Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 1–10
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1–10
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उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्ड MY ३ निबन्धा-मोतीलालशम्र्मा, भारद्वाजो पाह्नः जयरत्तनाभिजनः ( पुनः प्रकाशनाधिकार एकमात्र निबन्धा से सम्बन्धित ) ' राजस्थान वै दिकत चशोधसंस्थानजयपुर के द्वारा प्रकाशित एवं श्रीबालचन्द्रयन्त्रालय, मानवाश्रम दुर्गापुरा जयपुर के द्वारा मुद्रित प्रथमवार ५०० प्रति ( श्रीकृष्णजन्माष्टमी २०१३ ) मूल्य १३ ) रु ०
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श्रीः उपनिषद्रिज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्ड प्रस्तावना
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श्रीः किमपि प्रास्ताविकम् औपनिषद - पुरुष के अनुग्रह से ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका – तृतीय खण्ड ' उपनिधन-प्रेमियों के सम्मुख उपस्थित हो रहा है । एवं प्रस्तुत तृतीय खण्ड की उपरति के साथ ही खण्ड-त्रयात्मक ' भूमिकाग्रन्थ ' उपरत हो रहा है । प्रस्तुत तृतीय खण्ड में आठ सम्भ समाविष्ट हैं, जिनकी संक्षिप्त दिशा से यों परिचय प्राप्त किया जा सकता है कि-( १ ) - विज्ञान - तुति - इतिहास - निरूपणात्मक ११३१ अवान्तर - शाखाग्रन्थों में विभक्त ‘ संहितावेद ' वेदशास्त्र का प्रथम विभाग है । निष्काम कर्म्मयोगात्मक धर्म्मबुद्धियोग का प्रतिपादक, संहिताशाखाभेदानुरोध से ११३१ शाखाप्रन्थों में हीं विभक्त ' विधि ' नामक ' ब्राह्मणवेद ' वेदशास्त्र का द्वितीय विभाग है । निष्काम भक्तियोगात्मक ऐश्वर्य्यबुद्धियोग ( उपासना ) का प्रतिपादक, ११३१ शाखाग्रन्थों में हीं विभक्त ' आरण्यकवेद ' वेदशास्त्र का तृतीय विभाग है । ज्ञानकर्म्मोभयल क्षरण वैराग्यबुद्धियोग का प्रतिपादक, एवं निवृत्तिकर्मात्मक ज्ञानयोगापरपर्य्यायक ज्ञानबुद्धियोग का लोक-संग्रहदृष्ट्या संग्रह करने वाला ज्ञानकम्माभयसमत्त्वलक्षण वैराग्यबुद्धियोग का प्रतिपादक, ११३१ शाखाग्रन्थों में हीं विभक्त ' उपनिषद्वेद ' वेदशास्त्र का चतुर्थ, किंवा अन्तिम विभाग है । श्रतएव यह ' वेदान्त ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । वेद के अन्तिम ( चतुर्थ ) भागरूप उपनिषद्वचनों के पारस्परिक समन्त्रय के लिए प्रवृत्त होने वाला सूत्रग्रन्थ ( व्याससूत्र ) भी इसी दृष्टि से लोकव्यवहार में ' वेदान्त ’ नाम से प्रसिद्ध हो पड़ा है । आत्मा तसिद्धान्तप्रतिपादक वेदान्तशास्त्र ( उपनिषच्छास्त्र ) किसी श्रद्वय - श्रखण्ड - निरञ्जन- निर्द्धर्मक- निरस्त समस्तोपाधि - प्रपञ्चोपशम ब्रह्म को मूलाधार बनाता हुआ हो सञ्चर- प्रतिसञ्चररूपेण द्विधा विभक्त विश्वविज्ञान के मौलिक सिद्धान्तों का स्पष्टीकरण करने वाला सर्वशास्त्र प्रमाणित हो रहा है । आत्मसत्ताधारेण सुप्रतिष्ठित मौलिक विज्ञानसिद्धान्त ही मानवीय प्रज्ञा को लक्षीभूत विषय के सान्निध्य में निश्चयरूपेण निर्भ्रान्तरूपेण प्रतिष्ठित कर सकता है | अतएव यह उपपत्तिविज्ञानात्मक मौलिक सिद्धान्त हो- ' उप - नि - षत् ' रूप से ' उपनि— पत् ' शब्द का अवच्छेदक बना हुआ है, जैसा कि भुमिका प्रथमखण्ड में विस्तार से प्रतिपादित है । “ ज्ञानसहकृत विज्ञानसिद्धान्त ही उपनिषत् इसलिए है कि, इसके द्वारा मानवीय प्रज्ञा लक्षी-भूत विषय के उप- समीप श्रन्तस्तल पर, नि - निश्चयेन प्रस्थान - श्रद्धान- पूर्वक, पत् - प्रतिष्ठि हो जाती है " । I
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किमपि प्रास्ताविकम् इत्थंभूत वेदान्तलक्षण उपनिषच्छात्र की बहिरङ्गपरीक्षा से सम्बन्ध रखने वाले ' वेद पौरुषेय है, अथवा अपौरुषेय? ' इस प्रक्रान्त प्रश्न के समाधान के लिए ही प्रस्तुत तृतीयखण्ड में - ' पौरुषेयापौरुषेयमीमांसा ' नामक प्रथमस्तम्भ का समावेश हुआ है । भगवान् जैमिनि के -'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः ० ' इत्यादि सूत्रसन्दर्भ के माध्यम से ही इस स्तम्भ में उक्त प्रश्न के समन्वय की चेष्टा हुई है, जिसका निष्कर्ष यही है कि वाड्मय नित्यशब्दा-त्मक वेदशास्त्र जहाँ सर्वथा अपौरुषेय है, वहाँ प्रयोगशब्दात्मक वेदशास्त्र ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृति-दे ' इत्यादि काणादसिद्धान्तानुसार पौरुषेय ही है, कृ है । इस प्रश्न के माध्यम से विद्वत्समाज में विगत - कतिपय शताब्दियों से नितान्त भावुकतापूर्ण जो विवाद प्रक्रान्त है, उससे वेदशास्त्र पर आस्था - श्रद्धा रखने वाले सामान्यवर्ग का अहित ही हुआ है । इसी प्रश्न के महासमारम्भात्मक चाकू कलह ने विद्वानों की प्रज्ञा को स्वयं वेदशास्त्र के ज्ञातव्य कर्त्तव्य-रहस्यपूर्ण तत्त्वों से पराङ्मुख ही प्रमाणित किया है । ' वेद ईश्वर के बनाए हुए हैं, अथवा मनुष्यों के द्वारा ( ऋषियों के द्वारा ) बुद्धिपूर्वक अन्य ग्रन्थों की भाँति इनकी भी रचना हुई है? इस प्रश्न का उस समय यत् किञ्चित् भी तो महत्त्व शेष नहीं रह जाता, जब कि हम चतुर्द्धा विभक्त स्वयं वेदशास्त्र के ' तत्त्वात्मक वेदपदार्थ ' का स्वरूप अवगत कर लेते हैं | भूमिका-द्वितीय खण्ड में विस्तार के साथ इसी तत्त्वात्मक वेदपदार्थ की व्याख्या हुई है । अभी कुछ ही समय पूर्व व्याकरणशास्त्र के एक प्रज्ञाशील विद्वान् का किसी अर्वाचीन- प्रज्ञानिष्ठ के साथ हमनें इस दिशा में जैसा पारस्परिक वागविजृम्भण देखा - सुना, उससे सहसा हमें इसलिये स्तब्ध हो जाना पड़ा कि, दोनों हीं विद्वान् वेदस्वरूपचर्चा से कोइ सम्बन्ध न रखते हुये केबल कल्पना के आधार पर ही अहमहमिका के अनुगामी बने हुये थे । शब्दशास्त्रज्ञ महाभाग का प्रवेशपूर्वक इस सम्बन्ध में यह तर्क था कि, " यदि कोई हमें यह प्रमाणित कर दे कि, अमुक वर्ष - तिथि-स्थान में बैठकर अमुक ने वेद बनाया, तो हम उसे इसी क्षण दशसहस्र पुरस्कार प्रदान कर सकते हैं ” | वेदप्रामाण्य से सम्बन्ध रखने वाली इस आस्था - श्रद्धा का जहाँ अभिमन्दन किया जायगा, वहाँ इस प्रकार के बालोपलालन को सर्वथा इसलिये श्रपातरमणीयमूलक अभिनिवेश ही माना जायगा कि, इसप्रकार की काल्पनिक संधाओं से कदापि वेदशास्त्र का गौरव सुरक्षित नहीं रक्खा जा सकता । वर्त्तमान युग की प्रतीच्य प्रज्ञा जहाँ वेदार्थमीमांसा मे सतत - जागरूक बन रही हो, वहाँ हमारे यहाँ की प्राच्यप्रज्ञा इत्थंभूत केवल वागूविग्लान ही अपनी वेदप्रामाण्यभक्ति का अवसान करती रहे, सचमुच यह शोचनीय अवस्था है । शीघ्र से शीघ्र इस विवाद को उपशान्त कर भारतीय ब्राह्मणप्रज्ञा अपने सर्वस्वभूत वेदशास्त्र के तात्त्विक चिन्तन में प्रवृत्त होने का निःसीम ६
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किमपि प्रास्ताविकम् अनुग्रह करे, इसी कामना से जैमिनिसूत्रसन्दर्भ के माध्यम से प्रथमस्तम्भ का प्रकृत खण्ड समावेश हुआ है । ( २ ) —वेद के अन्तिम भागात्मक उपनिषदों में किन किन विषयों का निरूपण हुआ है?, द्वितीय स्तम्भ इसी प्रश्न की समाधानदिशा के लिए प्रवृत्त हुआ है । प्रश्न का वास्तविक समाधान तो अनन्य निष्ठानुगत चिरन्तन स्वाध्यायव्रत पर ही अवलम्बित है । तथापि तात्कालिक कण्डूप--शान्तिमात्र के लिये प्रस्तुत स्तम्भ में औपनिषद आत्मतत्त्व के स्वरूप विश्लेषण के द्वारा ' ईश - केन - कठ - प्रश्न – मुण्डक – माण्डूक्य - तैत्तिरीय — ऐतरेय - छान्दोग्य - बृहदारण्यक— श्वेताश्वतर -- कौषीतकि — मैत्रायणी ' इन १३ उपनिषद्द्मन्थों की विपयतालिका उद्धृत कर दी गई है । उपनिषत् - स्वाध्यायव्रतियों को अवश्यमेव इसके द्वारा अंशत: तुष्टिभाव उपलब्ध हो सकेगा, ऐसी आस्था है । ( ३ ) - आत्मा, बुद्धि, मन, शरीर, ' मानवीय संस्था के स्वरूपसम्पादक इन चारों पर्वों में उपनिषदों के द्वारा क्या अतिशयाधान होता है?, चारों के दोषमार्ज्जन- हीनाङ्गपूर्ति, तथा अतिशय धान के लिये उपनिपड़ों से मानव को कौन कौन सी मौलिक शिक्षाएँ उपलब्ध होती हैं?, सहजभाषानुसार - ' उपनिषत् हमें क्या सिखाती है? औपनिषद - शिक्षा का मानव के आत्मजीवन में तो क्या उपयोग है?, एवं लोकजीवन में क्या उपयोग है?, प्रस्तुत स्तम्भ इसी प्रश्न का समाधान कर रहा है । ( ४ ) - " ईश्वरीय ज्ञानात्मक वेद का मानत्रमात्र को अधिकार है, क्योंकि सभी मानव ईश्वर की ही सन्तान हैं, सभी में आत्म- बुद्धि - मनः- शरीर - भावसमन्विता समानता व्यवस्थित है " इस प्रकार के तत्त्वज्ञानशून्य - प्रकृतिरहस्यविज्ञानपराङ्मुख- हेत्वाभास के द्वारा समानाधिकार - व्यामोहन से ' व्यामुग्ध बन जाने वाले कल्पित ' मानवता ' के अनुगामी भावुक ष्ठों के उद्बोधन के लिये ही प्रस्तुत चतुर्थ स्तम्भ समाविष्ट हुआ है । अवश्य ही भौतिक - शारीरिक - मानसिंक एवं ऐन्द्रियक बाह्य आकार - प्रकार की दृष्टि से मानवमात्र का एक ही ' मानवजाति ' में अन्तर्भाव है । एवं इस दृष्टि से मानवजाति समानाधिकार की ही अनुगामिनी मानी जा सकती है, मानी गई है, जो कि भौतिक - समानाधिकार आहार - निद्रा - भयादि भौतिक अधिकारों पर ही विश्रान्त है । भोजन - वस्त्र-शयन - अपत्योत्पादन -गगन- हसन- मानसिक विनोद -आदि भौतिक विषयों में सभी मानव समानाधिकार से समन्त्रित हैं, क्योंकि इन अधिकारों का उस ' मानवजाति ' से सम्बन्ध है, जो मानवजाति ‘ श्राकृतिग्रहणा जातिः ' के अनुसार मानव के बाह्य भौतिक शारीरिक ऐन्द्रियक श्राकारों के आधार पर प्रतिष्ठित है । LO
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किमपि प्रास्ताविक र तथोक्ता मानवजाति जिस मौलिक तत्त्व के आधार पर प्रतिष्ठित है, वही तत्व ' प्रकृति ' कहलाया है, जोकि प्रकृतिभाव भौतिक क्षर का आधारभूत अव्यक्त ' अक्षर ' कहलाया है, जोकि गीता के शब्दों में- ' पराप्रकृति ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । यही अक्षरप्रकृति प्राणदेव - भेद से अनेक स्वरूपों में विभक्त हो रही है । इसी प्रकृतिभेद के आधार पर मानव का आभ्यन्तर प्राकृतिक स्वरूप एक दूसरे से विभिन्न बना हुआ है । एवं- ' प्रकृतिविशिष्टं चातुर्वर्ण्य, संस्कारविशेषाच्च ' इत्यादि सिद्धान्तानुसार यही प्राणमयी सुसूक्ष्मा प्रकृति चातुर्वर्ण्य की मूल प्रतिष्ठा बन रही है । एवं यही वर्ण, और जाति में वह महान् विभेद है, जिसे आज के केवल व्यक्त - क्षर - जड़ - भूत - वादी मानव नें सर्वथा विस्मृत कर मानत्र को सर्वथा शरीर - मन- इन्द्रियधम्र्मा-मात्र पशुश्रेणि में ला खड़ा किया है । अहङ्क तिमूलक गोत्रभाव का ऋषिप्राण से सम्बन्ध है. जिसके द्वारा ' कुलधर्म्म ' व्यवस्थित हुआ है । प्रकृतिमूलक वर्णभाव का देवप्राण से सम्बन्ध है, जिसके द्वारा ' वर्णधर्म्म ' व्यवस्थित हुआ है । एवं प्रकृतिमूलक जातिभाव का पितृप्राण से सम्बन्ध है, जिसके द्वारा ' मानवजातिधर्म्म ' व्यवस्थित हुआ है । एवं इस तात्त्विक दृष्टिभेद से मानव के कुल - वर्ण - जाति - भेद से अधिकार भी सर्वथा विभक्तरूप से ही व्यवस्थित हुए हैं । उक्त तीनों विभिन्न आधिकारिक उत्तरदायित्वों में से मध्यस्थ वर्णधर्मात्मक अधिकारी भेद ही औपनिषद - ज्ञान, किंवा वेदज्ञानाधिकार की मूलप्रतिष्ठा बना हुआ है । एवं इस वर्णधर्म्मसिद्ध प्राकृतिक अधिकारमर्य्यादा के अनुपात से ही औपनिषद - ज्ञान की अधिकार-मर्यादा व्यवस्थित हुई है । चतुर्थ स्तम्भ इसी अधिकारमय्र्यादा की तात्त्विक स्वरूपदिशा का स्पष्टीकरण कर रहा है । ५ – प्राचीन व्याख्याताओं की भावुकतापूर्णा मान्यता के अनुसार ' उपनिषत् ' सर्वकर्म्म-परित्यागलक्षण ज्ञानयोग का प्रतिपादक वैसा शास्त्र है, जिसका उपयोग चतुर्थाश्रम ( ७५ वर्ष के अनन्तर आने वाली संन्यासाश्रमावस्था ) में ही हुआ करता है । इसी मान्यता के दुष्परिणाम स्वरूप उपनिषच्छास्त्र ' आज मरणवेला का ही लक्ष्य बन गया है । संसार से जिसका कोई सम्बन्ध नहीं, लोक - समाज- राष्ट्र - जाति - वर्ण - धर्म्म आदि से जिसने विश्राम महण कर लिया हो, वही मानों उन ज्ञानाभिनिविष्टों की दृष्टि में उपनिषदों का पात्र है । अब्रह्मण्यम् । अत्रह्मण्यम्!! महती विडम्बना!!! वस्तुतः ' उपनिषत ' तो नित्यसिद्ध ज्ञानसद्दकृत उन विज्ञानसिद्धान्तों का स्पष्टीकरण करने वाला वैसा उपयोगी शास्त्र है, जिसे आधार बनाए बिना न तो ब्राह्मणभागोक्त कर्मकाण्ड का ८
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किमपि प्रास्ताविकम् ही मायक नवान सम्भव एवं न आरण्यक भागोक्ता उपासना का ही यथावत अनुगमन सम्भव । इसी आधार पर तो– ' यदेव विद्यया - श्रद्धया - उपनिषदा - करोति, तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति ' यह सिद्धान्त स्थापित हुआ है । ज्ञान हो, कर्म्म हो, उपासना हो. लोकनीति - समाजनीति - राष्ट्रनीति कुछ भी हो, प्रत्येक का कोई न कोई मौलिक विज्ञानमिद्धान्त आधार रहता है । उस आधार को जान कर जो प्रवृत्ति होती है, वही दृढमूला बना करती है । एवं उपनिषच्छास्त्र उसी सर्वविध मौलिक विज्ञानसिद्धान्त का रहस्यपूर्णा भाषा में स्पष्टीकरण करने वाला वैसा उपयोगी शास्त्र है, जो चारों हीं आश्रमों का मूलाधार बना हुआ है । अतएव कर्म्मकाण्ड प्रतिपादक ब्राह्मणभाग से तथा उपासनाकाण्ड-प्रतिपादक आरण्यकभाग से कदापि उपनिषद्भाग का पार्थक्य नहीं किया जा सकता । जिस प्रकार आत्मा - सत्त्व - शरीर - तीनों त्रिदण्डवत अन्योऽन्याविनाभूत वने रहते हुए त्रिपुटीभाव से परस्पर नित्य समन्वित हैं, एवमेव त्राह्मण- श्रारण्यक उपनिपत्- तीनों परस्पर सह सम्बद्ध हैं । तभी तो - ‘ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' इत्यादि के ' ब्राह्मण ' भाग से ब्राह्मण - आरण्यक-उपनिषत् - तीनों वेदभागों का संग्रह हो रहा है । प्रस्तुत पञ्चम स्तम्भ में इसी सम्बन्ध का स्पष्टीकरण हुआ है । ६ - क्रमप्राप्त षष्ठ स्तम्भ केवल उस लोकभावुकता के संरक्षण के लिए ही समाविष्ट हुआ है, जिसका परदर्शन से सम्बन्ध माना गया है । ऐकात्म्यवाद - खण्डात्मवाद - बहुदेवतावाद-कर्म्मभेदवाद - आदि परस्परात्यन्तविरोधी भी प्रतीयमान यच्चयावत् वैदिक सिद्धान्त अविभक्त ब्रह्म, एवं विभक्त प्रकृति के अनुबन्धों से स्त्र स्व स्थान पर सर्वथा निर्विरोधरूपेण सुसमन्वित हैं । " संहिताकाल में भारतीय लिखने - पढ़ने से अपरिचित थे । केवल सुन सुना कर ही वे अपने ज्ञानतन्त्र को सुरक्षित रखते थे । अतएव उस युग का मान्यतात्मक वाचिक शास्त्र ' श्रु त्रुति ' कहलाया । एवमेव संहिताकाल में बहुदेवतावाद का ही प्राधान्य था । अग्नि - वायु- सूर्य - जल-मेघ - वृक्ष - वनौषधि - आदि भौतिक पदार्थों की उपयोगिता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इन जड़ पदार्थों की ही भारतीयों के द्वारा । ' देवता ' नाम से स्तुति की जाने लगी, जिस युग में कि इन्हें ' एकेश्वर ' का यत् किश्चित् भी बोध नहीं था " इत्यादि भावुकतापूर्णा भ्रान्ति के समाधान के लिए ही प्रस्तुत स्तम्भ का लोकभ्भावुकतासंरक्षणमात्र के लिए संग्रह हो पड़ा है । वस्तुतः न इन प्रश्नों में कुछ तथ्य है, नापि इनके समाधान की ही कोई आवश्यकता है । क्योंकि भ्रान्तों की भ्रान्त कल्पनाओं से निर्भ्रान्त शाश्वत सनातन ज्ञानविज्ञानसिद्ध वेदशास्त्र का कोई सम्बन्ध नहीं है । ε
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किमपि प्रास्ताविकप् ७ – सप्तम स्तम्भ में " औपनिषद - ज्ञान के प्रथम प्रवर्त्तकत्त्व " को बीज मान कर इस से सम्बन्ध रखनें वाले लोकानुरञ्जक समाधान का स्पष्टीकरण हुआ है । एवं अन्ततोगत्त्वा ब्रह्मर्षिवंश से सम्बन्ध रखने वाले सिद्धान्तपक्ष का स्थापन हुआ है । ८ - एक विशेष कारण से पौरुषेयशास्त्रों में गीताशास्त्र सदा से ही सर्वमृर्द्धन्य प्रमाणित होता आ रहा है । गीताशास्त्र से सम्बन्ध रखने वाली इसी आस्था - श्रद्धा ने आज सर्वसामान्य का भी ध्यान इसी की ओर केन्द्रित कर लिया है, जिस आस्था श्रद्धा का अभिनन्दन ही किया जायगा । यह सब कुछ अभिनन्दनीय होनें पर भी गीताशास्त्र को ही स्वकर्त्तव्यकर्म्मनिर्णय में प्रमुख मान बैठना सर्वथैव भाचुकता ही कही जायगी इसलिए कि, गीताशास्त्र किसी भी कर्त्तव्यकर्म का अनुशासन नहीं करता । ' क्या करना चाहिए?, क्या नहीं करना चाहिए? ' गीता का इस प्रश्न के समाधान से कोई सम्बन्ध नहीं है । अपितु जब भी गीताशास्त्र से कर्त्तव्य - कर्म के सम्बन्ध में प्रश्न किया जाता है, तो यह इस प्रश्न का समस्त उत्तरदायित्त्व अपनें से अन्यशास्त्र के प्रति ही समर्पित कर देता है, जैसा कि - ' तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्ययवस्थित ' इत्यादि से स्पष्ट है * । अक्षरप्रकृतिमूलक, देवप्राग्रस्वरूपव्यवस्थापक - संहिता - ब्राह्मण - आरण्यक - उपनिषत् - रूपे ए चतुर्द्धा विभक्त ' श्रुतिशास्त्र ', क्षरप्रकृतिमूलक – भूतप्राणस्वरूपव्यवस्थापक- मनु -- याज्ञबल्क्य - वसिष्ठ-विष्णु - आदि रूपेण विभक्त अन्वर्थानुसारी ' स्मृतिशास्त्र ', एवं क्षराक्षरप्रकृतिनिबन्धन शिपि-विष्टात्मक पशुप्राणस्वरूपोपबृं ' हक ' पुरायशास्त्र ', यह शास्त्रत्रयी ही गीता के द्वारा निर्दिष्ट वह ' शास्त्र ' है, जिसके सुव्यवस्थित विधि - विधानों के आधार पर ही भारतीय मानव की कर्त्तव्य-कर्म्मनिष्ठा, तत्त्वोपासना, एवं निवृत्तिमूलक ज्ञान प्रतिष्ठित है । बिना इस शास्त्रत्रयी के केवल गीताभक्ति के आधार पर कदापि आस्तिक मानव कर्त्तव्यनिष्ठा को सुरक्षित नहीं रख सकता । प्रश्न सम्भव है कि, फिर गीता का उपयोग ही क्या? । इसी प्रश्न के समाधान के लिए अष्टम स्तम्भ प्रवृत्त हुआ है । जो उपयोगिता अपौरुषेय श्रुतिशास्त्र में उपनिषचास्त्र की है, वही 3 * यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारतः ॥ न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं, न परां गतिम् ॥ १ ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य्यव्यवस्थितौ ॥ ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्त ं कर्म्मक मिहार्हसि ॥ २ ॥
१० – गीता ० १६ २३, २४, ।
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किमपि प्रास्ताविकम् उपयोगिता पौरुषेय गीताशास्त्र की है । जिन विज्ञानसिद्धान्तात्मक कम्मोपास्तिज्ञान - कौशलों का उपनिषच्छास्त्र सर्वथा रहस्यपूर्णा, एवं संक्षिप्त भाषा में निरूपण करता है, गीताशास्त्र उन्हीं कौशलों का, औपनिषद - रहस्यों का सर्वथा लोक - प्राञ्जल - भाषा में विस्तार से निरूपण करता है । कैसे करना चाहिए?, क्यों करना चाहिए?, क्या विज्ञानसिद्धान्त है अमुक कर्म्म - उपासना -ज्ञान का?, इत्यादि जिन प्रश्नों का उपनिषदों में सक्षेप से दिग्दर्शन हुआ है, गीताशास्त्र में उन्हीं का विस्तार से उपबृ ंहण हुआ है । संकोच भाव का विस्तार ही ' गान ' है । इसी विस्तारभाव के कारण भगवान् वासुदेव श्रीकृष्ण के मुखपङ्कज से विनिःसृत यह तत्त्ववाद, एवं भगवान् कृष्ण-द्वैपायन के द्वारा प्राञ्जलभावोपेता इतिहासभाषा में ( महाभारत में ) संकलित शब्दात्मक यह शास्त्र ' गीताशास्त्र ' नाम से व्यवहृत हुआ है । उपनिषदों के रहस्यार्थों का विस्तार से निरूपण करने के कारण ही इस पौरुषेय भी गीताशास्त्र को अपौरुषेया ' उपनिन् ' की उपाधि से समलङ्कृत कर दिया गया है, जैसा कि - ' इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ० ' इत्यादि अध्यायोप-संहारवाक्य से प्रमाणित है । समस्त वेदशास्त्र की ' संक्षिप्ता सुची ' का स्थान ग्रहण करने वाला गीताशास्त्र श्रवश्य ही अपौरुषेय उपनिषच्छास्त्र का वैसा प्रातिनिध्य कर रहा है, जिसे साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से अभिभूत कर हमनें सर्वथैव विस्मृत कर दिया है । उक्त आठ स्तम्भों के अतिरिक्त इच्छा न रहते हुए भी सन्मित्रों के विशेष आग्रह से सर्वान्त में ' परिशिष्टसंग्रह ' नामक एक प्रकरण का समावेश और हो गया है, जिसमें उन शास्त्रीय प्रमाण -- वचनों की अक्षरार्थसङ्गति कर दी गई है, जो वचन प्रस्तुत तृतीय खण्ड में यत्र - तत्र समाविष्ट हुए हैं । उपनिषत - स्वाध्याय में प्रवृत्त होने वाले मादृश वेदवीथि- पथिकों के लिए यह प्रयास अवश्य ही सर्वात्मना नहीं, तो अंशतः मनस्तुष्टि का ही कारण प्रमाणित होगा । आज ' अनुमानत: १३ वर्ष पूर्व खण्डत्रयात्मक यह भूमिकाग्रन्थ सम्पन्न हो गया था । किन्तु नियति के निग्रह से अद्यावधि इसे व्यक्तीभाव का अवसर प्राप्त न हो सका । विगत कार्त्तिक मास में स्थापित ' राजस्थानवै दिकत श्वशोधसंस्थान ' के सहयोग से प्रकाशनप्रवृत्ति पुनः प्रक्रान्त हुई है, जिसके परिणामस्वरूप संस्थान की ओर से अब तक तीन ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं । खण्डचतुष्टयात्मक – ‘ भारतीय हिन्दू मानव, और उसकी भावुकता ' नामक ग्रन्थ का प्रथम खण्ड प्रथम प्रकाशित हुआ । अनन्तर ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्ड ' प्रकाशित हुआ * । एवं तीसरा प्रकाशन अयुस्तम्भात्मक प्रस्तुत ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्ड ' है । * ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - प्रथमखण्ड ' आज से १० - १२ वर्ष पूर्व प्रकाशित हो गया था, जो योग्य विद्वानों में निःशुल्क बाँट दिया गया है । पुनःप्रकाशनानन्तर ही स प्रथमखण्ड की उपलब्धि सम्भव होगी, जो कि पुनः प्रकाशन अद्यावधि तो संस्थान सञ्चालकों की मानसेच्या ( उत्याभ्याकांक्षा ) पर ही निर्भर है । ११