Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 11–20
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 11–20
पृष्ठ 11
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किमपि प्रास्ताविकम् निधि का स्वरूपविश्लेषक, छन्दोभ्यस्ता से समलङ्कृत उपनिषत् जैसा विविध विद्याभाण्डारात्मक मौलिक साहित्य अपनी ज्ञानविज्ञानात्मिका मौलिकता से सर्वथा ही पराः परावत प्रमाणित होचुका है, एवं काल्पनिक ' कलिसन्तरणोपनिषत् ' ' अल्लोपनिषत् ' आदि की भाँति रहस्य - पूर्ण यह उपनिषच्छास्त्र भी आज केवल पारयणपाठ का ही अनुगामी बना रह गया है । उपनिषत्साहित्य की अभ्युदय - नि: श्रेयस् - संसाधिका उभयपुरुषार्थ - प्रयोजिका कृत्स्ना उपयोगिता को तथाकथितरूपेण कर्म्मत्यागात्मिका काल्पनिको सांख्यनिष्ठा के व्यामोहन से एकान्ततः विस्मृत करा देने वाली महती भ्रान्ति के निराकरण के लिए यह आवश्यक है कि, मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के इस महत्त्वपूर्ण ध्यान उपनिषद्भाग के उन ज्ञानविज्ञानात्मक - अभ्युदयनिःश्र यस्संसाधक - दृष्टिकोण के प्रति श्रार्षप्रजा का आकर्षित किया जाय, जिक आकर्षण के बिना वेदशास्त्र का यह महत्त्वपूर्ण ज्ञानविज्ञान भाण्डार अनद्धा ही प्रमाणित होरहा है । इसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए अबतक के तथाकथित व्यामोहनात्मक - मतवादात्मक-प्राचीनव्याख्यारूप - व्यामोहनों को दूरतः ही प्रणम्य मानते हुए स्वयं उपनिच्छब्दों के उपनिषत् सम्मत ही पारिभाषिक — ज्ञानानुगत - वैज्ञानिक - समन्वय के आधार पर ईशादि - उपनिषदों के विज्ञानभाष्यों का संकल्प जागरूक हुआ है, जिसके परिणाम स्वरूप ही दो खण्डों में ' ईशोपनिषत् - हिन्दी- विज्ञानभाष्य ' प्रकाशित हुआ, एवं संकल्पित शेष उपनिषदों के विज्ञानभाष्य भी यथासमय, यथासुविधा प्रकाशनपथानुवर्मा बनते रहेंगे । अमुक - परिगणित - उपनिषदों के संकल्पित - विज्ञानभाष्यों के साथ ही यह भी संकल्प अभिव्यक्त हुआ कि, बहिरङ्गपरीक्षा से, तथा अन्तरङ्गपरीक्षा से अनुप्राणित अमुक विवादास्पद तथ्यों के वैज्ञानिक समन्वय के लिए उपनिषत् साहित्य पर ‘ भूमिका ' रूप से एक स्वतन्त्र निबन्ध भी उपनिबद्ध किया जाय । इसी संकल्पात्मिका प्रेरणा से ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका ' नाम से ( अनुमानत: दो सहस्र - फुलिस्केप - पृष्ठों में ) एक स्वतन्त्र निबन्ध भी आज से अनुमानत: बीस वर्ष पूर्व सम्पन्न हुआ, जिस इस बृहत्काय - निबन्ध को तीन खण्डों में विभक्त किया गया । तीन खण्डों से समन्विता उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका में जिन तथ्यों पर समन्वयात्मक विचार हुआ है, उपनिषत् - प्रेमियों की सुविधा के लिए अत्र उनका नामस्मरणमात्र कर लिया जाता है । ८
पृष्ठ 12
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उपनिषद्भूमिका १ खण्ड उपनिषद्विज्ञान- भाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्ड के प्रधान - विषयों का संस्मरण * ---प्रस्तुत - ' प्रथमखण्ड ' में प्रधानरूपेण निम्न लिखित चार स्तम्भों का समावेश है हुआ ह १- ' प्रस्तावना ' - ( भूमिका ) - ( प्रथमस्तम्भ ) २ - उपनिषदों के प्राद्यन्त में मङ्गलपाठ क्यों किया जाता है? ( द्वितीय स्तम्भ ) ३- ' उपनिषत् ' शब्द का क्या अर्थ है? [ तृतोयस्तम्भ ] ४ - क्या ' उपनिषत् ' वेद है? [ चतुर्थस्तम्भ ] ** * प्रथमखाण्डानुगता उक्ता स्तम्भचतुष्टयी के प्रत्येक स्तम्भ में अवान्तर अनेक प्रमुख विषय समविष्ट हुए हैं । दिग्देशकालव्यासक्त आज के अस्मच्छदृश व्यक्तियों की तात्कालिकी कण्डूपशान्ति के लिए यह श्रावश्यक है कि - स्तम्भचतुष्टयी से अनुप्राणित प्रमुख अवान्तर विषयों का भी स्वरूप - दिग्दर्शन करा दिया जाय । वही क्रमशः श्रत्र उपक्रान्त है । १ - ' प्रस्तावना ' - नामक प्रथमस्तम्भ के संस्मरणीय अवान्तर प्रमुख - विषयों का स्वरूप - दिग्दर्शन क - वैदिक - सासित्य, और हमारी मनोवृत्ति खवैदिक साहित्य, और प्रतीच्य- विद्वान् ग - वैदिक - साहित्य, और वैज्ञानिक - निदर्शन [ १ ] - आत्मनिवेदन- नामक प्रथम स्तम्भ में सर्वप्रथम वर्त्तमान युग के भारतीय- मानवों की उस प्रक्रान्ता मनोवृक्ति का स्पष्टीकरण हुआ है, जिस मनोवृत्ति के कारण आज स्वयं हम भारतीय ही ज्ञानविज्ञानप्रधान वेदशास्त्र की उपयोगिता पर सन्देह करने लग पड़े हैं । एवं युगधर्मानुबन्धो काल्पनिक
पृष्ठ 13
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किमपि प्रास्ताविकम् उपयोगितावाद - के व्यामोहन में श्रासक्त - व्यासक्ता हमारी भ्रान्ता प्रज्ञा इस महान् सांस्कृतिक - ज्ञानविज्ञानकोश की उपेक्षा करती हुई सर्वथैव - दिग्देशकालभ्रान्ता बनती जारही है, अथवा तो बन चुकी है । जबतक हमें? अपनी अन्य इन मूल संस्कृति का स्वरूपबोध नहीं होजायगा, तबतक दिग्देशकालानुबन्धी- उपयोगितात्मक, और प्रयत्नसहस्रों से भी हम अपना स्वरूप - बोध नहीं प्राप्त कर सकेंगे, जिस स्वरूपबोध के बिना मानव पशु के अवच्छेदक में कोई भी विभेद नहीं रह जाता । इसी तथ्य के स्पष्टीकरण के का लिए स्पष्टीकरण प्रस्तुत प्रथम स्तम्भ में ( क ) - ' वैदिक साहित्य, और हमारी मनोवृत्ति ' रूपेण श्रवान्तर- दृष्टिकोण हुआ है । ( ख ) - तदनन्तर इसी प्रथमस्तम्भ में उन ' प्रतीच्य - विद्वानों की मनोवृत्ति का स्वरूप- ' का संस्मरण एकमात्र हुआ है, जिस प्रतीच्यजगत् की सभ्यता, और आदर्श को ही आज हमने अपनी रखने वाले ' उन्नति प्रत्येक मानव को सम्बल मान रक्खा है । इस में तो कोई सन्देह नहीं कि, ' उन्नति ' की इच्छा अनुकरण करते आज उन पश्चिमी देशों की जीवनपद्धति, शासनपद्धति, समाजपद्धति, आदि आदि का उन्नति ' रहना ही चाहिए, जिन पश्चिमी देशों के भौतिक जीवन का एकमात्र लक्ष्य भूतानुबन्धिनी है । यह वह संस्मरणीय ' ही मानी गई है, जिस का रहस्यात्मक अर्थ ' उन्नति ' शब्द के गर्भ में हीं पिनद्ध - सुरक्षित है कि, ‘ उन्नति ' शब्द सर्वात्मना ' अवनति ' सापेक्ष ही है, जिस के आधार पर दशाचक्रानुगत - उत्थान, और पतन परिवर्तित होते रहते हैं । दिग्देशकालातीत - अखण्ड - श्रद्वय - श्रात्मा के ज्ञानात्मक प्रतिष्ठाघरातल ' विज्ञान ' पर है, प्रतिष्ठित श्रमृतात्मप्रतिष्ठा- दिग्देश-कालात्मक — पाञ्चभौतिक - विश्व से अनुप्राणित भौतिक विज्ञान ही वास्तविक माना गया है । एवं स्वयं नुत्रन्धेन - शाश्वत प्रमाणित होता हुआ वह विज्ञान सच्चिदानन्दत्रह्म से समतुलित का ' नित्यं - विज्ञानं-उपनिषच्छास्त्र ने- ' सत्यं ज्ञानं - अनन्तं - ब्रह्म ' से अनुप्राणित इत्थंभूत विश्वविज्ञान के दिग्देश-आनन्दं - ब्रह्म ' इत्यादिरूप से यशोगान किया है । स्पष्ट है कि, प्रतीच्य- भूतविज्ञान का अनुगामी प्रकृति प्रमाणित होरहा कालानुबन्धी तत्त्वों से अनुप्राणित रहता हुआ प्रत्यक्षदृष्ट्या जहाँ उपादेय कोटि वही प्रतीच्य भूतविज्ञान है, वहाँ दिग्देशकालातीत ज्ञानघन श्रात्मब्रह्म की प्रतिष्ठा से वञ्चित रहता हुआ प्रमाणित होरहा क्षणिक विज्ञान की कोटि में आता हुआ परिणामतः क्षणभावापन्न मृत्युपथ का ही सन्देशवाहक जगत् का वह ' उन्नति-है, एवं दिग्देशकालनिबन्धन- इसी प्रतीच्य भूतविज्ञान की भित्ति पर प्रतिष्ठित पश्चिमी जिस इस शब्द के निर्वचनात्मक अर्थ के गर्भ में ही तत्सापेक्ष - भावनिबन्धना वाद ' प्रक्रान्त हुआ है, पदों शब्दों से ही ' उन्नति ' का ' अवनति ' पुष्पित पल्लवित होती रहती है । ' उत् ' और ' नति ' दो विभिन्न ( उत् - ऊर्ध्व - गत्त्वा- नतिः-शब्द स्वरूप - निर्माण हुआ है, जिसका स्पष्टतम अक्षरार्थ है- ' ऊपर चढ़ कर पतन ऋषिदृष्टि से मान्य पतनम् ) ' चढ़ कर गिरना ' ही ' उन्नति ' शब्द का तत्त्वार्थ है, एवं ऐसी ' उन्नति ' कदापि नहीं है । तो क्या वेदद्रष्टा श्राप्तमहर्षि उन्नति के शत्रु हैं? । वर्त्तमानयुग का ऐसा सा ही प्रवाद कर्णाकर्णि— परम्परया श्रुतोपश्रुत है कि, “ भारतीय वेदादि शास्त्र तो भारतीय मानव की उन्नति में नैष्ठिक सदा - दृष्टिकोण से रोड़े ही है, अटकाते आरहे हैं ” । वस्तुस्थिति यथार्थ में ऐसे ही है, और यही भारतीय शास्त्र का वह -नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा - चक्रनेमिक्रमेण १०
पृष्ठ 14
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उपनिषद्भूमिका १ खण्ड जिसने केवल - दिग्देशकालानुबन्धिनी - प्रवाहपथानुगमिनी - तात्कालिकी - कण्डूपशमनकर्त्री - उपयोगितावादा-भिनिविष्टा तथोक्त - निर्वचन- गर्भिता - ' उन्नति ' का सदैव विरोध ही किया है, एवं ग्राकल्पान्त इत्थंभूता उदर्के - सर्वनाशकारिणी उन्नति का विरोध ही करता रहेगा । एवं इसी दृष्टिबिन्दु के माध्यम से पूर्वदिगनुबन्धी भारत पश्चिमदिगनुबन्धी दिग्देशकालव्यामोहन को सदैव उपेक्षणीय ही मानता आरहा है, एवं श्रात्मप्रतिष्ठा-शून्या केवल भूतैषणासमर्द्धिका - पतनपरिणाममूला ऐसी उन्नति को तो यावच्चन्द्रदिवाकरौ उपक्षणीया ही मानता रहेगा । ऊर्ध्वगमन का कदापि ऋषि विरोध नहीं कर रहे । विरोध उन का केवल पतनांश से है । ऋषि की नैष्ठिकी श्रास्था के अनुसार ऊर्ध्वगमन वैसा होना चाहिए, जिस के अनुगमन के अनन्तर पुनः कदापि किसी भी अवस्था में पतन की आशङ्का ही न रहे । जिस ऊर्ध्वपथ को लक्ष्य बना लिया जाय, वह उत्तरोत्तर ऊर्ध्वोर्ध्व - भावपरम्परा का ही अनुगामी प्रमाणित होता रहे । पतनाशङ्का से श्रसंस्पृष्ट इत्थंभूत ऊर्ध्वगमन को ही ऋषिभाषा में ' अभ्युदय ' कहा गया है, जिस का अक्षरार्थ है- ' अभि- सम्मुख - उत्-ऊपर - य - यन - गमन ' । अर्थात् सामने की ओर ऊर्ध्वभावानुगत - गमन ही ' अभ्युदय ' शब्द का अर्थ-समन्वय है, जिस का " गीताभूमिका - कर्म्मयोगपरीक्षा " नामक खण्ड में विस्तार से समन्वय - विश्लेषण हुआ है । श्रभ्युदयरूप उत्थानात्मक कर्म का तथाभूत अतिशय कैसे मान लिया गया?, प्रश्न का समाधान है - ' निश्रेयस् ' शब्द, जिस का दिग्देशकालातीत - श्रात्मब्रह्म से प्रमुख सम्बन्ध माना गया है । जो कर्म्म निःश्र यस् को आधार बनाए रहता है, वही ' अभ्युदयजनक ' कर्म्म माना गया है । यदि श्रात्मप्रतिष्ठारूप निःश्रेयस् के आधार को शास्त्रीय कर्म्म भी छोड़ बैठते हैं, तो वैसे शास्त्रीय - कर्म्म भी पतनाशङ्का से असंपृष्ट ' अभ्युदय ' के स्थान में केवल ' उन्नति ' के ही साधक बने रहे जाते हैं । निःश्रेयसानुगत ( ज्ञानानुगत - श्रात्मानुगत ) -कर्म्म ( विज्ञानानुगत- विश्वानुगत - भौतिक - यज्ञादिकम्म ) जहाँ प्रभ्युदय के साधक बनते हुए ' अबन्धनकर्म्म ' मान लिए गए हैं, वहाँ वे ही यज्ञकर्म्म निःश्रेयसाधार से वञ्चित होते हुए, अतएव क्षणिक - विज्ञानकोटि में ते हुए अपनी विशिष्टा अभ्युदयवृत्ति से वञ्चित रहते हुए अवरकोटिमात्र: ( क्षरत्मिका - भूतकोटिमात्र ) में हीं परिणत होजाते हैं, और इन का फल भी शेष रह जाता - ' उन्नतिमात्र ' । अर्थात् ऊपर चढ़ कर ' पुन: गिर पड़ना ',, जैसा कि - ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके वसन्ति ' से प्रतिध्वनित है । निष्कर्ष निवेदन का एतावन्मात्र ही है कि, वे सभी दिग्देशकालानुबन्धी- उपयोगितावाद मान्य हैं भारतीयशास्त्र को भी, यदि उनकी श्राधारभूमि दिग्देशकालातीत - श्रात्मन्ब्रह्म है, तो । एवं दिग्देशकालातीत * - यज्ञार्थात् - कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म्मबन्धनः । तदर्थं कर्म्म कौन्तेय! मुक्तसङ्गः समाचर । - गीतायाम् शा - प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा श्रष्टादशोत्तमवरं येषु कर्म 1 एतच्छे यो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥ ११ - मुण्डकोपनिषदि १२ । ७ ।
पृष्ठ 15
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किमपि प्रास्ताविकम् श्रात्मब्रह्मरूप शाश्वतधर्म्ममूर्ति प्रतिष्ठाभाव से निरपेक्ष यच्चयावत् दिग्देशकालानुबन्धी- व्यामोहन स्वप्न में भी मान्य नहीं हैं, फिर भले ही उनकी तात्कालिकी उपयोगिता का कितना हीं तुमुल घन्टाघोष क्यों न प्रक्रान्त रक्खा | जाय । उदर्कतः जिनका ' अभ्युदय ' से सम्बन्ध होगा, वे ही कर्मकलाप मान्य होंगे भारतीय आर्ष - प्रज्ञा के लिए । एवं ठीक इसके विपरीत आत्मप्रतिष्ठा के आधार से वञ्चित वे सभी कर्मकलाप सवथैव उपेक्षणीय ही मान लिए जायँगे, माने जाते रहे हैं, फिर भले ही उन तात्कालिक कर्मकलापों के तात्कालिक - फल लोक-दृष्ट्या कितने ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हों । परिणामतः नितान्त - पतनलक्षणा तथाकथिता ' उन्नति ' की अपेक्षा तो यदृच्छात्मिका हीनदशा ही कहीं श्र ेयःपन्था मान लिया गया है भारतीय श्रार्षजगत् में । जिस ' उन्नति ' से निःश्रेयसानुगत- अभ्युदय का सर्वात्मना अवरोध होजाय, वह ' उन्नति ' तो दूरतः ही प्रणम्या ही मानी जायगी, फिर भले ही ' दिग्देशकालानुबन्धिनी - एतादृशी - उन्नति ' के बिना हमें दिग्देशकालानुबन्धिनी उन सभी प्रकार की भूत - भौतिकी - सुख - सुविधाओं से वञ्चित होजाना पड़े, किंवा दिग्देशकालव्यालग्रस्त महानुभावों के द्वारा बलपूर्वक वञ्चित कर दिया जाय, जिन भौतिकी - सुख - सुविधाओं के बिना मानव का मनःशरीरानुबन्धी भौतिक - जीवन सर्वथैव दुःखार्णव में निगग्न होजाता है । क्योंकि, निःश्रेयस् - पथानुगत-अभ्युदयपथ में ही अपनी अनन्या बुद्धियोगनिष्ठा सुरक्षित रखने वाला श्रार्ष मानव यह जानता है कि, श्रात्मप्रतिष्ठाधार से वञ्चिता दिग्देशकालानुबन्धिनी लोकसमृद्धि उस शाश्वतत्ररूप सत्यधर्म से सर्वथैव संस्पृष्टा है, जिसका तात्कालिक परिणाम भले ही सुग्वाभासात्मक हो, किन्तु जिसका अन्तिम परिणाम मूलनाशा-त्मक सर्वनाश के अतिरिक्त और कुछ भी तो नहीं है । भगवान् मनु ने धर्मनिरपेक्षा, अतएव अधर्मभाव-सम, प्लुता एतादृशी उन्नति के सुपरिणामों? का ही काकूभाषा में दिग्दर्शन कराते हुए कहा है कि--अधर्मेणैधते तावत्, ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नाञ्जयति, समूलस्तु विनश्यति ॥ -मनुः ४।१७४ । राजर्षि की सूक्ति का अक्षरार्थ यही है कि, शाश्वतधर्ममूर्ति श्रात्मब्रह्म की प्रतिष्ठा से वञ्चित केवल दिग्देशकालानुबन्धी - तात्कालिक - स्वार्थसंसाधक - लौकिक उन्नतिप्रवत्तक सभी कर्म ' धर्म ' की भावना से समन्वित होते हुए धर्म्मनिरपेक्ष ही बने रहते हैं । ऐसे धर्मनिरपेक्ष, अतएव अधर्म्मभावनाक्रान्त - लोका-नुबन्धी कम्मों से निश्चयेन आरम्भ में तो तत्कर्मानुगामी मानव ' लोकसमृद्धि ' का ही भोक्ता प्रमाणित होता रहता है । अर्थात् अधर्म से समन्वित - भूतभौतिक कर्म्म तत्काल ही भूतसमृद्धि के समुत्तेजक बन जाया करते हैं तमोगुण की स्वैराचारिता से । आगे चलकर इस प्राप्ता समृद्धि ( भौतिक सम्पत्ति ) के बल पर तदर्ज क मानव विविध प्रकार के उत्सवायोजनादि में संलग्न होजाता है — ' ततो भद्राणि पश्यति ' । इसी सम्पत्ति के बल पर ( इसके वितरण के माध्यम से स्वपक्ष को बलवान् बनाता हुआ संघटन के द्वारा ) वह अपने प्रतिद्वन्द्वी - वर्ग पर विजय प्राप्त करने में भी समर्थ होजाता है- ' ततः सपत्नाञ्जयति ' । और इसप्रकार देखने - सुनने - कहने- कहलवाने के लिए धर्मनिरपेक्षा -- अधर्म्मभावनाक्रान्ता -- केवल दिग्देशकालानुबन्धिनी तात्कालिकी उपयोगिताओं के व्यामोहन में आसक्त - व्यासक्त मानव का मनःशरीरानुबन्धी लौकिक जीवन सभी दृष्टियों से सुखी - समृद्धिवत् प्रतीत होने लगता है । किन्तु परिणामतः इस प्रतीति का निकर्ष है -' समूलस्तु विनश्यति ' । अर्थात् ऐसे व्यक्ति का मूलतः सर्वनाश ही सुनिश्चित है । १२
पृष्ठ 16
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उपनिषद्भूमिका १ खण्ड दिग्देशकालव्यानुग्ध - लोकोन्नतिसमर्थक - लोकचतुर आज का मानव राजर्षि की - ' समूलस्तु विन-यति ' इस सूक्ति पर तार्किक दृष्टि से भ्रूविक्षेप करता हुआ इसे मन्दहास - पूर्वक उपेक्षणीय मान सकता है, मान ही रहा है । क्योंकि वह प्रत्यक्ष में यह जान रहा है कि, ' मूलनाश ' तो क्या, ऐसे लोकचतुर मानव तो अनुदिन लोकसमृद्धि का अनुगमन ही करते देखे गए हैं । अतरव तथाविधा धर्मसूक्तियों का उन्नति--पथानुवर्मा एक कर्म्मवीर? की दृष्टि में यत् किञ्चित् भी तो महत्त्व नहीं है । प्रत्यक्ष प्रभावमूला तथाविधा लोकदृष्टि का ही यह दुष्परिणाम है कि, अदृष्टभावानुबन्धी - अदृष्ट-परिणामों से अनुप्राणिता अदृष्टा स्थिति पर आज के लोकमानव की यत् किञ्चित भी तो आस्था नहीं रही है । श्रपितु श्राज तो वह - ' यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ' मन्त्र का ही अनुवर्त्मा बनता चला जारहा है । एवं धर्मपथानुगता नैतिकता का उसकी दृष्टि में यत्किञ्चित् भी महत्त्व शेष नहीं रह गया है । ' समूलविनाश ' का तात्पर्य्यं अत्यन्त ही रहस्यपूर्ण है, जिसका अत्र स्पष्टीकरण सम्भव नहीं है । राजर्षि की इसी सूक्ति से मिलती जुलती गीतासूक्ति का उपसंहार भी - ' बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ' * रूप ' सर्वनाश ' पर ही हुआ है । गीताविज्ञानभाष्य में - तच्छलोकसमन्वय - प्रसङ्ग से ही ' समूलस्तु विनश्यति ' के रहस्यार्थ का भी स्पष्टीकरण कर दिया गया है । प्रकृत में तथ्य - सङ्गति के लिए दो शब्दों में तत्पष्टीकरण का स्मरणमात्र ही कर लिया जाता है । सर्वश्री कुल्लूकभट्ट ( मनुस्मृति के सुप्रसिद्ध टीकाकार ) ने ' समूलस्तु ' - विनश्यति ' का यह अर्थ किया है कि – “ पश्चात् कियता कालेन - अधर्म्मपरिपाकवशात् - देह - धन - तनयादि सहितो विन-श्यति ” । अर्थात् जब श्रधर्म्म परिपाक की चरमसीमा पर पहुँच जाता है, किंवा लोक किंवदन्ती के अनुसार— ‘ जब पाप का घड़ा भर जाता है, ' तो उस समय इस अधर्म्माभिनिविष्ट के शरीर - धन- पुत्र आदि सभी लोकवैभव स्मृतिगर्भ में विलीन होजाते हैं, जिस विलयन का भारतराष्ट्र की धार्मिक प्रजा - ' इकलख पुत्र-सवालख नाती, रावण के घर दिया न बाती ' इस लोकसूक्ति के द्वारा बखान करती रही है । टीकाकार के इस अर्थसमन्वय का समादर करते हुए ही हमें एक उस तथ्य की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना हैं, जिसका स्वयं श्रु तिने अपने शब्दों में निम्नलिखित रूपेण दिग्दर्शन कराया है । ' सत्य ' और ' अनृत ' नामक सुप्रसिद्ध दोनों वाङमय - विवर्त्तो से अनुप्राणित विरुद्धधर्म्मा क्रमशः मानव की आत्मसमृद्धि के, एवं आत्मनाश के कारण बतलाती हुई श्रुति कहती है कि, वाक् का जो ' सत्य ’ भाग है, वह ‘ वाक् ’ के पुष्प फल माने गए हैं । अतएव जो व्यक्ति वाङमय - सत्य का अनुगामी बना रहता है, वह सर्वात्मना श्रभ्युदय - कीर्त्ति आदि का फलभोक्ता बनता रहता हैं X ।
* ध्यायतो विपयान् पुंसः - सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात् सञ्जायते कामः, कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥
क्रोधाद्भवति संमोहः, सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ॥
-गीतायाम् X - ततदेत् - पुष्पं फलं वाचः यत्सत्यम् । स - ह - ईश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्त्तिर्भवितोः पुष्पं हि फलं वाचः सत्यं वदति । — ऐतेरय आरण्यक २ | ३ | ६ | १३
पृष्ठ 17
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किमपि प्रास्ताविकम् ठीक इसके विपरीत ' अमृत भाव वाक् का मूलस्थानीय माना गया है + । श्रतएव जो व्यक्ति अपने वाङमय व्यवहार में ( शब्दोंच्चारण ) में अनृतभाषण ( मिथ्याभाषण ) करता है, उस व्यक्ति का वाङमय भूतात्मा उसीप्रकार सूख जाता है, सूख कर विनष्ट होजाता है, जैसे कि मूल के व्यक्त होजाने पर, उखड़ जाने पर पहिले तो वृक्ष सूख जाता है, और कालान्तर में विनष्ट होजाता है । अतएव प्रज्ञाशील का कर्त्तव्य हैं कि, वह श्रनृतभाषण से श्रात्मपरित्राण ही करता रहे ÷ । ऐतरेयश्रुति ने आत्मा के ' शुष्यति ', और ' उद्वर्त्तते ' ये दो परिणाम बतलाए है । सर्वनाश ही उद्वर्त्तते है और सर्वनाश का शिलान्यास ही आत्मा की शुष्कावस्था है । तात्पर्य इस परिणामद्वयी का स्पष्टतम है । असत्यभाषण करने वाला व्यक्ति सम्भव है अपने वाक्छल से तात्कालिक - स्वार्थ - साधन में समर्थ होजा । और तन्माध्यम से वह लोकसुखाभास का भोक्ता भी बन जाय । किन्तु इस लोकसुखभोग का क्षेत्र केवल मनोऽनुगत भौतिक- शारीर ही बना करता है, जिसे तत्त्वदृष्ट्या कदापि तबतक वास्तविक सुख नहीं माना जासकता, जबतक कि, मनः शरीरनिबन्धन लोकसुख की आधारभूमि आत्मबुद्धि - सहकृता-शान्ति नहीं बन जाया करती । शान्ति ही सुख की आधारभूमि है । बिना शान्ति के सुख का उपभोग वैसा ही सुखोपभोग है, जैसा कि - आत्मबुद्धिप्रतिष्ठा से वञ्चित पशु - पक्षी - श्रादि प्राकृत - जीव अपने मनः-शरीरानुबन्धी लोकभोग - सुखों का अनुगमन करते हुए भी प्रतिक्षण ही अन्याक्रमण भय से विकम्पित होते रहते हैं । अर्थात् जैसे प्राकृतसर्ग के मनःशरीरोपजीवी पश्वादि प्राणियों का ' सुख ' शान्ति से सर्वथैव वञ्चित रहता है, जैसे इनका प्रत्येक भोगात्मक - सुख शङ्कातङ्कित ही बना रहता है, ठीक वही स्थिति उन लौकिक-प्राकृतिक मानवों के लोकसुखोपभोगों के सम्बन्ध में घटित विघटित होती रहती है, जो आत्मबुद्धिमूला-प्रतिष्ठात्मिका शान्ति से वञ्चित रहते हुए केवल - मनः शरीरोपथिक - दिग्देशकालानुबन्धी- तात्कालिक प्राकृतिक - अथैतन्मूलं वाचः - यदनृतम् । तद्यथा वृक्ष आविम्मूलः - शुष्यति, स उद्वर्त्तते ( कालान्तरे विनश्यति ), एवमेवानृतं वदन् श्रवमूलमात्मानं करोति स शुष्यति, स उद्धर्चते । दस्मादनृतं न वदेत् । दयेत त्वेनेन । - ऐतरेय आरण्यक २ | ३ | ६ | + - ‘ अनृत ' का लोकानुबन्धी अर्थ है ' मिथ्याभाषण ' । श्रुति इसे वाक् का मूल क्यों: मान ' नामक रही है १, प्रश्न का रहस्यात्मक उत्तर सुप्रसिद्धा ' अम्भोविद्या ' से ही अनुप्राणित है । पारमेष्ठ्य ' श्रम्भ ऋततत्त्व ही श्रम्भृणी नाम की अर्थवाक् का, एवं सरस्वती नाम की शब्दवाक् का मूलप्रभव बनता है । ' सामान्ये सामान्याभाव: ' न्यायानुसार ऋत में क्योंकि ऋत नहीं रहता । श्रतएव सद्रूप प्राण जैसे- ' असत् ' कहलाया है, प्राणप्रधान - मनोधन अव्यय जैसे- ' प्राणो ह्यमनाः शुभ्रः ' कहलाया है, एवमेव ऋत ' अनृत ’ नाम से व्यवहृत हुआ है । प्रतिष्ठ ' शून्यभाव ही ऋत है, जिसका वैज्ञानिक -- लक्षण हुआ है- ' अहृदयं-शरीरं ऋतम् ' । मिथ्याभाषण भी क्योंकि प्रतिष्ठाचल से वञ्चित है । इस सादृश्य से ही ' अमृत ' शब्द मिथ्याभाषण का भी संग्राहक बन गया है । इस दृष्टि से भी ' अनृत ' को वाक् का मूल मान लिया गया है । से इस तथ्य का विस्तार से स्पष्टीकरण हुआ है 1 अन्य निबन्धों में सत्यानृतस्वरूप के समन्वय प्रसङ्ग १४
पृष्ठ 18
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उपनिषद्भूमिका १ खण्ड सुखों के प्रति ही श्रासक्त - व्यासक्त बने रहते हैं । अतएव स्पष्ट है कि ऐसे प्राकृत - मानव से अनुप्राणित रहते हुए श्रात्ममूला शान्ति से तो सर्वथैव वञ्चित बने रहते हैं । और यह सुखाभासात्मक वञ्चना ही इनके सुख सर्वनाश की स्वरूप - परिभाषा है । वस्तुस्थिति के समन्वय के लिए मिथ्याभाषण- चोरी- परहनन - आदि उदाहरण ही पर्य्याप्त इन तीनों हीं कुकम्मों से कुकर्म्मकर्त्ता मानव का बुद्धयनुगत आत्मा सर्वथैव विकम्पित होता रहता होंगे है ॥ आरम्भावस्थाओं में । आरम्भदशा में इन असत् कम्मों का अनुगामी प्राकृत मानव अपने आपको सदैव सशङ्कित-भयत्रस्त - खिन्न - श्रात्त - सा ही अनुभूत करता रहता है, एवं यही इसका ' श्रात्मस्वरूपशोषणकाल ' है । यदि इसका इत्थंभूत अभ्यास उत्तरोत्तर प्रक्रान्त ही होता रहता है, तो वह आरम्भ की विकम्पनावस्था कालान्तर उस जड़ता में ही परिणत होजाती है, जिस ' जड़ता ' की अभिव्यक्ति के अनन्तर उसी प्रकार इस में भी अपने प्राकृत - कम्मों के प्रति कोई घृणा नहीं रह जाती, जैसाकि श्रात्मस्वरूप - विस्मृत - लोकमानव को जीव सहजरूपेणैव मनःशरीरानुगत भोगों के प्रति अन्धन्यायेनैव अनुधावन करते रहते पशु - पक्षी - आदि के सहज अभिव्यक्तित्त्व से प्रकृत्यैव वञ्चित मानवेतर पश्वादिसर्ग जैसे श्रात्मबुद्धया सहजरूपेणैव हैं । श्रात्मबुद्धिस्वरूप रहता है, इस उन्मुग्धता के कारण ही जैसे इस पशु - पक्षि जगत् को कामोपभोगशमन के लिए उन्मुग्ध नृशंसतम बना कर्म्मप्रवृत्ति में भी लज्जा - क्षोभ की अनुभूति नहीं होती, ठीक वैसी ही स्थिति उस लोकचतुर होजाती है, जो आत्मबुद्धि सम्मत सहज मानवधर्म्म को जलाञ्जलि समर्पित कर पशु - पक्ष्यादिवत् विजड़ितावस्था मानव की किंवा श्रात्माभिव्यक्तित्त्वशून्या प्राकृतावस्था में हीं परिणत होजाता है, जिस श्रात्मविकासशून्या विजड़ितावस्था, काही पारिभाषिक नाम है मानव के मूलभूत आत्मस्वरूप की वह मृत्यु, जिसे ' जीवितमृत्यु ' भी सकता है । आत्मबुद्धि - स्वरूपाभिव्यक्तित्त्वशूना इत्थंभूता विजड़ितावस्था का नाम ही है- ' समूलम्तु विनश्यति कहा जा-जिसका आगमन होता है बुद्धि से अनुप्राणित सत् - श्रसत् - विवेक के अभिभूत होजाने पर । श्रतएव जो ', ' बुद्धिनाशात् -- प्रणश्यति ' का है, वही अर्थ ' समूलस्तु विनश्यति ' का प्रमाणित होजाता है । अर्थ निःसन्देह - उन्नतिपथानुवर्त्मा - प्राकृत - मानव मनःशरीरानुबन्धी- उन सभी लोकसुख - परम्पराओं भोग करते रहते हैं, पश्वादि - प्राणिवर्गवत् स्वच्छन्दरूपेण - बिना किसी मर्यादा सूत्रानुबन्ध के उन्मुक्त का रहते हैं । किन्तु श्रात्ममूला शान्ति का इस विजड़ितावस्था में यत् किञ्चित् संस्पर्श भी शेष ही बने आत्मस्वरूपाभिव्यक्तित्त्व का ही नाम है - मानवता, मानवधर्म्म । इसे जड़ावस्था नहीं में परिणत रह जाता । देने का अर्थ है- ' मानव ' स्वरूप को जलाञ्जलित समर्पित कर केवल मनः शरीरानुबन्धी- ' प्राकृत पशुजीवन कर ही अपना परमपुरुषार्थ मान बैठना । और यों निःसन्देह निश्रेयस् -मूलक - श्रभ्युदय से अनुप्राणित श्रात्मधर्म ' को से वञ्चिता लोकोन्नति, एवं तत्साधक लोककर्म्म मानव की मानवता के अन्यतम विघातक ही वन जाया हैं । इसी वस्तुतथ्य के आधार पर हमने श्रात्मप्रतिष्ठाशून्य ' उन्नति ' के प्रसङ्ग से यह स्पष्टीकरण उपनिषत्- करते प्रेमियों के सम्मुख रखने की महती धृष्टता करली है । प्रतीच्यजगत् की सामयिकी - ' उन्नति ' से अनुप्राणिता चर्चा के कारण ' उन्नति ' के प्रतिद्वन्द्वी के स्वरूप - समन्वय की दृष्टि से ही राजर्षि के वचन का समन्वय - प्रसङ्ग प्रक्रान्त होपड़ा था ' अभ्युदय ' भारतवर्ष अपने लोकजीवनीय - प्रत्येक क्षेत्र में अनुकरणाकर्षणधिया जिस प्रगति के साथ ' प्रतीच्योन्नतिपथ । आज हमारा का अन्धानुकरण करता जारहा है, तद्द ुष्परिणाम - स्वरूप ही श्रात्ममूला - धर्म्मसम्मता - नैतिकता उसी वेग ' १५
पृष्ठ 19
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किमपि प्रास्ताविक्रम् श्रमरूप'- ' कामकरो ' * से उत्तरोत्तर श्रभिभूत ही होती चली जारही है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण है आज का शुष्कवृक्षवत् ' नीरस आज का उद्घोष । श्रद्धा - वात्सल्य- स्नेह - शून्य, श्रतएव सर्वथैव जड़भावापन्न, अतएव च ही आकर्षित करता जारहा है, ' श्रमप्रधान यह कामोद्घोष ' भारतीय मानव को उत्तरोत्तर जड़ता की ओर भुक्त - प्रक्रान्त - कटु - अनुभवों जिस भूतोन्नतिमूला जड़ता से तदाविष्कारक स्वयं पश्चिमीजगत् अपने विगत विद्वानोंने - मुक्तकण्ठ से भारतीय-से संत्रस्त होता रहा है । तत्परिणामस्वरूप ही वहाँ के श्रमुक मनीषी श्रद्धाञ्जलियाँ अर्पित कीं हैं । प्रक्रान्त श्रात्मनिष्ठा के पावन सन्देश के प्रति अत्यन्त प्रणतभाव से अपनी के लिए ही कतिपय प्रतीच्य-प्रथम स्तम्भ में प्रतीच्य - पथानुवर्त्मा उन्नतिवादी भारतीय मानव के उद्बोधन प्रतीच्य विद्वानोंने मुक्तकण्ठ से विद्वानों की उस धारणा का दिग्दर्शन- प्रयास हुआ है, जिसके द्वारा है । उन भारतीय संस्कृति की महती उपयोगिता का सर्वात्मना समर्थन किया संस्कृति के प्रति ( ग ) - गच्छतः स्खलनरूपेण, किंवा गतानुगतिकन्यायेन अवरुद्धकण्ठ से भारतीय भारतीय - बन्धु-यदा कदा अनुरागात्मक - उदारभाव व्यक्त करते हुए भी वे उदारवादी प्रतीच्यशिक्षापारङ्गत कि, ' आत्मविद्या ' की दृष्टि से, अन्त में इस तथ्य पर अपनी इस उदारता का पटाक्षेप करते सुने गए बढ़े हैं चढ़े हों । किन्तु लोकानुबन्धी-किंवा आत्मज्ञान के क्षेत्र में हम किसी अतीत युग में भले ही * लोकातीत, विश्वातीत परात्पररूप - अद्वयब्रह्म, एवं लोकात्मक - विश्वेश्वर- सगुणब्रह्म पुरुषरूप विवर्त्त सगुणब्रह्म- के ही भेदेन प्रजापति के दो प्रमुख विवर्त्त होजाते हैं, जिनमें विश्वेश्वर - नामक द्वितीय अवान्तर - महिमा - विवर्त्ता ' अव्यय - अक्षर - क्षर - निबन्धनेन क्रमश: सर्वज्ञ - हिरण्यगर्भ - विराट् ये, लोकानुगत तीन - लोकसाक्षी - त्रिविध-होजाते हैं । तदित्थं अधिदैवतसंस्था में लोकातीत एकविध अद्वयात्मा हैं, जिन इन चारों अधिदैवत— सर्वज्ञ - हिरण्यगर्भ - विराडात्मा, भेदेन दो के चार श्रात्मविवर्त्त होजाते पर्व क्रमशः अनुप्राणित भावों से मानव के आत्मा - बुद्धि - मनः - शरीर नामक सुप्रसिद्ध चारों आध्यात्मिक विराड्भावापन्न शरीर हैं । विराट के प्रतिनिधि, किंवा प्रतीकरूप, दशकलअग्नि की चिति -- संचिति से कृतरूप ' श्रम ' का अनुगमन ही अपने दशाङ्गलित - विराडभावापन्न - पाणिद्वय से शरीर निबन्धन जिस अध्यवसायात्मक समर्थन किया है, एवं श्रत्यर्थ के करता है, उसका यद्यपि ' सोऽश्राम्यत ' इत्यादिरूपेण स्वयं श्रुति ने भी - श्रमात्मिका इस विराडू ---उपबृ हक पुराणपुरुष भगवान् बादरायण ने भी दशाङ्ग ुलिसम्मता शरीरनिबन्धना कदापि शरीरानुगत- ' श्रम ' को भारतीय-विभूति का उन्मुक्तहृदय से यशोगान किया है ( महाभारते ), श्रतएव के ऊर्ध्वभाग में स्थित मनोबुद्धिरूप--प्राच्य -- दृष्टि से भी कम महत्त्व प्राप्त नहीं है । तथापि विराट - शरीर का अवलम्ब लिए बिना हिरण्यगर्भ -- सर्वज्ञानुगत -- परिश्रमरूप तपोभाव का, एवं श्रात्मसंविद्रूप आश्रमभाव बना देता है, जिसका जड़ - भौतिक-केवल श्रम तो अन्ततोगत्वा मानव को कालान्तर में वैसा श्रमजीवीमात्र ही, पदार्थों से अधिक कुछ भी तो महत्त्व शेष नहीं रह जाता । श्रात्मानुगत संविद्भाव शारीरिक से अनुप्राणित श्रम ही आश्रम भारतीय तदनुगत मनोबुद्धिनिबन्धन परिश्रम, और ऐसे आश्रम - गर्भित परिश्रम से समन्वित- श्रमात्मक ' श्रम ' शब्द की रहस्य - पूर्णा वह पारिभाषिकी तत्त्वमीमांसा है, जिस की उपेक्षा करने वाला केवल दृष्टि से हमने आज का ' शुष्क - श्रम ' कदापि मानत्र के सर्वाङ्गीण अभ्युदय का कारण नहीं बन सकता । इसी अत्र श्रम को आलोच्यकोटि में समाविष्ट माना है । १६
पृष्ठ 20
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उपनिषद्भूमिका १ खण्ड भूतभौतिक विज्ञान के क्षेत्र में तो हमारा अध्यात्मवादी आपको निरक्षर - मूर्द्धा ही प्रमाणित करता आ रहा, केवल ज्ञानवादी भारत सदा से ही अपने प्रज्ञाक्षेत्र में कदापि स्थान नहीं पासकी " इत्यादि इत्यादि है..... । निष्कर्षतः वैज्ञानिकी दृष्टि भारतीय इष्टापत्ति है हमें अपने हीं आत्मबन्धुओं के तथाविध अभियोग ऋषिप्रज्ञा के द्वारा स्वप्न में भी ज्ञानमय श्रात्मब्रह्म के के सम्बन्ध में इसलिए कि, सचमुच अनुबन्धों की स्वाप्निकी कल्पना भी नहीं हुई, जिस ज्ञानप्रतिष्ठा नियन्त्रण से पराङमुत्र स्वच्छन्द वैसे वैज्ञानिक णाएँ उत्तरोत्तर प्रबद्ध होतीं हुई अन्ततो गत्त्वा मानव के सर्वनाश - वञ्चित भौतिक विज्ञान से मानव की एष-हैं —– तथाकथित -‘समूलस्तु विनश्यति ' सिद्धान्तानुसार । यदा का ही कारण प्रमाणित होजाया करत कर्णाकर्णि परम्परया ऐसा कुछ प्रयास सुना गया है कि, कदा वेदभक्त कतिपय बन्धुओं का की कल्पना के माध्यम से यह प्रमाणित कर देने के लिए वे वेदशास्त्र के अमुक शब्दों के अमुक अर्थों भौतिक - त्रिविध - आविष्कार देखे - सुने जाते हैं, उन का मूल व्यग्र बने रहते हैं कि, " वत ' मानयुग में जो कहना न होगा कि, वर्त्तमानंभूत विज्ञानानुगता तथाविधा धारणा से हमारे वेदशास्त्र में भी है " इत्यादि । का महत्त्व घटता ही है, बढ़ता नहीं । वैदिक - विज्ञान की कुछ वेदशास्त्र अपनी के ज्ञान - समन्वित - नित्यविज्ञान लक्ष्य है, जिस की वर्त्तमान भूतविज्ञान के साथ कदापि परिभाषा है, अपना स्वतन्त्र ही हमारे वैदिक - बिज्ञान की घोषणा है, जिस के आधार तुलता सम्भव नही हैं । ' न त्त्वहं तेषु, ते मयि ' पर इस व्यापक- वैदिक विज्ञान व्याप्य - पश्चिमी - बिज्ञान के साथ, कदापि समतुलित नहीं किया जासकता को आज के । इस के साथ ही प्रतीच्य - शिक्षा - पारङ्गत उन भारतीय सम्भव नहीं है, जिस के द्वारा वेदशास्त्र पर पूर्वकथनानुसार विज्ञानीय विज्ञानशून्यत्त्व बन्धुओं का आरोप की उस लगाते कल्पना का भी समर्थन भी तो लज्जा से अवनतशिरस्क नहीं बन जाते । ऐसे श्रात्मबन्धुत्रों हुए वे यत् किञ्चित् स्तम्भ में हमने - ' वैदिक - साहित्य, और वैज्ञानिक - निदर्शन ' रूपेण की तुष्टिमात्रा के लिए ही प्रस्तुत - प्रथम उदाहरणों का संस्मरण किया है । यों तीन अवान्तर स्तम्भों से समन्वित वेदशास्त्रानुगत कतिपय वैज्ञानिक स्तम्भ - ' भूमिका ' रूपेणैव उपनिषत् - प्रेमियों के सम्मुख उपस्थित हुआ है ' प्रारम्भिक । निवेदन ' नामक प्रथम 9 * ( २ ) - उपनिषदों के आद्यन्त में मङ्गलपाठ क्यों किया जाता नामक द्वितीय - स्तम्भ के संस्मरणोय - प्रमुख - विषयों है का?, स्वरूप - दिग्दर्शन-क - कर्मभेदमूलक अधिकारी का विभेद ख- देवी- श्रासुरी - सम्पत्ति, और मङ्गलरहस्य ग- आत्मविद्या, और उपनिषच्छास्त्र घ- मङ्गलभेद - मीमांसा -क } १७