Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 341–350
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 341–350
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मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड त्रयोदशमत १ - " ननु क्षणिकत्वाभावेऽपि वियदादिवदादिमत्वेन परमेश्वरकर्तृ- चेन्न । कतया पौरुषेयत्वं वेदानामिति तव सिद्धान्तो भज्येतेति न तावत् पुरुषेणोच्चार्यमाणत्वं पौरुषेयत्वं, गुरुमतेऽपि पौरुषेयत्वा-पत्तेः । नापि पुरुषाधीनोत्पत्तिमत्वं नैय्यायिकाभिमतपौरुषे-यत्वानुमानेऽस्मदादीनां सिद्धसाधनापत्तेः । किन्तु सजातीयो -चारणानपेक्षोच्चारणविषयत्वम् । तथा च सर्गाद्यकाले परमेश्वरः पूर्वसिद्धवेदसमानानुपूर्वीकं वेदं विरचितवान् । न तु तद्वि-जातीयं वेदमिति न सजातोयोच्चारणानपेक्षोच्चारणविषत्वं पौरुषेयत्वं वेदस्य । भारतादीनां तु सजातीयोच्चारणमनपेक्ष्यै-वोच्चारणमिति तेषां पौरुषेयत्वम् ” ( वेदान्तपरिभाषा ) । १३ १ - प्रश्न उपस्थित होता है कि वेदों के क्षणिक न होने पर भी अकाशादिवत् सादिभाव के कारण परमेश्वर के द्वारा बनाए जाने के कारण भी यदि वेद का पौरुषेयत्त्व माना जायगा, तो तुम्हारे ( वेदान्त के ) सर्वथा अपौरुषेय हैं ) । आक्षेपात्मक इस सिद्धान्त का विरोध होगा । ( कारण वेदान्त के मतानुसार वेद उच्चारण का विषय बन जाना ही प्रश्न का समाधान करते हुए कहते हैं कि- " केवल पुरुष के मुख से गुरुमत में भी पौरुषेयत्व की आपत्ति पौरुषेयत्व नहीं है । यदि पौरुपेयत्व का यही लक्षण माना जायगा, तो कहा हुआ है । इसीप्रकार पुरुष की अधीनता होगी । कारण भाद्रुमत के मतानुसार वेद ईश्वरपुरुष के मुख से । कारण न्यायानुसार में ( साक्षी में ) वेद उत्पन्न हुआ है " पौरुषेय का यह भी लक्षण नहीं माना जासकता मानने से हमारे ( वेदान्त ) में सिद्धसाधन पौरुषेयत्व का यही लक्षण किया गया है । फलतः इस लक्षण के हमें ) पौरुषेयत्व का - " सजातीयोच्चारण की दोष होता है । ऐसी स्थिति में ( स्वसिद्धान्त की रक्षा के लिए यह लक्षण समझना चाहिए । ऐसी परिस्थिति में अपेक्षा न रखने वाले उच्चारण का विषय ही पौरुषेयत्व है ", वेद की समान- श्रानुपूर्वी का ( यह सिद्ध हो जाता है कि ) सृष्टि के आदिकाल में ईश्वरने पूर्वकल्पसिद्ध वेद में घटित नहीं हुआ, फलत: वेद स्मरण करके ही वेदनिर्माण किया । ऐसी दशा में उक्त पौरुषेयलक्षण का अपौरुषेयत्व हमारे मत में सर्वथा अक्षुण्ण रह गया । २४
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मीमांसादर्शन उपनिषद्भूमिका मतसमष्टि उक्त तेरहों मत आंशिकरूप से परस्पर में विरोधात्मक होते हुए भी ' वेद नित्यसिद्ध हैं, कूटस्थ हैं, अपौरुषेय हैं ' इस श्रंश में सर्वथा विरोधी हैं । यही पूर्वोत्तरमीमांसा का मत है । इसीलिए इन विभिन्न मार्गानुगामी १३ हों मतों को हम मीमांसामन मान सकते हैं । माथ ही में यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि, जिन मतों का सप्रमाण अबतक दिग्दर्शन कराया गया है, उन में से कितने एक मत एक से चिदित मालुम होते हैं । यदि पाठक महाभाग सूक्ष्मदृष्टि से विचार करेंगे, तो उन्हें उन सब का सूक्ष्म - पार्थक्य हो जायगा । १-पूर्वोत्तर - मोमांसामत , वेद " प्रकृत 33 हैं,कूटस्थ - नित्य हैं, अपौरुषेय हैं । १ - वेद ईश्वर से अभिन्न हैं । २ – वेद ईश्वर के समकक्ष हैं । १३- वेद ईश्वर के निश्वास हैं । एक ४ - वेद को ईश्वरानुग्रह से ब्रह्मा ने प्राप्त किया है । 11 महर्षियोंनें प्राप्त किया है । FFER SE PRE पृश्नि ऋषियोंनें प्राप्त किया है । अथर्वाङ्गिरने प्राप्त किया है । ८- वेद ईश्वर का वाक्य है, ईश्वर इस का सम्प्रदायप्रवत ' के है । ६ - वेद चतुर्मुस्वब्रह्मा का वाक्य है, ब्रह्मा इसके सम्प्रदाय प्रवर्त्तक हैं । १० -- वेद भिन्न भिन्न ऋषियों के वाक्य हैं, ऋषि इस के सम्प्रदायप्रवर्त्तक हैं । ११ – वेद के तात्पर्य्यानुसार ईश्वर ने विश्व का निर्माण किया है । १२ – वेदशब्दों से ईश्वरने जगत् का निर्माण किया है । १३ – वेद के पूर्वकल्प का स्मरण करके सृष्टयादि में वेद को ईश्वर ने प्रकट किया है । २५
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मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड ( १ ) - ( २ ) - ( ३ ) - ( ४ ) मतसमष्टि इन तेरह मतों के सम्बन्ध में ४-४-३-३ - ये अवान्तर चार विमर्श समझने चाहिएँ । इन है— चारों के अनुसार उक्त तेरह मतों का निम्नलिखित स्वरूप पाठकों के सामने श्राता १ - १ - श्रात्मारूप वेद ईश्वर से अभिन्न हैं । ३२ - २ - आत्मारूप वेद ईश्वर से समतुल्य हैं । ३ - ३ - आत्मारूप वेद ईश्वर के निःश्वास है । ** * ४ - १ - ईश्वरानुग्रह से ब्रह्मा ने विज्ञानरूप वेदों को प्राप्त किया । ४ ५—२ —– ईश्वरानुग्रह से महर्षियोंनें विज्ञानरूप वेदों को प्राप्त किया । ६—३— ईश्वरानुग्रह से अजवृष्णि ऋषियोंनें विज्ञानरूप वेदों को प्राप्त किया । ७–४– ईश्वरानुग्रह से अथर्वाङ्गिराने विज्ञानरूप वेदों को प्राप्त किया । * * * । ८ - १ - शब्दमय वेद ईश्वर के वाक्य हैं, ईश्वर इनके सम्प्रदायप्रवत ' के हैं ३ ६-२ - शब्दमय वेद ब्रह्मा का वाक्य है, ब्रह्मा इस के सम्प्रदायप्रवर्त्त के हैं । हैं । १०- ३ – शब्दमय वेद ऋषियों के वाक्य हैं, ऋषि इसके सम्प्रदायप्रवर्त्तक ११ – १ – ईश्वर ने वेदशास्त्र से जगत् बनाया । ३१२–२ – ईश्वर ने वेदशब्द से जगत् बनाया । । १३ – ३ – ईश्वर ने वेदशास्त्र से पूर्वकल्प का स्मरण किया, एवं तद्द्वारा जगत् का निर्माण किया -ना - जाना ब इति -- मीमांसामतप्रदर्शनम् २६
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श्रीः इति - त्रयोदश ( १३ ) - अवान्तरमतयुक्तं -पूर्वोत्तर - मीमांसाभिमत- प्रदर्शनम् १
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श्रीः अथ - सप्त- ( ७ ) - अवान्तरमतयुक्तं-नव्यन्यायाभिमत -- प्रदर्शनम् २
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BFPFE - Piy FIFES -: न श्रीः PROFFEE " TIFFIE IF FAINT क सप्त- ( ७ ) - अवान्तरमतयुक्तं नव्यन्यायदर्शनामिमत -- मतप्रदर्शनम्XXX X नव्यन्यायानुगत- दृष्टिकोण: VESTBY - EPFFIE FIESTA FES नित्य-नव्यन्याय के मतानुसार वेद कूटस्थनित्यता, एवं प्रवाहनित्यता से रहित होता हुआ तथापि कथमपि इसे पौ-सिद्ध नहीं माना जासकता । मनुष्य ऋषि- यद्यपि इसके कर्त्ता नहीं हैं, अपितु द्रष्टा ही हैं, अनुसार रुषेय नहीं माना जाकता । क्योंकि “ यद्यत् कार्य्यं तत्तत् कर्तृ जन्यम् ” इस सर्वानुभूत सिद्धान्त के द्वारा कार्य्यं बिना कारण के अनुपपन्न है । फलतः जिन काय्यों का कर्त्ता हम प्रत्यक्ष में नहीं देखते, अनुमान है । के क्षित्य-तत्र अवश्य ही किसी परोक्ष कर्त्ता का अस्तित्व स्वीकार करना पड़ता है । वही अनुमानिक कर्त्ता ' ईश्वर वेद को ' ' पौरुषेय ' हुरादि की भाँति वही वेदकार्य्यं का भी प्रवृत्त के है । इस ईश्वरपुरुष के सम्बन्ध से ही हम - विरचित इसे अपौरुषेय भी माना जासकता है । नव्यन्याय-- प्रन्थों में अतिसुप्रसिद्ध सर्वश्री उदयनाचार्य्य वचन से स्पष्ट " कुसुमाञ्जलि " नामक ग्रन्थ में इसी मत का समर्थन किया गया है, जैसा कि निम्न लिखित होजाता है-FER
प्रमायाः परतन्त्रत्वात् सर्गप्रलयसम्भवात् ।
तदन्यस्मिन्ननाश्वासान्न विधान्तरसम्भवः ॥
स्यादेतत् - परतः प्रामाण्येऽपि नित्यत्वाद् वेदानामनपेक्ष्यत्वं महाजनपरिग्रहाच्च प्रामाण्यमिति विरोधः । न । उभयस्याप्यसिद्ध ेः । यदा च वर्णा एव न नित्यास्तदा कैव कथा पुरुषविवक्षाधीनानुपूर्व्यादिविशिष्टवर्ण समूहरूपाणां पदानां कुतस्तरां च तत्समूह-रचना विशेषस्य भावस्य वाक्यस्य, कुतस्तमां तत् समूहस्य वेदस्य । परतन्त्रपुरुषपराधीनतया प्रवाहाविच्छेदमेव नित्यतां च म इति चेत्, एतदपि नास्ति - सर्गप्रलयसम्भवात् ” -DIE BUBA m - कुसुमाञ्जलि द्वि ० स्तबक १ का ० । इसी मत को आधार मानने वाले सुविख्यातनामा म ० म ० श्रीगङ्ग शोपाध्याय भी चिन्तामणि-ग्रन्थ में अपने ये ही विचार प्रकट कर रहे हैं । देखिए! ३१
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नव्यन्यायदर्शन प्रथमखण्ड प्रथममत " छात्र ब्रमः - शब्दप्रयायां लोके वक्त र्यथार्थज्ञानं न गुणः, किन्तु योग्यतादिकं यथार्थतज्ज्ञानं वा । लाघवादावश्यकत्वाश्च । + + + + । एवं वेदेऽपि यथार्थयोग्यता-ज्ञानमेन गुण इति न, वैदिकप्रमाया गुणजन्यत्वेनेश्वरसिद्धिः । स्यादेतत् । वेदवक्तुर्य-यार्थवाक्यार्थज्ञानमपि न गुणः । लोके प्रमाणशब्दं प्रति तादृशस्य ज्ञानस्य हेतुत्वात् । × × × × । एवं च वेदो वाक्यार्थगोचरयथार्थज्ञानवत् स्वतन्त्रः प्रणीतः । प्रमाण-शब्दत्वात् । गामानयेति वाक्यवत् - इतीश्वरसिद्धिः । x x x x । अथ तात्पर्यविशेषे वेदः प्रमाणम् । न चास्मदादेर्वेदं विनाऽतीन्द्रियवेदार्थगोचरज्ञानं, येन तत् प्रतीतीच्छयो-च्चारणं भवेत् । न च वेदादेव तत्, अन्योऽन्याश्रयात् । श्रतः सकलवेदार्थदर्शिना यस्य वेदस्य यथार्थप्रतीतीच्छयोच्चारणं कृतं स तत्र प्रमाणमिति तादृशेच्चैव गुणः । तञ्जन्या वेदार्थप्रमा- इति तदाश्रयस्वतन्त्रस्य पुरुषधौरेयसिद्धिः ” । - तत्वचिन्तामणि- प्रामाण्यवाद - प्रमोत्पत्तिरहस्य । उक्त दार्शनिक सिद्धान्त के आधार पर ७ अवान्तर मतविभाग होजाते हैं । इनका भी संक्षेप से त्र क्रमशः दिग्दर्शन करा दिया जाता है । १ - प्रतिकल्प की सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर नवीन वेद बनाता है । ( १४ मत ) । वेदतत्व को न तो ईश्वररूप माना जासकता, एवं न इसे ईश्वर के समकक्ष ही कहा आसकता । कारण स्पष्ट है । ईश्वर नित्य है, अनादि है, शरीरानाश्रित है । इधर शब्दराशिभूत वेद अनित्य है, सादि है, शरीर-व्यापाराश्रित है । ईश्वर उत्पन्न नहीं होता, किन्तु वेद ईश्वर से उत्पन्न होता है । प्रतिकल्प में होने वाले सृष्टि के आदिकाल में ईश्वर नया वेद उत्पन्न करता है । जैसे सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी आदि विश्व के अन्यान्य पदार्थ ईश्वर से सृष्टिकाल में उत्पन्न होते रहते हैं, तथा प्रलयकाल में नष्ट होते रहते हैं, ठीक इसी प्रकार प्रतिसृष्टि में नवीन वेद उत्पन्न होता रहता है, एवं प्रलयकाल में नष्ट होता रहता है । इस मत के समर्थक निम्न लिखित वचन हमारे सामने आते हैं । १ – प्रतिमन्वन्तरं चैषा श्र तिरन्या विधीयते । ( पुराण - न्यायचिन्तामणि ) २ - ऋचो यजूंषि सामानि शरीराणि व्यपाश्रिताः ॥ जिह्वाग्रेषु प्रवर्त्तन्ते यत्नसाध्या विनाशिनः ॥१ ॥
१ – प्रत्येक मन्वन्तर के आरम्भ में दूसरे ( नवीन ) वेद का ( ईश्वर से ) विधान ( उत्पत्ति ) होता है । २ – ऋक्, यजुः, साम ये तीनों शरीरव्यापार के श्राश्रित हैं । जिह्वा के अग्रभाग में प्रतिष्ठित बागि-न्द्रिय से इनकी प्रवृत्ति [ उच्चारण ] होती है । प्रयास से प्राप्त होने योग्य यह ( शब्दराशिरूप ) वेद सर्वथा विनाशी है | १ | ३२
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नव्यन्यायदर्शन उपनिषद् भूमिका
न चैवमिष्यते ब्रह्म शरीराश्रयसम्भवम् ।
न यत्नसाध्यं तद्ब्रह्म नादिमध्यं न चान्तवत् ॥ २ ॥
ऋचामादिस्तथा साम्नां यजुषामादिरुच्यते ॥
अनन्तश्चादिमतां नत्वादिब्रह्मणः स्मृतः ॥ ३ ॥
अनादित्वादनन्तत्वात् तदनन्तमथाव्ययम् ॥
अव्ययत्वाच्च निदु: खं द्वन्द्वाभावस्ततः परम् ॥ ४ ॥
( म ० शान्तिप ० मोक्ष ० ) । प्रथममत ३ – सोऽयं पुरुषः प्रजापतिरकामयत -- भूयान्त्स्यां, प्रजायेयेति । सोऽश्राम्यत् । स तपोऽतप्यत । स श्रान्तस्तेपानो ब्रह्मव प्रथममसृजत त्रयीमेव विद्याम् । सैवास्मै प्रतिष्ठाऽभवत् । तस्मादाहुब्रह्मास्य सर्वस्य प्रतिष्ठेति । XX + X | तस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितोऽतप्यत । सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेव साऽसृज्यत । × × × × । सोऽकामयत श्राभ्योऽद्भ्योऽधि प्रजायेयेति । सोऽनया त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् । तत भाण्डं समवर्त्तत । तदभ्यमृशत् प्रस्त्विति । भूयोऽस्त्वित्येव तदब्रवीत् । ततो ब्रह्मैव प्रथममसृजत, त्रयीमेव विद्याम् । तस्मादाहुः- ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रथमजमिति । अपि ह तस्मात् पुरुषात् ब्रह्म व पूर्वमसृज्यत । तदस्य तन्मुख-मेवासृज्यत ” इति । - शत ० १।१८-१-१० कं ० उखासम्भरणश्रुतिः १ ब्रह्मतत्त्व ( ईश्वर ) शरीरव्यापार के श्राश्रय से कोई सम्बन्ध नहीं रखता । साथ ही में वह ब्रह्म न ( शब्दवत् ) यत्नसाध्य है, एवं न उसका कोई श्रादि है, न अन्त है । २ । वह ब्रह्म [ ईश्वर ] ऋक्, यजुः का ( आश्रयभूत ) अनन्त है । ब्रह्म का साम इन तीनों वेदों का श्रादि [ उत्पादक ] है । वह स्वयं सादिपदार्थों कोई श्रादि नहीं देखा गया ॥ ३ ॥
श्रनादिभाव, एवं अनन्तभाव के कारण ही वह ' अनन्त ' एवं ' अव्यय ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी श्रव्ययभाव के कारण वह पर ( परब्रह्म ) तत्व दुःखविरहित, एवं द्वन्द्वातीत है ॥४ ॥
३ – उस पुरुषप्रजापति ( ईश्वर ) ने इच्छा की कि, मैं बहुत बनूँ, उत्पन्न करूँ । इसी इच्छा से प्रेरित होकर उसने भ्रम किया, उसने तप किया । श्राम एवं तपः कर्म्म से श्रान्त, तथा तप्त उसने सर्वप्रथम ३३