श्रीगणेशाय नमः।
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १
Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba · 452 पृष्ठ · 46 खण्ड
In English
Collection of Upanishads: From Isha onwards
This book is the first volume of a collection containing the first ten Upanishads, starting with the Isha Upanishad. It includes the original Sanskrit text along with a Hindi translation by Keshavlal V. Shastri.
This book answers
- What are the first ten upanishads?
- What is the meaning of the word upanishad?
- What is brahma vidya?
- How do the upanishads relate to the vedas?
विषय सूची
- उपनिषत्सञ्चयनम् ईशाद्यष्टोत्तरशतोपनिषदः आचार्य केशवलाल वी. शास्त्री. 11317: 11 व्रजजीवन प्राच्यभारती ग्रन्थमाला 162 उपनिषत्सञ्चयनम् (… 1–10
- ( 9) (कृष्णयजुः शाखा ) हैं । सामवेद की छान्दोग्य ( ताण्ड्य शाखा ), केनोपनिषद् अथर्ववेद की मुण्डक, प्रश्न, नृसिंहतापनीय और माण्डूक्य हैं… 11–20
- ( 19 ) साधना के लिए संघर्ष क्यों करें? इसीलिए इस सृष्टि के विषय में जानना जरूरी है कि यह सृष्टि कैसे बनी? अभी तक वह कैसे टिकी हुई है? और इसका अंतिम परिणाम… 21–30
- (29 ) विशिष्टताएँ रखते हुए पाते हैं, पर सम्पूर्ण उपनिषत्साहित्य में सर्वोत्तम और सार्वत्रिक चिन्तन प्रदान करने का श्रेय तो याज्ञवल्क्य ऋषि को ही जाता है… 31–40
- ( 39 ) गिरगिट के किस रंग को आप झूठा साबित कर सकते हैं? एक-दूसरे से भिन्न उसके शरीर के सभी रंग वास्तविक ही हैं न? उपनिषदों के इस संग्रह को अपने मूल स्वरूप… 41–50
- द्वितीयः खण्डः ] केनोपनिषत् ( 2 ) 9 यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते । 5… 51–60
- प्रथमोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) 19 प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन्… 61–70
- द्वितीयोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) 2922 अथ द्वितीयोऽध्यायः चतुर्थी वल्ली पराञ्चि खानि व्यतॄणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति कश्चिद्धीरः… 71–80
- प्रथम: प्रश्न: ] प्रश्नोपनिषत् ( 4 ) 39 शान्तिपाठः ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः… 81–90
- चतुर्थ: प्रश्न: ] प्रश्नोपनिषत् ( 4 ) 49 जब मन आत्मा के प्रकाश से अभिभूत हो जाता है तब, ( अर्थात् जब कामनाओं के प्रवेश के लिए मन का दरवाजा बन्द हो जाता है… 91–100
- द्वितीयमुण्डकम्] मुण्डकोपनिषत् ( 5 ) 59 कर्म से प्राप्त करने योग्य लोकों के स्वरूप को अच्छी तरह परखकर अर्थात् यज्ञादि के स्वरूप को पहचानकर ब्राह्मण (… 101–110
- आगमप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 69 शान्तिपाठः ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः… 111–120
- वैतथ्यप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 79 विशेषता ( भेद ) केवल यही है कि भीतर के पदार्थ अन्तरिन्द्रिय द्वाराऔर बाहर के पदार्थ बाह्येन्द्रिय के द्वारा काम… 121–130
- अलातशान्तिप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 89 चित्त जब सुषुप्ति में लीन न हो अथवा तो फिर से विक्षेप में और द्वैत के किसी भी प्रकार के आभास से रहित हो गया… 131–140
- अलातशान्तिप्रकरणम् ] माण्डूक्योपनिषत् ( 6 ) 99 चित्त का स्पन्दन ही ग्राह्य- ग्राहकभाव रूप द्वैतभाव है । चित्त तो पारमार्थिक रूप से निर्विषय ही है… 141–150
- शीक्षावल्ली - 1 ] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) 109 उसके बाद वह महापुरुष ' स्व: ' इस व्याहृति के अर्थरूप सूर्य में इस व्याहृति के अर्थरूप ब्रह्म में स्थित होता… 151–160
- 119भृगुवल्ली - 3 ] तैत्तिरीयोपनिषत् ( 7 ) जहाँ से मन सहित सभी इन्द्रियाँ उसे प्राप्त किए बिना ही वापिस लौट जाती हैं, उस ब्रह्म के आनन्द को जाननेवाला… 161–170
- प्रथमोऽध्यायः ] ऐतरेयोपनिषत् ( 8 ) 129 यदि उसने अन्न को त्वचा से पकड़ लिया होता तो आज भी मनुष्य अवश्य अन्न को स्पर्श करके ही तृप्त हो जाता… 171–180
- प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 139 वाणी ' बृहती ' (बड़ी ) है । अत: यह बृहस्पति वाणी का स्वामी है… 181–190
- 149प्रथमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) दशमः खण्डः मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास । 1… 191–200
- 159द्वितीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) पशु उसी के आश्रय में जीते हैं । इसीलिए वे पशु पुरुष को देखकर भागने लगते हैं । और भयमुक्त वन में चले जाते हैं… 201–210
- द्वितीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 169 अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दत । 14… 211–220
- तृतीयोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 179 अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महास्वान्भवति य एवं वेद । 5… 221–230
- 189चतुर्थोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) त हाभ्युवाद रैक्वेद सहस्त्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति… 231–240
- 199चतुर्थोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) तत्पुरुषोऽमानवः । स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते… 241–250
- पञ्चमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 209 उस अग्नि में देवलोग अन्न के निमित्त हवन करते हैं, उस आहुति से वीर्य उत्पन्न होता है… 251–260
- पञ्चमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 219 तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैव हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति । 3… 261–270
- षष्ठोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 229 स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदः सर्वं तत्सत्यः स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा… 271–280
- सप्तमोऽध्यायः ] 'छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 239 “ जो ध्यान को ब्रह्म समझकर उपासना करता है, वे उनकी स्वेच्छानुसार गति के अनुरूप उनके ध्यान की गति हो जाती है”… 281–290
- सप्तमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 249 इस तरह से देखनेवाले, सोचनेवाले, समझनेवाले के आत्मा से प्राण उत्पन्न से आशा, आत्मा से स्मरण, आत्मा से आकाश,… 291–300
- अष्टमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 259 हुओं के शरीर को ( सुगन्ध- पुष्पमाला- अन्नादि) भिक्षा से और गहनों से सजाते हैं और मानते हैं कि इससे वे स्वर्गलोक… 301–310
- प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 269 गया । पूर्व दिशा अग्नि का मस्तक है, ईशान और आग्नेय कोण उसके दो हाथ हैं… 311–320
- प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ).279 उनके ये नाम कर्मानुसारी ही हैं । इसलिए जो उनमें से एक- एक देव की उपासना करता है, वह ( इसके वास्तविक स्वरूप को… 321–330
- 289प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) षष्ठं ब्राह्मणम् त्रयं वा इदं नामरूपं कर्म तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि… 331–340
- द्वितीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 299 हैं, जो कोई इन लोकों को आत्मा से भिन्न मानता है तो लोक भी उसका त्याग कर देते हैं… 341–350
- 309 तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन्यज्ञ आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या हुता… 351–360
- 319 तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) अन्तर्यामी है, वही अमृत है । इतना वर्णन प्राणियों के विषय में हुआ । अब शरीर के विषय में कहा जाता है… 361–370
- तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 329 शाकल्य ने पूछा– “ ध्रुवा ( ऊपर की दिशा ) में आप किस देव के रूप में हैं? ” याज्ञवल्क्य बोले— “ अग्निदेव के रूप… 371–380
- बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 339चतुर्थोऽध्यायः ] है । अग्नि के तेज से ही मनुष्य बैठता है, चलता -फिरता है, काम करता है और वापिस आता है… 381–390
- चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 349 जो लोग अविद्या की उपासना ( कर्मोपासना) करते हैं, वे घोरतमस् में (भयंकर हैं और जो विद्या की ही उपासना (… 391–400
- पञ्चमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 359 होवाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत्त्रयः… 401–410
- षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 369 जो प्रजाति ( प्रजननशक्ति) को जानता है, वह प्रजाओं और पशुओं के द्वारा - है । ‘वीर्य ही प्रजननशक्ति है… 411–420
- षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 379 एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वो- वाचापि य एनः शुष्के स्थाणौ निशिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः… 421–430
- मन्त्रानुक्रमणिका अ अथ जुहोति नमः छान्दो० 2.24.14 अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा बृह० 6.3.3 अथ जुहोति नमोऽग्नये छान्दो० 2.24.5 अग्निर्मूधा चक्षुषी मुण्ड ०… 431–440
- मन्त्रानुक्रमणिका 399 तेन त हबको दाल्म्यो छान्दो० 1.2.13 त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतत् कठ० 1.1.18 तेन त ह बृहस्पति छान्दो० 1.2.11 त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति बृह ०… 441–450
- उपनिषदें वैदिक वाङ्मय के विकास के अन्तिम सोपान हैं, अतएव इन्हें ‘ वेदान्त' के नाम से भी कहा जाता है । उपनिषदें भारतीय संस्कृति के प्राण हैं… 451–452