Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 361–370
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 361–370
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प्राचीन न्यायदर्शन प्रथमखण्ड दृष्टिकोण ५ – न भिद्यते लौकिकाद् वाक्याद् वैदिकं वाक्यम् । प्रेक्षापूर्णकारिपुरुषप्रणीतत्त्वेन । तत्र लौकिकस्तावत् परीक्षकोऽपि न जातमात्रं कुमारमेनं व यात् अधीष्व, यजत्र, ब्रह्मचर वादी -उपदेशार्थे प्रयुक्त, दिशा ( इति ) । कृत एप ऋषिरुपपन्नऽनवद्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहास - पुराण - धर्मशास्त्रस्य ६ — ' ' य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्र चेति ” | ( ४।१।६।२ ) । इति उक्त सूत्रों, तथा वात्स्यायन भाष्य का अभिप्राय यही है कि- ' प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान पहुँचवान , शब्द- ) भेद से प्रमासाधन ( ज्ञानसाधन ) प्रमाण चार भागों से विभक्त हैं । इन चारों में से प्राप्त पुरुष ( ही प्राप्त पुरुष का ( शब्दात्मक- किंवा शब्दरूप ) उपदेश ही शब्दप्रमाण है । साक्षात्कृतधर्म्मा से प्राप्त ( विषयप्राप्त ) कहलाते हैं । वे उस विषय के अन्तस्तल पर पहुँचे रहते हैं, उस विषय को यथार्थरूप जाता है । ऐसे ( प्राप्त कर लेते हैं । ऐसे ही श्राप्तपुरुषों को ' तत्र भवान् ' ( उस विषय में प्राप्त श्राप है ) " कहा ॥१ ॥
श्राप्तपुरुषों का शब्दात्मक उपदेश अस्मदादि श्रनाप्तपुरुषों के लिए अवश्य ही प्रमाण शब्दप्रमाण दृष्ट- अर्थ, एवं दृष्ट- अर्थ भेद से दो प्रकार का है । लौकिक घट - पट - अन्न पहिचानने - गृह-आदि पदार्थ दृष्टार्थ हैं । पारलौकिक अतीन्द्रियपदार्थ दृष्टार्थ हैं । प्रत्यक्षदृष्ट लौकिक अर्थों को वालों का शब्दोपदेश लौकिक अर्थों के सम्बन्ध में प्रमाणभूत है । लौकिक विषयों के परीक्षक लौकिक पदार्थों, के हानि - लाभ के सम्बन्ध में हमें जैसा श्रादेश करते हैं, वह हमारे लिए सर्वथा मान्य होता है । कारण वे लौकिक विषयों में प्राप्त हैं । इसीप्रकार पारलौकिक आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, नरक, पाप, पुण्य आदि अदृष्टपदार्थों को अपनी दिव्यदृष्टि ( श्रार्षदृष्टि - योगमदृष्टि ) से देखने वाले महर्षियों का शब्दोपदेश उक्त अदृष्टपदार्थों के सम्बन्ध में हम अनाप्तों के लिए प्रत्येक दशा में मान्य है । अपने अपने विषय में सभी प्राप्त हैं - जैसाकि भाष्यकार कहते हैं-“ प्राप्तः - ऋष्यार्य्यम्लेच्छानां समानं लक्षणम् । तथा च सर्वेषां व्यवहाराः प्रवर्त्तन्ते । एवमेभिः प्रमाणैर्देवमनुष्यतिरश्चां व्यवहाराः प्रकल्पन्ते । नातोऽन्यथा " ( वा ० भा ० १ | १ | ७ | ) । एक महर्षि पारलौकिक अर्थों में प्राप्त है, तो एक आर्य्य अपने सदाचार में प्राप्त है । एक ग्लेच्छ अपने हिंसाक में प्राप्त है । इन्हीं के बतलाए हुए मार्ग के अनुसरण से लौकिक - पारलौकिक व्यवहार चलते हैं । अपने अपने विषय में सब पण्डित हैं । एवं उन उन विषयों में उन उन श्राप्तपण्डितों का वचन ही हमारे लिए प्रमाण है । इन्हीं प्रमाणों के आधार पर देवता, मनुष्य, देवयोनियाँ सब की जीवनयात्रा | का निर्वाह होरहा है । यदि ऐसा न किया जाय तो, लौकिक - पारलौकिक दोनों हीं मर्य्यादाएँ उच्छिन्न होजाँय हमें ६६ प्रतिशत कार्य्यं केवल शब्दादेश पर ही करने पड़ते हैं । यदि हम अपने बुद्धिवाद के गर्व में पड़कर परीक्षा की प्रतीक्षा करने लगे, तो जीवन ही कठिन होजाय - ' तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यव-स्थितौ ॥२ ॥
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प्राचीन न्यायदर्शन उपनिषद्भूमिका दृष्टिकोण वेद शब्दराशिरूप है । मन्त्रशास्त्र एवं आयुर्वेदशास्त्र जैसे प्राप्तोपदेश होने से प्रमाण है, एवमेव वेद भी अतोपदेश होने से प्रमाण है । ' अमुक मन्त्र के जप से अमुक फल मिलता है ' इस उपदेश से हम उस कथन को प्रमाणभूत मानते हुए मन्त्रजप में प्रवृत्त होजाते हैं । एवमेव-- ' अमुक रोग में अमुक औषधि हितकर ' हैं, आयुर्वेद के इस आदेश को शिरोधार्य्य कर उस श्रौषधिपान में प्रवृत्त होजाते है । इस प्रवृत्ति का एकमात्र कारण प्राप्तबुद्धि ही है । हम समझते हैं कि, उक्त आदेश परीक्षक विद्वानों का है । इस में कभी भ्रान्ति नहीं होसकती । वेद भी प्राप्तमहर्षियों का वाक्य है । अतः ' अमुक कर्म से अमुक फल मिलता है ' इत्यादि वेदोपदेशों पर हमारी स्वतः एव निष्ठा होजाती हैं । यदि निष्ठा नहीं होती है, तो होनी चाहिए । जिस मनुष्यने अपने जीवन में एकबार भी ब्राह्मी नही देखी हो, जिसे स्वप्न में भी यह विदित नहीं हो कि, ब्राह्मी ज्ञानवर्द्धिका है, तो भी केवल श्राप्तोपदेश के आधार पर इसे उसको अपनाना पडेगा । ' हम तो जभी मानेगे, जबकी पूरी जाँचकर लेंगे ' ऐसा दुराग्रह रखने वाले श्रश्रद्धालुओं को भी श्रायुर्वेदोपदेश में प्राप्तभाव के कारण बिना परीक्षा के ही प्रवृत्त होजाना पड़ता है । महर्षि गोतम कहते हैं कि, जिस हेतु ( श्राप्तप्रामाण्य-बुद्धि ) से तुम आयुर्वेद को प्रमाण मान लेते हो, उसी प्राप्तभाव के कारण वेद को भी प्रमाण मनो || ३ || युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः लेभिरे तपसा पूर्णमनुज्ञाता स्वयम्भुवा ॥ उक्त प्राप्तवचन के अनुसार युगान्त में अन्तर्हित वेदों का युग के आदि में महर्षियों के द्वारा श्राविर्भाव हुआ करता है । दूसरे शब्दों में मन्वन्तर के आदि में वेदसम्प्रदायप्रवत्त के ऋषियों के द्वारा युगान्त में अन्तर्हित वेद प्रादुर्भूत होता रहता है । इसप्रकार वेद का यह उद्धारक्रम निरन्तर ( अनादिकाल से ) चला श्रारहा है । ऐसी स्थिति में वेद के नित्यसिद्ध, किंवा कूटस्थ नित्य न होने पर भी हम इसे ' प्रवाहनित्य ' अवश्य ही मान सकते हैं । श्राप्तप्रामाण्य के कारण वेद में प्रामाण्य मानना पड़ता है । लौकिक दृष्टार्थों के सम्बन्ध में भी यही व्यवस्था है । अर्थात् उन के शब्दोपदेश को भी प्राप्तबुद्धया ही प्रमाण माना जाता है । साक्षात्-कृतधर्म्मा पुरुष ही प्राप्त कहलाता है । श्राप्तोपदेशभूत दृष्टार्थस्वरूप आयुर्वेद के द्वारा अदृष्ट अर्थ का प्रतिपादन करने वाले वेदों की प्रामाणिकता में भी वही हेतु है । क्योंकि श्राप्तभाव दोनों के लिए समान है । अपिच दोनों के ( श्रायुर्वेद और वेद के ) प्रवक्ता द्रष्टा हैं । साक्षात्कार करने वाले ही द्रष्टा कहलाते है । श्रायुर्वेदादि के प्रवक्ता - द्रष्टा पुरुष हैं, इसलिए वह प्रामाणिक है, इसी आधार पर द्रष्टा के प्रवचनरूप वेद की प्रामाणिकता में भी सन्देह नहीं किया जासकता । निष्कर्ष यही हुआ कि, ब्रह्मा अश्विनीकुमार भारद्वाजादि जो महर्षि श्रायुर्वेदादि के प्रवक्ता हैं, वे ही वेद के प्रवक्ता हैं । ऐसी स्थिति में ब्रह्मादि के उपदेशभूत आयुर्वेदादि यदि प्रमाण हैं, तो उन्हीं ब्रह्मादि महर्षियों से कहे गए वेद की प्रामाणिकता में भी कोई सन्देह नहीं रह जाता । हाँ इस सम्बन्ध में यह नहीं भूल जाना चाहिए कि, शब्दराशि को प्रमाण माना जाता है । ' शब्द नित्य है, इसलिए वह प्रमाण है ' इस भ्रम में कदापि नहीं पड़ना चाहिए । क्योंकि शब्द ( न्यायमतानुसार ) सर्वथा अनित्य है ॥ ४ ॥ ५-६ – स्पष्ट हैं ।
तथाकथित प्राचीनन्यायमत के अवान्तर पाँच विभाग होजाते हैं । इनका भी अन्न संक्षेप से दिग्दर्शन करा दिया जाता है । ४५
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प्राचीन न्यायदर्शन प्रथमखण्ड १-२ मत १-- ईश्वरावतार ब्रह्माने वेद का निर्माण किया है । ( २१ मत ) ब्रह्मा ईश्वर के अवतार थे 1 । इन्होंनें हीं सर्वप्रथम वेदों को उत्पन्न किया है । निर्गुणसगुणभेद से ब्रह्म के दो विवर्त्त हैं । इनमें दूसरा सगुणब्रह्म निराकार - साकार भेद से दो भावों में परिणत है होरहा । ये तीनों है । इनमें से दूसरा साकार ब्रह्म परमात्मा, अन्तरात्मा, शरीरात्मा, भेद से तीन भागों में विभक्त, ये तीन हीं आत्मा पुनः तीन तीन भागों में विभक्त हो रहे हैं । परमात्मा के सर्वज्ञ, हिरण्यगर्भ, विराट् भूतात्मा, ये तीन विवत हैं । एवमेव शरीरात्मा के विवर्त्त ' हैं । अन्तरात्मा के जीवात्मा, क्षेत्रज्ञात्मा वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ, मेद से तीन विबत ' हैं अथवा प्रकारान्तर से देखिए । ईश्वरतत्त्व निर्गुण - सगुण भेद से दो भागों में विभक्त है । इनमें दूसरा सगुणेश्वर धर्मोपहित, धर्म्मविशिष्ट भेद से दो भागों में विभक्त है । इनमें दूसरा धर्म्मवशिष्ट तीन ईश्वरात्मा, जीवात्मा, शिपिविष्टात्मा, भेद से तीन भागों में विभक्त है । ये तीनों हीं आत्मविवर्त्त ' पुनः के तीन भागों में विभक्त हैं । ईश्वरात्मा के सर्वज्ञ, हिरण्यगर्भ, विराट् ये तीन वित्त ' हैं । जीवात्मा , सुमर-क्षेत्रज्ञात्मा, महानात्मा, भूतात्मा ये तीन विवत हैं । एवं शिपिविष्टात्मा के असंज्ञ, अन्तः है संज्ञ । भ्रूणादिरूप ससंज्ञ भेद से तीन विवर्त्ती ' हैं । इन सब श्रात्मविवत्तों की समष्टि ही ईश्वरप्रपञ्च में से जो उक्त ब्रह्म -- विवर्त्ती में से धर्म्मविशिष्ट ब्रह्म के अवयवभूत ईश्वरात्मा के तीन अवयवों मध्य का ' हिरण्यगर्भ ' नामक विवत्त ' है, उसे ही हम ईश्वरावतार ब्रह्मा, किंवा प्रजापति कहेंगे । इसी ईश्वरावतार, प्रजासृष्टिविधाता धाता ने वेदों का निर्माण किया है । इस मत के समर्थक निम्न लिखित श्रुति-स्मृति वचन हैं--१- हिरण्यगर्भः समवत ताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ २ - अध्यक्षं सर्वभूतानां धातारमकरोत् स्वयम् । ( यजुः सं ० ) । वेदविद्याविधातारं ब्रह्माणममितं द्य तिम् ( महाभारत - शान्तिप ० २०७० ) १ - ईश्वरावतार मत्स्यभगवान् ने वेद बनाया है । ( २२ मत ) । कितने हीं विद्वानों के मतानुसार यह वेद ईश्वरावतार ' मत्स्य ' भगवान् की वाणी है । मत्स्यावतार ही वेद के आदि प्रवत'क हैं, जैसा कि आगे की पङिक्तयों से स्पष्ट होजाता है— १ – सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए । ये ही सम्पूर्ण भूत - भौतिक प्रपञ्च के अधिपति थे । इन्होंने हीं पृथिवी और इस द्युलोक को धारण किया । हम इनसे अतिरिक्त और किस देवता के लिए हवि का विधान कर सकते हैं । २ - ईश्वर ने ( अपने अवतारभूत हिरण्यगर्भ नामक ) धाता [ ब्रह्मा ] को ही सम्पूर्ण भूतों का थे । अध्यक्ष बनाया T । वे ब्रह्मा वेदविद्या के प्रवर्तक थे, एवं महातेजस्वी ४६
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प्राचीन न्यायदर्शन उपनिषद्भूमिका द्वितीयमत * " ननु शरीरात् कथं वेद -- घटादि शब्दव्यवहारसम्प्रदायः । उच्यते - सर्गादावदृष्टो-पगृहीतभृतभेदात् -- मीनशरीरोत्पत्तावदृष्टवदात्मसंयोगाददृष्टसह कृतप्रयत्नवदीश्वरसंयोगाद्वा सकलवेदार्थगोचरज्ञानात् - विवक्षासहितान्मीन कलेवरकण्ठताल्वादिक्रियाजन्यसंयोगाद् वेदो-त्पत्तिः । एवं कुलालादिशरीरावच्छेदेन दृष्टसहकृत प्रयत्नवदीश्वरसंयोगात् तद् बुद्धीच्छा--सहितचेष्टोत्पत्तौ सकलघटानुकूलव्यापारो घटोत्पत्तिः । एवं प्रयोज्यप्रयोजकज्ञानाय व्यापाराभिमतशरीरावच्छेदनापि श्रदृष्टसहकृतेश्वरज्ञानेच्छा प्रयत्नादेव व्यवहारः । ततस्तत् सुशीलो बालो व्युत्पद्यते 1 । सोऽयं भूतावेशन्यायः । यत्त यथा लिप्यादिना मौनिश्लोकोऽनुमानाय पठ्यते, तथा सर्गान्तरोत्पन्नतत्व-ज्ञानवता भोगार्थ सर्गादावुत्पन्न ेन मन्वादिना सर्वज्ञेन ईश्वराभिप्रायस्थवेदः साक्षात्कृत्या-नूद्यते । ततोऽग्रिमसम्प्रदायः । स एव कायव्यूहं कृत्वा वाग्व्यवहारं करोतीति मतम् । तन्न । प्रतिसर्गाद्यनन्तकल्पनायां गौरवात् । तेषामेत्र क्षित्यादिकर्तृत्वसंभवं न- ईश्वरानु-गमाच्च ' ( तत्त्वचिन्तामणि ) * " अयं घट ', ' श्रयं वेदः " इत्यादि शब्दव्यवहारसम्प्रदाय कण्ठताल्वादि - जन्य श्रमिघातरूप शरीरव्यापार की अपेक्षा रखते हैं । ईश्वर शरीरव्यापाररहित है । फिर यह शब्दव्यवहारसम्प्रदाय किससे, कब-चला?, यह प्रश्न उपस्थित होता है । इस प्रश्न का समाधान करते हुए ' चिन्तामणि ' कार कहते हैं- ' सृष्टि के आरम्भ में अदृष्ट के बल से उपगृहीत भूतभेद से मीनशरीर की उत्पत्ति हुई है एवं दृष्टवत् आत्मसंयोग से, किंवा दृष्ट से युक्त प्रयत्न के समान ईश्वरेच्छा के संयोग से ( मीनशरीर में ) सम्पूर्ण वेदार्थों के देखने का ज्ञान प्राप्त होजाने से तत्तद्विवक्षाओं से युक्त मीनशरीर के कण्ठताल्वादि के अभिघात से उत्पन्न तत्तद्संयोग-विशेषों से ही वेदशब्द, किंवा शब्दात्मक वेद उत्पन्न हुआ है, यह मान लेने पर शरीरव्यापारसापेक्ष शब्दसम्प्रदाय की सिद्धि होजाती है । इसीप्रकार कुलालादि शरीर से युक्त, उसी श्रदृष्ट से युक्त प्रयत्न से ईश्वरसंयोग के द्वारा ईश्वरसंयोगयुक्ता बुद्धि एवं इच्छायुक्त चेष्टा के प्रादुर्भूत होने से सम्पूर्ण घटों के व्यापार के उदय से घटोत्पत्ति, एवं घटशब्दोत्पत्ति हुई है । इसप्रकार प्रयोज्य प्रयोजक के परिज्ञान के लिए व्यापाराभिमत शरीरसत्ता स्वीकार कर लेने पर भी, दूसरे शब्दों में शरीर का सहयोग मान लेने पर भी अदृष्टसहकृत ईश्वरज्ञान से उद्भूत इच्छा के प्रयास का सहयोग अवश्य ही मानना पड़ता है । अर्थात् ईश्वरेच्छा से ही मीनने स्वशरीरव्यापार से वेदसम्प्रदाय प्रवृत्त किया है, एवं ईश्वरेच्छा से ही कुलालादि घटसम्प्रदायप्रवृत्ति के हेतु बनते हैं । उसी ईश्वरेच्छा से एक कम ऊमर वाला बालक " काका - मामा - बावा " इसप्रकार बोलने लगता है । यही “ भूतावेशन्याय ” है । अर्थात् जिसप्रकार एक भूत ( प्रेतात्मा ) जैसे परकाय में प्रवेशकर बोलने लगता है, एवमेव ईश्वरेच्छा ही तत्तत् - शरीरों में प्रविष्ट होकर तत्तत् कार्यकलापप्रवृत्ति का कारण बनती है । इस सम्बन्ध में पूर्वपक्षी कहता है— ४७
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प्राचीन न्यायदर्शन प्रथमखण्ड तृतीयमत ३ - ईश्वरावतार अग्नि- वायु - सूर्य्य - नामक देवताओंनें वेद बनाया है । ( २३ मत ) ऋक् - यजुः साम नाम से प्रसिद्ध तीनों वेद क्रमशः अग्नि, वायु, सूर्य्य नामक तीन श्रभिमानी-देवताओं से उत्पन्न हुए हैं । " अभिमानीव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् " ( शा ० सूत्र ० ) के अनुसार संसार में सूर्य्य - चन्द्र- पृथिवी - अग्नि - वायु - वरुण आदि जितने भी जड़ पदार्थ हैं, उन सब का ( प्रत्येक का ) एक एक अभिमानि देवता * होता है । ये देवता पुरुष के समान ही शरीरधारी चेतनजीव हैं । पुरुष में जहाँ ११ इन्द्रियाँ है, वहाँ इन देवताओं में अष्टसिद्धि, नवतुष्टि इन १७ सिद्धितुष्टियों के समावेश से २८ इन्द्रियाँ हैं । ये देवता अपने ऐश्वर्य के प्रभाव से तीनों लोकों में यथेच्छ यातायात करने में समर्थ हैं ।
ऊर्ध्वं सत्वविशालस्तमोविशालस्तु मूलतः सर्गः ।
मध्ये रजोविशालो ब्रह्मादिस्तम्वपर्य्यन्तः ॥
( सां ० कारिका ) उक्त सांख्यसिद्धान्त के अनुसार भूतसर्ग सत्वविशाल, रजोविशाल, तमोविशाल भेद से तीन भागों में विभक्त है । इन में तमोविशालसर्ग श्रप्यजीव हैं, रजोविशालसर्ग वायव्यजीव हैं, एवं सत्वविशाल सर्ग सौम्यजीव हैं । ये तीनों क्रमशः १-५-८ इस क्रम से विभक्त हैं । यही सांख्योक्त १४ प्रकार का भूतसर्ग है । इन में सत्वविशाल सौम्यजीव यक्ष - राक्षस पिशाच गन्धर्व - ऐन्द्र- पैत्र्य - प्राजापत्य - ब्राह्म भेद से आठभागों में विभक्त है । ये आठों ही अपात् ( चरणरहित ) जीव हैं । ये चान्द्रमण्डल ( चन्द्रिका ) में हीं २ C जिसप्रकार लिपि के आधार पर एक व्यक्ति लिपिमय श्लोकों का अनुमान करता हुआ ( अन्दाजा में ) उत्पन्न तत्त्वज्ञान से भोग युक्त लगाता हुआ ) चुपचाप पढ़ लेता है, इसी प्रकार दूसरे सर्ग में ( पूर्वसर्ग के लिए सर्गादि में उत्पन्न मनु श्रादि सर्वज्ञ महानुभाव ईश्वराभिप्रायस्थ वेद का साक्षात्कार करके उसका अनुवाद किया करते हैं । तात्पर्य यह हुआ कि ईश्वर एकप्रकार का पत्र है । उसका वेदतत्त्वात्मक अभिप्राय ही वेदलिपि है । इस वेदलिपि को मौनवृत्ति से ईश्वरप्रेरणा से मन्वादि ने देखा । देखकर शब्द के द्वारा प्रकट किया । इस क्रम से वेदसम्प्रदाय आगे आगे चल पड़ा । मन्वादि राजर्षि, एवं वसिष्ठादि महर्षि उसी के तो शरीर हैं । जिसप्रकार एक योगी कायव्यूहप्रक्रिया से अनेक शरीर धारण कर कर्म्मभोग में समर्थ होजाता है, एवमेव वह ईश्वर कायव्यूहरूप मन्वादि अनेक शरीर धारण कर वेदवाक् का व्यवहार करता हुआ वेदसम्प्रदाय चलाता है ” । इस पूर्वपक्षी मत का खण्डन करते हुए मणिकार कहते हैं — ऐसी परिस्थिति में प्रतिसर्ग के आदि में अनेक सर्वज्ञों की कल्पना करने से गौरव होगा । साथ ही में वेदवत् उन्हीं का क्षित्यङ कुरादि का कर्तृत्व सम्भव होने से उन्हें ही ईश्वर मानना पड़ेगा । फलत: अनेक ईश्वर हो जायँगे । यह महा अनर्थं होगा । अतः वेद - घटादि - सम्प्रदायव्यवहार के सम्बन्ध में पूर्वोक्त सिद्धान्त ही स्वसिद्धान्त ( एकेश्वरवाद सिद्धान्त ) के अनुसार समीचीन है । * पुरुषविध, अपुरुषविध, मन्त्र, कर्म्म, अभिमानी, आत्म श्रादि भेद से देवता आठ प्रकार के होते हैं । इन सब का विशद वैज्ञानिक निरूपण " शतपथविज्ञानभाष्य " के प्रथमकाण्डानुगत प्रथमखण्ड में देखना चाहिए । ४८
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प्राचीन न्यायदर्शन उपनिषद्भूमिका तृतीयमत निवास करते हैं । इन आठों में से ५ वाँ ऐन्द्रसर्ग ही " इन्दः सर्वा देवता: " ( शत ० ब्रा ० ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार देवसर्ग है । देवता ३३ हैं । इन में अग्नि, वायु, सूर्य्य ये तीन देवता ही मुख्य, एवं श्रेष्ठ हैं । ये इन के वर्गनाम ( जातिनाम ) हैं । व्यक्तिविशेष से इन नामों का कोई सम्बन्ध नहीं है । अग्निजातीय, वायव्यजातीय, सूर्य्यजातीय, अनन्त श्रग्नि- वायु - सूर्य्यं देवता हैं । मनुष्यादि तिर्य्यक सर्गवत् इन का भी समय समय पर जन्म - मृत्यु हुआ करता है । जिसप्रकार अस्मदादि वायव्यजीव वायु के आधार पर, मत्स्य - मकरादि श्राप्यजीव पानी के आधार पर अपने चिदाभास को प्रतिष्ठित रखते हुए क्रमशः वायु एवं पानी के आधार पर श्वास प्रश्वास व्यापार में समर्थ होते हैं, एवमेव अष्टविध ये सौम्यदेवता सोम के आधार पर ही अपने चिदाभास एवं श्वास निःश्वास व्यापार को प्रतिष्ठित रखने में समर्थ होते हैं । यही ( सोम ही ) इनके जीवन का मूलाधार है । इन में जहाँ जन्मसे ही अणिमादि आठ सिद्धिए नौ तुष्टिए, रहती हैं, मनुष्य योगप्रक्रियाओं के द्वारा इन सिद्धि तुष्टियों को प्राप्त कर सकता है । जन्मसिद्ध इन सिद्धियों, एवं तुष्टियों के प्रभाव से ये देवता विशेषज्ञान, एवं विशेषशक्ति से युक्त हैं । इस ज्ञानोत्कर्ष एवं शक्त्युत्कर्ष से ही ये अस्मदादि की अपेक्षा विशेष ' भग ' सम्पत्ति से युक्त होते हुए ' ईश्वर के अवतार ' कहलाते हैं । हैं । हम जिन देवताओं की उपासना करते हैं, वे ये ही अभिमानी देवता है । जिसे सर्वसाधारण अग्नि कहते हैं, जिसमें कि अन्नादि का परिपाक होता है, वह ' भूताग्नि ' है । स्पर्शानुभूत वायु भौतिकवायु है । प्रत्यक्ष दृष्ट सूर्य्यपिण्ड भौतिकसूर्य्य ' है । प्रत्यक्षदृष्ट गंगातोय ' भौतिकजल ' है । हम इन भौतिक अग्नि-वायु- सूर्य्य - जलादि की उपासना नहीं करते । श्रपितु इन में रहने वाले प्राणात्मक अग्नि - वायु सूय्यं - गंगा-श्रादि श्रभिमानी - देवताओं की उपासना करते हैं । अस्तु यह सब विषय प्रकृत से असंबद्ध है । यहाँ हमें केवल अग्नि - वायु सूर्य्य इन तीन अभिमानी - देवताओं की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है । पूर्व के १८ वें मत में भौतिक अग्नि - वायु - सूर्य को वेदत्रयी का कर्त्ता बतलाया था, परन्तु प्रकृत मतानुसार इन तीनों के अभिमानी - देवता ही त्रयीवेद के उत्पादक हैं । जड़पदार्थ से कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होसकती । भौतिक देवता जड़ हैं, फलतः उन से वेदोत्पत्ति मानना असंगत है । चेतन, शरीरधारी अभिमानी इन तीनों प्राणात्मक देवताओं से ही वेद उत्पन्न हुए हैं । ईश्वर की विभूतिरूप, अतएव ईश्वरा-बतार अग्निनाम के जीवविशेष से ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद, एवं सूर्य्य से सामवेद उत्पन्न हुआ है । इस मत के आधारभूत निम्न लिखित श्रौतस्मार्च - वचन हैं—— १ – त्रयो वेदा असृज्यन्त - श्रग्नेऋग्वेदः, वायोर्यजुर्वेदः, श्रादित्यात् सामवेदः । -२ - अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । दुदोह यज्ञसिद्धयर्थमृग्यजुः सामलक्षणम् || ( मनु ० ) ( ऐ ० ब्र ० ) । १ - अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद, एवं श्रादित्य से सामवेद - इस क्रम से ईश्वरने तीनों देवताओं से तीन वेद उत्पन्न किए । २– यज्ञसिद्धि के लिए ईश्वर ने अग्नि वायु - रवि से ऋग्यजुः - सामलक्षण सनातन त्रयीब्रह्म का दोहन किया । ४६
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प्राचीन न्यायदर्शन प्रथमखण्ड चतुर्थमत १३ – प्रत्यक्षानुमानोपमा नागमेषु प्रमाणविशेषेषु अन्तिमो वेद इति चेन्न । मन्वा-दिस्मृतिष्वतिव्याप्तेः । समयवलेन सम्यकपरोक्षानुभवसाधनमित्येत-स्यागमलक्षणस्य तास्वपि सद्भावात् । अपौरुषेयत्वे सतीति विशे-पणाददोष इति चेन्न । वेदस्यापि परमेश्वरनिम्मितत्व ेन पौरुषेयत्वात् । शरीरधारिजीव पुरुषनिम्मितत्वाभावादपोरुयेयत्वमिति चेन्न । शरीरत्वात् । | कम् कर्मफलरूपशरीर-" सहस्रशीर्षा पुरुषः " इत्यादि श्रुतिभिरीश्वरस्यापि धारिजीवनिम्मितत्वाभावमात्रेणापौरुषेयत्वं ( वेदस्य ) विवचितमिति चेन्न । जीवविशेषैर-निवाय्यादित्यैर्वेदानामुत्पादितत्वात् । ' ऋग्वेद एवाग्नेरजायत, यजुर्वेदो वायोः, सामवेद आदित्यात् ( ऐ ० ब्रा ० ५ । ३२ । ) इति श्रुतेः । ईश्वरस्य अग्न्यादि - प्र रकत्वेन निर्मातृत्वं द्रष्टव्यम् " । ( श्रीसायणाचार्यविरचित - ऋग्वेदभाष्योपोद्घात ) ३. ४ - ईश्वरावतार सूर्य नामक देवताने वेद बनाए हैं । ( २४ मत ) जिसप्रकार सम्पूर्ण देवताओं में ( ३३ देवताओं में ) अग्नि वायु - सूर्य्य ये तीन अभिमानी - देवता श्रेष्ठ हैं, एवमेव इन तीनों में अभिमानी सूर्य्यदेवता को सर्वश्रेष्ठ माना गया है । द्युलोकस्थ भौतिकसूर्य्य अग्नि के श्रभिमानी - देवता सूर्यदेवता से ही मध्यमस्थानीय ( अन्तरिक्ष स्थानीय ) वायु एवं पृथिवीस्थानीय वेद आगम प्रमाण ३ - प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आगम ( शब्द ) इन चारों प्रमाणों में से इतर ( शब्दप्रमाण ) रूप है, यह भी नहीं कहा जासकता । वेद का यह लक्षण मानलेने पर मनुस्मृति श्रादि ग्रन्थों को भी वेद मानना पड़ेगा । क्योंकि यह भी शब्दप्रमाणकोटि में अन्तर्भूत है । ' समयबलानुसार की व्याप्ति सम्यग्रूप से परोक्षानुभव का साधक प्रमाण ही श्रागम प्रमाण है ' इस श्रागमलक्षण का साधक स्मार्त्तग्रन्थों में भी होरही है । यदि कहो कि, हम श्रागम का ' अपौरुषेय होता हुआ परोक्ष अनुभव वेद को परमेश्वर प्रमाण ही आगम है ', यह लक्षण करेंगे, तो इस से भी काम नहीं चल सकता । क्योंकि पुरुष का अर्थ पुरुषने बनाया है, इसलिए वेद पौरुषेय है । फलतः उक्तलक्षण श्रव्याप्त होजायगा । ' शरीरधारी जीवपुरुष ' मानलेने से भी काम नहीं चल सकता । कारण ' उसके हजार मस्तक जीवपुरुष हैं, हजार ' आंखें हैं ' इत्यादि श्रुतिए स्पष्ट ही ईश्वर को शरीरधारी बतला रही हैं । ' शरीरधारी जीवधारी से वेदों की के ग्रहण से भी लक्षणसमन्वय नहीं होसकता । क्योंकि ' जीवविशेष अग्नि वायु है - । सूर्य उत्पत्ति होती है ' । ईश्वर श्रग्न्यादि देवताओं को वेदनिर्माण के लिए प्रेरित करता -: *: - ----I I
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प्राचीन न्यायदर्शन उपनिषद्भूमिका पञ्चममत का जन्म हुआ है— * । इसप्रकार वायु, अग्नि के स्वरूपसमर्पक सूर्यदेवने हीं तीनों बेद ( ईश्वरेच्छा से ) उत्पन्न किए हैं । इत मत का समर्थक निम्नलिखित वचन है ---१ - तिस्रो वाच ईश्यति प्रवह्नितस्य धीतिं ब्रह्मणो मनीषाम् । गावो यन्ति गोपतिं पृच्छमानाः सोमं यन्ति मतयो वावशानाः ॥ वह्निरादित्यो भवति । स तिस्रो वाचः प्ररेयति - ऋचो, यजूंषि सामानि । ऋतस्यादित्यस्य कर्माणि ब्रह्मणो मतानि । एष एवैतत् सर्वमचरम् । 755 - या ० नि ० परिशिष्ट १४ ( नीला ) ४ ५ - ईश्वरावतार सर्वहुत यज्ञपुरुषने वेद बनाए हैं । ( २५ मत ) । यज्ञपदार्थ सूर्य्य - चन्द्र- पृथिवी आदि की भाँति श्रधिभौतिक जड़पदार्थ है । इस यज्ञ के अभिमानी देवता भगवान् विष्णु हैं, अतएव " यज्ञो वै विष्णुः " " विष्णुर्वै यज्ञः " इत्यादि रूप से दोनों को एक वस्तु मान लिया जाता है । यह विष्णुदेवता यजनीय, दूसरे शब्दों में पूजाई होने से भी " यज्ञ " नाम से व्यवहृत किए जाते हैं । यज्ञमूर्ति इह्रीं विष्णु भगवान् से सम्पूर्ण वेद उत्पन्न हुए हैं, जैसा कि आगे के मन्त्र से स्पष्ट है-* भवद् भूतं भविष्यच्च जङ्गमं स्थावरं च यत् । अस्यैके सूर्य्यमेवेदं प्रभवं प्रलयं विदुः ॥ १ ॥
कृत्वैष हि त्रिधात्मानमेषु लोकेषु तिष्ठति । देवान् यथायथं सर्वान्निवेश्य स्वेषु रश्मिषु ॥ २ ॥
दिव्यौ दिव्यप्रसूत्रौ द्वावग्नी मध्य ( म ) पार्थिवौ । ॥ ३ ॥
-- बृहद्देवता १ - वह वह्नि ( सावित्राग्निरूप आदित्य ) ॠत ( परमेष्ठी ) ब्रह्म की मनोमयी ( सोममयी ) विश्वधात्री ( विश्व को धारण करने वाली ) वाक् को ( श्राम्भृणीवाक् को ), एवं ऋग्यजुः सामात्मिका त्रयीवाक् को प्रेरित करता है । जिसप्रकार गोपति ( ग्वाले ) को ढूढती हुई गाएँ उसकी ओर अनुगत होजातीं हैं, एवमेव कामना-मयी बुद्धिरूपा सौररश्मिएं ( रश्मिरूपगाएं ) गोपतिस्थानीय ( पारमेष्ठ्य ) सोम की ओर अनुगत रहतीं हैं । वह्नि इस मन्त्र में आदित्य है । ऋक् यजुः सामरूप तीनों वाकूप्रपञ्चों को वह वह्निरूप आदित्य ही प्रेरित करता है ।........... + +++ । -५१
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प्रथमखण्ड प्राचीन न्यायदर्शन जज्ञिरे । ११- तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि किया है । १ - ( २१ ) - ईश्वरावतार ब्रह्मा ने वेद का निर्माण २– ( २२ ) — ईश्वरावतार मत्स्यभगवान् ने वेद बनाया है । ४- ( २४ ) – ईश्वरावतार सूर्य्य ने वेद बनाया है । ५- ( २५ ) -- ईश्वरावतार सर्वहुत- यज्ञपुरुष ने वेद बनाया है । इति - प्राचीनन्यायमतप्रदर्शनम् ( क ) कम ( ए ) III ( क ) ५२ मतसमष्टिः 15 , ) । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥ ( यजुः सं ० ३१ नहीं, अपितु ईश्वर के अवतार उक्त पांचों ही मतों का - " वेद का मुख्य है कर्त्ता , अनित्य स्वयं है ईश्वर , प्रवाहनित्य है " इस प्राचीनन्यायम हैं । अवतारकृत शब्दराशिरूप यह वेद पौरुषेय मतों का उक्त प्राचीन न्यायमत में अन्तर्भाव माना है । का समावेश है । इसी आधार पर हमने इन पांचों ) ३ - वेद ईश्वरावतारकृत हैं, पौरुषेय हैं, प्रवाहनित्य हैं 1 | ( प्राचीनन्यामत है । ३ - ( २३ ) - ईश्वरावतार श्रग्निवायु - सूर्य्य ने वेदत्रयी बनाई हुए हैं । १ – उस सर्वहुत नाम के यज्ञपुरुष से ऋक्, साम, छन्दः, और यजुः उत्पन्न
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1 ) --शीनर