उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री
Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I · 562 पृष्ठ · 57 खण्ड
विषय सूची
- i a Pit fe at Db Juay a) qe i Be ae श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका प्रथमखण्ड १ मोतीलालशम्र्मोपाह्रो मुक्तरक्तशर्मा आङ्गिरसो भारद्वाजः वेदवीथी- पथिकः… 1–10
- किमपि प्रास्ताविकम् निधि का स्वरूपविश्लेषक, छन्दोभ्यस्ता से समलङ्कृत उपनिषत् जैसा विविध विद्याभाण्डारात्मक मौलिक साहित्य अपनी ज्ञानविज्ञानात्मिका मौलिकता… 11–20
- किमपि प्रास्ताविकम् ( क ) -कम्र्ममेदमूलक - अधिकारी - वर्ग का विभेद - नामक प्रथम अवान्तर - विषय में श्र ेय प्रय-श्रेयप्रेय- रूप से तीन प्रकार के अधिकारी… 21–30
- किमपि प्रास्ताविकम् एवं उसी का नाम है - ' तत्त्वात्मक अपौरुषेय समझने मात्र के लिए उस सर्वादिभूत अव्यक्तभावापन्न वेद "… 31–40
- के P A1 BE 1599522 ि 25 श्रीः इति - उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्डस्य " किमपि - प्रास्ताविकम " उपरतम् श्रीः उपनिषद विज्ञान भाष्यभूमिकानुगत -… 41–50
- विषयसूची १७३ - घनाग्नि, और पार्थिवज्योति १७४ - तापलक्षण पार्थिवाग्निज्योति १७५ - विरलाग्नि, और दिव्यज्योति १७६- प्रकाशलक्षण दिव्येन्द्रज्योति १७७ -… 51–60
- विषयसूची १५ - त्रयं ब्रह्म, और त्रयो वेदाः १६ - वेद, और ब्रह्म की अभिन्नता १७ - सूर्य्यात्मक ब्रह्म, और वेदात्मिका रश्मियाँ १८ - उक्थरूप ब्रह्म, और कत्मक… 61–70
- विषयसूची से वेद उत्पन्न वेदों | ( ४ ) - " प्रकृतिसिद्ध कालचक्र - मत ( २ ) - " प्रकृतिसिद्ध भौतिक सूर्य तीनों " नामक चतुर्थ - प्राधानिक हुआ है से अभिन्न है… 71–80
- १२५ - प्रविष्टात्मा, और विश्वात्मविव १२६- प्रविविक्तात्मा, और विश्चविवर्त्त १२७ - विज्ञेय प्रविविक्त ब्रह्म १२.८ - दुर्विज्ञेय - सृष्टब्रह्म १२६-… 81–90
- विषयसूची १८६ ऋक्की ही सामरूपता ५५४ - विदेहमुक्ति का उक्थ- निष्कामभाव ६५५ - श्राध्वर्यवक का उक्थ - अध्वर्यु ५५६ - हौत्रकर्म्म का उक्थ होता ५५७ -… 91–100
- -श्रीः इति - उपनिषदविज्ञान भाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्डस्य प्रधानविषयसूची तथा स्मारकविषयसूची उपरता श्रीः प्रारम्भिक - निवेदन ( प्रथमखण्डानुबन्धी ) (… 101–110
- 031 प्रारम्भिक वक्तव्य । ५ - यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्म्ममयो मृगः । यश्च विमोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम विभ्रति । मनुः २ । १५७१ )… 111–120
- । प्रारम्भिक वक्तव्य । की उपेक्षा कर धर्म-वाले वे दोनों वीर बालक आदि महानात्माओं ने ऐहलौकिक सब सुखों का कौन ऐतिहासिक रक्षा में ही अपने जीवन का उत्सर्ग… 121–130
- - प्रारम्भिक वक्तव्य the feeble promethean speck in the full flood of the heavenly extinguished glory of. " noonday sun - faltering and feeble and ever… 131–140
- प्रारम्भिक वक्तव्य । गम्भीर शान्त एवं बड़े परिश्रमी थे । अच्छे कारीगर थे । वे शायद ही कोई मुकदमा दायर करते थे… 141–150
- प्रारम्भिक वक्तव्य । " ब्रह्म " कहा जाता है, अतएव तत्प्रतिपादिका आत्मविद्या को हम " ब्रह्मविद्या " कह सकते हैं । यौगिकतत्व को " यज्ञ " कहा जाता है… 151–160
- प्रारम्भिक वक्तव्य । २ – “ सोमः पूषा च चेततुर्विश्वासां सुक्षितीनाम् । देवत्रा रथ्योहिता ” ( सामसं ० पू ०२ । ८ । १० )… 161–170
- १० - स्थिरधर्म १- भार २- आयतन ३- स्थानविरोध ४ - विभाज्यता ५- सान्तरत्व - अस्थिरधर्म्म ' ८-१- शैत्य २- प्राकुञ्चन ३- कठिनत्व ४- वर्णरूपता ३ - सव्यपेतधर्म… 171–180
- श IP के ) 5 11 T: 11 मंगलरहस्य त मङ्गलादीनि हि शास्त्राणि प्रथन्ते, वीरपुरुषकाणि भवन्ति । आयुष्यत पुरुषकाणि, चाध्येतारश्च वृद्धियुक्ता तथा स्युः… 181–190
- भूमिका --23 || भङ्गस्य । प्रजापति । विघ्नध्वं वा बोध्यम् । प्रचुरस्यास्यैव बलवत्तरविघ्ननिवारणे कारणत्वम् विघ्नध्वंस एव फलं, सस्तु मङ्गलस्य द्वार्मित्याहुः… 191–200
- भूमिका || मङ्गल रहस्य | पञ्चदेवता सदा मंगल वचन ही ' हे ( आग्नेयमाणप्रधान ) देवताओ! ( हम अपनें ) कानों से अपनी आंखों से सदा मङ्गलभाव सुनते रहें… 201–210
- भूमिका । मङ्गलरहस्य || s उपसंहार की भी मङ्गलकामना की गई है । अभिप्राय से अङ्गात्मक स्थूलशरीर, एवं इन्द्रियात्मक ( कारणशरीररूप सूक्ष्मशरीर आयुर्म्मय आत्मा… 211–220
- उपनिषच्छन्द ॐ मध्य भूमिका । तपः । * यः सर्वज्ञः सर्ववित् - यस्य ज्ञानमयं प्राचीन दृष्टि जायते । ( मुण्डक ० १ । १ । ६… 221–230
- उपनिषच्छब्द माध्य भूमिका प्राचीन दृष्टि पहिले से ही विदित है | इसी आधार पर आप का “ धाता यथापूर्वमकल्पयत् " यह वचन चरि-तार्थ होता है… 231–240
- उप नष मध्य भूमिका । -ब्राह्मण में उपनिष प्रकार से क्यों किया जाता कर्म्मकलाप की इतिकर्तव्यता प्रतिष्ठित है । " अमुक अमुक कम्मों को उपनिषत है… 241–250
- उपनिषच्छब्द - । माष्यभूमिका ब्राह्मण में उपनिषत् अग्नि आहवनीयाग्नि है । सूर्य्यविरुद्ध दिक् में प्रतिष्ठित भूपिण्ड गाईपत्यकुण्ड है… 251–260
- विज्ञानदृष्टि । भाष्यभूमिका । -उपनिषत् में उपनिषत् अध्यात्मविद्यात्व को हीं उप-प्रतिपादक नहीं हैं । हैं - और अवश्य हैं… 261–270
- विज्ञानदृष्टि भाष्यभूमिका । उपनिषत् में उपनिषत् है, ऐन्द्र ज्योतिर्मयप्राण बुद्धिप्रद बनता हुआ देवता है… 271–280
- * श्रीः * चत्वारि शृङ्गा भयो अस्य पादा द्वे शीष सप्त हस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मय आविवेश… 281–290
- प्रस्तावना माध्य भूमिका गुण - दोषभाव कर्म्म अधिकारी भेद से विभक्त हैं, उन कम्पों में प्रवृत्त तत्तदधिकारी परस्पर में सहयोग रखते हुए, भग एक दूसरे की निन्दा… 291–300
- प्रस्तावना || माध्यभूमिका । मिथ्या श्रद्धा पर अथवा वैज्ञानिक के विरोध करने पर समुचित उत्तर देने में आप असमर्थ रहेंगे तो जनसाधारण , यदि हम अपने धर्म की… 301–310
- विषयप्रवेश । भाष्यभूमिका । ०-दोषदर्शन काश नहीं मिलना चाहिए । अर्थात् हमारा प्रश्न ऐसा होना चाहिए कि फिर उस प्रश्न के प्रश्नत्व पर किसी प्रकार के आघात होने… 311–320
- श्रीः अथ त्रयोदश ( १३ ) - अवान्तरमतयुक्तं -पूर्वोत्तरमीमांसादर्शनाभिमत- मतप्रदर्शनम् मीमांसानुगत - दृष्टिकोण-ब्राह्मणग्रन्थों में… 321–330
- मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड ६--७ -- मत ६ – नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव अपौरुषेय वेद को श्रपृश्नि ऋषियोंनें प्राप्त किया है-नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अपौरुषेय वेद को… 331–340
- मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड त्रयोदशमत १ - " ननु क्षणिकत्वाभावेऽपि वियदादिवदादिमत्वेन परमेश्वरकर्तृ- चेन्न… 341–350
- नव्यन्दादर्शन प्रथमखण्ड द्वितीयमत २-- नित्यसिद्ध वाक्तत्व से ईश्वर शब्द वेद, एवं विश्व को उत्पन्न करता है । शब्दव ( १५ मत )… 351–360
- प्राचीन न्यायदर्शन प्रथमखण्ड दृष्टिकोण ५ – न भिद्यते लौकिकाद् वाक्याद् वैदिकं वाक्यम् । प्रेक्षापूर्णकारिपुरुषप्रणीतत्त्वेन… 361–370
- श्रीः इति - पञ्च- ( ५ ) - अवान्तरमतयुक्तं प्राचीनन्यायाभिमत- मतप्रदर्शनम् ३ श्रीः इति - सप्त - ( ७ ) - अवान्तरमतयुक्तं प्राधानिकाभिमत- मतप्रदर्शनम् ४ III… 371–380
- सांख्यदर्शन प्रथमखण्ड ६-७ - मत ६- तीनों प्राकृतिक लोकों से क्रमशः तीन वेद उत्पन्न हुए हैं । [ ३१ मत ] भूः भुवः स्वः नाम से प्रसिद्ध पृथिवी - अन्तरिक्ष-… 381–390
- वैशेषिकदर्शन प्रथमखण्ड ४-५ मत ४ – यह वेद श्रपान्तरतमा ऋषि का वाक्य है । ( ३६ मत ) सुप्रसिद्ध “ अपान्तरतमा " नाम के महर्षि ने वेद का प्रवचन किया है… 391–400
- नास्तिकदर्शन प्रथमखण्ड प्रथममत मत का अनुगमन करने वाले चार्वाकों का कहना है कि- ' पृथिवी, जल, तेज- वायु - भेद से चार तत्त्व हैं… 401–410
- वेदनिरुक्तौ १ - परात्परब्रह्म - ' ब्रह्मवनम् ' २- पुरुषब्रह्म-क. १ - अव्ययानुग्राहकः परात्परः २ - पञ्चकलोऽव्ययः १३ - पञ्चकलोऽक्षरः ४ - पञ्चकलः क्षरः १-… 411–420
- श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ- के सच्चिदानन्दात्मलक्षणा - वेदनिरुक्ति श्रारम्भ किया जाता है । सच्चि -श्रात्मदृष्टि से मूल वेद का विचार श्रात्मप्रकरण उपरत… 421–430
- श्रीः इति - वेदनिरुक्तौ सच्चिदानन्दात्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः २ श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ अमृत - मृत्युमय - आत्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः ३ 10 की श्री:… 431–440
- वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड १ – मनःप्राणवाङ मये मनसि त्रिवृद्भावाद्व त्रयोपभोगः १ - मनोमयं मनः --- -महोक्थम् ——- ऋक् २ - मनोममयः प्राणः पुरुषः यजुः ३- मनोमयी… 441–450
- श्रीः इति - वैज्ञानिकवैदनिरुक्तौ उक्थ - ब्रह्म - साम - मयी —— वेदनिरुक्तिः श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ आत्म - ज्योति - प्रतिष्ठा - लक्षणा वैदनिरुक्तिः… 451–460
- श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ आत्म - ज्योति - प्रतिष्ठा - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः " " " श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ' उपलब्धि - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः… 461–470
- I श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्मेन्द्रविष्णुसहकृता-- वेदनिरुक्तिः सत्यवेदनिरुक्तिर्वा के सम्मुख उपस्थित किया ७ विवर्त्त भावों का स्वरूप पाठकों… 471–480
- वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड प्राणापोवाग् - वेदनिरुक्तिः -है । स्वयम्भू – परमेष्ठी - सूर्य्य-यही श्रानन्दात्मक, ब्रह्मानुग्रहीत, प्राणमय ब्रह्मनिःश्वसितवेद की… 481–490
- I I ee श्रीः अथ वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्म - विद्या वेद - - भिन्ना- ज्ञानलक्षणा - वेदनिरुक्तिः 99 में प्रयुक्त देखे गए… 491–500
- वेद क्ि प्रथमखण्ड ब्रह्म - विद्या - वेद - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः अव्यय - अक्षर- श्रात्मक्षर - परात्पर की समष्टिरूप चतुष्पाद् ब्रह्म ही कारणभूत आत्मा है… 501–510
- श्रीः इति वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( १ ) - " पर्ववेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्ण भावापन्ना १२ 999 * 100 श्री यथ- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( २ ) - “ भावनावेदनिरुक्तिः "… 511–520
- वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड भावना - वेदनिरुक्तिः भावनामय प्रत्येक पदार्थ क्रिया, किंवा कर्म्मरूप है, यह श्रारम्भ में ही कहा जाचुका है… 521–530
- ge श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ [ ४ ] - “ दिग्वेदनिरुक्तिः ” प्रकीर्णभावापन्ना १५ Terperso उभयसिद्ध मेद से तीन नातियों में विभक्त पदार्थतत्त्ववेत्ता… 531–540
- प्रथमखण्ड देशवेदनिरुक्तिः मूर्त्ति - माण्डल - गति, मेद से तीनों वेदों का उपभोग होरहा है । हमारी सूर्योपलब्धि है, जिसे मूलाधार बना कर उपलब्धि हो रही है, वह… 541–550
- कोश श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ७ ) - " वर्णवेदनिरुक्तिः ” - प्रकीर्ण भावापन्ना १८ वैश्य के वैश्यत्व जिस तत्व से सुरक्षित ब्राह्मण में रहने वाले… 551–560
- ' राजस्थानवैदिकतत्त्वशोध संस्थान - जयपुर ' के द्वारा प्रकाशित एवं ( जयपुर ) श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय, मानवाश्रम - दुर्गापुरा के द्वारा मुद्रित ana i} 561–562