Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 11–20

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 11–20

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किमपि प्रास्ताविकम् सुप्रसिद्ध साहित्यसेवी माननीय डॉ ० वासुदेवशरण अग्रवाल महाभाग की प्रेरणा के फलस्वरूप ही संस्थान स्थापित हुआ, जिसमें प्राणप्रतिष्ठा की श्रेष्ठिप्रवर श्रीकुड़ीलालजी सेक्सरिया श्रीमहावीरप्रसादजी मुरारका, तथा श्रीजगदीशप्रसादजी सेक्सरिया महाभाग ने । जैसाकि, डॉ ॰ महाभाग का अनुमान था, प्रारम्भिक भूतप्रतिष्ठा के अनन्तर ही राजस्थानसत्ता का ध्यान भी संस्थान की ओर आकर्षित होगा, एवं तन्माध्यम से संस्थान - प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठित बन जायगी । इसी दृष्टिबिन्दुमाध्यम से डॉ ० महाभाग निरन्तर १० मास से प्रयत्नशील हैं । राजस्थान सत्ता के माननीय मुख्यमन्त्री महोदय श्रीसुखाड़ियाजी महोदय से भी संस्थान के अन्यतम संस्कृतिनिष्ठ माननीय श्रीलक्ष्मीलालजी जोशी महोदय के माध्यम से ३-४ बार साक्षात्कार हुआ, जिनमें माननीय मुख्यमन्त्री महोदय ने पूर्णनिष्ठा के साथ ही इस दिशा में अविलम्ब कुछ न कुछ करने का श्राश्वा-सन प्रदान किया । ' आशा बलवती राजम्! ' न्याय से अब भी डॉ ० महोदय इस दिशा में निराश नहीं हैं । और हम भी यहां मङ्गलकामना अभिव्यक्त कर रहे हैं कि, अवश्य ही डॉ ० महा-भाग इस दिशा में कभी न कभी अवश्य ही सफलता प्राप्त होगी । जहाँ तक हमारा अपना प्रश्न है, इस दिशा में यह प्रपत्ति अश्माखणभावापन्ना बन चुकी वैदिक साहित्य की ज्ञानविज्ञानात्मिका मौलिक दिशा से है कि, " जब तक व्यापकरूप से इस राष्ट्रप्रज्ञा परिचित नहीं हो जाती, तब तक तीय सत्ताओं से, एवं केन्द्रसत्ता से केवल इतस्ततः इन्द्रम्यमाणवृत्ति से इस दिशा में कदापि सफलता नहीं मिल सकती " । विगत तीन वर्ष पर्य्यन्त एक विशेष मित्र के प्रबलतम आग्रह से हमने इस दिशा में पूर्ण प्रयत्न कर लिए हैं, जिनके द्वारा हो पड़ने वाली आर्थिक क्षति का संवरण हम अद्यावधि भी नहीं कर सके हैं । भूतपूर्व मुख्यमन्त्री माननीय श्रीजयनारायणजी व्यास के करकमलों के द्वारा प्रकाशनसमिति का उद्घाटन हुआ । सन्कालीन शिक्षामन्त्री महोदय माननीय श्री भोलानाथजी महोदय के इस दिशा में निश्चित आश्वासन उपलब्ध हुए । राजस्थानसत्ता के चार मन्त्री तत्कालीन समिति के सम्मान्य सदस्य भी बने । इनकी प्रेरणा से अभिनन्दन - उत्सवादि सभी सामयिक आयोजनों का अनुगमन भी हुआ | किन्तु अन्ततोगत्त्वा ' पुनस्तत्रैवावलम्बितो वेतालः ' ही परिणाम निकला । और अधिक समय पर्यन्त इन बातों के भारवहन में अपने आपको नितान्त असमर्थ अनुभूत करते हुए हमने गतवर्ष की समाप्ति पर ही इस लोकतन्त्रात्मिका सन्ना के व्यामोहन से सदा के लिए आत्म-चारण कर लेना ही श्रेयः पन्था मान लिया । इसी अवसान वेला में मा ० डॉ ० महोदय ने अपने प्रयास से नवीन ' संस्थान स्थापित किया, एवं नवीनरूप से सत्तासहयोग का उपक्रम किया, जिसका इतिवृत्त पूर्व में स्पष्ट किया ही जा चुका १२

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किमपि प्रास्ताविकम् है । डॉ ० महाभाग के सान्निध्य का हमने यही अर्थ समझा है कि, “ निरतिशय श्रम - परिश्रमात्मक आश्रम - जीवन में सलग्न रहते हुए एकाकीरूप से साहित्य सेवा में संयुक्त रहने के कारण सर्वायँव शिथिलकाय बन जाने वाले वर्त्तमान जीवन में ऐसा सहयोग उपलब्ध होगा, जिसके बल पर बाह्य-चिन्ताओं से उन्मुक्त होकर हम अपने शेष जीवन में केवल अध्ययनाध्यापन में हीं प्रवृत्त रह सकें । संस्थान के भुक्त - प्रक्रान्तकाल में अद्यावधि तो हमें ऐसा अवसर नहीं मिल सका है । श्रपितु ठीक इसके विपरीत अमुक उन समस्याओं का ही साम्मुख्य करना पड़ा है, जिनका स्वाध्ययनष्ठा से न केवल कोई सम्बन्ध ही नहीं है, अपितु जो एपरणाएँ स्वाध्याय- प्रतिबन्धि काही प्रमाणित हुई हैं । हमें वैसा कोई सा भी लोक - सहयोग किसी भी सन्धा पर भीप्सित नहीं है, जो समस्यानिराकरण के स्थान में अधिक समस्या जनक वन जाय । ' सर्वान् परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः ' ही हमारे जीवन का मूलमन्त्र रहा है, एवं यावज्जीवन रहेगा बड़े से बड़ा लोकमूल्य चुका कर भी । हम डॉ: महोदय से यही आवेदन करेंगे कि, ' संस्थान ' का सूत्रपात्र उनकी व्यावहारिकी प्रज्ञा के आधार पर ही हुआ है । अतएव ' संस्थान ' का संरक्षण एकमात्र उनकी निष्ठा पर ही अवलम्बित है । सर्वतोभावेन ' संस्थान ' का विकास उन्हीं के सहयोग पर अवलम्बित है । हमारा इसप्रकार का स्पष्टीकरण इससे पूर्व भी अमुक मित्रों को हमारी केवल ' सनक ' ही प्रतीत होता रहा है । किन्तु यह स्प है कि इसी ' सनक ' ने हमें श्रद्यावधि लौकैपणाओं से उन्मुक्त रखते हुये स्वाध्यायनिष्ठ बनाए रक्खा है । हम तो कृतज्ञ हैं संस्थान की ओर से उस श्रेष्ठप्रवरत्रयी के प्रति, जिसने संस्थान को प्राणदान देने का अनु-ग्रह किया है, एवं जिसके बल पर तीन ग्रन्थ प्रकाशित हो सके हैं, एवं दो मेधावी आचार्य वेदस्वाध्यायत के अनुगामी बन सके हैं । और इस दिशा में हमारी ऐसी आत्मनिष्ठा है कि, प्रकाशनका भले ही कालान्तर में अर्थाभाव से उपरत हो जाय, किन्तु मानवाश्रम विद्यापीठ की चह अध्ययनाध्यपनपर म्परा तो उसी श्रेष्ठिप्रवरत्रयी के अनुग्रह से सदा ही अतुरण बनी रहेगी । तदतिरिक्त हमारी यह भी आस्था है कि, यदि माननीय डॉ ० महाभाग कुछ समय पर्य्यन्त ' संस्थान ' को ही लक्ष्य बना कर, इसे ही स्थायीरूप प्रदान करने की कामना से निष्ठापूर्वक योगदान का अनुग्रह करेंगे, तो अवश्यमेव ' संस्थान ' भारत के लिए एक आदर्श ही प्रमाणित होगा, इसी मङ्गलकामना साथ यह ' किमपि प्रास्ताविकम् ' उपरत हो रहा है । मानवाश्रमविद्यापीठ-दुर्गापुरा ( जयपुर ) श्रीकृष्णजन्माष्टमी षि ० २०१३ नम्रो विधेयः -मोतीलालशम्र्मा ( भारद्वाजः ) वेदवीथी पथिकः १३

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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्ड की संक्षिप्त - विषयसूची

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श्री: उपनिषद्विज्ञान भाष्यभूमिका तृतीय खण्ड की संक्षिप्त - विषयसूची १- पौरुषेय - अपौरुषेय - मीमांसा ( प्रथमस्तम्भ ) पृष्ठ १ से १०४ पर्यन्त २ – उपनिषत्प्रतिपाद्य विषय दिग्दर्शन ( द्वितीयस्तम्भ ) १०५ से २४८ पर्यन्त ३ – उपनिषच्छिक्षास्वरूप दिग्दर्शन ( तृतीयस्तम्भ ) २४६ से ३१८ पर्यन्त ४ – औपनिषद- ज्ञानाधिकारिस्वरूप दिग्दर्शन ( चतुर्थस्तम्भ ) ३१६ से ३६४ पर्यन्त ५ – ब्राह्मणारण्यकोपनिषत्सम्बन्धस्वरूपदिग्दर्शन ( पञ्चमस्तम्भ ) ३६५ से ३६२ पर्यन्त ६- श्रुतिशब्दमीमांसा, एवं एकेश्वरवाद पर एक दृष्टि ( पप्पु स्तम्भ ) ३६३ से ४१६ पर्यन्त ७- औपनिषद - ज्ञानप्रवर्त्तकेतिवृत्त दिग्दर्शन ( सप्तमस्तम्भ ) ४१७ से ४३० पर्य्यन्त ८ - उपनिषत् के साथ गीता का समतुलन ( अष्टमस्तम्भ ) ४३१ से ४४६ पर्य्यन्त * उपनिषद्भाष्यभूमिकोपसंहार ( ४४७ से ४५० पर्यन्त ) * परिशिष्टसंग्रह ( शास्त्रोयवचनाचरार्थसमन्वय ) - * ---१ - प्रथम स्तम्भे- एते परिच्छेदा निरूपिता द्रष्टव्याः-१ - माङ्गलिक संस्मरण २- सन्दर्भसङ्गति ३ - दार्शनिक दृष्टि और मीमांसासूत्र ३ ....... १ ....... १ ४ - वाग्देवी के चार विवर्त्त ...... १७ ५- आम्भृणी - सूक्तरहस्य I I ६- ' चत्त्वारि वाकूपरिमिता पद / नि मन्त्र के ११ रहस्यार्थ " २५ मन्त्ररहस्यार्थ ७- गौरीर्मिमाय सलिला नि ' - वैज्ञानिक दृष्टि, और मीमांसासूत्र ........ ४४ ६- शब्द नित्यानित्यत्त्वमीमांस | ' ' ' ' '५२ १० - शब्दब्रह्म, एवं अर्थब्रह्म का समतुलन ं.... ५६ ११ - वेदापौरुषेयत्त्व - पौरुषेयत्त्व - मीमांसा ६८ १२ - सिंहावलोकन १३ - वेदशास्त्र, और हमारा प्रचलित दृष्टिकोण १४- वेदप्रामाण्यरक्षा, और प्राचीन व्याख्यता १५ - मन्त्रद्रष्टारः. और मन्त्रकृतः १६- वेदप्रामाण्य पर आपत्ति, और उसका निराकरण १७ - वेदमन्त्रों का मन्त्रत्त्व, और विज्ञानवाकू ७६ ..... ८० ८२ १७ - उपनिषच्छास्त्र का अतुरण वेदत्त्व ६७ १६ - वेदभक्तों की वितण्डा, और उसका निराकरण..... ६७ इति - एकोनविंशति - ( १६ ) - परिच्छेदात्मकः - प्रथमः - स्तम्भः -१-१६

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विषयसूची ( २ ) - द्वितीयस्तम्भे- एते परिच्छेदा निरूपिता द्रष्टव्याः-१ - द्वितीयस्तम्भोपक्रम ... १०७ २७- यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि २ - भूतसर्ग, और शास्त्रोपदेश ... २०७ २८- ईश्वरस्वरूपसिंहावलोकन ' ३- समाधानपरम्परा ... ११० २६- देवसत्यस्वरूपपरिचय ४- उपनिषदों के सन्तमतानुयायी ३० - जीवात्मस्वरूपविश्लेषण प्राचीन व्याख्याता ' १११ ३१ - उपनिषच्छास्त्र का मुख्य लक्ष्य ५ - उपनिपदों के गौण- प्रधान लक्ष्य -६- निगम- अनुगम - रहम्य मीमांसा I७ - आत्मन्वी ईशप्रजापति - कार्यरूप विश्व के दो तत्व - कारणस्वरूप विश्वमूल के दो तत्त्व १० - विश्वात्मा के १६ बलकोश ... १८० ... १८१ ' ११४ ३२ - ईशोपनिपत के प्रतिपाद्य विषय ( १ ) १८४ ... ११५ ३३ - केनोपनिषत के प्रतिपाद्य विषय ( २ ). १८७ ... ११८ ३४ - कठोपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय ( ३ ) १६० ... १२० ३५ - प्रश्नोपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय ( ४ ) १६४ - १२५ ३६ - मुण्डकोपनिषत् के प्रतिपाद्य ·· १२८ विषय ( ५ )... १६५ ... १७१ ... १७५ ... १७५ ११ - प्रविविक्तब्रह्मविवर्त्त • १४१ ३७ - माण्डूक्योपनिपत् के प्रतिपाद्य १२- श्वोवसीयसूब्रह्म ' १४२ विषय ( ६ ) .... १६६ १३- पञ्चगतिसमप्रिलक्षण अक्षरब्रह्म - १४३ ३ = - तैत्तिरीयोपनिषत् के प्रतिपाद्य १४- काममय पुरुषब्रह्म • १४५ त्रिषय ( ७ ) ' ' ' २०१ १५ - प्राकृत ब्रह्म के दो विवर्त्त १४८ २६ - ऐतरेयोपनिपत के प्रतिपाद्य १६ - षोडशकल ईशप्रजापति ... १४६ विपय ( 5 ) २०५ १७- ' प्रज्ञा ' शब्द का तात्त्विक विश्लेषण १५२ ४० - छान्दोग्योपनिपत के प्रतिपाद्य १८ - विश्वसृट्- पञ्चजन - पुरञ्जन - पुर-विपय ( 1 ) २१० विवर्त्तचतुष्टयी - १५३ ४१ - बृहदारण्यकोपनिपत के प्रतिपाद्य १६- प्रजापति की पाँच संस्थाएँ * १५७ विषय ( १० ) ... २२६ २०- ' संविदन्ति ' का रहस्यार्थ · १५६ ४२ - श्वेताश्वतरोपनिपत् के प्रतिपाद्य २१- आत्म - ब्रह्म - यज्ञ- योनि ..१६१ विषय ( ११ ) ' २४४ २२ - सप्तभुवनसृष्टि • १६४ २३- त्रीणि ज्योतींपि -१६६ ४३ - कौषीतकि ब्राह्मणोपनिपत् के प्रति-पाद्य विषय ( १२ ) २४५ २४ - भूतयोनि - भूतभावन भूतेश्वर - १६७ ४४ - मैत्रायण्युपनिषत् के प्रतिपाद्य २५- सच्चिदानन्दघन ईश्वर · १६८ विषय ( १३ ) ... २४७ २६ - विश्वकर्मा के सखा, और तीन धाम · १६६ * प्रकरणोपसंहार * २४७ इति - चतुश्चत्वारिंशत् - ( ४४ ) - परिच्छेदात्मकः - द्वितीयः - स्तम्भः -२ ~ १७

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विषयसूची ३- तृतीयस्तम्भे - एते परिच्छेदा निरूपिता द्रष्टव्याः-१- प्राचीनदृष्टि और उपनिषदों की शिक्षा... २५१ २ - प्रत्नदृष्टि, और उपनिषदों की शिक्षा. २६१ ३ - उपनिषदों की सञ्चर विद्यात्मिका शिक्षा... २६७ ६ - उपनिषदों की भक्तियोगात्मिका ऐश्वर्य्यबुद्धियोगशिक्षा ( २ ) ७- उपनिषदों की ज्ञानयोगात्मिका ज्ञान बुद्धियोगशिक्षा ( ३ ) ४ - उपनिषदों की प्रतिस्वरविद्या-मिका शिक्षा ५ - उपनिषदों की कर्मयोगात्मिका धर्म्मबुद्धियोगशिक्षा ( १ ) ' २८२ - उपनिषदों की बुद्धियोगात्मिका वैराग्यबुद्धियोगशिक्षा ( ४ ) ... २६२ ६ - उपनिषदों की व्यावहारिक शिक्षा... २६७ १० - उपनिपदों का शिक्षण - कौशल ..३०० • २७४ * - प्रकरणो र संहार • ३१७ इति - दश ( १० ) परिच्छेदात्मकः - तृतीयः स्तम्भः -३– ४ - चतुर्थस्तम्भे- एते परिच्छेदा निरूपिता द्रष्टव्याः – १- ब्रह्मविद्या और तनप्रतिपादक ७- पिप्पलादसम्मता अधिकार मर्यादा ३३७ शान्त्र ··· ३२१ ८ - याज्ञवल्क्यसम्मता अधिकार-२ - वर्णप्रजा, और अधिकारमर्थ्यादा ... ३२४ ... ३४८ ३ - संस्कार, और अधिकार मर्याद । ३२७ ६- परिशिष्ट- अधिकार मर्यादा ... २५६ ४- संस्कार स्वरूपदिग्दर्शन ... ३२६ १० - स्वाध्यायव्रत मीमांसा ... ३६० ५- ब्रह्मविद्यावित् - परमाचार्थ्य ... ३३१ * प्रकरणोपसंहार ... ३६३ ६- ब्रह्मपर्षन्स्वरूप दिग्दर्शन ... ३३३ इति - दश - ( १० ) - परिच्छेदात्मकः - चतुर्थः स्तम्भः -५-४ पञ्चमस्तम्भ - एते परिच्छेदा निरूपिता द्रष्टव्याः-१ - उपनिषत् और उपनिपच्छास्त्र ३६७ स ... ३८० २ - उपनिपच्छन्द्र का अवच्छेदक ... ३७० ६- मन्त्रसंहिता की सर्वना ... ३८१ ३- काण्डत्रयी का त्रिपुटी सम्बन्ध ... ३७१ ७ - ब्राह्मणवेद की सर्वता ... ३८३ ४ कृत्स्नात्मक वेदशास्त्र, और तन्त्रों की कृत्स्नता ५ - कृत्स्नात्मक वेदशास्त्र, ओर तन्त्रों इति – नव - ( 8) परिच्छेदात्मकः - पञ्चमः स्तम्भः -x-१८ आरण्यकवेद की सर्वता ... ३८७ ... ३७८ ६ - उपनिषद की सर्वता ... ३८८ * प्रकरणोपरांहार ... ३८१

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विषयसूची ६ - १ ष्ठ स्तम्भे ते परिच्छेदा निरूपिता द्रष्टव्याः— ... ४०३ ५ - श्रुति शब्द के आधुनिक व्याख्याता ४०४ ७- श्रुतिस्मृति - संज्ञामीमांसा... ४०५ १ - भारतीयशास्त्र ३६५ ५ - श्रागमवित्रर्त्त परिचय २ - चतुः संस्थ अपौरुषेयशास्त्र • ३६६ ३ - आगम - निगम - रहस्य ४- पडङ्गस्वरूपपरिचय = - एकेश्वरवाद पर एक दृष्टि .... ४११ ३६६ ... ४०० इति - अष्ट ( ८ ) परिच्छेदात्मकः - षष्ठः स्तम्भः -६-- * -७- सप्तमस्तम्भे- एते परिच्छेदा निरूपिता द्रष्टव्या: -१ - औपनिषद ज्ञान का स्वरूप .४१६ ५ - लोकभावुकता संरक्षक - प्रकरण का २ - देवयुग, और युगव्यवस्था ... ४२० उपसंहार ४२५ ३ - ब्रह्म - क्षेत्र का समन्वय ... ४२२ ६ - प्रकरणोपसंहारदृष्टि का उपलालन-४ - राजर्षिविद्यात्मक औपनिपढ़ ज्ञान भाब, एवं सिद्धान्तपक्ष • ४२६ के प्रथम प्रवर्त्तक ... ४२४ इति - पट्- ( ६ ) -परिच्छेदात्मकः – सप्तमः - स्तम्भः -61 ---- प्रष्टमस्तम्भ - एते परिच्छेदा निरूपिता द्रष्टव्याः-१ - उपनिपत्, और गीता २ - गीताशास्त्र की मर्यादा ३- दर्शन, और शास्त्रमर्यादा ४ - गीता का महान कौशल • ' ४३३ ५- गीता का दृष्टिकोण ... ४३६ ... ४३२ ६ - गीता, और कृत्स्न - वेदशास्त्र ... ४३७ ... ४३४ * प्रकरणेोदश्य ... ४४४ ··· ४३५ इति - षट् - ( ६ ) – परिच्छेदात्मकः- अष्टमः स्तम्भः ८ * — भूमिका - तृतीयखण्डोपसंहार, एवं खण्डत्रयात्मक भूमिकाग्रन्थोपसंहार ४४७ * —परिशिष्टसंग्रहः ( खण्डान्तर्गत – वचनार्थसंग्रहः ) उपरतश्चायं अष्टस्तम्भात्मकः - भूमिका - तृतीयखण्डः उपरता चेयं तृतीयखण्डस्य संक्षिप्ता - विषयसूची १६

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श्रीः उपनिषहिज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत पौरुषेय- अपौरुषेयमीमांसा नामक प्रथमस्तम्भ

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श्रीः तन सद् - त्रह्मणे नमः उपनिपद्विज्ञानभाष्यभूमिका तृतीयखण्ड १ – पौरुषेय - अपौरुषेय मीमांसा ( प्रथमस्तम्भ )

१ - माङ्गलिक संस्मरण-नि षु सीद गणपते! गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् ।

न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे महामर्क मघवञ्चित्रमर्च ॥१ ॥

एक एवाग्निर्भेहुधा समिद्ध एकः मूर्यो विश्वमनु प्रभृतः ।

एकैबोषाः सर्गेमिदं विभाति - " एकं वा इदं विबभूव सर्वम् ॥२ ॥

वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।

वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुपतामिन्द्रपत्नी ॥३ ॥

वागक्षरं प्रथमजा ऋतस्य वेदानां माताऽमृतस्य नाभिः ।

सा नो जुषाणोपयज्ञमागादयन्ती देवी सुहवा मेऽस्तु ॥ ४ ॥

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।

तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुनैं शरणमहं प्रपद्ये ॥ ५ ॥

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।

जगतः पितरौ बन्दे पार्वती - परमेश्वरौं ॥ ६ ॥

पिधाना नकुली दन्तैः परिवृता पविः ।

सर्वस्यै वाच ईशाना चारु मामिह बादयेत् ॥७ ॥

२ – सन्दर्भसङ्गति— “ आत्मनिवेदन, मङ्गलरहस्य, उपनिपच्छन्दार्थ, उपनिषदों का वेदत्त्व " इन चार विषयों का भूमिका - प्रथमखण्ड में क्रमिक निरूपण हुआ हैं । चारों में से चौथा विषय किसी विशेष प्रयोजन की सिद्धि के लिए बहुविस्तृत बन गया है । पहिले हमारा ऐसा अनुमान था कि, भूमिका प्रथमखण्ड में हीं चौथे विषय का स्पष्टीकरण हो जायगा, एवं द्वितीयखण्ड में प्रतिज्ञात शेष पाँचों विषयों का समावेश हो जायगा । फलतः भूमिका

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भाष्यभूमिका ग्रन्थ दो खण्डों में सम्पन्न हो जायगा । परन्तु उपनिषदों के वेदत्त्व की मीमांसा प्रारम्भ करते हुए जब हमनें तात्त्विक वेद के स्वरूप का उपक्रम किया, तो ऐसा भान होने लगा कि, प्रथमखण्ड में इस विषय का पूरा स्पष्टीकरण न हो सकेगा । तात्त्विक वेद से सम्बन्ध रखने वालीं कुछ एक वेदनिरुक्तियों का सामान्यतः दिग्दर्शन करा के ही प्रथमखण्ड समाप्त कर देना पड़ा । भूमिका द्वितीयखण्ड में वेद के तात्त्विक स्वरूप का निरूपण हुआ । वेदपदार्थ से सम्बन्ध रखने वाले विविध विषयों के स्पष्टीकरण से द्वितीयखण्ड का कलेवर यद्यपि प्रथम खण्ड की अपेक्षा से बहुविस्तृत बन गया । तथापि शब्दार्थाभेदानुबन्धिनी जिस ' पौरुषेया पौरुषेय ' समस्या को सुसमन्वित करने के लिए वेद के तात्विक स्वरूप का निरूपण हुआ था, अवसर न मिला । परिणामतः इस चौथे विषय के इस अत्यावश्यक अङ्ग के स्पष्टीकरण के लिए, एवं प्रतिज्ञात शेष पाँच विषयों के लिए भूमिका - तृतीयावण्ड प्रस्तुत करना पड़ा । इस प्रकार आरम्भ में एक ही खण्ड में, एवं आगे जाकर दो खण्डों में समाप्त होने वाला भूमिकाग्रन्थ तीन खण्डों में सम्पन्न हुआ ॥ यद्यपि हम यह अनुभव कर रहे हैं कि, ' उपनिषद्भूमिका ' के सम्बन्ध में वेदनिरूपण को इतना विशद-रूप देना ग्रन्थस्वरूपमर्थ्यादा से अतिक्रान्त है । इसके लिए हमें स्वतन्त्र ही प्रयास करना चाहिये था । तथापि प्रकरणसमत्त्व से ग्रन्थमर्थ्यादा की उपेक्षा करते हुए उपनिषद्भूमिका में हीं ' वेदमीमांसा ' का समावेश कर देना सामयिक मान लिया गया । इसी प्रासङ्गिक बेदमीमांसा से प्रस्तुत प्रन्थ विशद बन गया । भूमिका प्रथमखण्ड के लगभग २०० पृष्ठ, ५०० पृष्टात्मक सम्पूर्ण द्वितीयखण्ड, एवं तृतीयखण्ड के १०० पृष्ठ, इस प्रकार सम्भूय ८०० पृष्ठों में तो केवल “ क्या उपनिपत् वेद है? ” इस चतुर्थ प्रश्न की ही मीमांसा हुई है । प्रश्नमीमांसा से सम्बन्ध रखने वाले दार्शनिक, तथा वैज्ञानिक भावों का अब तक स्पष्टीकरण हुआ है । जैसा कि प्रश्नोपक्रम में यह स्पष्ट किया गया था कि, " क्या उपनिषत् वेद है? ” इस प्रश्न का समाधान वेदापौरुषेय - पौरुषेय से सम्बन्ध रखता है, एवं अपौरुषेयत्त्व भावों की निश्चित मीमांसा के लिए वेद के वैज्ञानिक स्वरूप का विश्लेषण श्रावश्यकरूप से अपेक्षित है ” ( देखिए - भू ० १ खण्ड ४ प्रकरण, पृ ० सं ० १ - १२७ ) इसी उपक्रम - प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए प्रथमखण्ड से प्रारम्भ होने वाली दार्शनिकदृष्टि से द्वितीयखण्ड- समाप्ति पर्य्यन्त वेदस्वरूप का स्पष्टीकरण करना पड़ा । इस प्रतिपादित वेदस्वरूप के आधार पर विज्ञ पाठकों को यह विदित हुआ होगा कि, शब्दात्मक वेदग्रन्थ पौरुषेय है, एवं तत्त्वात्मक वेद अपौरुषेय है । शब्दार्थ - सम्बन्ध की जटिल समस्या से सम्बन्ध रखने वाली पौरुषेयापौरुषेयमीमांसा इसप्रकार यद्यपि वेद के तात्त्विकस्वरूप विश्लेषण से बहुत कुछ स्पष्ट हो जाती है । तथापि शब्द नित्यत्त्व पक्षपाती मीमांसकों के सुदृढ वैज्ञानिक सिद्धान्त को देखते हुए अभी तक मीमांसा अपूर्ण ही मानी जायगी । इसी अपूर्णता की पूर्ति के लिए प्रक्रान्त चतुर्थ प्रश्न के सम्बन्ध में ' पौरुषेय, अपौरुषेयमीमांसा ' नाम से एक स्वतन्त्र प्रकरण का समावेश करना आवश्यक समझा गया है । इस प्रकरण में शब्दार्थसम्बन्ध का स्पष्टीकरण करते हुए मीमांसा-सूत्रों के तात्पर्य्यार्थ की ही निश्चित व्यवस्था होगी । एवं इसी आधार पर ' क्या उपनिषत् वेद है? ' इस चतुर्थ प्रश्न का निश्चित निर्णय किया जायगा । २