Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika III — पृष्ठ 441–450

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका ३ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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श्रीः उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - तृतीयखण्डान्तर्गत ' श्रौती उपनिषत् के साथ स्मार्त्ती उपनिषत् का समतुलन ' नामक ( उपनिषत् के साथ गीता का समतुलन - नामक ) अष्टम - स्तम्भ

पृष्ठ 442

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श्री: वेदोपनिषत् के साथ गीतोपनिषत् का समतुलन १ - उपनिषत् और गीता — ' उपनिषत् ' शब्द के अवच्छेदक का स्पष्टीकरण करते हुए षष्ठ स्तम्भ में यह निवेदन किया जा चुका है कि, ' उपनिषत् ' शब्द नित्यसिद्ध उपपत्तिविज्ञानात्मक निश्चयभावप्रवर्त्तक मौलिक सिद्धान्त का ही संग्राहक है | भारतीय शास्त्रनिधि में अपौरुषय - वेदशास्त्र के अतिरिक्त ' गीताशास्त्र ' ही एक ऐसा पौरुषेयशास्त्र ( स्मृतिशास्त्र ) है, जिसने उपनिषत् शब्द के तथोक्त वच्छेदक का अक्षरशः अनुगमन किया है । श्रमुक ( पूर्वपरिच्छेदप्रतिपादित ) कारण विशेष से अपौरुषय वेदशास्त्र के अव्ययात्मानुगत बुद्धियोग - प्रतिपादक अन्तिम वेदभाग में निरूढ़ हो जाने वाला ' उपनिषत् ' शब्द पौरुषेय स्मात ' गीताशास्त्र की अव्ययात्मविद्या, एवं तदनुगत वैराग्यबुद्धियोग का संग्राहक बनता हुआ इसके साथ भी समन्वित हो पड़ा है । यही कारण है कि, वेदातिरिक्त सम्पूर्ण भारतीय शास्त्रों में एकमात्र गीताशास्त्र को ही ' उपनिषत् ' की उपाधि प्राप्त हुई है । अतएव गीताशास्त्र आर्षपरम्परा में ' स्मार्त्ती - उपनिषत् ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । ' स्मार्त्ती ' शब्द ही यह व्यक्त कर रहा है कि, गीता अपौरुषेय शास्त्र नहीं है, अपितु अपौरुषेय श्रुतिशास्त्र ( उपनिषच्छास्त्र ) प्रामाण्य के आधार पर प्रतिष्ठित रहने वाला स्मृतिशास्त्र है । स्वयं गीताशास्त्र ने अपने मन्तव्य की प्रामाणि -कता के लिए “ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणन्ते कार्याकाव्यवस्थितौ ” ( गीता १६ । २३ ) इत्यादि रूप से अपनी प्रामाणिकता का आधार शास्त्र को ही माना है । २ - गीता की शास्त्रमय्र्यादा-नितान्त भावुकतापूर्णा श्राज की मानवप्रज्ञा की कुछ ऐसी मान्यता हो चली है कि, " मानव जीवन के ऐहलौकिक अभ्युदय सुख की प्राप्ति के लिए, तथा पारलौकिक निःश्रेयस - शान्तिभाव के लिए केवल गीताशास्त्र ही पर्याप्त है । तात्पर्य - गीताशास्त्र मानव की यच्चयावत् कर्त्तव्यकर्म्मनिष्ठाओं के लिए पर्याप्त है । कोई आवश्यकता नहीं, गीता से अतिरिक्त किसी अन्य उस शास्त्राडम्बर के अनुगमन की, जो अपने विधिनिषेधात्मक झञ्झावातों से मानव की प्रज्ञा को अधिकाधिक त्रिकम्पित ही करता रहता है " । अपनी तथोपवर्णिता मान्यता के अनुग्रह से वर्त्तमान भारतीय प्रज्ञा की दृष्टि में गीताशास्त्र ही उसके कर्त्तव्यकर्म का अन्यतम निर्णायक ग्रन्थ बन गया है । कर्त्तव्यकम्मशिक्षात्मिका इसी महती भ्रान्ति ने एकमात्र विज्ञान सिद्धान्तसूचक इस गीताशास्त्र को आबालवृद्धवनिता - सत्र का उपलालन - साधन बना दिया है । गीताशास्त्र की भाषा इतिहास की ( भहाभारत की ) भाषा है, अतएव व्याकरणानुगत प्रकृति - प्रत्यय - भाबाबु-बन्ध से बोधगम्या है । अतएव सभी इसके अक्षरार्थ से सहज में हीं परिचित हो जाते हैं, जिस अक्षरार्थबोध का विश्राम इनकी दृष्टि में केवल कर्ता - करण - पञ्चमी - षष्ठी - आदि भावों पर ही हो जाता है I । और यों अपनी ४३३

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मायभूमिका इतिहास भाषा के आर्कषण से अत्यन्त निगृढ़ विज्ञानसिद्धान्तों का सूचक गीताशास्त्र आज सर्वसामान्य का कीडाक्षेत्र बन रहा है I । एवं यही आज भावुक - प्रज्ञा का अन्यतम शास्त्र बन रहा है, जबकि कर्त्तव्यकम्र्म्मात्मिका आचारनिष्ठा ( आचरणपद्धति ) के अनुशासन से सम्बन्ध रखने वाले ' शास्त्र ' शब्द के अवच्छेदक का गीता से यत्किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं हैं । ' भारतीय मानव का क्या कर्तव्य है?, ' इस प्रश्न का गीता से कोई सम्बन्ध नहीं है | सहज भाषानुसार - हमें ' क्या करना चाहिए, एवं क्या नहीं करना चाहिए?, ' शास्त्रविधि से सम्बन्ध रखने वाले इस प्रश्न का गीता कोई समाधान नहीं करती । ठीक इसके विपरीत यदि गीता से कोई इस दिशा में यह प्रश्न कर बैठता है, तो गीता विस्पष्ट शब्दों में इस उत्तरदायित्त्व का भार ' शास्त्र ' पर ही डाल देती है । " क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए?, इस जिज्ञासा का समाधान शास्त्र के द्वारा ही प्राप्त करना चाहिए । ' जो ऐसा न कर अपनी इच्छामात्र से अच्छे - बुरे की कल्पना कर काल्पनिक कम्मों में प्रवृत्त हो जाता है, उसे न लोकसुख मिलता, न आत्मशान्ति उपलब्ध होती " * इत्यादि रूप से गीता विस्पष्ट शब्दों में कर्त्तव्य कर्म - निर्णय के सम्बन्ध में किसी अन्य शास्त्र की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रही है, जिस ' अन्यशास्त्र ' का सम्बन्ध उस ' श्रुति - स्मृतिशास्त्र ' से है, जिसमें श्रौतस्मार्त्त कर्तव्य - कग्र्मों का स्वरूप विहित हुआ है । श्रुति से श्रौतकर्म्म, श्रौतो उपासना, श्रौत ज्ञान प्रतिपादक ' ब्राह्मण - आरण्यक - उपनिषत् ' - नामक ' कर्त्तव्यवेदभाग ' ही गृहीत है । क्योंकि वेद के इसी ' कर्त्तव्यवेद भाग-में मानव के कर्म्मोपास्तिज्ञानात्मक देवप्राणनिबन्धन समस्त कर्त्तव्यों का विधान हुआ है । स्मृति से श्रुतिसिद्ध ग्रह्य लौकिक कर्मों की इतिकर्त्तव्यता बतलाने वाला कल्पशास्त्र, तथा मन्वादि स्मृतिशास्त्रही गृहीत है, क्योंकि इसी में मानव के भूतप्राणनिबन्धन लौकिक कम्मों का संग्रह हुआ है । विधि - आरण्यक – उपनिषदा त्मिका ब्राह्मणश्रुति एव ं तत्प्रामाण्याधार पर, प्रतिष्ठिता स्मृति, दो पर ही कर्त्तव्य कम्म विधायक अनुशासनात्मक ‘ शास्त्र ’ शब्द विश्रान्त है । एवं - तस्माच्छास्त्रं ' प्रमाणन्ते ' से यही शास्त्र अभिप्रेत है । यही गीता की शास्त्रमर्यादा है, जिसे विस्मृत कर श्रार्घप्रजा ने अपनी समस्ता श्राचारनिष्ठा को अभिभूत कर लिया है । ३- दर्शन, और शास्त्रमर्य्यादा— गीता की भाँति ' दर्शन ' के व्यामोहन ने भी भारतीय प्रज्ञा को सर्वात्मना विकम्पित ही किया है । दोनों में अन्तर केवल यही रहा है कि, दर्शन सूत्रात्मक है, अतएव भाषादृष्टया क्लिष्ट है, जब कि गीता की भाषा इतिहास ग्रन्थ की मर्य्यादा के अनुबन्ध से सरल है । दर्शनों के भाष्य भी ' इन्द्रस्य टीका बिडौजा ' रूपेण क्लिष्ट ही बने हुए हैं । फिर विषय भी अन्तोपक्रमभूता - बहुतत्त्ववादसम | कुलिता - नानाभावनिबन्धना - मृत्युलक्षणा

* यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारतः ।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ १ ॥

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणन्ते कार्याकार्य्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्त ं कर्म्मकर्त्ती मिहार्हसि ॥ २ ॥ ( गीता १६।२२,२३, ) ।

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तृतीयखण्ड प्रकृति के विभिन्न तत्त्ववादों को लक्ष्य बना रहा है । इन्हीं जटिलताओं के कारण गीतावत् दर्शन आबालवृद्ध-वनिता के तो उपलालन के माध्यम नहीं बन सके । हाँ उन भारतीय विद्वानों का उपलालन अवश्य ही इन दर्शनों ने कर डाला, जो श्रुति स्मृतिसिद्धा आचारनिष्ठा को विस्मृत कर चुके थे । अथवा यों कह लोजिए कि, दर्शनों के व्यामोहन ने हीं भारतीय विद्वत्प्रज्ञा को आत्मनिष्ठानुगत, अतएव शाश्वत - धम्म निष्ठानुगत आचारपथ से, एवं तत्प्रतिपादक रहस्यपूर्ण श्रुति - स्मृतिशास्त्र से पराङ्मुख कर दिया । अस्तु, यह विषय स्वतन्त्र रूप से अन्य निबन्ध में * प्रतिपादित है । प्रकृत में इस दिशा में केवल यही जान लेना पर्याप्त होगा कि, दर्शन भी गीतावत अमुक प्राकृतिक सिद्धान्तों के हीं प्रतिपादक हैं । धम्र्मानुगता श्राचारनिष्ठा से दर्शन का कोई सम्बन्ध नहीं है | अतएव गीतावत् दर्शन भी भारतीय कर्त्तव्यनिर्णायक शास्त्र की सीमा से सर्वथा बहिष्कृत है । गीता और दर्शन, दोनों ही तन्त्रों का धर्मनिष्ठा से साक्षात् रूप से कोई सम्बन्ध नहीं है । और दुर्भाग्यवश आज भारतवर्ष धर्मात्मिका श्रनिष्ठा के क्षेत्र में धर्मस्वरूपप्रतिपादक श्रुति - स्मृतिशास्त्र, एवं धर्म्म - कर्मेतिहास - निरूपणात्मक पुराणशास्त्र की प्रात्यन्तिक अवहेलना कर केवल तत्त्ववादात्मिका गीता-दर्शन - भक्ति का ही भ्रान्त - पथिक प्रमाणित हो रहा है । विद्वानों का पाण्डित्य दर्शन पर समाप्त है, एवं सर्वसाधारण की मान्यता गीतापारायण पर विश्रान्त है । ४ - गीता का महान कौशल -‘ उपनिषत् ’ के प्रतिपाद्य – सम्बन्ध में पूर्व प्रकरणों में विस्तार से स्पष्टीकरण किया जा चुका है । ' दर्शन ' के प्रतिपाद्य - सम्बन्ध में स्वतन्त्ररूप से अन्य निबन्ध में इच्छा न रहते भी कुछ निवेदन कर देना पड़ा है, क्योंकि भारतीय दर्शनवाद ने भारतीय श्रौतस्मार्त धर्म का कोई उपकार नहीं किया है । शेष रह जाता है । गीताशास्त्र । इसी के सम्बन्ध में दो शब्द निवेदन कर प्रस्तुत प्रकरण उपरत हो रहा है । क्या करना चाहिए?, विध्यात्मक अनुशासनात्मक इस शास्त्रोपदेश से, दूसरे शब्दों में कर्तव्यकम्र्मेतिकर्तव्यता से कोई सम्बन्ध न रखता हुआ गीताशास्त्र ' कैसे करना चाहिए? इस कर्म्म -कौशल का ही स्पष्टीकरण कर रहा है, जो कि गीताशास्त्र का महान् कौशल माना जायगा । इस कम्र्मकौशल का नित्यसिद्ध मौलिक विज्ञान - सिद्धान्त ही मुख्य आधार है । जो विषय वेद के उपनिषत् - भाग का है, वही विषय विस्तार से गीता में प्रतिपादित है । तभी तो इसे भी ' उपनिषत् ' का सम्मान प्राप्त हो गया है । पद्यात्मक संकोच भाव यदि उपनिषत् का लक्ष्य है, तो गेयात्मक विस्तारभाव इसका लक्ष्य है । तभी तो इसे ' गीता ' ( संक्षिप्त औपनिषद सिद्धान्त का विस्तार ) नाम से सुविभूषित किया गया है । निवृत्त - ज्ञानभाव-समन्विता सांख्यनिष्ठा, एवं प्रवृत्त - कर्म्मभावसमन्विता योगनिष्ठा, दोनों विभिन्न निष्ठाओं का सर्वत्र समरूपेगा अवस्थित समत्त्वयोगाधिष्ठाता अव्ययब्रह्म के माध्यम से समत्त्व स्थापित करते हुए मानव को बुद्धियोगनिष्ठा से समन्वित कर देना सचमुच गीताशास्त्र का महान् कौशल माना जायगा । इस मुख्य कौशल के साथ साथ गीता ने जिस कौशल से सम्पूर्ण अपौरुषेयशास्त्र * - ' श्वेतक्रान्ति का महान् सन्देश, और भारतीय आर्षधर्म के नवग्रह ' नामक स्वतन्त्र ग्रन्थ में इस विषयों का विस्तार से उपबृ ' हरण हुआ है । ४३५

पृष्ठ 445

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तृतीयखण्ड ( वेदशास्त्र ) के रहस्यपूर्ण ज्ञान - विज्ञानात्मक निगूढ़ सिद्धान्तों की जैसी संग्रहात्मिका तालिका ( सूची ) अपने क्रोड़ में समाविष्ट कर ली है, वैसा अन्य किसी भारतीय शास्त्र में नहीं है । और यही गीताशास्त्र का कृत्म्नसंग्रहात्मक दूसरा महान् कौशल है । इन उभयविध अलौकिक महान् कौशलों का कौशलपूर्वक संग्रह करने वाले गीताशास्त्र ने नहीं मानवीय अलौकिक आत्मभाव को पुष्पित - पल्लवित किया है, वहाँ भौतिक विश्व से अनुप्राणित लोकसंग्रहलक्षण लोकसंरक्षण की भी उस राजपद्धति का सर्वथैव ऋजुभाव से स्वरूप-विश्लेण किया है, जिसके अनुष्ठान से मानव का लोकतन्त्र भी सर्वात्मना सुव्यवस्थित बन जाता है । एवं यही गीताशास्त्र का तृतीय महान् कौशल है । इन्हीं कौशलों के कारण गीताशास्त्र स्मृतिस्थानीय बनता हुआ भी श्रुतिशास्त्र ( उपनिषच्छास्त्र ) के सम्मान से सम्मानित हो गया है, जोकि सम्मान गीताशास्त्र के अतिरिक्त अवधि और किमी भी भारतीय शास्त्र को उपलब्ध नहीं हो सका है । ५ - गीता का दृष्टिकोण-वेदप्रामाण्य के आधार पर प्रतिष्ठित, ईश्वरावतार भगवान् कृष्ण के मुखपङ्कज से विनिःसृत गीताशास्त्रका अन्य परतः प्रमाणशास्त्रों में विशेष समादर देखा सुना जाता है । यही कारण है कि, भारतीय सम्प्रदायाचायों नें स्वसम्प्रदाय - प्रामाण्य के लिए उपनिषत्, वेदान्तसूत्रों के साथ साथ गीताशास्त्र का भी संग्रह करना आवश्यक समझा है, जो कि प्रामाण्यत्रयी विद्वत समाज में ' प्रस्थानत्रयी ' नाम मे प्रसिद्ध है । प्रथम स्थान उपनिप्रच्छास्त्र का है, द्वितीय स्थान गीताशास्त्र का है, एवं तृतीय स्थान वेदान्तसूत्र का है । वेदान्त-सूत्रोंनं उपनिषदों के वचनों का समन्वय किया है, अतएव इमे भी यद्यपि उपनिषच्छास्त्र से समतुलित माना जा सकता है, माना गया है, तथापि उपनिषदों के तात्त्विक विषयों का साचातूरूप से स्पष्टीकरण करने वाला गोठा शास्त्र वेदान्तसूत्र की अपेक्षा उपनिषच्छास्त्र के अधिक समीप है, यह स्वीकार कर लेनें में कोई श्रापत्ति नहीं की जा सकती । प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से भी उक्त मान्यता तथ्यपूर्णं ही मानी जायगी । ' आत्मयुक्त विश्व ' का दर्शन कराने वाला शास्त्र ही दर्शनशास्त्र है । अव्यय - अक्षर - आत्मक्षरसमष्टि ' आत्मा ' है, एवं आत्मक्षरविशिष्ट विकारक्षरसंघ ' विश्व ' है । आत्मक्षरयुक्त विकारक्षरसंघात्मक विश्व का दर्शन वैशेषिकशास्त्र ने कराया है । आत्मक्षरगर्भित अक्षर नामक आत्मकला के दर्शन सांख्यशास्त्र ने कमाए हैं । श्रव्ययगर्मित अक्षरकला के दर्शन वेदान्तशास्त्र ने करायें हैं । इसप्रकार वेदान्तशास्त्र का पर्य्यवसान एक प्रकार से अक्षर पर ही समाप्त हो जाता है, जैसाकि - " अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्यतद् भावाभ्यामौपमदवत्तदुक्तम " ( वे ० सू ० २,४।११ ) इस सूत्र में स्पष्ट है । सर्वमूर्द्धन्य उपनिषच्छास्त्र विश्व, आत्मक्षर, अक्षरगर्भित अव्ययपुरुष को अपना मुख्य लक्ष्य बनाता है, एवं अव्ययप्राप्ति के साधनभूत बुद्धियोग का स्पष्टीकरण करता है । उधर हमारा गीताशास्त्र भी उपनिषत् के लक्षीभूत श्रन्ययपुरुष को, तथा तत्प्राप्तिसाधनभूत बुद्धियोग को ही अपना लक्ष्य बनाता है । श्रतएव गीताशास्त्र को वेदान्तश । म की तुलना में हम उपनिषत् के अधिक समीप माननें के लिए तैयार हैं । गीताशास्त्र उपनिषत् - शास्त्र से सर्वात्मना समतुलित है, एकमात्र इसी सौसादृश्य के आधार पर गीताशास्त्र ‘ उपनिषत् ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, जैसाकि - ' इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे ' इत्यादि अध्यायसंहारवाक्यों से प्रमाणित है । इन्हीं कुछ एक प्रामाणिक परिस्थितियों के आधार पर यह ४३६

पृष्ठ 446

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तृतीयखण्ड निःसंकोच कहा जा सकता है - कि, उपनिषत् - और गीता का परस्पर वही सम्बन्ध है, जो कि सम्बन्ध वैदिक परिभाषात्रों में उक्थ और अर्क का माना गया है । हृदयावच्छिन्न मूलतत्त्व ' उक्थ ' माना गया है । इस मूलोक्थ के आधार पर चारों ओर वितत होनें वालीं तूलात्मिका रश्मियाँ ' क ' कहलाई हैं । रश्मिमण्डल ही अर्कमण्डल है, यही विभूतिमण्डल, महिम-मण्डिल, पुनःपद, साहस्री, वैश्वरूप्य, वषट्कार, आदि विविध नामों से व्यवहृत हुआ है । दूसरे शब्दों में सुक्ष्मरूप उक्थ है, स्थूल - विकसित रूप अर्क है । जिन विषयों का उपनिप्रच्छास्त्र में सुसूक्ष्म भाषा में थोड़े में निरूपण हुआ है, उन्हीं विषयों का गीताशास्त्र में विस्तार से विश्लेषण हुआ है । उपनिषत् जहाँ उक्थ-शास्त्र है, वहाँ गीता अर्कशास्त्र है । उपनिषत् यदि भाषाविज्ञान की दृष्टि से पद्यस्थानीय है, तो गीता गेयस्थानीया है । पद्य का वितत रूप ही गान है । पद्य वाणी का संकुचित रूप है, गान वाणी का वितत रूप है । क्योंकि गीताशास्त्र पद्यस्थानीय उपनिषच्छास्त्र में उपवर्णित विषयों का विस्तारभाव से, वितानमात्र से प्रतिपादन करता है । एकमात्र इसी आधार पर इस शास्त्र को ' गीता ' नाम से व्यवहृत किया गया है । इसी आधार पर हम गीताशास्त्र को न केवल ज्ञानशास्त्र मानते, न केवल विज्ञानशास्त्र | जिस प्रकार उपनिषच्छास्त्र ज्ञानविज्ञानोभयशास्त्र है, एवमेव तत् समतुलित गीताशास्त्र भी ज्ञानविज्ञानोभयशास्त्र है, जैसाकि - ' ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ' इत्यादि गीतासूक्ति से प्रमाणित है । यही कारण है कि, हमनें गीताशास्त्र को दर्शन परिभाषा से पृथक मानते हुए इसे एक अपूर्व, पूर्ण, तथा विलक्षण शास्त्र माना है ( देखिए गीताविज्ञानभाष्यभूमिका बहिरङ्गपरीक्षात्मक प्रथम खण्ड )! - * ६ - गीता, और कृत्स्नवेदशास्त्र-गीताशास्त्र का उपनिषच्छास्त्र से क्या सम्बन्ध है? इस प्रश्न के उपर्युक्त समाधान के अनन्तर हमारे सम्मुत्र ‘ यदागम ' न्याय से कृत्स्न वेदशास्त्र उपस्थित होता है । जैसाकि पूर्व स्तम्भों में बतलाया गया है, संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषत्, वेदशास्त्र के ये चारों तन्त्र विज्ञान, स्तुति, इतिहास, कर्म्म, उपासना, ज्ञान, इन ६ न प्रतिपाद्य विषयों का निरूपण करते हुए ' सर्व ' मर्य्यादा से युक्त हैं । क्योंकि उपनिषत् इस मर्य्यादा से ‘ सर्वशास्त्र ' है, एवं गीताशास्त्र उपनिषत् से समतुलित है । अतएव कहा जा सकता है कि, गीताशास्त्र अवश्यमेव सर्वशास्त्र है, जैसाकि - ' गीताः सुगीता: कर्तव्याः किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः ' इत्यादि सूक्ति से भी ध्वनित है । षडविषयप्रतिपादक वेदशास्त्र से समतुलित गीताशास्त्र में अवश्य ही विज्ञानादि ६ ॐ विषयों का प्रतिपादन होना ही चाहिए । उक्त ६ ओं विषयों के अतिरिक्त ' बुद्धियोग ' नामक एक स्वतन्त्र विषय और बच रहता है, जिसके रहविश्लेषण का श्रेय एकमात्र वेद के उपनिषत् - भाग को ही । विषयप्रतिपादन से जहाँ गीताशास्त्र वेद-शास्त्र से समतुलित है, वहाँ बुद्धियोगप्रतिपादन से गीताशास्त्र उपनिषत् - शास्त्र से ममतुलित है । बुद्धियोग एकमात्र उपनिषच्छास्त्र का विषय है । उधर गीताशास्त्र विषयप्रतिपादन के साथ साथ इसी बुद्धियोग को अपना प्रधान प्रतिपाद्य बना रहा है । एकमात्र इसी प्रधानता के कारण ' तद्वाद ' न्याय से गीताशास्त्र सर्ववेद-सामान्यविषय का निरूपण करता हुआ भी नाम से ' उपनिषत् ' ही कहलाया । इस मीमांसा से हमें इस ४३७

पृष्ठ 447

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भाष्यभूमिका निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि गीताशास्त्र बडूविषयप्रतिपादनपूर्वक श्रौपनिषद बुद्धियोग का ही प्रधानरूप से प्रतिपादन कर रहा है । अब इस सम्बन्ध में हमारा यह कर्त्तव्य शेष रह जाता है कि, वेदशास्त्र के समतुलन के लिए गीताशास्त्र के आधार पर पहिले तो ६ श्रों विषयों का दिग्दर्शन करा दिया जाय, अनन्तर उपनिषच्छास्त्र-सम्मत बुद्धियोगानुगत प्रमाण उद्धृत कर दिया जाय । ( १ ) - विज्ञान समर्थकवचनानि— यज्ञ विज्ञानम् यात्मकमविज्ञानम् प्रकृतिविज्ञानम्

१ - ‘ ' सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥१ ॥

नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ॥

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म्मसमुद्भवः ॥ २ ॥

कर्म्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ॥

तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् " ॥ ३ ॥

- गीता ३ १०, १४, १५ ।

२ - " इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ॥

मनस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धः परतस्तु सः ॥१ ॥

एवं बुद्धः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ॥

नहि शत्रु महाबाहो! कामरूनं दुरासदम् ॥२ ॥

—गीता ३।४२, ४३ ।

३ - " भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।

कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥१ ॥

अपरेयम्

इतस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।

जीवभूतां महाबाहो! ययेदं धार्यते जगत् ॥२ ॥

1 – गीता ७ | ४, ५, । ४३६

पृष्ठ 448

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आत्मविमृतिविज्ञानम् नह श्रात्मगतिविज्ञानम् महविज्ञानम अश्वत्थविज्ञानम् तृतीयखण्ड गीता १४ ३, ४ । --गीता १५१,२३ ४३६ ४ - " रसोऽहमप्सु कौन्तेय! प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ॥ प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ १ ॥

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।

जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ २ ॥

यद्यद्विभूतिनत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ॥३ ॥

- गीता ७८, ६,

५ - " अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।

तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ १ ॥

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः पण्मासा दक्षिणायनम् ।

तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्धते ॥ २ ॥

शुक्लकृष्णे गती ह्य ेते जगतः शाश्वते मते ।

एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽवर्त्तते पुनः ॥३ ॥

- गीता २४, २५, २६, ।

६ - " मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।

सम्भवः सर्वभृतानां ततो भवति भारत! ॥१ ॥

सर्वयोनिषु कौन्तेय! मूर्त्तयः सम्भवन्ति याः । वासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ २ ॥ "

७- “ ऊर्ध्वमूलमघः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यरतं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥

अघनो प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रबालाः । अघश्च मूलान्यनुसन्ततानि कम्र्मानुत्रन्धीनि मनुष्यलोके ॥२ ॥ *

* इत्यादि विज्ञानों के अतिरिक्त ॠग्वेदीय दशधा विभक्त सृष्टिविज्ञानों का भी गीता में यत्र तत्र स्पष्टीकरण हुआ है, जिनका विवेचन ' गीता विज्ञान भाष्यभूमिका ' द्वितीयखण्ड ' व ' विभाग के ' कर्मपरीक्षा ' नामक प्रकरण में किया जा चुका है ।

पृष्ठ 449

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( २ ) - स्तुतिसमर्थकवचनानि—

१ – “ ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।

प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥

२- " कस्माच्च ते न नमरेन् महात्मन् — गरीयसे ब्रह्मणोऽदिकर्त्रे ॥ अनन्त देवेश जगन्निवास— त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३. - नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अन्नतवीर्य्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः 11 - गीता ११११४,३७,४० ( ३ ) - इतिहाससमर्थकवचनानि— " " १ - ' इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ॥ विवस्वान् मनवे ग्राह मनुरिवाकवेऽब्रवीत् ॥ २– एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ॥ स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप! ॥ — गीता ४।१२ । ३ –महर्षीणां भृगुरहम् । देवर्षीणां च नारदः । गन्धर्वाणां चित्ररथः । सिद्धानां कपिलो मुनिः । प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानाम् । वृष्णीनां-वासुदेवोस्मि । मुनीनामप्यहं व्यासः । कवीनामुशनाकविः । " ( ४ ) - कर्म्मसमर्थकवचनानि—

१ - “ यतः प्रवृत्तिभूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।

स्वकर्म्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

२ - सहजं कर्म्म कौन्तेय! सदोषमपि न त्यजेत् ।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥

४४० - गीता १८ ४६ | —– गीता, १८ | ४८ |

पृष्ठ 450

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तृतीयखण्ड

३- कर्म्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।

लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्त्तुमर्हसि ॥

४ - यज्ञदानतपःकर्म्म न त्याज्यं कार्य्यमेव तत् ।

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥

५ – सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ” - गीता ३२०१ - गीता १८ | ५ | - गीता १८५६ |

( ५ ) - उपासना समर्थकवचनानि -१ - " योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।

श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥

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२– पुरुषः स परः पार्थ! भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।

यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥

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३ - अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥

४- अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

- ह | ३० | -२२३ ५ - सततं कीर्त्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्त मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते । - हा १ स ४४१