वामन पुराण — पृष्ठ 111–120
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120
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अध्याय १ ९ ] चण्ड - मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती पीनाः सशस्त्राः परिघोपमाश्च भुजास्तथाऽष्टादश भान्ति तस्याः । पराक्रमं वै भवतो विदित्वा कामेन यन्त्रा इव ते कृतास्तु ॥ ६ मध्यं च तस्यास्त्रिवलीतरङ्गं विभाति दैत्येन्द्र सुरोमराजि । भयातुरारोहणकातरस्य कामस्य सोपानमिव प्रयुक्तम् ॥ ७ सा रोमराजी सुतरां हि तस्या विराजते पीनकुचावलग्ना । आरोहणे त्वद्भयकातरस्य स्वेदप्रवाहोऽसुर मन्मथस्य ॥ ८ नाभिर्गभीरा सुतरां विभाति तस्यैव विभाति मन्याम प्रदक्षिणाऽस्याः परिवर्तमाना । लावण्यगृहस्य मुद्रा कंदर्पराज्ञा स्वयमेव दत्ता ॥ ९ रम्यं जघनं मृगाक्ष्याः समंततो मेखलयाऽवजुष्टम् । तं कामनराधिपस्य प्राकारगुप्तं नगरं सुदुर्गम् ॥ १० वृत्तावरोमौ च मृदू कुमार्याः शोभेत ऊरू समनुत्तमौ हि । आवासनार्थं मकरध्वजेन जनस्य देशाविव संनिविष्टौ ॥ ११ तज्जानुयुग्मं महिषासुरेन्द्र अर्द्धोन्नतं भाति तथैव तस्याः । सृष्ट्वा विधाता हि निरूपणाय श्रान्तस्तथा हस्ततले ददौ हि ॥ १२ कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०१ दुर्गोंकी रचना की है । शस्त्रसहित उसकी मोटी परिघके समान अठारह भुजाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो आपका पराक्रम जानकर कामदेवने यन्त्रके समान उसका निर्माण किया है । दैत्येन्द्र! त्रिवलीसे तरङ्गायमान उसकी कमर इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो वह भयार्त तथा अधीर कामदेवका आरोहण करनेके लिये सोपान हो । असुर! उसके पीन कुचोंतककी वह रोमावलि इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो आरोहण करनेमें आपके भयसे कातर कामदेवका स्वेद प्रवाह हो ' ॥ ५–८ ॥ ' उसकी गम्भीर दक्षिणावर्त नाभि ऐसी लगती है, मानो कंदर्पने स्वयं ही उस सौन्दर्यगृहके ऊपर मुहर लगा दी है । मेखलासे चारों ओर आवेष्टित उस मृगनयनीका जघन बड़ा सुन्दर सुशोभित हो रहा है । उसे हम राजा कामका प्राकारसे ( चहारदीवारियोंसे ) गुप्त ( सुरक्षित ) दुर्गम नगर मानते हैं । उस कुमारीके वृत्ताकार रोमरहित, कोमल तथा उत्तम ऊरु इस प्रकार शोभित हो रहे हैं, मानो कामदेवने मनुष्योंके निवासके लिये दो रेखोंका संनिवेश किया है । महिषासुरेन्द्र! उसके अद्धन्नत जानुयुगल इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो उसकी रचना करनेके बाद थके विधाताने निरूपण करनेके लिये अपना करतल ही स्थापित कर दिया हो ' ॥ ९ - १२ ॥ जङ्गे सुवृत्तेऽपि च रोमहीने शोभेत दैत्येश्वर ते तदीये । आक्रम्य लोकानिव रूपार्जितस्यैव कृताधरौ हि ॥ पादौ च तस्याः कमलोदराभौ प्रयत्नतस्तौ हि कृतौ विधात्रा । आज्ञापि ताभ्यां नखरत्नमाला नक्षत्रमाला गगने यथैव ॥ ' दैत्येश्वर! उसकी सुवृत्त तथा रोमहीन दोनों जंघाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो ( दिव्य ) निर्मित की गयी नायिकाके रूपके द्वारा १३ सभी लोग पराजित कर दिये गये हैं । विधाताने प्रयत्नपूर्वक उसके कमलोदरके समान कान्तिवाले दोनों पैरोंका निर्माण किया है । उन्होंने कात्यायनीके उन चरणोंके नखरूपी रत्नशृङ्खलाको इस प्रकार प्रकाशित १४ । किया है, मानो वह आकाशमें नक्षत्रोंकी माला हो ।
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१०२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १ ९ एवंस्वरूपा दनुनाथ कन्या महोग्रशस्त्राणि च धारयन्ती । दृष्ट्वा यथेष्टं न च विद्म का सा तद्भूतले गत्वाथ श्रुत्वैव चक्रे प्रागेव यस्मिन् ततोनु उग्रायुधं आहत्य आगम्य ततस्तु मयस्य कुमार सुताऽथवा कस्यचिदेव बाला ॥ रत्नमनुत्तमं स्थितं स्वर्गं परित्यज्य महासुरेन्द्र । विन्ध्यं स्वयमेव पश्य कुरुष्व यत् तेऽभिमतं क्षमं च ॥ ताभ्यां महिषासुरस्तु देव्याः प्रवृत्तिं कमनीयरूपाम् । मतिं नात्र विचारमस्ति इत्येवमुक्त्वा महिषोऽपि नास्ति ॥ पुंसस्तु शुभाशुभानि स्थाने विधात्रा प्रतिपादितानि । यथा यानि यतोऽथ विप्र स नीयते वा व्रजति स्वयं वा ॥ मुण्डं नमरं सचण्डं विडालनेत्रं सपिशङ्गवाष्कलम् । चिक्षुररक्तबीज समादिदेशाथ महासुरेन्द्रः ॥ भेरी रणकर्कशास्ते स्वर्गं परित्यज्य महीधरं तु । मूले शिविरं निवेश्य तस्थुश्च सज्जा दनुनन्दनास्ते ॥ दैत्यो महिषासुरेण सम्प्रेषित दानवयूथपालः । पुत्रो रिपुसैन्यमर्दी स दुन्दुभिर्दुन्दुभिनिःस्वनस्तु ॥ देवीं गगनस्थितोऽपि स दुन्दुभिर्वाक्यमुवाच विप्र । दूतोऽस्मि महासुरस्य रम्भात्मजस्याप्रतिमस्य युद्धे ॥ कात्यायनी दुन्दुभिमभ्युवाच एह्येहि दैत्येन्द्र भयं विमुच्य । वाक्यं च द्रम्भ भ वदस्व तत्सत्यमपेतमोहः ॥ दैत्येश्वर! वह कन्या बड़े और भयानक शस्त्रोंको धारण किये हुए है । उसे भलीभाँति देखकर भी हम यह न १५ जान सके कि वह कौन है तथा किसकी पुत्री या स्त्री है । महासुरेन्द्र! वह स्वर्गका परित्याग कर भूतलमें स्थित श्रेष्ठरत्र है । आप स्वयं विन्ध्यपर्वतपर जाकर उसे देखें और फिर जो आपकी इच्छा एवं सामर्थ्य हो वह १६ करें ' ॥ १३ – १६ ॥ उन दोनों दूतोंसे कात्यायनीके आकर्षक सौन्दर्यकी | बात सुनकर महिषने ' इस विषयमें कुछ भी विचारना १७ नहीं है ' - यह कहकर जानेका निश्चय किया । इस प्रकार मानो महिषका अन्त ही आ गया । मनुष्यके शुभाशुभको ब्रह्माने पहलेसे ही निर्धारित कर रखा है । जिस व्यक्तिको जहाँपर या जहाँसे जिस प्रकार जो कुछ भी १८ शुभाशुभ परिणाम होनेवाला होता है, वह वहाँ ले जाया जाता है या स्वयं चला जाता है । फिर महिषने मुण्ड, नमर, चण्ड, विडालनेत्र, पिशङ्गके साथ वाष्कल, उग्रायुध, १ ९ चिक्षुर और रक्तबीजको आज्ञा दी । वे सभी दानव रणकर्कश भेरियाँ बजाकर स्वर्गको छोड़कर उस पर्वतके निकट आ गये और उसके मूलमें सेनाके दलोंका २० पड़ाव डालकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ १७–२० ॥ तत्पश्चात् महिषासुरने देवीके पास धौंसेकी ध्वनिकी भाँति उच्च और गम्भीर ध्वनिमें बोलनेवाले तथा शत्रुओं की सेनाओं के समूहोंका मर्दन करनेवाले दानवोंके २१ सेनापति मयपुत्र दुन्दुभिको भेजा । ब्राह्मणदेवता नारदजी! दुन्दुभिने देवीके पास पहुँचकर आकाशमें स्थित होकर उनसे यह वाक्य कहा - हे कुमारि! मैं महान् असुर २२ । रम्भके पुत्र महिषका दूत हूँ । वह युद्धमें अद्वितीय वीर है । इसपर कात्यायनीने दुन्दुभिसे कहा- दैत्येन्द्र! तुम निडर होकर इधर आओ और रम्भपुत्रने जो २३ । वचन कहा है, उसे स्वस्थ होकर ठीक - ठीक कहो ।
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अध्याय १ ९ ] चण्ड - मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०३ तथोक्तवाक्ये दितिजः शिवाया-स्त्यज्याम्बरं भूमितले निषण्णः । सुखोपविष्टः परमासने च रम्भात्मजेनोक्तमुवाच वाक्यम् ॥ दुन्दुभिरुवाच एवं समाज्ञापयते सुरारि-स्त्वां देवि दैत्यो महिषासुरस्तु । यथामरा हीनबलाः पृथिव्यां भ्रमन्ति युद्धे विजिता मया ते ॥ स्वर्गं मही वायुपथाश्च वश्याः पातालमन्ये च महेश्वराद्याः । इन्द्रोऽस्मि रुद्रोऽस्मि दिवाकरोऽस्मि सर्वेषु लोकेष्वधिपोऽस्मि बाले ॥ न सोऽस्ति नाके न महीतले वा रसातले वा । यो मां हि संग्राममुपेयिवांस्तु भूतो न यक्षो न जिजीविषुर्यः ॥ यान्येव रत्नाि महत वा स्वर्गेऽपि पातालतलेऽथ मुग्धे । सर्वाणि मामद्य समागतानि वीर्यार्जितानीह विशालनेत्रे ॥ स्त्रीरत्नमग्र्यं भवती च कन्या प्राप्तोऽस्मि शैलं तव कारणेन । तस्माद् भजस्वेह जगत्पतिं मां पतिस्तवार्होऽस्मि विभुः प्रभुश्च ॥ पुलस्त्य उवाच इत्येवमुक् दितिजेन दुर्गा कात्यायनी प्राह मयस्य पुत्रम् । सत्यं प्रभुर्दानवराट् पृथिव्यां सत्यं च युद्धे विजितामराश्च ॥ किं त्वस्ति दैत्येश कुलेऽस्मदीये धर्मो हि शुल्काख्य इति प्रसिद्धः । तं चेत् प्रदद्यान्महिषो ममाद्य भजामि सत्येन पतिं हयारिम् ॥ श्रुत्वाऽथ वाक्यं मयजोऽब्रवीच्च शुल्कं वदस्वाम्बुजपत्रनेत्रे । दद्यात्स्वमूर्धानमपि त्वदर्थे किं नाम शुल्कं यदिहैव लभ्यम् ॥ दुर्गाके इस प्रकार कहनेपर वह दैत्य आकाशसे उतरकर पृथ्वीपर आया और सुन्दर आसनपर सुखपूर्वक बैठकर महिषके वचनोंको इस प्रकार कहने २४ लगा— ॥२१–२४ ॥ दुन्दुभि बोला - देवि! असुर महिषने तुम्हें यह अवगत कराया है कि मेरे द्वारा युद्धमें पराजित हुए निर्बल देवतालोग पृथ्वीपर भ्रमण कर रहे हैं । हे बाले! २५ स्वर्ग, पृथ्वी, वायुमार्ग, पाताल और शङ्कर आदि देवगण सभी मेरे वशमें हैं । मैं ही इन्द्र, रुद्र एवं सूर्य हूँ तथा सभी लोकोंका स्वामी हूँ । स्वर्ग, पृथ्वी या रसातलमें २६ जीवित रहनेकी इच्छावाला ऐसा कोई देव, असुर, भूत या यक्ष योद्धा नहीं हुआ, जो युद्धमें मेरे सामने आ सकता हो । ( और भी सुनो ) पृथ्वी, स्वर्ग या पातालमें २७ जितने भी रत्न हैं, उन सबको मैंने अपने पराक्रमसे जीत लिया है और अब वे मेरे पास आ गये हैं । अतः अबोध २८ । बालिके! तुम कन्या हो और स्त्रीरत्नोंमें श्रेष्ठ हो । मैं तुम्हारे लिये इस पर्वतपर आया हूँ । इसलिये मुझ जगत्पतिको तुम स्वीकार करो । मैं तुम्हारे योग्य सर्वथा २ ९ समर्थ पति हूँ ॥ २५ - २ ९ ॥ पुलस्त्यजीने कहा- उस दैत्यके ऐसा कहनेपर दुर्गाजीने दुन्दुभिसे कहा – ( असुरदूत! ) यह सत्य है कि दानवराट् महिष पृथ्वीमें समर्थ है एवं यह भी सत्य है कि उसने युद्धमें देवताओंको जीत लिया है; किंतु ३० दैत्येश! हमारे कुलमें ( विवाहके विषयमें ) शुल्क नामकी एक प्रथा प्रचलित है । यदि महिष आज मुझे वह प्रदान करे तो सत्यरूपमें ( सचमुच ) मैं उस ३१ ( महिष ) - को पतिरूपमें स्वीकार कर लूँगी । इस वाक्यको सुनकर दुन्दुभिने कहा - ( अच्छा ) कमलपत्राक्षि! तुम वह शुल्क बतलाओ । महिष तो तुम्हारे लिये अपना सिर भी प्रदान कर सकता है; शुल्ककी तो बात ही ३२ । क्या, जो यहाँ ही मिल सकता है ॥३०-३२ ॥
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१०४ पुलस्त्य उवाच इत्येवमुक्ता दनुनायकेन कात्यायनी सस्वनमुन्नदित्वा । विहस्य चैतद्वचनं हिताय सर्वस्य चराचरस्य ॥ श्रीदेव्युवाच कुलेऽस्मदीये शृणु दैत्य शुल्कं कृतं हि यत्पूर्वतरैः प्रसह्य । यो STM रणाग्रे तस्याः स भर्त्ताऽपि भविष्यतीति ॥ पुलस्त्य उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं देव्या दुन्दुभिर्दानवेश्वरः ।
गत्वा निवेदयामास महिषाय यथातथम् ॥
स चाभ्यगान्महातेजाः सर्वदैत्यपुरःसरः ।
आगत्य विन्ध्यशिखरं योद्धुकामः सरस्वतीम् ॥
ततः सेनापतिर्दैत्यश्चिक्षुरो नाम नारद ।
सेनाग्रगामिनं चक्रे नमरं नाम दानवम् ॥
स चापि तेनाधिकृतश्चतुरङ्गं समूर्जितम् ।
बलैकदेशमादाय दुर्गां दुद्राव वेगितः ॥
तमापतन्तं वीक्ष्याथ देवा ब्रह्मपुरोगमाः ।
ऊचुर्वाक्यं महादेवीं वर्म ह्याबन्ध चाम्बिके ॥
अथोवाच सुरान् दुर्गां नाहं बध्नामि देवताः । कवचं कोऽत्र संतिष्ठेत् ममाग्रे दानवाधमः
यदा न देव्या कवचं कृतं शस्त्रनिबर्हणम् ।
तदा रक्षार्थमस्यास्तु विष्णुपञ्जरमुक्तवान् ॥
सा तेन रक्षिता ब्रह्मन् दुर्गा दानवसत्तमम् ।
अवध्यं दैवतैः सर्वैर्महिषं प्रत्यपीडयत् ॥
एवं पुरा देववरेण शम्भुना तद्वैष्णवं पञ्जरमायताक्ष्याः प्रोक्तं तया चापि हि पादघातै-महिषासुरेन्द्रः ॥ एवंप्रभावो द्वि विष्णुपञ्जरः सर्वासु रक्षास्वधिको हि गीतः । कस्तस्य कुर्याद् युधि दर्पहानिं यस्य स्थितश्चेतसि चक्रपाणिः श्रीवामनपुराण [ अध्याय १ ९ पुलस्त्यजी बोले- दैत्यनायक दुन्दुभिके ऐसा कहनेपर दुर्गाजीने उच्च स्वरसे गर्जन कर और हँसकर समस्त चराचरके कल्याणार्थ ३३ | कहा- ॥ ३३ ॥
श्रीदेवीजीने कहा- दैत्य! पूर्वजोंने जो शुल्क निर्धारित किया है, उसे सुनो । कि ) हमारे कुलमें उत्पन्न कन्याको जो ३४ जीतेगा, वही उसका पति होगा ॥ ३४ ॥
पुलस्त्यजीने कहा- देवीकी यह दुन्दुभिने जाकर महिषासुरसे इस बातको ३५ निवेदित कर दिया । उस महातेजस्वी यह वचन हमारे कुलमें ( वह यह है बलसे युद्धमें बात सुनकर ज्यों - का - त्यों दैत्यने सभी दैत्योंके साथ ( युद्धमें देवीको पराजितकर उसका पति बननेके लिये ) प्रयाण किया एवं सरस्वती ( -देवी ) -से ३६ युद्ध करनेकी इच्छासे विन्ध्याचल पर्वतपर पहुँच गया । नारदजी! उसके पश्चात् सेनापति चिक्षुर नामक दैत्यने नमर नामके दैत्यको सेनाके आगे चलनेका निर्देश ३७ दिया । और वह भी महान् बली असुर उससे निर्देश पाकर बलशाली चतुरंगिणी सेनाकी एक लड़ाकू टुकड़ीको ३८ लेकर वेगपूर्वक दुर्गाजीपर धावा बोल दिया ॥ ३५–३८ ॥ उसे आते देखकर ब्रह्मा आदि देवताओंने महादेवीसे ३ ९ कहा – अम्बिके! आप कवच बाँध लें । उसके बाद देवीने देवताओंसे कहा – देवगण! मैं कवच नहीं बाँधूंगी । ॥ ४० मेरे सामने ऐसा कौन अधम दानव है जो यहाँ युद्धमें ठहर सके? जब देवीने शस्त्र - निवारक कवच न पहना तो ४१ उनकी रक्षाके लिये देवताओंने ( पूर्वोक्त ) विष्णुपञ्जरस्तोत्र पढ़ा । ब्रह्मन्! उससे रक्षित होकर दुर्गाने समस्त देवताओंके ४२ द्वारा अवध्य दानव - श्रेष्ठ महिषासुरको खूब पीड़ित किया । इस प्रकार पहले देवश्रेष्ठ शम्भुने बड़े नेत्रोंवाली ( कात्यायनी ) - से उस वैष्णव पञ्जरको कहा था, उसीके ४३ प्रभावसे उन्होंने ( देवीने ) भी पैरोंसे मारकर उस महिषासुरका कचूमर निकाल दिया । द्विज! इस प्रकारके प्रभावसे युक्त विष्णुपञ्जर समस्त रक्षाकारी ( स्तोत्रों ) में श्रेष्ठ कहा गया है । वस्तुतः जिसके चित्तमें चक्रपाणि स्थित हों, युद्धमें ॥ ४४ । उसके अभिमानको कौन नष्ट कर सकता है ॥ ३ ९ —४४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १ ९ ॥
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अध्याय २० ] भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना १०५ बीसवाँ अध्याय भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध; महिषासुर - वध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना नारद उवाच
कथं कात्यायनी देवी सानुगं महिषासुरम् ।
सवाहनं हतवती तथा विस्तरतो वद ॥
एतच्च संशयं ब्रह्मन् हृदि मे परिवर्तते ।
विद्यमानेषु शस्त्रेषु यत्पद्भ्यां तममर्दयत् ॥
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम् ।
वृत्तां देवयुगस्यादौ पुण्यां पापभयापहाम् ॥
एवं स नमरः क्रुद्धः समापतत वेगवान् ।
सगजाश्वरथो ब्रह्मन् दृष्टो देव्या यथेच्छया ॥
ततो बाणगणैर्दैत्यः समानम्याथ कार्मुकम् ।
ववर्ष शैलं धारौघैद्यौरिवाम्बुदवृष्टिभिः ॥
शरवर्षेण तेनाथ विलोक्याद्रिं समावृतम् ।
क्रुद्धा भगवती वेगादाचकर्ष धनुर्वरम् ॥
तद्धनुर्दानवे सैन्ये दुर्गया नामितं बलात् ।
सुवर्णपृष्ठं विबभौ विद्युदम्बुधरेष्विव ॥
बाणैः सुररिपूनन्यान् खड्गेनान्यान् शुभव्रत ।
गदया मुसलेनान्यांश्चर्मणाऽन्यानपातयत् ॥
एकोऽप्यसौ बहून् देव्याः केसरी कालसंनिभः ।
विधुन्वन् केसरसटां निषूदयति दानवान् ॥
कुलिशाभिहता दैत्याः शक्त्या निर्भिन्नवक्षसः ।
लाङ्गलैर्दारितग्रीवा विनिकृत्ताः परश्वधैः ॥
दण्डनिर्भिन्नशिरसश्चक्रविच्छिन्नबन्धनाः 1 चेलुः पेतुश्च मम्लुश्च तत्यजुश्चापरे रणम् ॥ नारदजीने पूछा— ( पुलस्त्यजी! ) दुर्गादेवीने सेना एवं वाहनोंके सहित महिषासुरको किस प्रकार मार १ डाला, इसे आप विस्तारसे कहें । मेरे मनमें यह शंका घर कर गयी है कि शस्त्रोंके विद्यमान होते हुए भी २ देवीने पैरोंसे उसे क्यों मारा? ॥१-२ ॥ [ फिर नारदजीके प्रश्नको सुनकर ] पुलस्त्यजीने | कहा- नारदजी! देवयुगके आदिमें घटित तथा पाप एवं ३ भयको दूर करनेवाली इस प्राचीन एवं पवित्र कथाको आप सावधान होकर सुनिये । एक बार इसी प्रकार ( अर्थात् ) पूर्ववर्णित रीतिसे क्रुद्ध होकर नमरने भी हाथी, ४ घोड़े और रथोंके साथ वेगपूर्वक देवीके ऊपर आक्रमण कर दिया था । फिर देवीने भी उसे भलीभाँति देखा । इसके बाद दैत्यने अपने धनुषको झुकाकर ( चढ़ाकर ) विन्ध्य पर्वतके ऊपर इस प्रकारसे बाण - वर्षा की जैसे आकाशसे ५ बादल ( उसपर ) धारा- प्रवाह ( मूसलाधार ) जलवृष्टि करता हो । उसके बाद उस दैत्यकी बाण - वर्षासे पर्वतको सर्वथा ढका देखकर देवीको बड़ा क्रोध हुआ और तब उन्होंने ६ वेगपूर्वक झट विशाल धनुषको चढ़ा लिया ॥ ३–६ ॥ श्रीदुर्गाजीद्वारा चढ़ाया गया सोनेकी पीठवाला वह ७ धनुष दानवी - सेनामें इस प्रकार चमक उठा, जैसे बादलोंमें बिजली चमकती है । शुभ व्रतवाले श्रीनारदजी! श्रीदुर्गाजीने कुछ दैत्योंको बाणोंसे, कुछको तलवारसे, ८ कुछको गदासे, कुछको मुसलसे और कुछ दैत्योंको ढाल चलाकर ही मार डाला । कालके समान देवीके सिंहने ( भी ) अपनी गर्दनके बालोंको झाड़ते हुए अकेला ही अनेकों दैत्योंका संहार कर डाला । देवीने ९ कुछ दैत्योंको वज्रसे आहत कर दिया, कुछ दैत्योंके वक्षःस्थलको शक्तिसे फाड़ डाला, कुछके गर्दनको हलसे विदीर्ण कर कुछको फरसेसे काट डाला, कुछके १० सिरको दण्डसे फोड़ दिया तथा कुछ दैत्योंके शरीरके संधि - स्थानोंको चक्रसे छिन्न - भिन्न कर दिया । कुछ पहले ही चले गये, कुछ गिर गये, कुछ मूच्छित हो गये ११ और कुछ युद्धभूमि छोड़कर भाग गये ॥ ७–११ ॥
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ते वध्यमाना रौद्रया दुर्गया दैत्यदानवाः ।
कालरात्रिं मन्यमाना दुद्रुवुर्भयपीडिताः ॥
सैन्याग्रं भग्नमालोक्य दुर्गामग्रे तथा स्थिताम् ।
दृष्ट्वा जगाम नमरो मत्तकुञ्जरसंस्थितः ॥
समागम्य च वेगेन देव्याः शक्तिं मुमोच ह ।
त्रिशूलमपि सिंहाय प्राहिणोद् दानवो रणे ॥
तावापतन्तौ देव्या तु हुंकारेणाथ भस्मसात् ।
कृतावथ गजेन्द्रेण गृहीतो मध्यतो हरिः ॥
अथोत्पत्य च वेगेन तलेनाहत्य दानवम् ।
गतासुः कुञ्जरस्कन्धात् क्षिप्य देव्यै निवेदितः ॥
गृहीत्वा दानवं मध्ये ब्रह्मन् कात्यायनी रुषा ।
सव्येन पाणिना भ्राम्य वादयत् पटहं यथा ॥
ततोऽट्टहासं मुमुचे तादृशे वाद्यतां गते ।
हास्यात् समुद्भवंस्तस्या भूता नानाविधाऽद्भुताः ॥
केचिद् व्याघ्रमुखा रौद्रा वृकाकारास्तथा परे ।
हयास्या महिषास्याश्च वराहवदनाः परे ॥
आखुकुक्कुटवक्त्राश्च गोऽजाविकमुखास्तथा ।
नानावक्त्राक्षिचरणा नानायुधधरास्तथा ॥
गायन्त्यन्ये हसन्त्यन्ये रमन्त्यन्ये तु संघशः ।
वादयन्त्यपरे तत्र स्तुवन्त्यन्ये तथाम्बिकाम् ॥
सा तैर्भूतगणैर्देवी सार्द्ध तद्दानवं बलम् । शातयामास चाक्रम्य यथा सस्यं महाशनिः सेनाग्रे निहते तस्मिन् तथा सेनाग्रगामिनि । चिक्षुरः सैन्यपालस्तु योधयामास देवताः
कार्मुकं दृढमाकर्णमाकृष्य रथिनां वरः ।
ववर्ष शरजालानि यथा मेघो वसुंधराम् ॥
श्रीवामनपुराण [ अध्याय २० भयंकर रूपवाली दुर्गाद्वारा मारे जा रहे दैत्य एवं १२ दानव भयसे व्याकुल हो गये तथा वे उन्हें कालरात्रिके समान मानते हुए डरसे भाग चले । सेनाके अग्र ( प्रधान ) १३ भागको नष्ट तथा अपने सम्मुख दुर्गाको स्थित देखकर नमर मतवाले हाथीपर चढ़कर आगे आया । उस दानवने युद्धमें देवीके ऊपर शक्तिसे कसकर प्रहार किया एवं सिंहके १४ ऊपर त्रिशूल चलाया । ( किंतु ) देवीने उन दोनों अस्त्रोंको आते देख हुंकारसे ही उन्हें भस्म कर डाला । इधर नमरके १५ हाथीने ( सूँड़से ) सिंहकी कमर पकड़ ली ॥ १२-१५ ॥ इसपर सिंहने तेजीसे उछलकर नमर दानवको १६ पंजेसे मारकर उसके प्राण ले लिये और हाथीके कंधेसे उसे नीचे गिराकर देवीके आगे रख दिया । नारदजी! देवी कात्यायनी क्रोधसे उस दैत्यको मध्यमें पकड़कर १७ तथा बायें हाथसे घुमाकर ढोलके समान बजाने लगीं और उसे अपना बाजा बनाकर उन्होंने जोरसे अट्टहास किया । उनके हँसनेसे अनेक प्रकारके अद्भुत भूत उत्पन्न १८ हो गये! कोई - कोई ( भूत ) व्याघ्रके समान भयंकर मुखवाले थे, किसीकी आकृति भेड़ियेके समान थी, किसीका मुख घोड़ेके तुल्य और किसीका मुख भैंसे-१ ९ जैसा एवं किसीका सूकरके समान मुँह था ॥ १६–१९ ॥ उनके मुँह चूहे, मुर्गे ( कुक्कुट ), गाय, बकरा २० और भेड़के मुखोंके समान थे । कई नाना प्रकारके मुख, आँख एवं चरणोंवाले थे तथा वे नाना प्रकारके आयुध धारण किये हुए थे । उनमें कुछ तो समूह बनाकर गाने २१ लगे, कुछ हँसने लगे और कुछ रमण करने लगे तथा कुछ बाजा बजाने लगे एवं कुछ देवीकी स्तुति करने लगे । देवीने उन भूतगणोंके साथ उस दानव सेनापर . आक्रमण कर उसे इस प्रकार तहस - नहस कर दिया, ॥ २२ जैसे भारी वज्रके समान ओलोंके गिरनेसे खेतीका संहार । हो जाता है । इस प्रकार सेनाके अग्रभाग तथा सेनापतिके मारे जानेपर अब सेनापति चिक्षुर देवताओंसे भिड़ ॥ २३ गया – युद्ध करने लगा ॥ २०–२३ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ उस दैत्यने अपने मजबूत धनुषको अपने कानोंतक चढ़ाकर उससे बाणोंकी इस प्रकार वर्षा २४ । की जैसे मेघ पृथ्वीपर ( घनघोर ) जल बरसाते हैं । परंतु
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अध्याय २० ] भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना १०७
तान् दुर्गा स्वशरैश्छित्त्वा शरसंघान् सुपर्वभिः ।
सौवर्णपुङ्खानपराञ्शराञ्जग्राह षोडश ॥
ततश्चतुर्भिश्चतुरस्तुरङ्गानपि भामिनी ।
हत्वा सारथिमेकेन ध्वजमेकेन चिच्छिदे ॥
ततस्तु सशरं चापं चिच्छेदैकेषुणाऽम्बिका ।
छिन्ने धनुषि खड्गं च चर्म चादत्तवान् बली ॥
तं खड्गं चर्मणा सार्धं दैत्यस्याधुन्वतो बलात् ।
शरैश्चतुर्भिश्चिच्छेद ततः शूलं समाददे ॥
समुद्भ्राम्य महच्छूलं संप्राद्रवदथाम्बिकाम् ।
क्रोष्टुको मुदितोऽरण्ये मृगराजवधूं यथा ॥
तस्याभिपततः पादौ करौ शीर्षं च पञ्चभिः ।
शरैश्चिच्छेद संक्रुद्धा न्यपतन्निहतोऽसुरः ॥
तस्मिन् सेनापतौ क्षुण्णे तदोग्रास्यो महासुरः ।
समाद्रवत वेगेन करालास्यश्च दानवः ॥
बाष्कलश्चोद्धतश्चैव उदग्राख्योग्रकार्मुकः ।
दुर्द्धरो दुर्मुखश्चैव बिडालनयनोऽपरः ॥
एतेऽन्ये च महात्मानो दानवा बलिनां वराः ।
कात्यायनीमाद्रवन्त नानाशस्त्रास्त्रपाणयः ॥
तान् दृष्ट्वा लीलया दुर्गा वीणां जग्राह पाणिना ।
वादयामास हसती तथा डमरुकं वरम् ॥
यथा यथा वादयते देवी वाद्यानि तानि तु ।
तथा तथा भूतगणा नृत्यन्ति च हसन्ति च ॥
ततोऽसुराः शस्त्रधराः समभ्येत्य सरस्वतीम् ।
अभ्यघ्नंस्तांश्च जग्राह केशेषु परमेश्वरी ॥
प्रगृह्य केशेषु महासुरांस्तान् उत्पत्य सिंहात्तु नगस्य सानुम् । वीणां परिवादयन्ती पपौ च पानं जगतो जनित्री ॥ ततस्तु देव्या बलिनो महासुरा दोर्दण्डनिर्धूतविशीर्णदर्पाः 1 विस्त्रस्तवस्त्रा व्यसवश्च जाताः ततस्तु तान् वीक्ष्य महासुरेन्द्रान् ॥ देव्या महौजा महिषासुरस्तु व्यद्रावयद् भूतगणान् खुराग्रैः । पुच्छेन थोरसाऽन्यान् निःश्वासवातेन च भूतसंघान् ॥ | दुर्गाने भी सुन्दर पर्वों ( गाँठों ) - वाले अपने बाणोंसे उन २५ बाणोंको काट डाला और फिर सुवर्णसे निर्मित पंखवाले सोलह बाणोंको अपने हाथोंमें ले लिया । उन्होंने क्रुद्ध होकर चार बाणोंसे उसके चार घोड़ोंको और एकसे २६ सारथीको मारकर एक बाणसे उसकी ध्वजाके दो टुकड़े कर दिये । फिर अम्बिकाने एक बाणसे उसके बाणसहित धनुषको काट डाला । धनुष कट जानेपर बलवान् २७ चिक्षुरने ढाल और तलवार उठा ली ॥ २४–२७ ॥ वह ढाल और तलवारको जोर लगाकर घुमा ही २८ रहा था कि देवीने चार बाणोंसे उन्हें काट डाला । इसपर उस दैत्यने शूल ले लिया । महान् शूलको घुमाकर वह अम्बिकाकी ओर इस प्रकार दौड़ा, जैसे वनमें सियार २ ९ आनन्दमग्न होकर सिंहिनीकी ओर दौड़े! पर देवीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर पाँच बाणोंसे उस असुरके दोनों ३० हाथों, दोनों पैरों एवं मस्तकको काट डाला, जिससे वह असुर मरकर गिर पड़ा । उस सेनापतिके मरनेपर उग्रास्य नामका महान् असुर तथा करालास्य नामका दानव -३१ ये दोनों तेजीसे उनकी ओर दौड़े ॥ २८–३१ ॥ बाष्कल, उद्धत, उदग्र, उग्रकार्मुक, दुर्द्धर, दुर्मुख ३२ तथा बिडालाक्ष – ये तथा अन्य अनेक अत्यन्त बली एवं श्रेष्ठ दैत्य शस्त्र और अस्त्र लेकर दुर्गाकी ओर दौड़ ३३ । पड़े । देवी दुर्गाने उन्हें देखा और वे लीलापूर्वक हाथोंमें ३४ वीणा एवं श्रेष्ठ डमरू लेकर हँसती हुई उन्हें बजाने लगीं । देवी उन वाद्योंको ज्यों - ज्यों बजाती जाती थीं, त्यों - त्यों ३५ सभी भूत भी नाचते और हँसते थे ॥ ३२–३५ ॥ अब असुर शस्त्र लेकर महासरस्वतीरूपा दुर्गाके ३६ पास जाकर उनपर प्रहार करने लगे । पर परमेश्वरीने ( तुरंत ) उनके बालोंको जोरके साथ पकड़ लिया । उन | महासुरोंका केश पकड़कर और फिर सिंहसे उछलकर ३७ पर्वत शृङ्गपर जाकर जगज्जननी दुर्गा वीणा वादन करती हुई मधुपान करने लगीं । तभी देवीने अपने बाहुदण्डोंसे सभी असुरोंको मारकर उनके घमण्डको चूर कर दिया । उनके वस्त्र शरीरसे खिसक पड़े और ३८ वे प्राणरहित हो गये । यह देखकर महाबली महिषासुर अपने खुरके अग्रभागसे, तुण्डसे, पुच्छसे, वक्षःस्थलसे तथा निःश्वास- वायुसे देवीके भूतगणोंको भगाने ३ ९ | लगा ॥ ३६–३९ ॥
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१०८ नादेन चैवाशनिसंनिभेन विषाणकोट्या त्वपरान् प्रमथ्य । दुद्राव सिंहं युधि हन्तुकामः ततोऽम्बिका क्रोधवशं जगाम ॥ ततः स कोपादथ तीक्ष्णशृङ्गः क्षिप्रं गिरीन् भूमिमशीर्णयच्च । संक्षोभयस्तोयनिधीन् घनांश्च विध्वंसयन् प्राद्रवताथ दुर्गाम् ॥ सा चाथ पाशेन बबन्ध दुष्टं स चाप्यभूत् क्लिन्नकटः करीन्द्रः । करं प्रचिच्छेद च हस्तिनोऽग्रं स चापि भूयो महिषोऽभिजातः शूलं व्यसृजन्मृडानी स शीर्णमूलो न्यपतत् पृथिव्याम् । शक्तिं प्रचिक्षेप हुताशदत्तां सा कुण्ठिताग्रा न्यपतन्महर्षे चक्रं हरेर्दानवचक्रहन्तुः क्षिप्तं त्वचक्रत्वमुपागतं हि । गदां समाविध्य धनेश्वरस्य क्षिप्ता तु भग्ना न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ जलेशपाशोऽपि महासुरेण विषाणतुण्डाग्रखुरप्रणुन्नः I निरस्य तत्कोपिया च मुक्तो दण्डस्तु याम्यो बहुखण्डतां गतः ॥ वज्रं सुरेन्द्रस्य च विग्रहेऽस्य मुक्तं सुसूक्ष्मत्वमुपाजगाम । संत्यज्य सिंहं महिषासुरस्य दुर्गाधिरूढा सहसैव पृष्ठम् ॥ पृष्ठस्थितायां महिषासु पोप्लूयते वीर्यमदान्मृडान्याम् । सा चापि पद्भ्यां मृदुकोमलाभ्यां ममर्द तं क्लिन्नमिवाजिनं हि स मृद्यमानो धरणीधराभो देव्या बली हीनबलो बभूव श्रीवामनपुराण [ अध्याय २० और अपने बिजलीकी कड़कके समान नाद एवं सींगोंकी नोकसे शेष भूतोंको व्याकुल कर रणक्षेत्र में सिंहको मारने दौड़ा । इससे अम्बिकाको बड़ा क्रोध ४० हुआ । फिर वह क्रुद्ध महिष अपने नुकीले सींगोंसे जल्दी - जल्दी पर्वतों एवं पृथ्वीको विदीर्ण करने लगा । वह समुद्रको क्षुब्ध करते तथा मेघोंको तितर - बितर ४१ करते हुए दुर्गाकी ओर दौड़ा । इसपर उन देवीने उस दुष्टको पाशसे बाँध दिया, पर वह झटसे मदसे भींगे कपोलोंवाला गजराज बन गया । ( तब ) देवीने उस । गजके शुण्डका अगला भाग काट डाला । अब उसने पुन: ॥ ४२ भैंसेका रूप धारण कर लिया । महर्षि नारदजी! उसके बाद देवीने उसके ऊपर शूल फेंका जो टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । तत्पश्चात् उन्होंने अग्निसे प्राप्त हुई शक्ति ॥ ४३ फेंकी, किंतु वह भी टूटकर गिर पड़ी॥४०–४३ ॥ दानवसमूहको मारनेवाला विष्णुप्रदत्त चक्र भी फेंके जाने पर व्यर्थ हो गया । देवीने कुबेरद्वारा दी गयी गदा भी घुमाकर फेंकी, पर वह भी भग्न होकर ४४ पृथ्वीपर गिर पड़ी । महिषने वरुणके पाशको भी अपने सींग, थूथना एवं खुरके प्रहारसे विफल कर दिया । | फिर कुपित होकर देवीने यमदण्डको छोड़ा, पर उसे ४५ भी उसने तोड़कर कई खण्ड - खण्ड कर डाला । उसके शरीरपर देवीद्वारा छोड़ा गया इन्द्रका वज्र भी छोटे - छोटे टुकड़ों में बिखर गया । अब दुर्गाजी सिंहको छोड़कर सहसा महिषासुरकी पीठपर ही चढ़ गयीं । ४६ देवीके पीठपर चढ़ जानेपर भी महिषासुर अपने बलके मदसे उछलता रहा । देवी भी अपने मृदुल तथा कोमल चरणोंसे भींगे मृगचर्मके समान उसकी पीठको ॥ ४७ | मर्दन करती गयीं ॥ ४४ - ४७ ॥ अन्तमें देवीद्वारा कुचला जाता हुआ पर्वताकार । बलवान् महिष बलशून्य हो गया । तब देवीने अपने
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अध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव सम्बन्धी ततोऽस्य शूलेन बिभेद कण्ठं तस्मात् पुमान् खड्गधरो विनिर्गतः ॥ ४८ निष्क्रान्तमात्रं हृदये पदा तं आहत्य संगृह्य कचेषु कोपात् । शिरः प्रचिच्छेद वरासिनाऽस्य हाहाकृतं दैत्यबलं तदाऽभूत् ॥ ४ ९ सचण्डमुण्डाः समयाः सताराः सहासिलोम्ना भयकातराक्षाः । संताड्यमानाः प्रमथैर्भवान्याः पातालमेवाविविशुर्भयार्ताः ॥५० देव्या जयं देवगणा विलोक्य स्तुवन्ति देवीं स्तुतिभिर्महर्षे । नारायणीं सर्वजगत्प्रतिष्ठां कात्यायनीं घोरमुखीं सुरूपाम् ॥५१
संस्तूयमाना सुरसिद्धसंघै-र्निषण्णभूता पादमूले ।
भूयो भविष्याम्यमरार्थमेव-मुक्त्वा सुरांस्तान् प्रविवेश दुर्गा ॥ ५२ ।
प्रश्नोत्तर; संवरण- तपतीका विवाह १० ९ शूलसे उसकी गर्दन काट दीं । उसके कटे कण्ठसे तुरंत तलवार लिये एक पुरुष निकल पड़ा । उसके निकलते ही देवीने उसके हृदयपर चरणसे आघात किया और क्रोधसे उसके बालोंको समेटकर पकड़ लिया तथा अपनी श्रेष्ठ तलवारसे उसका भी सिर काट डाला । उस समय दैत्योंकी सेनामें हाहाकार मच गया । चण्ड, मुण्ड, मय, तार और असिलोमा आदि दैत्य भवानीके प्रमथगणोंद्वारा प्रताडित एवं भयसे उद्विग्न होकर पातालमें प्रविष्ट हो गये । महर्षि नारदजी! इधर देवीकी विजयको देखकर देवतागण स्तुतियोंके द्वारा सम्पूर्ण जगत्की आधारभूता, क्रोधमुखी, सुरूपा, नारायणी, कात्यायनीदेवीकी स्तुति करने लगे । देवताओं और सिद्धोंद्वारा स्तुति की जाती हुई दुर्गाने ' मैं आप देवताओंके श्रेयके लिये पुनः आविर्भूत होऊँगी ' – ऐसा कहकर शिवजीके पादमूलमें लीन हो गयीं ॥४८–५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २० ॥
इक्कीसवाँ अध्याय देवीके पुनराविर्भाव - सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; कुरुक्षेत्रस्थ पृथूदकतीर्थका प्रसङ्ग; संवरण- तपतीका विवाह नारद उवाच
पुलस्त्य कथ्यतां तावद् देव्या भूयः समुद्भवः ।
महत्कौतूहलं मेऽद्य विस्तराद् ब्रह्मवित्तम ॥
पुलस्त्य उवाच श्रूयतां कथयिष्यामि भूयोऽस्याः सम्भवं मुने । शुम्भासुरवधार्थाय लोकानां हितकाम्यया ।
या सा हिमवतः पुत्री भवेनोढा तपोधना ।
उमा नाम्ना च तस्याः सा कोशाज्जाता तु कौशिकी ॥
नारदजीने कहा- ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ पुलस्त्यजी! अब आप देवीकी उत्पत्तिके विषयमें मुझसे पुनः १ विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये । उसे सुननेकी मेरी बड़ी अभिलाषा है ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी बोले- मुनिजी! सुनिये; मैं पुनः लोककल्याणकी इच्छासे शुम्भ नामक असुरके वधके २ लिये देवीकी जो पुनः उत्पत्ति हुई, उसका वर्णन करता हूँ । भगवान् शङ्करने हिमवान्की जिस तपस्विनी कन्या उमासे विवाह किया था, उन्हींके शरीर कोश ( गर्भ ) - से ३ । उत्पन्न होनेके कारण वे देवी कौशिकी कहलायीं ।
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११० श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१
सम्भूय विन्ध्यं गत्वा च भूयो भूतगणैर्वृता ।
शुम्भं चैव निशुम्भं च वधिष्यति वरायुधैः ॥
नारद उवाच
ब्रह्मंस्त्वया समाख्याता मृता दक्षात्मजा सती ।
सा जाता हिमवत्पुत्रीत्येवं मे वक्तुमर्हसि ॥
यथा च पार्वतीकोशात् समुद्भूता हि कौशिकी ।
यथा हतवती शुम्भं निशुम्भं च महासुरम् ॥
कस्य चेमौ सुतौ वीरौ ख्यातौ शुम्भनिशुम्भकौ ।
एतद् विस्तरतः सर्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥
पुलस्त्य उवाच
एतत्ते कथयिष्यामि पार्वत्याः सम्भवं मुने ।
शृणुष्वावहितो भूत्वा स्कन्दोत्पत्तिं च शाश्वतीम् ॥
रुद्रः सत्यां प्रणष्टायां ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
निराश्रयत्वमापन्नस्तपस्तप्तुं व्यवस्थितः ॥
स चासीद् देवसेनानीर्दैत्यदर्पविनाशनः ।
शिवरूपत्वमास्थाय सैनापत्यं समुत्सृजत् ॥
ततो निराकृता देवाः सेनानाथेन शम्भुना । दानवेन्द्रेण विक्रम्य महिषेण पराजिताः ।
ततो जग्मुः सुरेशानं द्रष्टुं चक्रगदाधरम् ।
श्वेतद्वीपे महाहंसं प्रपन्नाः शरणं हरिम् ॥
तानागतान् सुरान् दृष्ट्वा ततः शक्रपुरोगमान् ।
विहस्य मेघगम्भीरं प्रोवाच पुरुषोत्तमः ॥
किं जितास्त्वसुरेन्द्रेण महिषेण दुरात्मना ।
येन सर्वे समेत्यैवं मम पार्श्वमुपागताः ॥
तद् युष्माकं हितार्थाय यद् वदामि सुरोत्तमाः ।
तत्कुरुध्वं जयो येन समाश्रित्य भवेद्धि वः ॥
उत्पन्न होनेपर भूतगणोंसे आवृत हो वे विन्ध्यपर्वतपर ४ | गयीं और उन्होंने ( अपने ) श्रेष्ठ आयुधोंसे शुम्भ तथा निशुम्भ नामके दानवोंका वध किया ॥ २-४ ॥ नारदजीने कहा- ब्रह्मन्! आपने पहले यह बात कही थी कि दक्षकी पुत्री सती ही मरकर फिर ५ हिमवान्की पुत्री हुई थीं । ( अब ) इसे आप विस्तारसे सुनाइये । पार्वतीके शरीर कोशसे जिस प्रकार वे कौशिकी प्रकट हुईं और फिर उन्होंने शुम्भ तथा निशुम्भ नाम ६ बड़े असुरोंका जैसे वध किया था – इन सभी बातोंको विस्तारसे कहिये । ये शुम्भ और निशुम्भ नामसे विख्यात वीर किसके पुत्र थे, इसका ठीक - ठीक विस्तारसे वर्णन ७ कीजिये ॥ ५–७ ॥ पुलस्त्यजी बोले- मुने! ( अच्छा, ) अब मैं फिर आपसे पार्वतीकी उत्पत्तिके विषयमें वर्णन कर रहा हूँ, ८ आप ध्यान देकर ( सम्बद्ध ) स्कन्दके जन्मकी शाश्वत ( नित्य, सदा विराजनेवाली ) कथा सुनें! सतीके देह त्याग कर देनेपर रुद्र भगवान् निराश्रय विधुर हो गये ९ एवं ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए तपस्या करने लगे । वे शङ्करजी ( पहले ) दैत्योंके दर्पको चूर्ण करनेवाले देवताओंके सेनानी थे । परंतु अब उन्होंने ( रुद्र - रूपका त्याग कर ) शिव - स्वरूप धारण कर लिया तथा तपमें १० लगकर सेनापति ( स्थायी ) - पदका भी परित्याग कर दिया । फिर तो देवताओंके ऊपर उनके सेनापति शिवसे विरहित हो जानेके कारण दानवश्रेष्ठ महिषने बलपूर्वक ११ । आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया ॥ ८–११ ॥ ( जब देवसमुदाय पराजित हो गया ) तब पराजित १२ हुए देवतालोग शरण- प्राप्तिकी खोजमें देवेश्वर भगवान् श्रीविष्णुके दर्शनार्थ श्वेतद्वीप गये । उस समय भगवान् विष्णु इन्द्र आदि देवताओंको आये हुए देखकर हँसे १३ और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले- मालूम होता है कि आपलोग असुरोंके स्वामी दुरात्मा महिषसे हार गये हैं, जिसके कारण इस प्रकार एक साथ मिलकर १४ मेरे पास आये हैं? श्रेष्ठ देवताओ! अब आपलोगोंकी भलाई के लिये मैं जो बात कहता हूँ, उसे आप सब सुनिये और उसे ( यथावत् ) आचरण कीजिये । उसके १५ । सहारे आपकी निश्चय विजय होगी॥१२–१५ ॥