वामन पुराण — पृष्ठ 101–110

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

वामन पुराण, पृष्ठ 101 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १७ ] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत विधान, विष्णु पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९ १ महेश्वरस्य हृदये धत्तूरविटपः शुभः संजातः स च शर्वस्य रतिकृत् तस्य नित्यशः ब्रह्मणो मध्यतो देहाज्जातो मरकतप्रभः खदिरः कण्टकी श्रेयानभवद्विश्वकर्मणः गिरिजायाः करतले कुन्दगुल्मस्त्वजायत गणाधिपस्य कुम्भस्थो राजते सिन्धुवारकः यमस्य दक्षिणे पार्श्वे पालाशो दक्षिणोत्तरे कृष्णोदुम्बरको रुद्राज्जातः क्षोभकरो वृषः स्कन्दस्य बन्धुजीवस्तु रवेरश्वत्थ एव च । कात्यायन्याः शमी जाता बिल्वो लक्ष्म्याः करेऽभवत् नागानां पतये ब्रह्मञ्छरस्तम्बो व्यजायत वासुकेर्विस्तृते पुच्छे पृष्ठे दूर्वा सितासिता

साध्यानां हृदये जातो वृक्षो हरितचन्दनः ।

एवं जातेषु सर्वेषु तेन तत्र रतिर्भवेत् ॥

तत्र रम्ये शुभे काले या शुक्लैकादशी भवेत् । तस्यां सम्पूजयेद् विष्णुं तेन खण्डोऽस्य पूर्यते पुष्पैः पत्रैः फलैर्वापि गन्धवर्णरसान्वितैः । ओषधीभिश्च मुख्याभिर्यावत्स्याच्छरदागमः

घृतं तिला ब्रीहियवा हिरण्यकनकादि यत् ।

मणिमुक्ताप्रवालानि वस्त्राणि विविधानि च ॥

रसानि स्वादुकट्वम्लकषायलवणानि च । तिक्तानि च निवेद्यानि तान्यखण्डानि यानि हि

तत्पूजार्थं प्रदातव्यं केशवाय महात्मने ।

यदा संवत्सरं पूर्णमखण्डं भवते गृहे ॥

कृतोपवासो देवर्षे द्वितीयेऽहनि संयतः ।

स्नानेन तेन स्नायीत येनाखण्डं हि वत्सरम् ॥

सिद्धार्थकैस्तिलैर्वापि तेनैवोद्वर्तनं स्मृतम् ।

हविषा पद्मनाभस्य स्नानमेव समाचरेत् ।

होमे तदेव गदितं दाने शक्तिर्निजा द्विज ॥

। भगवान् शंकरके हृदयपर सुन्दर धतूर - वृक्ष उत्पन्न ॥ ४ हुआ, अतः वह शिवजीको सदा प्यारा है॥१–४ ॥ । ब्रह्माजीके शरीरके बीचसे मरकतमणिके समान ॥ ५ खैरवृक्षकी उत्पत्ति हुई और विश्वकर्माके शरीरसे सुन्दर कटैया उत्पन्न हुआ । गिरिनन्दिनी पार्वतीके करतलपर । कुन्द लता उत्पन्न हुई और गणपतिके कुम्भ- देशसे ॥ ६ सेंदुवारवृक्ष उत्पन्न हुआ । यमराजकी दाहिनी बगलसे । पलाश तथा बायीं बगलसे गूलरका वृक्ष उत्पन्न हुआ । ॥ ७ रुद्रसे उद्विग्न करनेवाला वृष ( ओषधि - विशेष ) - की उत्पत्ति हुई । इसी प्रकार स्कन्दसे बन्धुजीव, सूर्यसे पीपल, कात्यायनी दुर्गासे शमी और लक्ष्मीजीके हाथसे ॥ ८ बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ॥५–८ ॥ । नारदजी! इसी प्रकार शेषनागसे सरपत, ॥ ९ वासुकिनागकी पुच्छ और पीठपर श्वेत एवं कृष्ण दूर्वा उत्पन्न हुई । साध्योंके हृदयमें हरिचन्दनवृक्ष उत्पन्न हुआ । इस प्रकार उत्पन्न होनेसे उन सभी वृक्षोंमें उन-१० उन देवताओंका प्रेम होता है । उस रमणीय सुन्दर समयमें शुक्लपक्षकी जो एकादशी तिथि होती है, उसमें भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये । ॥ ११ इससे पूजाकी न्यूनता दूर हो जाती है । शरत्कालकी उपस्थितितक गन्ध, वर्ण और रसयुक्त पत्र, पुष्प एवं फलों तथा मुख्य ओषधियोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा ॥ १२ | करनी चाहिये ॥ ९ –१२ ॥ घी, तिल, चावल, जौ, चाँदी, सोना, मणि, मुक्ता, १३ मूँगा तथा नाना प्रकारके वस्त्र, स्वादु, कटु, अम्ल, कषाय, लवण और तिक्त रस आदि वस्तुओंको ॥ १४ अखण्डितरूपसे महात्मा केशवकी पूजाके लिये अर्पित करना चाहिये । इस प्रकार पूजा करते हुए वर्षको १५ बितानेपर घरमें पूर्ण समृद्धि होती है । देवर्षे! जितेन्द्रिय होकर दूसरे दिन उपवास करके जिससे वर्ष अखण्डित १६ रहे इसलिये इस प्रकार स्नान करे – ॥ १३-१६ ॥ सफेद सरसों या तिलके द्वारा उबटन तैयार करना चाहिये ऐसा कहा गया है । उससे या घीसे भगवान् विष्णुको स्नान कराना चाहिये । नारदजी! होममें भी घीका ही विधान है १७ और दानमें भी यथाशक्ति उसीकी विधि है ।

पृष्ठ 102

वामन पुराण, पृष्ठ 102 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९ २

पूजयेताथ कुसुमैः पादादारभ्य केशवम् ।

धूपयेद् विविधं धूपं येन स्याद् वत्सरं परम् ॥

हिरण्यरत्नवासोभिः पूजयेत जगद्गुरुम् ।

रागखाण्डवचोष्याणि हविष्याणि निवेदयेत् ॥

ततः संपूज्य देवेशं पद्मनाभं जगद्गुरुम् ।

विज्ञापयेन्मुनिश्रेष्ठ मन्त्रेणानेन सुव्रत ॥

नमोऽस्तु ते पद्मनाभ पद्माधव महाद्युते ।

धर्मार्थकाममोक्षाणि त्वखण्डानि भवन्तु मे ॥

विकासिपद्मपत्राक्ष यथाऽखण्डोसि सर्वतः ।

तेन सत्येन धर्माद्या अखण्डाः सन्तु केशव ॥

एवं संवत्सरं पूर्णं सोपवासो जितेन्द्रियः ।

अखण्डं पारयेद् ब्रह्मन् व्रतं वै सर्ववस्तुषु ॥

अस्मिंश्चीर्णे व्रते व्यक्तं परितुष्यन्ति देवताः ।

धर्मार्थकाममोक्षाद्यास्त्वक्षयाः सम्भवन्ति हि ॥

एतानि ते मयोक्तानि व्रतान्युक्तानि कामिभिः ।

प्रवक्ष्याम्यधुना त्वेतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम् ॥

नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम् ।

प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः ॥

गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभामितद्युते । याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः

हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम ।

प्रतीच्यां रक्ष मे विष्णो भवन्तं शरणं गतः ॥

मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम् ।

उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गतः ॥

शार्ङ्गमादाय च धनुरस्त्रं नारायणं हरे । नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ऐशान्यां शरणं गतः श्रीवामनपुराण [ अध्याय १७ फिर पुष्पोंद्वारा चरणसे आरम्भकर ( सिरतक ) सभी १८ अङ्गोंमें केशवकी पूजा करे एवं नाना प्रकारके धूपोंसे उन्हें सुवासित करे, जिससे संवत्सर पूर्ण हो । सुवर्ण, रत्नों और वस्त्रोंद्वारा ( उन ) जगद्गुरुका पूजन करे तथा १ ९ राग - खाँड, चोष्य एवं हविष्योंका नैवेद्य अर्पित करे । सुव्रत नारदजी! देवेश जगद्गुरु विष्णुकी पूजा करनेके २० बाद इस मन्त्रसे प्रार्थना करे – ॥ १७ - २० ॥ हे महाकान्तिवाले पद्मनाभ लक्ष्मीपते! आपको २१ प्रणाम है । ( आपकी कृपाके प्रसादसे ) हमारे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अखण्ड हों । विकसित कमलपत्रके समान नेत्रवाले! आप जिस प्रकार चारों ओरसे अखण्ड २२ उसी सत्यके प्रभावसे मेरे भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ( पुरुषार्थ ) अखण्डित रहें । ब्रह्मन्! इस प्रकार २३ | वर्षभर उपवास और जितेन्द्रिय रहते हुए सभी वस्तुओंके । द्वारा व्रतको अखण्डरूपसे पूरा करे । इस व्रतके करनेपर देवता निश्चितरूपसे प्रसन्न होते हैं एवं धर्म, अर्थ, काम २४ तथा मोक्ष सभी पूर्ण होते हैं॥२१–२४ ॥ नारद! यहाँतक मैंने तुमसे सकाम व्रतोंका वर्णन २५ किया है । अब मैं कल्याणकारी विष्णुपञ्जर * स्तोत्रको कहूँगा । ( वह इस प्रकार है - ) गोविन्द! आपको नमस्कार है । आप सुदर्शनचक्र लेकर मेरी पूर्व दिशामें २६ रक्षा करें । विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ । अमितद्युते पद्मनाभ! आप कौमोदकी गदा धारणकर मेरी दक्षिण ॥ २७ दिशामें रक्षा करें । विष्णो! मैं आपके शरण हूँ । पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार | आप सौनन्द नामक हल लेकर मेरी पश्चिम दिशामें रक्षा करें । विष्णो! मैं २८ आपकी शरणमें हूँ ॥ २५ - २८ ॥ पुण्डरीकाक्ष! आप ' शातन ' नामके विनाशकारी २ ९ मुसलको लेकर मेरी उत्तर दिशामें रक्षा करें । जगन्नाथ! मैं आपकी शरणमें हूँ । हरे! शार्ङ्गधनुष एवं नारायणास्त्र लेकर मेरी ईशानकोणमें रक्षा करें । ॥ ३० । रक्षोघ्न! आपको नमस्कार है, मैं आपके शरण हूँ । * यह विष्णुपञ्जरस्तोत्र बहुत प्रसिद्ध है तथा स्वल्पान्तरसे अग्निपुराण अ ० १३, ब्रह्मवैवर्त ३ | ११, विष्णुधर्मोत्तर १ । ११५ आदिमें प्राप्त होता है । वामनपुराणमें तो यह दो बार आया है - एक यहाँ तथा आगे ८५ वें अध्यायमें ।

पृष्ठ 103

वामन पुराण, पृष्ठ 103 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १७ ] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत - विधान, विष्णु - पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९ ३

पाञ्चजन्यं महाशङ्खमन्तर्बोध्यं च पङ्कजम् ।

प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेय्यां यज्ञसूकर ॥

चर्म सूर्यशतं गृह्य खड्गं चन्द्रमसं तथा ।

नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नृकेसरिन् ॥

वैजयन्तीं प्रगृह्य त्वं श्रीवत्सं कण्ठभूषणम् ।

वायव्यां रक्ष मां देव अश्वशीर्ष नमोऽस्तु ते ॥

वैनतेयं समारुह्य अन्तरिक्षे जनार्दन ।

मां त्वं रक्षाजित सदा नमस्ते त्वपराजित ॥

विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले ।

अकूपार नमस्तुभ्यं महामोह नमोऽस्तु ते ॥

करशीर्षाङ्घ्रिपर्वेषु तथाऽष्टबाहुपञ्जरम् ।

कृत्वा रक्षस्व मां देव नमस्ते पुरुषोत्तम ॥

एतदुक्तं भगवता वैष्णवं पञ्जरं महत् ।

पुरा रक्षार्थमीशेन कात्यायन्या द्विजोत्तम ॥

नाशयामास सा यत्र दानवं महिषासुरम् ।

नमरं रक्तबीजं च तथान्यान् सुरकण्टकान् ॥

नारद उवाच

काऽसौ कात्यायनी नाम या जघ्ने महिषासुरम् ।

नमरं रक्तबीजं च तथाऽन्यान् सुरकण्टकान् ॥

कश्चासौ महिषो नाम कुले जातश्च कस्य सः ।

कश्चासौ रक्तबीजाख्यो नमरः कस्य चात्मजः ।

एतद्विस्तरतस्तात यथावद् वक्तुमर्हसि ॥

पुलस्त्य उवाच

श्रूयतां संप्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् ।

सर्वदा वरदा दुर्गा येयं कात्यायनी मुने ॥

पुरासुरव रौद्रौ जगत्क्षोभकरावुभौ ।

रम्भश्चैव करम्भश्च द्वावास्तां सुमहाबलौ ॥

तावपुत्रौ च देवर्षे पुत्रार्थं तेपतुस्तपः ।

बहून् वर्षगणान् दैत्यौ स्थितौ पञ्चनदे जले ॥

तत्रैको जलमध्यस्थो द्वितीयोऽप्यनिपञ्चमी ।

करम्भश्चैव रम्भश्च यक्षं मालवटं प्रति ॥

यज्ञवाराह विष्णो! आप पाञ्चजन्य नामक विशाल शङ्ख ३१ तथा अन्तर्बोध्य पङ्कजको लेकर मेरी अग्निकोणमें रक्षा करें । दिव्यमूर्ति नृसिंह! सूर्यशत नामकी ढाल तथा चन्द्रहास नामकी तलवार लेकर मेरी नैर्ऋत्यकोणमें ३२ रक्षा करें ॥ २ ९ –३२ ॥ आप वैजयन्ती नामकी माला तथा श्रीवत्स नामका ३३ कण्ठाभूषण धारणकर मेरी वायव्यकोणमें रक्षा करें । देव हयग्रीव! आपको नमस्कार है । जनार्दन! वैनतेय ( गरुड़ ) - पर आरूढ़ होकर आप मेरी अन्तरिक्षमें रक्षा ३४ करें । अजित! अपराजित! आपको सदा नमस्कार है । महाकच्छप! आप विशालाक्षपर चढ़कर मेरी रसातलमें ३५ रक्षा करें । महामोह! आपको नमस्कार है । पुरुषोत्तम! आप आठ हाथोंसे पञ्जर बनाकर हाथ, सिर एवं सन्धि-स्थलों ( जोड़ों ) आदिमें मेरी रक्षा करें । देव! आपको ३६ नमस्कार है ॥ ३३–३६ ॥ द्विजोत्तम! प्राचीन कालमें भगवान् शंकरने ३७ कात्यायनी ( दुर्गा ) - की रक्षाके लिये इस महान् विष्णुपञ्जरस्तोत्रको उस स्थानपर कहा था, जहाँ उन्होंने महिषासुर, नमर, रक्तबीज एवं अन्यान्य देव-३८ शत्रुओंका नाश किया था ॥ ३७-३८ ॥ नारदजीने पूछा- ऋषे! महिषासुर, नमर, रक्तबीज तथा अन्यान्य सुर- कण्टकका वध करनेवाली ये ३ ९ भगवती कात्यायनी कौन हैं? तात! यह महिष कौन है? तथा वह किसके कुलमें उत्पन्न हुआ था? यह रक्तबीज कौन है? तथा नमर किसका पुत्र है? आप ४० इसका यथार्थ रूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन करें ॥ ३ ९ -४० ॥ पुलस्त्यजी बोले – नारदजी! सुनिये, मैं उस पापनाशक कथाको कहता हूँ । मुने! सब कुछ ४१ देनेवाली वरदायिनी भगवती दुर्गा ही ये कात्यायनी हैं । प्राचीन कालमें संसारमें उथल - पुथल मचानेवाले रम्भ और करम्भ नामके दो भयंकर और महाबलवान् ४२ असुर- श्रेष्ठ थे । देवर्षे! वे दोनों पुत्रहीन थे । उन दोनों दैत्योंने पुत्रके लिये पञ्चनदके जलमें रहकर बहुत ४३ वर्षोंतक तप किया । मालवट यक्षके प्रति एकाग्र होकर करम्भ और रम्भ- इन दोनोंमेंसे एक जलमें स्थित होकर और दूसरा पञ्चाग्निके मध्य बैठकर तप कर ४४ रहा था ॥ ४१-४४ ॥

पृष्ठ 104

वामन पुराण, पृष्ठ 104 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९ ४ एकं निमग्नं सलिले ग्राहरूपेण वासवः चरणाभ्यां समादाय निजघान यथेच्छया ततो भ्रातरि नष्टे च रम्भः कोपपरिप्लुतः वह्नौ स्वशीर्षं संक्षिप्य होतुमैच्छन् महाबलः ततः प्रगृह्य केशेषु खड्गं च रविसप्रभम् । छेत्तुकामो निजं शीर्षं वह्निना प्रतिषेधितः उक्तश्च मा दैत्यवर नाशयात्मानमात्मना । दुस्तरा परवध्याऽपि स्ववध्याऽप्यतिदुस्तरा यच्च प्रार्थयसे वीर तद्ददामि यथेप्सितम् । मा म्रियस्व मृतस्येह नष्टा भवति वै कथा ततोऽब्रवीद् वचो रम्भो वरं चेन्मे ददासि हि त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्मे त्वत्तेजसाऽधिकः अजेयो दैवतैः सर्वैः पुंभिर्दैत्यैश्च पावक महाबलो वायुरिव कामरूपी कृतास्त्रवित् तं प्रोवाच कविर्ब्रह्मन् बाढमेवं भविष्यति यस्यां चित्तं समालम्बि करिष्यसि ततः सुतः इत्येवमुक्तो देवेन वह्निना दानवो ययौ द्रष्टुं मालवटं यक्षं यक्षैश्च परिवारितम् तेषां पद्मनिधिस्तत्र वसते नान्यचेतनः गजाश्च महिषाश्चाश्वा गावोऽजाविपरिप्लुताः तान् दृष्ट्वैव तदा चक्रे भावं दानवपार्थिवः महिष्यां रूपयुक्तायां त्रिहायण्यां तपोधन सा समागाच्च दैत्येन्द्रं कामयन्ती तरस्विनी स चापि गमनं चक्रे भवितव्यप्रचोदितः तस्यां समभवद् गर्भस्तां प्रगृह्याथ दानवः पातालं प्रविवेशाथ ततः स्वभवनं गतः दृष्टश्च दानवैः सर्वैः परित्यक्तश्च बन्धुभिः अकार्यकारकेत्येवं भूयो मालवटं गतः श्रीवामनपुराण [ अध्याय १७ । इन्द्रने ग्राहका रूप धारणकर इनमेंसे एकको ॥ ४५ जलमें निमग्न होनेपर पैर पकड़कर इच्छानुसार दूर ले । जाकर मार डाला । उसके बाद भाईके नष्ट हो जानेपर क्रोधयुक्त महाबलशाली रम्भने अपने सिरको काटकर ॥ ४६ अग्निमें हवन करना चाहा । वह अपना केश पकड़कर हाथमें सूर्यके समान चमकनेवाली तलवार लेकर अपना ॥ ४७ सिर काटना ही चाहता था कि अग्निने उसे रोक दिया और कहा – दैत्यवर! तुम स्वयं अपना नाश मत करो । दूसरेका वध तो पाप होता ही है, आत्महत्या भी ॥ ४८ भयानक पाप है ॥ ४५–४८ ॥ वीर! तुम जो माँगोगे, तुम्हारी इच्छाके अनुसार ॥ ४ ९ वह मैं तुम्हें दूँगा । तुम मरो मत । इस संसारमें मृत । व्यक्तिकी कथा नष्ट हो जाती है । इसपर रम्भने । कहा – यदि आप वर देते हैं तो यह वर दीजिये कि ॥ ५० मुझे आपसे भी अधिक तेजस्वी त्रैलोक्यविजयी पुत्र उत्पन्न हो । अग्निदेव! समस्त देवताओं तथा मानवों । और दैत्योंसे भी वह अजेय हो । वह वायुके समान ॥ ५१ महाबलवान् तथा कामरूपी एवं सर्वास्त्रवेत्ता हो । नारदजी! इसपर अग्निने उससे कहा- अच्छा, ऐसा ही । होगा । जिस स्त्रीमें तुम्हारा चित्त लग जायगा उसीसे ॥ ५२ तुम पुत्र उत्पन्न करोगे ॥ ४ ९ -५२ ॥ । अग्निदेवके ऐसा कहनेपर रम्भ यक्षोंसे घिरा हुआ ॥ ५३ मालवट यक्षका दर्शन करने गया । वहाँ उन यक्षोंका एक पद्म नामकी निधि अनन्य - चित्त होकर निवास । करती थी । वहाँ बहुत - से बकरे, भेंड़े, घोड़े, भैंसे तथा ॥ ५४ हाथी और गाय - बैल थे । तपोधन! दानवराजने उन्हें । । देखकर तीन वर्षोंवाली रूपवती एक महिषीमें प्रेम ॥ ५५ प्रकट किया ( अर्थात् आसक्त हुआ ) । कामपरायण होकर वह महिषी शीघ्र दैत्येन्द्रके समीप आ गयी तब । भवितव्यता से प्रेरित उसने ( रम्भने ) भी उस महिषीके ॥ ५६ साथ संगत किया ॥ ५३-५६ ॥ । उसे गर्भ रह गया । उसके बाद उस महिषीको ॥ ५७ लेकर दानव पातालमें प्रविष्ट हुआ और अपने घर चला । गया । उसके दानव - बन्धुओंने उसे देख एवं ' अकार्यकारक ' ॥ ५८ जानकर उसका परित्याग कर दिया । फिर वह पुनः

पृष्ठ 105

वामन पुराण, पृष्ठ 105 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १७ ] देवाङ्गोंसे तरुओं की उत्पत्ति, अखण्डव्रत विधान, विष्णु - पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९ ५

साऽपि तेनैव पतिना महिषी चारुदर्शना ।

समं जगाम तत् पुण्यं यक्षमण्डलमुत्तमम् ॥

ततस्तु वसतस्तस्य श्यामा सा सुषुवे मुने ।

अजीजनत् सुतं शुभ्रं महिषं कामरूपिणम् ॥

एतामृतुमतीं जातां महिषोऽन्यो ददर्श ह ।

सा चाभ्यगाद् दितिवरं रक्षन्ती शीलमात्मनः ॥

तमुन्नामितनासं च महिषं वीक्ष्य दानवः ।

खड्गं निष्कृष्य तरसा महिषं समुपाद्रवत् ॥

तेनापि दैत्यस्तीक्ष्णाभ्यां शृङ्गाभ्यां हृदि ताडितः ।

निर्भिन्नहृदयो भूमौ निपपात ममार च ॥

मृते भर्तरि सा श्यामा यक्षाणां शरणं गता । रक्षिता गुह्यकैः साध्वी निवार्य महिषं ततः ।

निवारितो यक्षैर्हयारिर्मदनातुरः ।

निपपात सरो दिव्यं ततो दैत्योऽभवन्मृतः ॥

नमरो नाम विख्यातो महाबलपराक्रमः ।

यक्षानाश्रित्य तस्थौ च कालयन् श्वापदान् मुने ॥

स च दैत्येश्वरो यक्षैर्मालवटपुरस्सरैः ।

चितामारोपितः सा च श्यामा तं चारुहत् पतिम् ॥

ततोऽग्निमध्यादुत्तस्थौ पुरुषो रौद्रदर्शनः ।

व्यद्रावयत् स तान् यक्षान् खड्गपाणिर्भयंकरः ॥

ततो हतास्तु महिषाः सर्व एव महात्मना ।

ऋते संरक्षितारं हि महिषं रम्भनन्दन ॥

स नामतः स्मृतो दैत्यो रक्तबीजो महामुने ।

योऽजयत् सर्वतो देवान् सेन्द्ररुद्रार्कमारुतान् ॥

एवं प्रभावा दनुपुंगवास्

तेजोऽधिकस्तत्र बभौ हयारिः ।

राज्येऽभिषिक्तश्च महाऽसुरेन्द्रै-विनिर्जितैः शम्बरतारकाद्यैः ॥

अशक्नुवद्भिः सहितैश्च देवैः

सलोकपालैः सहुताशभास्करैः ।

स्थानानि त्यक्तानि शशीन्द्रभास्करै-धर्मश्च दू प्रतियोजितश्च ॥

। मालवटके निकट गया । वह सुन्दरी महिषी भी उसी ५ ९ पतिके साथ उस पवित्र और उत्तम यक्षमण्डलमें गयी । मुने! उसके वहीं निवास करते समय उस महिषीने सन्तान उत्पन्न की । उसने एक शुभ्र तथा इच्छाके अनुकूल रूप ६० धारण करनेवाले महिष - पुत्रको जन्म दिया ॥ ५७–६० ॥ उसके पुनः ऋतुमती होनेपर एक दूसरे महिषने ६१ उसे देखा । वह अपने शीलकी रक्षा करती हुई दैत्य श्रेष्ठके निकट गयी । नाकको ऊपर उठाये उस ६२ महिषको देखकर दानवने खड्ग निकालकर महिषपर वेगसे आक्रमण किया । उस महिषने भी तीक्ष्ण शृङ्गोंसे दैत्यके हृदयमें प्रहार किया । वह दैत्य हृदय फट जानेसे ६३ भूमिपर गिर पड़ा और मर गया । पतिके मर जानेपर वह महिषी यक्षोंकी शरणमें गयी । उसके बाद गुह्यकोंने ६४ । महिषको हटाकर साध्वी महिषीकी रक्षा की ॥ ६१–६४ ॥ यक्षोंद्वारा हटाया गया कामातुर हयारि ( महिष ) ६५ एक दिव्य सरोवरमें गिर पड़ा । उसके बाद वह मरकर एक दैत्य हो गया । मुने! वन्य पशुओंको मारते हुए यक्षोंके आश्रयमें रहनेवाला महान् बली तथा पराक्रमी वह ६६ दैत्य ' नमर ' नामसे विख्यात हुआ । फिर मालवट आदि यक्षोंने उस हयारि दैत्येश्वरको चितापर रखा । ६७ वह श्यामा भी पतिके साथ चितापर चढ़ गयी । तब अग्निके मध्यसे हाथमें खड्ग लिये विकराल रूपवाला भयंकर पुरुष प्रकट हुआ । उसने सभी यक्षोंको ६८ भगा दिया ॥ ६५-६८ ॥ और फिर उस बलवान् दैत्यने रम्भनन्दन महिषको ६ ९ छोड़कर सारे महिषोंको मार डाला । महामुने! वह दैत्य रक्तबीज नामसे विख्यात हुआ । उसने इन्द्र, रुद्र, सूर्य ७० एवं मारुत आदिके साथ देवोंको जीत लिया । यद्यपि वे सभी दैत्य इस प्रकारके प्रभावसे युक्त थे; फिर भी उनमें महिष अधिक तेजस्वी था । उसके द्वारा विजित ७१ शम्बर, तारक आदि महान् असुरोंने उसका राज्याभिषेक किया । लोकपालोंसहित अग्नि, सूर्य आदि देवोंके द्वारा एक साथ मिलकर जब वह जीता नहीं गया तब चन्द्र, इन्द्र एवं सूर्यने अपना - अपना स्थान छोड़ दिया तथा ७२ । धर्मको भी दूर हटा दिया गया ॥ ६ ९ -७२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥

पृष्ठ 106

वामन पुराण, पृष्ठ 106 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९ ६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १८ अठारहवाँ अध्याय महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव, विन्ध्यप्रसंग, पुलस्त्य उवाच ततस्तु देवा महिषेण निर्जिताः स्थानानि संत्यज्य सवाहनायुधाः । जग्मुः पुरस्कृत्य पितामहं द्रष्टुं तदा चक्रधरं श्रियः पतिम् ॥ गत्वा त्वपश्यंश्च मिथः सुरोत्तमौ स्थितौ खगेन्द्रासनशङ्करौ हि । दृष्ट्वा प्रणम्यैव च सिद्धिसाधकौ दुर्गाकी अवस्थिति पुलस्त्यजी बोले- इसके बाद महिषद्वारा पराजित देवता अपने - अपने स्थानको छोड़कर पितामहको आगे कर चक्रधारी लक्ष्मीपति विष्णुके दर्शनार्थ अपने वाहनों और आयुधों को लेकर विष्णुलोक चले गये । १ वहाँ जाकर उन लोगोंने गरुड़वाहन विष्णु एवं शङ्कर – इन दोनों देवश्रेष्ठोंको एक साथ बैठे देखा । उन दोनों सिद्धि - साधकोंको देखनेके बाद उन लोगोंने न्यवेदयंस्तन्महिषादिचेष्टितम् ॥२ उन्हें प्रणामकर उनसे महिषासुरकी दुश्चेष्टा बतलायी । वे प्रभोऽश्विसूर्येन्द्वनिलाग्निवेधसां आक्रम्य एतद् न चेद् इत्थं दृष्ट्वाऽथ जलेशशक्रादिषु चाधिकारान् । नाकात्तु निराकृता वयं कृतावस्था महिषासुरेण ॥ भवन्तौ शरणागतानां श्रुत्वा वचो ब्रूत हितं सुराणाम् । व्रजामोऽद्य रसातलं हि संकाल्यमाना युधि दानवेन ॥ मुरारिः सह शङ्करेण श्रुत्वा वचो विप्लुतचेतसस्तान् । चक्रे सहसैव कोपं कालाग्निकल्पो हरिरव्ययात्मा ॥ ततोऽनुकोपान्मधुसूदनस्य सशङ्करस्यापि पितामहस्य । तथैव शक्रादिषु दैवतेषु महद्धि तेजो वदनाद् विनिःसृतम् ॥ तच्चैकतां पर्वतकूटसन्निभं जगाम तेज: प्रवराश्रमे मुने । कात्यायनस्याप्रतिमस्य तेन महर्षिणा तेज उपाकृतं च ॥ तेनर्षिसृष्टेन च तेजसा वृतं ज्वलत्प्रकाशार्कसहस्त्रतुल्यम् 1 तस्माच्च जाता तरलायताक्षी कात्यायनी योगविशुद्धदेहा ॥ बोले - प्रभो! महिषासुरने अश्विनीकुमार, सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र आदि सभी देवताओंके अधिकारों को छीनकर स्वर्गसे निकाल दिया है ३ और अब हमलोग भूलोकमें रहनेको विवश हो गये हैं । हम शरणमें आये देवताओंकी यह बात सुनकर आप दोनों हमारे हितकी बात बतलायें; अन्यथा दानवद्वारा युद्धमें मारे जा रहे हमलोग अब रसातलमें ४ चले जायँगे ॥ १-४ ॥ शिवजीके साथ ही विष्णुभगवान्ने ( भी ) उनके इस प्रकारके वचनको सुना तथा दुःखसे व्याकुल चित्तवाले उन देवताओंको देखा तो उनका क्रोध ५ कालाग्निके समान प्रज्वलित हो गया । उसके बाद मधु नामक राक्षसको मारनेवाले विष्णु, शङ्कर, पितामह ( ब्रह्मा ) तथा इन्द्र आदि देवताओंके क्रोध करनेपर उन ६ सबके मुखसे महान् तेज प्रकट हुआ । मुने! फिर वह तेजोराशि कात्यायन ऋषिके अनुपम आश्रममें पर्वतशृङ्गके समान एकत्र हो गयी । उन महर्षिने भी उस तेजकी और अभिवृद्धि की । उन महर्षिद्वारा उत्पन्न किये ७ गये तेजसे आवृत वह तेज हजारों सूर्योके समान प्रदीप्त हो गया । उसके योगसे विशुद्ध शरीरवाली एवं चञ्चल तथा विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनी देवी प्रकट हो ८ | गयीं ॥५–८ ॥

पृष्ठ 107

वामन पुराण, पृष्ठ 107 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९ ७ माहेश्वराद् बभूव नेत्रत्रयं पावकतेजसा च । याम्येन हरितेजसा च भुजास्तथाष्टादश संप्रजज्ञिरे ॥ सौम्येन युग्मं स्तनयोः सुसंहतं मध्यं तथैन्द्रेण च तेजसाऽभवत् । ऊरू च जङ्गे च नितम्बसंयुते जाते जलेशस्य तु तेजसा हि ॥ पादौ च लोकप्रपितामहस्य पद्माभिकोशप्रतिमौ बभूवतुः । दिवाकराणामपि तेजसाऽङ्गुलीः कराङ्गुलीश्च वसुतेजसैव ॥ प्रजापतीनां दशनाश्च तेजसा याक्षेण नासा श्रवणौ च मारुतात् । साध्येन च श्रूयुगलं सुकान्तिमत् कंदर्पबाणासनसन्निभं भौ ॥ तथर्षितेजोत्तममुत्तमं मह-नाम्ना पृथिव्यामभवत् प्रसिद्धम् । कात्यायनीत्येव तदा बभौ सा नाम्ना च तेनैव जगत्प्रसिद्धा ॥ ददौ त्रिशूलं वरदस्त्रिशूली चक्रं मुरारिर्वरुणश्च शङ्खम् । शक्तिं हुताशः श्वसनश्च चापं तूणौ तथाक्षय्यशरौ विवस्वान् ॥ वज्रं तथेन्द्रः सह घण्टया च यमोऽथ दण्डं धनदो गदां च । ब्रह्माऽक्षमालां सकमण्डलुं च कालोऽसिमुग्रं सह चर्मणा च ॥ हारं च सोमः सह चामरेण मालां समुद्रो हिमवान् मृगेन्द्रम् । चूडामणिं कुण्डलमर्द्धचन्द्रं प्रादात् कुठारं वसु शिल्पकर्त्ता ॥ गन्धर्वराजो रजतानुलिप्तं पानस्य पूर्ण सदृशं च भाजनम् । भुजंगहारं भुजगेश्वरोऽपि अम्लानपुष्पामृतवः स्रजं च ॥ महादेवजीके तेजसे कात्यायनीका मुख बन गया और अग्रिके तेजसे उनके तीन नेत्र प्रकट हो गये । ९ इसी प्रकार यमके तेजसे केश तथा हरिके तेजसे उनकी अट्ठारह भुजाएँ, चन्द्रमाके तेजसे उनके सटे हुए स्तनयुगल, इन्द्रके तेजसे मध्यभाग तथा वरुणके तेजसे ऊरु, जङ्घाएँ एवं नितम्बोंकी उत्पत्ति हुई । १० लोकपितामह ब्रह्माके तेजसे कमलकोशके समान उनके दोनों चरण, आदित्योंके तेजसे पैरोंकी अङ्गुलियाँ एवं वसुओंके तेजसे उनके हाथोंकी अङ्गुलियाँ ११ । उत्पन्न हुईं । प्रजापतियोंके तेजसे उनके दाँत, यक्षोंके तेजसे नाक, वायुके तेजसे दोनों कान, साध्यके तेजसे कामदेवके धनुषके समान उनकी दोनों भौंहें १२ प्रकट हुईं – ॥ ९ –१२ ॥ इस प्रकार महर्षियोंका उत्तमोत्तम तथा महान् तेज पृथ्वीपर ' कात्यायनी ' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ, तब वे उसी नामसे विश्वमें प्रसिद्ध हुईं । वरदानी १३ शङ्करजीने उन्हें त्रिशूल, मुरके मारनेवाले श्रीकृष्णने चक्र, सूर्यने १४ | किये । गदा, तथा १५ किया माला, वरुणने शङ्ख, अग्निने शक्ति, वायुने धनुष तथा अक्षय बाणोंवाले दो तूणीर ( तरकस ) प्रदान इन्द्रने घण्टासहित वज्र, यमने दण्ड, कुबेरने ब्रह्माने कमण्डलुके साथ रुद्राक्षकी माला कालने उन्हें ढालसहित प्रचण्ड खड्ग प्रदान । चन्द्रमाने चँवरके साथ हार, समुद्र हिमालयने सिंह, विश्वकर्माने चूड़ामणि, कुण्डल, अर्धचन्द्र, कुठार तथा पर्याप्त ऐश्वर्य * १६ प्रदान किया॥१३–१६ ॥ गन्धर्वराजने उनके अनुरूप रजतका पूर्ण पान ( मद्य ) - पात्र, नागराजने भुजङ्गहार तथा ऋतुओंने १७ । कभी न कुम्हिलानेवाले पुष्पोंकी माला प्रदान की । * सभी पुराणों तथा सप्तशतीकी व्याख्याओंमें विश्वकर्माद्वारा ही आभूषण बनाने- देनेकी चर्चा है । कुछ प्रतियोंके अर्थमें समुद्रद्वारा देनेकी बात छप गयी है, जो गलत है ।

पृष्ठ 108

वामन पुराण, पृष्ठ 108 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९ ८ तदाऽतितुष्टा सुरसत्तमानां अट्टाहासं मुमुचे त्रिनेत्रा । तां तुष्टुवुर्देववराः सहेन्द्राः सविष्णुरुद्रेन्द्वनिलाग्निभास्कराः ॥ नमोऽस्तु देव्यै सुरपूजितायै या संस्थिता योगविशुद्धदेहा । निद्रास्वरूपेण महीं वितत्य तृष्णा त्रपा क्षुद् भयदाऽथ कान्तिः ॥ श्रद्धा स्मृतिः पुष्टिरथो क्षमा च छाया च शक्तिः कमलालया च । वृत्तिर्दया भ्रान्तिरथेह माया नमोऽस्तु देव्यै भवरूपिकायै ॥ ततः स्तुता देववर्यैर्मृगेन्द्र-मारुह्य देवी प्रगताऽवनीभ्रम् । विन्ध्यं महापर्वतमुच्च शृङ्गं चकार यं निम्नतरं त्वगस्त्यः ॥ नारद उवाच किमर्थमद्रि भगवानगस्त्य-स्तं निम्नशृङ्गं कृतवान् महर्षिः । कस्मै कृते केन च कारणेन एतद् वदस्वामलसत्त्ववृत्ते ॥ पुलस्त्य उवाच पुरा हि विन्ध्येन दिवाकरस्य गतिर्निरुद्धा गगनेचरस्य । रविस्ततः कुम्भभवं समेत्य होमावसाने वचनं बभाषे समागतोऽहं द्विज दूरतस्त्वां कुरुष्व मामुद्धरणं मुनीन्द्र । ददस्व दानं मम यन्मनीषितं चरामि येन त्रिदिवेषु निर्वृतः इत्थं दिवाकरवचो गुणसंप्रयोगि श्रुत्वा तदा कलशजो वचनं बभाषे । दानं ददामि तव यन्मनसस्त्वभीष्टं नार्थी प्रयाति विमुखो मम कश्चिदेव श्रुत्वा वचोऽमृतमयं कलशोद्भवस्य प्राह प्रभुः करतले विनिधाय मूर्ध्नि । एषोऽद्य मे गिरिवरः प्ररुणद्धि मार्ग विन्ध्यस्य निम्नकरणे भगवन् यतस्व श्रीवामनपुराण [ अध्याय १८ उसके बाद श्रेष्ठ देवताओंके ऊपर अत्यन्त प्रसन्न होकर त्रिनेत्रा ( कात्यायनी ) ने उच्च अट्टहास किया । इन्द्र, १८ विष्णु, रुद्र, चन्द्रमा, वायु, अग्नि तथा सूर्य आदि श्रेष्ठ देव उनकी स्तुति करने लगे - योगसे विशुद्ध देहवाली देवोंसे पूजित देवीको नमस्कार है । वे निद्रारूपसे १ ९ | पृथ्वीमें व्याप्त हैं, वे ही तृष्णा, त्रपा, क्षुधा, भयदा, कान्ति, श्रद्धा, स्मृति, पुष्टि, क्षमा, छाया, शक्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, दया, भ्रान्ति तथा माया हैं; ऐसी कल्याणमयी २० देवीको नमस्कार है ॥ १७–२० ॥ फिर देववरोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर वे देवी सिंहपर आरूढ़ होकर विन्ध्य नामके उस ऊँचे शृङ्गवाले महान् पर्वतपर गयीं, जिसे अगस्त्य मुनिने अति निम्न २१ कर दिया था ॥ २१ ॥

नारदजीने पूछा- शुद्धात्मन् ( पुलस्त्यजी )! आप यह बतलायें कि भगवान् अगस्त्यमहर्षिने उस पर्वतको किसके लिये एवं किस कारणसे निम्न शृङ्गवाला २२ | कर दिया? ॥ २२ ॥

पुलस्त्यजीने कहा- प्राचीनकालमें विन्ध्य-पर्वतने ( अपने ऊँचे शिखरोंसे ) आकाशचारी सूर्यकी गतिको अवरुद्ध कर दिया था । तब सूर्यने महर्षि ॥ २३ अगस्त्यके पास जाकर होमके अन्तमें यह वचन कहा— द्विज! मैं बहुत दूरसे आपके पास आया हूँ । मुनिश्रेष्ठ! आप मेरा उद्धार करें । मुझे अभीष्ट प्रदान करें, जिससे मैं निश्चिन्त होकर आकाशमें विचरण कर सकूँ । इस ॥ २४ प्रकार सूर्यके नम्र वचनोंको सुनकर अगस्त्यजी बोले-मैं आपकी अभीष्ट वस्तु प्रदान करूँगा । मेरे पाससे कोई भी याचक विमुख होकर नहीं जाता । अगस्त्यजीकी ॥ २५ अमृतमयी वाणी सुन करके सिरपर दोनों हाथ जोड़कर सूर्य ने कहा – भगवन्! यह पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य आज मेरा मार्ग रोक रहा है, अतः आप इसे नीचा करनेका ॥ २६ | प्रयत्न करें ॥ २३ – २६ ॥

पृष्ठ 109

वामन पुराण, पृष्ठ 109 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९९ इति रविवचनादथाह कुम्भजन्मा कृतमिति विद्धि मया हि नीचशृङ्गम् । तव किरणजितो भविष्यते महीथ्रो ` मम चरणसमाश्रितस्य का व्यथा ते ॥ इत्येवमुक्त्वा कलशोद्भवस्तु सूर्यं हि संस्तूय विनम्य भक्त्या । जगाम संत्यज्य हि दण्डकं हि विन्ध्याचलं वृद्धवपुर्महर्षिः ॥ गत्वा वचः प्राह मुनिर्मी यास्ये महातीर्थवरं सुपुण्यम् । वृद्धोऽस्म्यशक्तश्च तवाधिरोढुं _तस्माद् भवान् नीचतरोऽस्तु सद्यः ॥ इत्येवमुक्तो मुनिसत्तमेन स नीच शृङ्गस्त्वभवन्महीध्रः । समाक्रमच्चापि महर्षिमुख्यः प्रोल्लङ्घय विन्ध्यं त्विदमाह शैलम् ॥ यावन्न भूयो निजमाव्रजामि महाश्रमं धौतवपुः सुतीर्थात् । त्वया न तावत्त्वह वर्धितव्यं नो चेद् विशप्स्ये ऽहमवज्ञया ते ॥ इत्येवमुक्त्वा भगवाञ्जगाम आक्रम्य तत्राश्रमं तत्राथ दिशं स याम्यां सहसान्तरिक्षम् । तस्थौ स हि तां तदाशां काले व्रजाम्यत्र यदा मुनीन्द्रः ॥ रम्यतरं हि कृत्वा संशुद्धजाम्बूनदतोरणान्तम् निक्षिप्य विदर्भपुत्र स्वमाश्रमं सौम्यमुपाजगाम ॥ ऋतावृतौ पर्वकालेषु नित्यं

तमम्बरे ह्याश्रममावसत् सः ।

शेषं च कालं स हि दण्डकस्थ-स्तपश्चचारामितकान्तिमान् मुनिः ॥

सूर्यकी बात सुनकर अगस्त्यजीने कहा – सूर्यदेव! विन्ध्यको आप मेरे द्वारा नीचा किया हुआ ही समझें । यह पर्वत आपकी किरणोंसे पराजित हो जायगा । मेरे २७ चरणोंके आश्रय लेनेपर आपको अब व्यथा कैसी? वृद्ध शरीरवाले महर्षि अगस्त्यजी ऐसा कहकर विनम्रतापूर्वक भक्तिसे सूर्यकी स्तुति करनेके बाद दण्डकको छोड़कर २८ विन्ध्यपर्वतके निकट चले गये । वहाँ जाकर मुनिने पर्वतसे कहा - पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य! मैं अत्यन्त पवित्र महातीर्थको जा रहा हूँ । मैं वृद्ध होनेसे तुम्हारे ऊपर चढ़नेमें असमर्थ हूँ; अतः तुम तत्काल नीचा हो जाओ । २ ९ मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विन्ध्य पर्वत निम्न शिखरवाला हो गया । तब महर्षिश्रेष्ठ ( अगस्त्यजी ) - ने विन्ध्यपर्वतपर चढ़कर विन्ध्यको पार कर लिया और ३० तब उससे यह कहा – ॥ २७–३० ॥ मैं जबतक पवित्र तीर्थसे स्नान कर पुनः अपने महान् आश्रममें न लौहूँ, तबतक तुम्हें नहीं बढ़ना चाहिये; अन्यथा अवज्ञा करनेके कारण मैं तुम्हें घोर ३१ शाप दे दूँगा । ' मैं उचित समयपर फिर आऊँगा ' – ऐसा कहकर भगवान् अगस्त्य सहसा दक्षिण दिशाकी ओर चले गये तथा वहीं रह गये । मुनिने वहाँ विशुद्ध स्वर्णिम ३२ तोरणोंवाले अति रमणीय आश्रमकी रचना की एवं उसमें विदर्भपुत्री लोपामुद्राको रखकर स्वयं अपने आश्रमको चले गये । अत्यन्त प्रकाशमान मुनि ( शरद्से वसन्ततक ) विभिन्न ऋतुओंमें पर्व ( अष्टमी, चतुर्दशी, ३३ अमावास्या, पूर्णिमा तिथियों तथा रवि - संक्रान्ति, सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण ) - के समय नित्य आकाशमें और शेष समय दण्डकवनमें अपने आश्रममें निवासकर तप करने ३४ लगे ॥ ३१–३४ ॥ विन्ध्योऽपि दृष्ट्वा गगने महाश्रमं विन्ध्यपर्वत भी आकाशमें महान् आश्रमको देखकर वृद्धिं न यात्येव भयान्महर्षेः । महर्षिके भयसे नहीं बढ़ा । वे नहीं लौटे हैं - ऐसा नासौ निवृत्तेति मतिं विधाय स संस्थितो नीचतराग्रशृङ्गः ॥ ३५ समझकर वह अपना शिखर नीचा किये हुए अब भी

पृष्ठ 110

वामन पुराण, पृष्ठ 110 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०० एवं महाचलेन्द्रः स नीचशृङ्गो हि कृतो महर्षे । तस्योर्ध्वशृङ्गे संस् सा दुर्गा स्थिता दानवनाशनार्थम् ॥ देवाश्च सिद्धाश्च महोरगाश्च विद्याधरा भूतगणाश्च सर्वे । सर्वाप्सरोभिः प्रतिरामयन्तः कात्यायनीं तस्थुरपेतशोकाः श्रीवामनपुराण [ अध्याय १ ९ वैसे ही स्थित है । हे महर्षे! इस प्रकार अगस्त्यने महान् पर्वतराज विन्ध्यको नीचा कर दिया । उसीके शिखरके ऊपर मुनियोंद्वारा संस्तुता दुर्गादेवी दानवोंके विनाशके ३६ लिये स्थित हुई और देवता, सिद्ध, महानाग, अप्सराओंके सहित विद्याधर एवं समस्त भूतगण इनके बदले | कात्यायनीदेवीको प्रसन्न करते हुए नि: शोक होकर ॥ ३७ । उनके निकट रहने लगे ॥३५–३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १८ ॥

उन्नीसवाँ अध्याय चण्ड - मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन, महिषासुरका संदेश पुलस्त्य उवाच ततस्तु तां तत्र तदा वसन्तीं कात्यायनीं शैलवरस्य शृङ्गे । अपश्यतां दानवसत्तमौ द्वौ चण्डश्च मुण्डश्च तपस्विनीं ताम् ॥ १ दृष्ट्वैव शैलादवतीर्य शीघ्र-माजग्मतुः स्वभवनं सुरारी । महिषासुरस्य दूताविदं चण्डमुण्डौ दितीशम् ॥ २ स्वस्थो भवान् किं त्वसुरेन्द्र साम्प्रत-मागच्छ पश्याम च तत्र विन्ध्यम् । तत्रास्ति देवी सुमहानुभावा कन्या सुरूपा सुरसुन्दरीणाम् ॥ ३ जितास्तया तोयधरा कैर्हि जितः शशाङ्को वदनेन तन्व्या । नेत्रैस्त्रिभिस्त्रीणि हुताशनानि जितानि कण्ठेन जितस्तु शङ्खः ॥ ४ स्तन सुवृत्तावथ मग्नचूचुक स्थितौ विजित्येव गजस्य कुम्भौ । त्वां सर्वजेतारमिति प्रतर्क्यं कुर्ची स्मरेणैव कृतौ सुदुर्गौ ॥ ५ । और युद्धोपक्रम पुलस्त्यजीने कहा- उसके बाद उस श्रेष्ठ पर्वतशिखरपर निवास करनेवाली उन तपस्विनी कात्यायनी ( दुर्गा ) - को चण्ड और मुण्ड नामके दो श्रेष्ठ दानवोंने देखा और देखते ही पर्वतसे उतरकर वे दोनों असुर अपने घर चले गये । फिर उन दोनों दूतोंने दैत्यराज महिषासुर निकट जाकर कहा – ' ' असुरेन्द्र! आप इस समय स्वस्थ तो हैं? आइये, हमलोग विन्ध्यपर्वतपर चलकर देखें; वहाँ सुर - सुन्दरियोंमें अत्यन्त सुन्दर श्रेष्ठ लक्षणोंसे युक्त एक कन्या है । उस तन्वी ( सूक्ष्म देहवाली ) - ने केशपाशके द्वारा मेघोंको, मुखके द्वारा चन्द्रमाको तीन नेत्रोंद्वारा तीनों ( गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय ) अग्नियोंको और कण्ठके द्वारा शङ्खको जीत लिया है ( उसकी शोभा और तेजसे ये फीके पड़ गये हैं ) ' ॥ १–४ ॥ ' उसके मग्न चूचुकवाले वृत्त ( सुडौल गोले ) -स्तन हाथीके गण्डस्थलोंको मात कर रहे हैं । मालूम होता है कि कामदेवने अपनेको सर्वविजयी समझकर आपको परास्त करनेके लिये उसके दो कुचरूपी दो