उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका २ मोतीलाल शास्त्री
Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika II · 264 पृष्ठ · 27 खण्ड
विषय सूची
- श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका द्वितीय खण्ड २ मोतीलालशम्र्मोपाह्वो मुक्तरक्तशर्म्मा आङ्गिरसो भारद्वाजः वेदपीथी - पथिकः जयपत्तनाभिजनः श्री श्रीयुत… 1–10
- किमपि प्रास्ताविकम् कि इसका शास्त्रविधि से कोई सम्बन्ध नहीं है । भगवान् याज्ञवल्क्य ने इसी काल्पनिक ' अज-पशुबन्धन ' कर्म की निःसारता बतलाते हुए कहा है कि,… 11–20
- श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्डान्तर्गता परिलेखसूची —— ] ): ( -- ): ( [ १ - अभिव्यक्तिचाधारभूत - ' क्युन ' परिलेख: ( पृ ० सं ०६०, तथा ६६१ के… 21–30
- विषयसूची ( ४ ) - ' अपौरुषेय वेद का तात्विक इतिवृत्त ' नामक चतुर्थस्तम्भान्तर्गत अवान्तरपरिच्छेद-१ - प्रजापति, और वेद २७३ | २८ - पार्थिव, एवं सौर सामत्रयी… 31–40
- द्वितीयखण्ड पूर्वापर प्रकरणसमन्वय वञ्चित रहतीं हुई वेदार्थसम्बन्ध में अनुपयोगिनीं हीं सिद्ध हुई… 41–50
- द्वितीयखण्ड है?, एवं स्वयं सावित्राग्नि का मौलिक स्वरूप क्या है? । इन प्रश्नों के समाधान के लिए हमे ग्रह नामक ' प्रति-पन ' भाव, एवं उपग्रह नामक ' अनुचर '… 51–60
- द्वितीयखण्ड ( १ ) - " स योऽयं मध्ये प्राणः, एष एवेन्द्रः ( ग्रहः, प्रतिपत् ) । तानेष प्राणान् मध्यत इन्द्रियेणैन्द्व । यदैन्द्ध, तस्मादिन्धः… 61–70
- द्वितीयखण्ड सप्तपुरुषपुरुषात्मकश्चित्यप्रजापतिः -- “ ब्रह्म ” १ - ऋष }. ऋग्वेद: २ -- यत् “ ब्रह्मनिःश्वसितवेदः, अपौरुषेयवेदः, ब्रह्मवेदः, यजुर्वेदः ३ --… 71–80
- द्वितीयखण्ड समन्वय की दृष्टि से हम यहाँ क्रमशः तीनों ग्रहों के १८, १३, ६, इन उपग्रहों को प्रधानता देंगे… 81–90
- द्वितीयखण्ड तीन प्रजापति, तीनों के तीन वेद, एवं तीनों से क्रमश: वेद, यज्ञ, प्रजाभावों का विकास, यही दूस दृष्टि है, जिसका कि पूर्व में दिग्दर्शन कराया जा… 91–100
- भाष्यभूमिका परमाकाशलक्षण परमेश्वर के गर्भ में पुराणाकाशलक्षण महेश्वर प्रतिष्ठित है, पुराणकाशलक्षण ५. हेश्वर के गर्भ में भूताकाशलक्षण ईश्वर प्रतिष्ठित है… 101–110
- भाष्यभूमिका ही है, एवं न कोई लाभ ही । सुसूक्ष्म प्राणजगत् का प्रथम आविष्कारक भारतवर्ष इस प्रकार म्थूल जगत् का उपासक बन जायगा, प्राणविद्या का स्थान प्राणी… 111–120
- भाष्यभूमिका ३ – ऋषे मन्त्रकृतां स्तोमैः कश्यपोद्वर्धयन् गिरः । सोमं नमस्य राजानं यो जज्ञ े वीरुधां पतिः । - ऋक् सं ० ६१ ९ ४… 121–130
- भाष्यभूमिका अग्निर्जागार तमयं सोम आह--तवाहमस्मि सख्य न्योकाः । --ऋक् सं ० ५ । ४५ । १५ । “ अग्नि जग पड़ा, ऋचाएँ इस की कामना करने लगीं… 131–140
- बी हरीण, तानि यजुषां रूपम् । सैषा त्रयीविद्या यज्ञः । तस्या एतच्छिल्पमेष वर्णः । तद्यत् कृष्णानं भवति, यज्ञ-स्यैव सर्वत्वाय… 141–150
- मायभूमिका में रहने वाले कपालद्वय हैं । देवयोनिरूप अग्नि में डाली जाने वाली आहुति ही रेत ( शुक्र ) है… 151–160
- भाष्यभूमिका ३१ - व्याहृतित्रयी, और वेदत्रयी-( ब्याहृतित्रेदः, - ( ३३ ) --‘- भूर्भुवः स्वरित्येता वा व्याहृतय इमे त्रयो वेदाः… 161–170
- भाष्यभूमिका " अग्नि - वायु - ग्रादित्य से ही प्रजापति ने विश्वयज्ञस्वरूपसञ्चालन के लिए ऋक् - यजुः - सामलक्षण– सनातन त्रयीब्रह्म का दोहन किया " इत्यादिरूप… 171–180
- भूमिका ३ - श्रयं वेदः पृथिवीमन्वविन्दद् गुहा सतीं गहने गरेषु । स विन्दतु यजमानाय लोकमच्छिद्रं यज्ञं भूरिकर्म्मा करोति " ( तै ० ब्रा ० ३७ ६ १३ )… 181–190
- अथैनमेतद् भूय एव शमयति । सर्वतो विकर्षति । सर्वत एवैनमेतच्छमयति " । - शत ० ६ । ११२ / २० मातरिश्वा वायु की नोदना से होने वाली घृताहुति ( भार्गव सामाहुति )… 191–200
- भाष्यभूमिका त्रिलोकी है, रोदसी त्रैलोक्य रौद्रः त्रिलोकी है । विश्व के पाँचों पर्वों में उत्तर - उत्तर के पर्व में पूर्व - पूर्व पर्वका अन्तर्भाव है… 201–210
- भाष्यभूमिका पाशुकाग्निग्निवंश में सातवीं हैं । यदि इमे वृद्धातिवृद्ध प्रपौत्र स्थानीय माना जाता है, तत्र तो पूर्व-कथनानुसार सर्वमूलभूत ब्रह्माग्नि ' बिता… 211–220
- उपनिषद् भूमिका - द्वितीयखण्ड ( १८४, तथा १८५ के मध्य में ) -( चक्र सम्वत्सर प्रतिकृतिरियम ) विष्वद्वृत्त वृ सूर्य्य: भूर्पिष्ठः श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय,… 221–230
- भूमिका श्रादित्य कहनाने लगता है । अग्नि वायु आदेत्य तीनों में गतिभाव उपनच्च होता है । उवर गतिभाव जत्र एकमात्र वायु का ही धर्म्म है, तो हन कर सकते हैं कि,… 231–240
- द्वितीयखण्ड करता है, पानी बुद्बुद् स्वरूप में परिणत हो जाता है । वतु'लाकार बुद्बुद् के गर्भ में प्रविष्ट तिसहवागे " यु बुद्धुमण्डल के त्रुटित होने से… 241–250
- द्वितीयखण्ड उक्त दो कारणों के अतिरिक्त मध्यस्थ ' बृहत्प्राण ' खःस्वस्तिक, अधः स्वस्तिक, उदयन्त्रिन्दु, अस्तन्त्रिन्दु, सप्तग्रहोरात्र, ग्रादि अन्यान्य… 251–260
- IIIII इस ग्रन्थि - बन्धन का यह हुआ कि, कृष्णपक्ष के भी पञ्चदश ( १५ ) पर्व ( अहोरात्र ) हो गए, एवं शुक्ल-पक्ष के भी पञ्चदश पर्व हो गए… 261–264