Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 1–10
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1–10
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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका प्रथमखण्ड १ मोतीलालशम्र्मोपाह्रो मुक्तरक्तशर्मा आङ्गिरसो भारद्वाजः वेदवीथी- पथिकः जयपत्तनाभिजनः
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श्रीः प्रकाशितग्रन्थसूची-१ - गीताविज्ञानभाष्यभूमिकान्तर्गता- ' बहिरङ्गपरीक्षा ' नामक प्रथमखण्ड ३-४-y--11 " " " ६-11 ७-39 - ' आत्मपरीक्षा ' नामक द्वितीयखण्ड * - ' ब्रह्मकम्र्मपरीक्षा ' नामक तृतीयखण्ड * - ' कर्मयोगपरीक्षा ' नामक चतुर्थखण्ड * १५ ) २० ) २० ) २० ) ता - नामक २० ) २० ) २० ) १५ ) - ' ज्ञानयोग ' तथा भक्तियोगपरीक्षा-( पूर्वखण्ड ) पञ्चम, तथा पष्ठखण्ड - ' भक्तियोगपरीक्षा ' ( उत्तरखण्ड ) नामक सप्तमखण्ड - ' बुद्धियोगपरीक्षा ' नामक अष्टमखण्ड ८- ईशोपनिषत् - हिन्दी- विज्ञानभाष्य- प्रथमखण्ड ]... [ ६ - ईशोपनिषत् - हिन्दी - त्रिज्ञानभाष्य- द्वितीयखण्ड... ० - उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका-१०-११ - उपनिषद्विज्ञान भाष्यभूमिका-१२- उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका-प्रथमखण्ड द्वितीयखण्ड तृतीयखण्ड १३- श्राद्धविज्ञानग्रन्थानुगत ' आत्मविज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रथमखण्ड १४- श्राद्धविज्ञानग्रन्थानुगत ' सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीयखण्ड १५ - संस्कृति और सभ्यता - शब्दों का चिरन्तर इतिवृत्त, एवं भारतीय सांस्कृतिक-आयोजनों की रूपरेखा १६ - ' भारतीय - हिन्दु- मानव, और उस की भावुकता ' नामक खण्डचतुष्टयात्मकग्रन्थ का- ' विश्वस्वरूपमीमांसा ' नामक प्रथमखण्ड १७- ' वेदस्य सर्वविद्या निधानचम् ' ( संस्कृतनिबन्ध ) * १५ ) २० ) १५ ) १५ ) २० ) १५ ) २५ ) १५ ) १ ॥ ) ** --- चिह्नाङ्कित ग्रन्थ प्रेस में हैं, जो अग्रिम - वर्ष में प्रकाशित होजायेंगे ।
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उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत प्रथमखण्ड १ निबन्धा - मोतीलालशम्र्मोपाह्रो यः कश्चिदपि मुक्तरक्तशर्मा, श्राङ्गिरसो भारद्वाजः वेदवीथी - पथिकः, जयपत्तनाभिजनः निबन्धा ( ग्रन्थकर्त्ता ) की अनुमति से पुनः ( द्वितीय ) प्रकाशित ( पुनः प्रकाशनाधिकार एकमात्र निबन्धा से ही अनुप्राणित ) ‘ राजस्थानवैदिकतच्चशोधसंस्थानजयपुर ' के द्वारा प्रकाशित एवं श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय, मानवाश्रम - दुर्गापुरा - ( जयपुर ) के द्वारा मुद्रित द्वितीय- संस्करण ५०० प्रति मूल्य २० )
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श्रीः महामहिम राष्ट्रपति श्री डॉ ० राजेन्द्रप्रसादजी महाभाग के मान्य सचिव - द्वारा प्राप्त ' राजस्थानवैदिकतत्त्वशोधसंस्थान ' मानवाश्रम दुर्गापुरा ( जयपुर ) का ' प्रधान संरक्षतानुगत - प्रमाणपत्र ' अत्यन्त सम्मान से यहाँ उद्धृत होरहा है. -XXX भारत के राष्ट्रपति डा ० राजेन्द्र प्रसाद राजस्थान- वैदिक तत्त्वशोध संस्थान - जयपुर XXX XXX का प्रधान संरक्षक बनने की स्वीकृति प्रदान करते हैं मिलिट्री सेक्रेट्री ऑफिस राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली दिनांक 30 अगस्त १ ९ ५६ भारत के राष्ट्रपति के आदेशानुसार यदुनाथसिंह ( यदुनाथ सिंह ) मेजर जनरल मिलिट्री सेक्रेट्री टू दि प्रेसिडेन्ट
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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्डस्य किमपि - प्रास्ताविकम् प्रस्तोता - वेदवीथी - पथिकः— मुक्तरक्तशर्मा, आङ्गिरसो भारद्वाजः
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एक श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्ड की प्रस्तावना G ** ही ' उपनिषद् -औपनिषद - पुरुष की नभ्यप्रजापत्यनुगता संविन्मयी नैष्ठिकी प्रेरणा के फलस्वरूप सम्मुख उपस्थित ज्ञानभाष्यभूमिकानुगत- प्रथमखण्ड ' का प्रस्तुत ' द्वितीय - संस्करण ' उपनिषत्न मियों के सम्मिलित के सहयोग से होने जारहा है । आज से अनुमानत १५-२० वर्ष पूर्व बम्बई के कतिपय गुर्जरबन्धुनों श्राश्विनशुक्लपक्ष-उपनिषद्भूमिकानुगत प्रथमखण्ड ( एकसहस्र - प्रतियों के रूप में ) विक्रम सं ० १६६७ अप्रकाशित - ही थे, जिनका विजयदशमी तिथि पर प्रकाशित हुआ था । शेष दोनों खण्ड साधनों के अभाव से ही प्रकाशन सर्वप्रथम बिगत वि ० सं ० २०१३ में ' राजस्थानवैदिकतत्त्वशोधसंस्थानजयपुर ' की रहने ओर से से अनेक वर्षों - पूर्व हुआ । बीस वर्ष पूर्व प्रकाशित प्रथमखण्ड योग्य विद्वानों में निःशुल्क समर्पित करते ही पुनः प्रकाशन - सापेक्ष बन चुका था । किन्तु.......... १ । शोधसंस्थानने विगत तीन - चार वर्षों में अनेक प्रकाशन किए, जिनमें उपनिषद् भूमिकानुगत - द्वितीय- प्रथम-खण्ड, एवं तृतीय - खण्ड का भी समावेश है । इस वर्ष संस्थान ने यह अनुभव किया कि संस्थान , बिना ने प्रथम खण्ड के प्रकाशित द्वितीय तृतीय खण्डों से वेदप्र ेमी पाठक सन्तुष्ट नहीं होरहे । अतएव वर्ष के अनन्तर संस्थान खण्ड का पुनःप्रकाशन अनिवार्य माना । तत्प्रेरणा से ही प्रस्तुत प्रथमत्खण्ड बीस ही अभिव्यक्त करनी के द्वारा पुनः प्रकाशित होरहा है, जिसके लिए हमें संस्थान के प्रति कृतज्ञाता चाहिए । उपनिषदों के प्रति भारतीय विद्वानों का जो सहन श्राकर्षण देखा सुना नारहा है, इस दृष्टि - श्रुति के मूल में कम्र्म्मत्यागलक्षणा, विशुद्धज्ञानात्मिका ' संन्यासनिष्ठा ' ही प्रधान बनी हुई है । इसी प्रधानता के अनु-बन्ध से क्रौपनिषद् - ज्ञान, और वेदान्तज्ञान का अभेद लोकप्रसिद्धि का अनुगामी बना हुआ है । " नामरूपा-त्मक - सम्पूर्ण विश्व मायामय है, अतएव दैविक - भौतिक - श्रात्मिक तापत्रय का आगार के लिए है । अत- अतएव च सर्वथैव बन्धनप्रवत्त के है । इस मायामय - विश्वबन्धन से आत्मपरित्राण करने सिद्धान्तरूप उस वेदान्तज्ञानरूप विशुद्ध अध्यात्मज्ञान का अनिवार्य है, जिसका उपनिषदों में संक्षेप से, एवं विस्तार से स्वरूपोपबृंहण हुआ है " इसप्रकार की नितान्त— कतिपय-भावुकता पूर्णा काल्पनिकी मान्यताने ही मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के ' उपनिषद् ' भाग को विगत शताब्दियों से प्रमुखता प्रदान कर रक्खी है, जिस इत्थंभूता प्रमुखता का ही यह दुष्परिणाम है कि, महर्षियों -की तपःपूत । गरिमा - महिमामयी - नैष्ठिकी - आर्षप्रज्ञा के द्वारा अत्यन्त रहस्य - पूर्णा पारिभाषिकी ज्ञानविज्ञान ७