Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 1–10
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1–10
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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका द्वितीय खण्ड २ मोतीलालशम्र्मोपाह्वो मुक्तरक्तशर्म्मा आङ्गिरसो भारद्वाजः वेदपीथी - पथिकः जयपत्तनाभिजनः
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श्री श्रीयुत सम्माननीय संस्कृतिपरायण मानवश्रेष्ठ श्रेष्ठिप्रवर श्रीकुड़ीलालजी सेकसरिया महाभाग के समर्थ करकमलों में ससम्मान प्रस्तुत ग्रन्थ कृतज्ञतापूर्वक समर्पित जिनकी महती उदारता से विगत ८ - १० वर्षों से हमारी सांस्कृतिक - साहित्यि सम्पूर्ण प्रगतियाँ प्रक्रान्त हैं, जिनके सात्विक सहयोग से ही ' राजस्थान वैदिक-तत्त्वशोध संस्थानमानवाश्रमदुर्गापुरा जयपुर ' नामक संस्थान प्राणप्रतिष्ठा का अनुगामी बन सका है, उन श्रेष्ठिप्रबर सम्माननीय मानवश्रेष्ठ श्रीकुड़ीलालजी महोदय सेकसरिया के समर्थ करकमलों में संस्थान की ओर से कृतज्ञताभिव्यक्ति के लिए प्रस्तुत ' उपनिषद्विज्ञान भाष्यभूमिका ' - द्वितीय खण्ड सादर समर्पित करते हुए हम मनस्तुष्टि काही अनुभव कर रहे हैं । ज्येष्ठशुक्ल प्रतिपत् १ वि ० सं ० २०१३ शनश्चरवासर समपकक: -मोतीलाल शर्मा आङ्गिरसो भारद्वाजः ( अध्यक्ष ) राजस्थान वैदिकतत्वशोधसंस्थान मानवाश्रम - दुर्गापुरा ( जयपुर )
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श्रीः महामहिम राष्ट्रपति श्री डॉ ० राजन्द्रप्रसादजी महाभाग द्वारा प्राप्त ' राजस्थानवदिकतत्त्वशोधसंस्थान ' मानवाश्रम दुर्गापुरा ( जयपुर ) का ' प्रधान संरक्षतानुगत - प्रमाणपत्र ' अत्यन्त सम्मान स यहाँउद्घृतहो रहाहै.-भारत के राष्ट्रपति डा ० राजेन्द्र प्रसाद राजस्थान- वैदिक तत्त्वशोध संस्थान - जयपुर् का प्रधान संरक्षक बनने की स्वीकृति प्रदान करते हैं मिलिट्री सेक्रेट्री ऑफिस राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली दिनांक 30 अगस्त १ ९ ५६ भारत के राष्ट्रपति के आदेशानुसार यदुनाथसिंह ( यदुनाथ सिंह ) मेजर जनरल मिलिट्री सेक्रेट्री टू दि प्रेसिडेन्ट
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उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्ड ( पञ्चस्तम्भात्मक ) निबन्धा-२ मोतीलाल शर्मा, वेदवीथी पथिकः भारद्वाजोपाह्वः जयपत्तनाभिजनः ( पुनः प्रकाशनाधिकार एकमात्र ग्रन्थकर्त्ता से सम्बन्धित ) ' राजस्थानवै दिकत शोधसंस्थान जयपुर के द्वारा प्रकाशित एवं श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय, मानवाश्रम दुर्गापुरा ( जयपुर ) के द्वारा मुद्रित प्रथमचार ५०० मूल्य १५ )
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श्रीः ' राजस्थानवैदिकतत्त्वशोधसंस्थान जयपुर के तत्वावधान से अनुप्राणित एवं प्राच्यसाहित्य को ज्ञानविज्ञानपरिपूर्णा परिभाषाओं से समन्वित प्रकाशित -ग्रन्थों की सूची ( निबन्धा - मोतीलालशम्र्मा - भारद्वाजः ) ग्रन्थनाम पृष्ठ संख्या मूल्य १ — शतपथहिन्दीविज्ञान भाष्य-" प्रथमवर्ष २– " द्वितीय वर्ष ३– 99 तृतीयवर्ष ४-चतुर्थवर्ष ५— पञ्चम ६. ४०८ # १० ) ३६६ # १० ) ४३४ # ४६४ ३०० ११-१२-१३-- शतपथ भाष्यत्रैवार्षिक विषयसूची ७ ईशोपनिषत् - हिन्दी - विज्ञान भाष्य- प्रथमखण्ड ब - ईशोपनिषत् - हिन्दी विज्ञानभाष्य- द्वितीयखण्ड ६ - माण्डूक्योपनिषत - हिन्दी- विज्ञान माध्य १०- हिन्दी - गीताविज्ञानभाष्यभूमिका- प्रथमखण्ड ( बहिरङ्गपरीक्षा ) १४-द्वितीयखण्ड - आत्मपरीक्षा ' क ' विभाग ५०० 27 - ब्रह्मकर्म परीक्षा ' ख ' विभाग ६०० # - कर्मयोगपरीक्षा ' ग ' विभाग ५०० # तृतीय खण्ड - बुद्धियोगपरीक्षा ' ग ' विभाग ६५० १५ - हिन्दी- उपनिषद्विज्ञान भाष्यभूमिका- प्रथमखण्ड ,, १६- उपनिषद्विज्ञानमाष्यभूमिका - द्वितीयखण्ड १७- " उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्ड १०० # २ ) ५०० ५०० १० ) ५० ५०० १२ ) १२ ) १५ ) १२ ) २० ) ५०० १२ ) ५,०० १५ ) ५०० १५ ) १८- ' आत्मस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ' नामक श्राद्धविज्ञान - प्रथमखण्ड ५०० २० ) १६ - ' सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषत् ' नामक श्राद्धविज्ञान - तृतीयखण्ड ६०० १५ ) २० - खण्डचतुष्टयात्मक ३००० पृष्ठात्मक ' भारतीय हिन्दू - मानव और उसकी भावुकता ' नामक निबन्धान्तर्गत असदाख्यान - विश्वस्वरूपमीमांसात्मक प्रथमस्वण्ड ५५० २१ - वेदेषु धर्मभेदः ( सामयिक - संस्कृतनिबन्ध ) १२ ), ३४ २२ - ‘ श्राद्धविज्ञानप्रस्तावना ( खण्डचतुष्टयात्मक श्रा ० ग्रन्थपरिचय ) ६० २३- हमारी समस्या ( सामयिक - निबन्ध ) २४ - मानवाश्रमपाक्षिक - सप्ताङ्कसमष्टि ( उपयोगी निबन्धसंग्रह ) २०० प्रकाशन का आधार है । चिह्नाति ग्रन्थ परिसमाप्त हैं, अतएव अनुपलब्ध हैं । पर्याप्त ग्राहकसंख्योपलब्धि ही इनके पुनः एकमात्र प्राप्तिस्थान – व्यवस्थापक - प्रकाशनविभाग— ' राजस्थानवैदिकतत्त्वशोधसंस्थान जयपुर ' प्रधान कार्यालय - मानवाश्रमविद्यापीठ दुर्गापुरा, जयपुर ( राजस्थान )
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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्डस्य ' किमपि प्रास्ताविकम ' प्रस्तोता - वेदवीथीपथिकः
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श्रीः किमपि प्रस्ताविकम् औपनिषद पुरुष के निग्रहात्मक अनुग्रह से ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका- द्वितीयखण्ड ' प्रकाशित हो रहा है, जो विगत १५ वर्षों से प्रकाशन की आशा प्रतीक्षा का अनुगामी बना हुआ था । विगत कतिपय वर्षो से प्रकाना अपनी शारीरिक अस्वस्थता के अनुबन्ध से बाह्यत्रवृत्ति-प्रधान प्रकाशनादि कार्यों से हम तटस्थ बन चुके थे । सहसा गत वर्ष सुहृदर श्रीवासुदेवशरण अग्रवाल महोदय का व्यानप्राणात्मक वह सान्निध्य अङ्क ुरित हो पड़ा, जिसका बीजवपन ' शत-पथविज्ञानभाष्य ' के माध्यम से सन् ३२ में हुआ था । अवश्य ही इस सान्निध्य को ' देवप्रसाद ' हो माना जायगा, जिसके अनुग्रह से विगत १०-१२ वर्षों से सर्वथा अन्तर्मुख बन जानें वार्ली प्रकाशन - प्रचारादि - लोकप्रवृत्तियाँ आज पुनः अग्रवाल महाभाग के द्वारा अभिव्यक्त हो रहीं हैं । अपनी इन अभिव्यक्तियों को ( युगभाषा के अनुसार ) वैधानिकरूप से सुव्यवस्थित बनाने के लिए गत नवम्बर सन् ५५ में ' राजस्थान वैदिकतत्त्वशोधसंस्थान ' नामक एक वैधानिक ( राज-स्थानशासन के द्वारा स्वीकृत - रजिस्टर्ड ) सस्थान प्रतिष्ठित हुआ, जिसके ' मन्त्रित्त्व ' का महान उत्तरदायित्त्व भी तत्प्रेरक अग्रवाल महाभाग से ही अनुप्राणित हुआ । संस्थान -संस्थापन से पूर्व अपनी अस्वस्थता के कारण प्रवासयात्राओं में कतिपय वर्षों से श्रसमर्थ बन जाने से राजस्थान शासन का हमनें इस ओर ध्यान श्रवर्धित करने का प्रयत्न किया था । किन्तु निरन्तर २ - ३ वर्ष पर्य्यन्त सतत अनुधावन करते रहने पर भी हमें सम्भवतः किसी हमारी ही अज्ञात - त्रुटि से इस दिशा में कोई सफलता नहीं मिल सकी | संस्थान के म्ान्य मन्त्रीमहाभाग संस्थान के संस्कृतिनिष्ठमाननीय श्रीलक्ष्मीलालजी जोशी महाभाग के सह-योग से पुन: ' सत्ता ' की अनुग्रहप्राप्ति का उपक्रम किया, जो निश्चयेन ' योगसंसिद्ध - कालोपस्थिति ' पर सफल होगी, ऐसी धारणा है । ' संस्थान ' की शैशवावस्था को जीवन प्रदान करने वाले इस साहित्यसेवी के शाश्वत सहयोगी माननीय श्रेष्ठिप्रवर श्रीकुड़ीलालजी सेकसरिया — श्रीमहावीरप्रसादजी मुरारका, एवं श्रीजगदीशप्रसादजी सेकसरिया महाभाग के सात्त्विक सहयोग से ही संस्थान ' अब तक ' स्वजीवनयापन ' में समर्थ बन सका है, जिसके लिए संस्थान अवश्य ही इन पुरातन - सहयोगियों
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किमाप प्रास्ताविकम् प्रति कृतज्ञता अर्पित करना अपना नैष्ठिक कर्त्तव्य मानेगा । इसी सहयोग के बल पर संस्थान अपने प्रक्रान्त सम्वत्सर में दो सहस्र पृष्ठात्मक तो साहित्य प्रकाशित किया है, एवं दो मेधावी प्रतिभाशाली आचार्य्यं स्नातकों को वैदिकतत्त्व- परम्परानुगत स्वाध्याय के प्रति आकर्षित किया है । संस्थान - हितैषी इस ' सुसंवाद ' को भी गौरव के साथ सुनेंगे कि, मान्य मन्त्री महाभाग के सर्वथा अभिनन्दनीय प्रयास से भारत राष्ट्र के महामहिम राष्ट्रपति श्री डॉ ० राजेन्द्रप्रसादजी महाभाग ने संस्थान के ' प्रधान संरक्षक ' बनने की अनुमति प्रदान कर संस्थान को कृतज्ञ बनाया है | इसके अतिरिक्त यह भी अग्रवाल महाभाग के ही साम्वत्सरिक प्रयास का सुपरिणाम है कि, राजस्थान के मुख्यमन्त्री माननीय श्रीमोहनलालजी सुखाड़िया ने भी संस्थान की उपयोगिता के सम्बन्ध में अपने उदार विचार अभिव्यक्त किए हैं । महामहिम राष्ट्रपति महाभाग की ओर से प्राप्त ' प्रधान संरक्षकता - स्वीकृतिपत्र ' अविकलरूप से मुखपृष्ठ के सान्निध्य में सम्मानपूर्वक उद्धृत कर दिया गया है | अवश्य ही यह संस्थान के लिए प्रतीक्षात्मक आश | मय वातावरण माना जायगा, जिसके आकर्षण से संस्थान के सदस्य अब और भी अधिक उत्साह से में इस प्राच्यतत्त्वानुष्ठान सफलता प्राप्त कर सकेंगे । ' संस्थान ' के अनुग्रह से ही प्रक्रान्त सम्वत्सर में हम चार ग्रन्थ- प्रकाशित कर सकें हैं । अतएव कृतज्ञता के रूप में इस प्रास्ताविक के आरम्भ में हमें ' संस्थान ' का भुक्त- प्रक्रान्त इतिवृत्त समाविषु करना पड़ा । अब दो शब्दों में प्रस्तुत द्वितीयखण्ड के सम्बन्ध में किञ्चिदिव आवेदन कर दिया जाता है । उपनिषद्भूमिका - प्रथसखण्ड में - ' क्या उपनिषत् वेद है? ', इस प्रासङ्गिक प्रश्न का उत्थान हुआ है, जिससे सम्बन्ध रखने वाले बाह्य - विषयों का प्रथमखण्ड में हीं विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । प्रस्तुत द्वितीयखण्ड उसी प्रक्रान्त प्रश्न का शेष - समाधान करने के लिए प्रवृत्त हुआ है । सचमुच यह भारतीय आर्पिप्रजा का निःसीम दुर्भाग्य है कि, वह अपने सर्व-स्वभूत आर्ष वैदिक - तत्त्ववाद के ज्ञानविज्ञानात्मक रहस्यपूर्ण बोध से, उसके मौलिक उपपत्ति-ज्ञान से सर्वथा पराङ्मुख ही बनी हुई है । पराङ्मुखता के विदित- अविदित अन्यान्य कारणों के सभतुलन में सबसे प्रमुख कारण यही प्रतीत हो रहा है कि, आर्प प्रजाने ' वेद की अपौरुषेयता ' का मर्म्म न समझ कर शब्दात्मक वेदग्रन्थ को ही अपनी अपौरुषेयनिष्ठा का केन्द्र मान लिया । सी महती भ्रान्ति ने इसके तान्त्रिक जीवन को सर्वथैव साम्प्रदायिक तथा अभिनिविष्ट जीवन बना डाला, जिसके दुष्परिणामस्वरूप इसके वैय्यक्तिक - पारिवारिक - सामाजिक- राष्ट्रीय-, तथा विश्वानुबन्धी समस्त कर्म्मकलाप एकान्ततः अव्यवस्थित ही प्रमाणित होते रहे । आर्प वैदिक - साहित्य जैसी ५
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किमपि प्रास्ताविकम् ज्ञानविज्ञाननिधि का अधिपति भी भारतीय वर्ग अपनी प्रज्ञापराधजनिता ' अपौरुषेयभ्रान्ति ' से वैदिकसाहित्य के ज्ञानविज्ञानात्मक तत्त्वबोध से अपरिचित रहता हुआ । आज सभी क्षेत्रों के लिए उपहास का साधन बना हुआ है । इसकी इस भ्रान्ति के निराकरण के लिए ही प्रस्तुत द्वितीय खण्ड उपनिबद्ध हुआ है । क्या वेदों को पौरुषेय प्रमाणित करना हीं हमारा मुख्य लक्ष्य है?, प्रश्न के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण पर्याप्त होगा कि, शब्दार्थ के औत्पत्तिक ( नित्य ) सम्बन्ध से अनुप्राणित पौ रुपेय - तत्त्वात्मक वेदशास्त्र का निरूपक शब्दात्मक वेदप्रन्थ भी यद्यपि अवश्य ही है तो अपौरुपेय हो । किन्तु इस वेदप्रन्थ की यह पौरुपेयता अपना एक विशेष महत्त्व रखती है, जिसे अवगत कर बिना वेदग्रन्थ की अपीरुपेयता का रहस्यात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं हो सकता । इसी रहस्यात्मक दृष्टिकोण के विश्लेषण के लिए ' भूमिका - तृतीयखण्ड ' उपनिबद्ध हुआ है । प्रस्तुत द्वितोयखण्ड में शब्दात्मक वेदग्रन्थ में उपवर्णित अर्थात्मक ( तत्त्वात्मक ) उस नित्यकूटस्थ - अपौरुषेय ' वेद ' का ही स्वरूप स्पष्ट करने का प्रयास हुआ है, जिसके स्वरूप से भारतीय प्रज्ञा अनेक शताब्दियों से सर्वथा अपरिचित ही मानी, और कही जा सकती है । विगत शताब्दियों में वेदार्थ के सम्बन्ध में जिन भारतीय विद्वानों ने जो कुछ लिखा, सब का लक्ष्य शब्दात्मक वेदग्रन्थ ही रहा । " तेजोमय सूर्य्यमण्डल का मण्डलात्मक मूर्त्तिभाव ' ऋक् ' है, सौर रश्मिरूप अचिमण्डल ( तेजोमण्डल ) साम है, एवं सौर प्राणात्मक गतिधर्म्मा अग्नि यजु है " इत्यादि रूप से उपवर्णित तत्त्वात्मक वेद की ओर किसी वेया-ख्याता का ध्यान न गया * | " पाञ्चभौतिक महाविश्व में जितने भी व्यक्त - मूर्त - पिण्ड हैं, उन सबका अधिष्ठान तच्चात्मक ऋग्वेद है, वस्तुपिण्डों का स्वरूप सुरक्षित रखने बाला ' एति - प्र'ति ' लक्षण गतिधर्म्म तत्त्वात्मक यजुर्वेद से अनुप्राणित है, एवं स्पृश्य वस्तुपिण्ड को दृश्यमहिमामण्डलरूप में परिणत कर देने वाला ' विभूतिमण्डलात्मक ' * -यदेतन्मण्डलं तपति –तन्महदुक्थं, ता ऋचः, स ऋचां लोकः । अथ यदेतदर्चि-दप्यते - तन्महाव्रतं, तानि सामानि स साम्नां लोकः । अथ य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः- सोऽग्निः, तानि यजूंषि, स यजुषां लोकः I । सैषा त्रय्येव विद्या तपति 1 । तद्धु– तदप्यविद्वांस आहुः - ' त्रयी वा एषा विद्या तपति ' इति । - शत ० ब्रा ० १०।५।२।१,२, । ६
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किमपि प्रास्ताविकम् तेजोमण्डल तत्त्वात्मक सामवेद है, " इस रहस्य का किसी भी भारतीय व्याख्याताने स्पर्शभी नहीं किया ÷ । “ वस्तुपिण्ड का विष्कम्भ ( व्यास ) ही उस वस्तु का ऋक् है, वस्तुपिण्ड का नभ्यविन्दु ( केन्द्रबिन्दु ) ही उस वस्तु का यजुः है, एवं वस्तुपिण्ड का चारों ओर का वह परिणाह ( घेरा - जो ऋगुरूप विष्कम्भ से त्रिगुणित है, अतएव जिसके लिए -‘ त्रिचं साम ' यह सिद्धान्त स्थापित हुआ है ) - ही उस वस्तु का साम है " इस वस्त्वाधार-भूत तत्त्वात्मिका वेदत्रयी का किसी भी व्याख्याता ने अपनी वेदव्याख्याओं में नामस्मरण भी नहीं किया । सचमुच हमारे लिए यह असमान ही प्रश्न है कि, वेद के प्रति अनन्य श्रद्धा रखने वाले भी भारतीय व्याख्याता कैसे विस्पष्टतम भी इस तथोपवर्णित तत्त्वात्मक वेदस्वरूपबोध से अद्यावधि तटस्थ बने रह गए? । सहजप्रज्ञानानुगत सविता देवता इस दिशा में यही समाधान कर रहे हैं कि, त्रिगुणभावप्रधानता से वेदानुगत ( ब्राह्मणभागानुगत ) आर्पविद्या - ( प्राणर्पिविद्या ) -त्मक धम्मंबुद्धियोगलक्षण निष्काम कर्म्मयोग मानव की प्रकृतिनिबन्धना एषणा के निग्रहानुग्रह से काला-न्तर में त्रिगुणभावापन्न वन गया । परिणामस्वरूप निष्कामयोग काम्ययोगात्मक ' यज्ञकाण्ड ' रूप म परिणत हो गया । काम्यकर्मानुबन्धी इस यज्ञिय कर्मकाण्ड के प्रति भारतीय प्रज्ञा सर्वात्मना प्रभिनिविष्ट हो गई । इसी श्रासक्तिमूलक कर्मा भनिवेश ने भारतीय प्रज्ञा को इस सीमा पर्य्यन्त अभिनिविष्ट बना डाला कि, जिस किसी ने कर्मकाण्डपद्धतियों में जैसा कुछ सन्निवेश कर डाला, वह भी इस भावुक कर्म्मठ के लिए एक ' शास्त्रविधान ' हीं प्रमाणित हो गया । ज्ञानविज्ञाना-मिका परिभाषाओं के महान् कोश शतपथब्राह्मण में एक इसी प्रकार के अभिनिवेश का भगवान् याज्ञबल्क्य ने स्पष्टीकरण किया है । पाठकों के अनुरञ्जन के लिए वह उदाहरण यहाँ भी उद्धृत कर दिया जाता है | शारीरिक भूताग्नि में प्राणानि के प्रधान के लिए विहित विशेष यज्ञकर्म्म ही ' अग्न्याधान-कर्म्म ' कहलाया है । तैत्तिरीय सम्प्रदाय के किसी याज्ञिक ने जब अग्न्याधान किया होगा, तो वहीं कहीं आस पास ‘ अज ' पशु भी बँध रहा होगा । एकमात्र इसी आधार पर तद्वंशजों नें, एवं तदा-वार्य्यसम्प्रदायशिष्यों नें अग्न्याधानकर्म में अजपशु बाँधना भी शास्त्रविहित मान लिया, जब -- ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः सर्वं तेजः सामरूप्यं ह शश्वत्
सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत् ।
सर्वं हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् ॥
— तैत्तिरीय ब्रा ०३।१२।६।१,२, ।