श्रीगणेशाय नमः।

वामन पुराण — पृष्ठ 121–130

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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अध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव -य एते पितरो दिव्यास्त्वग्निष्वात्तेति विश्रुताः । अमीषां मानसी कन्या मेना नाम्नाऽस्ति देवताः ॥

तामाराध्य महातिथ्यां श्रद्धया परयाऽमराः ।

प्रार्थयध्वं सतीं मेनां प्रालेयाद्रेरिहार्थतः ॥

तस्यां सा रूपसंयुक्ता भविष्यति तपस्विनी ।

दक्षकोपाद् यया मुक्तं मलवज्जीवितं प्रियम् ॥

साशङ्करात् स्वतेजोऽशं जनयिष्यति यं सुतम् ।

स हनिष्यति दैत्येन्द्रं महिषं सपदानुगम् ॥

तस्माद् गच्छत पुण्यं तत् कुरुक्षेत्रं महाफलम् ।

तत्र पृथूदके तीर्थे पूज्यन्तां पितरोऽव्ययाः ॥

महातिथ्यां महापुण्ये यदि शत्रुपराभवम् ।

जिहासतात्मनः सर्वे इत्थं वै क्रियतामिति ॥

पुलस्त्य उवाच

इत्युक्त्वा वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः ।

कृताञ्जलिपुटा भूत्वा पप्रच्छुः परमेश्वरम् ॥

देवा ऊचुः

कोऽयं कुरुक्षेत्र इति यत्र पुण्यं पृथूदकम् ।

उद्भवं तस्य तीर्थस्य भगवान् प्रब्रवीतु नः ॥

केयं प्रोक्ता महापुण्या तिथीनामुत्तमा तिथिः ।

यस्यां हि पितरो दिव्याः पूज्याऽस्माभिः प्रयत्नतः ॥

ततः सुराणां वचनान्मुरारिः कैटभार्दनः ।

कुरुक्षेत्रोद्भवं पुण्यं प्रोक्तवांस्तां तिथीमपि ॥

श्रीभगवानुवाच

सोमवंशोद्भवो राजा ऋक्षो नाम महाबलः ।

कृतस्यादौ समभवदृक्षात् संवरणोऽभवत् ॥

स च पित्रा निजे राज्ये बाल एवाभिषेचितः ।

बाल्येऽपि धर्मनिरतो मद्भक्तैश्च सदाऽभवत् ॥

पुरोहितस्तु तस्यासीद् वसिष्ठो वरुणात्मजः ।

स चास्याध्यापयामास साङ्गान् वेदानुदारधीः ॥

ततो जगाम चारण्यं त्वनध्याये नृपात्मजः ।

सर्वकर्मसु निक्षिप्य वसिष्ठं तपसां निधिम् ॥

सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण- तपतीका विवाह १११ देवगण! जो ये ' अग्निष्वात्त ' नामसे प्रसिद्ध दिव्य १६ पितर हैं, उनकी मेना नामकी एक मानसी कन्या है । | देववृन्द! आपलोग अत्यन्त श्रद्धासे अमावास्याको सती मेनाकी ( यथाविधि ) आराधना करें तथा उनसे हिमालयकी १७ पत्नी बननेके लिये प्रार्थना करें । उन्हीं मेनासे ( एक ) तपस्विनी रूपवती कन्या उत्पन्न होगी, जिसने दक्षके १८ ऊपर कोपकर अपने प्रिय जीवनका मलके समान परित्याग कर दिया था । वे शिवजीके तेजके अंशरूप जिस पुत्रको उत्पन्न करेंगी वह दैत्योंमें श्रेष्ठ महिषको १ ९ उसकी सेनासहित मार डालेगा ॥ १६–१९ ॥ अतः आपलोग महान् फल देनेवाले, पवित्र २० कुरुक्षेत्रमें जायँ एवं वहाँ ' पृथूदक ' नामके तीर्थमें नित्य ही अनिष्वात्त नामके पितरोंकी पूजा करें । यदि आपलोग अपने शत्रुकी पराजय चाहते हैं तो सब कुछ छोड़कर अमावास्याको उस परम पवित्र तीर्थमें इसी ( निर्दिष्ट ) २१ कार्यको सम्पन्न करें ॥ २०-२१ ॥ पुलस्त्यजी बोले- भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि देवताओंने हाथ जोड़कर उन परमात्मासे २२ | पूछा – ॥ २२ ॥

देवताओंने पूछा— भगवन्! यह कुरुक्षेत्र तीर्थ कौन है, जहाँ पृथूदक तीर्थ है? आप हमलोगोंको उस २३ तीर्थकी उत्पत्तिके विषयमें बतायें । और वह पवित्र उत्तम तिथि कौन - सी है जिसमें हम सब दिव्य पितरोंकी पूजा प्रयत्नपूर्वक कर सकें । तब भगवान् २४ विष्णुने देवताओंकी प्रार्थना सुनकर उनसे कुरुक्षेत्रकी पवित्र उत्पत्ति तथा उस उत्तम तिथिका भी वर्णन किया २५ ( जिसमें पूजा करनेकी बात कही थी ) ॥ २३–२५ ॥ श्रीभगवान् ने कहा- सत्ययुगके प्रारम्भमें सोमवंशमें ऋक्षनामके एक महाबलवान् राजा उत्पन्न २६ हुए । उन ऋक्षसे संवरणकी उत्पत्ति हुई । पिताने उसे बचपनमें ही राज्यपर अभिषिक्त कर दिया । वह बाल्यकालमें भी सदा धर्मनिष्ठ एवं मेरा भक्त था । २७ वरुणके पुत्र वसिष्ठ उसके पुरोहित थे । उन्होंने उसे अङ्गसहित सम्पूर्ण वेदोंको पढ़ाया । एक दिनकी बात २८ है कि अनध्याय ( छुट्टी ) रहनेपर वह राजपुत्र ( संवरण ) तपोनिधि वसिष्ठको सभी कार्य सौंपकर वनमें चला २ ९ | गया ॥ २६–२९ ॥

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११२

ततो मृगयाव्याक्षेपाद् एकाकी विजनं वनम् ।

वैभ्राजं स जगामाथ अथोन्मादनमभ्ययात् ॥

ततस्तु कौतुकाविष्टः सर्वर्तुकुसुमे वने ।

अवितृप्तः सुगन्धस्य समन्ताद् व्यचरद् वनम् ॥

स वनान्तं च ददृशे फुल्लकोकनदावृतम् ।

कह्लारपद्मकुमुदैः कमलेन्दीवरैरपि ॥

तत्र क्रीडन्ति सततमप्सरोऽमरकन्यकाः ।

तासां मध्ये ददर्शाथ कन्यां संवरणोऽधिकाम् ॥

दर्शनादेव स नृपः काममार्गणपीडितः ।

जातः सा च तमीक्ष्यैव कामबाणातुराऽभवत् ॥

उभौ तौ पीडित मोहं जग्मतुः काममार्गणैः ।

राजा चलासनो भूम्यां निपपात तुरंगमात् ॥

तमभ्येत्य महात्मानो गन्धर्वाः कामरूपिणः ।

सिषिचुर्वारिणाऽभ्येत्य लब्धसंज्ञोऽभवत् क्षणात् ॥

सा चाप्सरोभिरुत्पात्य नीता पितृकुलं निजम् ।

ताभिराश्वासिता चापि मधुरैर्वचनाम्बुभिः ॥

स चाप्यारुह्य तुरगं प्रतिष्ठानं पुरोत्तमम् ।

गतस्तु मेरुशिखरं कामचारी यथाऽमरः ॥

यदाप्रभृति सा दृष्टा आक्षिणा तपती गिरौ ।

तदाप्रभृति नाश्नाति दिवा स्वपिति नो निशि ॥

ततः सर्वविदव्यग्रो विदित्वा वरुणात्मजः ।

तपंतीतापितं वीरं पार्थिवं तपसां निधिः ॥

समुत्पत्य महायोगी गगनं रविमण्डलम् ।

विवेश देवं तिग्मांशुं ददर्श स्यन्दने स्थितम् ॥

तं दृष्ट्वा भास्करं देवं प्रणमद् द्विजसत्तमः ।

प्रतिप्रणमितश्चासौ भास्करेणाविशद् रथे ॥

ज्वलज्जटाकलापो ऽसौ दिवाकरसमीपगः ।

शोभते वारुणिः श्रीमान् द्वितीय इव भास्करः ॥

श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ फिर शिकारके लिये व्याक्षिप्त ( व्यग्र ) वह अकेला ३० ही वैभ्राज नामक निर्जन वनमें पहुँचा । उसके बाद वह उन्मादसे ग्रस्त हो गया । उस वनमें सभी ऋतुओंमें फूल फूलते रहते थे, सुगन्धि भी रहती थी, फिर भी उससे ३१ संतृप्त न होनेके कारण वह कुतूहलवश वनमें चारों ओर विचरण करने लगा । वहाँ उसने फूले हुए श्वेत, लाल, ३२ पीले कमल, कुमुद एवं नीले कमलोंसे भरे उस वनको देखा । अप्सराएँ एवं देवकन्याएँ वहाँ सदा मनोरञ्जन ( मनबहलाव ) किया करती थीं । संवरणने उनके बीच ३३ एक अत्यन्त सुन्दरी कन्याको देखा ॥ ३०–३३ ॥ उसे देखते ही वह राजा कामदेवके बाणसे पीड़ित ३४ ( कामसे आशित ) हो गया और इसी प्रकार वह कन्या भी उसे देखकर कामबाणसे अधीर ( मोहित ) हो गयी । कामके बाणोंसे विवश होकर वे दोनों अचेत से हो गये । ३५ राजा घोड़े की पीठपर रखे हुए आसनसे खिसककर पृथ्वीपर गिर पड़ा और इच्छाके अनुसार अपना रूप बना लेनेवाले महात्मा गन्धर्वलोग उसके पास जाकर उसे जलसे ३६ सींचने लगे । ( फिर ) वह दूसरे ही क्षण चेतनामें आ । गया । तब अप्सराओंने उसे मधुर वचनरूपी जलसे भी आश्वस्त किया और उसे उठाकर उसके पिताके घर ले ३७ गयीं ॥ ३४ - ३७ ॥ फिर वह राजा ( अपने ) घोड़ेपर चढ़कर ( अपने ) ३८ श्रेष्ठ पैठण नगर इस प्रकार चला गया, जैसे कोई इच्छाके अनुसार चलनेवाला देवता ( सरलतासे ) मेरुशृङ्गपर चला जाय । ऋक्षके पुत्र संवरणने पर्वतपर देवकन्या तपतीको जबसे अपनी आँखोंसे देखा था, तबसे वह ३ ९ दिनमें न तो भोजन करता था और न रात्रिमें सोता ही था । फिर सब कुछ जाननेवाले एवं शान्त तथा तपस्याके निधिस्वरूप वरुणके पुत्र महायोगी वसिष्ठ उस वीर ४० राजपुत्रको तपतीके कारण संतापमें पड़े देखकर आकाशमें | ऊपर जाकर ( मध्य आकाशमें स्थित ) सूर्यमण्डलमें प्रवेश किया तथा वहाँ रथपर बैठे हुए तेज किरणवाले ४१ सूर्यदेवका उसने दर्शन किया॥३८–४१ ॥ द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठने सूर्यदेवको देखकर प्रणाम ४२ किया । फिर वे सूर्यके द्वारा प्रत्यभिवादन ( प्रणामके | बदले प्रणाम ) किये जानेपर उनके समीप जाकर रथमें बैठ गये । सूर्यदेवके पास रथपर: बैठे हुए अग्नि- शिखाके ४३ | समान चमचमाती जटावाले वरुणके पुत्र वसिष्ठ दूसरे

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अध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव - सम्बन्धी

ततः सम्पूजितोऽर्घाद्यैर्भास्करेण तपोधनः ।

पृष्टश्चागमने हेतुं प्रत्युवाच दिवाकरम् ॥ ४४

समायातोऽस्मि देवेश याचितुं त्वां महाद्युते ।

सुतां संवरणस्यार्थे तस्य त्वं दातुमर्हसि ॥ ४५

ततो वसिष्ठाय दिवाकरेण निवेदिता सा तपती तनूजा । गृहागताय द्विजपुंगवाय राज्ञोऽर्थतः संवरणस्य देवाः ॥ ४६ सावित्रिमादाय वसिष्ठः स्वमाश्रमं पुण्यमुपाजगाम । सा चापि संस्मृत्य नृपात्मजं तं कृताञ्जलिर्वारुणिमाह देवी ॥ ४७ तपत्युवाच ब्रह्मन् मया खेदमुपेत्य यो हि सहाप्सरोभिः परिचारिकाभिः । दृष्टो ह्यरण्येऽमरगर्भतुल्यो नृपात्मजो लक्षणतोऽभिजाने ॥ ४८ पादौ शुभौ चक्रगदासिचिह्नौ जङ्गे तथोरू करिहस्ततुल्यौ । कटिस्तथा सिंहकटिर्यथैव ग्रीवा स्य हस्तौ नीलाश्च दीर्घाश्च समुन्नतः रक्तस्तथा क्षामं च मध्यं त्रिबलीनिबद्धम् ॥ ४ ९ शङ्खाकृतिमादधाति भुजौ च पीनौ कठिनौ सुदीर्घौ । तथा पद्मदलोद्भवाङ्कौ छत्राकृतिस्तस्य शिरो विभाति ॥ ५० केशाः कुटिलाश्च तस्य कर्णौ समांसौ सुसमा च नासा । तस्याङ्गुलयः सुपर्वाः पद्भ्यां कराभ्यां दशनाश्च शुभ्राः ॥ ५१ । षड्भिरुदारवीर्य-स्त्रिभिर्गभीरस्त्रिषु च प्रलम्बः । पञ्चसु राजपुत्रः कृष्णश्चतुर्भिस्त्रिभिरानतोऽपि ॥ ५२ द्वाभ्यां च शुक्लः सुरभिश्चतुर्भिः दृश्यन्ति पद्मानि दशैव चास्य । वृतः स भर्ता भगवन् हि पूर्वं तं राजपुत्रं भुवि संविचिन्त्य ॥ ५३ । प्रश्नोत्तर; संवरण- तपतीका विवाह ११३ सूर्यके समान सुशोभित होने लगे । फिर भगवान् सूर्यने उन तपस्वी ( अतिथि ) - का अर्घ्य आदिसे ( सत्कार ) किया; उसके बाद उनसे उनके आनेका कारण पूछा । तब तपोधन वसिष्ठजीने सूर्यसे कहा - अति तेजस्वी देवेश! मैं राजपुत्र संवरणके लिये आपसे कन्याकी याचना करने आया हूँ । उसे आप ( कृपया ) प्रदान करें ॥ ४२–४५ ॥ [ भगवान् विष्णु कहते हैं— ] देवगण! उसके बाद सूर्यदेव घरपर आये और ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठको राजा संवरणके लिये ( अपनी ) तपती नामकी उस कन्याको समर्पित कर दिया । फिर सूर्यपुत्रीको साथ लेकर वसिष्ठ अपने पवित्र आश्रममें आ गये । वह कन्या उस राजपुत्रका स्मरण कर और हाथ जोड़कर ऋषि वसिष्ठसे बोली - ॥ ४६-४७ ॥ तपतीने कहा- वसिष्ठजी! मैंने वनमें चिन्तामें विभोर होकर अपनी सेविकाओं तथा अप्सराओंके साथ देवपुत्रके समान ( सौम्य सुन्दर ) जिस व्यक्तिको देखा था, उसे मैं लक्षणोंसे राजकुमार समझ रही हूँ; क्योंकि उसके दोनों शुभ चरणोंमें चक्र, गदा और खड्गके चिह्न हैं । उसकी जाँघें तथा ऊरु दोनों हाथीकी सूँड़के समान हैं । उसकी कटि सिंहकी कटिके समान है तथा त्रिवलीयुक्त – तीन बलोंवाला उसका उदरभाग बहुत पतला है । उसकी गर्दन शङ्खके समान है, दोनों भुजाएँ मोटी, कठोर और लम्बी हैं, दोनों करतल कमल - चिह्नसे अङ्कित हैं तथा उसका मस्तक छत्रके समान सुशोभित है । उसके बाल काले तथा घुँघराले हैं, दोनों कर्ण मांसल हैं, नासिका सुडौल है, उसके हाथों एवं पैरोंकी अँगुलियाँ सुन्दर पर्वयुक्त ( पोरवाली ) और लम्बी हैं और उसके दाँत श्वेत हैं । ४८-५१ ॥ [ तपतीने आगे कहा- ] उस महापराक्रमी राजपुत्रके ललाट, कंधे, कपोल ( गाल ), ग्रीवा, कमर तथा जाँघें— ये छः अङ्ग ऊँचे ( सुडौल ) हैं, नाभि, मध्य तथा हँसुली - ये तीन अङ्ग गम्भीर हैं और उसकी दोनों भुजाएँ तथा अण्डकोष – ये तीन अङ्ग लम्बे हैं । दोनों नेत्र, अधर, दोनों हाथ, दोनों पैर तथा नख - ये पाँचों लाल वर्णवाले हैं, केश, पक्ष्म ( बरौनी ) और कनीनिका ( आँख की पुतली ) – ये चार अङ्ग कृष्ण हैं, दोनों भौंहें, आँखके दोनों कोर तथा दोनों कान झुके हुए हैं, दाँत तथा नेत्र दो अङ्ग श्वेत वर्णके हैं, केश, मुख तथा

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११४ ददस्व मां नाथ तपस्विनेऽस्मै समीहिताय । नेहान्यकामां प्रवदन्ति सन्तो दातुं तथान्यस्य विभो क्षमस्व ॥ देवदेव उवाच इत्येवमुक्तः सवितुश्च पुत्र्या ऋषिस्तदा ध्यानपरो बभूव । ज्ञात्वा च तत्रार्कसुतां सकामां मुदा युतो वाक्यमिदं जगाद ॥ स एव पुत्रि नृपतेस्तनूजो दृष्टः पुरा कामयसे यमद्य । स एव चायाति ममाश्रमं वै ऋक्षात्मजः संवरणो हि नाम्ना ॥ अथाजगाम स नृपस्य पुत्र-स्तमाश्रमं ब्राह्मणपुंगवस्य । दृष्ट्वा वसिष्ठं प्रणिपत्य मूर्ध्ना स्थितस्त्वपश्यत् तपतीं नरेन्द्रः ॥ दृष्ट्वा च तां पद्मविशालनेत्रां तां पूर्वदृष्टामिति चिन्तयित्वा । पप्रच्छ केयं ललना द्विजेन्द्र स वारुणिः प्राह नराधिपेन्द्रम् ॥ इयं विवस्वदुहिता नरेन्द्र नाम्ना प्रसिद्धा तपती पृथिव्याम् । मया वार्थाय दिवाकरोऽर्थितः प्रादान्मया त्वाश्रममानिनिन्ये तस्मात् समुत्तिष्ठ नरेन्द्र देव्याः पाणिं तपत्या विधिवद् गृहाण । इत्येवमुक्तो नृपतिः प्रहृष्टो जग्राह पाणिं विधिवत् तपत्याः सा तं पतिं प्राप्य मनोऽभिरामं सूर्यामा शक्रसमप्रभावम् । रराम तन्वी भवनोत्तमेषु यथा महेन्द्रं दिवि दैत्यकन्या श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ दोनों कपोल — ये चार अङ्ग सुगन्धवाले हैं । उनके नेत्र, मुख - विवर, मुखमण्डल, जिह्वा, ओठ, तालु, स्तन, नख, हाथ और पैर – ये दस अङ्ग कमलके समान हैं । भगवन्! मैंने खूब सोच - विचारकर पृथ्वीपर उस राजपुत्रको ५४ पहले ही पतिरूपसे वरण कर लिया है । विभो! मुझे क्षमा करें । आप गुणोंसे युक्त ( मेरी ) इच्छाके अनुकूल तथा वाञ्छित उस तपस्वीको मुझे दे दें; क्योंकि सन्तोंका यह कहना कि अन्यकी कामना करनेवाली कन्याको किसी औरको नहीं देना चाहिये ॥ ५२-५४ ॥ देवोंके देव [ भगवान् विष्णु ] ने कहा -- फिर सूर्यपुत्री तपतीके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी ध्यानमें मग्न हो गये और तपतीको उस कुमारमें आसक्त समझकर ५५ प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने यह बात कही – पुत्रि! जिस राजपुत्रका तुमने पहले दर्शन किया था और जिसकी कामना तुम आज कर रही हो, वह ऋक्षका पुत्र ( राजा ) संवरण ही है । वह आज मेरे आश्रममें आ रहा है । उसके पश्चात् ५६ वह राजकुमार भी ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीके आश्रम में आया । उस राजाने वसिष्ठको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया; बैठनेपर तपतीको भी देखा । खिले ५७ कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली उस तपतीको देखकर उसने सोचा कि इसे मैंने पहले भी देखा है । ( तब उसने पूछा - ब्राह्मणश्रेष्ठ! यह सुन्दर स्त्री कौन है? इसपर ५८ वसिष्ठजीने राजश्रेष्ठ संवरणसे कहा – ॥ ५५-५८ ॥ ' नरेन्द्र! पृथ्वीमें तपती नामसे प्रसिद्ध यह सूर्यकी पुत्री है । मैंने तुम्हारे ही लिये सूर्यसे इसकी याचना की थी और उन्होंने तुम्हारे लिये इसे मुझे सौंपा था । मैं तुम्हारे ॥ ५ ९ लिये ही इसे आश्रममें लाया हूँ; अतः नरेन्द्र! उठो एवं विधिवत् इस सूर्यपुत्री तपतीका पाणिग्रहण करो । ' [ वसिष्ठजीके ] - ऐसा कहनेपर राजा बहुत प्रसन्न हुआ । उसने तपतीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया । सूर्यकी ॥ ६० तनया तपती भी इन्द्रके तुल्य प्रभावशाली उस सुन्दर पतिको पाकर [ अत्यन्त ] प्रसन्न हुई । वह उत्तम महलों में | उसके साथ इस प्रकार विहार करने लगी, जैसे इन्द्रको ॥ ६१ पाकर स्वर्गमें शची विहार करती है ॥ ५ ९ –६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २१ ॥

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अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण - प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य ११५ बाईसवाँ अध्याय कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण - प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य देवदेव उवाच तस्यां तपत्यां नरसत्तमेन जातः सुतः पार्थिवलक्षणस्तु । स जातकर्मादिभिरेव संस्कृतो विवर्द्धताज्येन हुतो यथाऽग्निः ॥ कृतोऽस्य चूडाकरणश्च देव विप्रेण मित्रावरुणात्मजेन । नवाब्दिकस्य व्रतबन्धनं च वेदे च शास्त्रे विधिपारगोऽभूत् ॥ ततश्चतुःषड्भिरपीह वर्षैः सर्वज्ञतामभ्यगमत् ततोऽसौ । ख्यातः पृथिव्यां पुरुषोत्तमोऽसौ नाम्ना कुरुः संवरणस्य पुत्रः ॥

ततो नरपतिर्दृष्ट्वा धार्मिकं तनयं शुभम् ।

दारक्रियार्थमकरोद् यत्नं शुभकुले ततः ॥

सौदामिनीं सुदाम्नस्तु सुतां रूपाधिकां नृपः ।

कुरोरर्थाय वृतवान् स प्रादात् कुरवेऽपि ताम् ॥

सतां नृपसुतां लब्ध्वा धर्मार्थावविरोधयन् ।

रेमे तन्व्या सह तया पौलोम्या मघवानिव ॥

ततो नरपतिः पुत्रं राज्यभारक्षमं बली ।

विदित्वा यौवराज्याय विधानेनाभ्यषेचयत् ॥

ततो राज्येऽभिषिक्तस्तु कुरुः पित्रा निजे पदे ।

पालयामास स महीं पुत्रवच्च स्वयं प्रजाः ॥

स एव क्षेत्रपालोऽभूत् पशुपालः स एव हि ।

स सर्वपालकश्चासीत् प्रजापालो महाबलः ॥

ततोऽस्य बुद्धिरुत्पन्ना कीर्तिर्लोके गरीयसी ।

यावत्कीर्तिः सुसंस्था हि तावद्वासः सुरैः सह ॥

देवोंके देव [ भगवान् विष्णु ] - ने कहा- उस तपतीके गर्भसे मनुष्योंमें श्रेष्ठ संवरणके द्वारा राजलक्षणोंवाला एक पुत्र उत्पन्न हुआ । वह जातकर्म आदि संस्कारोंसे संस्कृत होकर इस प्रकार बढ़ने लगा जैसे घीकी आहुति १ । डालनेसे अग्नि बढ़ती है । देवगण! मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठजीने उसका ( यथासमय ) चौल - संस्कार कराया । नवें वर्षमें उसका उपनयन संस्कार हुआ । फिर वह ( श्रम - क्रमसे अध्ययन कर ) वेद तथा शास्त्रोंका पारगामी २ विद्वान् हो गया एवं चौबीस वर्षोंमें तो फिर वह सर्वज्ञ-सा हो गया । पुरुष श्रेष्ठ संवरणका वह पुत्र इस भूभागपर ' कुरु ' नामसे प्रसिद्ध हुआ । तब राजा ( उस ) कल्याणकारी ३ अपने धार्मिक पुत्रको ( उपयुक्त अवस्थामें आये हुए ) देखकर किसी उत्तम कुलमें उसके विवाहका यत्न ४ करने लगे ॥ १- ४ ॥ राजाने कुरुके लिये सुन्दर स्वरूपवाली सुदामाकी ५ पुत्री सौदामिनीको चुना और सुदामा राजाने भी उसे कुरुको विधिवत् प्रदान कर दिया । उस राजकुमारीको पाकर वह ( कुरु ) धर्म और अर्थका ( यथावत् ) पालन करते हुए उस तन्वङ्गी अर्थात् कृशाङ्गीके साथ गार्हस्थ्य धर्ममें ६ वैसे ही रहने लगा, जैसे पौलोमी ( शची ) - के साथ इन्द्र दाम्पत्य - जीवन व्यतीत करते ( हुए रहते हैं । उसके बाद बलवान् राजाने राज्य - भारके वहन करनेमें – राज्यकार्य ७ संचालनमें – उसे समर्थ जानकर विधिपूर्वक युवराज-पदपर अभिषिक्त कर दिया । तब पिताके द्वारा अपने राज्यपदपर अभिषिक्त होकर कुरु औरस पुत्रकी भाँति ८ । अपनी प्रजाका और पृथ्वीका पालन करने लगे॥५–८ ॥ ( प्रजा और पृथ्वीके पालनमें लगे ) वे राजकुमार ९ कुरु ' क्षेत्रपाल ' तथा ' पशुपाल ' भी हुए! महाबली वे सर्वपालक एवं प्रजापालक भी हुए । फिर उन्होंने सोचा कि संसारमें यश ही सर्वश्रेष्ठ वस्तु है ( उसे प्राप्त करना चाहिये ); क्योंकि जबतक संसारमें कीर्ति भलीभाँति स्थित १० रहती है, तबतक मनुष्य देवताओंके साथ निवास करता है ।

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स त्वेवं नृपतिश्रेष्ठो याथातथ्यमवेक्ष्य च ।

विचचार महीं सर्वां कीर्त्यर्थं तु नराधिपः ॥

ततो द्वैतवनं नाम पुण्यं लोकेश्वरो बली ।

तदासाद्य सुसंतुष्टो विवेशाभ्यन्तरं ततः ॥

तत्र देवीं ददर्शाथ पुण्यां पापविमोचनीम् ।

प्लक्षजां ब्रह्मणः पुत्रीं हरिजिह्वां सरस्वतीम् ॥

सुदर्शनस्य जननीं हृदं कृत्वा सुविस्तरम् ।

स्थितां भगवतीं कूले तीर्थकोटिभिराप्लुताम् ॥

तस्यास्तज्जलमीक्ष्यैव स्नात्वा प्रीतोऽभवन्नृपः ।

समाजगाम च पुनर्ब्रह्मणो वेदिमुत्तराम् ॥

समन्तपञ्चकं नाम धर्मस्थानमनुत्तमम् ।

आसमन्ताद् योजनानि पञ्च पञ्च च सर्वतः ॥

देवा ऊचुः

कियन्त्यो वेदयः सन्ति ब्रह्मणः पुरुषोत्तम ।

येनोत्तरतया वेदिर्गदिता सर्वपञ्चका * ॥

देवदेव उवाच

वेदयो लोकनाथस्य पञ्च धर्मस्य सेतवः ।

यासु यष्टं सुरेशेन लोकनाथेन शम्भुना ॥

प्रयागो मध्यमा वेदिः पूर्वा वेदिर्गयाशिरः । विरजा दक्षिणा वेदिरनन्तफलदायिनी प्रतीची पुष्करा वेदिस्त्रिभिः कुण्डैरलंकृता । समन्तपञ्चका चोक्ता वेदिरेवोत्तराऽव्यया तममन्यत राजर्षिरिदं क्षेत्रं महाफलम् । करिष्यामि कृषिष्यामि सर्वान् कामान् यथेप्सितान् इति संचिन्त्य मनसा त्यक्त्वा स्यन्दनमुत्तमम् । चक्रे कीर्त्यर्थमतुलं संस्थानं पार्थिवर्षभः श्रीवामनपुराण [ अध्याय २२ इस प्रकार यथार्थताका विचार कर वे राजा यश प्राप्तिके ११ लिये समस्त पृथ्वीपर विचरण करने लगे । उसी सिलसिलेमें वे बलशाली राजा पवित्र द्वैतवन पहुँचे एवं पूर्ण सुसंतुष्ट १२ होकर उसके भीतर प्रविष्ट हो गये ॥ ९ –१२ ॥ [ प्रविष्ट होनेके बाद राजाने ] वहाँपर पापनाशिनी १३ उस पवित्र सरस्वती नदीको देखा, जो पर्कटि ( पाकड़ ) वृक्षसे उत्पन्न ब्रह्माकी पुत्री है । वह हरिजिह्वा, ब्रह्मपुत्री और सुदर्शन - जननी नामसे भी प्रसिद्ध है । वह १४ सुविस्तृत हृद ( बड़ा ताल या झील ) - में स्थित है । उसके तटपर करोड़ों तीर्थ हैं । उसके जलको देखते ही राजाको उसमें स्नान करनेकी इच्छा हुई । उन्होंने स्नान १५ किया और बड़े प्रसन्न हुए । फिर वे उत्तर दिशामें स्थित ब्रह्माकी समन्तपञ्चक वेदीपर गये । वह समन्तपञ्चक नामक धर्मस्थान चारों ओर पाँच - पाँच योजनतक फैला १६ हुआ है ॥ १३–१६ ॥ देवताओंने पूछा— पुरुषोत्तम! ब्रह्माकी कितनी वेदियाँ हैं? क्योंकि आपने इस सर्वपञ्चक वेदीको उत्तर १७ वेदी ( अन्य दिशा - सापेक्ष शब्द ' उत्तर से विशिष्ट ) कहा है ॥ १७ ॥

[ भगवान् विष्णु बोले ] - लोकोंके स्वामी ब्रह्माकी पाँच वेदियाँ धर्म- सेतुके सदृश हैं, जिनपर १८ देवाधिदेव विश्वेश्वर श्रीशम्भुने यज्ञ किया था । प्रयाग मध्यवेदी है, गया पूर्ववेदी और अनन्त फलदायिनी जगन्नाथपुरी दक्षिणवेदी है । ( इसी प्रकार ) तीन कुण्डोंसे ॥ १ ९ अलंकृत पुष्करक्षेत्र पश्चिम वेदी है और अव्यय समन्तपञ्चक उत्तर वेदी है । राजर्षि कुरुने सोचा कि ॥ २० इस ( समन्तपञ्चक ) क्षेत्रको महाफलदायी करूँगा ( बनाऊँगा ) और यहीं समस्त मनोरथों ( कामनाओं ) -॥ २१ की खेती करूँगा ॥ १८–२१ ॥ अपने मनमें इस प्रकार विचारकर वे राजाओं में शिरोमणि कुरु रथसे उतर पड़े एवं उन्होंने अपनी ॥ २२ । कीर्तिके लिये अनुपम स्थानका निर्माण किया । उन * समन्तपञ्चक और सर्वपञ्चक समानार्थी शब्द हैं; क्योंकि ' सम ' और सर्व दोनों सर्ववाची शब्द हैं, अतः दोनों शब्दोंका अर्थ एक ही है । इसमें पाठभेदसे भ्रम नहीं होना चाहिये ।

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अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका

कृत्वा सीरं स सौवर्णं गृह्य रुद्रवृषं प्रभुः ।

पौण्ड्रकं याम्यमहिषं स्वयं कर्षितुमुद्यतः ॥

तं कर्षन्तं नरवरं समभ्येत्य शतक्रतुः ।

प्रोवाच राजन् किमिदं भवान् कर्तुमिहोद्यतः ॥

राजाब्रवीत् सुरवरं तपः सत्यं क्षमां दयाम् ।

कृषामि शौचं दानं च योगं च ब्रह्मचारिताम् ॥

तस्योवाच हरिर्देवः कस्माद्बीजो नरेश्वर ।

लब्धोऽष्टाङ्गेति सहसा अवहस्य गतस्ततः ॥

गतेऽपि शक्रे राजर्षिरहन्यहनि सीरधृक् ।

कृषतेऽन्यान् समन्ताच्च सप्तक्रोशान् महीपतिः ॥

ततोऽहमब्रुवं गत्वा कुरो किमिदमित्यथ ।

तदाऽष्टाङ्गं महाधर्मं समाख्यातं नृपेण हि ॥

ततो मयाऽस्य गदितं नृप बीजं क्व तिष्ठति ।

स चाह मम देहस्थं बीजं तमहमब्रुवम् ।

देह्यहं वापयिष्यामि सीरं कृषतु वै भवान् ॥

ततो नृपतिना बाहुर्दक्षिणः प्रसृतः कृतः ।

प्रसृतं तं भुजं दृष्ट्वा मया चक्रेण वेगतः ॥

सहस्त्रधा ततश्छिद्य दत्तो युष्माकमेव हि ।

ततः सव्यो भुजो राज्ञा दत्तश्छिन्नोऽप्यसौ मया ॥

तथैवोरुयुगं प्रादान्मया छिन्नौ च तावुभौ । ततः स मे शिरः प्रादात् तेन प्रीतोऽस्मि तस्य च । वरदोऽस्मीत्यथेत्युक्ते कुरुर्वरमयाचत । कुरुरुवाच

यावदेतन्मया कृष्टं धर्मक्षेत्रं तदस्तु च ।

स्नातानां च मृतानां च महापुण्यफलं त्विह ॥

उपवासं च दानं च स्नानं जप्यं च माधव ।

होमयज्ञादिकं चान्यच्छुभं वाप्यशुभं विभो ॥

त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश शङ्खचक्रगदाधर ।

अक्षयं प्रवरे क्षेत्रे भवत्वत्र महाफलम् ॥

तथा भवान् सुरैः सार्धं समं देवेन शूलिना ।

वस त्वं पुण्डरीकाक्ष मन्नामव्यञ्जकेऽच्युत ।

इत्येवमुक्तस्तेनाहं राज्ञा बाढमुवाच तम् ॥

निर्माण - प्रसङ्ग और ' पृथूदक तीर्थका माहात्म्य ११७ राजाने सुवर्णमय हल बनवाकर उसमें शङ्करके बैल २३ एवं यमराजके पौण्ड्रक नामक भैंसेको नाँधकर स्वयं जोतनेके लिये तैयार हुए । इसपर इन्द्रने उनके पास जाकर कहा – राजन्! आप यहाँ यह क्या करनेके लिये २४ उद्यत हुए हैं? राजा बोले – मैं यहाँ तप, सत्य, क्षमा, दया, शौच, दान, योग और ब्रह्मचर्य - इन अष्टाङ्गक २५ खेती कर रहा हूँ ॥ २२–२५ ॥ इसपर इन्द्र उनसे बोले - नरेश्वर! आपने ( कृषिके २६ लिये साधनभूत ) हल और बीज कहाँसे प्राप्त किये हैं? यह कहते हुए उपहास कर इन्द्र वहाँसे शीघ्र ही चले गये । इन्द्रके चले जानेपर भी राजा प्रतिदिन हल लेकर २७ चारों ओर सात कोसोंतक पृथ्वी जोतते रहे । तब मैंने ( विष्णुने ) उनसे जाकर कहा – कुरु! तुम यह क्या कर २८ रहे हो? ( इसपर ) राजाने कहा – मैं ( पूर्वोक्त ) अष्टाङ्ग-महाधर्मोकी खेती कर रहा हूँ । फिर मैंने उनसे पूछा-राजन्! बीज कहाँ है? राजाने कहा - बीज मेरे शरीरमें है । मैंने उनसे कहा - उसे मुझे दे दो । मैं ( उसे ) २ ९ बोऊँगा, तुम हल चलाओ । तब राजाने अपना दाहिना हाथ फैला दिया । फैलाये हुए हाथको देखकर मैंने ३० चक्रसे शीघ्र ही उसके हजारों टुकड़े कर डाले और उन टुकड़ोंको तुम देवताओंको दे दिया । उसके बाद राजाने वाम बाहु दिया और उसे भी मैंने काट दिया । ३१ इसी प्रकार उसने दोनों ऊरुओंको दिया । उन दोनोंको भी मैंने काट दिया । तब उसने अपना मस्तक दिया, जिससे

मैं उसके ऊपर प्रसन्न हो गया और कहा- तुम्हें मैं वर दूँगा ।

३२ मेरे ऐसा कहनेपर कुरुने ( मुझसे ) वर माँगा - ॥ २६–३२ ॥

कुरुने कहा- जितने स्थानको मैंने जोता है, वह धर्मक्षेत्र हो जाय और यहाँ स्नान करनेवालों एवं ३३ मरनेवालोंको महापुण्यकी प्राप्ति हो । माधव! विभो! शङ्खचक्रगदाधारी हृषीकेश! यहाँ किये गये उपवास, ३४ स्नान, दान, जप, हवन, यज्ञ आदि तथा अन्य शुभ या अशुभ कर्म भी इस श्रेष्ठ क्षेत्रमें आपकी कृपासे अक्षय ३५ एवं महान् फल देनेवाले हों तथा हे पुण्डरीकाक्ष! हे अच्युत! मेरे नामके व्यञ्जक ( प्रकाशक ) इस कुरुक्षेत्रमें आप सभी देवताओं एवं शिवजीके साथ निवास ३६ । करें । राजाके ऐसा कहनेपर मैंने उनसे कहा - बहुत

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११८

तथा च त्वं दिव्यवपुर्भव भूयो महीपते ।

तथाऽन्तकाले मामेव लयमेष्यसि सुव्रत ॥

कीर्तिश्च शाश्वती तुभ्यं भविष्यति न संशयः ।

तत्रैव याजका यज्ञान् यजिष्यन्ति सहस्रशः ॥

तस्य क्षेत्रस्य रक्षार्थं ददौ स पुरुषोत्तमः ।

यक्षं च चन्द्रनामानं वासुकिं चापि पन्नगम् ॥

विद्याधरं शङ्कुकर्णं सुकेशिं राक्षसेश्वरम् ।

अजावनं च नृपतिं महादेवं च पावकम् ॥

एतानि सर्वतोऽभ्येत्य रक्षन्ति कुरुजाङ्गलम् ।

अमीषां बलिनोऽन्ये च भृत्याश्चैवानुयायिनः ॥

अष्टौ सहस्राणि धनुर्ध

ये वारयन्तीह सुदुष्कृतान् वै ।

स्नातुं न यच्छन्ति महोग्ररूपा-स्त्वन्यस्य भूताः सचराचराणाम् ॥

तस्यैव मध्ये बहुपुण्य उक्तः पृथूदकः पापहरः शिवश्च । पुण्या नदी प्राङ्मुखतां प्रयाता यत्रौघयुक्तस्य शुभा जलाढ्या पूर्वं प्रजेयं प्रपितामहेन सृष्टा समं भूतगणैः समस्तैः । मही जलं वह्निसमीरमेव खं त्वेवमादौ विबभौ पृथूदकः तथा च सर्वाणि महार्णवानि तीर्थानि नद्यः स्त्रवणाः सरांसि । संनिर्मितानीह महाभुजेन तच्चैक्यमागात् सलिलं महीषु देवदेव उवाच सरस्वतीदृषद्वत्योरन्तरे कुरुजाङ्गले । मुनिप्रवरमासीनं पुराणं लोमहर्षणम् । अपृच्छन्त द्विजवराः प्रभावं सरसस्तदा प्रमाणं सरसो ब्रूहि तीर्थानां च विशेषतः देवतानां च माहात्म्यमुत्पत्तिं वामनस्य च एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां रोमहर्षसमन्वितः । श्रीवामनपुराण [ अध्याय २२ अच्छा, ऐसा ही होगा । राजन्! तुम पुनः दिव्य ३७ शरीरवाले हो जाओ तथा हे सुव्रत! ( दृढ़तासे व्रतका सुष्टु पालन करनेवाले ) अन्तकालमें तुम मुझमें ही लीन ३८ हो जाओगे ॥ ३३–३७ ॥ [ भगवान् विष्णुने आगे कहा- ] निःसंदेह तुम्हारी ३ ९ । कीर्ति सदा रहनेवाली होगी । यहाँपर यज्ञ करनेवाले व्यक्ति ( यजमान ) यज्ञ करेंगे । फिर उस क्षेत्रकी रक्षा ४० करनेके लिये उन पुरुषोत्तमभगवान्ने राजाको चन्द्र नामक यक्ष, वासुकि नामक सर्प, शङ्कुकर्ण नामक विद्याधर, ४१ सुकेशी नामक राक्षसेश्वर, अजावन नामक राजा और महादेव नामक अग्निको दे दिया । ये सभी तथा इनके अन्य बली भृत्य एवं अनुयायी वहाँ आकर कुरुजाङ्गलकी सब ओरसे रक्षा करते हैं ॥ ३८- ४१ ॥ आठ हजार धनुषधारी, जो पापियोंको यहाँसे ४२ हटाते रहते हैं, वे उग्र रूप धारणकर चराचरके दूसरे भूतगण ( पापियों ) को स्नान नहीं करने देते । उसी ( कुरुजाङ्गल ) - के मध्य पाप दूर करनेवाला एवं अति पवित्र कल्याणकारी पृथूदक ( पोहोआ ) नामक तीर्थ ॥ ४३ है, जहाँ शुभ जलसे पूर्ण एक पवित्र नदी पूर्वकी ओर बहती है । इसे प्रपितामह ब्रह्माने सृष्टिके आदिमें पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाशादि समस्त भूतोंके साथ ही रचा था, महाबाहु ब्रह्माने पृथ्वीपर जिन महासमुद्रों, ॥ ४४ तीर्थों, नदियों, स्रोतों एवं सरोवरोंकी रचना की उन सभीके जल उसमें एकत्र प्राप्त हैं ॥ ४२–४५ ॥ [ यहाँसे कुरुक्षेत्र और उसके सरोवरका माहात्म्य कहते हैं— ] ॥ ४५ देवदेव भगवान् विष्णु बोले- पहले समयमें ब्राह्मणोंने सरस्वती और दृषद्वती ( घग्गर ) - के बीचमें स्थित कुरुक्षेत्रमें आसीन मुनिप्रवर वृद्ध लोमहर्षणसे वहाँ स्थित सरोवरकी महिमा पूछी और इस सरोवर ॥ ४६ विस्तार, विशेषतः तीर्थों और देवताओंके माहात्म्य । एवं वामनके प्रादुर्भावकी कथा कहनेकी प्रार्थना की । ॥ ४७ उनके इस वचनको सुनकर रोमाञ्चित होते हुए पौराणिक ऋषि लोमहर्षण उन्हें प्रणाम कर ( फिर ) इस प्रकार

प्रणिपत्य पुराणर्षिरिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८ । बोले – ॥ ४६ – ४८ ॥

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अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका लोमहर्षण उवाच ब्रह्माणमग्र्यं कमलासनस्थं विष्णुं तथा लक्ष्मिसमन्वितं च । रुद्रं च देवं प्रणिपत्य मूर्ध्ना तीर्थं महद् ब्रह्मसरः प्रवक्ष्ये ॥

रन्तुकादौजसं यावत् पावनाच्च चतुर्मुखम् ।

सरः संनिहितं प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वमेव तु ॥

कलिद्वापरयोर्मध्ये व्यासेन च महात्मना ।

सरःप्रमाणं यत्प्रोक्तं तच्छृणुध्वं द्विजोत्तमाः ॥

विश्वेश्वरादस्थिपुरं तथा कन्या जरद्गवी ।

यावदोघवती प्रोक्ता तावत्संनिहितं सरः ॥

मया श्रुतं प्रमाणं यत् पठ्यमानं तु वामने ।

तच्छृणुध्वं द्विजश्रेष्ठाः पुण्यं वृद्धिकरं महत् ॥

विश्वेश्वराद् देववरो नृपावनात् सरस्वती ।

सरः संनिहितं ज्ञेयं समन्तादर्धयोजनम् ॥

एतदाश्रित्य देवाश्च ऋषयश्च समागताः ।

सेवन्ते मुक्तिकामार्थं स्वर्गार्थं चापरे स्थिताः ॥

ब्रह्मणा सेवितमिदं सृष्टिकामेन योगिना ।

विष्णुना स्थितिकामेन हरिरूपेण सेवितम् ॥

रुद्रेण च सरोमध्यं प्रविष्टेन महात्मना ।

सेव्य तीर्थं महातेजाः स्थाणुत्वं प्राप्तवान् हरः ॥

आद्यैषा ब्रह्मणो वेदिस्ततो रामहृदः स्मृतः ।

कुरुणा च यतः कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम् ॥

तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं यदन्तरं रामह्रदाच्चतुर्मुखम् । एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ॥ निर्माण - प्रसङ्ग और ' पृथूदक तीर्थका माहात्म्य ११ ९ लोमहर्षणजी बोले - सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले कमलासन ब्रह्मा, लक्ष्मीके सहित विष्णु और महादेव रुद्रको सिर झुकाकर प्रणाम करके मैं महान् ब्रह्मसर तीर्थका वर्णन करता हूँ । ब्रह्माने पहले कहा था कि ४ ९ वह ' संनिहित ' सरोवर ' रन्तुक ' नामक स्थानसे लेकर ' औजस ' नामक स्थानतक तथा ' पावन ' से ' चतुर्मुख ' ५० तक फैला हुआ है । ब्राह्मणश्रेष्ठो! किंतु अब कलि और द्वापरके मध्यमें महात्मा व्यासने सरोवरका जो ( वर्तमान ) प्रमाण बतलाया है उसे आपलोग ५१ सुनें । ' विश्वेश्वर ' स्थानसे ' अस्थिपुर ' तक और ' वृद्धा-कन्या ' से लेकर ' ओघवती ' नदीतक यह सरोवर ५२ स्थित है ॥ ४ ९ –५२ ॥ ब्राह्मणश्रेष्ठो! मैंने वामनपुराणमें वर्णित जो प्रमाण ५३ सुना है, आप उस पवित्र एवं कल्याणकारी प्रमाणको सुनें । विश्वेश्वर स्थानसे देववरतक एवं नृपावनसे सरस्वतीतक चतुर्दिक् आधे योजन ( दो कोसों ) - में ५४ फैले इस संनिहित सरको समझना चाहिये । मोक्षकी इच्छासे आये हुए देवता एवं ऋषिगण इसका आश्रय लेकर सदा इसका सेवन करते हैं तथा अन्य लोग ५५ स्वर्गके निमित्त यहाँ रहते हैं । योगीश्वर ब्रह्माने सृष्टिकी इच्छासे एवं भगवान् श्रीविष्णुने जगत्‌के पालनकी ५६ कामनासे इसका आश्रय लिया था ॥ ५३ - ५६ ॥ ( इसी प्रकार ) सरोवरके मध्यमें पैठकर महात्मा ५७ रुद्रने भी इस तीर्थका सेवन किया, जिससे महातेजस्वी ( उन ) हरको स्थाणुत्व ( स्थिरत्व ) प्राप्त हुआ । आदिमें यह ' ब्रह्मवेदी ' कहा गया था, किंतु आगे चलकर ५८ इसका नाम ' रामह्रद ' हुआ । उसके बाद राजर्षि कुरुद्वारा जोते जानेसे इसका नाम ' कुरुक्षेत्र ' पड़ा । तरन्तुक एवं अरन्तुक नामके स्थानोंका मध्य तथा रामहृद एवं चतुर्मुखका मध्यभाग समन्तपञ्चक है, जो कुरुक्षेत्र कहा जाता है । इसे पितामहकी उत्तरवेदी भी ५ ९ कहते हैं ॥ ५७-५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२ ॥

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१२० श्रीवामनपुराण [ अध्याय २३ तेईसवाँ अध्याय वामन - चरितका उपक्रम, बलिका दैत्यराज्याधिपति होना और उनकी अतुल राज्य - लक्ष्मीका वर्णन ऋषय ऊचुः

ब्रूहि वामनमाहात्म्यमुत्पत्तिं च विशेषतः ।

यथा बलिर्नियमितो दत्तं राज्यं शतक्रतोः ॥

लोमहर्षण उवाच

शृणुध्वं मुनयः प्रीता वामनस्य महात्मनः ।

उत्पत्तिं च प्रभावं च निवासं कुरुजाङ्गले ॥

तदेव वंशं दैत्यानां शृणुध्वं द्विजसत्तमाः ।

यस्य वंशे समभवद् बलिर्वैरोचनिः पुरा ॥

दैत्यानामादिपुरुषो हिरण्यकशिपुः पुरा ।

तस्य पुत्रो महातेजाः प्रह्लादो नाम दानवः ॥

तस्माद् विरोचनो जज्ञे बलिर्जज्ञे विरोचनात् ।

हते हिरण्यकशिपौ देवानुत्साद्य सर्वतः ॥

राज्यं कृतं च तेनेष्टं त्रैलोक्ये सचराचरे ।

कृतयत्त्रेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यतां गते ॥

जये तथा बलवतोर्मयशम्बरयोस्तथा ।

शुद्धासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि ॥

संप्रवृत्ते दैत्यपथे अयनस्थे दिवाकरे ।

प्रह्लादशम्बरमयैरनुह्रादेन चैव हि ॥

दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते ।

देवेषु मखशोभां च स्वर्गस्थां दर्शयत्सु च ॥

प्रकृतिस्थे ततो लोके वर्तमाने च सत्पथे ।

अभावे सर्वपापानां धर्मभावे सदोत्थिते ॥

ऋषियोंने कहा – ( कृपया आप ) वामनके माहात्म्य और विशेषकर उनकी उत्पत्तिका वर्णन ( विस्तारसे ) १ करें तथा यह भी बतलायें कि बलिको किस प्रकार बाँधकर इन्द्रको राज्य दिया गया ॥ १ ॥

लोमहर्षणने कहा – मुनियो! आपलोग प्रसन्नता-पूर्वक महात्मा वामनकी उत्पत्ति, उनका प्रभाव और २ कुरुजाङ्गल स्थानमें उनके निवासका वर्णन सुनें! द्विजश्रेष्ठो! आपलोग दैत्योंके उस वंशके सम्बन्धमें भी सुनें, जिस वंशमें प्राचीनकालमें विरोचनके पुत्र बलि ३ उत्पन्न हुए थे । पहले समयमें दैत्योंका आदिपुरुष हिरण्यकशिपु था । उसका प्रह्लाद नामक पुत्र अत्यन्त तेजस्वी दानव था । उससे विरोचन उत्पन्न हुआ ४ और विरोचनसे बलि । हिरण्यकशिपुके मारे जानेपर बलिने सभी स्थानोंसे देवताओंको खदेड़ दिया और वह चराचरसहित तीनों लोकोंका राज्य स्वच्छन्दतासे ५ करने लगा । ( विरोधमें ) देवताओंके ( बहुत ) प्रयत्न करते रहनेपर भी तीनों लोक दैत्योंके अधीन हो ही गये ( एवं त्रैलोक्यपर देवताओंका अधिकार नहीं ६ | रह गया ) ॥ २–६ ॥ बलशाली मय और शम्बरकी विजय - वैजयन्ती ७ फहराने लग गयी । धर्मकार्य सर्वत्र होने लग गये । फलत: दिशाएँ शुद्ध हो गयीं । सूर्य दैत्योंके मार्ग ( दक्षिण अयन ) - में चले गये । ( दैत्योंके शासनमें ) ८ प्रह्लाद, शम्बर, मय तथा अनुहाद - ये सभी दैत्य सभी दिशाओंकी रक्षा करने लगे । आकाश भी दैत्योंसे रक्षित ९ हो गया । देवगण स्वर्गमें होनेवाले यज्ञोंकी शोभा देखने लगे । सारा संसार प्रकृतिमें स्थित और ( व्यवस्थित ) हो गया तथा सभी सन्मार्गपर चलने लगे । सर्वत्र पापोंका १० अभाव और धर्मभावका उत्कर्ष हो गया ॥ ७-१० ॥