Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II — पृष्ठ 11–20
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 11–20
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किमपि प्रास्ताविकम् कि इसका शास्त्रविधि से कोई सम्बन्ध नहीं है । भगवान् याज्ञवल्क्य ने इसी काल्पनिक ' अज-पशुबन्धन ' कर्म की निःसारता बतलाते हुए कहा है कि, यज्ञ में समागत हविद्र ग्यादि को सुरक्षित रखने के लिए ही आचार्य्यविशेष ने अग्न्याधानकाल में अपने घर के अज शु को बँधवा दिया था, जिस बन्धनकर्म्म का यज्ञषद्धति से कोई सम्बन्ध नहीं है । कहीं से अजपशु लाकर बाँधना, एवं इससे यज्ञपद्धति की पूर्णता मान बैठना सर्वथा निरर्थक है । यदि घर में अज पशु हो, और उससे आशङ्का ही हो, तो अग्नीधादि किसी ऋत्विक को ही वह दे देना चाहिए | इससे भी विद्रव्यादिरक्षात्मक प्रयोजन सिद्ध हो जाता है । इसका तो कुछ भी अर्थ नहीं है कि, कहीं से जपशु लाया जाय, और उसे पद्धति का अङ्ग मानते हुए बाँधा जाय । काम्य कम्मों का आत्यन्तिक अभिनिवेश, तत्पद्धतिमात्र के पूर्वापर समन्वय की आतुरता, लाककलैषरणाओं की सतत चर्व्वणा, आदि आदि अभिनिवेशों में ही विगत शताब्दियों में वेद के रहस्यपूर्ण तत्त्ववाद एकान्ततः आवृत कर लिया । फलस्वरूप तत्कालीन व्याख्याताओं का एकमात्र यही पुरुषार्थ शेष बना रह गया कि, वे पञ्चम्यर्थ - पष्ठयर्थादि के द्वारा प्रकृति - प्रत्यय-समन्वय - माध्यम से वेदशास्त्र की कर्म्मकाण्डपरा व्याख्याओं में हीं अपनी प्रज्ञा समर्पित करते रहें । अवश्य ही जहाँ तक ' कर्म्मपद्धति ' का सम्बन्ध है, व्याख्याताओं का प्रयास स्तुत्य माना जायगा । किन्तु जिस मौलिक रहस्यविज्ञान के ( सृष्टिविज्ञान के आधार पर कर्मकाण्ड व्यवस्थित था, उसे सर्वथा विस्मृत कर देने का ही वह महाभयावह परिणाम हुआ, जिसके कारण आज वही शास्त्र हमारी दृष्टि में एक अनुपयोगी शास्त्र प्रमाणित हो रहा है, किंवा प्रमाणित किया जा रहा है । ' देव विद्यया करोति श्रद्धया उपनिषदा, तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति ' ( छान्दाग्य उप ० १ | १ | १० | ) इत्यादि शास्त्रसिद्ध आदेश की उपेक्षा करने वाले व्याख्याताओं का कार्य्यकारण-सम्बन्धपरिज्ञानात्मिका विद्या, मानस सत्यसंकल्प से अनुप्राणिता बुद्धियुक्ता धृतिलक्षणा श्रद्धा, एवं मौलिक उपपत्तिपरिज्ञानात्मिका उपनिपत्, इन तीनों माध्यमों से वञ्चित केवल प्रकृति-प्रत्यग्र - समन्वयात्मक व्याख्या कौशल उत्तरोत्तर निर्वीर्य ही प्रमाणित होता गया । यज्ञकर्मानुगता तथाकथिता अभिनिवेशभावना का विगत युगों में अवश्य ही एक भारतीय मेधावी - महाविद्वान के द्वारा संशोधन हुआ, जो आस्तिक प्रजा में ' भगवान् शङ्कराचार्य्य ' नाम * तद्ध के ( तैत्तिरीयाः ) अजमुपबध्नन्ति - ' आग्नेयोऽजः, अग्नेरेव सर्वत्वाय ' – इति वदन्तः । तदु तथा न कुर्यात् । यदि अजः स्यात् ( गृहे ), अग्नीध एवैनं प्रातर्दद्यात् । तेनैव तं कामममाप्नोति । तस्मान्नाद्रियेत । --शतः ब्रा ० शाश
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किमपि प्रास्ताविकम् से प्रसिद्ध हैं | आप काम्य कर्म्मवाद की एषणाओं से भारतीय प्रज्ञा का उद्बोधन कराया । एवं तत्परिणामस्वरूप राष्ट्र में कर्मत्यागलक्षणा वैसो वेदान्तनिष्ठा जागरूक हो पड़ी, जिससे कामना के माथ साथ कर्म्मकाण्ड भी अभिभूत हो गया । संहिता, एवं तद्व्याख्याभूत ब्राह्मणग्रन्थों का स्पर्श भी न करते हुए आचार्य ने केवल उस उपनिपत ' का ही अपनी व्याख्या का मुख्य लक्ष्य बनाया,जो उपनिपत् - शास्त्र बाह्यदृष्या सहसा ऐसी भ्रान्ति उत्पन्न कर देता है, मानो इसके द्वारा कर्मकाण्ड का विरोध ही हुआ हो, जसा कि- ' प्लवा ह्य ेते अद्धा यज्ञरूपाः ' - ' नास्त्यकृतः कृतेन ' - ' तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मण: ' -- ' त्यागेन केऽमृतच्चमानशुः ' इत्यादि कतिपय पनिषद वचनों से स्पष्ट है । बस्तुस्थिति तो कुछ ऐसी है कि, ' संहिता - ब्राह्मण - आरण्यक - उपनिषत् ' चारों विभाग परस्पर नित्य संश्लिष्ट हैं । चारों की समषि ही ' कृत्स्नवेदशास्त्र ' है । अतएव चारों परस्पर अन्योन्याश्रित हैं, जैसाकि ' उपनिषत् ' शब्द के अवच्छेदक का स्पष्टीकरण करते हुए भूमिका-प्रथमखण्ड में विस्तार से बतलाया जा चुका है । संहिता, एवं तद्व्याख्याभूत ब्राह्मणग्रन्थों की रहस्यपूर्णा सृष्ट्रिविद्या का परिज्ञान किए विना केवल उपनिषत् भाग के याचार पर ' उपनिषत् ' के एक अक्षार्थ का भी समन्वय सम्भव नहीं है । कहना न होगा कि, इसी अङ्गभङ्गात्मिका उपनिषद्भक्ति ने भारतीय विज्ञानगरिमा को सर्वथा अभिभूत हो कर डाला । और केवल वेदान्तनिष्ठा का उद्घोष करने वाली प्रजा अभ्युदय - निःश्रेयस - संसाधक समस्त कर्त्तव्य-कम्मों से एकान्ततः पराङ्मुख ही बन गई । कालान्तर में इसी पराङ्मुखता ने उस ' सन्तमत ' को जन्म दे ही तो डाला, जिसका मूलकेन्द्र बना भावुकता, एवं महान पुरुषार्थ बना ' ' आलप्यालम्! और आज के सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र - भारत की स्वतन्त्रनिष्ठ प्रज्ञा ने अपने इस मौलिक साहित्य, तथा तन्मूला राष्ट्रीय संस्कृति का कैसा स्वरूप समझा - समझाया?, प्रश्न इसलिए सर्वथा मीमांस्य है कि, आसन्नप्राप्ता अभिनव - स्वतन्त्रता की स्वातन्त्र्यचणा से मनः - शरीर-त्रिभोर बने हुए जन - गण के अन्तराल को इस कटुप्रश्न की कटुमीमांसा से संतुच्ध कर देना हमें अभीष्ट नहीं है । ' संस्कृति ' के नाम पर जहाँ - जैसा जो कुछ घटित विवदित हो रहा है, ही बहुत सम्भव है - निकट भविष्य में हीं राष्ट्रीय जन - मानस को उद्बोधन प्रदान करदे । एतदतिरिक्त जब तक भारतीय विद्वान अपने मौलिक साहित्य का एवं तन्मूना राष्ट्रीय संस्कृति को अनेक शताब्दियों के पूर्वनिर्दिष्ट काल्पनिक आवेशों से उन्मुक्त कर उसे विशुद्ध-ज्ञानविज्ञानस्वरूप से राष्ट्र के सम्मुख समुपस्थित नहीं क देते, तब तक राष्ट्रीय प्रज्ञा से इस सम्बन्ध में कुछ भी आग्रह करना केवल दुराग्रह ही तो माना जायगा । ह
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किमपि प्रास्ताविकम् अवश्य ही हमें इस दिशा में उन प्रतीच्य विद्वानों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर देनी चाहिए, जिन्होंने आर्य वैदिक साहित्य के उन दुर्लभ ग्रन्थों का प्रकाशन कर अपनी प्राच्य -सांस्कृतिक निष्ठा से भारतराष्ट्र का ऋणी बनाया है, जबकि आप वैदिक साहित्य की नामभक्ति में विभोर भारतराष्ट्र के सामान्य जनमानस की कौन कहे, अधिकांश विद्वानों को भी उन प्रन्थों के नान भी विदित नहीं है । रही बात प्रतीच्य विद्वानों के द्वारा संकलिता अर्थसमन्वयात्मिका व्याख्याओं की 1 । सो इसलिए श्रमीमांस्य है कि, जब कि स्वयं भारतीय विद्वान् हीं तथाकथितरूपेण ' त्र्याख्याजगत् ' की दृष्टि से मीमांस्य हैं, तो जिन प्रतीच्य विद्वानों के साहित्य - विमर्श का एकमात्र आधार विशुद्ध बुद्धिवाद है, वे यदि इस दिशा में अपनी मान्यताओं के अनुपात से ही भारतीय आर्ष साहित्य की व्याख्या करें, तो कोई आश्चर्य नहीं है साथ ही जो आधुनिक भारतीय विद्वान्, जिनके कि आदर्श एक हेलया प्रतीच्य विद्वान् ही वने हुए हैं, वे भी यदि वेदव्याख्या के सम्बन्ध में उन्हीं के विचारों का अनुसरण करें, तो इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं है । बिशुद्ध बुद्धिवादात्मिका इन प्रतीच्य व्याख्याओं का केवल एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा यह प्रमाणित करने के लिए कि, वैदिक पारिभाषिक तत्त्वार्थसमन्वय से बचित श्रद्धा - आस्था-विद्या - उपनिषत् - शून्य - शुष्क बुद्धिवाद, एवं बुद्धितत्त्वशून्य अभिनिवेशात्मक विशुद्ध अन्धश्रद्धाबाद किस प्रकार वेदार्थ को विकृत कर दिया करते हैं । ब्राह्मणग्रन्थों में सुप्रसिद्ध ऐतरेय ब्राह्मण का आरम्भ - ' - अग्नि देवानामवमः, विष्णुः परमः । तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता: ' ( ऐत ० ना ० १११ । १ । ) इस वचन से हुआ है । बुद्धिवादी प्रतीच्च व्याख्याताओं ने एवं तदनुगामी केवल बुद्धिवादी अर्वाचीन भारतीय व्याख्याताओं ने उक्त वचन का तात्त्विक? समन्वय करते हुए अपने ये विचार व्यक्त किए हैं कि-" यज्ञारम्भकाल में भारतीय प्रधानरूप से अग्नि को ही प्रधानता देते थे । किन्तु आगे जाकर अग्नि का स्थान विष्णुपूजा ने ग्रहण कर लिया । फलस्वरूप अग्नि गौण देवता बन गए, एवं विष्णु प्रधान देवता बन गए । इन दोनों के अतिरिक्त अन्य देवता अनुपात से विभिन्न स्थान - सम्मानों के अधिकारी मान लिए गए " । प्राच्य भारतीय वेदत्र्याख्याता केवल श्रद्धालु सर्वश्री सायणाचार्य ने उक्त वचन का कैसा, और क्या समन्वय किया है?, यह भी देख लीजिए । जैसा कि निवेदन किया गया है, इन प्राच्य भारतीय व्याख्याताओं की दृष्टि भी केवल कर्म्मपद्धतियों पर ही विश्रान्त है । अतएव पद्धति के माध्यम से ही वे वेदार्थ में प्रवृत्त हुए हैं । सायणाचार्य कहते हैं - " जो देवता ' अग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है, उन्हें देषताओं के मध्य में अवम - प्रथम समझना चाहिए । जो विष्णु है, वे परम - उत्तम हैं । १०
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किमपि प्रास्ताविकम् ऐसा समझने में ' अग्निमुखं प्रथमो देवतानामुत्तमो विष्णुरासीत् ' इत्यादि मन्त्र ही प्रमाण है । अर्थात मन्त्र में अग्नि को ' प्रथम ', एव विष्णु को ' उत्तम ' कहा है । अतः यहाँ के श्रवम-परम - शब्दों को प्रथम - उत्तम - परक लगा लेना चाहिए । अथषा " बै " शब्द उपपत्ति का द्योतक है । और उपपत्ति की योजना ( समन्वय ) यों कर लेनी चाहिए कि, यद्यपि ' देव ' शब्द सामा-न्यार्थक बनता हुआ सम्पूर्ण देवताओं का वाचक है । तथापि यहाँ प्रकरणचल से ' अग्निष्टोम ' नामक यज्ञ के अङ्गों से सम्बन्ध रखने वाले शस्त्रकम्मों में प्रतीयमाना प्रधान देवता ही विवक्षित है । शस्त्र १२ हैं । इन में पहिला ' ज्यशास्त्र ' है, जिसके सम्बन्ध में ' भूरग्निज्यों तिरग्निः ' यह मन्त्र विहित है | ' अग्निमारुत ' नामक शस्त्र अन्तिम ( १२ बाँ ) शस्त्र है, जिसके सम्बन्ध में ' विष्णोर्नु ' कम् ' यह मन्त्र विहित है । इसप्रकार अग्निष्टोमसंस्था में द्वादश शस्त्रपाठापेक्षया अग्नि का प्रथमत्त्व, एवं विष्णु का उत्तमत्त्व प्रमाणित हो रहा है । ( एवं यही पूर्ववचन के अश्रम - परम शब्दों की उपपत्ति है ) । अथवा सभी संस्थाओं में उक्त न्यायानुसार अग्नि का प्राथम्य, एवं विष्णु का उत्तमत्त्व स्थापित है । ( यह भी उपपत्ति मानी जा सकती है ) । अथवा-प्रथमा दीक्षणीयेष्टि में अग्नि का यजन होता है, एवं अन्त की उपसदवसानीयेष्टि के स्थान में वाजसेनयी लोग वैष्णवी पूर्णाहुति करते हैं । इसलिए भी अग्नि- विष्णु को अवम - परम- माना जा सकता है | सभी उपपत्नियों का सार? यही है कि, स्तोतव्य, तथा यटु - य देवताओं की अपेक्षा अग्नि का प्राथम्य, एव विष्णु का उत्तमत्त्व ही युक्तियुक्त है । अतएव सम्पूर्ण देवताओं के दोनों ओर रक्षक की भाँति अग्नि- विष्णु हीं प्रशस्त मान लिए गए हैं " । - देखिए ऐ ० ब्रा ० १ | १ | १ | का सायणभाष्य शास्त्रबादी ( शास्त्राभिनिविष्ट ) केवल श्रद्धालु प्राच्य व्याख्याता कहते हैं- " अमुक अमुक स्थलों में अग्नि- विष्णु को प्रथम - उत्तम कहा है, इसलिए अग्नि को देवताओं में अवम, तथा विष्णु को परम मान लिया है " । एवं शुष्क - बुद्धिवादी प्रतीच्य व्याख्याता कहते हैं- " आरम्भ में अग्निपूजन प्रधान था, कालान्तर में विष्णुपूजन प्रधान बन गया । उसी युग में ऐसी मान्यता बन गई कि, अग्नि का गौण स्थान है, एवं विष्णु का प्रमुख स्थान है " क्या उक्त दोनों दृष्टिकोणों स हम किसी तात्त्विक दृष्टिकोण का अनुगमन कर सकते हैं? । नेति होवाच । इसी लिए तो हमें यह निवेदन करना पड़ा कि तत्त्ववाद की विलुमि ने हीं इसप्रकार वेदार्थ के सम्बन्ध में विविध भ्रान्तियों का सज्जन कर डाला है । पारिभाषिक तत्त्वबोध का अभाव, एवं अपने कल्पित सिद्धान्तों के माध्यम से वेदाक्षरों के समन्वय की ११
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' कमाप प्रस्ताविकम् अनधिकार चेष्टा ही इस अनर्थ का प्रधान कारण है । पारिभाषिक तत्त्वसमन्वय की दृष्टि से ' यद्व । ' ' यद्वा ' की परम्परा से सम्बन्ध रखने वाली संशयवृत्तियों की कोई आवश्यकता नहीं है । अपितु सर्वथा निर्णीत - व्यवस्थित समन्वय है वेदवचनों का । प्रकृत उदाहरण को ही लक्ष्य बनाइए । ' स्त्रि सर्वे देवा: ' इत्यादि निगमवचन के अनुसार पार्थिव आग्नेय प्राण-देवता ३३ कोटियों ( श्रेणियों विभागों ) में विभक्त हैं । " यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरि-न्द्र ेण गर्भिणी ” इत्यादि मन्त्रश्रुति के अनुसार भूपिण्डोपलक्षिता पृथिवी के गर्भ में प्राणाग्नि प्रतिष्ठित है, एवं सूर्योपलक्षितः द्य के गर्भ में प्राणेन्द्र प्रतिष्ठित हैं । भूगर्भस्थ प्राणाग्नि अपने रम्यात्मक भाव से भ पिण्ड से निकल कर चारों ओर अपना एक स्वतन्त्र मण्डल बनाता है, जिस प्राणाग्निमण्डल को ' रथन्तरसाम ' कहा गया है । मण्डल में व्याप्त इस प्राणाग्नि की घन - तरल - विरल य तीन अवस्थाएँ हो जातीं हैं, जो श्रवस्थाएँ वैदिक परिभाषा-नुसार क्रमशः ध्रुव - धर्म- धरुण कहलाई हैं । ध्रुवाग्नि ( घनाग्नि ) ' प्राणाग्नि ' नाम से, धर्नाग्नि ( तरलाग्नि ) ‘ प्राणवायु ' नाम से, एवं धरुणा ग्न ( विरलाग्नि ) ' प्राणादित्य ' नाम से प्रसिद्ध है । इन तीनों प्राणाग्नियों के साथ क्रमशः अक्षर गायत्रीछन्द, एकादशाक्षर त्रिष्ट ुपछन्द, एवं द्वादशाक्षर जगतीछन्द, इन तीन वाकूप ( माणात्मक छन्दों का सम्बन्ध होता है । इन छन्दाक्षरों के सम्बन्ध से प्राणाग्नि - वायु- आदित्य- तीनों के क्रमशः ८ - ११ - १० - ये अत्रान्तर अवस्थाविभाग हो जाते हैं, जो क्रमशः आठ वसु, ग्यारह रुद्र, वारह आदित्य इन नामों से प्रसिद्ध हैं । तीनों में आठ और ग्यारह के मध्य में, तथा ११ और १२ के मध्य में दो सान्ध्य प्राण और उद्भूत हैं । सम्भूय एक ही प्राणाग्नि के अवान्तर ३३ विवर्त्त हो जाते हैं । एवं यही पार्थिव ३३ प्राणदेवता है । आरम्भ के आठ सूत्रों में पहिला वस्वग्नि ' अग्नि ' कहलाया है, एवं यही ३३ सों प्राणा-ग्निदेवताओं का उपक्रमस्थान है । एवं अन्त के १२ आदित्यों में सर्वान्त का आदित्य ' विष्णु ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं यही तेतीस प्राणाग्निदेवताओं का उपसंहारस्थान है । आरम्भ में
- - अदित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिन्दम! ।
यादित्या वसवो रुद्रा - अश्विनौ च परन्तप! ॥
- वाल्मीकिरा ० अष्टौ वसवः -८, एकादश रुद्राः - ११, द्वादश - आदित्याः - १२, * 3 * इन्द्रो - धाता भगः - पूषा मित्रोऽथ वरुणो ऽर्यमा । ८ २ 9. -" [ १२ ] अ ंशु - विवस्वान् - त्वष्टा च – सविता - " विष्णु " - रेव च ॥ १२ द्वौ -अश्विनौ - ( इत्यरे २ ) ।
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किमपि प्रस्ताविकम् ' अग्नि ' नामक वस्वग्नि, सर्वान्त में ' विष्णु ' नामक अन्तिम आदित्य, शेष मध्यस्थ ३१ सों प्राणदेवग दोनों के मध्य में भुक्त, सैपा प्राकृतस्थितिः । वैध यज्ञ के द्वारा यज्ञकर्त्ता इन प्राकृतिक पार्थिव आधिदैविक प्राणाग्निदेवताओं को अपने आधिभौतिक प्राणाग्नि में अन्तर्यामसम्बन्ध से प्रतिष्ठित करना चाहता है । इस आधिदैविक-कम्र्माधिकार की योग्यतासम्पादन करने के लिए जो आरम्भ में ' दृष्टिकम् ' किया जाता है, वही ' दीक्षणीयेष्टि ' कहलाया है । इससे यज्ञकर्त्ता दीक्षित ( अधिकारी ) बन जाता है । इस दीक्षणी-ये में ' आग्नावैष्णव पुरोडाश ' द्रव्य सम्पन्न होता है, जैसा कि - ' प्रान्नावैष्णवं पुरोडाशं निर्वपति दीक्षणीयमेकादशकपालम् ' ( ऐ ० ना ० १ १ १ २ ) इत्यादि उत्तरवचन से स्पष्ट है । इस दृष्टि से सम्बन्ध रखने वाला पुरोडाश ( हविद्रव्य ) आग्नावैष्णव क्यों होता है?, दूसरे शब्दों में दीक्षणीयेट्रिक में श्रग्नि, और विष्णु को ही क्यों प्रधानता दी जाती है?, इसी प्रश्न की मौलिक उपपत्ति ( उपनिपत ) बतलाते हुए भगवान एतरेय ने कहा है कि- ' अग्निर्वै देवानामवम: -विष्णुः परमः । तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता: ' । तात्पर्य स्पप्तम है । तेतीस प्राणाग्नि-देवताओं के साथ यज्ञकर्त्ता को अन्तर्यामसम्बन्ध स्थापित करता है । एवं यह प्रयोजन सर्वादिभूत अग्निदेव, तथा सर्वान्तभूत विष्णुदेव के संग्रह से संसिद्ध होजाता है । क्योंकि इतर सम्पूर्ण प्राणदेवता इन दोनों अम ( उपक्रम ) - परम ( उपसंहार ) स्थानीय प्राणदेवताओं से संगृहीत हैं । कहना न होगा कि, परिभाषाओं के समन्वय के बिना स्पष्टतम भी इत्थंभूत समन्वय प्राच्य - प्रतीच्य व्याख्याताओं के अनुग्रह से एक जटिल समस्या प्रमाणित कर दिए गए हैं । श्रलमतिपल्लवितेन । यही अवस्था वेदपदार्थ के सम्बन्ध में घटित हुई है । जिस तात्त्विक वेद का स्वरूप स्वयं वेदशास्त्र में विस्परूप से यत्र तत्र सर्वत्र प्रतिपादित हुआ है, उसके स्वरूप से व्याख्याताओं नें अपने आप को सर्वथा तटस्थ ही प्रमाणित किया है । उनकी दृष्टि में वेद का अर्थ केवल वह ' शब्दराशिमात्र ' ही है, जिसका महर्षियों के द्वारा तत्त्वात्मक अपौरुषेय नित्यकूटस्थ वेद के स्वरूपानुपात से संकलन हुआ है । व्याख्याता इस तथ्य से सर्वथा अपरिचित हैं कि, ' वेद ' वह मौलिक तत्त्व है, जिससे सम्पूर्ण विश्व का, एवं तद्गर्भीभूता चराचरप्रजा का स्वरूप निर्माण हुआ है । ' इपे त्वोर्जे वा ० ' इत्यादि शब्दात्मक मन्त्र से उपक्रान्त, तथा ' खं ब्रह्म ' इत्यादि मन्त्र पर उप-संहृत शब्दसमाम्नायात्मक यजुर्वेदग्रन्थ ही व्याख्याताओं की दृष्टि में ' पौरुपेय वेदशास्त्र, है, जबकि स्वयं वेदशास्त्र ही ' यजुर्वेद ' के तात्त्विक स्वरूप का स्पष्टीकरण करता हुआ यह कह रहा है कि-" यही तो वह यजुः है, जो अपने प्राणात्मक गतिधर्म्म से सर्वत्र व्याप्त है । यही गतिधर्मा प्राणात्मक यजु सब कुछ उत्पन्न करता है । अतएव गत्यात्मक इस प्राणवायु को ही यजु कहा गया है । ( वस्तुस्थिति यह है कि ) आकाश ही ' जू ' है, जो अन्तरितरूप से प्रत्यक्ष है | इस ' जू ' रूप अन्तरिक्षाकाश में आ ६ न्तात् व्याप्त गतिधर्मा प्राणवायु ही ' यत् ' है । एवं यत् - और जू की समन्वित अवस्था का हो नाम ' यज्जू: ' है, जो परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्षभाषा में ' यजु: ' नाम से व्यवहृत हुआ है । देखिए! १३
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किमपि प्रस्ताविकम् “ अयं वा यजुर्योऽयं पवते । एष हि यन्न वेदं सर्वं जनयति । एतं यन्तमनुप्रजायते । तस्मा-द्वायुरेव यजुः । श्रयमेवाकाशो जूः, यदिदम तरिक्षम् । एत ह्याकाशमनु जयते । तदेतत् - यजुवायुश्च-अन्तरिक्षञ्च, यच्च - जूश्च । तस्माद्यजुः । एष एव यत्, एप ह्येति । तदेतद्यजु क्सामयोः प्रतिष्ठितम् । ऋक्सामे वद्दतः ” । - शतपथब्राह्मण १०।३।५।१, २, । यज्ञिय कर्म्मकाण्डनिबन्धन कामभाव से समुत्पन्न अभिनिवेश के निग्रह से, आधिदैविक प्राणरहस्यस्वरूपज्ञानाभाव जनिता आचारशून्या दर्शनदृष्टिभ्रान्ति से, जगन्मिथ्यात्ववादात्मिका कल्पित वेदान्तनिष्ठा से, तत्प्रसूनरूपा अभिनिविष्टा भावुकतापूर्ण सन्तमतानुगति से, विविध मतवादनिबन्धन साम्प्रदायिक संघर्ष से, प्रतीच्य शासनपाशबन्धनजनिता आत्मदासता स, क्षणिक - भूत विज्ञानानुगत तात्कालिक - चार्काचक्यत्र्यामोहन से, सर्वोपरि भारतीय ब्राह्मणप्रज्ञा के वेदस्वाध्यायपरित्याग-आचारपरित्याग आलस्य अन्नदोष से, एवमेव अन्याय ज्ञात - अज्ञात द पपरम्पराओं के निग्रह से भारतराष्ट्र के सर्वस्वभूत इस आई - वेदतत्त्व का स्वरूप सर्वथैव अभिभूत हो गया है, जिसके दुष्परिणामस्वरूप अनेक शताब्दियों से इस राष्ट्र को नितान्त भावुकतापूर्णा स्खलनपरम्पराओं का ही अनुगामी बना रहना पड़ा है । एवं तदवधिपर्यन्त इसका यह स्खलन कदापि उपसंहृत न हो सकेगा, जब तक कि यह अपनी इस मूल निधि की यों हीं उपेक्षा करता रहेगा । अतएव स्वतन्त्र भारत की स्वतन्त्रप्रज्ञा का सर्वप्रधान यह अनिवार्य, तथा प्रथम प्रमुख नैष्ठिक कर्त्तव्य होना चाहिए कि वह विशुद्ध श्रादृष्टि से, तत्त्वानुगता ज्ञानविज्ञानदृष्टि से अपनी इस निधि के पुनरुत्थान के प्रति अविलम्ब जागरूक हो । ' नान्यः पन्था विद्यते - अयनाय ' । इसी ' जागरूकता ' के अनुबन्ध से वेदतत्त्वम्वरूपनिरूपणात्मक प्रस्तुत द्वितीय खण्ड भारतीय आर्षप्रज्ञा के सम्मुख इसलिए उपस्थित हो रहा है कि, वह दोषदर्शन दृष्टि से ही एक बार इस पर दृष्टिनिक्षेप का अनुग्रह अवश्य कर अवश्य ही तद्द्द्वारा उसकी ' पुराणीप्रज्ञा ' किसी वैसे अचिन्त्य - अप्रतर्क्य - अनिर्देश्य - प्रसुप्तमिव तत्त्व की ओर आकर्षित होगी, जिसके माध्यम से उसे भारतराष्ट्र के वास्तविक सांस्कृतिक आलोक का सान्निध्य प्राप्त हो सकेगा । प्रस्तुत खण्ड में पाँच स्तम्भों का समावेश हुआ है, जिनके स्वरूप - दिग्दर्शन का भी स्वमन्वय कर लेना चाहिए । प्रथमस्तम्भ में वेद के उम्र मौलिक स्वरूप का दिग्दर्शन कराया गया है, जिसका सौरसावित्राग्नि से सम्बन्ध है । एवं जिसके माध्यम से सुप्रसिद्ध महर्षि भरद्वाज ने इन्द्र के बर से वेद की अनन्तता का साक्षात्कार किया था । द्वितीयस्तम्भ में उन प्रमाणों का संकलन हुआ है, जिनके द्वारा यह स्पष्ट प्रमाणित हो जाता है कि, " जिस वेढ़ को प्रजा अपौरुषेय - नित्यकूटस्थ बेद कहती - मानती है, वह वेद वस्तुतः वह मौलिक तत्त्वविशेष ही है, जिससे सम्पूर्ण विश्व का सर्ज्जन हुआ है, एवं जिस सृष्टिमूलभूत इत्थंभूत वेदतन्त्व के स्वरूप-विश्लेषण के लिए ही शब्दात्मक वेदमन्थ आविर्भूत हुए हैं " । तृतीयस्तम्भ में वेद के उस प्राजापत्यस्वरूप का स्वरूप विश्लेषण हुआ है, जिसका बृहतीसहस्र ( ३६००० ) संख्या के व्यूहन से सम्बन्ध है । चतुर्थस्तम्भ- में अपौरुषेय वेद के उस तात्त्विक इतिवृत्त का स्वरूपोद्घाटन हुआ । १४
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किमपि प्रस्ताविकम् है, जो वस्तुगत्या सम्पूर्ण विश्व का इतिहास ( सृष्टिविज्ञानात्मक इतिहास ) है | पञ्चमस्तम्भ में बेदतत्वात्मक प्राणामि के उन प्राकृत विकासों का स्वरूपविश्लेषण हुआ है, जिनसे नित्य वेद -पदार्थ अपने तत्त्वात्मक ऋक् - यजुः साम - अथर्व - भात्रों से क्रमशः २१ - २१-१०००-६ - संख्या-वित्त में परिणत होकर विश्व का निर्माण कर रहा है । सर्वान्त के पशिष्ट विभाग के सम्बन्ध में एक सामयिक निवेदन और कर देना है । निबन्धों में जो शास्त्रीय वचन यत्र - तत्र उद्धृत हुए हैं, उनका समन्वय तत्तद्विषयों के साथ ही कर दिया गया है | इसलिए भी उनके अक्षरार्थ समन्वय का निबन्धों में प्रयास नहीं हुआ है । दूसरा कारण यह है कि, अत्यन्त रहस्यपूर्ण वेदवचनों का समन्वय केबल अक्षरार्थ समन्वय से कथमपि सम्भव नहीं है । हम तो इत्थंभूत अक्षरार्थसमन्वय मात्र में अपने आपको सर्वथा असमर्थ ही अनु-भूत कर रहे हैं । यह सब कुछ अनुभव करते हुए भी हमने अमुक मित्रों की प्रेरणा से अनि-च्छन्नपि यह सङ्कल्प कर लिया था कि, वचनों के अक्षरार्थसमन्वय का ग्रन्थान्त में परिशिष्टरूप से संकलन कर दिया जाय । संकल्पानुसार ही प्रयत्न प्रक्रान्त भी हो चुका था, जिसके परिणामस्वरूप अनुमानतः १० पृष्ठ परिशिरूप से प्रकाशित भी कर दिए । सहसा हमें शारीरिक पीड़ा से सन्त्रस्त हो जाना पड़ा | उधर ‘ संस्थान ' के मन्त्री महाभाग का ऐसा आग्रह था कि, शीघ्र से शीघ्र मुद्रित ग्रन्थों को बाह्य जगत् की वस्तु बना देना चाहिए । अतएव यह अर्थसमन्वय प्रकरगा हमें तत्पृष्ठों पर ही विश्रान्त कर देना पड़ा । सम्भवतः कभी पुनः संस्करण पर ही परिशिष्टविभाग पूर्णरूपेण प्रकाशित सकेगा । तत्त्वानुगत विषयों के समन्वय की दृष्टि से प्रस्तुत खण्डमें ३१ रेखात्मक परिलेख ( चित्र ) समाविष्ट हुए हैं । यद्यपि विभक्त - विषय - प्रदर्शनानुबन्धी इन परिलेखों का तत्तद्वर्णानुपात से ( तिरङ्ग - रूप से ) ही समाविषु होना उचित था । तथापि संस्थान की आर्थिक शैशवावस्था की से वैसा सम्भव न हो सका । अवश्य ही इस सुविधा के प्राप्त हो जाने पर प्रकाशन को सर्वथा विषयानुरूप बनाया जा सकेगा । यही स्थिति प्रकाशन - सौष्ठव के सम्बन्ध में घटित हुई है । सर्वथा एकाकीरूप से अपनी शारीरिक अस्वस्थता के निग्रह से प्रकाशन जैसा चाहिए, वैसा नहीं हो रहा । जिस युग में आर्ष दृष्टिकोण से प्रजा सर्वथा पराङ्मुख बन रही हो, इत्थंभूत आपद्य ग में वैसी सुविधाओं का प्राप्त हो जाना ' खपुष्पकल्पना ' ही मानी जायगी, जिन सुविधाओं के बिना कोई भी आयोजन व्यवस्थित नहीं वन सकता | अनुरूप व्यवस्थित - साधन - परिग्रहों की कल्पना-चर्व्वणा व्यर्थ है । जैसा जो कुछ सम्भव है, तदनुपात से जीवन इस शेषांश में जैसा कुछ बन पड़, करते जाना हीं श्रेयपन्था है । और इसी श्रेयो भावना के फलस्वरूप यह बाङ्मय श्रद्धाप्रसून राष्ट्रीय प्रजा के प्रति समर्पित है । ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपत् १ वि ० सं ० २०१३ शनैश्वर - वासर विधेयः— मोतीलालशर्मा, वेदवीथीपथिकः भारद्वाजोपाह्वः जयपत्तनाभिजनः १५
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श्रीः उपरतञ्चेदं किमपि प्रास्ताविकम् उ ० भू ० द्वितीयखण्डानुगतम् 8. -
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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्ड संक्षिप्त - विषयसूची