Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 11–20
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 11–20
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( 9) (कृष्णयजुः शाखा ) हैं । सामवेद की छान्दोग्य ( ताण्ड्य शाखा ), केनोपनिषद् अथर्ववेद की मुण्डक, प्रश्न, नृसिंहतापनीय और माण्डूक्य हैं । (इस प्रकार ( 15जैमिनीयसंख्याशाखा) तथा होती है । ) किन्तु बात तो पूर्वोक्त 15 या 16 उपनिषदों के वर्गीकरण की ही हुई 108 उपनिषदों का समुच्चय हुआ है, उनका वर्गीकरण भी तरह - तरह से । पर उत्तर भारत में जो तत्त्वप्रधान आदि कई विभागों में इन उपनिषदों को बाँटने का प्रयत्न करते किया गया है । कुछ लोग उपनिषदों के मर्म- ग्रहण के लिए ऐसे वर्गीकरण ज्यादा लाभदायक नहींहुएप्रतीतदृष्टिगोचर होते हैं । किन्तु होते । उपनिषदों की संख्या ऊपर बताए गए 15 या 16 उपनिषदों के अतिरिक्त भी अनेक 'उपनिषद्' नाम के ग्रन्थ होते हैं । ऐसे ग्रन्थों की संख्या 108 अथवा 200 से 240 तक पहुँच गयी है । श्रौतकाल दृष्टिगोचरसे लेकर मुसलमानों के अर्वाचीन राज्यशासनकाल तक के समय में 'उपनिषद्' नामक देवीछायावालीआदिग्रन्थों नामका‘ वज्रसूचिबहुत ’बड़ाका विस्तारभी प्रवेशहोहोगयागयाहैहै ॥ ‘ अल्लोपनिषद्शाक्त आगम 'कीभीत्रिपुराइसमें, कालीघुस गई, अन्नपूर्णाहै । बौद्धधर्म, भावना, की, उपनिषदें भी शामिल हो सप्रमाण स्थान न बताया जाए गई हैं, वहाँ। परन्तुतकइनउन्हेंसभीश्रौतकोनहींजहाँमाननातक चाहिएसंहिता । ब्राह्मणये उपनिषदेंया आरण्यककीकेअनेकसाथ समय के बाद अपने - अपने सम्प्रदाय के प्रचार-प्रसार के लिए लिखी गई हैं और उन्हें ‘ उपनिषद्बाद में 'बहुतका आदरसूचक नाम भी दिया गया है, जिससे रूढिवादियों और उन-उन मतावलम्बियों में ऐसे ग्रन्थों का आदर, स्वीकार और प्रमाण माने जाएँ । कुछ भी हो, लेकिन इतना तो मानना ही पड़ेगा कि भले ही ये बाद की उपनिषदें शुद्ध साम्प्रदायिक हों, फिर भी उन्होंने उपनिषद् का स्वरूप ज्यों -का- त्यों रखने का प्रयास किया है । यह बाह्य बात तो ठीक है, पर उन्होंने लोकधर्म के प्रचार- प्रसार में अच्छा योगदान दिया है और सामान्य जनसमाज की नैतिक जीवनशैली को बढ़ावा दिया है । साथ ही लोगों में आध्यात्मिक चेतना एवं वेदान्तिक अधिगम को जाग्रत् रखने में बड़ा योगदान दिया है, इसमें कोई सन्देह नहीं । इन बाद की उपनिषदों का वर्गीकरण छः भागों में किया जा सकता है— ( 1 ) वेदान्ती उपनिषदें, ( 2 ) शैव उपनिषदें, ( 3 ) शाक्त उपनिषदें, ( 4 ) वैष्णव उपनिषदें, ( 5 ) योग उपनिषदें और ( 6 ) संन्यास उपनिषदें । इनमें ये बाद की वेदान्तोपनिषदें तो जहाँ तक सामान्य सिद्धान्तों का प्रश्न है, उन्हीं पुरानी मुख्य उपनिषदों के मार्ग पर ही चलती हैं । शैव, शाक्त और वैष्णव उपनिषदें हठयोग और पतंजलि के सूत्रों पर आधारित राजयोग सम्बन्धी अनेकानेक हकीकतें बताती हैं, और भी कई नयी बातें कहती हुई दिखाई देती हैं । संन्यास उपनिषदें विशेषरूप में संन्यास की और साधना की बातें बताती हैं । उपनिषदों का स्वरूप पहले कहा जा चुका है कि प्राचीन 10 से लेकर 15 उपनिषदें ही प्राचीन भारतीय तत्त्वज्ञान की नींव के समान मानी गई हैं । फिर भी ये पुरानी उपनिषदें क्या एक ही तत्त्वज्ञान सिखाती हैं, या भिन्न-भिन्न प्रकार की तत्त्वज्ञान पद्धतियाँ बताती हैं? यह प्रश्न विशेष करके विदेशी आलोचकों के मन में उठता है । भारतीय परंपरा तो यही मानती आई है कि समग्र औपनिषदिक वाङ्मय ‘ श्रुति' नाम से एक ही है और इसीलिए वह तत्त्वज्ञान की एक ही पद्धति सिखाता है । हाँ, उस एक ही पद्धति के अनेक पहलू हो सकते हैं? फिर भी वह समन्वित रूप से एक ही है ।
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( 10 ) परन्तु इन उपनिषदों के विविध उपदेशों को देखते हुए हमें सहज ही वह परम्परित दृष्टिकोण परितोषजनक नहीं मालूम पड़ता । उपनिषदों के परम्परागत भाष्यकारों ने किसी तरह हमारी इस समस्या को हल करने का प्रयत्न किया है । उन्होंने उपनिषदों के मंत्रों के अपने मतानुसार विवरण किए । हमारे मस्तिष्क में उठे हुए प्रश्न का— उपनिषदों के तत्त्वज्ञानी एकता या अनेकता के प्रश्न का—कुछ समाधान तो हमें मिल जाता है, क्योंकि एक भाष्यकार द्वारा अपना मत स्थापित करने के लिए एक ही मंच पर अन्य भाष्यकारों के मतों का खण्डन किया हुआ पाया जाता है । क्या यह संभावना भी हो सकती हैं कि सदियाँ बीत जाने से उपनिषदों की पारस्परिक एकसूत्रता के समन्वयकारी कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त खो गये हों, और आज जो हमारे हाथ में है, वह खाली उन मुख्य सिद्धान्तों के टुकड़े मात्र ही शेष रह गये हों; और वे ही टुकड़े हमें उन परस्पर- विरोधी विचारों की ओर खींचते रहे हों । ठीक है यह कल्पना युक्तियुक्त तो लगती है परन्तु इसके लिए हमें कोई प्रमाण नहीं मिलता नहीं है, अतः यह धारणा कोरी कल्पना ही लगती है । अथवा एक दूसरी धारणा भी की जा सकती है कि उपनिषदों में उल्लिखित गौतम, अत्रि, याज्ञवल्क्य, श्वेतकेतु अथवा रैक्व आदि बहुत महान चिन्तक और रहस्यवादी थे । उन्होंने अपने ढंग के स्वतंत्र मौलिक विचार, युक्ति और अनुभूति के आधार पर प्रकट किए, जिसके कारण उपनिषदों में विचार- वैविध्य आ गया हो । क्योंकि आखिर परमसत्यरूप पब्रह्म तो अनन्त है और वह किसी के द्वारा सम्पूर्णतया तो नहीं जाना जा सकता । इसलिए अन्धों ने हाथी एक-एक अंग पकड़कर हाथी को अपने पकड़े हुए अंग जैसा ही बताया, उसी तरह उन ऋषियों ने भी अपनी अनुभूति के अनुसार परमतत्त्व ब्रह्म के एक ही पहलू को पकड़कर उसका तर्कपूत निदर्शन कर दिया हो, यह भी संभव है । तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि भले ही इन ऋषियों के विचार अलग-अलग दिखाई देते हों, फिर भी वे एक ही परमसत्य परब्रह्म के ही विविध पहलू हैं? इन 15 या 16 उपनिषदों के बारे में ज्यादा-से- ज्यादा ये सब केवल बौद्धिक अवधारणाएँ ही हैं । और ये अवधारणाएँ अब भी चालू ही हैं और कुछ समय तक चालू ही रहेंगी । उपनिषदों के ऊपर संस्कृत में टीकाएँ इन प्राचीन उपनिषदों को रहस्यमय ग्रन्थ माना जाता है । इसलिए उनका नाम ‘ उपनिषद्’ भी अन्वर्थक ही है । ' उपनिषद्' शब्द की व्युत्पत्ति ही यह बता रही है । उपनिषदें अपने स्वरूप और अपने विषय — दोनों में चिन्तन-प्रधान हैं । उपनिषदों की भाषा आदिम युग की और कालग्रस्त है । उपनिषदों की कई विभावनाएँ ( अनुभूतियाँ) ऐसी हैं, जिनका सम्बन्ध संहिताकालीन यज्ञप्रधान संस्कृति से जुड़ा हुआ है । और कुछ ब्राह्मणकालीन विचारों से एवं भावनाओं से भी उनका सम्बन्ध है, जो आज हमारी समझ में नहीं आता । उपनिषदों की ऐसी बातों से हम हजारों साल की दूरी पर आज हो गए हैं, तत्कालीन विधि- विधानों से आज हमारा कोई सरोकार नहीं रहा है । यही कारण है कि किसी प्रमाणभूत भाष्य ( या व्याख्या) के बिना उपनिषदों के विचारों की एकसूत्रता को और कभी - कभी तो सामान्य बात को भी समझना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाता है । उपनिषदों के भाष्यों में सबसे प्राचीन और सर्वप्रथम भाष्य शंकराचार्य ने लिखा । बाद में शंकराचार्य के उपनिषद्- भाष्यों को ही ज्यादा स्पष्ट करने के लिए उन्हीं भाष्यों पर बहुत सी टीकाएँ लिखी गईं । उन टीकाओं में तेरहवीं सदी के आनन्दगिरि की टीका का विशेष महत्त्व है | आनन्दगिरि की ये टीकाएँ उपनिषद् के ज्ञानरहस्य का ताला खोलने में चाबी का काम करती हैं ।1
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( 11 ) रामानुज ने भले ही किसी भी उपनिषद् पर भाष्य- टीका आदि कुछ लिखा न हो, पर उन्होंने अपने ‘ वेदार्थसारसंग्रह’ में उपनिषदों के कुछ चिन्तन को और कुछ भावनाओं को विस्तार से समझाने का कुछ प्रयत्न तो किया है । परन्तु, ई. स. 1600 में हुए उसी सम्प्रदाय के रंगरामानुज ने सभी मुख्य उपनिषदों पर टीकाएँ लिखकर रामानुज का काम पूरा कर दिया । मध्वाचार्य (ई. 1199-1303 ) ने भी प्राचीन दस उपनिषदों पर संक्षिप्त में टीकाएँ लिखी है तथा उनके ऊपर राघवेन्द्र तीर्थ ने (ई. 1595-1671 ) संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखी हैं । उपनिषदों पर संस्कृत व्याख्याकारों में कुछ ऐसे भी टीकाकार हुए हैं जिन्होंने प्राचीन दस उपनिषदों में से अपनी टीका के लिए कुछ ही उपनिषदों का चयन किया है । ऐसी उपनिषदों में ईशावास्योपनिषद् प्रधान है । इस उपनिषद् ने बहुत से विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है । उन विद्वानों में ब्रह्मानन्द सरस्वती, शंकरानन्द ( 14 वीं सदी ), उवटाचार्य ( 11 वीं सदी ) और वेदान्तदेशिक ( 1268-1370 ) के नाम उल्लेखनीय हैं । पहले कहे गए मध्वसंप्रदायी राघवेन्द्र तीर्थ ने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक और माण्डूक्य उपनिषदों पर साम्प्रदायिक टीकाएँ लिखीं । पिछले वर्षों में उपनिषद्ब्रह्मयोगीन्द्र ने प्राचीन उपनिषदों के अतिरिक्त अन्य सामान्य उपनिषदों के ऊपर भी अपनी टीकाएँ लिखकर एक सराहनीय काम कर दिखाया है । उपनिषदों का तत्त्वज्ञान एक तरह से देखा जाय तो उपनिषदों का विचारप्रवाह ब्राह्मणग्रन्थों और आरण्यकों से अविच्छिन्न धारा के रूप में माना जा सकता है । फिर भी उपनिषदों का झुकाव तो अवश्य ही वैदिक विधिविधानों के विरोध की ओर ही है । सभी उपनिषदें बाहरी क्रियाकाण्डों का घोर विरोध करती हैं और उपासना एवं ध्यान के ऊपर ही जोर देती हैं तथा ज्ञान- अनुभूति को ही सर्वप्रथम स्थान देती हैं । उपनिषदों की तात्त्विक चर्चाओं में, संवादों में ज्यादातर इस जगत् के मूल कारण की चर्चा दृष्टिगोचर होती है । उसी नींव की खोज में प्रश्नोत्तरी हुआ करती है । ऋषिलोग इसी की चर्चा करते हुए, खोज करते हुए सोचते हैं कि क्या इस जगत् का कोई एक उपादान कारण हो सकता है? और यदि है तो उसकी जगत् के रूप में उत्क्रान्ति करने की सहज प्रकृति क्या है? अपनी खोज के अन्त में ऋषियों ने जो तत्त्व पाया वह 'ब्रह्म' है । उपनिषदों का यह परमतत्त्व यों तो वैदिक काल के ऋग्वेदीय ऋषियों के चिन्तनों में दिखाई देता है । वहाँ इसका नाम 'ऋत' था । यह ऋत की संकल्पना 'ब्रह्म' जैसी ही मनोरम है । ऋत का अर्थ है — ‘ अविनाशी सत्ता' । उपनिषदों के ब्रह्म की तरह इस ऋत के कारण ही सृष्टि की उत्पत्ति होती है । ऋग्वेद के ‘ऋत' की तरह ही अथर्ववेद के 'स्कम्भ सूक्त' ( अथर्व. 10.7-8 ) तथा ‘उच्छिष्ट सूक्त' ( अथर्व. 11.9 ) पर विचार करने से ऐसा स्पष्टरूप से दिखाई देता है कि ब्रह्म को ही पारमार्थिकता और जीव-ब्रह्मैक्य की बात अथर्ववेद में भी अस्तित्व रखती थी । अतः यह कल्पना नहीं की जा सकती कि शुरू में अनेक देववाद के बाद एकेश्वरवाद और बाद में उपनिषदों में ही पहली बार सर्वेश्वरवाद के दर्शन होते हैं । चिन्तन के क्रमिक विकास की यह धारणा चाहे कितनी भी मनोनुकूल, मनोहर और क्रमिक विकास के सिद्धान्त पर अवलम्बित दिखाई देती हो, परन्तु वास्तविक भूमि पर वह टिक नहीं सकती, कल्पना के सिवा इसका कोई बहि: साक्ष्य ऐतिहासिक
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( 12 ) प्रमाण नहीं मिलता । हाँ, विचार की व्यापकता के तौर पर हम यह अवश्य कह सकते हैं कि उपनिषदों के समय में ब्रह्मात्मैक्य का यह विचार ज्यादा व्यापक था । ब्रह्म और आत्मा कुछ भी हो, जिस परमतत्त्व को ( जगत् के मूल कारण को ) उपनिषदों ने 'ब्रह्म ' नाम से पुकारा है, इस 'ब्रह्म' तत्त्व की खोज करते- करते उन्होंने यह भी चिन्तन किया कि हमारे इस मन: शारीर संकुल के पीछे किसी शाश्वत तत्त्व की हस्ती है भी या नहीं? ऋषियों की समानान्तर खोज के परिणामस्वरूप एक तत्त्व जो उन्हें मिला उसी तत्त्व को वे ' आत्मा' कहने लगे । बाद में प्रश्न उठे कि यह व्यक्तिनिष्ठ परमतत्त्वरूप आत्मा एक है, या अनेक? उसका परिमाण ( आकार) क्या है? वैश्विक परमतत्त्व रूप ब्रह्म से उसका क्या सम्बन्ध है? उपनिषदों में इन सभी प्रश्नों की चर्चा तो की गई है, पर इन प्रश्नों का कोई एक निश्चित उत्तर पाना मुश्किल - सा लग रहा है । क्योंकि इन विषयों में विविध मतमतान्तर दिखाई दे रहे हैं । फिर भी परम्परागत वेदान्तसम्प्रदाय उन विरोधों और विविधता का मेल बिठाने के लिए किसी तरह अविरोध का समन्वय करने के लिए बड़ा कठिन परिश्रम करते दिखाई देते हैं । वे किसी तरह अपने साम्प्रदायिक दृष्टिकोण को ही सही बताने पर तुले हुए हैं, और अन्य मत का खण्डन उनका मुख्य विषय बन गया है । उपनिषदों का दूसरा विषय मनुष्य की मरणोत्तर गति के बारे में है । इसके अतिरिक्त आचारपक्ष एवं नीति-नियमों का है । मनुष्य का संसार में बन्धन होने का कारण उसका अज्ञान है और उस अज्ञान का निरसन आत्मसंयम आदि की साधना से हो सकता है । इसके साथ ही सत्यभाषण, अहिंसा आदि कुछ सद्गुणों का भी वर्णन किया गया है । उपनिषदों के उपदेशों का कुछ विवरण यहाँ संक्षेप में दिया जा रहा है । आत्मा उपनिषदों में आत्मा का स्वरूप- वर्णन बहुत विश्लेषणात्मक ढंग से किया गया है । पुरुष जब मृत्यु को प्राप्त होता है, तब क्या ऐसा कोई तत्त्व है कि जो शेष रहता है, और उसका जीवन चालू ही रहता है? यदि मरने के बाद भी वह तत्त्व जीवित रहता है तो वह क्या है, जिसके वशीभूत होकर इन्द्रियों और मन को सक्रिय रहना पड़ता है? उपनिषद् के ऋषियों की यह खोज उन्हें इस आत्मतत्त्व की स्थापना तक ले गई । वही आत्मतत्त्व जीव, चैतन्य, चेतना आदि नामवाला है वह प्रत्येक सजीव प्राणी के मन और बुद्धि से परे है; वही जीवन संजीवनी शक्ति है । वह 'आत्मा' है । यह आत्मा कभी जन्मा नहीं है और कभी मरेगा भी नहीं । जन्म- मरण शरीर का ही होता है, आत्मा तो अजन्मा और शाश्वत ही है । यह आत्मा, शरीर- इन्द्रिय-प्राण- मन-बुद्धि- अहंकार से पृथक् ही है, वह सदा मुक्त है । उपर्युक्त शरीरादि सभी तत्त्व आत्मा से ही जीवित रहते हैं, उसी के द्वारा काम कर सकते हैं, उसी के लिए कार्यरत होते हैं । इन्द्रियादि की क्षति, अक्षमता या हानि— कुछ भी आत्मा को प्रभावित नहीं करती । ऐसा होने पर यह भी एक अनुभवसिद्ध यथार्थ है कि वह आत्मा इस शरीराकार भौतिक पिंजरे में रहते हुए बद्ध हो गया है और उसने अपना बहुत कुछ स्वातन्त्र्य खो दिया है । ऐसी स्थिति में उस आत्मा को ‘ जीवात्मा' या ' जीव' कहा जाता है । प्रश्न होता है कि- स्वरूप से मुक्त यह आत्मा शरीरादि बन्धन में किसलिए और कैसे फँस गया? इसके उत्तर में कहा गया है कि— यह उसके
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( 13 ) भूतकाल के किए गए कर्मों का अनिवार्य और अविनाश्य फल जाए कि उसने पहला कर्म कब और क्यों किया जो कि उसके का परिणाम है । यहाँ अगर यह पूछा कि वह बन्धन की शृंखला बन गई? उपनिषदों के पास इस प्रश्नबन्धन का कारण हुआ और जिससे उपनिषदें सृष्टि को अनादि प्रक्रिया मानती हैं । उपनिषदों के मत का कोई उत्तर नहीं है । क्योंकि अन्त । प्रलय की संकल्पना है फिर भी अमुक समय के बाद “ धातामें सृष्टि का कोई आरंभ नहीं है, न ' अनुसार पूर्ववत् ही सृष्टि चालू ही रहती है । यथापूर्वमकल्पयत् की श्रुति के जन्म- मरण के चक्र में जीव का फँसना और उसके परिणामस्वरूप दुःखों को ‘ ’ कहलाता है और संसार के इन बन्धनों से छुटकारा पाना ही मोक्ष है । इस मोक्ष भोगना ही संसार जीवन का परम लक्ष्य माना है । उपनिषदें कहती हैं कि ऐसा मोक्ष सच्चे को उपनिषदों ने मानव- सकता है । ऐसा मोक्ष भक्ति से भी मिलता है, उस भक्ति के साथ उपासना'ज्ञान' से प्राप्त किया जा आ जाने चाहिए | उपनिषदों ने कर्मों को मोक्ष के सहकारी कारण के रूप मेंऔर ध्यान सहजरूप से माना है । शरीरादि से अलग इस आत्मतत्त्व के मरणोपरान्त भी अपने अस्तित्व के रहने के बारे में नित्यताकठोपनिषद्, जन्ममरणमें बड़ी-हीनतासुन्दर, मीमांसामन-इन्द्रियादिकी गईसे हैपृथकता। यम- नचिकेताआदि को के- 'सुप्रसिद्धआत्मानं रथिनंसंवाद विद्धिमें आत्मा' की (. 2.3-4 ) रूपक द्वारा भलीभाँति समझाया गया है कठ । इत्यादि ‘ आत्मन्' शब्द का व्युत्पत्ति- लभ्य अर्थ भी आत्मस्वरूप का यथार्थ परिचय पाने के लिए उपयुक्त मालूम पड़ता है । कठोपनिषद् ( 2.1.1 ) के शांकरभाष्य में आचार्य ने एक प्राचीन आत्मव्युत्पत्तिदर्शक
श्लोक़ उद्धृत किया है, वह इस प्रकार है—
यदाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।
यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति कीर्त्यते ॥
अर्थात् जो ‘ आप्नोति’ = वस्तुओं को ग्रहण करता है, ' आदत्ते' = स्थितिकाल में विषयों का अनुभव करता है; ‘ अत्ति' = जो विषयों को भोगता है, ‘ आतनोति ’ जो विद्यमान रहता है, वह आत्मा है । इस आत्मा की सत्ता के कारण ही प्राणिमात्र जीवित रह सकते हैं । कठ उपनिषद् कहती है कि " कोई भी प्राणी न तो प्राण के कारण जीवित रहता है, न अपान से जीवित रहता है परन्तु वह उस तत्त्व के सहारे जीवित रहता है, जिससे ये दोनों (प्राण तथा अपान ) जीवित रहते हैं । वह तत्त्व कौन है? वह आत्मा है । ” ( कठ. 2.25 ) आत्मा का स्वरूप इस आत्मतत्त्व का विवेचन उपनिषदों में बड़ी ही सुन्दर रीति से किया गया I शुद्ध चैतन्य आत्मा का मूल स्वरूप है । परन्तु वह केवल शुद्ध चैतन्य हमारी सभी अवस्थाओं में नहीं रहता । वह न जाग्रत् में, न स्वप्न में और न तो सुषुप्ति में शुद्ध चैतन्य है । ये तीनों अवस्थाएँ मायिक हैं, अत: इन तीनों अवस्थाओं में रहता हुआ चैतन्य या तो आभासित है या प्रतिबिंबित है, या अवच्छिन्न है अथवा उपहित ही है । इन तीनों अवस्थाओं से परे उच्च कोटि की चौथी - तुरीय अवस्था में ही आत्मतत्त्व का पारमार्थिक स्वरूप प्राप्त हो सकता है । जाग्रत् ( शरीरचेतना ),
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( 14 ) स्वप्नचैतन्य तथा सुषुप्ति चैतन्य की उपाधियों से या विशेषणों से सर्वथा मुक्त विशुद्ध चैतन्यनाम(उनसेतुर्य सर्वथा अलग चैतन्य) अपने मूल विशुद्ध रूप में विद्यमान रहता है । इस चौथी अवस्थारोचक काढंग से एक या तुरीय अवस्था है । इस सिद्धान्त का प्रतिपादन छान्दोग्योपनिषद् में बड़े हीदेवता तथा असुरों ने आख्यायिका द्वारा वर्णित किया गया है । उस उपनिषद् के आठवें अध्याय मेंभेजा । प्रजापति ने उन्हें आत्मतत्त्व की जिज्ञासा से प्रेरित होकर इन्द्र तथा विरोचन को प्रजापति के पास में और दर्पण में जो,, बत्तीस साल की कठोर तपस्या करवाई और बाद में बतलाया कि आँख में जल लेकिन पुरुष दिखाई देता है, वही ' आत्मा' है । विरोचन को तो प्रजापति के इस उत्तर से संतोषदर्पणहो मेंगयादेखने पर, इन्द्र को सन्तोष न हुआ । उसने सोचा कि वस्त्रालंकार से भूषित होकर जल या के अन्धत्व आत्मा सुंदर लगता है, तो क्या यह शरीर ही आत्मा है? यदि ऐसा ही हो, तब तो शरीरकरने के लिए काणत्व, पंगुत्व से आत्मा अन्धा, काना, पंगु हो जाएगा । अपनी शंका का निवारणबताया । तब भी: ' ', वह पुन प्रजापति के पास पहुँचा । तब प्रजापति ने उसे स्वप्न- चैतन्य को आत्मा तो विचारक इन्द्र की शंका बनी ही रही । क्योंकि स्वप्न में हम दुःखानुभव करते हैं, आँसू बहातेकेहैं पास आनन्दरूप आत्मा में दुःख कैसे? क्या ऐसा कभी हो सकता है? फिर से वह प्रजापति आया । इस समय प्रजापति ने उसे ' सुषुप्त चैतन्य' को आत्मा बताया । परन्तु विचार करनेवाले इन्द्र को उसमें भी कमियाँ दिखाई पड़ीं । उसने सोचा कि सुषुप्तिकाल में तो अपने अस्तित्व का भी भान। नहीं रहता, तो आत्मा का भान कैसे होगा? उस समय तो चैतन्य का ही अभाव दिखाई देता है वह पुन: प्रजापति के पास पहुँचा । तब प्रजापति ने अन्त में उसे पारमार्थिक आत्मतत्त्व का ज्ञान दिया कि इन तीनों प्रकार के चैतन्यों से पृथग्भूत, उपाधिरहित, विशुद्ध चैतन्य ही आत्मा है । वही सत् रूप स्वचैतन्य है । इस प्रकार के चैतन्य को माण्डूक्योपनिषद् में ' तुरीय' या ' तुर्य' नाम दिया गया है | जाग्रत्- स्वप्न सुषुप्ति की ये तीन अवस्थाएँ उसी आत्मा की विविध दशाएँ हैं । जाग्रदवस्था में आत्मा बाहर की वस्तुओं का अनुभव करता है, स्वप्नावस्था में भीतर की मानस वस्तुओं का अनुभव करता है और सुषुप्त अवस्था में केवल अपने आनन्दस्वरूप का ही अनुभव करता है । ये तीनों अवस्थाएँ आत्मा की उच्चतम अवस्था का संकेत करती हैं । इन तीनों अवस्थाओं में आत्मा का नाम क्रमश: विश्व, तैजस और प्राज्ञ है । इन तीनों अवस्थाओं में अवस्थित आत्मा का अनुभव हमें आंशिक रूप में ही होता है । परन्तु, तुरीय (चौथी ) अवस्था के पूर्ण आत्मा में इन गुणों का सर्वथा अभाव ही है । उस समय न बाह्य चेतना है, न अंतस् चेतना और न दोनों का संमिश्रण ही है । प्रज्ञा और अप्रज्ञा का भी उस समय अभाव रहता है । अदृष्ट, अग्राह्य, अव्यवहार्य, अलक्षण, अचिन्तनीय, अव्यपदेश्य केवल आत्म प्रत्ययसार, प्रपंचोपशम, शान्त, शिव, एक, अद्वैत, तुरीय ही रहता है । वही आत्मा है, उसे ही जानना चाहिए । वह आत्मा कूटस्थ, अविकारी है, और उसी आत्मा की परब्रह्म ( निर्गुण ब्रह्म ) के साथ सर्वतोभावेन एकता उपनिषदों में मानी गई है । ऐसे आत्मतत्त्व का द्योतक ( प्रतीक) ओंकार (ॐ ) अक्षर माना गया है । ब्रह्म ऊपर कहा गया है कि आत्मा के साथ ब्रह्म की सर्वतोभावेन एकता उपनिषदों में मानी गई है । तो वह 'ब्रह्म' क्या है? ब्रह्म समग्र विश्व का मूल कारण है । इस ब्रह्म के अन्य वाचक शब्द उपनिषदों में जो दिये हैं वे हैं आत्मा, आकाश, सत्, अक्षर और भूमा । यह समस्त विश्व उसी से उत्पन्न होता है, उसी से जीता है और उसी में लय हो जाता है । वह ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान
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( 15 ) है । यह ब्रह्म महान् से भी महान् और अणु से भी अणु है । वही सबका अन्तर्यामी है । जल में नमक की तरह वह सबमें ओतप्रोत (अनुप्रविष्ट ) है, वह सभी जगह एक समान ही है— कहीं कम- ज्यादा नहीं है । वह अनन्त है, वह अकाय है, वह सबका अधिष्ठान, सबका स्वामी है । वह सबको देखता है, सबको सुनता है और सबको जानता है पर उसे कोई नहीं देखता, उसे कोई नहीं सुनता, उसे कोई नहीं जानता । वह समग्र सद्गुणों का मूर्तरूप है । भक्तों की भक्ति का प्रतिसाद वह अवश्य देता है | भक्तों की सभी कामनाएँ वह पूर्ण करता है । सभी लोगों का वही अन्तिम लक्ष्य- स्थान है । उसका ध्यान करने में सरलता हो इसलिए उपनिषदें कभी- कभी उसे ' पुरुष' ( मानव रूप में दिव्य चेतना - 'हिरण्मयोऽयं पुरुष: ' ) नाम भी देती है । उसके सभी अंग तेजस्वी हैं । आँखें उसकी खिले हुए लाल कमल जैसी हैं, वह अग्निमूर्धा ( अग्नि जैसे मस्तक वाला ) है, वह सूर्यचन्द्ररूप दो आँखोंवाला है, दिशाएँ उसके कान हैं, वेद उसकी वाणी है, धरती उसके पैर हैं । वह सहस्रशीर्षा, सहस्राक्ष, सहस्रपाद है । वैश्विक रूप में उनकी सर्वव्यापकता बताई गई है (देखिए पुरुषसूक्त ) । ध्यान के लिए इसी रूप का परामर्श उपनिषदें करती हैं । उपनिषदों में बताया गया वही ‘ औपनिषद् पुरुष ' है । मूलस्रोत की समानान्तरता उपनिषद् के अध्यात्मवेत्ता ऋषियों ने इस वैविध्यपूर्ण और सतत परिवर्तनशील अनित्य जगत् के मूल में विद्यमान शाश्वत सत्तारूप पदार्थ का अन्वेषण तात्त्विक दृष्टि से किया है । इस अन्वेषण- प्रक्रिया के मूलस्रोत संहिताओं तक पहुँचते हैं । हमारे द्रष्टा ऋषियों के पास तीन प्रकार की अन्वेषण पद्धतियाँ थीं, ऐसा उस प्राचीन श्रौत वाङ्मय को देखने से हमें पता चलता है - ( 1 ) आधिभौतिक पद्धति, ( 2 ) आधिदैविक पद्धति और ( 3 ) आध्यात्मिक पद्धति । उन तीनों के उदाहरण हमें मूल संहिताओं में भी मिलते हैं । अधिभूतभावना-प्रधान पद्धति का उदाहरण हमारा नासदीय सूक्त है, अधिदैवप्रधान पद्धति का उदाहरण वैश्वानर सूक्त को ले सकते हैं और अध्यात्म- प्रधान पद्धति के उदाहरणरूप में वाक् सूक्त को ले सकते हैं । यही कारण है कि एक ही परमार्थ सत् का तीन प्रकार से वर्णन उपनिषदों में पाया जाता है । आधिभौतिक पद्धति इस भौतिक जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कारणों का विश्लेषण करके विलक्षण नित्य पदार्थ का निरूपण करती है, तो आधिदैविक पद्धति विविधरूप और विविध स्वभाववाली अनेक देवताओं में शक्ति का संचार करानेवाली किसी एक परमसत्ता को खोज निकालती है और आध्यात्मिक पद्धति व्यक्ति की मानसिक प्रक्रियाओं तथा दैहिक कार्यकलापों का निरीक्षण- परीक्षण करके उनके मूलभूत आत्मतत्त्व का निरूपण करती है । उपनिषद् के द्रष्टा ऋषियों ने ऊपर की तीनों पद्धतियों का उपयोग करके जिस परमतत्त्व का निरूपण किया है वही 'ब्रह्म' कहा गया है । ये तीनों पद्धतियाँ समानान्तर रूप से चली हैं । उनमें कोई कालिक क्रमिकता अथवा वैचारिक विकास के सोपान का रूप नहीं है । कुछ पाश्चात्य संस्कृत विद्वान् ऐसा मानते हैं, पर यदि ऐसा होता तो इन तीनों पद्धतियों के समानान्तर उदाहरण, जो ऊपर बताए हैं वे नहीं मिल सकते । ये सब तो संहिताओं के ही सूक्त हैं | अब तो उन तीनों शैलियों के समकालीन - समानान्तर अस्तित्व के विषय में तत्त्वज्ञों को शंका नहीं होनी चाहिए । यह संभव है कि ऊपर बताई गई तीन शैलियों में से किसी एक दृष्टि से ब्रह्म को देखनेवाले व्यक्ति को, अन्य शैली द्वारा किए गए ब्रह्मनिरूपण में विसंगति और विरोध मालूम हो । इसलिए बहुत
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( 16 ) धैर्य, विवेक और सहानुभूतिपूर्वक सभी शैलियों द्वारा किए गए ब्रह्मनिरूपण का मूल्यांकन करके उनमें समन्वय स्थापित करना चाहिए । इसमें अपरिपक्व दृष्टि काम नहीं आएगी । पाश्चात्य वैदिक विद्वानों की यह त्रुटि सहेतुक हो या निर्हेतुक हो, उनकी बात छोड़ दें, तो भी वैदिक देवतातत्त्व को उन्होंने या तो समझा नहीं या समझने का श्रम नहीं उठाया और बहुदेवत्व, एकदेवत्व और सर्वेश्वरवाद की मनगढ़न्त परिकल्पना उन्होंने कर दी । यदि उनकी बात सही है तो ऋग्वेद का पुरुषसूक्त क्यों संहिता में आ सका? हमारे सिद्धान्त! के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में तो हम यास्क को ले सकते हैं । अपने निरुक्त के सातवें अध्याय में उन्होंने स्पष्ट कह दिया है कि— “महाभाग्याद् देवताया एक एव आत्मा बहुधा स्तूयते । एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यगानि भवन्ति । ” (7.4.8-9 ) । दूसरा प्रमाण बृहद्देवता का भी है । अब इससे ज्यादा किस प्रमाण की अपेक्षा रह जाती है? हम तो यहाँ तक मानने के लिए लालायित हो उठते हैं कि ऋग्वेद का प्रधान लक्ष्य ही शक्तिवैविध्यसम्पन्न ब्रह्मतत्त्व का निरूपण है । और इसीलिए प्रकृति की विविध शक्तियों का देवतारूप में वर्णन किया गया है । ऐतरेय आरण्यक हमारे इस मत का प्रमाण देते हुए कहता है कि “एक ही महान् सत्ता की उपासना ऋग्वेदी 'उक्थ' से, यजुर्वेदी 'अग्नि' से और सामवेदी 'महाव्रतयाग' से करते हैं । ” (ऐतरेय आरण्यक 3.2.3.12 ) तदुपरान्त ऋग्वेद के 'ऋत' की बात और अथर्ववेद के 'स्कंभ' की बात तो हम कह आए हैं । अदितिसूक्त आदि अनेकानेक अकाट्य प्रमाण मिल सकते हैं । ब्रह्म के दो स्वरूप इन्हीं तीन पूर्वोक्त पद्धतियों में अधिभूत और अधिदैव में से उपनिषदों का सगुण ब्रह्म अवतरित हुआ या कहें कि परिष्कृत हुआ और आध्यात्मिक पद्धति का परिष्कृत रूप निर्गुण ब्रह्म में उतरा । इस तरह उपनिषदों में ब्रह्म के दो स्वरूपों का विशद वर्णन किया गया है । ऊपर आरंभ में ब्रह्म का जो स्वरूप बताया गया है वह दोनों का समन्वित स्वरूप है । उसमें वाचक को परस्पर विरोधाभास लगेगा । इसके समाधान के लिए हम यहाँ दोनों को अलग दिखाकर स्पष्ट करने का प्रयत्न करेंगे । उपनिषदों में निर्गुण- निराकार- स्वप्रकाश- ज्ञानस्वरूप- अनन्त परमसत् ब्रह्म को ' परब्रह्म’ कहा गया है और सर्वशक्तियुक्त सृष्टि के सर्जक पालक पोषक परमतत्त्व साकार सगुण ब्रह्म को ‘ अपरब्रह्म ’ की संज्ञा दी गई है । परब्रह्म को निर्विशेष, अलक्ष्य, गुणातीत, निरुपाधिक, निर्विकल्प आदि संज्ञाएँ दी जाती हैं, जबकि अपरब्रह्म में विशेषत्व, लक्षण, चिह्न, प्रतीक, गुण, उपाधि- परिवेशादि सविकल्पता आदि सबका समावेश कर सकते हैं । उसका स्वरूप हृदय में रखा जा सकता है । ब्रह्म के इन पर- अपर— दो भावों को प्रदर्शित करने के लिए उपनिषदों ने दो प्रकार के वाक्य प्रयुक्त किए हैं - एक निर्विशेष और निर्लिंग है, तो दूसरा सविशेष और सलिंग है । सलिंग - सविशेष अपरब्रह्म का वर्णन करती हुई श्रुतियाँ ब्रह्म को पुंल्लिंग श्रेणी में रखती हैं, जैसे — सर्वकर्मा, सर्वसंकल्प, सर्वकर्ता, सर्वरूप, सर्वरस आदि हैं । और परब्रह्म का वर्णन करनेवाली श्रुतियाँ ब्रह्म को नुपंसकलिंग में वर्णित करती हैं; जैसे अणु, अस्थूलम् आदि हैं । कारण यह है कि परमार्थतः परब्रह्म की कोई जाति नहीं होती । यही कारण है कि उसका 'तत्' पद से निर्देश होता है । ‘सः ' के द्वारा नहीं । सः का निर्देश सविशेष ब्रह्म के लिए - सगुण ब्रह्म के लिए ही किया जाता है । ब्रह्म के सम्बन्ध में
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( 17 ) श्रुतिवाक्यों में पर- अपर, सविशेष- निर्विशेष लिए इतना पार्थक्य होते हुए भी ब्रह्म के सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का वैषम्य नहीं । सविशेष -निर्विशेष तो भाव- भेद के सूचक शब्द हैं, पदार्थ- भेद के सूचक नहीं । सगुण-निर्गुण, सोपाधि- निरुपाधि आदि शब्द तो एक ही ब्रह्मतत्त्व के भावगत विशेषण के सूचक हैं । जैसे माण्डूक्योपनिषद् ( 1.1.6 ) की एक ही श्रुति में निर्विशेष ब्रह्म के नपुंसकलिंगी वर्णन के साथ ही साथ सविशेष ब्रह्म का पुंल्लिंगी वर्णन भी (एक साथ ) किया गया है । ( अस्थूलम्...... भूतयोनिम्..... आदि ) । इस प्रकार जब एक ही मंच में उभयविध पदों से उभयविध ब्रह्म का निरूपण किया जा रहा हो, तब सुस्पष्ट रीति से दोनों के बीच में वस्तुगत भेद का अभाव सिद्ध हो ही जाता है । पर बाद में उपनिषदों पर भाष्य- टीका आदि करने वाले आचार्यों ने इस उभयविध पदरचना के बारे में भारी ऊहापोह मचाया है । शंकर निर्गुणपरकता को मुख्य और गुणपरकता को गौण मानते हैं, जबकि रामानुज सगुणपरकता को मुख्य और निर्गुणपरकता को गौण मानते हैं । परन्तु, चाहे सगुण हो या निर्गुण, परमतत्त्व तो एक ही है । अपर ब्रह्म के दो प्रकार के लक्षण उपनिषदों में अपर (सगुण - सविशेष ) ब्रह्म का परिचय दो तरह से दिया गया है । किसी भी सविशेष वस्तु के परिचय के लिए उसका लक्षण देना अनिवार्य है । वह लक्षण दो प्रकार का होता है-- एक स्वरूप लक्षण और दूसरा तटस्थ लक्षण । स्वरूप लक्षण– जिसके द्वारा वस्तु के शुद्ध मूलस्वरूप का ज्ञान हो जाए उसे स्वरूप लक्षण कहते हैं । श्रुतियों में ब्रह्म का मूलस्वरूप–' सत्यं ज्ञानमन्तं ब्रह्म', 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’, ‘ परास्य शक्ति- र्विविधै श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च' आदि रूप में क्रमश: तैत्तिरीय (2.9 ) बृहदारण्यकोपनिषद् ( 3.9.28 ) में दिया गया है अर्थात् वह ब्रह्म स्वरूपतः सत्य, ज्ञान, अनन्त, विज्ञान, आनन्द आदि रूप है तथा ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति तथा क्रियाशक्ति से परिपूर्ण है । ऐसी रीति से सविशेष ब्रह्म का निरूपण स्वरूप-लक्षण बताकर किया गया है । तटस्थ लक्षण - अब सविशेष ब्रह्म का तटस्थ लक्षण देखें तो वह लक्षण छान्दोग्योपनिषद् में केवल एक ही शब्द में दिया गया है- 'तज्जलान्' ( छा.उ. 3.14.9 ) केवल तीन ही वर्णों का -बना लक्षण | इसके तीन शब्द बनाएँ तो – 1. तज्ज, 2. तल्ल और 3. तदन् होगा । इनमें ' तज्ज’ का अर्थ है उस ब्रह्म से जगत् उत्पन्न होता है 'तल्ल ' का अर्थ है 'उस ब्रह्म में यह जगत् लय होता है' और ' तदन्' का अर्थ 'उसी के कारण स्थितिकाल में जगत् प्राण धारण करता है । ' तैत्तिरीय उपनिषद् में पूरा लक्षण दिया है— ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म ।' (तै.उ. 3.1 ) । इसी उपनिषद् मंत्र का सिद्धान्त ‘जन्माद्यस्य यत: ’ ( ब्रह्मसूत्र 1.1 ) में उपस्थित है । माण्डूक्योपनिषद् में इसी सगुण ब्रह्म की सर्वज्ञता, सर्वान्तर्यामिता, सर्वाधिपत्य, सर्वकारणत्व, जीवोत्पादकता आदि बताएं गए हैं । सगुण ब्रह्म सारे संसार का शासक और सभी प्राणियों का भाग्यविधाता है । वह सत्कर्मशील जनों का कल्याणकारी और दुष्कर्त्ताओं को दण्ड देने वाला है । वह कभी ईश्वर, कभी हिरण्यगर्भ और कभी विराट् के नाम से विभूषित है । केनोपनिषद् के तृतीय खंड में ब्रह्म की सर्वशक्तिमत्ता के विषय में कही गई उमा- हैमवती की कथा भी तो यही कहती है कि अग्नि में अपनी कोई दाहक शक्ति नहीं है, वायु में एक तिनके को भी उड़ाने की अपनी कोई शक्ति नहीं है । यदि वे उन शक्तियों को अपनी शक्तियाँ मानने का गर्व करें 2 उ०भू०
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( 18 ) तो वह गलत ही है । ब्रह्म की ही शक्ति से वे शक्तिमान हैं । इन्द्र की नम्रता से ही उमा- हैमवती (ज्ञानदेवी ) ही उसे उपदेश देने के लिए आविर्भूत हुई थीं । परब्रह्म यह ठीक है कि सविशेष ब्रह्म का स्वरूप लक्षण या तटस्थ लक्षण किसी तरह मन में बैठ सकता है, परन्तु निर्गुण - निर्विशेष ब्रह्म का लक्षण क्या है? निर्विशेष या निर्गुण भाव को तो किसी लक्षण में कैसे बाँधा जा सकता है । लक्षण तो विशेषता वाले पदार्थ का ही होता है, निर्विशेष का लक्षण कभी हो ही नहीं सकता, तब उसके अस्तित्व को कैसे माना जाए? उसे किस तरह पहचाना जाय? वह तो अनिर्देश्य है । यही कारण है कि जब बाष्कलि ऋषि ने बाध्व ऋषि से ब्रह्म के बारे में पूछा तब वे मौन हो गए । मौन ही इस प्रश्न का उत्तर है । ब्रह्म में सभी गुणों का अभाव होने से उसका भावात्मक वर्णन नहीं हो सकता । इसलिए श्रुति 'नेति नेति' कहकर परब्रह्म का परिचय करवाती है, यथा— “स एष नेति नेति आत्मा आदेशो भवति नेति नेति नह्येतस्मात् अन्यत् परम् अस्ति । ” (बृ.उ. 4.4.22 ) इस नकारात्मक वर्णन पद्धति को ' अतद्व्यावृत्ति' नाम दिया गया है । परब्रह्म के निरूपण में इस पद्धति का अनुसरण किए बिना छुटकारा नहीं है; और कोई उपाय भी नहीं, इसीलिए परब्रह्म के वर्णन में श्रुतियों में ‘ नकार ( ' अ'कार) का बाहुल्य ही नजर आता है, जैसे – अस्थूलम्, अनणु, अह्रस्वम्, अदीर्घम् (बृ.उ. 3.6.6 ), अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस, अगन्धयत्, अनादि, अनन्त ( कठ. 1.3.15 ) आदि । याज्ञवल्क्य ने जहाँ गार्गी को ब्रह्मोपदेश दिया, वहाँ भी इस परब्रह्म के वर्णन में नकार की ( अकार की ) हारमाला ही दिखाई देती है । विस्तार भय से उसे यहाँ नहीं लिखा जा सकता । केनोपनिषद् में प्रतिपादित निर्गुण ब्रह्म के वर्णन में कितनी सजीवता है—
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
यही परब्रह्म की अवाङ्मनस- गोचरता है । देश- कालादि सभी उपाधियों से नितान्त- अतीत विरहित, सर्वातीत, प्रमाणातीत, परात्पर वह है वहाँ- न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतः कुतोऽयमग्निः? तमेवभान्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति । यही वह परब्रह्म है । सृष्टि यह ब्रह्म ही समस्त सृष्टि का अधिष्ठान है, वही हमारा आत्मा है, जीवन का परमलक्ष्य प्राप्ति ही है, वही मोक्ष है और इसी बात को उपनिषदों में तरह-तरह से बार- बार बतलाया उसकी है; उपनिषदों का मुख्य विषय भी यही है । तथापि जिस जगत् में हम रहते हैं, चलते- फिरते भी गया पीते हैं, मानो अपने अस्तित्व का भान प्राप्त करते हैं, उस जगत् की उपेक्षा तो कोई हैं, खाते-नहीं कर सकता । सभी व्यावहारिक हेतुओं के लिए जगत् हमारे लिए सत्य ही है । भी तत्त्वज्ञानी यह सृष्टि है तभी तो हमारे लिए मोक्ष- साधना की और मोक्ष की प्राप्ति की सार्थकता हैइतना, नहींहीतोनहींहम,