Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 451–457
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 451–457
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( ६ ) - ज्ञानयोगसमर्थकवचनानि–
१- “ यस्त्वात्मरतिरेव स्यात् - आत्मतृप्तश्व मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य काय्यं न विद्यते ॥
२- श्रेयान् द्रन्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप! ।
सर्व कर्माखिलं पार्थ! ज्ञाने परिसमाप्यते ॥
३ - न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
४- उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥
५- अपिचेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥
( ७ ) - सिद्धान्तयोग ( बुद्धियोग ) समर्थकवचनानि— १ – “ एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धि, योंगे त्विमां 1 बुद्धया युक्तो यया पार्थ! कर्म्मबन्धं ग्रहास्यति ॥
२ - व्यवसायात्मिका बुद्धि रेकेह! कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥
—२ | ३६ | -31821 ३ – योगस्थः कुरु कर्म्माणि सङ्ग ं त्यक्त्वा धतजय! सिद्धवसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
४- दूरेण ह्यवरं कर्म्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय! ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥
-२ | ४३ |
५- बुद्धियुक्तो जहातीह उमे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्म्मसु कौशलम् ॥
४४ ९ -२२४६ |
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तृतीयखण्ड
६ कर्म्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्वनामयम् ॥
७ श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
—२५० | —२ | ५३ | निरूपणीय प्रधान विषय के साथ साथ गीताशास्त्र के सम्बन्ध में हमारा अपना एक प्रातिम्विक मन्तव्य यह भी है कि, - गीता ' वेदशास्त्रीय विषयों की संक्षिप्त सूची है '! दूसरे शब्दों में यह कहना अधिक समीचीन होगा कि, – ' औपनिषद कुछ एक तत्त्वों के लिए गीताशास्त्र जहाँ विस्तारभूमि है, वहाँ इतर वेदभागों के लिए गीताशास्त्र एकप्रकार का स्मारक ग्रन्थ है ' । एक एक, दो दो, तीन तीन श्लोकों में गीताशास्त्र में गहनतम तत्त्वों का, निगूढ विद्याओं का सङ्केतविधि से विश्लेषण हुआ है, जिनके पूर्ण परिचय प्राप्त करने के लिए वेदशास्त्रसमाश्रय परमावश्यक बन जाता है । केवल गीताशास्त्र के आधार पर जो महानुभाव गीताप्रतिपाद्य विषयों का समन्वय कर डालना चाहते हैं, हमारी दृष्टि में यह उनका साहस है, कल्पित आत्मतुष्टिमात्र है । अस्तु, गीता किन विषयों का तो संकेतविधि से, तथा किन विषयों का विस्तारविधि से निरूपण करती है?, इत्यादि प्रश्न प्राकृत हैं । स्वयं गीताभाष्य इन सब समस्याओं का समाधान करने के लिए पर्याप्त है । प्रकृत में इस सम्बन्ध में हमें यही कहना है कि, वेदशास्त्र, तथा गीताशास्त्र, दोनों अनेक दृष्टियों से समसम्बन्धी हैं । इसमें भी वेद के उपनिषद्भाग की तुलना में तो गीता निकटतम सम्बन्धिनी बन रही है । यहाँ कुछ एक ऐसे वचन उद्धृत कर देना अप्रासङ्गिक न माना जायगा, जो दोनों के इस सख्यभाव का पूर्ण समर्थन कर रहे हैं— ( १ ) - " अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते " ( गोता १३ । १२ । ) । “ नासदासीनो सदासीत्तदानीम् " ( ऋक् सं ० १८ । १२ । ६।१ । ) । ( २ ) —– “ अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्त्तते " ( गी ० १०।८ ) । " अहंता ( नि ) विश्वा ( नि ) चकरम् " ( ऋक् सं ० ४।४२।६ । ) । ( ३ ) - " अहं क्रतुरहं यज्ञः " ( गी ० ६।१६ ) । 1 " अहमर्णासि वितरामि सुक्रतुः ', ( ऋक्सं ० २०२४६ । ४६ ) । ( ४ ) - " अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन " ( गीता ६।१६ । ) । “ उभयं हैतदग्रे प्रजापतिरास - मर्त्यं चैवामृतं च " ( शत ० १०।१।४।१ । ) । ४४३
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भाष्यभूमिका ( ५ ) इन्द्रियेभ्यः परार्थाय परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धि: " इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिः " * 11 " ( 7312 3131201 ) | ॥ ” ( गी ० ३।४२ ९ ) । ( ६ ) - " उर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ” ( कठो ० ६३१। ) " ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ” ( गी ० १५।१ । ) ।
( ७ ' स्रुती अशृखवं पितृ खामहं देवानाम्रुत मर्त्यानाम् ।
ताम्यामिदं विसमेत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं च " ॥
-ऋक् सं ० १०१६८१५ शुक्ल - कृष्णे गती ह्ये ते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवतेि पुनः ॥ ( गी ०८।२६ । ) । * प्रकरखोद्देश्य-प्रस्तुत प्रकरण का उद्देश्य एकमात्र यही है कि, बिन्हें औपनिषद ज्ञान की जिज्ञासा है, उन्हें उपनिषत्-साहित्य के साथ साथ गीता साहित्य को भी अपना लक्ष्य बनना चाहिए! कारण यही है कि, उपनिषदों नें आत्मविवों में से जिस पुरुषोत्तम ( अव्यय ) को अपना लक्ष्य बनाया है, एवं आत्यन्तिक शान्तिप्राप्तिसाधन-भूत जिस वैराग्यलक्षण बुद्धियोग का उपनिषदों में दिग्दर्शन कराया गया है, वह ऋषिभेद से यत्रतत्र बिखरा हुआ सा है । किसी एक ही उपनिवत् में अव्ययपुरुष, तथा बुद्धियोग का विस्पष्ट निरूपण नहीं है । यदि इस सम्बन्ध में यह मो कह दिया बाय, तो मी अतिशयोक्ति न मानी बायगी कि, जो अव्ययपुरुष, एवं जो बुद्धियोग उपनिषदों में सर्वथा गुहानिहित है, गीताचार्य्य ने उसे बाह्यस्वरूप प्रदान किया है । अतएव गीताचा ही इसके प्रथम प्रवर्तक मान लिए गए है । एक ही ग्रन्थ में बड़ी प्राञ्जलभाषा में समस्त उपनिषदों के सारमृत श्रव्ययात्मा, तथा बुद्धियोग का प्रतिपादन करने वाला गीताशास्त्र अवश्यमेव उपनिश्वत्-स्वाध्याय प्रेमियों के लिए श्रेयः प्र यः पन्था माना जायगा । जिस युग में वैदिक परिभाषाएँ बिलुप्त म हो गई हों, उस आज के युग में वो गीताशास्त्र ही एक ऐसा साधन है, जिसको सेतु बना कर हम औपनिषद ज्ञानसमुद्र का सन्तरण कर सकते हैं । किन्तु 1 ' किन्तु ' का सन्निवेश इसलिए किया जा रहा है कि, कुछ एक शताब्दियों से पुष्पित पल्लवित सम्प्रदाय -बाद ने ज्ञान - विज्ञानप्रधान तत्त्वप्रतिपादक गीताशास्त्र को ' दर्शनशास्त्र ' का रूप दे डाला है । साम्प्रदायिक दर्शन - भाव की प्रतिच्छाया से युक्त गीताशास्त्र अपने रहस्यपूर्ण औपनिषद तत्त्वमाव से बहुत पीछे हट चुका है । यदि पाठकों नें उसी साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से गीता को माध्यम बनाया, तो कहना पढ़ेगा कि, वे औप-निषद -तत्त्वरविज्ञान में सफल न हो सकेंगे । गीता तभी माध्यम मानी जा सकेगी, जबकि साम्प्रदायिक दृष्टिकोण ४४४
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तृतीयखण्ड से इसे सर्वथा असंस्पृष्ट रखते हुए विशुद्ध तत्त्ववाद के आधार पर इसका अवलोकन किया जायगा | गीता-शास्त्र की इसी तत्त्वमर्यादा को सुरक्षित रखने के लिए अर्धसाहित्यप्रेमी महानुभावों की सेवा में ' गोता-विज्ञानभाष्य ' उपस्थित हुआ है । उपनिषदों में संक्षेप से, साथ ही मधुकरवृत्ति से प्रतिपादित अव्ययात्मस्वरूप, एवं तत्प्राप्तिसाधनभूत वैराग्यबुद्धियोग का जिन्हें एकत्र स्पष्ट निरूपण देखना हो, उन्हें अवश्य ही ' गीताविज्ञानभाष्य ' को लक्ष्य बनाना चाहिए, एकमात्र यही सूचित करना प्रकृत प्रकरण का मुख्य उद्देश्य है । उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूका है यखण्डान्तर्गत ' श्रौती उपनिषत् के साथ स्मार्त्ती उपनिषत् का समतुलन ' नामक अष्टम स्तम्भ - उपरत ८ ४४५
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cit: उपनिषद्विज्ञानभाष्य भूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' श्रोती उपनिषत् के साथ स्मार्ती उपनिषत् का समतुलन ' नामक अष्टम स्तम्भ - उपरत Τ
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तृतीयखण्ड * - भूमिका - तृतीयखण्डोपसंहार, एवं खण्डत्रयात्मक भूमिका ग्रन्थोपसंहार -प्रकरण आवश्यकता से अधिक विशद हो गया है, जब कि ' उपनिषदों का श्रात्मतत्त्व, ' ' वेदान्तसूत्र, और उपनिषत् ' आदि श्रावश्यक विषय भी ज्यों के त्यों सुरक्षित हैं । आरम्भ में भूमिकाग्रन्थ २०० पृष्ठों में सम्पन्न हुआ, आगे चलकर ५०० पृष्ठों का आश्रय लिया गया । जय प्रकाशन प्रतिलिपि ( प्रेसकोंपी ) का श्रवसर आया, तो विशेष स्पष्टीकरण की आवश्यकता प्रतीत हुई । फलस्वरूप भूमिका ग्रन्थ के १५०० पृष्ठ हो गए, एवं उस समय इसे तीन खण्डों में विभक्त करना पड़ा । ग्रन्थ समाप्त करने से पहिले हम यह निवेदन करना आवश्यक समझते है कि, उपनिषदों के अक्षरार्थमात्र से तत्र तक श्रौपनिषद तत्त्वों का समन्वय नहीं किया जा सकता, जब तक कि समस्त वैदिक तत्त्वों से सम्बन्ध रखने वालीं परिभाषाओं का विशुद्ध प्रणाली से समन्वय नहीं कर लिया जाता । साथ ही उपनिषद् - भाग के यथावत् स्वरूपपरिचय के लिए विधि, या रण्यकादि अन्य वेदभागों का लोन विलोडन भी आवश्यकरूप से अपेक्षित है । उदाहरण के लिए कठोपनिषत् के ' नचिकेतोपाख्यान ' को हो लीजिए । यमरात्र के अतिथि नचिकेता यमराज से ' स्वर्ग्याग्नि ' का स्वरूप पूँछते हैं । यमराज निम्न लिखित शब्दों में नचिकेता का समाधान करते हैं-" लोकादिमग्नि तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । स चापि तत्प्रत्यवदद्ययोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ 97 ( कठोपनिषत् १ | १ | ५ | ) । हम साहस पूर्वक कह सकते हैं कि, ब्राह्मणग्रन्थों में प्रतिपादित, पञ्चचितिक, चयनयज्ञ की इति-कर्त्तव्यता का सम्यक् ज्ञान प्राप्त किए बिना पण्डितराज भी उपर्युक्त शब्दार्थ मात्र के आधार पर स्वर्ग्याग्नि का रहस्य नहीं समझ सकते । वेदशास्त्र की तात्त्विक परिभाषाओं का ऋषियों नें पृथक् ग्रन्थरूप से संकलन अवश्य किया था, जिसके लिए यत्र तत्र ' रहस्य ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । परन्तु कालपुरुष के प्रकोप से श्रथवा तो हमारी आत्यन्तिक उदासीनता से रहस्य प्रतिपादक वे रहम्यधन्य हमारी दृष्टि से ओझल हो गए हैं । वेदार्थसम्बन्ध में यही एक कठिनाई है । दूसरी कठिनाई है - स्वाध्यायपरम्परा की विलुप्ति । तीसरी कठिनाई है सन्तमत का प्राबल्य, एवं श्रार्षधर्म्म, तथा तन्मूलक साहित्य ( वैदिक साहित्य ) के प्रति प्रमाण भारतीय प्रजा की अनन्य उपेक्षा । इन्हीं सब जटिल समस्याओं के कारण हमारा यह ' भाषाप्रपास ' भी यदि दुरूह मान लिया जायगा, तो विशेष आश्चर्य न होगा । एकमात्र इसी दटिलता के अनुग्रह से हनें अनेक विषयों को पुनरुक्तिदोष का अतिथि बनाना पड़ा है । सर्वान्त में सत्यतत्त्व के प्रतिपादन के नाते यदि किन्हीं महानुभावों के प्रति हमारे मुख से अनुचितोचित निकल गया हो, तो उसके लिए हम हृदय से क्षमाप्रार्थी हैं । निगूढतम रहस्यपूर्णा वैदिक परिभाषाओं के ४४७
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उपरतश्चायम् - उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकायाः-तृतीय:: -खण्डः -र अष्टस्तम्भात्मकः -: X: -उपरता चेयमुपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका खण्डत्रयात्मिका -: * ) ( *: -