उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री
Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III · 457 पृष्ठ · 46 खण्ड
विषय सूची
- उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्ड MY ३ निबन्धा-मोतीलालशम्र्मा, भारद्वाजो पाह्नः जयरत्तनाभिजनः ( पुनः प्रकाशनाधिकार एकमात्र निबन्धा से सम्बन्धित ) '… 1–10
- किमपि प्रास्ताविकम् सुप्रसिद्ध साहित्यसेवी माननीय डॉ ० वासुदेवशरण अग्रवाल महाभाग की प्रेरणा के फलस्वरूप ही संस्थान स्थापित हुआ, जिसमें प्राणप्रतिष्ठा की… 11–20
- ३– दार्शनिक दृष्टि, और मीमांसासूत्र— तृतीयखण्ड उक्त प्रश्न के वैज्ञानिक निर्णय से पहिले हमें दार्शनिकों कै, विशेषतः पूर्वमीमांसा ( जैमिनिसूत्रों ) के उन… 21–30
- तृतीयखण्ड ( १६ ) – - “ शब्दप्रमाणका वयं, यदस्माकं शब्द आह, तदस्माकं प्रमाणम् ' इस सिद्धान्त को मानने वालों की दृष्टि में युक्ति - तर्क हेतु वादों का कोई… 31–40
- तृतीयखण्ड ५-- " अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्ट ं देवेभिरुत मानुषेभिः । यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ” । १० । १२५ । ५ । )… 41–50
- तृतीयखण्ड मनुष्य जिस वाक् का प्रयोग करते हैं, जिस प्रयुक्त वाक् में कार - ककारादि वर्ण प्रविभक्त - प्रज्ञात प्रतीत होते हैं, वही चौथी व्याकृता वाकू है,… 51–60
- तृतीयखण्ड अधिदैचतसंस्था में इस वाक्चतुष्टयी के चार विवर्त्त हैं । इन चारों विवतों को क्रमशः प्राजापत्या-वाकू, लोकत्राकू, व्याहृतिवाकू, ब्रह्मवाकू, इन… 61–70
- तृतीयखण्ड परिमिता पढ़ानि ० ' इत्यादि पूर्वप्रतिपादित अनुगममन्त्र के अनुसार “ वाकू - शब्द, ध्वनिः शब्द, नादृशब्द, प्रयोगशब्द " भेदसे चार भागों में विभक्त… 71–80
- द्वितीयखण्ड मूलसिद्धान्तः---“ अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत्, सर्वा ह्य वैमाः सर्वस्यै बाच उपनिषदः । इ॒मां त्वेवाऽऽचचने… 81–90
- तृतीयखण्ड है कि, ये सादि सान्त हैं । क्योंकि वेदशास्त्र भी ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ' ( वैशेषिकद ०६ । १… 91–100
- तृतीयखण्ड सम्भवतः श्रास्तिकसमाज यास्क की भाँति भगवान् करणाद के वचनों पर भी कम निष्ठा नहीं रखता… 101–110
- १७- वेदमन्त्रों का मन्त्रच, तृतीयखण्ड और विज्ञानत्राक्— ' विज्ञानवाक् ' का वही स्वरूप है, जो स्वरूप श्रात्मलक्षणा नित्यावाक का है… 111–120
- श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीयखण्डान्तर्गत ' वेद - पौरुषेय - अपौरुषेयत्व - मीमांसा ' प्रथमस्तम्भ - उपरत १ -X-नामक श्रीः… 121–130
- तृतीयखण्ड यदा चमयाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः । तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति । उक्त औौपनिषद सिद्धान्त के अनुसार बिना तत्स्वरूपज्ञान के… 131–140
- तृतीयखण्ड के अधिकारी बनते हुए उभयलोक सम्पत्ति के सत्पात्र बने रहते हैं । इसी भाव का निरूपण करती हुई उपनिषच्छ्रति कहती है— सन्नेव स भवति, सद् बह्म ेति वेद… 141–150
- तृतीयखण्ड कि विज्ञानकाण्ड में - १ - अलक्षण, २ - विभूति, ३ - योग, ४ - बन्ध, ५- अमितवृत्तित्व ७ – श्रसङ्ग, ८ – समवाय, ६ - सन्धि, १० - दहरोत्तर, ११ -… 151–160
- तृतीयखण्ड सूत्रात्मा है । अन्तर्य्यामीरूप से अक्षर सहृदय है, सूत्रात्मरूप से सशरीर है, अतएव शरीरयुक्त हृदयावच्छिन्न अक्षरतत्त्व पूर्वोक्त सत्यपरिभाषानुसार… 161–170
- तृतीयखण्ड ' आभूप्रजापति ' - ' परम प्रजापति ' इध्यादि नामों से व्यवहृत हुआ है । परमप्रजापति नामक इस स्वयम्भू में ' आत्मा, पदं, पुनःप्रदम् ' इन तीन भावों की… 171–180
- तृतीयखण्ड शुक्रसे परमेष्टी | भुबन का, एवं अमृतवाक् - शुक्र से स्वयम्भू भुबन का विका हुआ है । ये दोनों अमृतभुवन मध्यस्थ सूर्य्य से पराक् रहते हुए सूर्य के… 181–190
- ७- ईश्वरस्वरूप - सिंहावलोकन— २७ २८ - देवसत्यस्वरूप- परिचय— तृतीयखण्ड " १७५ माको बन्धन से मुक्त करने वाले औपनिषद - ज्ञान के सम्बन्ध में अपेक्षणीय… 191–200
- तृतीयखण्ड नाम से ही गतार्थ है । ही माना जायगा । ईशोपनिषत् में जिस विषय का निरूपण हुआ है, वह इसके ही ईशोपनिषत् का प्रधान ' गूढोत्मा ' नाम से प्रसिद्ध… 201–210
- तृतीयखण्ड प्रथम प्रश्न में रवि - प्राणात्मक महत प्राण के निरूपण के साथ साथ अहोरात्र, पक्ष, मास, अयना-धिष्ठाता, उत्तरायण - दक्षिणायनप्रवर्त्तक, पञ्चपाद,… 211–220
- ६- आपनत्रह्मरहस्याधिकरणम् तृतीयखण्ड नवमोऽनुवाकः ( ३२६ । ) । १० - अध्यात्मत्रह्मरहस्याधिकरणम् दशमोऽनुवाकः ( ३ । १० । )… 221–230
- खण्ड: खण्ड: ८-६ खण्डौ १०-११ खण्डौ १२ खण्ड: १३ खण्ड: १३ खण्डाः तृतीयखण्ड ३ १७ - अन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुष उद्गीथः २ १६ - अध्यात्मं चक्षुषः - ऋगध्यूढसाम्न… 231–240
- तृतीयखण्ड * — भूमा - विज्ञानमीमांसा ( २२ ) - १ - श्रानन्दविवर्त ' म् ( २३ ) -२- भूमा - विवर्त्त ' म् * - श्रात्म विज्ञानमीमांसा * - २२ खण्ड: -- २३ खण्डः (… 241–250
- तृतीयखण्ड १४ - अक्षरात्मानुगतमधुप्राणविज्ञानम् १५. - अक्षरात्मानुगतमधुप्रारणस्य सर्वेषां मधुप्राणानामालम्बनत्त्वम् १६- मधुविद्याविष्कारकाः,… 251–260
- तृतीयखण्ड ( ४ ) - ईश्वर साक्षी सुपर्ण है, जीव भोक्ता सुपर्ण है । दोनों ब्रह्माश्वत्थ पर प्रतिष्ठित हैं… 261–270
- भाग्यभूमिका १ - " न ह्यभ्रुणैः प्राप्यते ध्रुनं तत् ” ( कठोपनिषत् १० । २६० । १० मं ० ) । २ - " नास्त्यकृतः कृतेन ” ( मुण्डकोप ० १० । २ । खं ० । १२ मं ० )… 271–280
- भाष्यभूमिका १३ - प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ( गीता १ । १८ । ) । १४ - सर्वं खल्विदं ब्रह्म " उक्त श्रौतस्मार्च प्रमाण यह प्रमाणित करने के लिए… 281–290
- are भूमिका वाली अनासक्ति. आसक्ति ही मुक्ति, बन्ध का कारण बन रही है, जैसाकि निम्न लिखित शास्त्रीय वचन से भी प्रमाणित है--न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि… 291–300
- प्रज्ञानब्रह्मोपासना-भाष्यभूमिका " कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा - येन वा रूपं पश्यति + + + । सयेतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति… 301–310
- भाष्यभूमिका विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् " । ५… 311–320
- भाष्यभूमिका २० – सम्पत्ति का दुरुपयोग न करो! ( भूत्यै न प्रमदितव्यम् ) । २१ – हितत्रचन कहना न छोड़ो! ( प्रवचनान्न प्रमदितव्यम् )… 321–330
- भूमिका साधारण अन्न जहाँ पार्थिव शरीर का अन्न है, वहाँ जज्ञ, तथा तेज ( प्रकाश ) दोनों क्रमशः सौम्य - ग्राग्नेय देवताओं के अन्न हैं… 331–340
- तृतीयखण्ड प्राणानुगता रात्रि सौम्यप्राणप्रधाना है, इसी से योषा सर्ग ( स्त्री - सृष्टि ) हुआ है… 341–350
- तृतीयखण्ड ( ८ ) - प्रावाहरिणपर्वत-की पाञ्चाल देशान्तर्गत कन्नौज में प्रवाहरिण के पुत्र, श्रतएव प्रावाहणि नाम से प्रसिद्ध राजर्षि ' चचर ' थी… 351–360
- तृतीयखण्ड ' बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ' रूप मृत्युफल कालान्तर में अतिथि बन जाता है । इस मृत्युपाश विमुक्ति का मुख्य साधन शुक्ररक्षात्मक ब्रह्मचर्य्य ही माना… 361–370
- तृतीयखण्ड अभ्युदय - निःश्रेयस् है, ऐसा श्रद्धालु, विश्वासी व्यक्ति ही इस शास्त्र का अधिकारी बन सकता है… 371–380
- भाय भूमिका कर्म्म, भक्ति, ज्ञान, बुद्धि, नामक चारों हीं योग पुरुषस्वरूप के विकासक बनते हुए ' पुरुषार्थ ' मार्ने जा सकते हैं | ये योग पुरुषार्थ क्यों माने… 381–390
- भाष्यभूमिका साम- अथर्व तन्त्रों को, ब्राह्मण के विधि - श्रारण्यक उपनिषत् तन्त्रों को | पृथक् पृथक् तन्त्रायी मानतेहुएवेदशास्त्र का समन्वय करने के लिए आगे… 391–400
- ( ३ ) - इतिहाससमर्थकवचन — भाष्यभूमिका १ - " विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषसाद । स हान्नमित्यभिव्याहृत्य बृहतीसत्रौं शरांस… 401–410
- भाष्यभूमिका श्रारण्यक, उपनिपत, मेद से ब्राह्मण विभाग के तीन पर्व है । श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, सामयाचारिकसूत्र, भेद से कल्प तीन विभागों में विभक्त है… 411–420
- भाष्यभूमिका ये दो ही विवर्त शेष रह जाते हैं । प्रत्यक्ष भी शब्दप्रमाण ही है, अनुमान भी शब्दप्रमाण ही है… 421–430
- तृतीयखण्ड आत्मक्षरानुगत शिपिविष्टात्मा इनका मुख्य लक्ष्य था । इनकी यह श्रात्मविद्या इनके इस ( ऋषि ) नाम सम्बन्ध से गीतापरिभाषा में ' विद्या ' कहलाई है,… 431–440
- श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' श्रौती उपनिषत् के साथ स्मार्त्ती उपनिषत् का समतुलन ' नामक ( उपनिषत् के साथ गीता का समतुलन - नामक )… 441–450
- ( ६ ) - ज्ञानयोगसमर्थकवचनानि– १- “ यस्त्वात्मरतिरेव स्यात् - आत्मतृप्तश्व मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य काय्यं न विद्यते… 451–457