Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 421–430

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 379 एतमु हैव जानकिरायस्थूणः सत्यकामाय जाबालायान्तेवासिन उक्त्वो- वाचापि य एनः शुष्के स्थाणौ निशिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥11 ॥

जानकि आयस्थूण ने अपने शिष्य सत्यकाम जाबाल को इसी मन्थ का उपदेश देते हुए कहा था कि “ यदि कोई भी मनुष्य इस मन्थ को सूखे वृक्ष के तने पर भी सींचेगा तो उसमें भी शाखाएँ और कोंपलें फूटने लगेंगी । एतमु हैव सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनः शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतन्नापुत्राय नानन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥12 ॥

सत्यकाम जाबाल ने अपने शिष्यों को इसी का उपदेश देकर कहा था कि— “ यदि कोई भी मनुष्य इस मन्थ को वृक्ष के ठूंठे पर भी सींचेगा तो उसमें से भी शाखाएँ और कोंपलें फूटने लगेंगी । पर इस मन्थ का उपदेश पुत्ररहित और शिष्यरहित व्यक्ति को नहीं करना चाहिए । ” चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदु- म्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियङ्गवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान्द- धनि मधुनि घृत उपसिंचत्याज्यस्य जुहोति ॥13 ॥

इति तृतीयं ब्राह्मणम् ॥ इस मन्थनकर्म में चार औदुम्बरकाष्ठ से बनाई हुई वस्तुएँ होती हैं- औदुम्बर काष्ठ का स्रुव, औदुम्बर काष्ठ का चमसपात्र, औदुम्बर काष्ठ का ईंधन तथा औदुम्बर काष्ठ की दो उपमन्थनियाँ ( मन्थ को हिलाने की शलाकाएँ) । इसमें दस प्रकार के ग्रामीण धान्यों का उपयोग होता है वे हैं — व्रीहि ( धान ), यव ( जौ ), तिल, माष (उड़द ), अणु (साँवा), प्रियंगु (कांगनी), गोधूम ( गेहूँ), मसूर, खल्व (एक धान ) और खलकुल ( कुलथी ) । इन सभी को पीसकर उसमें मधु और घृत डालकर आहुति दी जाती है । ( यहाँ तीसरा ब्राह्मण पूरा हुआ ।) चतुर्थं ब्राह्मणम् एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधय ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥1 ॥

पृथ्वी सभी प्राणियों का रस (सारतत्त्व ) है, जल पृथ्वी का सार है, औषधियाँ जल का सार ( रस ) हैं, पुष्प औषधियों का रस है, फल फूलों का रस है, पुरुष फलों का रस है, और वीर्य पुरुष का सारतत्त्व है I स ह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्त्रियःग्रावाणमा-ससृजे ताःसृष्ट्वाऽध उपास्ते तस्मात्स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं त्मन एव समुदपारयत्तेनैनामभ्यसृजत् ॥2 ॥

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380 उपनिषत्सञ्चयनम् उन्होंने प्रसिद्धस्त्री बनाईप्रजापति। उसे नेबनाकरअनुग्रहपूर्वकउसके अधोभागसोचा, मैं कीइसउपासना( वीर्य ) कीके लिए( मैथुनआधारभूमिकर्म बना दूँ । इसलिए के अधोभाग का सेवन करना चाहिए । इन प्रजापति ने उस उत्कृष्ट और पाषाणखण्डकिया ) । इसीलिए स्त्री शिश्न ( लिंग ) उत्पन्न करके स्त्री की योनि में उसे प्रेरित किया । उससे स्त्री का संसर्ग कियाजैसा। अपना तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासाः स्त्रीणाः सुकृतं वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानधोपहासं चरत्यस्य स्त्रियः सुकृतं वृञ्जते ॥3 ॥

स्त्री की उपस्थेन्द्रिय वेदी है, उस पर के लोम ही दर्भ है, योनि का मध्यभाग है, जो दो मुष्क हैं ( योनि के दोनों पार्श्वो में जो कठिन मांसखण्ड हैं ) वे अधिषवण प्रज्वलित अग्नि नाम से सुख्यात दोलोकचर्ममयकी प्राप्तिसोमफलकहोती हैहैं), । उतनावाजपेयही यज्ञपुण्यकरनेऐसासेरहस्ययजमानजानकरको जितनाग्राम्यधर्मपुण्यकाप्राप्त होता है (जितने अच्छे मिलता है । ऐसा पुरुष स्त्रियों के पुण्यों को रोक देता है । परन्तु जो कोई इससेवनरहस्यकरनेवाले मनुष्य को -, मैथुन कर्म में प्रयुक्त हो जाता है उसके पुण्य को स्त्रियाँ रोक देती हैं । को बिना जाने ही एतद्ध स्म वै तद्विद्वानुद्दालक आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्कुमारहारित आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात्प्रयन्ति य इदमविद्वासोऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इदः सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥4 ॥

सचमुच यह मैथुनकर्म वाजपेयसम्पन्न रहस्यज्ञ उद्दालक आरुणि ने कहा उसीकुमारहारितरूप मेंनेजाननेभी कहावालेहै मुद्गलपुत्र| वे कहते नाकहैं किनेबहुतकहाहीहै ऐसे। औरमरणधर्माभी— उसी को उसीहै । रूपइसी मेंमैथुनकर्मजाननेवालेको, निःसत्त्वआचरण औरकरतेप्राणहीनहैं वे परलोकहैं जोसेपुण्यहीनभ्रष्ट होऔरजातेमैथुनविज्ञानहैं । निद्रावस्थाको जाननेवालेकथनमात्रनहीं हैं, केफिरब्राह्मणभी ग्राम्यधर्मलोग हैं काजो न्यून प्रमाण में स्खलित हो जाता है । में अथवा जाग्रत् अवस्था में अधिक या तदभिमृशेदनु वा मन्त्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कान्त्सीद्यदोषधीरप्य- सरद्यदप इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मामैत्विन्द्रियं पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकाङ्गुष्ठाभ्यामादायान्तरेणपुनस्तेजः पुनर्भगः स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥5 ॥

उस वीर्य का हाथ से स्पर्श करना चाहिए ( अर्थात् स्पर्श करते समय यह मंत्र बोलना होकर पड़ा है, जो पहले कभी औषधियों मेंचाहिए - और( मन्त्रार्थउसे यहइस है—मंत्र )से“ मेराअभिमन्त्रितवीर्य आजकरनाजो स्खलितचाहिए । ( ) ( ), को मैं ग्रहण करता हूँ उठा लेता हूँ ” – अन्न में भी पड़ा है और जल में भी पड़ा है उस वीर्यसे उठाकर दोनों स्तनों और । ऐसा बोलकर उस वीर्य को अनामिका अंगुली तथा अंगुष्ठ ( मन्त्रार्थ— ) “ मेरी इन्द्रिय ( जोभौंहोंवीर्यरूपपर लगाना चाहिए । वहाँ लगाते समय यह मंत्र बोलना चाहिए । तेज और ऐश्वर्य की प्राप्ति हो जाए । अग्निरूपसे मुझसे चली गई थी वह) वापिस आ जाए । मुझे फिर से ) " (में योग्य स्थान पर स्थापित कर दें । स्थानवाले देवतालोग फिर से उस वीर्य को मेरे शरीर

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षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 381 अथ यद्युदक आत्मानं पश्येत्तभिमन्त्रयेत् मयि तेज इन्द्रियं यशो द्रविण सुकृतमिति । श्रीर्ह वा एषां स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मान्मलोद्वाससं यश- स्विनीमभिक्रम्योपमन्त्रयेत ॥6 ॥

और यदि कभी पानी में वीर्य स्खलित हो जाए और भूल से उसमें यदि अपना प्रतिबिम्ब दीख जाए, तो जल को इस प्रकार अभिमंत्रित करना चाहिए ( अभिमंत्रण का मंत्रार्थ— ) "हे देवो! मुझमें तेज, इन्द्रिय ( वीर्य ), यश, धन, सत्कर्म स्थापन करें । " (इसके बाद अपनी स्त्री की प्रशंसा करते हुए कहना चाहिए कि— ) "यह मेरी स्त्री संसार की सभी स्त्रियों में लक्ष्मीस्वरूप है । क्योंकि इसके वस्त्र में रजस्वलात्व के चिह्न स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं । " बाद में ( तीन रात्रियों के बाद ) शुद्ध हुई अपनी कीर्तिमती पत्नी के पास जाकर पुत्रोत्पत्ति के लिए उसके साथ विचार- विमर्श करना चाहिए । सा चेदस्मै न दद्यात्काममेनामवक्रीणीयात्सा चेदस्मै नैव दद्यात्काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ 7 ॥

पत्नी यदि अपने पति को मैथुन के लिए समर्पित न करे तो उस पत्नी को आभूषणादि देकर मना लेना चाहिए । फिर भी यदि मैथुन न करने दे तो उसे दंड का भय दिखलाकर उसके साथ बलपूर्वक इन्द्रिय से संभोग करना चाहिए । यदि यह भी संभव न हो, तो उसे कह देना चाहिए कि “तुम्हारे यश को मैं अपनी यशस्वरूप इन्द्रिय से ले लेता हूँ ।" इससे वह अयशस्विनी ही हो जाती है । ( अर्थात् वन्ध्या ही रहती है । ) सा चेदस्मै दद्यादिन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥ 8 ॥

वह पत्नी यदि अपने पति को मैथुन करने का अवसर दे ही देती है, तो (शुभेच्छाएँ देते हुए ) पति को उससे कहना चाहिए कि- " मेरी यशरूप इन्द्रिय से तुझमें मैं यश की स्थापना करता हूँ । ” ऐसा करने से वे दोनों यशस्वी ( संतानवाले ) होते हैं । स यामिच्छेत्कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखः संधायोपस्थ- मस्या अभिमृश्य जपेदङ्गादङ्गात्संभवसि हृदयादधि जायसे । स त्वमङ्ग- कषायोऽसि दिग्धविद्धामिव मादयेमाममूं मयीति ॥9 ॥

पुरुष अपनी जिस स्त्री के विषय में कि "यह मुझे चाहे ” – ऐसी इच्छा रखता हो, वह उस पत्नी में अपने शिश्न को स्थापित करके, अपने मुँह के साथ उसका मुख लगाकर उस पत्नी के उपस्थ का स्पर्श करना चाहिए । स्पर्श करते समय इस मंत्र का जप करना चाहिए । ( मंत्रार्थ— ) "हे वीर्य! तू मेरे अंग- अंग में से उत्पन्न होता है । खास करके हृदय से तेरा प्रादुर्भाव होता है । तू मेरे अंगों का रस I विष लगाए हुए बाण से आहत हरिणी की तरह मेरी इस पत्नी को मेरे विषय में पागल ( उन्मत्त) बना दे । ” अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखः संधाया- भिप्राण्यापान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥10 ॥

और यदि वह ‘ यह स्त्री गर्भ धारण न करे' – ऐसा चाहता हो तो,> उस पत्नी में अपना शिश्न स्थापित करके, उसके मुँह से अपना मुँह लगाकर इन्द्रिय से “ अभिप्राणनकर्म करके फिर

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382 उपनिषत्सञ्चयनम् ‘ अपाननक्रिया’ करनी चाहिए । (' अभिप्राणन' कर्म वह है जिसमें पुरुष अपनी ' ', शरीर में वायु का प्रवेश कराता है और अपानन क्रिया वह है जिसमें शिश्नेन्द्रिय द्वारा स्त्री के निकालते समय वायु को बाहर निकाल देता है । ) इन क्रियाओं को करतेपुरुष समयअपने शिश्न को बाहर चाहिए— ( मंत्रार्थ ) “ इन्द्रियस्वरूप वीर्य के द्वारा मैं तुम्हारे तेज को (रेतस् को ) ग्रहण यह मंत्र बोलना, ” करने से वह रेतस् से रहित हो जाती है और गर्भ धारण नहीं करती । करता हूँ । ऐसा अथ यामिच्छेद्दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखः संधायापान्याभि- प्राण्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥11 ॥

पुरुष जिस पत्नी के विषय में ऐसा सोचे कि 'इसे गर्भ धारण करना चाहिए, ' – योनि में अपने शिश्न को स्थापित करके उसके मुँह से अपना मुँह लगाकर तो उसे उसकी ( भावना द्वारा पहले स्त्री के रेतस् वायु को आकर्षित करके ), बाद में मेढ्रपहलेद्वाराअपानन क्रिया करके ‘ अभिप्राणन कर्म' करना चाहिए । अभिप्राणन कर्म करते समय यह मन्त्र बोलना (जननेन्द्रिय द्वारा) “ मैं इन्द्रियरूप रेतस् के द्वारा तुम्हारे रेतस् का आधान करता हूँ । " ऐसा करने चाहिए ( मन्त्रार्थ- ) ( ) अभिप्राणन कर्म की स्पष्टता ऊपर की जा चुकी है । से स्त्री गर्भवती होती है । अथ यस्य जायायै जारः स्यात्तं चेद्विष्यादामपात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमश् शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरमुष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ताः जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धे- ऽहौषीः पुत्रपशूस्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशापराकाशौ त आददेऽसाविति त वा एष निरिन्द्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात्प्रेति यमेवंविद्वान्ब्राह्मणः। स शपति तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत भवति ॥12 ॥ ह्येवंवित्परो

और जिस गृहस्थ विद्वान् की पत्नी का किसी जार ( व्यभिचारी ( ) ), करकेजार केविपरीतप्रति क्रमद्वेष होनेसे ( अर्थात्पर उसदक्षिणाग्रविद्वान् कोया मिट्टीपश्चिमाग्रके कच्चे बरतन मेंके अग्निसाथ सम्बन्धकी विधिपूर्वकहो औरस्थापनाउसके बिछाकर उस अग्नि में घी से भिगोई गई उन बाणाकार क्रमशलाकाओंसे ) सरकंडों या दर्भ की शलाकाओं को 4 ( — ) मेंबोलतेतूने हुएवीर्य कीआहुतियाँआहुति देनीडालीचाहिएहै । ऐसा। मंत्रार्थअपराध ( 1 ) “युवावस्थाकोसेविपरीतप्रज्वलितक्रममेरीमें हीस्त्रीरूपीइस मंत्रअग्निको “ युवावस्था से प्रज्वलित मेरी स्त्रीरूपी अग्नि करते तेरे प्राण और अपान मैं ले लेता हूँ । ” ( 2 ) मैं तेरे पुत्र, पशु आदि को ले लेता हूँ । ” ( 3में) तूने वीर्यरूपी आहुति दी है तेरे इस अपराध के लिए वीर्यरूपी आहुति दे दी है, तेरे इस अपराध “युवावस्था से प्रज्वलित मेरी स्त्रीरूपी अग्नि में तूने “ ” (4 ) युवावस्था से प्रज्वलित मेरी स्त्रीरूपी के लिए मैं तेरे यज्ञों और पुण्यों को ले लेता हूँ । मैं तेरी आशाओं और वचनपालन की अग्निप्रतिज्ञाओंमें तूने वीर्यरूपी आहुति दी है । तेरे इस अपराध के लिए " — शाप देता है । और वह जार इन्द्रियविहीन को ले लेता हूँ । इस प्रकार विद्वान् ब्राह्मण उसेऐसे ज्ञानी ब्राह्मण की पत्नी और पुण्यरहित होकर इस लोक से चला जाता है । अतःचाहिए । क्योंकि उसके व्यभिचारके साथ- कर्मकिसीको समझदारजान आदमी को हँसी- मजाक का भी सम्बन्ध नहीं रखना लेने पर महान् श्रोत्रिय ब्राह्मण उसका शत्रु हो जाताहै ।

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षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 383 अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत्त्र्यहं कसे न पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात्त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥13 ॥

और जिसकी पत्नी को रजोधर्म (ऋतुधर्म ) प्राप्त हो, उस स्त्री को तीन दिनों तक काँसे के बरतन में कुछ पीना नहीं चाहिए । उसके बाद (चौथे दिन में ) जब वह ' अहतवासा' हो, अर्थात् फटा न हो ऐसा स्वच्छ वस्त्र पहने हुए हो, तब उसे शूद्र पुरुष अथवा शूद्र स्त्री के द्वारा नहीं छुआ जाना चाहिए ( | तीन दिन बीतने के बाद उसे धान कूटने के काम में लगाना चाहिए उसके द्वारा धान कुटवाना ) अर्थात् उसे फिर श्रमयुक्त काम में लगा देना चाहिए । चाहिए स य इच्छेत्पुत्रो मे शुक्लो जायेत वेदमनुब्रवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥14 ॥

यदि कोई पुरुष ऐसा चाहता हो कि मेरा बेटा गोरा (रूपवान ) हो, वेदों का अध्ययन करनेवाला हो, पूरी आयु (सौ वर्ष की ) भोगनेवाला हो, तो दूध और चावल पकाकर (खीर बनाकर) उसमें घी मिलाकर दोनों को खाना चाहिए । इससे वे उक्त लक्षणवाले पुत्र को प्राप्त करने में समर्थ बन सकते हैं । अथ य इच्छेत्पुत्रो मे कपिलः पिङ्गलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रवीत सर्व- मायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥15 ॥

यदि कोई पुरुष ऐसा चाहता हो कि मेरा बेटा कपिल या पिंगलवर्ण वाला जन्मे, वह दो वेदों को जाननेवाला हो, और वह पूर्ण आयुष्य को भोगनेवाला हो, तो उन दोनों को (पति- पत्नी को ) दही के साथ चावल पकाकर उसमें घी डालकर उसका भक्षण करना चाहिए, जिससे कि वे वांछित पुत्र के जन्म के लिए समर्थ हों । अथ य इच्छेत्पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन्वेदाननुब्रवीन सर्वमायुरियादित्युदौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जन- यितवै ॥16 ॥

यदि कोई मनुष्य ऐसा चाहता हो कि मेरा बेटा श्यामवर्ण हो, लौहित ( लाल) अरुण आँखों वाला हो, तीन वेदों का अध्ययन करनेवाला हो, और पूर्ण आयुष्य को भोगनेवाला हो, तो उन दोनों को पानी में चावल पकाकर, उसमें घी डालकर खाना चाहिए जिससे वे मनोवांछित पुत्र-प्राप्ति में समर्थ हों | अथ य इच्छेदुहिता मे पण्डिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाच- यित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥17 ॥

यदि कोई मनुष्य ऐसा चाहता हो कि मेरी बेटी पण्डित जन्मे, पूर्ण आयुष्य भोगे, तो उन दोनों (पति- पत्नी को ) तिल और चावल पकाकर, उसमें घी डालकर भोजन करना चाहिए जिससे कि वे अपनी चाही हुई बेटी को प्राप्त करने में समर्थ हों । अथ य इच्छेत्पुत्रो मे पण्डितो विगीतः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान्वेदाननुब्रवीत सर्वमायुरियादिति मासौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवा औक्षेण वार्षभेण देवा ॥18 ॥

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384 उपनिषत्सञ्चयनम् यदि कोई पुरुष ऐसा चाहे कि मेरा बेटा पंडित हो, विख्यात हो, विद्वत्सभा में जानेवाला हो, मधुर वाणी बोलने वाला हो, सब वेदों का अध्ययन करनेवाला हो, पूरे सौ साल जीनेवाला हो, तो ( - ) दोनों पति पत्नी को ऋषभ नामक औषधि के गूदे को चावल में मिलाकर पकाना चाहिए उन घी डालकर भक्षण करना चाहिए, जिससे कि वे मनोवांछित पुत्र-प्राप्ति के लिए समर्थ ।होंफिर। (उसमेंऔक्ष अथवा ऋषभ नाम की औषधि के गर्भ के साथ खाने का नियम है ) । अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं चेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहानुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सहेति ॥19 ॥

इसके बाद (चौथे दिन ) सुबह होते ही उस कूटे हुए धान को स्थालीपाक की उसमें घी का संस्कार करके, स्थालीपाक के अन्न में से थोड़ा- थोड़ा लेकर निम्नांकितविधि से पकाकर, बोलकर आहुतियाँ देनी चाहिए । ये मंत्र इस प्रकार हैं— “ अग्नये स्वाहा, अनुमतये इन मंत्रों को " ' ', एकसवित्रेबरतनसत्यप्रसवायमें निकालकरस्वाहा उसमें। बादघीमेंडालकरस्विष्टकृतपहलेहोमपतिकरकेउस स्थलीअन्न कोमें खाताबचे हुए चरु को स्वाहा(हुतद्रव्यदेवायको ) अन्न को वह अपनी पत्नी को खिलाता है । बाद में हाथ धोकर, आचमन है, बाद में उसी उच्छिष्ट जल से अपनी पत्नी का तीन बार अभिषेक करता है । अभिषेक काकरकेमंत्र, जलपात्र भरकर, उसी ” “ विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यं सं जायां पत्या सह । यह है- उत्तिष्ठातो अथैनामभिपद्यतेऽमोहमस्मि सा त्वः सा त्वमस्यमोऽहं सामाहमस्मि ऋक्त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वं तावेहि सभावहै सह रेतो दधावहै वित्तय इति ॥20 ॥ पुसे पुत्राय

इसके बाद ( खीर आदि खिलाने के बाद ) पति इसके साथ शयन (; - ) " ऋक्और हैइस, मैंसमयद्युलोकयहहूँमंत्रऔरपढ़तातू पृथिवीहै मन्त्रार्थहै अत: आओहे देवीहम!दोनोंमैं प्राण हूँ तू वाक्करकेहैआलिंगन, मैं साम करताहूँ औरहैतू। एक साथ ही रेतस्- वीर्य धारण करके हम दोनों पुरुषत्वयुक्त एक- दूसरे का आलिंगन करें | अर्थात् पुत्र से लाभान्वित हों । मुखेनअथास्यमुखःऊरूसंधायविहापयतित्रिरेनामनुलोमामनुमार्ष्टिविजिहीथां द्यावापृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय रूपाणि पिश्शतु । आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके गर्भं ते अश्विनौगर्भं दधातुदेवावाधत्तांते । गर्भं धेहि जौ ॥21 ॥ पुष्कर- इसके बाद पति स्त्री की दोनों जंघाओं ( ) “ ( )पत्नीमंत्रार्थ—की योनिहेमेंऊरुस्वरूपअपनी जननेन्द्रियस्वर्ग औरस्थापितपृथ्वी! कोतुमपृथक्दोनों अबचौड़ीअलगकरता- अलगहै औरहो जाओयह मंत्र। ” बोलताइसके बादहै । —,,क्रम से पत्नी के सर से लेकर पैर करके उसके मुख के साथ अपना मुख लगाकर अनुलोम मंत्र बोलता है । ( मन्त्र का अर्थ यहतक के क्रम से तीन बार मार्जन करता है । मार्जन करते समय यह

उत्पत्ति के लिए समर्थ करें । भगवान् सूर्यहै—तेरे) “उत्पद्यमानसर्वव्यापी भगवान् विष्णु तुम्हारी जननेन्द्रिय को पुत्र की पुत्र को रूप दें (उसके अंगों को यथायोग्य रीति

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षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 385 से पुष्ट और सुन्दर बनाएँ । प्रजापति मुझमें अभिन्न रूप से स्थित होकर तुझमें गर्भ धारण |! ) उसका पोषण करें हे एक कलावशिष्ट अमावास्या रूप हे देव तुम यह करें और बहुत स्तुतियाँ गायी जाती हैं । ऐसे हे सिनीवाली देव! (हे एककलावशिष्ट गर्भधारण करो | जिनकी को धारण करो । अपनी किरणरूपी कमलमाला पहने हुए हे दोनों अश्विनीकुमारोअमावास्या! ) तुम इस गर्भ ( ) ”! होकर मुझमें स्थित होकर तुझमें गर्भ धारण करें । आप मुझसे अभिन्न हिरण्मयी अरणी याम्यां निर्मन्थतामश्विनौ । तं ते गर्भं हवामहे मासि सूतये । यथाऽग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी । वायुर्दिशांदशमे यथा गर्भं एवं गर्भं दधामि तेऽसाविति ॥22 ॥

“प्राचीन काल में दो स्वर्णमयी (तेजोमयी ) अरणियाँ थीं । उन दोनों के द्वारा मन्थन किया । (उससे उत्पन्न हुए उसी) गर्भ को तुम्हारी कोख में हम बुलाते हैं ( स्थापितअश्विनीकुमारों ने जिससे दसवें महीने में तुम सन्तान को उत्पन्न कर सको । जिस प्रकार पृथ्वी अग्निरूप गर्भवालीकरते हैं ) कि स्वर्गभूमि इन्द्र से गर्भिणी है, जैसे दिशाओं का गर्भ वायु है, वैसे ही उसी प्रकार का है, जैसे! ”, अमुकनामवाली स्त्री मैं तुझमें स्थापित करता हूँ । गर्भ हे सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति यथा वायुः पुष्करिणी समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजतु सहावैतु जरायुणा । इन्द्रस्यायं वज्रः कृतः सार्गलः सपरिश्रयः । तमिन्द्र निर्जहि गर्भेण सावरा’सहेति ॥23 ॥

प्रसवकाल में प्रसवासत्र स्त्री के ऊपर जल का अभ्युक्षण ( मार्जन) करना चाहिए और तब यह मंत्र बोलना चाहिए ( मंत्रार्थ - ) “जिस प्रकार वायु पुष्करिणी ( छोटे तालाब ) के पानी को चारों ओर से चंचल बना देता है इसी तरह तुम्हारा गर्भ अपने ही स्थान में चलित ( स्फुरित) हो, और वह जरायु के साथ बाहर निकले । यह इन्द्र के (प्रसववायु के ) बाहर निकलने का मार्ग है, वह गर्भ का प्रतिबन्धक है, गर्भ का आश्रय है ( अर्थात् गर्भ को नीचे नहीं गिरने देता) तो हे इन्द्र! (हे प्रसववायु! ) उस मार्ग को प्राप्त करके जरायु के साथ बाहर निकल आ । ” जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क आधाय कसे पृषदाज्यः संनीय पृषदाज्य- स्योपघातं जुहोत्यस्मिन्सहस्त्रं पुष्यासमेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसंद्यां मा च्छैत्सीत् प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा । मयि प्राणाःस्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा । यत्कर्मणात्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम् । अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्वा- निस्वष्टः सुकृतं करोतु नंः स्वाहेति ॥24 ॥

पुत्र का जन्म होने के बाद उसको गोद में लेकर अग्नि की स्थापना करके, काँसे की कटोरी में दही और का मिश्रण रखकर, उस दही और घी के मिश्रण को पिता थोड़ा - थोड़ा आहुति देता है । आहुति देते समय इन मंत्रों को बोलना चाहिए ( मंत्रार्थ )— " मेरे अपने घर में पुत्र आदि से वृद्धि प्राप्त करता हुआ मैं हजारों मनुष्यों का पोषण करनेवाला बनूँ । मेरे इस पुत्र के वंश में प्रजा और पशुओं के साथ सम्पत्ति का कभी उच्छेद न हो । स्वाहा”– ऐसा बोलकर आहुति देनी चाहिए । “मुझमें अवस्थित प्राणों को मन से तुझमें होमता हूँ, स्वाहा । " ( यह बोलकर और आहुति देनी चाहिए) “प्रधानकर्म के साथ मैंने यदि कुछ अधिक कार्य कर दिया हो अथवा यहाँ आवश्यक कर्म में भी अल्प करके (कुछ क्षति या न्यूनता करके ) जो किया हो, तो हमारे उस कर्म को विद्वान् अग्नि अभीष्ट ( साधक ) होकर 25 JATA

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386 उपनिषत्सञ्चयनम् अभीष्ट और सुकृत कर दें । ( अर्थात् न्यूनाधिकता के दोष से मुक्त कर दें ) स्वाहा” – यह बोलकर आहुति देता है । अथास्य दक्षिणं कर्णमभिनिधाय वाग्वागिति त्रिरथ दधिमधुघृतः संनी- यानन्तर्हितेन जातरूपेण प्राशयति भूस्ते दधामि भुवस्ते दधामि स्वस् दधामि भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामीति ॥25 ॥।

स्विष्टकृत होम के बाद, उस बालक के दाहिने कान पर अपना मुख रखकर उसके कान पर, ‘ वाक्, वाक्, वाक्’ — ऐसा तीन बार पिता कहता है । इसके बाद दही, मधु और घी को मिलाकर विशुद्ध सोने की चमची से उसे खिलाना चाहिए । खिलाते समय (प्रत्येक ग्रास देते समय) ऐसा एक-एक मन्त्र बोलते जाना चाहिए – “( 1 ) भूस्ते दधामि, ( 2 ) भुवस्ते दधामि, ( 3 ) स्वस्ते दधामि । ‘ भू भुवः स्वः सर्वं ते दधामि । ” अर्थात् ' तुझमें पृथ्वी धारण करता हूँ, अन्तरिक्ष धारण करता हूँ, स्वर्ग धारण करता हूँ । ' अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद्गुह्यमेव नाम भवति ॥26 ॥

इसके बाद उस बालक का नामकरण करता है कि "तू वेद है ।” – यह ' वेद' नाम बालक का गुप्त नाम होता है । अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः । येन विश्वा पुष्यसि वार्याणिः सरस्वति तमिह धातवेऽकरिति ॥27 ॥

इसके बाद उस बालक को माता को देकर उसके मुँह में ( पिता ) स्तन देता है । स्तन देते समय यह मंत्र बोलता है । ( मन्त्रार्थ- ) "हे सरस्वती! यह स्तन अब इसको पान करने के लिए दो । तुम्हारा जो स्तन अभी तक शुष्क जैसा ही था, वह तो सर्व प्राणियों के लिए सुखदायक है, वह रमणीय है, वह धन को धारण करनेवाला है । वह सुवर्णधारक है, वह कल्याणकारी है (हे सरस्वती! ) तुम उस स्तन से सर्वपोषण करने योग्य वस्तुओं का पोषण करती हो । ” अथास्य मातरमभिमन्त्रयते इलासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनत् त्वं वीरवती भव याऽस्मान् वीरवतोऽकरोदिति तं वा एतमाहुरतिपिता। सा बताभूरतिपितामहो बताभूः परमां बत काष्ठां प्रापच्छ्रिया ॥ ब्रह्मवर्चसेन य एवंविदो ब्राह्मणस्य पुत्रो जायत इति ॥28 यशसा इति चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥ इसके बाद ( पिता) बालक की माता को अभिमंत्रित करता बोलता है । ( मंत्रार्थ— ) “तुम पृथ्वीरूप हो, समस्त भोग सामग्रीहै । अभिमन्त्रण करते समय यह मंत्र ( ), !!वालीअपनेअरुन्धतीबनोपिता। सेहोतुमनेभी। पुत्रोत्पत्तिआगेहमें वीरपुत्रवालाबढ़केगयालिए मैं निमित्त कारण हूँ इसी को देनेवाली हो तुम मैत्रावरुणी पिताअरे वाहबनाया! तूहैतो। इसअपनेपुत्रसेकोवीरदेखकरपुत्र उत्पन्नलोग कहेंगेकरनेवाली – “वाहतुम वीरपुत्रोंतूतो!,ब्राह्मणकीर्ति औरको ब्रह्मतेजयदि ऐसासे पुत्रतू तोहोताउन्नतिहै, कीतो उससेचरम सीमापिता तक पहुँचदादागयासे!भी” बढ़करइस प्रकारनिकलाविशिष्टऔरज्ञानसम्पन्नलक्ष्मी भी स्तुतिपात्र हो जाता है । ( यहाँ चौथा ब्राह्मण पूरा हुआ ।)

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षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 387 पञ्चमं ब्राह्मणम् अथ वशः । पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् कात्यायनीपुत्रो गौतमी- पुत्राद्गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्राद्भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्र औपस्वस्तीपुत्रादौपस्वस्तीपुत्रः पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्रः कात्यायनी- पुत्रात्कात्यायनीपुत्रः कौशिकीपुत्रात्कौशिकीपुत्र आलम्बीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्रः काण्वीपुत्राच्च कापीपुत्राच्च कापीपुत्रः ॥1 ॥

कात्यायनी अब- पुत्रइससेज्ञानशाखा, कात्यायनीकी- पुत्रआचार्यने गौतमीपरंपराके पुत्रकहीसे,जागौतमीरही- हैपुत्र । नेयहभारद्वाजीज्ञान पौतिमाषीके से,केभारद्वाजीपुत्र के पुत्र नेपाराशरी के पुत्र से, पाराशरी पुत्र ने औपस्वस्ती- पुत्र से, औपस्वस्ती- पुत्र नेपुत्रपाराशरी के पुत्र से, पाराशरी- पुत्र ने कात्यायनी के पुत्र से, कात्यायनी के पुत्र ने कौशिकी के पुत्र से, कौशिकी - पुत्र ने आम्बीलपुत्र और वैयाघ्रपदी के पुत्र से, वैयाघ्रपदी के पुत्र ने काण्वी के पुत्र और कापी - पुत्र से लिया । और कापीपुत्र ने— आत्रेयीपुत्रादात्रेयीपुत्रो गौतमीपुत्राद्गौतमीपुत्रो भारद्वाजीपुत्राद्भारद्वाजी- पुत्रः पाराशरीपुत्रात्पाराशरीपुत्रो वात्सीपुत्राद्वात्सीपुत्रः पाराशरीपुत्रा- त्पाराशरीपुत्रो वार्कारुणिपुत्राद्वार्कारुणिपुत्रो वार्कारुणिपुत्राद्वार्कारुणि- पुत्र आर्तभागीपुत्रादार्तभागीपुत्रः शौङ्गीपुत्राच्छौङ्गीपुत्रः सांकृतीपुत्रात्सां- कृतीपुत्र आलम्बायनीपुत्रादालम्बायनीपुत्र आलम्बीपुत्रादालम्बीपुत्रो जायन्तीपुत्राज्जायन्तीपुत्रोमाण्डूकीपुत्रान्माण्डूकीपुत्रः शाण्डिलीपुत्राच्छाण्डिलीपुत्रोमाण्डूकायनीपुत्रान्माण्डूकायनीपुत्रोराथीतरीपुत्रा- द्राथीतरीपुत्रो भालुकीपुत्राद्भालुकीपुत्रः क्रौञ्चिकीपुत्राभ्यां क्रौञ्चिकीपुत्रौ वैदभृतीपुत्राद्वैदभृतीपुत्रः कार्शकेयीपुत्रात्कार्शकेयीपुत्रः. प्राचीनयोगी- पुत्रात्प्राचीनयोगीपुत्रः सांजीवीपुत्रात्सांजीवीपुत्रः प्राश्नीपुत्रादासुरि- वासिनः प्राश्नीपुत्र आसुरायणादासुरायण आसुरेरासुरिः ॥2 ॥

आत्रेयीपुत्र से, आत्रेयीपुत्र ने गौतमीपुत्र से, गौतमीपुत्र ने भारद्वाजी से, उसने पाराशरी के पुत्र से, उसने वात्सी के पुत्र से, उसने पाराशरी के पुत्र से, उसने वार्कारुणि के पुत्र से, उसने दूसरी वार्कारुणि कें पुत्र से, उसने आर्तभागी के पुत्र से, उसने शौंगी के पुत्र से, उसने सांकृति के पुत्र से, उसने आलम्बायनी के पुत्र से, उसने आलम्बी के पुत्र से, उसने जायन्ती के पुत्र से, उसने माण्डूकायनी के पुत्र से, उसने माण्डूकी के पुत्र से, उसने शांडिली के पुत्र से, उसने राथीतरी के पुत्र से, उसने बालुकि के पुत्र से, उसने कौंचिकी के दो पुत्रों से, उन्होंने वैदभृति के पुत्र से, उसने कार्शकेयी के पुत्र से, उसने प्राचीन योगी के पुत्र से, उसने सांजीवी के पुत्र से, उसने प्राश्नी के पुत्र आसुरिवासी से, उसने आसुरायण से, आसुरायण ने आसुरि से, और आसुरि ने— याज्ञवल्क्याद्याज्ञवल्क्य उद्दालकादुद्दालकोऽरुणादरुण उपवेशेरुपवेशिः कुश्रेः कुश्रिर्वाजश्रवसो वाजश्रवा जिह्वावतो बाध्योगाज्जिह्वावान्बाध्यो- गोऽसिताद्वार्षगणादसितो वार्षगणो हरितात्कश्यपाद्धरितः कश्यपः शिल्पात्कश्यपाच्छिल्पः कश्यपः कश्यपान्नैध्रुवेः कश्यप नैधुविर्वाचो

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388 उपनिषत्सञ्चयनम् वागम्भिण्या अम्भिण्यादित्यादित्यानीमानि शुक्लानि यजुषि वाजसने- येन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते ॥3 ॥

याज्ञवल्क्य से, याज्ञवल्क्य ने उद्दालक से, उसने अरुण से, उसने उपवेशि से, उसने कुश्री से, उसने याजश्रवा से, उसने जिह्वावान बाध्योग से, उसने असित वार्षगण से, उसने हरित काश्यप से, उसने शिल्प काश्यप से, उसने काश्यप नैध्रुवि से, उसने वाक् से, उसने अंभिणी से, उसने सूर्य से और सूर्य द्वारा प्राप्त हुआ यह यजुर्वेद याज्ञवल्क्य वाजसनेय ने कहा है । समानमा सांजीवीपुत्रात्सांजीवीपुत्रो माण्डूकायनेर्माण्डूकायनिर्माण्ड- व्यान्माण्डव्यः कौत्सात्कौत्सो माहित्थेर्माहित्थिर्वामकक्षायणाद्वामकक्षा- यणः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यो वात्साद्वात्स्यः कुश्रेः कुश्रिर्यज्ञवचसो राज- स्तम्बायनाद्यज्ञवचा राजस्तम्बायनस्तुरात्कावषेयात्तुरः कावषेयः प्रजा- पतेः प्रजापतिर्ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥4 ॥

इति पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि षष्ठोऽध्यायः ॥6 ॥

॥ इति बृहदारण्यकोपनिषत्समाप्ता ॥ (वही ज्ञान सांजीवी के पुत्र के पास कैसे आया, यह अब बताते हैं - ) सांजीवी के पुत्र ने वह ज्ञान माण्डूकायनि से प्राप्त किया । उसने माण्डव्य से, उसने कौत्स से, उसने आहित्थि से, उसने वाकक्षायण से, उसने शाण्डिल्य से, उसने वत्स्य से, उसने कुश्रि से, उसने यज्ञवचा राजस्तंभायन से, उसने तुरकावशेय से, उसने प्रजापति से तथा प्रजापति ने ब्रह्म से ज्ञान प्राप्त किया । ब्रह्म स्वयंभू है उस स्वयंभू ब्रह्म को नमस्कार । (यहाँ पाँचवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ ।) यहाँ बृहदारण्यकोपनिषद् में छठा अध्याय समाप्त होता है । इस प्रकार बृहदारण्यकोपनिषत् समाप्त होती है । शान्तिपाठः

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥