Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 551–560

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

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पृष्ठ 552

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कोश श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ७ ) - " वर्णवेदनिरुक्तिः ” - प्रकीर्ण भावापन्ना १८ वैश्य के वैश्यत्व जिस तत्व से सुरक्षित ब्राह्मण में रहने वाले ब्राह्मणत्त्व, क्षत्रिय के क्षत्रियत्त्व हैं, उसी , एवं तत्त्व को " वर्ण " कहा जाता है । प्रकृति के रहने से ब्राह्मणादि ब्राह्मणादि कहलाने के अधिकारी बनते के संचालक प्राणाग्नि- देवता ही से छन्दित प्रातः सवन साम्राज्य में विचरण करने वाले अष्टाक्षर - गायत्रीछन्द है । एवं यही श्राधिदैविक - संस्था का " ब्राह्मणवर्ण " " ब्रह्मतत्त्व " है, इसे ही, " ब्रह्मवीर्य्य " कहा जाता " इत्यादि वचन से स्पष्ट है । जिसकी उत्पत्ति इस है जैसा कि - " अग्ने! महाँ असि ब्राह्मण भारतेति से सम्बन्ध रखती है, वही मनुष्यों में जाया ब्राह्मण ब्रह्मवर्ण से युक्त माता - पिता के रजोवीर्य्यानुगत- दाम्पत्य कहलाता है । के सञ्चालक, प्राणेन्द्र -- देवता ही ' क्षत्रतत्त्व ' एकादशाक्षर - त्रिष्ट ुप्छन्द से छन्दित, माध्यन्दिनसवन - संस्था का ' क्षत्रियवर्ण ' है । जिस की उत्पत्ति है, इसे ही “ क्षत्रवीर्य्य ” कहा जाता है, एवं यही आधिदैविक ' क्षत्रिय ' कहलाता है । द्वादशाक्षर - जगतीछन्द से एतद्युक्त दाम्पत्यभाव से होती है, मनुष्यों में वही जात्या ' नामक देवताओं की समष्टि ही " विट्तत्त्व है, इसे ही छन्दित, सायंसवन के सञ्चालक, प्राणात्मक ' विश्वेदेव संस्था का " वैश्यवर्ण " है । जिस का जन्म इन विश्वदेवों को “ विडवीर्य्य " कहा जाता है, एवं यही आधिदैविक - मनुष्यों में " वैश्य " कहा जाता है । प्रकृति में तीन ही प्रधानता देने वाले शुक्र -शोणित से होता है, उसे ही में वर्ण तीन ही मुख्य हैं । श्रतएव चौथा शूद्रवर्णं देवता सछन्दस्क बनते हुए वीर्य्यरूप हैं । दूसरे शब्दों भी स्वछन्द है, स्वतन्त्र है, यथाजात है, वेदमर्थ्यादा से पार्थिव पूषाप्राण के सम्बन्ध से वर्ण कहलाता हुआ कर श्रति कहती है— छन्दोऽतीत है । इसी छन्दोविज्ञान को लक्ष्य में रख " गायत्र्या ब्राह्मणं निरवर्त्तयत्, त्रिष्टुभा राजन्यं, जगत्या वैश्यम् । न केन चिच्छन्दसा शूद्र ं निरवत्त यत् " ॥ शुक्र - शोणितरूप भूतों में वर्णतत्त्व प्राणदेवतारूप है, अतएव यह विशुद्ध ' सत्तासिद्ध नहीं ' कर पदार्थ सकते है । हाँ, तत्तद्वर्णोचित तत्तद्विशेष-रहने वाली इस वर्णत्रयी का हम अपनी किसी इन्द्रिय है से । भान परन्तु जिसप्रकार मनुष्य पशु - पक्षी इत्यादि उभय-ताओं के द्वारा अनुमान अवश्य ही लगाया जासकता की अपने चर्म्मचक्षुत्रों से प्रतीति करना चाहे, सिद्ध पदार्थों का हमें भान होता है, वैसे यदि कोई है । वर्णतत्त्व वर्णतत्त्व प्राणात्मक है, एवं प्राणतत्त्व रूप - रस - गन्धादि तो उसका यह प्रयास व्यर्थ होगा । कारण स्पष्ट सत्तासिद्ध पदार्थ का भान करने में समर्थ हैं, पञ्चतन्मात्राओं की मर्य्यादा से बहिर्भूत है । इधर है इन्द्रियाँ । यही कारण उसी है कि, ब्राह्मणादि वर्णों के परिचय के लिए जो सत्ताभाव तन्मात्रामूलक भूतों से वेष्टित रहते आधार पर श्राप विशुद्ध बाह्यदृष्टि से बाह्य आकार ब्राह्मणादि मनुष्यों में ऐसा कोई बाह्य चिह्न नहीं है, जिसके अतएव वर्णतत्त्व प्राणात्मक, अतएव विशुद्धसत्तात्मक के श्राधार पर ब्राह्मणादि वर्णों का विभाजन कर सकें । बनता हुआ केवल बुद्धिगम्य ही है । २३५

पृष्ठ 553

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बेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड वर्णवेदनिरुक्तिः ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य, तीनों वर्ण क्रमशः ज्ञानशक्ति - क्रियाशक्ति- अर्थशक्ति, इन तीन शक्तियों के प्रवर्तक माने गये हैं । उधर पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ, इन तीन लोकों के अग्नि वायु - इन्द्र, ये तीन प्रतिष्ठावा ( अधिष्ठाता ) देवता बतलाए गए हैं । पार्थिव अग्नि अर्थशक्ति के, आन्तरिक्ष्य वायु क्रियाशक्ति के, एवं द्युलो-कस्थ मघवेन्द्र ज्ञानशक्ति के प्रवतक हैं । साथ ही में अर्थशक्तिप्रधान अग्नि का ऋग्वेद से, क्रियाशक्तिप्रधान वायु का यजुर्वेद से, एवं ज्ञानशक्तिप्रधान इन्द्र का सामवेद से सम्बन्ध है । फलतः यही निष्कर्ष निकलता है कि, ज्ञानशक्तियुत ब्राह्मणवर्ण का विकास ज्ञानशक्तियुक्त इन्द्रानुगत सामवेद से हुआ है । क्रियाशक्तियुत क्षत्रियवर्ण की उत्पत्ति क्रियाशक्तियुत यजुर्वेद से हुई है । एवं अर्थशक्तियुत वैश्यवर्ण की प्रसूति अर्थशक्तियुत अग्न्यनुगत ॠग्वेद से हुई है । तत्त्वतः ब्राह्मणवर्ण सामवेदरूप है, क्षत्रियवर्ण यजुर्वेदरूप है, एवं वैश्यवर्णं ॠग्वेद-रूप है । ज्ञान - क्रियाभावों का उक्थ ' अर्थ ' ही माना गया है । अर्थ के आधार पर ही ज्ञान - कर्म्म पुष्पित, तथा पल्लवित होते हैं । इसौ उक्थभाव के कारण उक्थरूप वैश्य को " ऋग्वेद " कहना न्यायसङ्गत होता है । ज्ञान पर सम्पूर्ण कर्म्म - कलाप का अवसान है । ज्ञानोदय होने पर अर्थ- कर्म्मादि संचका अवसान होजाता है । इसी पृष्ठलक्षण अवसानभाव से ब्राह्मण को “ सामवेद " कहना श्रन्वर्थ बनता है । क्रियारूप क्षत्रिय दोनों के मध्य में रहता हुआ, दोनों से योग रखता हुआ दोनों को प्रतिष्ठित रखने वाला है, अतएव प्रतिष्ठारूप ब्रह्मात्मक क्षत्रिय को “ यजुर्वेद " कहना उचित होजाता है । इसप्रकार वर्णत्रयी में क्रमशः तीनों वेदों का उपभोग सिद्ध होजाता है । इसी वर्णवेद का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है-ऋग्भ्यो जातं वैश्यवर्णमाहु: --

-यजुर्वेदं क्षत्रियस्याऽऽहुर्योनिम् ।

सामवेदी ब्राह्मणानां प्रसूतिः-पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतदूचुः ॥

वर्णवेदसंस्थापरिलेखः– — तै ० ना ० १३ | १२ | ६ | २ | १ – पृथिवी —– अग्निः - श्रर्थः – उक्थम् - विट् – " ऋग्वेदः " २ – अन्तरिक्षम् - वायुः—- क्रिया — ब्रह्म - क्षत्रम् — “ यजुर्वेदः " ३– द्यौः ——— इन्द्रः—— ज्ञानम् - पृष्ठम् — ब्रह्म - " - " सामवेदः " इति वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ -'वर्णवेदः ' ( ७ ) - “ वर्णवेदनिरुक्तिः ” प्रकीर्णभावापन्ना १८ * २३६ क

पृष्ठ 554

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पृष्ठ 555

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श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ७ ) - “ वर्णवेदनिरुक्तिः ” – प्रकीर्णभावापन्ना १८ -' वेद के तात्त्विक स्वरूप की रूपरेखा से अनुप्राणिता ' " वैज्ञानिक- वेदनिरुक्तिश्च " अत्र उपरता ---

पृष्ठ 556

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कि श्रीः ह उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्ड का विराम-“ क्या उपनिषत् वेद है? ", इस महत्त्वपूर्ण उस प्रश्न की मीमांसा उपक्रान्त है, जिस प्रश्न की शताब्दियों से ' वेद की अपौरु अहमहमिका को आधार बनाकर ही भारतीय वेदभक्त विगत - भुक्त - प्रक्रान्त - अनेक हैं । तत्त्वदृष्ट्या इत्थंभूत सभी पेयता, तथा पौरुषेयता ' के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के ऊहापोह करते चले आ रहे इत्थंभूत महत्त्वपूर्ण? प्रकार के ऊहापोह सर्वथैव निरर्थक, अतएव नितान्त उपेक्षणीय ही माने जाने चाहिए | क्योंकि स्वाध्याय की दृष्टि प्रश्नों का, तथा तथाविध ही ऊहापोहों का वेदानुबन्धी ज्ञानविज्ञानात्मक तात्त्विक पारिभाषिक- वेदस्वाध्याय से वञ्चित रहने से यत्कििञ्चत् भी तो महत्त्व नहीं है । वस्तुस्थिति तो वास्तव में कुछ ऐसी है कि, की प्रज्ञा प्रश्रय प्रदान कर के कारण ही इसप्रकार के काल्पनिक प्रश्नों को, एवं निरर्थक ऊहापोहों को मानव प्रवञ्चना से तथाविध दिया करती है, और मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के सम्बन्ध में एकमात्र इसी स्वाध्याय--प्रश्न, एवं निरर्थक ऊहापोह - प्रक्रान्त होपड़े हैं । दृष्टि से ही ' उपनिषद्विज्ञान-युगधर्म्मनिबन्धन तथाभूत प्रश्नों, एवं ऊहापोहों के नीरक्षीरविवेक में की विभक्त है, जिसका कि प्रतिज्ञात-भाष्यभूमिका ' नामक निबन्ध प्रस्तुत हुआ है, जो तीन अवान्तर खण्डों ही अत्र उपरत होरहा है । अठारह ' प्रथमखण्ड ' प्रक्रान्त प्रश्न के समाधान की प्रक्रान्ति से अनुगत रहता हुआ वेद की जो ' रूपरेखा ' भागों में विभक्ता ' वेदनिरुक्ति ' के माध्यम से प्रक्रान्त- प्रश्न के सम्बन्ध में तात्त्विक समाधान कर देने में अत्र उपस्थित हुई है, हम समझते हैं - अभी वह पर्याप्तरूपेण तत् प्रश्न का सम्यग्रूपेण तथ्यों से सर्वथैव असंस्पृष्ट सक्षम नहीं है । यही नहीं, अपितु कुछ एक शताब्दियों से प्रक्रान्त, पारिभाषिक काल्त्रालीकृता प्रज्ञा में खचित रूढ़िवादात्मक जो काल्पनिक संस्कार, किंवा कुसंस्कार हमारी भावुकतापूर्णा दुराग्रह उत्पन्न होगए हैं, उनके निग्रहात्मक वारुणपाशबन्धनवे हमारे मनस्तन्त्र में एक वैसा अभिनिवेशात्मक - दुराग्रहमूला-कर दिया है, जिसके अनुबन्ध से वास्तविक तथ्य के सम्पर्क में आकर भी हम है, अपनी और काल्पनिकी अधिकांश में सम्भव है मान्यता के परित्याग में सक्षम नहीं बन पाते । श्रतएव यह सम्भव से ही कि, ' वैज्ञानिकी - वेदनिरुक्ति ' से अनुप्राणिता अठारह प्रकार की वेदनिरुक्तियों पर दृक्पात करने मात्र हमारा अभिनिवेश कहीं सहसा प्रदीप्त न होपड़े । तथाविधा - अभिनिवेशमूला प्रदीप्ति की उपशान्ति के लिए यह श्रावश्यक होजाता जिसका है कि तत्त्वनिष्ठोंनें , आत्म-वेदनिबन्धन- उस ' प्राजापत्यवेद ' के ही तात्त्विक स्वरूप का अनुगमन किया जाय, के माध्यम से ही सौर- सावित्राग्नि के साथ ही अन्तर्य्याम - सम्बन्ध माना है । एवं जिस सौर- सावित्राग्नि के द्वारा उपशान्त महर्षि भरद्वाज की — ' अनन्ता वै वेदा: ' सूत्रमूला तत्त्वानुगता वेदविज्ञान जिज्ञासा इन्द्रदेव की उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका के क्रमप्राप्त द्वितीय तथा तृतीय खण्डों में उसी - प्राजापत्यवेद , जिसके अनुरूप महिमा का विस्तार से यशोगान हुआ है । तत्त्वात्मक - प्राज्यापत्यवेद ही वह अपौरुषेयवेद है ०२३६

पृष्ठ 557

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प्रथमखण्ड का विराम ही छन्दोमर्यादा के अनुबन्ध से ' शास्त्रवेद ' का श्राविर्भाव हुआ है ऋषिप्रज्ञा के द्वारा । तात्त्विक- पौरु-षेयवेद का शाखात्मक मौलिक स्वरूप - क्या है?, तत्प्रतिरूपात्मक शास्त्रवेद की अमुक नियत-शाखाएँ ह्रीं क्यों हुई?, इत्यादि रहस्यात्मक मौलिक प्रश्नों के ज्ञान - विज्ञानात्मक - पारिभाषिक - तथ्यों का विस्तार से स्पष्टीकरण करने वाले भूमिका के अग्रिम दोनों खण्ड निश्चयेन कल्पनाप्रसूत उन सभी प्रश्नों का, तथा निरर्थक - ऊहापोहों का आमूलचूड़ उन्मूलन कर देंगे, जिन प्रश्नोंनें, एवं ऊहापोहोंनें भारतराष्ट्र की निष्ठात्मिका भी प्रज्ञा को विगत कतिपय शताब्दियों से सर्वथैव पिब्दमाना ही प्रमाणित कर रक्खा है । हमारी ऐसी आत्मनिष्ठा है कि, यदि दोषदृष्टि से भी, एकबार भी पाठकोंनें निष्ठापूर्वक खण्ड-त्रयात्मिका उपनिषद्भूमिका को समन्वित कर लिया, तो निश्चयेन उपनिषदों से सम्बन्ध रखने वाले वैज्ञानिक - इतिवृत्त के साथ साथ वेद के पौरुषेय - अपौरुषेय - वाद से अनुप्राणित चिरकालिक विसंवाद सर्वथैव उपशान्त होजायँगे, इसी मङ्गलकामना के साथ प्रस्तुत प्रथमखण्ड - विरामपथानुगामी बन रहा है । इति- उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकायाः प्रथमखण्डः - उपरतः १ क - * -बिहार डाउ २४० की की TEMNING 1983

पृष्ठ 558

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-कीड़

पृष्ठ 559

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श्रीः इति- उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकायाः प्रथमखण्डः - उपरतः १

पृष्ठ 560

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१८- भारतीय दृष्टिकोण से ' विज्ञान ' शब्द का समन्वय १६ - वेदका स्वरूप विचार -२०- क्या हम मानव हैं? ( सांस्कृतिक आमन्त्रण ) २१ - दिग्देशकालस्वरूप मीमांसा २३-99 २४ - राष्ट्रपतिभवनानुगत - व्याख्यानपञ्चक ( १ ) - सम्वत्सरमूला - अग्नीषोमविद्या ( २ ) - पञ्चपर्वात्मिका विश्वविद्या ) - मानव का स्वरूप परिचय ( ४ ) - ' अश्वत्थविद्या ' का स्वरूप- परिचय के प्रास्ताविक से समन्वित । १ ॥ ) २ ) २ ॥ ) २५ ) २५ ) ३० ) ६ ) ( प्रथम - व्याख्यान ) ( द्वितीय- " ( तृतीय- " ( चतुर्थ- " प्राप्तिस्थान-दुर्गापुरा ( जयपुर - राजस्थान ) २२- शतपथब्राह्मण हिन्दीविज्ञानभाष्य- प्रथमकाण्डानुगत - प्रथमखण्ड ( ५ ) - वेदशास्त्र के साथ पुराणशास्त्र का समन्वय ( पञ्चम - " व्यवस्थापक- ' राजस्थानवैदिकतच्चशोध संस्थान - जयपुर ' * - राष्ट्रपतिभवन के टेपरेकार्डों के आधार पर प्रकाशित एवं महामहिम श्रीराष्ट्रपति महाभाग