औद्ग्रभण ब्राह्मण संसार में अग्नि और सोम यह दो ही तत्त्व सारा काम करते हैं… 161–170
- तृतीय काण्ड ( ०१ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिन दीक्षा अथ प्रोर्णुते । गर्भो वाऽएव भवति यो दीक्षते प्रावृता व गर्भा उल्बेनेव जरायुणेव तस्माद्वै प्रोर्णुते… 171–180
- तृतीय काण्ड ( ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा तत्पश्चात् यजमान मेखला की नीवी का “ सोमस्य नीविरसि " कहकर उपगूहन करता है, बांधता है… 181–190
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा " ऋचा समं मेने " यह कहा जाता है । जहाँ तक जिस वस्तु का सान जाता है, वहां तक उस वस्तु की सत्ता मानी जाती… 191–200
- तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण कृष्णाजिनदीक्षा है । इसीलिए किसी कार्य में प्रवृत्त होने पर वृद्ध पुरुष श्रादेश करते हैं, वत्स! कमर कस लो और इस… 201–210
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मरण " ह्वमिष्यते वै त्वेति स्वयं वा " कृष्णाजिनदीक्षा यज्ञ ने इच्छा की, विचार किया, यह वाक् योषा है अर्थात् स्त्री है… 211–220
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणं जपिष्यन् भवतीति वदन्तः " । [ २०३ ] कृष्णा जिनदीक्षा क्रिञ्च न तोह वा ऊर्क उदम्बरः… 221–230
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणे दीक्षितव्रत ब्राह्मणं होनी चाहिए । किन्तु यज्ञ द्वारा देवप्राण असुरों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं… 231–240
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शंतपंथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण अतएव अमृतस्वरूप होकर हमारी तृप्ति करें तथा हमारे ऋतभाग को बढ़ावें… 241–250
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मणं " यज्ञेन वे देवा इमां जितिजिज्ञुर्या एषांमियं जितिः " दीक्षितव्रत ब्राह्मण इस प्रकार प्रकृतिमण्डल में विजय का हेतुभूत जो… 251–260
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण देवताओं की चीज नहीं है । कारण इसका यही है कि देवता आग्नेय हैं । आग्नेय प्राण का नाम देवता है… 261–270
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण दीक्षितव्रत ब्राह्मण प्राण आते हुए का नाम है अतएव इसे मित्र कहते हैं । उदान जाता हुम्रा है प्रतएव उसे वरूण कहते हैं… 271–280
- तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मणं दीक्षितव्रत ब्राह्मण अग्नि ही देवताओं के व्रतपति है । ग्रग्नि ही से देवता सारे व्रत अन्न को प्राप्त करते हैं… 281–290
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतथि ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण शिरो वै यज्ञस्यातिथ्यम् । बाहू प्रायणीयोदयनीयावभितो वै शिरो बाहू भवतस्तस्मादभित आतिथ्यमेते हविषी… 291–300
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण सोम से देवतनों ने दक्षिण दिशा को पहचाना… 301–310
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मणं जब पृथिवी को देवताओं ने अलग निकाल दिया तो पृथिवी नाराज हो गई और नाराज होकर उसने देवताओं के यज्ञ… 311–320
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण यह कहा जाता है कि क्रान्तिवृत्त के पृष्ठ के प्रति बिन्दु से कदम्ब ९ ० अंश पर है एवं विष्वद्वृत्त… 321–330
- तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मणं प्रायणीयेष्टि ब्राह्मर्ण से मार्ग व्यवस्था कायम हुइ है उस स्थिर पदार्थ का ज्ञान हो… 331–340
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) अग्निना सोमेन सवित्रा पथ्ययास्वस्त्या श्रदित्या । २० । प्रायणीयेष्टि ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण प्राचीं दक्षिणां च । दक्षिणां प्रतीचीं च… 341–350
- तृतीय काण्ड ( अ ० २ ) शतपथ ब्राह्मरण सोमाख्यान ब्राह्मणं जब त्रिष्टुप भी सोम को न ला सकी तब गायत्री को सोम लाने के लिए सुपर्णी ने भेजा 1… 351–360
- तृतीय काण्ड ( अ ०२ ) शर्तपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्म अवश्य ही सोम खरीदना पड़ता है । खरीदे हुए सोम से ही यजमान यज्ञ कर सकता है क्योंकि भुवनं -त्रिलोकी के… 361–370
- तृतीय काण्ड ( श्र ० २ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणं बस स्वयम्भू के बाद का जो प्रापोमयमण्डल है वही परमेष्ठिमण्डल कहलाता है… 371–380
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण [ ३६३ ] सोमाख्यान ब्राह्मणं ( ऋग्वेद ३ । ३० । २२ ) ( यजु ० ७ ५ ) प्रजापति रहता है - " ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्दशेऽर्जुन… 381–390
- तृतीय काण्ड ( 9 शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मणं .८ आएगी । यह निश्चय कर देवताओं ने वाकू को भेज दिया । वाक् उन गन्धर्वों के साथ वापस लौट आई… 391–400
- तृतीय काण्ड ( ०२ ) शतपथ ब्राह्मण सोमाख्यान ब्राह्मण में भी, आशीर्वाद देने से जय - जयकार करने से ही कुछ प्राप्ति होती है… 401–410
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्ररणी ब्राह्मण वह अध्वर्यु ' अस्मे रमस्व ' इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ भूमि का परिलेखन करता है… 411–420
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमक्रयणी ब्राह्मण उस स्थान पर पानी छिड़कने की क्या आवश्यकता है - यह बतलाते हैं… 421–430
- तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनहनं ब्रह्मेणं! माध्यन्दिन सवन तथा सायं सवन इन तीन सवनों में ही होती है… 431–440
- तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनह्न ब्राह्मण से प्रजा प्रतिष्ठित रहती है । यदि राजा ही प्रतिष्ठित नहीं है तो फिर प्रजा की प्रतिष्ठा कैसे रह सकती… 441–450
- तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमोपनन ब्राह्मण उपयुक्त हो जाता है । अर्थात् सवितादेवताक मंत्र बोल कर सोम खरीदने से एवं विभाग करने से यह खरीदना उसकी… 451–460
- तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण श्रथ राजानमादायोत्तिष्ठति । उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृतां २… 461–470
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणन ब्राह्मण गाय की बहुत महिम ) है, यह दस वीथ्यों की धारक है, बहुत ही श्रेष्ठ वस्तु है… 471–480
- तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मणं " प्रतिपन्थामपद्महि स्वस्तिगामनेहसम् । सोमपरन ब्राह्मणं येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु । १५… 481–490
- तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपणहन ब्राह्मण हो तो इस वर्ष बहुत वर्षा होगी, और यदि एक बैल में ही काली परछाई प्रतीत हो तो भी ठीक वर्षा होगी यह… 491–500
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण " आसीदद्विश्वा भुवनानि सम्राट् - इति " । ४ । सोमपर्य्याणहन ब्राह्मणं सोम ही सम्पूर्ण भुवनों का सम्राट् बन कर बैठा… 501–510
- तृतीय काण्ड ( अ ० ३ ) शतपथ ब्राह्मण सोमपर्थ्याएहन ब्राह्मण शत्रु तीन तरह के होते हैं । एक तो आत्मनाशक होते हैं… 511–520
- तृतीय काण्ड ( ०३ ) शतपथ ब्राह्मरण सोमपर्थ्याणहून ब्राह्मण वह आसन्दी नाभि जितनी ऊँची होती है । हम जो अन्न खाते हैं, वह नाभि में जा कर प्रति-ष्ठित होता है… 521–530
- तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण प्रातिथ्येष्टि ब्राह्मण बीच में जो दो कुशाएँ उत्तराग्रमुख करके रखी जाती हैं वे ही ' विधृति ' कहलाती हैं… 531–540
- तृतीय काण्ड ०४ ) शतपथ ब्राह्मण अतिथ्येष्टि ब्राह्मण ब्रीहि! हे हवि!!, आप अग्नि के शरीर हैं- ऐसे प्रारको मैं विष्णु के लिए अर्थात् यज्ञ-साधक सोम के लिए… 541–550
- तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण आतिथ्येष्टि ब्राह्मण मस्तक उत्पन्न होता है । पाँव की ओर से तो कोई विरला ही उत्पन्न होता है… 551–560
- तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनध्त्र ब्राह्मणे मनुष्य मन से जैसा संकल्प करता है, वह संकल्प प्रारण पर आता है… 561–570
- तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मणं तानूनप्त्र ब्राह्मण " एष वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः ” | ( शत ० १ | ६ | ४ | ५ ) अन्तरिक्ष में वायु रहता है… 571–580
- तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण तानूनपत्र ब्राह्मण है - वायु उसी समय उन विद्वान् देवताओं को खबर कर देता है… 581–590
- तृतीय काण्ड ( अ ० ४ ) शतपथ ब्राह्मणं तनूनप्त्र ब्राह्मण " अनाधृष्टा हि देवाऽआसन्, अनाधृष्याः, सहसन्तः, समानं वदन्तः, समानं दध्राणा "… 591–600
- तृतीय काण्ड ( ०४ ) तपथ ब्राह्मण अवान्तरदीक्षा ब्राह्मण भाषण एवं मिथ्या - कर्म आदि व्रत -भंगों के प्रायश्चित्त के लिए अवश्य ही अवान्तर दीक्षा ग्रहण करनी… 601–610
- तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण " नाह पुराऽवभृथात् पुनर्दीक्षामवाकल्पयन् ( अतः प्रायश्चित्तिमैच्छ-दिति भावः ) "… 611–620
- तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण को ही स्वर्ग कहा जाता है । चयनयज्ञ के अतिरिक्त जो सोमयाग आदि हैं उनसे यही स्वर्ग मिलता है… 621–630
- तृतीय काण्ड ( श्र ० ४ ) शतपथ ब्राह्मण श्रवान्तरदीक्षा ब्राह्मण यज्ञ के इस सार - भाग को सामान्य मनुष्य नहीं पहचान सकते… 631–640
- चतुर्थाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ' उपसदिष्टि ब्राह्मण ' [ मूल ] ग्रीवा वै यज्ञस्योपसदः । शिरः प्रवर्ग्यः… 641–650
- तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्रह्मण १२ उपसत् कर्मों को दिन में दो बार करने से २४ उपसत् कर्म हो जाते हैं । मास संवत्सर में २४ अर्ध होते हैं… 651–660
- तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मण उसे हम पृथिवीलोक की वस्तु कहेंगे । चांदी अन्तरिक्ष प्राण से उत्पन्न होती है - अतएव चाँदी के पृथिवी पर… 661–670
- तृतीय काण्ड ( ०४ ) शतपथ ब्राह्मण उपसदिष्टि ब्राह्मणे “ स वै तिल उपसद उपेयात् " । संवत्सरस्वरूप वज्ज्र का संस्कार करने के लिए अग्नि - सोम - विष्णु का यजन… 671–680
- 201 ( शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या सं । २२ " 1 सं १ ९ उ ० / १ २० उ ० / १1१ " उ ०१… 681–690
- पथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति - संख्या १४७ ४ भा । १ १४८ भा । १६ " } भा । २४ " भा । १६ १४६ सं… 691–700
- शतपथ ब्राह्मण ( तृतीय काण्ड ) पृष्ठ संख्या कण्डिका / उद्धरण / अनुवाद / भाष्य / पंक्ति संख्या उ ० । ३ सूर्य एवाग्नेयः 11 उ ० १४ः सोऽमिध्याय " भा… 701–710
- ब्रम्हाण ( तृतीय काण्ड ) शुद्धि पत्र ( प्रथम खण्ड ) " 1 पृष्ठ संख्या: कण्डका / उद्धरण / अनुवाद / ४७३ भाष्य / पंक्ति - संख्या अशुद्ध मुद्रित पाठ वांछित… 711–714