Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 331–340

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड ६--७ -- मत ६ – नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव अपौरुषेय वेद को श्रपृश्नि ऋषियोंनें प्राप्त किया है-नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अपौरुषेय वेद को ईश्वर के अनुग्रह से अपनी तपोवल के द्वारा अपृश्नि नामक ऋषियोंनें प्राप्त किया है । वेदानुक्रमणिका के अनुसार आकृष्टमाप, ” “ सिकतानिवावरी, अजपृश्नि, ये तीन नाम उपलब्ध होते हैं । ' आकृष्ट - माषाः " - " सिकता - निवावरी ' - " प्रश्नयोऽजाः " के अनुसार इन तीनों ऋषियों के दो दो नाम हैं । ये नाम इन के व्यक्तिभाव से सम्बन्ध रख कर गुणभाव से ही सम्बन्ध रखते हैं । इन तीनों में से सर्वप्रथम अजपृश्नि नामक ऋषि में ही वेद प्रकट हुआ । यह वेद अजपृश्नि के द्वारा निर्मित नहीं, अपितु ईश्वर के द्वारा इन में प्राप्त है । फलतः वेद की अपौरुषेयता, एवं नित्यता में कोई आपत्ति नहीं आती । इस मत का समर्थक निम्न लिखित श्रुतिपचन है ।

अजान् ह वै पृश्नीन् तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भू - अभ्यानर्षत् ।

तद् ऋषयोऽभवन् । त एवं ब्रह्मयज्ञमपश्यन् ॥

७-- नित्यसिद्ध, ईश्वरानुग्रह से प्राप्त किया FIFT ६ कूटस्थ, अपरुषेय वेद को अथर्वाङ्गिरा - ऋषिने अतएव ऋषियों की सम्प्रदाय में अथर्वाङ्गिरा नाम के एक प्रसिद्ध महर्षि होगए हैं । अङ्गिरा - प्राण की परीक्षा में सफल होने के कारण ही ये अङ्गिरा नाम से प्रसिद्ध हुए । इन की एक स्वतन्त्र " ब्रह्मपर्षत् ” ( ब्रह्मपरिषत् ) थी । इसके ये अध्यक्ष थे । अध्यक्ष को वेदभाषा में " ब्रह्मा " कहा जाता है । अतएव अध्यक्षपदारूढ कुलपति ये अङ्गिरा ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध । अपि च विज्य ( ऋत्विक्कर्म ) में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण भी उस युग में इन्हें ब्रह्मा कहा जाता था । इनके सभी वंशधर गिराप्राण की उपासना ( परीक्षा ) के कारण अङ्गिरा - आङ्गिरस नामों से प्रसिद्ध हुए । मूलपुरुषभूत ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध इन्ही अङ्गिरामहर्षिने सर्वप्रथम वेद को प्रकाशित किया, एवं इस प्रकाशित त्रयीवेद को ( यज्ञप्रचारार्थ ) सर्वप्रथम अपने ज्येष्ठपुत्र अथर्वा में प्रतिष्ठित किया । दूसरे शब्दों में स्वयं अङ्गिराने वेद प्राप्त किया, एवं सर्वप्रथम अथर्वा को इसका मुख्य शिष्य बनाया । पूर्ण विद्वान् विदितवेदितव्य श्राङ्गिरस अथर्वा महर्षिने पिता से प्राप्त इस त्रयीवेद के आधार पर विश्व में सर्वप्रथम यज्ञविद्या का आविष्कार किया । अथर्वा से प्रारम्भ कर त्रेतायुग पर्यन्त इस यज्ञविद्या की क्रमशः उन्नति होती रही । परन्तु तदनन्तर विज्ञानभाव के नष्ट-प्राय होजाने से यज्ञविद्या का क्रमशः ह्रास ही होता गया । इसप्रकार अथर्वाङ्गिरा के द्वारा ही यद्यपि सर्वप्रथम वेद प्रकट हुआ, परन्तु ये भी इसके प्रवर्त्तकमात्र ही रहे । फलतः वेदापौरुषेयत्त्व, एवं नित्यस्व पर कोई आघात नही हुआ । इस मत के पोषक आगे के प्राप्तवाक्य हैं— * अनि नाम के महर्षियों की ओर, जो कि वेदप्राप्ति के लिये तपश्चर्या कर रहे थे, स्वयम्भूब्रह्म ( ईश्वर वेदप्रदान के लिये ) अनुगत हुआ । ( ईश्वरीय प्रेरणा से प्राप्त वेद के प्रभाव से ही अजपृश्नि ' ऋषि ' नाम से प्रसिद्ध हुए । उन्होंनें ब्रह्म ( ईश्वर ) के यज्ञरूप वेद का साक्षात्कार किया । १४

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मीमांसादर्शन उपनिषद्भूमिका सप्तममत ११ – दङ्गिराः प्रथमं दधिरे वय इवाग्नयः शम्या ये सुकृत्यया । सर्वपणेः समविन्दन्त भोजमश्वावन्तं गोमन्तमा पशु नरः । $ 1913 --ऋ. कुसं ०० १ । ८३ । ४ ।

१२ – यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्यो व्रतपा वेन याजनि ।

या गा आजदुशना काव्यः सचा यमस्य जातममृतं यजामहे ॥

लोकशा -ऋक्सं ० १ । ८३ । ५ ।५ ।

३ - ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता ।

स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥

-मुण्डक ० १११११ १ – जिस समय परिण नाम से प्रसिद्ध असुरोंनें बृहस्पति की गाएँ चुरालीं, उस समय अङ्गिरा-महर्षियोंनें प्रथम इन्द्र के लिए वयोलक्षण अन्नरूप हवि का ( यशप्रक्रिया के द्वारा ) सम्पादन किया । प्रज्वलित अग्नि से ( यज्ञाग्नि से ) युक्त होते हुए, अग्निमूर्त्ति इन तिरानें सर्वश्रेष्ठ शम्या नाम के यज्ञकर्म्म के द्वारा पणियों की गौ, अश्व, पशुरूपा सम्पूर्ण सम्पत्ति छीन ली । यज्ञाविष्कारक अङ्गिराओं के यज्ञबल से ही इन्द्र असुरों को परास्त करने में समर्थ हुए, यही तात्पर्य्यार्थ है । २ - अथर्वा ( नाम के ब्रह्मा के ज्येष्ठपुत्र ) ने यज्ञों से पहिला मार्ग वितित किया । अर्थात् अथर्वा ने ह्रीं सर्वप्रथम यज्ञविद्या का श्राविष्कार किया । इसी यज्ञ के प्रभाव से ( यज्ञजनित बल से ) यज्ञत्रतों के रक्षक ज्योतिर्म्मय सूर्ण्यसदृश प्रतापी इन्द्र पणिवध के लिए प्रकट हुए । अथर्वा उन गायों के सामने आए । कवि के पुत्र उशना असुरों के विनाश के लिए उस इन्द्र के सहायक हुए, जिस मरणरहित इन्द्र की हवि से हम तृप्ति किया करते हैं । ३ – सम्पूर्ण विश्व की व्यवस्था करने वाले, रक्षक ब्रह्मा ही सब भौमदेवताओं के पहिले प्रकट हुए । इन्होंनें सब विद्याओं की प्रतिष्ठा रूप ब्रह्मविद्या ( वेदविद्या ) को अपने ज्येष्ठपुत्र अथर्वा में प्रतिष्ठत किया । १५

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मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड सप्तममत

४ – अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा श्रथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् ।

स भरद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भरद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥

-मुण्डक ० उप ० १।२।२

५ - मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि ।

तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥

- मुण्डक ० १।२ ।

६- त्रेतायुगे विधिस्त्वोष यज्ञानां न कृते युगे ।

द्वापरे विप्लवं यान्ति यज्ञाः कलियुगे तथा ॥ १ ॥

त्रेतायां संहता वेदाः यज्ञा वर्णाश्रमास्तथा ।

संरोधादायुपस्त्वेते भ्रश्यते द्वापरे युगे ॥ २ ॥

दृश्यंते न च दृश्यन्ते वेदाः कलियुगे - खिलाः ।

उत्सीदन्ते सयज्ञाश्च केवला धर्म्मपीडिताः ॥ ३ ॥

- महाभा ० शान्ति ० मो ० २३४ प्र ० । ७ :: --४ - ब्रह्माने अथर्वा के लिए जिस ब्रह्मविद्या का प्रदान किया, अथर्वाने पिता से प्राप्त उस ब्रह्मविद्या का सर्वप्रथम अङ्गिरा को उपदेश दिया । श्रङ्गिराने भरद्वाजवंश में उत्पन्न, अतएव भारद्वाज नाम से प्रसिद्ध अपने शिष्य अङ्गिरा सत्यवाह को ब्रह्मविद्या प्रदान की । भारद्वाज ने परावरलक्षणा इस विद्या का उपदेश प्रसिद्धा ब्रह्मविद्या को को दिया । अथवा ऊपर से क्रमशः नीचे की ओर आने के कारण परावरा नाम से अङ्गिरा में प्रतिष्ठित किया । ५ — कविलोगोंनें वेदमन्त्रों में जिन कम्मों को देखा, वे यज्ञकर्म्म त्रेतायुग में अनेक प्रकार से व्याप्त हुए । अर्थात् मन्त्रों से आविष्कृत यज्ञविद्या का त्रेतायुग में बहुत प्रचार हुआ । तुम आज भी उन्हीं यज्ञकर्म्मो को व्यवहार में लाओ । यह तुम्हारे लिए सर्वश्रेष्ठ उन्नति का मार्ग है । ६ -- पूर्वप्रतिपादित यज्ञों की विधि त्रेतायुग के लिए है । कृतयुग [ सत्ययुग ] में इस का प्रभाव है । इसी प्रकार द्वापरयुग में ये यज्ञ सर्वथा विप्लवभाव को प्राप्त हो जाते हैं । [ १ ] त्रेतायुग में धर्म में वर्णाश्रमों मनुष्यों की का स्वतः श्रप्रवृत्ति रहती है । इसीलिए धर्म्मव्यवस्थापकोंनें इस युग में वेदपारायण, यज्ञ, तथा १६

पृष्ठ 334

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मीमांसादर्शन उपनिषद्भूमिका १७ अष्टममत - मुण्डक ० २।१ ॥ --2 ८ – नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव अपौरुषेय वेद ईश्वर के वाक्य हैं, ईश्वर ही इनका सम्प्रदायक है-नित्यसिद्ध वेद ईश्वर के वाक्य हैं । स्वयं ईश्वर ही इसका सम्प्रदाय प्रवर्तक है । उसी ने अपने हीं द्वारा विश्व में वेदविभूति का प्रसार किया है । इसी वेदवाणी से ईश्वर ने सम्पूर्ण विश्व का निर्माण किया है । शिवादि ऋषपर्यन्त सभी महापुरुष इसके ज्ञातामात्र थे । न उन्होंनें वेद बनाया, न सम्प्रदाय के वे श्रादिप्रवर्तक हुए । इस मत के समर्थक निम्नलिखित प्रमाण हमारे सामने आते हैं-१ - तस्मै नूनमभिद्यवळे वाचा विरूप- नित्यया । वृष्णे चोदस्व सुष्टुतिम् ॥ ( ऋक्सं ० ८।७५।२५ । ) ।

२- अग्निमूर्द्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यो दिशः श्रोत्रे वाग विवृताश्च वेदाः ।

वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्य ेष सर्वभूतान्तरात्मा ॥

३ – अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ।

यादौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥

४ - स्वयम्भूरेष भगवान् वेदो गीतस्त्वया पुरा ।

शिवाद्या ऋषिपर्य्यन्ता स्मर्त्तारोऽस्य न कारकाः ॥

विधान किया है । आगे जाकर आयु की कमी से द्वापर में भी उच्छिन्न हो जाते हैं । [ २ ] कलियुग में नाममात्र को कहीं कहीं दिखलाई पड़ते हैं । यज्ञसहित वेद इस युग में उच्छिन्न होजाते हैं । नाममात्र के अवैध यज्ञादि, जिन से कि धर्म पीड़ित होता है, रहजाते हैं: १ -हे विरूप! ( नाम के महर्षि? ) आप उस प्रसिद्ध वर्षक अग्नि की तृप्ति के लिए मन्त्ररूप नित्या वाक् से स्तुति करें । २ – उस ईश्वर का अग्नि मस्तक है, चन्द्र - सूर्य्यं चतु हैं, वेद वाक् के विवर्तरूप हैं, अर्थात् वेद उसकी वागिन्द्रिय है, वायु प्रारण है, विश्व उसका हृदय है । वह पैरों से पृथिवी पर प्रतिष्ठित है । ऐसा वह सर्वभूतान्तरात्मा सर्वत्र व्याप्त है । ३- अनादिनिधना ( मरण - धर्म्मशून्या अतएव ) सर्वथा नित्या ( वेद ) वाक् स्वयम्भू के ( मुख से ) उद्भूत हुई । आदि में विशुद्ध वेदमयी यह वाक् सर्वथा दिव्या है, जिस दिव्या वेदवाक् से कि सम्पूर्ण विश्व की प्रवृत्ति ( रचना ) हुई है । ४ – स्वयम्भू भगवान् ने ( ईश्वर ने ) ही सर्वप्रथम ( अपने मुख से ) वेद का विस्तार किया है । शिव से आरम्भ कर सब वेदमहर्षि इस के स्मर्त्ता हुए हैं, न कि कर्त्ता ।

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मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड नवममत

५— “ उत्सर्गोऽप्ययं वाचः सम्प्रदायप्रवर्त्तनात्मको द्रष्टव्यः ।

अनादिनिधनाया अन्यादृशस्यात्सर्गासम्भवात् ” ॥

- शां ० भा ० १।३।२८ ॥

- * ६- - नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव अपौरुषेय यह वेद चतुर्मुख ब्रह्मा का वाक्य है, ब्रह्मा ही इन का सम्प्रदायप्रवर्तक है-यह नित्यसिद्ध वेद चतुर्मुख ब्रह्मा के वाक्य हैं । सृष्टिनिर्माता स्वयम्भू ब्रह्मा के मुख से सर्वप्रथम इस वेदवाक् का ही विनिर्गम हुआ है । इसी नित्या वाक् के आधार पर ब्रह्मा सृष्टिनिम्माँणकर्म में समर्थ से हुए इन्हीं हैं के । यह स्वयम्भू ब्रह्मा वेद के आदिसम्प्रदायप्रवर्त्तक हैं, न कि वेदों के निर्माता । ईश्वर के अनुग्रह नित्यसिद्ध मुख से ( प्रारणमुत्र नाम के प्रथम मुख से ) सर्वप्रथम नित्या वेदवाक् बाहिर निकली है । जिसप्रकार को पुराणतत्त्व के ब्रह्मा स्मर्त्ता हैं, तथैव वेद के भी ये स्मर्त्ता ही हैं । अपिच जिसप्रकार नित्यसिद्धा पुराणविद्या भगवान् वेदव्यास ने प्रकाशित किया है, उन्होंनें पुराण बनाया नहीं है । व्यास पुराणों के सम्प्रदायप्रवर्त्तकमात्र हैं, एवमेव ब्रह्मा भी वेद के सम्प्रदायप्रवर्त्तकमात्र हैं, कर्त्ता नहीं । फलतः वेद की कूटस्थनित्यता, एवं अपौरुषेयता सर्वथा अक्षुण्ण रह जाती है । इस मत के उपोलक निम्नलिखित बचन हैं -१ - पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् ॥ अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गता ॥ २ – ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ।

३ – अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वायम्भुवा ।

आदौ वेदमयी नित्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥

५ — उत्सर्गरूप उद्भव ( उत्पत्तिभाव ) भी वाक् ( वेदवाक ) का सम्प्रदायप्रवर्त्तनात्मक ही समझना चाहिए । क्योंकि अनादिनिधना नित्या वाक् का कोई उत्पादक नहीं हो सकता । १— ब्रह्मा ने सब शास्त्र के आदि में पुराण का स्मरण किया है, पुराण के अनन्तर इन के मुख से वेद निकले हैं । ( २ + ३ + पूर्व से गतार्थ ) । १८

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मीमांसादर्शन उपनिषद्भूमिका दशममत १० – नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव अपौरुषेय वेद भिन्न भिन्न ऋषियों का वाक्य है, ऋषि इस के सम्पदायप्रवर्तक हैं-नित्यसिद्ध यह वेद ( शास्त्र ) भिन्न भिन्न ऋषियों का वाक्य है । ये प्राप्त महर्षि इस वेद के सम्प्रदायप्रवर्त्तक हैं । ऋषियोंनें तपोबल के प्रभाव से प्राप्त श्रार्षदृष्टि के द्वारा समय समय पर वेदतत्त्व को देखा, एवं उसे शब्द के द्वारा लोक में प्रवृत्त किया । यह वेदशास्त्र ऋषियों की कल्पना नहीं है, अपितु ईश्वरदत्ता विभूति है । जैसा इनके हृदय में ( ईश्वर की प्रेरणा से ) प्रकाश हुआ, इन्होंनें उस दिव्यज्ञानप्रकाशको उसी रूप से प्रकट किया । तात्पर्य्य यही हुआ कि, तपोयोग के प्रभाव से ऋषियों के अन्तःकरण में यह वेद अपने आप प्रकट हुआ । ऋषि ही इस के सम्प्रदायप्रवर्त्तक हुए । दूसरे शब्दों में- यह भी कहा जासकता है कि, महर्षिगण सम्प्रदायपरम्परा से इसे सुनते, एवं समझते हुए इसका प्रचार करते आए हैं । कोई भी ऋषि मुख्यतया इसका निर्माता नहीं हुआ । इसी अभिप्राय से प्राप्त - पुरुष कहते हैं-१ - तद्वा ऋषयः प्रतिबुबुधिरे, य उ तर्हि ऋषय आसुः । २ - तद्वा ऋषीणामनुश्रुतमास । ३ - यमाप्नवानो भृगवो विरुरुचुः । -शत ० २।२।१।१४ । ४ - ऋषयो मन्त्रदष्टारः, साक्षात्कृतधर्म्माण ऋषयो बभृवुः । ५ - तेषां ब्रह्ममयी वाणी सर्वेषां श्रोत्रमागमत् । दिव्या सरस्वती तत्र स्वं बभूव नभस्तलात् । १० :: ——-----१-- उस वेदज्ञान को उन महर्षियोंनें प्राप्त किया किया, जोकि उस समय ऋषि होगए हैं । २ — यह वेदशास्त्र ऋषियों के द्वारा परम्परया श्रुत तत्त्व है । ३ - जिस वेदतत्त्व को प्राप्त होते हुए ( वेदज्ञान के प्रकाश से ) भृगु ऋषिगण प्रकाशित होगए । ४— ऋषि वेदमन्त्रों के द्रष्टा हैं । वेदतत्त्व का ( श्रार्षदृष्टि से ) साक्षात्कार करने वाले ही ऋषि हुए है । ५ — उन ऋषियों की वेदमयी वाणी सब के कानों पर आई । वह दिव्या सरस्वती वहाँ आकाश ार्ग से अपने आप प्रगट हुई । १६

पृष्ठ 337

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मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड एकादशमत ११ – नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव अपौरुषेय वेद के तात्पर्य्यानुसार ईश्वरने विश्व का निर्माण किया है-पदार्थ नित्यसिद्ध वेदों के तात्पर्य के अनुसार ईश्वरप्रजापतिने विश्व का निर्माण किया है । प्रत्येक के उत्पत्तिक्रम, देश, काल, नाम, रूप, गुण, कर्म्म जो जो भाव पूर्वकल्प में थे, वे ही भाव वेदतत्त्व उत्तरकल्प का जिस में हुए । इसी प्रकार ऋषियों के भी जो नाम पूर्वकल्प में थे, एवं जिस ऋषिने पूर्वकल्प में द्वारा उसी रूप से साक्षात्कार किया था, इस कल्प में भी ऋषियों के वे ही नाम हुए, एवं उन ऋषियों के इस प्रकार वेदसृष्टि हुई । इसप्रकार ईश्वरप्रजापतिमें पूर्वकल्प में जो वेदमय ज्ञान अनुवर्त्तमान था,, वही उसी के उत्तरकल्प में जाना गया । वही ईश्वरीय ज्ञान वेद कहलाया है । वेद ईश्वर का ही प्रत्यक्षज्ञान है से स्पष्ट आधार पर नामरूपगुणकर्ममय विश्व का निर्माण किया है, जैसा कि निम्न लिखित वचनों होजाता है-१ – वेदेन नामरूपे व्याकरोत्, सदसती प्रजापतिः । -२ – धाता यथापूर्वमकल्पयद्दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ।

३ – तथाभिमानिनो नीतास्तुल्यास्ते साम्प्रतैरिह ।

देवा देवैरतीतैर्हि रूपैर्नामभिरेव च ॥१ ॥

यस्मिन् योग्यः पुरा क्लृप्तो यस्मिन् देशे यथा स्थितिः ।

तत्र तस्यानुरूपेण प्रजासर्गः प्रवर्त्तते ॥ २ ॥

ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः ।

शर्व्वर्य्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः ॥ ३ ॥

११ १ - सदसन्मूर्त्ति ( अमृत - मृत्युमूर्ति ) प्रजापति ( ईश्वर ) ने वेद से ही नामरूप का विभाग किया । २– सर्वजगत् - धाता ( ईश्वर ) ने पूर्वकल्प के अनुसार ही द्यु, पृथिवी, अन्तरिक्ष, एवं स्व आदि लोकों को बनाया । ३ - अभिमानी देवताओं से सम्बद्ध उत्तरकल्प के देवता उन पूर्वकल्प के देवताओं के समान हीं हैं । अतीत देवताओं के नाम - रूप- कम्मों के अनुसार ही इस युग में देवता प्रकट हुए हैं । जिस कर्म्म में पूर्वकल्प जो योग्य था, उसी कल्प में जो देश जहाँ था, जैसी स्थिति थी, वहाँ उसी स्थिति के अनुसार प्रजासर्ग होता है । पूर्वकल्प में ऋषियों के जो नाम थे, उन की वेदसम्बन्ध में जो दृष्टि ( ज्ञान ) थी, रात्रिकल्प के अन्त में उत्तरकल्प में प्रसूत उन्हीं नामों, एवं वेददृष्टियों को प्रजापति प्रदान करते हैं । २०

पृष्ठ 338

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मीमांसादर्शन किया है । " द्वादशमत उपनिषद्भूमिका २१ १२ - नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अपौरुषेय वेदशब्दों से ईश्वर ने विश्व का निर्माण ईश्वरप्रजापतिने वेदशब्दों से विश्व की रचना की है । प्रत्यक्षदृष्ट सम्पूर्ण भूतभौतिक विश्व - प्रपञ्च के वेदशब्दों पदार्थ भिन्न से ( सांख्यमतानुसार शब्दतन्मात्रा से ) ही उत्पन्न हुआ है । शब्दों के सन्निवेशतारतम्य से ही, भिन्न नाम - रूपों में परिणत होरहे हैं । सम्पूर्ण विश्व वाङ् मय है, इसीलिए पृथिवी, जल कहीं , तेज भी,, वायु कोई , आकाश भी वस्तु विश्व के इन पाँचों प्रधान अवयवों में शब्द की उपलब्धि हो रही है हमारे । संसार सामने में आते हैं । अशब्द नहीं है । इस मत के समर्थक निम्न लिखित श्रौतस्मार्त्त ' वचम

१ –वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे वाचैव विश्व बहुरूपं निबद्धम् ।

तयैवैकं प्रविभज्योपभुङ क्रू ॥

२ – वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।

वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥

३ - वागतरं प्रथमजा ऋतस्य वेदानां माताऽऽमृतस्य नाभिः ।

सा नो जुषाणोपयज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मेस्तु ॥

४ - वाचा वै वेदाः सन्धीयन्ते, वाचा छन्दांसि I वाचा मित्राणि

संदधति, वाचा सर्वाणि भूतानि । “ थो वागेवेदं सर्वम् " ॥

१ - इन सम्पूर्ण ( १४ ) भुवनों को वाक् ने ही उत्पन्न किया है । वाक् से ही अनेकरूप विश्व आक्रान्त है । उस वाक् से ही विभक्त करके ( मनुष्य - वाङमय प्रपञ्च का ) भोग करता है । गन्धर्व २ - सम्पूर्ण ( ३३ ) देवता वाक को आधार बनाकर ही स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित हैं । सम्पूर्ण ( २७ ), सम्पूर्ण पशु ( ५ ), मनुष्य, सत्र वाक के आधार पर ही जीवित हैं । यह वाक्तत्त्व इन सम्पूर्ण भुवनों में ओतप्रोत है । ऐसी यह वाग्देवी इन्द्रपत्नी हमारी प्रार्थना पर प्रसन्न हो । ३ - एकाक्षरमयी वाक् ऋतब्रह्म से सर्वप्रथम प्रकट हुई है । यह वाक् वेदों की ( शब्दात्मक करती हुई वेदों यज्ञ की में ) माता है, अमृत ( ज्ञान ) की नाभि है । ऐसी यह वाग्देवी प्रसन्न होती हुई, हमारी रक्षा पधारी है । यह मेरे लिए अच्छी बुलाई हुई बनें । ४ - वाक् से ही वेदों का संधान होता है, छन्द एवं मित्रों का सन्धान भी वाकू से ही करता है, सम्पूर्ण भूतों का 1 सन्धान वाकू से ही होता है । वाक् ही सबकुछ है ।

पृष्ठ 339

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मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड द्वादशमत ५ – “ एते असृत्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमासवः । विश्वात्यभिसौभग ” -“ एत ” इति प्रजापतिर्देवानसृजत, “ असृगृ ” -मिति मनुष्यान्, “ इन्दव ” इति पितृ न्, “ तिरः पवित्र ” -मिति गृहान्, “ च्यासव ” -इति स्तोत्रम्, “ विश्वानी " - ति शस्त्रम्, “ अभिसौभगे " त्यन्याः प्रजाः ” । ६ - स ' भू ' रिति व्याहरत, स भूमिमसृजत । स ' भुव ' इति व्याहरत् " सोऽन्तरिक्षमसृजत । स ' स्व'रिति व्याहरत्, स दिवसृजत । ७- -भूरादिशब्देभ्य एव मनसि प्रादुर्भूतेभ्यो भूरादीन् लोकान् प्रादुर्भूतान् सृष्टान् दर्शयति । ( शां ० भा ० १।३।२१ ) । ८ - वेदेन नामरूपे व्याकरोत् सदसती प्रजापतिः । ५ - प्रजापति ने “ एते ” इस शब्द से देवताओं को उत्पन्न किया, " असृग्रम् " शब्द से मनुष्यों को, “ इन्दवः ” शब्द से पितरों को, " तिरः पवित्र " शब्द से ४० ग्रहों को, " आसवः " शब्द से स्तोत्र को, " विश्वानि ” शब्द से शस्त्र को, " अभिसौभग " शब्द से इतर ( पशु - पक्षी आदि ) प्रजा को उत्पन्न किया । ६ - वह प्रजापति अपने मुख से " भूः " यह शब्द बोला, इसी शब्द से इसने भूपिगड उत्पन्न किया । भुवः से अन्तरिक्ष, एवं स्वः से द्युलोक उत्पन्न किया । ७ - अन्तःकरण में प्रादुर्भूत भूः भुवः आदि शब्दों से उत्पन्न भूमि - अन्तरिक्षादि लोकों की उत्पत्ति दिखलाते हैं । ८- सदसत् प्रजापति ने वेद ( शब्द ) से पदार्थों के नाम एवं रूपों का विभाग किया । * " असृग्रम् " के स्थान में " असृजदग्रम् " यह पाठान्तर मिलता है । + " आसवः " के स्थान में " श्रावसवः ” यह पाठान्तर मिलता है । दोनों ही पाठान्तर लेखप्रमाद समझना चाहिए । २२

पृष्ठ 340

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मीमांसादर्शन उपनिषद्भूमिका

६ - सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।

वेदशब्देभ्य एवादी पृथकसंस्थाच निर्ममे ॥

१० - नामरूपे च भूतानां कर्म्मणां च प्रवर्त्तनम् ।

वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः ॥

११ - नामरूपं च भूतानां कृत्यानाञ्च प्रपञ्चनम् ।

वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां चकार सः ॥

I १२ P त्रयोदशमत १३ – नित्यसिद्ध, कूटस्थ, अतएव अपौरुषेय वेद के पूर्वकल्प का स्मरण करके सृष्टि के आदि में इस वेद को ईश्वर ने प्रकट किया है-मनुष्य जब घोरनिद्रा में निमग्न होजाता है, तो पूर्वकल्पस्थानीय पूर्व दिन के उस के सभी कर्म्म अनुद्बुद्ध होजाते हैं । दूसरे दिन प्रात: निद्राभंग होने पर उन सब कार्यों का ज्यों का त्यों आर्विभाव होजाता है । सुषुप्तिकालोपलिक्षता रात्रि मनुष्य का पूर्वकल्प है, एवं जाग्रदवस्थोपलक्षित दिन इस का उत्तरकल्प है । ठीक यही परिस्थिति ईश्वरीय सृष्टि - प्रलय - धारा के सम्बन्ध में समझनी चाहिर । प्रलयकालोपलक्षित रात्र्यागम में जब पदार्थमात्र का विराम होजाता है, तो उस समय वेद भी उसी ईश्वर प्रजापति में लीन होजाते हैं । सृष्टिकालोपक्षित अहरागम में पुनः उन सब पदार्थों का, एवं वेदों का उसी रूप से आविर्भाव होजाता है । इस से यह भी सिद्ध होजाता है कि, ईश्वर वेद का कर्त्ता नहीं है, अपितु स्मर्त्तामात्र है । इसी अन्तिम मत का निरूपण करता हुआ वेदान्त कहता है-६- इस परमात्मा परमेश्वर ने गौजाति के गौ, श्रश्वजाति के अश्व, मनुष्यजाति के मनुष्य इत्यादि नामों को, एवं अध्ययनादि ब्राह्मणजाति के कम्मों का, प्रजापालनादि क्षत्रियजाति के कम्मों का, इसप्रकार सब के कम्मों का सृष्टि के आरम्भकाल में वेदशब्दों से ही पूर्वकल्पानुसार पृथक् पृथक् व्यवस्थितरूप से निर्माण किया । १० - सम्पूर्ण उत्पन्न पदार्थों के नाम - रूपों का, कम्मों का जो विभाग देखा जाता है, उस सुव्यवस्थित विभाग का निर्माण सृष्टि के आदि में वेदशब्दों से महेश्वरने ही किया है । ११ – भूर्ती के नाम रूपों का, कृत्या अभिचार - वल्गादि भावों का, एवं देवादि का सृष्टि के आदि में वेदशब्दों से उसी ईश्वरने ( सुव्यवस्थित विभाग ) किया है । २३