Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 411–420

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 411–420

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षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 369 जो प्रजाति ( प्रजननशक्ति) को जानता है, वह प्रजाओं और पशुओं के द्वारा - है । ‘वीर्य ही प्रजननशक्ति है ।' – ऐसा जो जानता है, वह प्रजाओं और पशुओं वृद्धिसे युक्तकोहोताप्राप्त हैहोता। ते हेमे प्राणा अहःश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन्व उत्क्रान्त इदः शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥7 ॥

एक बार वाग् आदि ये प्राण ( इन्द्रियाँ ) अपनी श्रेष्ठता ( साबित करने ) के लिए ब्रह्मा के पास गए । (उन्होंने पूछा— ) “हममें से बड़ा कौन है?" ब्रह्मा ने उनसे कहा – “तुममें से जिसके चले जाने से ( अलग पड़ जाने से ) यह शरीर अपने को अधिक पापी मानने लगे ( शरीर की दुर्दशा हो ) वही सबसे बड़ा है । " वाग्घोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितु- मिति ते होचुर्यथाऽकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वासो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रवि- वेश ह वाक् ॥8 ॥

बाद में जीभ शरीर में से चली गई । एक वर्ष तक बाहर रहकर वह वापिस आई और अन्यों से बोली- “ मेरे बिना तुम लोग कैसे जी सके? ” उन इन्द्रियों ने उत्तर दिया– “ जैसे गूँगे लोग वाणी से बिना बोले ही प्राणवायु से साँस लेते हुए, आँख से देखते हुए, कान से सुनते हुए, मन से जानते हुए और वीर्य से उत्पन्न हुए जीते हैं, वैसे ही हम जीएँ । ” ( यह सुनकर ) वाणी ने फिर ( शरीर में) प्रवेश कर लिया । चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितु- मिति ते होचुर्यथाऽन्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वासो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रवि- वेश ह चक्षुः ॥१ ॥

बाद में चक्षु शरीर से बाहर चला गया । एक वर्ष तक बाहर रहकर वापस आकर अन्यों से पूछने लगा— “मेरे बिना तुम लोग कैसे जी सके? ” अन्यों ने कहा– “ जैसे अन्धे लोग बिना चक्षु से न देखते हुए भी प्राणों से साँस लेते हुए, वाणी से बोलते हुए, कान से सुनते हुए, मन से जानते हुए और वीर्य से उत्पन्न हुए जीते हैं, वैसे ही हम जीएँ । ” तब आँख ने फिर से ( शरीर में ) प्रवेश कर लिया । श्रोत्र होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवि- तुमिति ते होचुर्यथा बधिरा अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वासो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥10 ॥

तब श्रोत्र उठकर चला गया । वह ( भी) एक वर्ष तक बाहर रहकर वापिस आकर (अन्य इन्द्रियों से) कहने लगा— “ मेरे बिना तुम लोग कैसे जी सके? " उन्होंने कहा— “जैसे बहरे लोग कान के बिना न सुनेते हुए भी प्राणों से साँस लेते हुए, वाणी से बोलते हुए, आँख से देखते हुए, मन से जानते 24 उ०प्र०

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370 उपनिषत्सञ्चयनम् हुए, और वीर्य से उत्पन्न होते हुए जीते हैं, वैसे ही हम लोग भी जीए । " यह सुनकर कान भी (शरीर में ) वापिस प्रविष्ट हो गया । मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितु- मिति ते होचुर्यथा मुग्धा अविद्वासो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥11 ॥

अब मन उठकर चला गया । वह एक वर्ष तक बाहर रहकर वापस आकर बोला— “मेरे बिना तुम लोग कैसे जी सके? ” तब अन्य इन्द्रियों ने कहा– “ जैसे नासमझ मनुष्य मन से न समझते हुए भी प्राणों से साँस लेते हुए, वाणी से बोलते हुए, आँख से देखते हुए, कान से सुनते हुए, वीर्य से उत्पन्न होते हुए जीते हैं, वैसे ही हम जीए ।" यह सुनकर मन भी फिर से ( शरीर में ) प्रविष्ट हो गया । रेतो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितु- मिति ते होचुर्यथा क्लीबा अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वासो मनसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥12 ॥

फिर वीर्य शरीर से चला गया । एक वर्ष तक बाहर रहकर वह वापिस आया और बोला- “ मेरे तुम लोग कैसे जी सके? ” उन्होंने तब कहा- "जैसे नपुंसक लोग बिना वीर्य के प्रजा तो उत्पन्न नहीं कर सकते, परन्तु प्राण से साँस लेकर, वाणी को बोलते हुए, आँख से देखते हुए, कान से सुनते हुए, मन से जानते हुए जीते हैं, वैसे ही हम जीए । " यह सुनकर वीर्य ने भी वापस ( शरीर में ) प्रवेश किया । अथ ह प्राण.उत्क्रमिष्यन्यथा महासुहयः सैन्धवः पड्वीशशकून्संवृहे- देव' हैवेमान्प्राणान्त्संववर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रमीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥13 ॥

फिर जब प्राण चलने लगा तब उसने जैसे सिन्ध देश में जन्मा हुआ बड़ा सुन्दर घोड़ा बन्धन के खूँटों को उखाड़ देता है, वैसे ही इन दूसरे प्राणों को ( इन्द्रियों को) उखाड़ दिया । इसलिए उन्होंने ( इन्द्रियों ने ) कहा—-“' हे भगवन्! आप मत जाइए । आपके बिना हम जीवित नहीं रह सकेंगे । ” तब प्राण बोला— “तब श्रेष्ठ ऐसे मुझको बलि देते रहो । " तब दूसरे प्राण ( इन्द्रियाँ ) बोले- “ठीक है— जी हाँ । " साह वागुवाच यद्वा अहं वसिष्ठास्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद्वा अहं प्रति- ष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति चक्षुर्यद्वा अहः संपदस्मि त्वं तत्संपदसीति श्रोत्रं यद्वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो वा प्रजातिरस्मि त्वं तत्प्रजातिरसीति रेतस्तस्यो मे किमन्नं यद्वा अहं यदिदं किंचाश्वभ्य आकृमिभ्य आकीटपतङ्गेभ्यस्तत्तेऽन्नमापोकिं वास इति नतद्विद्वासःह वा अस्यानन्नंश्रोत्रियाजग्धंअशिष्यन्तभवति नानन्नंआचमन्त्यशित्वाचामन्त्येतमेवपरिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नंवास इतिवेद नग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते ॥14 ॥ तदनम- इति प्रथमं ब्राह्मणम् ॥

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षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 371 वाणी बोली– “ यदि मैं उत्तम आश्रय हूँ, तो मुझसे अधिक उत्तम आश्रय तुम हो । ” तब आँख ने कहा— “यदि मैं प्रतिष्ठा हूँ, तो मुझसे भी सबकी प्रतिष्ठा तुम हो ” । तब कान ने कहा— “यदि मैं सम्पत्तिरूप तो मुझसे अधिक तुम सम्पत्तिरूप हो । ” तब मन बोला– “यदि मैं आश्रयरूप हूँ तो मुझसे अधिक आश्रयरूप तो तुम्हीं हो । " तब वीर्य ने कहा– “ यदि मैं प्रजननशक्तिवाला हूँ, तो तुम उसकी भी प्रजननशक्ति हो । ” तब प्राण ने कहा- "तुम लोगों में श्रेष्ठ ऐसे मेरा अन्न क्या है? मेरा वस्त्र क्या है? ” ( इसके उत्तर में वागादि ने कहा कि- ) “कुत्ते, कीड़े और जुगनुओं से लेकर यह जो कुछ भी है, वह सब तुम्हारा अन्न है, और जल ही तुम्हारा वस्त्र है । जो कोई भी मनुष्य इस प्राण के अन्न को जानता है, उसको कभी अभक्ष्य का भक्षण नहीं होता । अभक्ष्य का संग्रहण भी उसका नहीं होता है । इसलिए पढ़े - लिखे विद्वान् लोग भोजन करते समय आचमन करते हैं, और भोजन करने के बाद भी आचमन करते हैं । और अपने उस कर्म को वे प्राणों को आच्छादित करने का (प्राणों को वस्त्रहीन करने का) कार्य नहीं करते हैं । ( यहाँ पहला ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * द्वितीयं ब्राह्मणम् श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम स आजगाम जैवलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमार 3 इति स भो 3 इति प्रतिशुश्रावाऽनुशिष्टोन्वसि पित्रेत्योमिति होवाच ॥1 ॥

अरुणपौत्र श्वेतकेतु पांचालों की सभा में आया । वह जीवलपुत्र प्रवहण के यहाँ पहुँचा । वह नौकरों से अपनी सेवा करवा रहा था । उसे देखकर प्रवहण ने कहा- "क्यों कुमार! ” उसने उत्तर दिया ‘ जी! ' तब ( राजा प्रवहण ने ) पूछा– “क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें पढ़ाया है? " वह बोला— “जी हाँ ” । वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयत्यो विप्रतिपद्यन्ता 3 इति नेति होवाच वेत्थ यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता 3 इति नेति हैवोवाच वेत्थो यथासौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न संपूर्यता 3 इति नेति हैवोवाच वेत्थो यति- थ्यामाहुत्या हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती 3 इति नेति हैवोवाच वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वा यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वापि हि न ऋषेर्वचः श्रुतम् । द्वे सृती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् । ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति नाहमत एकंचन वेदेति होवाच ॥2 ॥

(तब राजा ने पूछा— ) “ ये सब लोग मृत्यु के बाद विभिन्न मार्गों में जाते हैं, वह तुम जानते हो? ” श्वेतकेतु ने कहा— “नहीं जी । " तब राजा ने पूछा- "जैसे पुनः वे लोग यहाँ आते हैं वह जानते हो? ” श्वेतकेतु ने कहा- " नहीं जी । " तब राजा ने पूछा– “क्या तुम यह जानते हो कि बार-बार लोग परलोक में जाते हैं, फिर भी वह भर क्यों नहीं जाता? " श्वेतकेतु बोला– “नहीं जी । ” तब राजा ने फिर पूछा— “कितनी आहुतियाँ देने के बाद जल पुरुषशब्द वाच्य होकर बोल उठता है, वह तुम जानते हो? ” श्वेतकेतु बोला- "जी नहीं । ” राजा ने आगे पूछा– “देवयान या पितृयाण के मार्गों के साधनों को तुम जानते हो क्या? हम लोगों ने ऋषि का वचन ( मंत्रवाक्य) सुना है कि मनुष्यों के

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372 उपनिषत्सञ्चयनम् लिए दो रास्ते हैं एक देवदान है और दूसरा है पितृयाण । यह सारा विश्व उन दो मार्गों से होकर ही जाता है । ये दो मार्ग जिसके बीच में हैं, ऐसे द्युलोकरूप पिता और पृथ्वीलोकरूप माता के मध्यवर्ती मार्गों को तुम जानते हो क्या? ” तब श्वेतकेतु ने कहा– “ मैं इनमें से किसी को नहीं जानता । ” अथैनं वसत्योपमन्त्रयांचक्रेऽनादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव स आज- गाम पितरं त होवाचेति वाव किल नो भवान्पुरानुशिष्टानवोचदिति कथ सुमेध इति पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत्ततो नैकंचन वेदेति कतमेत इती इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥३ ॥

बाद में उसको (श्वेतकेतु को ) यहाँ ठहरने के लिए प्रार्थना की । परन्तु कुमार श्वेतकेतु ठहरने की उस प्रार्थना का अनादर करके दौड़कर अपने पिता के पास आ पहुँचा, और उससे कहने लगा-“ आपने पहले समावर्तन संस्कार के समय ऐसा ही कहा था न कि आपने मुझे पढ़ा दिया है! " तब पिता बोले —‘ “अरे सयाने! तो उसका अब क्या है? ” तब श्वेतकेतु ने कहा-" अरे! उस दुष्ट क्षत्रिय ने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे, उनमें से एक का जवाब भी मैं नहीं दे पाया । " पिता ने पूछा— “ कौन से थे वे प्रश्न? ” श्वेतकेतु ने कहा– “ये हैं वे प्रश्न!” ऐसा कहकर उसने (पूछे हुए ) प्रश्नों का कुछ अंश सुनाया । स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किंचन वेद सर्वमहं तत्तुभ्यमवोचं प्रेहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैबलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहारयांचकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार त होवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति ॥4 ॥

तब उसने ( पिता ने पुत्र से ) कहा - "तुम मुझसे यह जान लो कि मैं जो कुछ भी जानता था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया है । इसलिए चलो मेरे साथ चलो, हम दोनों उसके यहाँ जाकर विद्याग्रहण करने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करें ।” श्वेतकेतु ने कहा– “ आप ही जाइए । ” ऐसा सुनकर गौतम ( आरुणि) प्रवाहण जैबाल की जहाँ बैठक थी वहाँ गए । राजा प्रवाहण ने उनके लिए आसन लाकर और ( सेवकों द्वारा ) जल मँगवाकर अर्घ्यदान किया । और कहा– “मैं भगवान् गौतम को वर देता हूँ ।" स होवाच प्रतिज्ञातो म एष वरो यां तु कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥5 ॥

तब उसने ( गौतम आरुणि ने ) कहा– “आपने मुझे वर देने की प्रतिज्ञा की है, तो ऐसे आपसे मेरा यही वर है कि आपने कुमार से ( मेरे पुत्र से ) जो बात पूछी थी, वह कहिए। ” स होवाच दैवेषु वै गौतम तद्वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति॥6 ॥

तब उसने (प्रवाहण ने ) कहा- “' हे गौतम! वह वरदान तो दैव वरदानों में से है । आप मनुष्य सम्बन्धी वरदानों में से कोई वर माँगिए । ” स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं परिधानस्य मा नो भवान्बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यवदान्योऽभूदितिगोअश्वानां दासीनां प्रवाराणां गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचा स वै स होपायनकीर्त्योवास ॥7 ॥ ह स्मैव पूर्व उपयन्ति

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षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 373 की, घोड़ोंउसनेकी(, गौतमदासियोंआरुणिकी, परिवारने ) कहाकी-और"आपवस्त्रजानतेआदि हैंकीकिप्राप्तिवह तोतो मुझेमेरे पासहै हीहै ही । सोने की, गायों अपार अनन्त धन का दान करते ही रहे हैं, तो मेरे लिए उस अपार अक्षुण्ण वस्तु। आपकेतो सदा पुष्कल ‘ अदाता’ ( दान में संकोच करनेवाले ) न हों ।" तब राजा ने कहा– “तब तो हे गौतम, तुम्हेंदानशास्त्रकथितके लिए विधि अनुसार ऐसी इच्छा करनी चाहिए । " तब गौतम ने कहा- "मैं आपके पास शिष्यभाव से उपस्थित होता हूँ । ब्राह्मण लोग मुँह से ऐसा बोलकर ही प्राचीन समय में गुरु के यहाँ पढ़ने जाते थे । ” स होवाच यथा नस्त्वं गौतम मापराधास्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिश्श्चन ब्राह्मण उवास तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वैवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥8 ॥

उसने ( राजा ने ) कहा— “जिस तरह तुम्हारे परदादों ने हमारे पूर्वजों के अपराधों को लक्ष्य में नहीं लिया, वैसे ही हमारे अपराधों को तुम लक्ष्य में मत लेना । यह विद्या पहले किसी ब्राह्मण के यहाँ नहीं रही । वह मैं तुम्हें बताऊँगा । क्योंकि इस तरह विनयपूर्वक बोलनेवाले तुमको 'नहीं' - – ऐसा कहने के लिए कौन समर्थ है भला? असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोहरर्चिर्दि- शोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां ता हु सोमो राजा संभवति ॥ १ ॥

हे गौतम! यह द्युलोक ही अग्नि है, आदित्य उसका समिध है, किरणें धुआँ है, दिवस उसकी ज्वाला है, दिशाएँ अंगारे हैं, अवान्तर दिशाएँ चिनगारियाँ हैं, उस ऐसे अग्नि में देवलोक श्रद्धा का होम करते हैं । उस आहुति से राजा मोम उत्पन्न होता है । पर्जन्यो वाऽग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिर- जुह्वतिशनिरङ्गारातस्यह्रादुनयोत्यैविस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौवृष्टिः संभवति ॥10 ॥ देवाः सोमश् राजानं

हे गौतम! मेघ ही अग्नि है, उसका संवत्सर ही समिध है, बादल धुआँ है, विद्युत् उसकी ज्वाला है, अशनि ( इन्द्र का वज्र ) अंगारे हैं, मेघगर्जनाएँ चिनगारियाँ हैं, ऐसे उस अग्नि में देवलोग सोम राजा की आहुति देते हैं । उस आहुति से वृष्टि होती है । अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निर्धूमो रात्रिरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नः संभवति ॥11 ॥

हे गौतम! यह लोक ही अग्नि है, पृथ्वी ही इसका समिध है, अग्नि धूम है, रात्रि ज्वाला है, चन्द्रमा अंगारे हैं, नक्षत्र चिनगारियाँ हैं । ऐसे इस अग्नि में देवलोग वृष्टि को होमते हैं, इस आहुति से अन्न होता है । पुरुषो वाऽग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित्प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः संभवति ॥12 ॥

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374 उपनिषत्सञ्चयनम् हे गौतम! पुरुष ही अग्नि है, उसका खुला हुआ मुख ही समिध है, प्राण धूम है, चक्षु अंगारे हैं, श्रोत्र चिनगारियाँ हैं । ऐसे इस अग्नि में देवलोग अन्न का होम करते हैहैं, वाणी। उस ज्वालाआहुति से वीर्य उत्पन्न होता है । योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्य- दन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा तो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः संभवति । स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ 13 ॥

हे गौतम! स्त्री ही यज्ञाग्नि है, उसकी जननेन्द्रिय ही समिध है, उसके ऊपर के बाल धूम हैं, योनि ज्वाला है, उसके अन्दर किया जानेवाला मैथुन व्यवहार अंगारे हैं, आनन्द चिनगारियाँ हैं । ऐसे उस अग्नि में देवलोग वीर्य का होम करते हैं । उस आहुति से पुरुष उत्पन्न होता है | वह कर्म शेष रहने तक जीता है, और जब मर जाता है, तब- अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित्समिद्धूमो धूमोऽर्चिर- चिरङ्गारा अङ्गारा विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णः संभवति ॥14 ॥

उसे अग्नि के पास ले जाते हैं । उसका अग्नि ही अग्नि रूप होता है, समिध ही समिध रूप होता है, धूम ही धूम रूप होता है, ज्वाला ही ज्वाला रूप होती है, अंगारे ही अंगारे रूप होते हैं, चिनगारियाँ ही चिनगारियाँ रूप होती हैं । ऐसे उस अग्नि में देवलोग पुरुष का होम करते हैं । उस आहुति से पुरुष अत्यन्त दीप्तिमान हो जाता है । ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धाः सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसंभव- न्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान्षण्मासानुदङ्ङादित्य एति मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्याद्वैद्युतं तान्वैद्युता- न्पुरुषी मानस एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥15 ॥

वे जो इस प्रकार इसको ( पंचाग्निविद्या को ) जानते हैं, और वे जो वन में, की उपासना करते हैं वे ज्योति अभिमानी देवताओं को प्राप्त होते हैं । श्रद्धायुक्त होकर सत्य के, से मास देव से शुक्लपक्षपक्षमें से केदिवसअभिमानी के अभिमानीदेव उनदेव छःको दिवसके अभिमानीके अभिमानीदेव ज्योतिके अभिमानीके अभिमानीदेव कोदेवताओं, शुक्ल ओर चलता है । फिर उस मासाभिमानी देव से देवलोकको प्राप्त होता है, जिनमें सूर्य उत्तर दिशा की विद्युत्सम्बन्धी देवताओं को प्राप्त होता है । उन वैद्युत देवोंको, देवलोक से आदित्य को, आदित्य से -ब्रह्मलोक में ले जाता है । उन ब्रह्मलोकों में वे प्रकृष्ट के पास एक एक मानस पुरुष आकर उन्हें हैं । उनका इस संसार में पुनरागमन नहीं होता होकर ( मोक्ष प्राप्त करके ) अनेक वर्षों तक । अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति त्रिः रात्रेपरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद्यान्वण्मासान्दक्षिणादित्यते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रा- एति मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चन्द्रं स्तत्र देवा यथा सोमश् राजानमाप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनाश्स्तत्रते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति ताः- भक्ष-

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षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 375 यन्ति तेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद्वायुं वायोर्वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ जायन्ते लोकान्प्रत्युत्थायिनस्त एवमेवानुपरिवर्त- न्तेऽथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गाः यदिदं दन्दशूकम् ॥16 ॥।

इति षष्ठे द्वितीयं ब्राह्मण् ॥ और जो मनुष्य यज्ञ से, दान से, तप से लोकों को प्राप्त करता है, वे धूमाभिमानी देवता को प्राप्त होते हैं | धूम से रात्रि देवता को, रात्रि से कृष्णपक्षाभिमानी देवता को, कृष्णपक्ष से दक्षिणायन के छ: महीनों में जाते हैं । उन महीनों में से पितृलोक में जाते हैं । पितृलोक से चन्द्रलोक में जाते हैं । चन्द्रलोक में जाकर वे अन्नरूप बन जाते हैं । वहाँ जैसे ऋत्विज् लोग ' आप्यायस्व अपक्षीयस्व' – ऐसा बोलकर सोमराजा को चमस में पी जाते हैं, उस तरह देव लोग, उन अन्नरूप बने मनुष्यों को खा जाते हैं । फिर से उनका पुरुषरूप अग्नि में होम किया जाता है । उससे फिर लोकों के प्रति उत्थान करने वाले होकर वे फिर स्त्रीरूपी अग्नि से उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार वे बार- बार परिवर्तित हुआ करते हैं ( घूमा करते हैं ) । परन्तु, जो लोग इन दोनों मार्गों में से एक का भी ज्ञान नहीं रखते, वे कीट - पतंगादि और डाँस - मच्छर आदि होते हैं, वे ही होते हैं । ( यहाँ दूसरा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) तृतीयं ब्राह्मणम् स यः कामयेत महत्प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वाद- शाहमुपसती भूत्वौदुम्बरे कसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति संभृत्य परिसमुह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यः सस्कृत्य पु सा नक्षत्रेण मन्थः संनीय जुहोति- यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामान् । तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा । या तिरश्ची निपद्यतेऽहं विधरणी इति । तां त्वा घृतस्य धारया यजे साधनीमहः स्वाहा ॥1 ॥

जो ऐसा चाहता हो कि मैं बहुत ही महत्त्व प्राप्त करूँ, यह उत्तरायण में शुक्लपक्ष के पवित्र दिन, बारह दिनों तक केवल दूध ही पीकर रहकर, औदुम्बर- गूलर के काष्ठ से बनाए गए कटोरे में अथवा चमसपात्र में सभी औषधियाँ, फल और अन्य सामग्रियाँ एकत्रित करके, हवनस्थान को दर्भ से साफ- सुथरा बनाकर उसकी लिपाई करे । फिर उसमें अग्नि का स्थापन करके, उसके आसपास आसन बिछाकर, गृह्यसूत्रों में बताई गई विधि के अनुसार घी का संस्कार करके पुल्लिंग नामवाले (हस्त आदि ) नक्षत्रों में ( पहले से तैयार किए गए) सर्वौषधियों के दध्यादि मिश्रित मन्थ ( मिश्रण = चूर्ण ) को, स्वयं तथा अग्नि के बीच में रखकर होम करता है । और उस समय यह मन्त्र बोलता है- "हे जातवेद! तुम्हारे वश में से जितने देवता वक्रमति होकर पुरुष की कामनाओं का प्रतिबन्ध करते हैं, उनको उद्देश करके यह आव्यभाग मैं तुममें होमता हूँ । तृप्त हुए वे सभी मुझे सब कामनाओं से तृप्त करें । स्वाहा । ” (यह बोलकर आहुति देनी चाहिए) और भी “मैं सबके मृत्यु को धारण करनेवाला हूँ । ऐसाउसमानकरदेवता जो कुटिल बुद्धिवाला देवता तुम्हारा आश्रय लेकर रहता है, सर्वसाधनों की पूर्ति करनेवाले

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376 उपनिषत्सञ्चयनम् के लिए घी की धारा से मैं यजन करता हूँ, स्वाहा” – ऐसा बोलकर उसको आहुति देनी चाहिए (वह देता है) । ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सस्त्रवमवनयति प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्ये सस्त्रवमवनयति वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सत्रवमवनयति चक्षुषे स्वाहा संपदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सत्रवमवनयति श्रोत्राय स्वाहाऽयतनाय स्वाहे- त्यग्नौ हुत्वा मन्थे सस्त्रवमवनयति मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सस्रवमवनयति रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सत्रवमवन- यति ॥2 ॥

‘“ ' – मन्थ में ज्येष्ठायटपका देतास्वाहाहै श्रेष्ठाय(उसे टपकास्वाहादेना इसचाहिएमंत्र) से। अग्नि"प्राणायमें आहुतिस्वाहा वसिष्ठायैदेकर स्रुव स्वाहा ” हुए– यहघी मंत्रको बोलकर अग्नि में वह आहुति देता है, और स्रुव में बचे हुए घी को मन्थ में टपका देता है । “ वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहा ” —इस मंत्र से वह अग्नि में आहुति देता है और स्रुव में चिपके हुए घी को मन्थ में टपका देता है । “ चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहा”– यह मंत्र बोलकर अग्नि में आहुति देता है और स्रुव में लगे रहे घी को मन्थ में टपका देता है । " श्रोत्राय स्वाहा आयतनाय स्वाहा ” —यह मन्त्र बोलकर अग्नि में आहुति देता है और स्रुव में बचे-खुचे घी को मन्थ में टपका देता है । बाद में “रेतसे स्वाहा ” —यह मन्त्र बोलकर अग्नि में आहुति देता है और स्रुव में अवशिष्ट घी को मन्थ में टपका देना है । अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सत्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सस्रवमवन- यति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सस्रवमवनयति भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्ये सशस्त्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सत्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा सर्वायसस्त्रवमवनयतिस्वाहेत्यग्नौविश्वायहुत्वा मन्थेस्वाहेत्यग्नौसत्रवमवनयतिहुत्वा मन्थेप्रजापतयेसस्रवमवनयतिमन्थे हुत्वा मन्थे सस्रवमवनयति ॥3 ॥ स्वाहेत्यग्नौ “अग्नये स्वाहा ”—यह मन्त्र बोलकर अग्नि

मन्थ में टपकाता है । “सोमाय स्वाहा ”—यह मंत्र बोलकरमें आहुति डालता है और स्रुव में अवशिष्ट घी को “ मेंघी अवशिष्टको मन्थ घीमें कोटपकातामन्थ मेंहै टपका। भूःदेतास्वाहाहै ”। “– इस मंत्र को पढ़करअग्नि मेंअग्निआहुतिमें आहुतिदेता है देताऔर हैस्रुवऔरमें स्रुवलगे है और स्रुव में अवशिष्ट घी को मन्थ में टपकाभुवःदेतास्वाहा”–इस मंत्र को पढ़कर अग्नि में आहुति देता “: ” कोआहुतिपढ़करदेता अग्निहै औरमेंस्रुवआहुतिमें अवशिष्टडालताघीहै,कोऔरमन्यअवशिष्टमें टपकाहै । स्वदेता स्वाहाहै । “ भूर्भुव—यह: स्वमंत्र: स्वाहाबोलकर”–इसअग्निमंत्रमें स्वाहा ” —यह मन्त्र पढ़कर अग्नि में आहुति डालता है औरघी को मन्थ में टपका देता है । "ब्रह्मणे स्रुव में बचे- खुचे घी को मन्थ में टपका

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षष्ठोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 377 देता है । " क्षत्राय स्वाहा '. - यह मन्त्र पढ़कर अग्नि में आहुति देता है और स्रुव में बचे घी को मन्थ में टपका देता है । “ भूताय स्वाहा” – यह मंत्र बोलकर अग्नि में आहुति देता है और स्रुव में लगे घी को मन्थ में टपका देता है । "भविष्यते स्वाहा” – यह मन्त्र पढ़कर अग्नि में आहुति देता है और स्रुव में बचे घी को मन्थ में टपका देता है । “विश्वाय स्वाहा” – यह मंत्र बोलकर अग्नि में आहुति देता है और स्रुव में बचे घी को मन्थ में टपकाता है । " सर्वाय स्वाहा” – यह मंत्र बोलकर अग्नि में आहुति डालता है और स्रुव में बचे घी को मन्थ में टपकाता है । "प्रजापतये स्वाहा ” –यह मन्त्र बोलकर अग्नि में आहुति डालता है और स्रुव में बचे घी को मन्थ में टपका देता है । अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकसभमसि हिंकृतमसि हिंक्रियमाणमस्युद्गीथमस्युद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे संदीप्तमसि विभूरसि प्रभूरस्यन्नमसि ज्योतिरसि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥4 ॥

बाद में उस मन्थ का स्पर्श करते हुए यह मंत्र बोलता है– “हे मन्थ! तू सर्व प्राणियों में भ्रमण करनेवाला प्राण है, तू अग्नि के रूप में चलता है, तू ब्रह्मरूप में परिपूर्ण है, तू आकाश के रूप में अति स्तब्ध है, तू जगत्रूपी एक सभा- सा है ( तू सबका अविरोधी है ), तू ही यज्ञारंभ में प्रस्तोता द्वारा किया गया हिंकार है, तू ही उसी प्रस्तोता द्वारा किया गया यज्ञमध्य हिंक्रियमाण है, तू ही उद्गीथ है, तू ही यज्ञमध्य का उद्गीयमान है, तू ही श्रावित ( सुनाया) जानेवाला है, तू ही प्रत्याश्रावित ( सामने से सुनाया जानेवाला ) है, तू ही आर्द्र- मेघ में चमकनेवाला (विद्युत् रूप में ) है, तू ही विभु है, तू ही प्रभु है, तू ही अन्न है, तू ही भोक्ता है, तू ही प्रलयस्थान है, तू ही संवर्ग (सर्वसंहारक ) है । ” अथैनमुद्यच्छत्यामः स्यामः हि ते महि स 'राजेशानोऽधिपतिः समाः राजेशानोऽधिपतिं करोत्विति ॥5 ॥

बाद में " आमं स्यामं ते महि” –इत्यादि मन्त्र के द्वारा मन्थ को हाथ में लेता है । मंत्रार्थ यह है— "तू सब कुछ जानता है, तेरी महिमा को मैं अच्छी तरह जानता हूँ । वह प्राण ही राजा है, वही नियन्ता है, वही अधिपति है । वह प्राण मुझे राजा ईशान ( नियंता ) और अधिपति बनाए । अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यं मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वोषधीर्भूः स्वाहा भर्गो देवस्य धीमहि मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवश्रजः मधु द्यौरस्तु नः पिता भुवः स्वाहा धियो यो नः प्रचोदयान्मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ 3 अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मधुमतीरहमेवेदः सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं मनुष्याणामेकपुण्डरीकं भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वशं जपति ॥6 ॥

बाद में (उस मन्थ के चार अलग- अलग ग्रास बनाकर) वह खाता है । प्रथम ग्रास यह मन्त्र बोलकर खाता है— “सूर्य के उस श्रेष्ठ पद का मैं ध्यान करता हूँ । वायु मधुर रीति से बहते। ” ( फिरहैं, नदियाँउसके भी मधुर रस का स्राव कर रही हैं, हमारे लिए औषधियाँ मधुर रसवाली हों, भूः स्वाहाहैं । रात और दिन बाद दूसरा ग्रास यह मंत्र बोलकर खाता है — ) “ सूर्यदेव के तेज का हम ध्यान करते

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378 उपनिषत्सञ्चयनम् हमारे लिए सुखकर हों, पृथ्वी की रज हमें उद्वेगकारी न हो ( अर्थात् हमारे लिए आनन्दकारी हो), हमारे पिता द्युलोक हमारे लिए सुखदायक हों, भुवः स्वाहा ।” (इसके बाद तीसरा ग्रास यह मंत्र बोलकर वह खाता है कि— ) “ जो सूर्यदेव हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं वे तथा वनस्पतिरूप सोम— दोनों हमारे लिए आनन्द देनेवाले हों, उनकी किरणें हमारे लिए सुखकर हों । स्वः स्वाहा । ” इस प्रकार ( तीन ग्रास भक्षण करके बाद में) वह पूरा गायत्रीमंत्र बोलता है, और ( साथ में ही ) “मधुवाता ऋतायते ” आदि पूरी मधुमती ऋचा बोलकर, हाँ मैं ही सर्वस्वरूप हूँ” –ऐसा कहता है, और "भूर्भुव: स्व: स्वाहा” —ऐसा बोलकर चौथे ग्रास का भक्षण करता है । और अन्त में वह मन्थवाला पात्र भी धोकर उसका पानी पी जाता है । और आचमन करके दोनों हाथ धोकर अग्नि के पश्चिम भाग में पूर्व दिशा की ओर मस्तक रखकर सो जाता है । फिर प्रात:काल होने पर सूर्य के सामने इस मन्त्र के द्वारा उपस्थान करता है कि— “हे सूर्य! जिस तरह आप दिशाओं में अखण्ड ( श्रेष्ठ ) हैं, वैसे ही मैं भी मनुष्यों में अखण्ड और श्रेष्ठ बनूँ"" - इस प्रकार सूर्योपस्थान के बाद रात्रि में सोने से पहले जिस मार्ग से आया था, उसी मार्ग से अग्नि के पास जाकर, अग्नि के पश्चिम की ओर बैठकर ( आगे के मन्त्रों में बताए अनुसार) वंश का जप करता है । तु हैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वो- वाचापि य एनः शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशा- नीति ॥7 ॥

अरुणपुत्र उद्दालक ने इस ( मन्थकर्म ) का उपदेश वाजसनेयिपुत्र याज्ञवल्क्य नाम के अपने एक शिष्य को दिया था और कहा था कि "जो उपासक इस मन्थ को सूखे ठूंठे पर भी सींचेगा तो उस ठूंठे में भी शाखायें और कोपलें फूटेंगी । एतमुहैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैज्यायान्तेवासिन उक्त्वो- वाचापि य एनः शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशा- नीति ॥8 ॥

इसी उपर्युक्त मन्थ का उपदेश वाजसनेय याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्य पैंग्य को दिया था कि जो कोई भी इस मंथ का सिञ्चन किसी वृक्ष के ढूँठे पर भी करेगा, तो उसमें भी शाखाएँथा और कहा ” कोपलें फूटने लगेंगी । और एतमुहैव मधुकः पैङ्ग्यश्चलाय भागवित्तयेऽन्तेवासिने उक्त्वोवाचापि य इसी पूर्वोक्तएनः मन्थशुष्केकास्थाणौउपदेशनिषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाःमधुक पैंग्य ने अपने शिष्यप्ररोहेयुःचूल भागवित्तिपलाशानीति ॥9 ॥ यदि कोई भी मनुष्य इस मन्थ को वृक्ष के सूखे तने पर भी सींचेगा, तो उसमें को दिया और कहा कि ” फूटने लगेंगी । भी शाखायें और कोंपलें

एतमु हैव चूलो भागवित्तिर्जानकायायस्थूणायान्तेवासिन उक्त्वोवा- चापि य एनः शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः नीति ॥10 ॥ प्ररोहेयुः पलाशा- चूल भाग्यवित्ति ने अपने शिष्य जानकी

कि यदि कोई भी मनुष्य इस मन्य का सिंचन सूखेआयस्थूणवृक्ष को इसी पूर्वोक्त मन्थ का उपदेश देकर कहाकोपलें फूटने लगेंगी । के ठूंठे पर करेगा तो उसमें भी शाखायें और