श्रीगणेशाय नमः।
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री
Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I · 562 पृष्ठ · 57 खण्ड
In English
Introduction to the Science-Commentary of the Upanishads, Vol. 1
This is the first volume of a large essay series titled Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika by Motilal Sharma. It serves as an introduction to the author's scientific commentaries on various Upanishads and includes discussions on Vedic literature, its meaning, and its status as scripture.
This book answers
- What is the meaning of the word upanishad?
- Is the upanishad considered part of the vedas?
- Why is mangalpath performed at the beginning of upanishads?
- How does vedic literature relate to human psychology and culture?
विषय सूची
- i a Pit fe at Db Juay a) qe i Be ae श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका प्रथमखण्ड १ मोतीलालशम्र्मोपाह्रो मुक्तरक्तशर्मा आङ्गिरसो भारद्वाजः वेदवीथी- पथिकः… 1–10
- किमपि प्रास्ताविकम् निधि का स्वरूपविश्लेषक, छन्दोभ्यस्ता से समलङ्कृत उपनिषत् जैसा विविध विद्याभाण्डारात्मक मौलिक साहित्य अपनी ज्ञानविज्ञानात्मिका मौलिकता… 11–20
- किमपि प्रास्ताविकम् ( क ) -कम्र्ममेदमूलक - अधिकारी - वर्ग का विभेद - नामक प्रथम अवान्तर - विषय में श्र ेय प्रय-श्रेयप्रेय- रूप से तीन प्रकार के अधिकारी… 21–30
- किमपि प्रास्ताविकम् एवं उसी का नाम है - ' तत्त्वात्मक अपौरुषेय समझने मात्र के लिए उस सर्वादिभूत अव्यक्तभावापन्न वेद "… 31–40
- के P A1 BE 1599522 ि 25 श्रीः इति - उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्डस्य " किमपि - प्रास्ताविकम " उपरतम् श्रीः उपनिषद विज्ञान भाष्यभूमिकानुगत -… 41–50
- विषयसूची १७३ - घनाग्नि, और पार्थिवज्योति १७४ - तापलक्षण पार्थिवाग्निज्योति १७५ - विरलाग्नि, और दिव्यज्योति १७६- प्रकाशलक्षण दिव्येन्द्रज्योति १७७ -… 51–60
- विषयसूची १५ - त्रयं ब्रह्म, और त्रयो वेदाः १६ - वेद, और ब्रह्म की अभिन्नता १७ - सूर्य्यात्मक ब्रह्म, और वेदात्मिका रश्मियाँ १८ - उक्थरूप ब्रह्म, और कत्मक… 61–70
- विषयसूची से वेद उत्पन्न वेदों | ( ४ ) - " प्रकृतिसिद्ध कालचक्र - मत ( २ ) - " प्रकृतिसिद्ध भौतिक सूर्य तीनों " नामक चतुर्थ - प्राधानिक हुआ है से अभिन्न है… 71–80
- १२५ - प्रविष्टात्मा, और विश्वात्मविव १२६- प्रविविक्तात्मा, और विश्चविवर्त्त १२७ - विज्ञेय प्रविविक्त ब्रह्म १२.८ - दुर्विज्ञेय - सृष्टब्रह्म १२६-… 81–90
- विषयसूची १८६ ऋक्की ही सामरूपता ५५४ - विदेहमुक्ति का उक्थ- निष्कामभाव ६५५ - श्राध्वर्यवक का उक्थ - अध्वर्यु ५५६ - हौत्रकर्म्म का उक्थ होता ५५७ -… 91–100
- -श्रीः इति - उपनिषदविज्ञान भाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्डस्य प्रधानविषयसूची तथा स्मारकविषयसूची उपरता श्रीः प्रारम्भिक - निवेदन ( प्रथमखण्डानुबन्धी ) (… 101–110
- 031 प्रारम्भिक वक्तव्य । ५ - यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्म्ममयो मृगः । यश्च विमोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम विभ्रति । मनुः २ । १५७१ )… 111–120
- । प्रारम्भिक वक्तव्य । की उपेक्षा कर धर्म-वाले वे दोनों वीर बालक आदि महानात्माओं ने ऐहलौकिक सब सुखों का कौन ऐतिहासिक रक्षा में ही अपने जीवन का उत्सर्ग… 121–130
- - प्रारम्भिक वक्तव्य the feeble promethean speck in the full flood of the heavenly extinguished glory of. " noonday sun - faltering and feeble and ever… 131–140
- प्रारम्भिक वक्तव्य । गम्भीर शान्त एवं बड़े परिश्रमी थे । अच्छे कारीगर थे । वे शायद ही कोई मुकदमा दायर करते थे… 141–150
- प्रारम्भिक वक्तव्य । " ब्रह्म " कहा जाता है, अतएव तत्प्रतिपादिका आत्मविद्या को हम " ब्रह्मविद्या " कह सकते हैं । यौगिकतत्व को " यज्ञ " कहा जाता है… 151–160
- प्रारम्भिक वक्तव्य । २ – “ सोमः पूषा च चेततुर्विश्वासां सुक्षितीनाम् । देवत्रा रथ्योहिता ” ( सामसं ० पू ०२ । ८ । १० )… 161–170
- १० - स्थिरधर्म १- भार २- आयतन ३- स्थानविरोध ४ - विभाज्यता ५- सान्तरत्व - अस्थिरधर्म्म ' ८-१- शैत्य २- प्राकुञ्चन ३- कठिनत्व ४- वर्णरूपता ३ - सव्यपेतधर्म… 171–180
- श IP के ) 5 11 T: 11 मंगलरहस्य त मङ्गलादीनि हि शास्त्राणि प्रथन्ते, वीरपुरुषकाणि भवन्ति । आयुष्यत पुरुषकाणि, चाध्येतारश्च वृद्धियुक्ता तथा स्युः… 181–190
- भूमिका --23 || भङ्गस्य । प्रजापति । विघ्नध्वं वा बोध्यम् । प्रचुरस्यास्यैव बलवत्तरविघ्ननिवारणे कारणत्वम् विघ्नध्वंस एव फलं, सस्तु मङ्गलस्य द्वार्मित्याहुः… 191–200
- भूमिका || मङ्गल रहस्य | पञ्चदेवता सदा मंगल वचन ही ' हे ( आग्नेयमाणप्रधान ) देवताओ! ( हम अपनें ) कानों से अपनी आंखों से सदा मङ्गलभाव सुनते रहें… 201–210
- भूमिका । मङ्गलरहस्य || s उपसंहार की भी मङ्गलकामना की गई है । अभिप्राय से अङ्गात्मक स्थूलशरीर, एवं इन्द्रियात्मक ( कारणशरीररूप सूक्ष्मशरीर आयुर्म्मय आत्मा… 211–220
- उपनिषच्छन्द ॐ मध्य भूमिका । तपः । * यः सर्वज्ञः सर्ववित् - यस्य ज्ञानमयं प्राचीन दृष्टि जायते । ( मुण्डक ० १ । १ । ६… 221–230
- उपनिषच्छब्द माध्य भूमिका प्राचीन दृष्टि पहिले से ही विदित है | इसी आधार पर आप का “ धाता यथापूर्वमकल्पयत् " यह वचन चरि-तार्थ होता है… 231–240
- उप नष मध्य भूमिका । -ब्राह्मण में उपनिष प्रकार से क्यों किया जाता कर्म्मकलाप की इतिकर्तव्यता प्रतिष्ठित है । " अमुक अमुक कम्मों को उपनिषत है… 241–250
- उपनिषच्छब्द - । माष्यभूमिका ब्राह्मण में उपनिषत् अग्नि आहवनीयाग्नि है । सूर्य्यविरुद्ध दिक् में प्रतिष्ठित भूपिण्ड गाईपत्यकुण्ड है… 251–260
- विज्ञानदृष्टि । भाष्यभूमिका । -उपनिषत् में उपनिषत् अध्यात्मविद्यात्व को हीं उप-प्रतिपादक नहीं हैं । हैं - और अवश्य हैं… 261–270
- विज्ञानदृष्टि भाष्यभूमिका । उपनिषत् में उपनिषत् है, ऐन्द्र ज्योतिर्मयप्राण बुद्धिप्रद बनता हुआ देवता है… 271–280
- * श्रीः * चत्वारि शृङ्गा भयो अस्य पादा द्वे शीष सप्त हस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मय आविवेश… 281–290
- प्रस्तावना माध्य भूमिका गुण - दोषभाव कर्म्म अधिकारी भेद से विभक्त हैं, उन कम्पों में प्रवृत्त तत्तदधिकारी परस्पर में सहयोग रखते हुए, भग एक दूसरे की निन्दा… 291–300
- प्रस्तावना || माध्यभूमिका । मिथ्या श्रद्धा पर अथवा वैज्ञानिक के विरोध करने पर समुचित उत्तर देने में आप असमर्थ रहेंगे तो जनसाधारण , यदि हम अपने धर्म की… 301–310
- विषयप्रवेश । भाष्यभूमिका । ०-दोषदर्शन काश नहीं मिलना चाहिए । अर्थात् हमारा प्रश्न ऐसा होना चाहिए कि फिर उस प्रश्न के प्रश्नत्व पर किसी प्रकार के आघात होने… 311–320
- श्रीः अथ त्रयोदश ( १३ ) - अवान्तरमतयुक्तं -पूर्वोत्तरमीमांसादर्शनाभिमत- मतप्रदर्शनम् मीमांसानुगत - दृष्टिकोण-ब्राह्मणग्रन्थों में… 321–330
- मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड ६--७ -- मत ६ – नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव अपौरुषेय वेद को श्रपृश्नि ऋषियोंनें प्राप्त किया है-नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अपौरुषेय वेद को… 331–340
- मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड त्रयोदशमत १ - " ननु क्षणिकत्वाभावेऽपि वियदादिवदादिमत्वेन परमेश्वरकर्तृ- चेन्न… 341–350
- नव्यन्दादर्शन प्रथमखण्ड द्वितीयमत २-- नित्यसिद्ध वाक्तत्व से ईश्वर शब्द वेद, एवं विश्व को उत्पन्न करता है । शब्दव ( १५ मत )… 351–360
- प्राचीन न्यायदर्शन प्रथमखण्ड दृष्टिकोण ५ – न भिद्यते लौकिकाद् वाक्याद् वैदिकं वाक्यम् । प्रेक्षापूर्णकारिपुरुषप्रणीतत्त्वेन… 361–370
- श्रीः इति - पञ्च- ( ५ ) - अवान्तरमतयुक्तं प्राचीनन्यायाभिमत- मतप्रदर्शनम् ३ श्रीः इति - सप्त - ( ७ ) - अवान्तरमतयुक्तं प्राधानिकाभिमत- मतप्रदर्शनम् ४ III… 371–380
- सांख्यदर्शन प्रथमखण्ड ६-७ - मत ६- तीनों प्राकृतिक लोकों से क्रमशः तीन वेद उत्पन्न हुए हैं । [ ३१ मत ] भूः भुवः स्वः नाम से प्रसिद्ध पृथिवी - अन्तरिक्ष-… 381–390
- वैशेषिकदर्शन प्रथमखण्ड ४-५ मत ४ – यह वेद श्रपान्तरतमा ऋषि का वाक्य है । ( ३६ मत ) सुप्रसिद्ध “ अपान्तरतमा " नाम के महर्षि ने वेद का प्रवचन किया है… 391–400
- नास्तिकदर्शन प्रथमखण्ड प्रथममत मत का अनुगमन करने वाले चार्वाकों का कहना है कि- ' पृथिवी, जल, तेज- वायु - भेद से चार तत्त्व हैं… 401–410
- वेदनिरुक्तौ १ - परात्परब्रह्म - ' ब्रह्मवनम् ' २- पुरुषब्रह्म-क. १ - अव्ययानुग्राहकः परात्परः २ - पञ्चकलोऽव्ययः १३ - पञ्चकलोऽक्षरः ४ - पञ्चकलः क्षरः १-… 411–420
- श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ- के सच्चिदानन्दात्मलक्षणा - वेदनिरुक्ति श्रारम्भ किया जाता है । सच्चि -श्रात्मदृष्टि से मूल वेद का विचार श्रात्मप्रकरण उपरत… 421–430
- श्रीः इति - वेदनिरुक्तौ सच्चिदानन्दात्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः २ श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ अमृत - मृत्युमय - आत्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः ३ 10 की श्री:… 431–440
- वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड १ – मनःप्राणवाङ मये मनसि त्रिवृद्भावाद्व त्रयोपभोगः १ - मनोमयं मनः --- -महोक्थम् ——- ऋक् २ - मनोममयः प्राणः पुरुषः यजुः ३- मनोमयी… 441–450
- श्रीः इति - वैज्ञानिकवैदनिरुक्तौ उक्थ - ब्रह्म - साम - मयी —— वेदनिरुक्तिः श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ आत्म - ज्योति - प्रतिष्ठा - लक्षणा वैदनिरुक्तिः… 451–460
- श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ आत्म - ज्योति - प्रतिष्ठा - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः " " " श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ' उपलब्धि - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः… 461–470
- I श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्मेन्द्रविष्णुसहकृता-- वेदनिरुक्तिः सत्यवेदनिरुक्तिर्वा के सम्मुख उपस्थित किया ७ विवर्त्त भावों का स्वरूप पाठकों… 471–480
- वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड प्राणापोवाग् - वेदनिरुक्तिः -है । स्वयम्भू – परमेष्ठी - सूर्य्य-यही श्रानन्दात्मक, ब्रह्मानुग्रहीत, प्राणमय ब्रह्मनिःश्वसितवेद की… 481–490
- I I ee श्रीः अथ वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ब्रह्म - विद्या वेद - - भिन्ना- ज्ञानलक्षणा - वेदनिरुक्तिः 99 में प्रयुक्त देखे गए… 491–500
- वेद क्ि प्रथमखण्ड ब्रह्म - विद्या - वेद - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः अव्यय - अक्षर- श्रात्मक्षर - परात्पर की समष्टिरूप चतुष्पाद् ब्रह्म ही कारणभूत आत्मा है… 501–510
- श्रीः इति वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( १ ) - " पर्ववेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्ण भावापन्ना १२ 999 * 100 श्री यथ- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( २ ) - “ भावनावेदनिरुक्तिः "… 511–520
- वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड भावना - वेदनिरुक्तिः भावनामय प्रत्येक पदार्थ क्रिया, किंवा कर्म्मरूप है, यह श्रारम्भ में ही कहा जाचुका है… 521–530
- ge श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ [ ४ ] - “ दिग्वेदनिरुक्तिः ” प्रकीर्णभावापन्ना १५ Terperso उभयसिद्ध मेद से तीन नातियों में विभक्त पदार्थतत्त्ववेत्ता… 531–540
- प्रथमखण्ड देशवेदनिरुक्तिः मूर्त्ति - माण्डल - गति, मेद से तीनों वेदों का उपभोग होरहा है । हमारी सूर्योपलब्धि है, जिसे मूलाधार बना कर उपलब्धि हो रही है, वह… 541–550
- कोश श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ७ ) - " वर्णवेदनिरुक्तिः ” - प्रकीर्ण भावापन्ना १८ वैश्य के वैश्यत्व जिस तत्व से सुरक्षित ब्राह्मण में रहने वाले… 551–560
- ' राजस्थानवैदिकतत्त्वशोध संस्थान - जयपुर ' के द्वारा प्रकाशित एवं ( जयपुर ) श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय, मानवाश्रम - दुर्गापुरा के द्वारा मुद्रित ana i} 561–562