Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 541–550

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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प्रथमखण्ड देशवेदनिरुक्तिः मूर्त्ति - माण्डल - गति, मेद से तीनों वेदों का उपभोग होरहा है । हमारी सूर्योपलब्धि है, जिसे मूलाधार बना कर उपलब्धि हो रही है, वह मूलपिण्ड उपलब्धि का उक्थ का जो मूल श्राधार के अनुसार ' ऋग्वेद ' कहा जायगा । बनता हुआ पूर्वपरिभाषा उक्थ उस तत्त्व का नाम है, जिससे अनन्त अर्क ( रश्मियाँ ) बाहिर की ओर अधः- पूर्व - पश्चिम - उत्तर - दक्षिण सब ओर फैले रहें । उक्थ सदा एक निकल कर ऊर्ध्व-पूर्व में यद्यपि हमने उक्थपिएड को उपलब्धि का आधार बतलाया है, रहता है, अर्क असंख्य होते हैं । ये ही अर्क बनते हैं । क्योंकि अर्को का आधार स्वयं पिण्ड है, इसलिए परन्तु वस्तुतः उपलब्धि के आधार सिद्ध होजाती है । सूर्य्यपिण्डरूप उक्थकेन्द्र से निकल कर चारों ओर परम्परया पृथिवीपिण्ड मूलपिण्ड की भी श्राधारता व्याप्त होरहे हैं । इन कों का एक स्वतन्त्र तेजोमण्डल बना हुआ है से भी परे पर्य्यन्त क “ सामवेद ” कहा जायगा । तेजोमण्डलरूप बहिः पृष्ठ, एवं सूर्य्यपिण्डरूप उक्थपृष्ठ । इसी अर्करूप तेजोमण्डल को से योग करता हुआ जो संचारीभाव है, गतिमत् तत्त्व है, सूर्य्यबिम्ब से, दोनों के मध्य में दोनों हुआ जो अपने गतिभाव से लोकालोकपृष्ठपर्य्यन्त अभिव्याप्त है, निकल कर पृथिवीपृष्ठ का स्पर्श करता तात्पर्य्यं कहने का यही हुआ कि, सत्तासिद्ध प्रत्येक पिण्ड देशवेद उसे है ही । प्रत्येक ' ब्रह्म ' रूप ' यजुर्वेद ' कहा जायगा । नामक तीन विभाग रहते हैं । पिण्ड में उक्थ - पृष्ठ - ब्रह्म स्वयं मूलपिण्ड उक्थ कहलाता है । मूलपिएड के केन्द्र से व्याप्त होने वाला रश्मिमण्डल पृष्ठ कहलाता है । पिण्डकेन्द्र, और निकल कर बड़ी दूर पर्य्यन्त के मध्य में विचरण करने वाला गतिमत्तत्त्व ' ब्रह्म ' कहलाता है । क्योंकि मण्डल की अन्तिम परिधि, दोनों तीनों का प्रत्यक्ष भलीभाँति होजाता है, इसीलिए उसे उदाहरण सूर्य में ज्योतिर्भाव के कारण पिण्डमात्र में समझना चाहिए । जो रूपज्योतिर्म्मय ( पृथिव्यादि बतला दिया है । वस्तुत: यह त्रयीभाव पार्थिवतमोरूप आवरण से ही पार्थिवरश्मिमण्डल का सूर्य्यरश्मिमण्डलवत् ) पिण्ड हैं, उनमें भी यही व्यवस्था है । प्रत्यक्ष कहा जाता है, उपलब्धि माना जाता है, वह तो मण्डल की ही प्रत्यक्ष नहीं होता । वस्तुतस्तु जिसे वाले वेदरहस्यप्रकरण में देखेंगे । यहाँ इस सम्बन्ध में यही जान लेना होती है, जैसाकि पाठक आगे आने पर्याप्त होगा कि, स्वज्योतिम्र्म्मय ( सूर्य्यादि पिण्ड हों, परज्योतिर्म्मय ( चन्द्रमादि ) पिण्ड हों, अथवा हों, सत्र में उक्थ - ब्रह्म - पृष्ठ तीनों संस्थाएँ नियमतः रहेंगीं । स्वयं मूलपिएड रूपज्योतिर्म्मय ( पृथिव्यादि ) पिण्ड माना जायगा । मूलपिण्ड के केन्द्र से बद्ध होकर चारों ओर वितत तेजोमण्डल उक्थ कहलाएगा । इसे ही ऋग्वेद सामवेद कहा जायगा । एवं उक्थपिएड, और तेजोमण्डल, दोनों से, किंवा रश्मिमण्डललक्षण पृष्ठ कहलाएगा । इसप्रकार देशात्मक प्रत्येक सत्तासिद्ध पदार्थ में तीनों वेदों अनुगृहीत का उपभोग गतिमत् प्राणब्रह्म यजुर्वेद त्मक यच्चयावत् पिण्डों में प्रकृत वेदव्यवस्था की समानरूप से ही व्याप्ति उपलब्ध मिलेगा होगी । बड़ - चेतना-श्रौत वचन इसी देशवेदसंस्था का समर्थन कर रहा है- । निम्नलिखित छ ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहु: -सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत् । सर्व तेजः सामरूप्यं ह शश्वत्-ब्रह्मणा २२४ ० सृष्टम् ॥ १० ब्रा ० ३।१२।६।२ ।

पृष्ठ 542

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वेदनिरुक्तौ देशवेदसंस्थापरिलेख – १ - मूर्त्तिः - उक्थम् -- ' ऋग्वेद: ' उपनिषद्भूमिका देशवेदनिरुक्तिः २- वस्तुभावः-- ब्रह्म — ' यजुर्वेदः ' ३- मण्डलम् -- पृष्ठम् – ' सामवेदः ' ' " देशवेदः ” इति - वैज्ञानिवेदनिरुक्तौ ( ५ ) - " देशवेदनिरुक्तिः ” – प्रकीर्णभावापन्ना १६ - फोड २२५

पृष्ठ 543

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श्रीः इति- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ-( x ) [ ५ ] - " देशवेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्णभावापन्ना १६ 3-4-

पृष्ठ 544

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श्रीः श्रथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ६ ) - “ कालवेदनिरुक्तिः " - प्रकीर्ण भावापन्ना १७

पृष्ठ 545

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पृष्ठ 546

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S श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ६ ) - " कालवेदनिरुक्तिः ” - प्रकीर्णभावापन्ना १७ - ** --विश्वसृष्टिवत्त'क ' प्रतिष्ठापुरुष ' ( ब्रह्मा ), विश्वसृष्टिपालक ' यज्ञपुरुष ' ( विष्णु ), एवं इन दोनों पुरुषों के क्रमशः प्रवर्त्तित और पालित स्वयं विश्वप्रपञ्च विश्वसृष्टिसंहारक महापुरुषलक्षण जिस ' महाकाल ' ( महादेव ) के गर्भ में अणुवत् समा रहा है, जो कालतत्त्व अपने इतर सब प्रपञ्चों को अपना ग्रास बनाए हुए है, जो कालपुरुष स्वयं काल ( संहार ) मर्य्यादा से अतीत बनता हुआ ' मृत्युञ्जय ' नाम से प्रसिद्ध ही-रहा है, मृत्यु ही जिस महाकाल का विश्वसंहारक ताण्डवनृत्य है, जो तत्त्व स्वयं विश्वातीत बनता हुआ अखण्ड - अद्वय - परात्पर है, जो तत्त्व विश्वविवर्त्त ' को अपनी कालरूपा श्राद्या महाकाली के द्वारा कालचक्र में • श्राद्ध करता हुआ स्वयं कालबन्धन से पृथक रहता हुआ कालातीत है, उस अखण्ड, कालतीत, कालपुरुष के सम्बन्ध में खण्डभाव से सम्बन्ध रखने वाली शब्दतन्मात्रावयी वेदनिरुक्ति का प्रदर्शन कराना तात्त्विक दृष्टि से यद्यपि सर्वथा अनुचित है, तथापि विश्वविवत ' के सोपाधिकभाव को ही आगे कर पुरुष को उपाधि से विभूषित कर, विश्वदृष्टया उसी श्रखण्ड के क्रमशः भूत वर्त्तमान भविष्यत् ये तीन खण्ड कर उसके इन सोपाधिकरूपों के साथ ही वेद का सम्बन्ध कराने का साहस किया गया है । स्वयं विश्वातीस, अखण्ड, महाकालपुरुष यद्यपि विशुद्ध सत्तासिद्ध तत्त्व है, किन्तु उसी अखण्ड के खण्डात्मक भूत - वर्त्तमान- भष्यित् तीनों सोपाधिक- खण्ड विशुद्ध भातिसिद्ध ही माने जायँगे । सत्ता एक है, भाति तीन हैं । विश्वमर्यादा से सम्बन्ध रखने वाले मानवीय व्यवहारकाण्ड में उस एक ही सत्तासिद्ध तत्त्व की तीन खण्डों में प्रतीति होरही है । तीनों ही खण्ड क्योंकि भाति - भाव से सम्बन्ध रखते हैं, अतएव इनका अनुगममर्थ्यादा से ही सम्बन्ध रहता है । निश्चितभाव को निगममर्य्यादा कहा जाता है, एवं इसका प्रधानतया सत्ताभाव से ही सम्बन्ध है । अनिश्चित, विपरिमाणी, परिवर्तनीय भाव को अनुगममर्थ्यादा माना गया है, अतएव अपेक्षाभाव के अनुग्रह से पर्व पर्व में, अणु अणु में तीनों खण्डों का समन्वय देखा जाता है । जब सृष्टि नहीं हुई थी, तो सम्पूर्ण प्रपञ्च भूतात्मक कालखण्ड के गर्भ में ही विलीन था । आज सृष्टि विद्यमान है, और यह वर्त्तमानात्मक कालखण्ड के आधार पर ही प्रतिष्ठित है 1 । कोई समय ऐसा आवेगा, जिस दिन सम्पूर्ण विश्व भविष्यदात्मक कालखण्ड में ही विलीन होजायगा । इसप्रकार विश्वसत्ताकाल को वत्तमान २२६

पृष्ठ 547

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प्रथमखण्ड काल वेदनिरुक्तिः कहा जासकता है, विश्व के पूर्वकाल को भूतकाल माना जासकता है, एवं विश्व की उत्तरावस्था को भविष्यत् कहा जासकता है । ' जायते ' से पहिले भूतसत्ता, अस्ति- विपरिणमते वद्ध ते अपक्षीयते चारों वर्त्तमानसत्ता, एवं ' नश्यति ' भविष्यत् सत्ता । भूतकाल सृष्टि का मूल है । भूत ही वर्तमान का कारण बनता है । इसी आधार पर कितने एक दार्शनिक अभाव को भाव के प्रति कारणा माना करते हैं । बात है भी सच | जो वस्तु नहीं रहती, उसी की तो उत्पत्ति होती है । उत्पत्तिदशा वर्तमान है, ' नहीं ' दशा भूत है । अतः अवश्य ही भूत को वर्त्तमान का जनक माना जासकता है । इस वर्त्तमान का अवसान होता है भविष्यत् पर । इसी दृष्टि से काल के भूतपर्व को प्रभव-स्थान, वर्तमानपर्व को प्रतिष्ठास्थान, पर्व भविष्यत् पर्व को परायणस्थान माना जासकता है । भूतकाल विश्व-प्रपञ्च का प्रभव बनता हुआ उक्थ है, यही कालात्मक ' ऋग्वेद ' है । भविष्यत्काल विश्वप्रपश्च की अवसान-भूमि बनता हुआ ' पृष्ठ ' है, यही कालात्मक ' सामवेद ' है । वर्त्तमानकाल भूतकालात्मक ऋक् और भविष्यत् कालात्मक साम, दोनों के मध्य में प्रतिष्ठित रहता हुआ, दोनों से युक्त रहता हुआ ' ब्रह्म ' है, और यही कालात्मक ‘ यजुर्वेद ’ है । इसप्रकार महाविश्वानुबन्धी महाकालखण्डों में तीनों वेदों का उपभोग होरहा है । ( क ) —— महाकालवेदसंस्थापरिलेख ः— १- भूतकालः- - सृष्टेः: प्रागवस्था - उक्थम् — ऋग्वेदः २- वर्त्तमानकालः - सृष्टयवस्था - - ब्रह्म --यजुर्वेदः - " महाकालवेदः ” ३- भविष्यत् काल: - सृष्ट रुत्तरावस्था - पृष्ठम् — सामवेदः FIS पूर्वोक्ता अनुगममय्यांदा की कृपा से आगे जाकर स्वयं विश्वदशा में इस महाकालखण्डत्रयी के अनन्त अपरिमेय खण्ड होजाते हैं । इन्हीं खण्डों के आधार पर पुराणशास्त्र की महाप्रलय - प्रलय, खण्डप्रलय, नित्य-प्रलय, आदि अनेक प्रलयावस्थाएँ प्रतिष्ठित हैं । विश्वसीमा से भी बाहिर तक दौड़ लगाने में सामान्य बुद्धि वालों को क्योंकि कष्ट होता है, अतएव वेदमहर्षि ने विश्वमर्य्यादा के भीतर ही कालवेद के दर्शन कराए हैं । विश्वमर्य्यादा भी दुरधिगम्या है । सभी वहाँ भी नहीं पहुँच सकते । इसीलिए सर्वानुभूत ग्रहःकाल के ही पूर्वाह्न - मध्याह्न - अपराह्न तीन विभागों के द्वारा बड़ी सुगमता से कालवेदत्रयी का स्वरूप हमारे सामने रख दिया है ऋषिप्रज्ञा ने । प्रातःकाल पूर्वाह्न का उपक्रमस्थान है, सायंकाल अपराह्न का उपसंहारस्थान है, बीच का सम्पूर्ण समय मध्याह्न है । पहिला भूत है, अन्त का भविष्यत् है, मध्य का वर्त्तमान है । पूर्वाद्धोपलक्षित भूतकाल आगे का उक्थ बनता हुआ ' ऋग्वेद ' है । अपराह्नोपलक्षित भविष्यत्काल अवसानलक्षण ' पृष्ठ ' बनता हुआ ' साम-वेद ' है । एवं मध्याह्नेोपलक्षित वर्त्तमानकाल प्रतिष्ठालक्षण ' ब्रह्म ' बनता हुआ, दोनों से योग करता हुआ ' यजुर्वेद ' है । इसप्रकार एक ही अहः काल में तीनों वेदों का उपभोग होरहा है, और इस उपभुक्ता वेदत्रयी का भोग कर रहे हैं - अपने यज्ञ के प्रातः सवन, माध्यन्दिसवन, सायंसवन - नामक तीनों पर्वो से श्रहःपति सूर्य्य-देवता । आगे की श्रुति इसी कालवेद का दिग्दर्शन करा रही है— २३०

पृष्ठ 548

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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका

ऋभिः पूर्वाह्न े दिवि देव इयते-यजुर्वेदे तिष्ठति मध्ये अह्नः ।

सामवेदेनास्तमये महीयते-वेदैरशून्यस्त्रिभिरेति सूर्य्यः ॥

— तै ० ब्रा ० ३ | १२ | ६ | १ ॥

( ख ) – कालवेदसंस्थापरिलेखः— कालवेदनिरुक्तिः ' कालवेदः ' १ – पूर्वाह्न बिन्दुः-- भूतकालः — उक्थम् — ' ऋग्वेदः ' २ - मध्यकालः-३ - अपराह्नबिन्दुः-- वर्त्तमानकालः - ब्रह्म - ' यजुर्वेदः ' - भविष्यत्कालः- पृष्ठम् -'सामवेदः ' इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्त [ ] ( ६ ) – “ कालवेदनिरुक्तिः ” प्रकीर्णभावान्ना १७ २३१

पृष्ठ 549

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श्रीः इति- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ [ ६ ] - " कालवेदनिरुक्तिः ” - प्रकीर्णभावापन्ना १७

पृष्ठ 550

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श्रीः श्रथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ७ ) - " वर्ण वेदनिरुक्तिः ” - प्रकीर्णभावापन्ना १८