Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 371–380

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 371 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीः इति - पञ्च- ( ५ ) - अवान्तरमतयुक्तं प्राचीनन्यायाभिमत- मतप्रदर्शनम् ३

पृष्ठ 372

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 372 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीः इति - सप्त - ( ७ ) - अवान्तरमतयुक्तं प्राधानिकाभिमत- मतप्रदर्शनम् ४

पृष्ठ 373

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 373 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

III

पृष्ठ 374

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 374 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

के इति - सप्त - ( ७ ) - अवान्तरतमयुक्तं विप्राधानिकामिमत- मतप्रदर्शनम् सांख्यदर्शनानुगत - दृष्टिकोण-४ अब क्रमप्राप्त सांख्यमत का विचार कीजिए । “ प्रधाना " नाम से प्रसिद्धा प्रकृति के आधार पर प्रतिष्ठित यह दर्शन " प्राधानिकदर्शन " नाम से प्रसिद्ध है । इस के मतानुसार वेद श्रनित्य है, अपौरुषेय है । जिसप्रकार सूर्य्य, पृथिवी भाँति चन्द्रमा, वृक्षाङ्क र पर्वत श्रादि प्राकृतिक पदार्थ अपने आप समय पर उत्पन्न होजाते हैं, उसीप्रकार ( प्राकृतिक नियमों के अनुसार ) वेद भी समय समय पर अपने श्राप उत्पन्न हुआ करते हैं । प्राकृतिक पदार्थों की भाँति वेद भी प्रावाहिक है, उत्पत्ति - विनाशशाली है, अतएव हम इसे सर्वथा अनित्य ही कहेंगे । समय समय पर उत्पन्न होने वाले, एवं समय समय पर नष्ट होने वाले वेद कभी नित्यसिद्ध नहीं माने जासकते । वेदों की नित्यता प्रकृतिसिद्ध है, परन्तु साथ ही में इम इस के बनाने वाले किसी पुरुषविशेष को नहीं पाते, अतः कहेंगे हम इसे अपौरुषेय ही निम्नलिखित प्राधानिक सूत्र उक्त मत का ही समर्थन कर रहे हैं -- " न नित्यत्वं वेदानां कार्यच्च श्रुतेः " ( सां ० ५।४५ । ) । - " न पौरुषेयत्वं, तत् कर्त्त: पुरुषस्याभावात् " ( ५ । ४६ । ) । -'मुक्तामुक्तयोरयोग्यच्चात् ” ( ५ । ४७ ) । ४ – “ नापौरुषेयत्वान्नित्यत्वं श्रङ्करादिवत् " ( ५ । ४८ ] ) । ५ – " तेषामपि तद्योगे दृष्टबाधादि - प्रसक्तिः " ( ५।४६१ ) । १६ – ' यस्मिन्नदृष्ट ेऽपि कृतबुद्धिरुपजायते- तत्पौरुषेयम् ” ( ५।५० । ) । 53 " स तपोऽतप्यत, तस्मात् तपस्तेपानात् त्रयो वेदा श्रजायन्त " [ प्रजापतिने तप किया । इस तप से तीन वेद उत्पन्न हुए ] इत्यादि श्र तियोंनें स्पष्ट शब्दों में वेद की कार्य्यता ही सिद्ध की है । वेद सूर्य्यचन्द्रादिवत् उत्पन्न होने वाला कार्य्यविशेष है । कार्य्यं श्रव्यक्त व्यक्त - श्रव्यक्तभावापन्न होने से सर्वथा अनित्य है । ऐसी दशा में कार्यरूप इन वेदों को हम अवश्य ही अनित्य मान सकते हैं ॥। १ ॥ इतर कायों की भाँति कार्य्यकोटि में प्रविष्ट होते हुए वेद यदि अनित्य हैं, तो क्या इन्हें पौरुषेय माना जासकता है?, इस प्रश्न का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि, वेद पौरुषेय नहीं है । कारण, इसके ५७

पृष्ठ 375

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 375 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सांख्यदर्शन प्रथमखण्ड दृष्टिकोण निर्माता पुरुष का हम सर्वथा अभाव पाते हैं । सांख्यशास्त्र प्राधानिकशास्त्र है । वह ईश्वर नाम के पुरुष-विशेष की सत्ता अवश्य मानता है, परन्तु उसका विश्व से वह कोई सन्बन्ध नहीं मानता । प्रकृति की व्यक्ता-वस्था ही सांख्यमतानुसार सर्ग है, व्यक्त की अव्यक्तावस्था ही प्रलय है । इसी प्रकृति के कारण उक्त दर्शन “ प्राधानिक ” नाम से भी प्रसिद्ध है । ईश्वरपुरुष कार्यकारणातीत बनता हुआा सर्वथा निर्लेप है । इसी का किसी से भी कुछ अभिप्रायसे - - ' “ ईश्वरासिद्ध: " ( सा ० सू ० ) यह कहा गया है । जब ईश्वरपुरुष सम्बन्ध नहीं, तो ऐसी दशा में हम उसे वेद का कर्त्ता क्योंकर मान सकते हैं । फलतः इन अनित्य, किंवा प्रवाहनित्य प्राकृतिक वेदों का अपौरुषेयत्व सिद्ध होजाता है ॥ २ ॥

ईश्वरपुरुष कर्त्ता न सही, सुप्रसिद्ध पुरुष ( महर्षि श्रादि ) को ही क्यों न वेद का कर्त्ता मान लिया जाय?, इस विप्रतिपत्ति का निराकरण करते हुए आगे जाकर सूत्रकार कहते है कि, संसार में ' मुक्त ' ' श्रमुक्त तथापि ' मेद से पुरुषवर्ग दो भागों में विभक्त है । मुक्तात्मा पुरुष यद्यपि सर्वज्ञ होने से वेदरचना में समर्थ है, सर्वथा असंग होने से ईश्वरपुरुषकोटि में आता हुआ यह वेदनिर्माण की इच्छा से कोई सम्बन्ध नहीं प्रमुक्त रखता दोनों । इधर अमुक्तात्मा सर्वज्ञ, अतएव भ्रान्त बनता हुआ । वेदरचना में अयोग्य है । इसप्रकार मुक्त । फलतः ही पुरुषवर्ग वेदरचना के सम्बन्ध में असंग सर्वज्ञ क्रमशः इन दोनों कारणों से अयोग्य ठहर जाते हैं वेदों का अपौरुषेयत्त्व अतुरण बना रह जाता है ॥ ३ ॥

यदि वेद को अपौरुषेय माना जायेगा, तो इसे नित्य भी मानना पड़ेगा १, इस आपत्ति का निराकरण करते. आचार्य कहते हैं कि यह कोई नियम नहीं है कि जो अपौरुषेय हो, वह नित्य ही हो । श्रङ्कर, हुए लता, वृक्ष आदि का कोई कर्त्ता नहीं है । ये अपने आप प्रकृति से उत्पन्न होनेवाले अपौरुषेय पदार्थ हैं ।

फिर भी ये अनित्य हैं । तथैव अपौरुषेय वेद भी अनित्य ही है ॥ ४ ॥

देता । वह " क्षित्यङ्करादि का कर्त्ता तो कोई अवश्य, परन्तु वह हमें अङ्क चर्मचक्षु रादि श्रनित्य से दिखलाई हैं । ऐसी नहीं स्थिति में वेद हमारे लिए अदृश्य है । श्रदृश्यपुरुष से उत्पन्न, अतएव पौरुषेय यदि कोई यह आक्षेप करै, तो की अनित्यता में श्राप अङ्क ुरादि दृष्टान्त को उपस्थित नहीं कर सकते " तो १, ' दृष्टवावदोष ' उपस्थित होगा । इस का समाधान यही है कि, यदि श्रङ्कर रादि का कोई कर्त्ता माना जायगा, हैं " यह व्याप्ति है । ऐसी अवस्था " जो जो पौरुषेय ( पुरुष से उत्पन्न ) हैं, वे वे शरीरजन्य में यदि अङ्करादि पौरुषेय होते, तो उनका कर्त्ता कोई शरीरी अवश्य हैं ॥ ही ५ ॥ उपलब्ध नहीं होता, अतः हम वेदवत् अङ्करादि को अपौरुषेय ही मान सकते | परन्तु उपलब्ध ( श्रुति-वादी पुनः प्रश्नाक्षेप करता है कि, " श्रादिपुरुष के मुख से वेद निकले अवश्य हैं, ही यह पौरुषेय सर्वसम्मत कह सकते हैं " सम्मत ) पक्ष है । ऐसी स्थिति में पुरुषनिःश्वासरूप इन वेदों को हम पुरुषोश्चरितमात्रत्वं पौरुषेय-इस आक्षेप का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि, पौरुषेयत्व का - ' पौरुषेय नहीं माना जासकता । त्वम् " यह लक्षण नहीं है । पुरुष के मुख से निकला है, जीवात्मा इसीलिए ) इसे सर्वथा निर्व्यापार है । उस अवस्था में इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, सुषुषुप्तिकाल में पुरुष ( सर्वथा अपौरुषेय हैं । इन्हें कोई पौरुषेय नहीं श्वास - प्रश्वास अविकल रूप से निकलते रहते हैं । ये व्यापार अमुक्त व्यक्ति के द्वारा बड़ी बुद्धि-कहता । वस्तुतः पौरुषेय का " जिस पदार्थ के देखते ही ' यह पदार्थ ५८

पृष्ठ 376

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 376 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सांख्यदर्शन उपनिषद्भूमिका प्रथममत मानी से बनाया गया है " -- यह भाव उत्पन्न होजाय, वही पौरुषेय है " यह लक्षण है । वेद श्रबुद्धि-पूर्वक है । घटपटादि पदार्थ ही कृतबुद्धिविषयक बनते हुए पौरुषेय हैं । वेद तो श्रादिपुरुष के मुख से बिना प्रयास के अपने आप ही निःश्वासवत् किकला हुआ है । ऐसी स्थिति में इसे कथमपि पौरुषेय नहीं कहा जासकता ॥ ६ ॥

इस मत के अनुसार वेदों का ईश्वर के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । वेद प्राकृतिक तत्व है । इसी सांख्यमत के आधार पर सात अवान्तर मत और होजाते हैं । संक्षेप से इनका भी अत्र दिग्दर्शन करा दिया जाता है । १- प्रकृतिसिद्ध अग्नि वायु - सूर्य्य, इन तीनों भौतिक पदार्थों से तीनों वेद अभिन्न हैं । ( २६ मत ) नव्यन्यायमतानुसार अग्नि वायु - सूर्य्य इन तीनों भौतिक पदार्थों से क्रमशः तीनों वेदों की उत्पत्ति बतलाई गई थी ( देखिए नव्य - न्या ० ५ मत ), एवं प्राचीनन्यायमतानुसार ईश्वरावतार इन तीनों के अभिमानी - देवताओं से क्रमशः तीनों वेदों की उत्पति बतलाई गई थी ( देखिए प्रा ० न्या ० म ० ३ मत ) । इन दोनों मतों से सर्वथा विलक्षण एक मत यह भी है कि, न इन भौतिक अग्न्यादि पदार्थों से वेद उत्पन्न हुए, एवं न इन के अभिमानी - देवताओं से वेद उत्पन्न हुए । श्रपितु इन तीनों भौतिक पदार्थों का ही नाम वेद है । दूसरे शब्दों में इनमें और वेदों में जन्यजनकभाव सम्बन्ध नहीं है, अपितु दोनों में अभिन्नता है । अग्नि ही ऋग्वेद है । हंस नाम से प्रसिद्ध वायु ही यजुर्वेद है । आदित्य ही सामवेद है । कारण स्पष्ट है । जब हम तीनों वेदों को उठाकर देखते हैं, तो उनमें क्रमशः हमें ऋग्वेद में विभूतियुक्त अग्नि का, यजुर्वेद में विभूतियुक्त वायु का, एवं सामवेद में विभूतियुक्त सामवेद का ही निरूपण मिलता है । जिसप्रकार प्रकृतिसिद्ध व्याकरणादि विद्याओं के प्रतिपादक शास्त्र व्याकरणादि शब्दों से व्यवहृत होते हैं, एवमेव अग्नि वायु - सूर्यरूप तीनों वेदों के प्रतिपादक वेदग्रन्थ भी इन्हीं शब्दों से व्यवहृत देखे जाते हैं । अथर्ववेद ने स्पष्टशब्दों में वेद, एवं देवताओं का अभेद बतलाते हुए इसी मत का समर्थन किया है, जैसा कि निम्न-लिखित वचन से स्पष्ट होनाता है -ह

१ - येर्वाङ मध्य उत वा पुराणे वेदं विद्वांसमभितो वदन्ति ।

आदित्यमेव ते परिवदन्ति सर्वे अग्नि द्वितीयं त्रिवृतं च हंसम् ॥

१ -- अथर्वसं ० १०/८/१७ | १ - जो ( अल्पज्ञ ) मनुष्य प्रथम ( अर्वाक ) कोटि के ऋग्वेद के विद्वान् के सम्बन्ध में, मध्यम कोटि के यजुर्वेद के विद्वान् के विषय में, एवं तृतीय ( पुराण ) कोटि के सामवेद के विद्वान् के सम्बन्ध निन्दापरक वचनों का प्रयोग करते हैं, दूसरे शब्दों में जो हृतधी वेदवेत्ता विद्वान् की अवहेलना करते हैं, में वे आदित्य, अग्नि, वायु की ही निन्दा करते हैं । श्रुति का अभिप्राय यही है कि, ऋक् यजुः साम विद्वान् श्रग्नि वायु - सूर्य्यमूर्ति है । श्रुति का उक्त कथन तभी सुसङ्गत होसकता है, जब कि का ज्ञाता अभिन्न मान लिया जाय । वेदों को देवताओं से ५६

पृष्ठ 377

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 377 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सांख्यदर्शन प्रथमखण्ड द्वितीयमत २ - प्रकृतिसिद्ध भौतिक सूर्य तीनों वेदों से अभिन्न है । ( २७ मत ) नव्यन्यायानुसार भौतिक सूर्य्य से तीनों वेद उत्पन्न हुए हैं ( देखिए नव्यन्याय ० ६ मत ) । प्राचीन-न्यायानुसार ईश्वरावतार श्रभिमानी सूर्य से तीनों वेद उत्पन्न हुए हैं ( दे ० प्रा ० न्या ० ४ मत ) । परन्तु प्रकृत मतानुसार भौतिक प्राकृतिक सूर्य्य, और तीनों प्राकृतिक वेद अभिन्न हैं । सूर्य्यं और वेदों का जन्य-जनकभाव सम्बन्ध नहीं है, अपितु सूर्य्यं ही साक्षात् वेद है । किंवा त्रयीवेद ही साक्षात् सूर्य्य है । जिसप्रकार ' आगमशास्त्र ' में प्रधानरूप से पृथिवी के पदार्थों का ही निरूपण हुआ है, एवमेव इस निगम ( वेद ) शास्त्र में प्रधानरूप से सौरपदार्थों का निरूपण हुआ है । अग्नि वायु - आदित्यादि सम्पूर्ण देवता सूर्य का ही विवत्त-वाद है -- " नून ं जनाः - सूर्येण प्रसृताः " । सौरब्रह्माण्डमय विश्व ( रोदसी लोक्य ) का त्रिज्ञानप्रति-पादक शस्त्र ही वेदशास्त्र है । इस मत का समर्थक निम्न लिखित श्रौतप्रमाण हमारे सामने आता है— १ - सैषा त्रयीविद्या तपति, य एष तपति । ( शत ० १० ५।३ । ) २- श्रादित्यो वा एष एतन्मण्डलम् । तत्र ता ऋचः, तदृचां मण्डलम् । स ऋचां लोकः । अथ य एष एतस्मिन् मण्डलेऽचिर्दीप्यते तानि सामानि । स साम्नां लोकः । अथ य एष एतस्मिन्मण्डलेऽचिर्षि पुरुषः, तानि यजूंषि । स यजुषां लोकः । सैषा व विद्यातपति, य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः । ( नारायणोपनिषत् ) ३ - यदेतन्मण्डलं तपति तन्महदुक्थम् । ता ऋचः । स ऋचां लोकः । श्रथ यदेतदचिर्दीप्यते तन्महाव्रतम् । तानि सामानि । स सान्मां लोकः । अथ य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः, सोऽग्निः । तानि यजूंषि । स यजुषां लोकः । सैषा त्रय्येव विद्या तपति, तद्ध तदविद्वांस श्राहु: -त्रयी वा एषा विद्या तपतीति । बाग- हैव तत् पश्यन्ती वदति । ( शत ० १०।५।४ ) । १ — वह यह त्रयीविद्या ही तप रही है, जो कि यह सूर्य तप रहा है । २- यह श्रादित्यरूप मण्डल तप रहा है । इस ( सौरमण्डल ) में जो ऋचाएँ हैं, वह ऋचाओं का मण्डल है । वह ऋचाओं का लोक है । जो कि इस मण्डल में अर्चि ( प्रकाश ) प्रदीप्त हो रही है, वे साम हैं । वह सामों का लोक है । एवं जो कि इस मण्डल में अर्चिर्भाग ( के केन्द्र ) में पुरुष है, वे यजु हैं । वह यजुओं का लोक है । इस नकार यह त्रयीविद्या ही तप रही है, जो कि इस श्रादित्य के केन्द्र में हिरण्मय-पुरुष ( तप रहा ) है । १३- जो कि यह मण्डल ( सूर्य्यबिम्ब ) तप रहा है, वह " महदुक्थ ', किंवा ' महोक्थ ' है । वे ऋचाएँ हैं । वह ऋचाओं लोक है । जो कि यह अर्चिमण्डल ( प्रकाशमडएल ) प्रदीप्त हो रहा है, वह महाव्रत है । वे साम हैं । वह सामों का लोक है । एवं जो कि इस मण्डल ( बिम्ब के केन्द्र ) में जो पुरुष है, वह अग्नि है । वे यजु हैं । वह यजुत्रों का लोक है । इसप्रकार यह त्रयीविद्या ही ( सूर्य्यरूप से ) तप रही है । ( उस युग के ) साधारण, शास्त्रानभिज्ञ मनुष्य भी इस सूर्य्यं के लिए ' अरे! यह त्रयीविद्या तप रही है, यह कहते थे । वे वाङमय सूर्य्य को, किंवा सूर्य्यरूपा ' पश्यन्ती ' नाम की वाक् को देखकर ही ऐसा कहते थे | अथवा सूर्य्यरूपा स्वयं पश्यन्ती वाक ही सर्वसाधारण को कहती है कि, देखो! मै त्रयीविद्यामयी हूँ । ६०

पृष्ठ 378

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 378 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सांख्यदर्शन " उपनिषद्भूमिका तृतीयमत ४- सा वा एषा वाक त्रेधा विहिता ऋचो, यजूंषि सामानि । ××× । साया सा वागमौ स आदित्यः । XXX । मण्डलमेवर्चः । अचिः सामानि । पुरुषो यजूंषि । ( शत ० १० ) । ३ - प्रकृतिसिद्ध अन्नीषोमात्मक भौतिक यज्ञ तीनों वेदों से अभिन्न है । ( २८ मत ) नव्यन्यायानुसार भौतिक यज्ञ से तीनों वेद उत्पन्न हुए हैं— ( दे ० न ० न्या ० ७ मत ) । प्राचीनन्याया-नुसार भौतिक यज्ञ के अभिमानी देवता, ईश्वरावतार यज्ञपुरुष से तीनों वेद उत्पन्न हुए हैं - ( दे ० प्रा ० न्या ॰ ५ मत ) | परन्तु प्रकृतमतानुसार वेद और भौतिकयज्ञ अभिन्न हैं । यज्ञ ही वेद है, वेद ही यज्ञ है 1 । दोनों में जन्य - जनकभाव सम्बन्ध नही है, अपितु प्रभेद - समम्बन्ध है । सम्पूर्ण वेद में यज्ञ ही का तो प्रतिपादन हुआ है । यज्ञ से अतिरिक्त वेद में और है क्या । हौत्र श्रद्गात्र आध्वर्य किंवा शस्त्र स्तोत्र ग्रह इन कम्मों की समष्टि का ही नाम यज्ञ है । ऋग्वेद से होता के द्वारा ऋङमय हौत्र, एवं शस्त्र कर्म होता है । यजुर्वेद से अध्ययु ' के द्वारा यजुर्मंय आध्वय्यैव, एवं ग्रहकर्म्म सम्पन्न होता है । सामवेद से उगदाता नाम के ऋत्विक् के द्वारा श्रद्गात्र, एवं स्तोत्रक संपन्न होते हैं । इसप्रकार तीनों वेद एकमात्र यज्ञकर्म का स्वरूप सम्पादन करते हुए वास्तव में यज्ञात्मक ही हैं । यही सिद्धान्त निम्न लिखित वचनों से प्रतिध्वनित हो रहा है-१ - ब्रह्म यज्ञः । २ - सैषा त्रयीविद्या यज्ञः । ( शत ० १ । १ । ४ । ३ ) । ३ - एतावान् नै सर्वो यज्ञो यावानेष वेदः । ( शत ० ५। ५६ । ) । ४ -- वाग्वा यज्ञः ( ऐ ० ब्रा ० ५।२४ । ) । ५ - वागविवृताश्च वेदाः ( मुण्डक ) । ४ - सो यह वाक् ऋक्, यजुः, साम भेद से तीन भागों में विभक्त है । मण्डल ही ऋचाएँ हैं । ि साम है । पुरुष यजु है । सो यह वाक् यही साक्षात् सूर्य्य है । १ — ब्रह्म [ वाङमयवेदब्रह्म ] ही यज्ञ है । २ -- ऋग्यजुः - सामात्मिका त्रयीविद्या यज्ञ है । ( * ) ३ — इतना हीं यह सम्पूर्ण यज्ञ है, जितना कि यह सम्पूर्ण वेद है । ४ - वाक् [ वेदमयीवाक् ] ही यज्ञ है । ५ - वाक का विवर्त्त भाव [ फैलाव ] ही वेद है । ६१

पृष्ठ 379

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 379 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सांख्यदर्शन प्रथमखण्ड चतुर्थ - पञ्चममत ४ – प्रकृतिसिद्ध कालचक्र से वेद उत्पन्न हुआ है । ( २६ मत ) प्रजापति से आरम्भकर स्थावरजङ्गमात्मक सम्पूर्ण विश्वचक्र एकमात्र ' कालचक्र ' की गति से ही उत्पन्न हुआ । है । सब का प्रभव - प्रतिष्ठा -परायण कालचक्र ही है । इसी प्राकृतिक कालचक्र के अनुसार वेद भी उत्पन्न हुआ है । इस मत के समर्थक निम्न लिखित वचन हैं—

१ - सप्तचक्रा वहति काल एप सप्तास्य नाभोरमृतत्वं न्वक्षः ।

सइमा विश्वा भुवनान्यर्वाक् कालः स ईयते प्रथमोनु देवः ॥ १ ॥

कालो ह सर्वस्येश्वरो यः पितासीत् प्रजापतेः ।

तेनेषितं तेन जातं तदु तस्मिन् प्रतिष्ठितम् ॥२ ॥

कालो ह ब्रह्म भूत्वा विभर्त्ति परमेष्ठिनम् ।

कालः प्रजा असृजत कालो अग्र प्रजापतिम् ॥ ३ ॥

कालो ह भव्यं भूतं च पुत्रो अजनयत् पुरा ।

कालाचः समभवन् यजुः कालादजायत ॥ ४ ॥

--अथर्वसंहितायाम् ५ – सृष्टि के आरम्भ में यह वेद प्रकृति के अनुसार स्वयं उत्पन्न हुआ है । [ ३० मत ] सृष्टि के आदिकाल में [ आरम्भ में ] वेद स्वयमेव प्रादुर्भूत हुए हैं । जिस वेदराशि में मनुष्यबुद्धि से सर्वथा परे की अलौकिक विद्याओं का निरूपण हुआ है, उस अलौकिक वेदशास्त्र का निर्माण मनुष्य करै, १ - यह ( सम्वत्सररूप ) कालचक्र सात चक्रों ( सात अहोरात्र वृक्षों ) का वहन करता है । इस कालचक्र ( रूप सम्वत्सर ) के ( सात अहोरात्रवृत्तों के कारण ) सात केन्द्र हैं । अमृतभावापन्न सूर्यकेन्द्र इस चक्र का अक्ष ( धुरा ) है । ऐसा यह कालचक्र इन सम्पूर्ण [ सात ] भुवनों को अपने अवाङ प्राण से [ मर्त्यप्राण से ] प्रेरित करता है । यह कालचक्र सब का आदिदेव है | १ | काल सबका ईश्वर है । स्वयम्भू प्रजापति का भी यह पिता ( उत्पादक ) है । इसी से सब कामनाओं का उदय हुआ है । इसी से कामनापूर्वक सबकुछ उत्पन्न हुआ है । उत्पन्न यह सम्पूर्ण प्रपञ्च इसी कालचक्र पर प्रतिष्ठित है । २। काल ही ब्रह्म ( स्वयम्भू ) बनकर परमेष्ठी को धारण करता है । काल ने प्रजा उत्पन्न की है । काल ने ही सर्वप्रथम प्रजापति को उत्पन्न किया है | ३ | कालने हीं भूत भविष्यत् का निर्माण किया है । कालने हीं सृष्टि के आरम्भ में वेदमन्त्र उत्पन्न किए हैं ।

काल से ही ऋचाएँ उत्पन्न हुई हैं । काल से ही यजु उत्पन्न हुआ है ॥ ४० ॥

[ विस्तार के लिए देखिए— ' दिग्देशकालस्वरूपमीमांसा ' नामक सहस्र- पृष्ठात्मक स्वतन्त्र- निबन्ध ] — ६२.

पृष्ठ 380

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 380 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सांख्यदर्शन उपनिषद्भूमिका पञ्चममत यह कथमपि सम्भव नहीं है । समुद्र पर्वतादि पदार्थों का निर्माण जैसे मनुष्यशक्ति के बाहिर की बात है, एव-' मेव प्राकृतिक, सत्यसंहित वेद भी असत्यसंहित मनुष्य की असत्यकृति से एकान्ततः बहिर्भू'त है । “ ईश्वरने वेदों को बनाया होगा " - यह कहना भी सुसङ्गत प्रतीत नहीं होता । कारण स्पष्ट है । पहिले तो ईश्वर की सत्ता मानना ही कठिन है - [ ईश्वरासिद्ध े : ० ] शब्दबल के आधार पर यथाकथंचित् यदि ईश्वर की सत्ता मान भी लीजाती है, तब भी उसे क्लेश - कर्म विपाक - आशयादि से सर्वथा असंस्पृष्ट ही मानना पड़ेगा । न उस में क्रिया है, एवं न प्रवृत्तियों के मूलकारण राग - द्वेष का ही उस में समावेश है । वह तो ( विशिष्टाद्वै तसम्प्रदाय के अनुसार ] नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध, नित्यमुक्त, निष्क्रिय, निरञ्जन, अनन्तकल्याणगुणाकर है । न वह विश्व का कर्त्ता माना जासकता, न उसे विश्वावयवभूत वेद का कर्त्ता कहा जासकता । विश्व के यच्चयावत् पदार्थ नित्य - प्रकृतिजात - पुरुषजात भेद, से तीन भागों में विभक्त हैं । आकाश - परमाणु आदि पदार्थ नित्यजात हैं । नित्यसिद्ध हैं । ये किसी से उत्पन्न नहीं हुए हैं, अपितु स्वयंसिद्ध है । सूर्य्य - चन्द्रमा - पृथिवी-ग्रह - नक्षत्रादि पदार्थ प्रकृतिजात हैं । इह्रौं ह्रीं प्राकृतिक कहा जाता है । एवं गृह - वस्त्र- पुस्तक - घट आदि पदार्थ पुरुषजात हैं । ये पदार्थ पौरुषेय कहलाते हैं । उक्त विभाग के अनुसार किसी ने वेदपदार्थ का नित्यसिद्ध पदार्थों में अन्तर्भाव माना है, किसी ने प्रकृतिजात में, एवं किसी ने पुरुषजात में इनका समावेश माना है । ये विभाग केवल व्यावहारिक हैं । यदि व्यापकदृष्टि से विचार किया जाता है, तो सर्वसाक्षी, निराकार, चिद्धन पुरुष ( ब्रह्म ), एवं तत्सम्बन्धिनी प्रकृति देवी के अतिरिक्त और कुछ भी नित्य नहीं है- " प्रकृति पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि ” । कोई पदार्थ क्षरण, किंवा त्रुटि कालपूर्व, एवं कोई परार्ध्यकालपूर्व उत्पन्न हुआ है । उत्पन्न सब हैं । इसी प्रकार पुरुषजात - विभाग का भी कोई मूल्य नहीं है । जिन पुरुषों ( मनुष्यों ) से गृह --वस्त्रादि पौरुषेय - पदार्थों का निर्माण माना जाता है, वे पुरुष भी प्रकृतिपरतन्त्र हैं । उनका जन्म, मृत्यु, स्वरूपसंघठन, स्वभाव, मनो-वृत्ति, कर्म्मसामर्थ्य, ज्ञानशक्ति, कहाँ तक गिनावें, स्वयं उनकी स्वरूपसत्ता की वागडोर भी प्रकृतिदेवी के हाथ में ही है- ' प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः कि करिष्यति ' । ऐसी अवस्था में हम कह सकते हैं कि, पुरुषधौरेय ( ईश्वर ) सर्वथा निर्लेप है । सबकुछ प्रपञ्च एकमात्र प्रकृतिसिद्ध ही है । इसी सर्वसम्मत, एवं सर्वानुभूत सामान्य सिद्धान्त के अनुसार सृष्टि के आदि में सूर्य्य - चन्द्रादि इतर प्राकृतिक पदार्थों की भाँति वेद भी प्रकृतिसिद्ध होते हुए स्वतः ही उत्पन्न हुए हैं । इसी मत का समर्थन करते हुऐ आप्तपुरुष कहते हैं— १ सैषा त्रयीविद्या प्रथमं जायते, यथैवादोऽमुत्राजायत - एवम् । ( शत ० २।३।२० ) । २ - गेदाः प्रमाणं लोकानां न व ेदः पृष्ठतः कृताः । ( म ० शा ० कपिलवाक्य ) । - * ----१ — यह त्रयीविद्या सर्वप्रथम उसी प्रकार उत्पन्न हुई है, जैसे कि पूर्वकाल में यह उत्पन्न हुई थी । २– वेद लोकों के सम्बन्ध में प्रमाणमात्र है । वेदों का निर्माण पीछे से नहीं हुआ है । श्रपितु ये प्रकृतिसिद्ध हैं । ६३