श्रीगणेशाय नमः।
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री
Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II · 264 पृष्ठ · 27 खण्ड
In English
Introduction to the Science of Upanishads, Volume 2
This is the second volume of a series titled Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika. It contains philosophical essays written in Hindi by Motilal Sharma. The work aims to explain the relationship between the Vedas as spoken texts and their eternal nature.
This book answers
- What is the connection between the vedas and the upanishads?
- Is the veda a human-authored or divine text?
- How does the science of the upanishads relate to vedic knowledge?
विषय सूची
- श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका द्वितीय खण्ड २ मोतीलालशम्र्मोपाह्वो मुक्तरक्तशर्म्मा आङ्गिरसो भारद्वाजः वेदपीथी - पथिकः जयपत्तनाभिजनः श्री श्रीयुत… 1–10
- किमपि प्रास्ताविकम् कि इसका शास्त्रविधि से कोई सम्बन्ध नहीं है । भगवान् याज्ञवल्क्य ने इसी काल्पनिक ' अज-पशुबन्धन ' कर्म की निःसारता बतलाते हुए कहा है कि,… 11–20
- श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्डान्तर्गता परिलेखसूची —— ] ): ( -- ): ( [ १ - अभिव्यक्तिचाधारभूत - ' क्युन ' परिलेख: ( पृ ० सं ०६०, तथा ६६१ के… 21–30
- विषयसूची ( ४ ) - ' अपौरुषेय वेद का तात्विक इतिवृत्त ' नामक चतुर्थस्तम्भान्तर्गत अवान्तरपरिच्छेद-१ - प्रजापति, और वेद २७३ | २८ - पार्थिव, एवं सौर सामत्रयी… 31–40
- द्वितीयखण्ड पूर्वापर प्रकरणसमन्वय वञ्चित रहतीं हुई वेदार्थसम्बन्ध में अनुपयोगिनीं हीं सिद्ध हुई… 41–50
- द्वितीयखण्ड है?, एवं स्वयं सावित्राग्नि का मौलिक स्वरूप क्या है? । इन प्रश्नों के समाधान के लिए हमे ग्रह नामक ' प्रति-पन ' भाव, एवं उपग्रह नामक ' अनुचर '… 51–60
- द्वितीयखण्ड ( १ ) - " स योऽयं मध्ये प्राणः, एष एवेन्द्रः ( ग्रहः, प्रतिपत् ) । तानेष प्राणान् मध्यत इन्द्रियेणैन्द्व । यदैन्द्ध, तस्मादिन्धः… 61–70
- द्वितीयखण्ड सप्तपुरुषपुरुषात्मकश्चित्यप्रजापतिः -- “ ब्रह्म ” १ - ऋष }. ऋग्वेद: २ -- यत् “ ब्रह्मनिःश्वसितवेदः, अपौरुषेयवेदः, ब्रह्मवेदः, यजुर्वेदः ३ --… 71–80
- द्वितीयखण्ड समन्वय की दृष्टि से हम यहाँ क्रमशः तीनों ग्रहों के १८, १३, ६, इन उपग्रहों को प्रधानता देंगे… 81–90
- द्वितीयखण्ड तीन प्रजापति, तीनों के तीन वेद, एवं तीनों से क्रमश: वेद, यज्ञ, प्रजाभावों का विकास, यही दूस दृष्टि है, जिसका कि पूर्व में दिग्दर्शन कराया जा… 91–100
- भाष्यभूमिका परमाकाशलक्षण परमेश्वर के गर्भ में पुराणाकाशलक्षण महेश्वर प्रतिष्ठित है, पुराणकाशलक्षण ५. हेश्वर के गर्भ में भूताकाशलक्षण ईश्वर प्रतिष्ठित है… 101–110
- भाष्यभूमिका ही है, एवं न कोई लाभ ही । सुसूक्ष्म प्राणजगत् का प्रथम आविष्कारक भारतवर्ष इस प्रकार म्थूल जगत् का उपासक बन जायगा, प्राणविद्या का स्थान प्राणी… 111–120
- भाष्यभूमिका ३ – ऋषे मन्त्रकृतां स्तोमैः कश्यपोद्वर्धयन् गिरः । सोमं नमस्य राजानं यो जज्ञ े वीरुधां पतिः । - ऋक् सं ० ६१ ९ ४… 121–130
- भाष्यभूमिका अग्निर्जागार तमयं सोम आह--तवाहमस्मि सख्य न्योकाः । --ऋक् सं ० ५ । ४५ । १५ । “ अग्नि जग पड़ा, ऋचाएँ इस की कामना करने लगीं… 131–140
- बी हरीण, तानि यजुषां रूपम् । सैषा त्रयीविद्या यज्ञः । तस्या एतच्छिल्पमेष वर्णः । तद्यत् कृष्णानं भवति, यज्ञ-स्यैव सर्वत्वाय… 141–150
- मायभूमिका में रहने वाले कपालद्वय हैं । देवयोनिरूप अग्नि में डाली जाने वाली आहुति ही रेत ( शुक्र ) है… 151–160
- भाष्यभूमिका ३१ - व्याहृतित्रयी, और वेदत्रयी-( ब्याहृतित्रेदः, - ( ३३ ) --‘- भूर्भुवः स्वरित्येता वा व्याहृतय इमे त्रयो वेदाः… 161–170
- भाष्यभूमिका " अग्नि - वायु - ग्रादित्य से ही प्रजापति ने विश्वयज्ञस्वरूपसञ्चालन के लिए ऋक् - यजुः - सामलक्षण– सनातन त्रयीब्रह्म का दोहन किया " इत्यादिरूप… 171–180
- भूमिका ३ - श्रयं वेदः पृथिवीमन्वविन्दद् गुहा सतीं गहने गरेषु । स विन्दतु यजमानाय लोकमच्छिद्रं यज्ञं भूरिकर्म्मा करोति " ( तै ० ब्रा ० ३७ ६ १३ )… 181–190
- अथैनमेतद् भूय एव शमयति । सर्वतो विकर्षति । सर्वत एवैनमेतच्छमयति " । - शत ० ६ । ११२ / २० मातरिश्वा वायु की नोदना से होने वाली घृताहुति ( भार्गव सामाहुति )… 191–200
- भाष्यभूमिका त्रिलोकी है, रोदसी त्रैलोक्य रौद्रः त्रिलोकी है । विश्व के पाँचों पर्वों में उत्तर - उत्तर के पर्व में पूर्व - पूर्व पर्वका अन्तर्भाव है… 201–210
- भाष्यभूमिका पाशुकाग्निग्निवंश में सातवीं हैं । यदि इमे वृद्धातिवृद्ध प्रपौत्र स्थानीय माना जाता है, तत्र तो पूर्व-कथनानुसार सर्वमूलभूत ब्रह्माग्नि ' बिता… 211–220
- उपनिषद् भूमिका - द्वितीयखण्ड ( १८४, तथा १८५ के मध्य में ) -( चक्र सम्वत्सर प्रतिकृतिरियम ) विष्वद्वृत्त वृ सूर्य्य: भूर्पिष्ठः श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय,… 221–230
- भूमिका श्रादित्य कहनाने लगता है । अग्नि वायु आदेत्य तीनों में गतिभाव उपनच्च होता है । उवर गतिभाव जत्र एकमात्र वायु का ही धर्म्म है, तो हन कर सकते हैं कि,… 231–240
- द्वितीयखण्ड करता है, पानी बुद्बुद् स्वरूप में परिणत हो जाता है । वतु'लाकार बुद्बुद् के गर्भ में प्रविष्ट तिसहवागे " यु बुद्धुमण्डल के त्रुटित होने से… 241–250
- द्वितीयखण्ड उक्त दो कारणों के अतिरिक्त मध्यस्थ ' बृहत्प्राण ' खःस्वस्तिक, अधः स्वस्तिक, उदयन्त्रिन्दु, अस्तन्त्रिन्दु, सप्तग्रहोरात्र, ग्रादि अन्यान्य… 251–260
- IIIII इस ग्रन्थि - बन्धन का यह हुआ कि, कृष्णपक्ष के भी पञ्चदश ( १५ ) पर्व ( अहोरात्र ) हो गए, एवं शुक्ल-पक्ष के भी पञ्चदश पर्व हो गए… 261–264