Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 1–10

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 1–10

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उपनिषत्सञ्चयनम् ईशाद्यष्टोत्तरशतोपनिषदः आचार्य केशवलाल वी. शास्त्री.

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11317: 11 व्रजजीवन प्राच्यभारती ग्रन्थमाला 162 उपनिषत्सञ्चयनम् ( हिन्दीभाषानुवादसहितम् ) प्रथम: खण्ड: (ईशादिदशोपनिषदः ) अनुवादकः आचार्य केशवलाल वि० शास्त्री ज्ञानेसर्व प्रतिष्ठितम् चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान दिल्ली

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उपनिषत्सञ्चयनम् प्रकाशक चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान ( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक ) 38 यू. ए. बंगलो रोड, जवाहर नगर पो.बा.नं. 2113 facit 110007 दूरभाष: ( 011 ) 23856391, 41530902 सर्वाधिकार सुरक्षित प्रथम संस्करण 2015 मूल्य: 250.00 अन्य प्राप्तिस्थान चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन के. 37/117 गोपालमन्दिर लेन पो.बा.नं. 1129, वाराणसी 221001 चौखम्बा विद्याभवन चौक (बैंक ऑफ बड़ौदा भवन के पीछे ) पो.बा.नं. 1069, वाराणसी 221001 चौखम्बा पब्लिशिंग हाउस 4697/2, गली नं. 21 -ए, अंसारी रोड दरियागंज, नई दिल्ली 110002 मुद्रक ए.के. लिथोग्राफर्स, दिल्ली 978-81-7084-611-4 (Vol. 1 ) ISBN 978-81-7084-617-3 (Set)

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अर्पण- पत्रिका प्रात: स्मरणीय परमपूज्य पिताश्री स्व. श्रीविट्ठलजी पुरुषोत्तम मेहता ( शेरगढ़ - निवासी ) के चरण- कमलों में जिन्होंने अपने अपार वात्सल्य के द्वारा मेरी बाल्यावस्था में हुए मातृ- वियोग का मुझे कभी आभास नहीं होने दिया विनीत केशवलाल शास्त्री

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भूमिका पीठिकाबन्ध वैदिक धर्म के कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड जब अलग नहीं हुए थे, ऐसे समय में भी तात्त्विक चर्चाएँ नहीं होती थीं, ऐसी बात नहीं है । ऐसे समय में भी तो तात्त्विक चिन्तन होते ही रहते थे । पर वे चिन्तन उस समय प्रचलित यज्ञ संस्कृति के पर्यावरण में होते थे, इसलिए वे यज्ञों के अंगों पर आधारित थे । वेदों में परमेश्वर को 'पुरुष' शब्द से पहचाना गया है क्योंकि वह ब्रह्माण्डरूपी पुर में निवास करता है । वहाँ संसार यज्ञ माना गया है और उसका सर्जन यज्ञप्रसारण रूप में माना गया है । सृष्टि के सर्जक हिरण्यगर्भ भी वैश्वानर अग्नि के रूप में इस यज्ञमय विश्व के अध्यक्ष स्थान पर रहते हैं, ऐसा माना जाता था । वह अग्नि मनुष्य को स्वर्गलोक में ले जाता है, ऐसी उस युग के याज्ञिक लोगों की भावना थी । जगत् का आद्य सर्जक हिरण्यगर्भ है । उसका प्रतीक यज्ञीय अग्नि को माना और पूजा जाता था । विश्वसर्जक का प्रतीक यह अग्नि यज्ञसंस्कृति के लोगों के जीवन में केन्द्रस्थान में था । इसलिए सदैव वैश्वदेव - अग्निहोत्र प्रत्येक घर में किया जाता था और नैमित्तिक कर्मों में भी अग्निपूजन- यजन बौद्धिक प्रसन्नता के लिए, आध्यात्मिक आनन्द के लिए, तात्त्विक चर्चाओं के लिए निमित्त बनता था । अग्नि को विश्वसर्जक मानते-मानते उन लोगों ने धीरे- धीरे अग्नि का स्वरूप विकसित किया और यज्ञकाण्ड से ब्राह्मणग्रन्थों और आरण्यकों में आते-आते यह अग्नि अन्तर्यामी बन गया और यही अन्तर्यामी बाद में ईश्वर भी बन गया । यह अग्निरहस्य के विकास की ( अर्थ विकास की) परम्परा दीख पड़ती है । सामान्यत: वेदों में देवताबहुत्व की विभावना प्रचलित होने पर भी प्रत्येक देव एक ही ‘ सत्’ वस्तु के अनन्त रूपों में से कोई एक रूप है, यह भावना तो ऋषियों के अन्त: करण में पूर्व से ही जगी हुई - सी दिखाई देती है । श्रौतकाल के तत्त्वचिंतन को देखा जाय तो उस समय का तत्त्वचिंतन अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव - इन तीन पदार्थों का स्पर्श करता था । अधिभूत चिन्तन की प्रधानता हमें नासदीय सूक्त में दिखाई देती है, अधिदैव चिन्तन की प्रधानता वैश्वानर सूक्त में दिखाई देती है जबकि अध्यात्मभावना की प्रधानता वाक्सूक्त आदि में हम पाते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि तत्त्वचिन्तन का प्रारंभ उपनिषदों से ही नहीं होता । हाँ, जब ज्ञानकाण्ड कर्मकाण्ड से अलग हुआ तब चिन्तन की परिपक्वता ज्ञानकाण्ड में हम देख सकते हैं और अपेक्षाकृत वैदिक चिन्तन अपक्व था, यह कह सकते हैं । वैदिक चिन्तन का सिलसिला ब्राह्मणग्रन्थों के काल में भी रुका नहीं । वैदिक चिन्तन की अपेक्षा ब्राह्मणग्रन्थों के चिन्तन में कुछ व्यवस्था मालूम पड़ती है । वैदिक चिन्तन तो बिखरा हुआ ही था, उसमें कोई संकलन नहीं था, पर ब्राह्मणग्रन्थों के चिन्तन में किसी ऋषि के मन्तव्य को स्पष्टतया पकड़ने में हमें सरलता मालूम होती है । जैसे निहारिका में से थोड़ा स्पष्ट आकार बाहर आता हो, ऐसी ब्राह्मणकाल के चिन्तन की अवस्था है । किसी 'दर्शन' जैसी स्पष्ट व्यवस्था तो ब्राह्मणकालीन चिन्तन में भी दुर्लभ लगती है । यज्ञसम्बन्धी परिषदों में या धर्म की सामाजिक सभाओं में चिन्तन तो चलता रहा, परन्तु उसे प्रयोगान्वित करने का रहस्योद्घाटन तो बहुत काल के बाद ही हुआ ।

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( 6 ) यह रहस्य ऋषिलोग अपने शिष्यों को एकान्त में दिया करते थे । एकान्त में दिये जानेवाले उस रहस्य का नाम ही ‘ उपनिषद्' है । इन उपनिषदों ने भारतीय संस्कृति और समाज को हजारों वर्षों से प्रेरणा दी है और सांस्कृतिक पोषण दिया है । करोड़ों लोगों को प्रभावित किया है । जड़ प्रकृति के ऊपर चैतन्य की अन्तिम विजय की घोषणा करके इन उपनिषदों ने भारत में ( और बाहर भी ) आध्यात्मिकता की ज्योति जलती ही रखी है । उपनिषदों की यह महान् आध्यात्मिक परंपरा विश्व को भारत की बहुमूल्य देन है । जड़ प्रकृति पर चैतन्य की, भौतिकता पर मानव की इस विजय घोषणा ने भारत के लोगों में ऊर्जा भर है । यह भगीरथ कार्य उपनिषदों ने निर्भय होकर खोज करके तर्कों से उसे ठीक तरह से परिपुष्ट किया । इतना ही नहीं, अपितु बुद्धि का भी अतिक्रमण करके रहस्यमय अन्त:प्रेरणा ( अनुभूतियों ) के द्वारा भी किया । ऋषियों की ये अनुभूतियाँ हमेशा के लिए प्राय: विश्व की एकता की ओर अग्रसर थीं । इन ऋषियों की वह ऐक्योन्मुखी विचारधारा इतनी प्रभावी थी कि बाद के हजारों वर्षों के विचारकों में, सम्प्रदायों में, धार्मिक पन्थों में, भारत के समग्र इतिहास में उनके चिन्तन का प्रवाह गतिशील ही रहा । भले ही वे विचार उन पर पूर्णतया न छाये हों, परन्तु उन विचारों से वे अछूते नहीं रह पाये । सदियाँ गुजर गईं, पर विचारपरंपरा गतिमान ही रहीं । सही बात तो यह है कि बाद की विचारधाराएँ अपनी प्रामाणिकता के लिए उपनिषद् में प्रतिपादित उन ऋषियों के विचारों को या तो संपूर्णतः अपना लेती थीं, या उनकी ओर बड़े सम्मान के साथ देखती थीं, या तो उनके मार्ग पर ही चल रही थीं, अथवा कुछ इधर- उधर का मिश्रण करके उन्हीं विचारों को अपनी धारा में समा लेती थीं । इसमें नास्तिक दर्शन ( बौद्ध) और जैन दर्शन भी अपवाद नहीं है । कई संशोधक विद्वानों ने, उपनिषदों के इन ऋषियों के चिन्तन ने भारत के बाहर विदेशों में भी कैसा प्रभाव डाला है, उसके बारे में शोध किया है । जापान, चीन, कोरिया, पूर्व मध्य एशिया और पश्चिमी देशों का इसमें समावेश होता है । भारत की धार्मिक परंपरा ने उपनिषदों को उच्चतम प्रमाण के रूप में स्वीकृत किया है । इसीलिए तो उन्हें ' श्रुति' का आदरणीय नाम मिला है । उपनिषदें भारतीय धर्मपरंपरा के लिए नि: संदिग्धरूप से प्रमाण मानी गई हैं । 'उपनिषद्' शब्द का अर्थ ‘ उपनिषद्' शब्द ' उप' और 'नि' पूर्वक 'सद्' धातु से 'क्विप्' प्रत्यय जोड़ने से निष्पन्न होता है । ‘ सद्' धातु के तीन अर्थ होते हैं - 1. विशरण अर्थात् नाश होना, 2. गति अर्थात् प्राप्ति और 3. अवसादन अर्थात् शिथिल हो जाना । यह तो व्युत्पत्ति- लभ्य अर्थ है । पारिभाषिक रूप से उपनिषद् को अध्यात्मविद्या कहा गया है । यह ऐसी विद्या है कि जिसका अध्ययन करने से दृष्ट एवं आनुश्रविक ( श्रुतिगम्य) विषयों में से तृष्णा को छोड़कर मुमुक्षु लोग संसार की बीजभूत अविद्या का नाश कर सकते हैं । जो विद्या मुमुक्षुओं को परमतत्त्व (ब्रह्म) की प्राप्ति करा देती है तथा जिसके परिशीलन से जन्म- मरणादि दुःख-द्वन्द्वों का सर्वदा- सर्वदा के लिए शिथिलीकरण हो, वही अध्यात्मविद्या उपनिषद् है । तात्पर्य यह है कि ‘ सद्' धातु के विशरण (नाश ) के अर्थ में उपनिषद् अविद्या का नाश करती है, ' गति' के ( प्राप्ति के ) अर्थ में वह परमतत्त्व की प्राप्ति कराती है और ' अवसाद' (उदासी) के अर्थ में वह सांसारिक बन्धनों को शिथिल कर देती है । शंकराचार्य ने कठोपनिषद् तथा तैत्तिरीयोपनिषद् के के उपोद्घात में यही तात्पर्य प्रकट किया है । वे इसे ब्रह्मविद्या कहते हैं । शंकराचार्य के अनुसारभाष्यों

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(7 ) उपनिषद् का मुख्य अर्थ ब्रह्मविद्या है और गौण अर्थ ब्रह्मविद्या के प्रतिपादक ग्रन्थ होता है । ब्रह्म, जीव, जगत्, ईश्वर, माया– इन सबका परस्पर सम्बन्ध, मानव-जीवन का लक्ष्य, लक्ष्यप्राप्ति के उपाय आदि विषयों का उपनिषदों में विशद् वर्णन किया गया है । 'उपनिषद्' शब्द का एक और भी अर्थ हो सकता है । उप = नजदीक, नि = निष्ठापूर्वक, सीदति = बैठता है । अर्थात् शिष्य का निष्ठा ( श्रद्धा ) पूर्वक गुरु के पास बैठना, वह उपनिषद् है । यह एकान्त में गुरु के पास बैठना यह सूचित करता है कि गुरु से शिष्य को कुछ रहस्यमय ( गूढ ) विद्या की प्राप्ति के लिए ही ऐसा किया जा रहा है । वह आध्यात्मिक ज्ञान है जो अधिकारी शिष्यों को ही दिया जा सकता है । अनधिकारी को यह विद्या न मिले, इसकी पूरी सावधानी यहाँ बरती गई है । उपनिषदों का रचनाकाल उपनिषदों के कालनिर्णय के बारे में परम्परा तो कहती है कि वे श्रुति हैं और स्वयं ईश्वर के द्वारा कही गई वाणी है । प्रलय के बाद पूर्ववत् नयी सृष्टि के चलते हुए चक्र के प्रारंभ में ईश्वर के मुख से श्रुति ( वेद) ( उपनिषद् भी ) निकले हैं, इसीलिए उपनिषदें शाश्वत हैं । फिर भी उपनिषदों को अध्यात्मज्ञान के ग्रन्थों के रूप में देखते हुए, आज तक हमें जो मानव जाति का इतिहास ज्ञात है, उसके साथ जोड़ने के लिए उपनिषदों का कुछ- न- कुछ काल- निर्णय तो करना ही पड़ता है । इस दिशा में विद्वानों के प्रयत्न आज भी जारी हैं । पर विद्वानों के ये प्रयत्न अभी तक परितोषजनक नहीं हुए हैं । ये तो हमें और भी असमंजस में डालने वाले सिद्ध हुए हैं । उपनिषदों के काल- निर्धारण में ज्यादा तकलीफ होने का एक मुख्य कारण तो यह रहा है कि हिन्दू मस्तिष्क की एक खास लाक्षणिकता यह रही है कि उसने सर्वदा सिद्धान्तों पर ही बल दिया है, किन्तु उस सिद्धान्त के स्थापक तथा उसके काल पर कभी भी ध्यान नहीं दिया । उपनिषदें वेदों के आंतरिक भाग रूप हैं । इसलिए जो वेदों के निर्माण का समय होगा, वही उपनिषदों के निर्माण का भी समय मान लेना चाहिए । ऋग्वेद का समय तो ई.पू. 4500 ( तिलक ), ई.पू. 2400 तक (हँग) और 1200 ई.पू. ( मैक्समूलर) तक फैला हुआ है । अर्वाचीन पश्चिमी विद्वान् उपनिषदों का समय ई.पू. 700 से ई.पू. 600 रखते हैं और मानव के तत्त्वज्ञान सम्बन्धी क्रमिकहोते- विकास का मानदण्ड मन में रखते हैं । वे कहते हैं कि वेद में बिखरे हुए चिन्तन को व्यवस्थितवर्ष बीत होते वेद के बाद ब्राह्मणग्रन्थों और वहाँ से आरण्यकों में आकर उपनिषद् तक आने में सैंकड़ों है कि चुके होंगे । लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने खगोलशास्त्रीय आधार पर यह सिद्ध किया उपनिषदों का रचना- काल ई.पू. 1900 होना चाहिए । इसलिए उनके मतानुसार और उनके मतानुयायीतक का अन्य विद्वानों के अनुसार भी उपनिषदों का रचना- काल ई.पू. 2500 से लेकर ई.पू. 2000 होना चाहिए । हैं । जिन दस उपनिषदों पर शंकराचार्य ने भाष्य लिखे उनमें से कुछ बहुत प्राचीनहोता हैमालूमकि येपड़तीउपनिषदें ये उपनिषदें बुद्ध के जन्म के पहले की हैं यह नि: संदिग्ध बात है । ऐसा मालूमबाद बनी हुई मालूम पड़ती एक साथ नहीं, धीरे - धीरे बनती रहीं । इसलिए कुछ उपनिषदें बुद्धजन्म केके उदय के बीच में माना जा हैं । उपनिषदों का रचनाकाल वैदिक सूक्तों की समाप्ति और बौद्धधर्मतो अभी हो नहीं पाया है । सकता है, ऐसा भी कुछ विद्वान् मानते हैं । सर्वसम्मत कालनिर्णय

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( 8 ) शंकराचार्य के भाष्यवाली कुछ उपनिषदों को कुछ विद्वान् बुद्ध के जन्म के बाद की मानते हैं । जो उपनिषदें गद्य में हैं और जिनका कोई सम्प्रदाय नहीं दीखता, वे प्राचीनतम हैं । कौषीतकी, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और केनोपनिषद् का कुछ भाग इस श्रेणी में आते हैं । उपनिषद् नामवाले जो ग्रन्थ आज छपे हुए मिलते हैं, उनकी संख्या लगभग 200 से ऊपर जाती है । मुक्तिकोपनिषद् में 108 नाम गिनाए गए हैं । उपनिषदों के ऊपर सबसे प्राचीन भाष्य शंकराचार्य (788-820 ) का ही है । भाष्य के लिए उन्होंने केवल 10 उपनिषदें चुनी हैं । अपने किए हुए भाष्य के अतिरिक्त अन्य उपनिषदों का उल्लेख उन्होंने ब्रह्मसूत्र के भाष्य में किया है । रामानुज ने ( 1017- 1137 ) शंकराचार्य के उपरान्त दो अन्य उपनिषद् भी चुनी हैं । इन दोनों आचार्यों द्वारा चुने गए उपनिषद् ग्रन्थों को ही प्राचीनतम और प्रामाणिक मानें तो यह तालिका इस प्रकार हो सकती है- ऐतरेय, बृहदारण्यक, छान्दोग्य, ईश, जाबाल, कैवल्य, कठ, केन, माण्डूक्य, महानारायण, मुण्डक, प्रश्न, श्वेताश्वतर, तैत्तिरीय और वज्रसूचिका- ये पन्द्रह उपनिषदें हैं । उपनिषदों का वर्गीकरण जहाँ तक | उपनिषदों के वर्गीकरण का प्रश्न है, वहाँ विविध, विषयानुसारउपयोग कियाभीहै उपनिषदोंकुछ लोगकारचनाविषयकवर्गीकरण करतेविभागीकरणहैं । करते हैं कुछविद्वानोंलोग नेवेदानुसारविविध तोपद्धतियोंकुछ लोगका यज्ञकाण्ड के कर्मविभाग में से ज्ञानकाण्ड के चिन्तन विभाग की बाद में ही रचना हुई । उन्हें उपनिषद् कहा गया । कुछ समय के बाद उन उपनिषदों का समुच्चय हुआ । यह समुच्चय दो स्थानों में हुआ । एक उत्तर भारत में हुआ और दूसरा दक्षिण भारत में हुआ । दक्षिणापथ में किए गए समुच्चय में 52 उपनिषदें संगृहीत हुई हैं, जबकि उत्तरभारत में संकलित उपनिषत्संग्रह में 108 उपनिषदें समाविष्ट हुई हैं । पहले समुच्चय पर श्रीनारायण की दीपिका नामक टीकाएँ हैं । यह समुच्चय, नारायण ने स्वयं किया हो ऐसी अवधारणा की जा सकती है । पर दूसरा समुच्चय भी ( ) पहले की अपेक्षा बाद का संकलन मालूम होता है । उत्तर भारत का भाष्यकार भगवान् श्री शंकराचार्य की दृष्टि में उपनिषद् कितनी होंगी, यह कहना, बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, मुण्डक-, है । फिर भी उनके ग्रन्थों के अन्तः साक्ष्य के आधार पर छान्दोग्य मुश्किल सा काठक, कौषीतकि, श्वेताश्वतर, प्रश्न, ऐतरेय, जाबाल, महानारायण, ईशावास्य, पैंगल, – चौदह उपनिषदों के उपरान्त माण्डूक्योपनिषद् की गौड़पाद कारिका को प्रकरण केन इन केवल माण्डूक्योपनिषद् को आगम भाग माना जाता था । माना जाता था और रचनाविषयक दृष्टिकोण से देखा जाय तो (क) प्राचीन गद्यात्मक ऐतरेय, तैत्तिरीय, कौषीतकि, केन और छान्दोग्य आती हैं । (ख) पद्यात्मक उपनिषदों में बृहदारण्यक,, ( ),, श्वेताश्वतर, मुण्डक और महानारायण हैं । और ग श्रौतकाल के अन्तभाग उपनिषदोंके में काठक ईश प्रश्न मैत्रायणी और माण्डूक्य हैं । गद्यात्मक उपनिषदों में शंकराभिमत चौदह एवं माण्डूक्य समेत 15 उपनिषदों का वैदिक जाय तो ऋग्वेद के एतरेय ब्राह्मण की ऐतरेयोपनिषद् और कौषीतकिशाखानुसार वर्गीकरण किया ( कृष्णयजुर्वेद ), मैत्रायणि (कृष्णयजुर्वेद ), काठक (लुप्त शाखा) हैं । यजुर्वेद की तैत्तिरीय बृहदारण्यक (काण्व शाखा ), ईशावास्य ( शुक्लयजुर्वेदीय वाजसनेयि शाखा, श्वेताश्वतर) और महानारायणोपनिषद्( लुप्त शाखा ),