वामन पुराण — पृष्ठ 131–140

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140

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अध्याय २३ ] वामन - चरितका उपक्रम, बलिका दैत्यराज्याधिपति होना १२१ चतुष्पादे स्थिते धर्मे ह्यधर्मे पादविग्रहे ।

प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु ।

स्वधर्मसंप्रयुक्तेषु तथाश्रमनिवासिषु ॥

अभिषिक्तो सुरैः सर्वैर्दैत्यराज्ये बलिस्तदा ।

हृष्टेष्वसुरसंघेषु नदत्सु मुदितेषु च ॥

अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मान्तरप्रभा ।

पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुप्रवेशिनी ॥

श्रीरुवाच

बले बलवतां श्रेष्ठ दैत्यराज महाद्युते ।

प्रीताऽस्मि तव भद्रं ते देवराजपराजये ॥

यत्त्वया युधि विक्रम्य देवराज्यं पराजितम् ।

दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ॥

नाश्चर्यं दानवव्याघ्र हिरण्यकशिपोः कुले ।

प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम् ॥

विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः ।

भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥

एवमुक्त्वा तु सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यनृपं बलिम् ।

प्रविष्टा वरदा सेव्या सर्वदेवमनोरमा ॥

तुष्टाश्च देव्यः प्रवराः ह्रीः कीर्तिर्द्युतिरेव च ।

प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्ऋद्धिर्दिव्या महामतिः ॥

श्रुतिः स्मृतिरिडा कीर्तिः शान्तिः पुष्टिस्तथा क्रिया ।

सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्तगीतविशारदाः ॥

प्रपद्यन्ते स्म दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यं सचराचरम् । प्राप्तमैश्वर्यमतुलं बलिना ब्रह्मवादिना । फिर तो धर्म चारों चरणोंसे प्रतिष्ठित हो गया और अधर्म एक ही चरणपर स्थित रह गया । सभी ११ राजा ( भलीभाँति ) प्रजापालन करते हुए सुशोभित होने लगे और सभी आश्रमोंके लोग अपने-अपने धर्मका पालन करने लगे । ऐसे समयमें असुरोंने बलिको दैत्यराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया । १२ असुरोंका समुदाय हर्षित होकर निनाद ( जय - जयकार ) करने लगा । इसके बाद कमलके भीतरी गोफाके समान कान्तिवाली वरदायिनी और सुन्दर सुवेशवाली श्रीलक्ष्मीदेवी हाथमें कमल लिये हुए बलि १३ | समीप आयीं ॥११- १३ ॥ लक्ष्मीने कहा – बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी दैत्यराज बलि! देवराजके पराजय हो जानेपर मैं तुमपर १४ प्रसन्न हूँ । तुम्हारा मङ्गल हो; क्योंकि तुमने संग्राममें पराक्रम दिखाकर देवोंके राज्यको जीत लिया है । इसलिये तुम्हारे श्रेष्ठ बलको देखकर मैं स्वयं आयी १५ हूँ । दानव! असुरोंके स्वामी! हिरण्यकशिपुके कुलमें उत्पन्न हुए तुम्हारा यह कर्म ऐसा है – इसमें कोई १६ आश्चर्यकी बात नहीं है । राजन्! आप दैत्यश्रेष्ठ अपने प्रपितामह हिरण्यकशिपुसे भी विशिष्ट ( प्रभावशाली ) हैं; क्योंकि आप पूरे तीनों लोकोंमें समृद्ध इस राज्यका १७ | भोग कर रहे हैं ॥ १४–१७ ॥ दैत्यराज बलि ऐसा कहने बाद १८ सर्वदेवस्वरूपिणी एवं मनोहर रूपवाली सबकी सेव्य एवं ( सबको ) वर देनेवाली श्रीलक्ष्मी देवी राजा बलिमें प्रविष्ट हो गयीं । तब सभी श्रेष्ठ देवियाँ - - ही, १ ९ कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, ऋद्धि, दिव्या, महामति, श्रुति, स्मृति, इडा, कीर्ति, शान्ति, पुष्टि, क्रिया और नृत्तगीतमें निपुण दिव्य अप्सराएँ भी प्रसन्न २० होकर दैत्येन्द्र ( बलि ) - का सेवन करने लगीं । इस प्रकार ब्रह्मवादी बलिने चर - अचरवाले त्रिलोकीका २१ । अतुल ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया ॥ १८-२१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥

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१२२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २४ चौबीसवाँ अध्याय वामन - चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना ऋषय ऊचुः

देवानां ब्रूहि नः कर्म यद्वृत्तास्ते पराजिताः ।

कथं देवाधिदेवोऽसौ विष्णुर्वामनतां गतः ॥

लोमहर्षण उवाच

बलिसंस्थं च त्रैलोक्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः ।

मेरुप्रस्थं ययौ शक्रः स्वमातुर्निलयं शुभम् ॥

समीपं प्राप्य मातुश्च कथयामास तां गिरम् ।

आदित्याश्च यथा युद्धे दानवेन पराजिताः ॥

अदितिरुवाच

यद्येवं पुत्र युष्माभिर्न शक्यो हन्तुमाहवे ।

बलिर्विरोचनसुतः सर्वैश्चैव मरुद्गणैः ॥

सहस्रशिरसा शक्यः केवलं हन्तुमाहवे ।

तेनैकेन सहस्त्राक्ष न स ह्यन्येन शक्यते ॥

तद्वत् पृच्छामि पितरं कश्यपं ब्रह्मवादिनम् ।

पराजयार्थं दैत्यस्य बलेस्तस्य महात्मनः ॥

ततोऽदित्या सह सुराः संप्राप्ताः कश्यपान्तिकम् ।

तत्रापश्यन्त मारीचं मुनिं दीप्ततपोनिधिम् ॥

आद्यं देवगुरुं दिव्यं प्रदीप्तं ब्रह्मवर्चसा ।

तेजसा भास्कराकारं स्थितमग्निशिखोपमम् ॥

न्यस्तदण्डं तपोयुक्तं बद्धकृष्णाजिनाम्बरम् ।

वल्कलाजिनसंवीतं प्रदीप्तमिव तेजसा ॥

हुताशमिव दीप्यन्तमाज्यगन्धपुरस्कृतम् ।

स्वाध्यायवन्तं पितरं वपुष्मन्तमिवानलम् ॥

ब्रह्मवादिसत्यवादिसुरासुरगुरुं प्रभुम् ।

ब्राह्मण्याऽप्रतिमं लक्ष्म्या कश्यपं दीप्ततेजसम् ॥

यः स्रष्टा सर्वलोकानां प्रजानां पतिरुत्तमः । आत्मभावविशेषेण तृतीयो यः प्रजापतिः । ऋषियोंने कहा- आप हमें यह बतलायें कि देवताओंने कौन - सा कर्म किया, जिससे प्रभावित १ होकर वे ( दैत्य ) पराजित हुए तथा देवाधिदेव भगवान् विष्णु कैसे वामन ( बौना ) बने ॥१ ॥

लोमहर्षणने कहा ( उत्तर दिया ) – इन्द्रदेवने जब तीनों लोकोंको बलिके अधिकारमें देखा तब वे २ मेरु ( पर्वत ) - पर स्थित ( रहनेवाली ) अपनी कल्याणमयी माताके घर गये । माताके समीप जाकर उन्होंने उनसे ( मातासे ) यह बात कही - जिससे देवगण युद्धमें दानव ३ बलिसे पराजित हुए थे॥२-३ ॥ ( माता ) अदितिने कहा- पुत्र! यदि ऐसी बात है तो तुमलोग सम्पूर्ण मरुद्गणोंके साथ मिलकर भी ४ संग्राममें विरोचनके पुत्र बलिको नहीं मार सकते । सहस्राक्ष! युद्धमें केवल हजारों सिरवाले ( सहस्रशीर्षा ) भगवान् विष्णु ही ( उसे ) मार सकते हैं । उनके सिवा ५ किसी दूसरेसे वह नहीं मारा जा सकता । अतः इस विषयमें उस महान् आत्मा ( महाबलवान् ) बलि नामक | दैत्यकी पराजयके लिये मैं तुम्हारे पिता ब्रह्मवादी ६ कश्यपसे ( उपाय ) पूछूंगी ॥४-६ ॥ इस प्रकार माता अदितिके कहनेपर सभी देवता ७ उनके साथ कश्यपजीके पास पहुँच गये । वहाँ ( जाकर उन लोगोंने ) तपस्याके धनी, मरीचिके पुत्र, आद्य एवं ८ दिव्य पुरुष, देवताओंके गुरु, ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान और अपने तेजसे सूर्यके समान तेजस्वी, अग्निशिखाकी ९ भाँति दीप्त, संन्यासीके रूपमें, तपोयुक्त वल्कल तथा मृगचर्म धारण किये हुए ( आहुतिके ) घीकी गन्धसे आप्यायित ( वासित ) अग्निके समान जलते हुए, स्वाध्याय में १० लगे हुए मानो शरीरधारी अग्नि ही हों एवं ब्रह्मवादी, सत्यवादी देवों तथा दानवोंके गुरु, अनुपम ब्रह्मतेजसे ११ पूर्ण एवं शोभासे दीप्त कश्यपजीको देखा ॥ ७-११ ॥ वे ( देवताओंके पिता श्रीकश्यपजी ) सभी लोकोंके रचनेवाले, श्रेष्ठ प्रजापति एवं आत्मभाव अर्थात् १२ | अध्यात्मतत्त्वकी विज्ञताकी विशिष्टताके कारण ऐसे लग

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अध्याय २४ ] वामन - चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना १२३

अथ प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्षभाः ।

ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणमिव मानसाः ॥

अजेयो युधि शक्रेण बलिर्दैत्यो बलाधिकः ।

तस्माद् विधत्त नः श्रेयो देवानां पुष्टिवर्धनम् ॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां पुत्राणां कश्यपः प्रभुः ।

अकरोद् गमने बुद्धिं ब्रह्मलोकाय लोककृत् ॥

कश्यप उवाच

शक्र गच्छाम सदनं ब्रह्मणः परमाद्भुतम् ।

तथा पराजयं सर्वे ब्रह्मणः ख्यातुमुद्यताः ॥

सहादित्या ततो देवा याताः काश्यपमाश्रमम् ।

प्रस्थिता ब्रह्मसदनं महर्षिगणसेवितम् ॥

ते मुहूर्तेन संप्राप्ता ब्रह्मलोकं सुवर्चसः ।

दिव्यैः कामगमैर्यानैर्यथार्हस्ते महाबलाः ॥

ब्रह्माणं द्रष्टुमिच्छन्तस्तपोराशिनमव्ययम् ।

अध्यगच्छन्त विस्तीर्णां ब्रह्मणः परमां सभाम् ॥

षट्पदोद्गीतमधुरां सामगैः समुदीरिताम् ।

श्रेयस्करीममित्रघ्नीं दृष्ट्वा संजहृषुस्तदा ॥

ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च प्रोक्ताः क्रमपदाक्षराः । शुश्रुवुर्विबुधव्याघ्रा विततेषु च कर्मसु

यज्ञविद्यावेदविदः पदक्रमविदस्तथा ।

स्वरेण परमर्षीणां सा बभूव प्रणादिता ॥

यज्ञसंस्तवविद्भिश्च शिक्षाविद्भिस्तथा द्विजैः ।

छन्दसां चैव चार्थज्ञैः सर्वविद्याविशारदैः ॥

लोकायतिकमुख्यैश्च शुश्रुवुः स्वरमीरितम् ।

तत्र तत्र च विप्रेन्द्रा नियताः शंसितव्रताः ॥

जपहोमपरा मुख्या ददृशुः कश्यपात्मजाः ।

तस्यां सभायामास्ते स ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

सुरासुरगुरुः श्रीमान् विद्यया वेदमायया ।

उपासन्त च तत्रैव प्रजानां पतयः प्रभुम् ॥

रहे थे जैसे तीसरे प्रजापति ही हों । फिर अदितिके साथ १३ समस्त देववीर उन्हें प्रणाम कर उनसे हाथ जोड़कर ऐसे बोले जैसे ब्रह्मासे उनके मानस पुत्र बोलते हैं-बलशाली दैत्यराज बलि युद्धमें इन्द्रसे अपराजेय हो १४ गया है । अत: हम देवोंके सामर्थ्यकी पुष्टि - वृद्धिके लिये आप कल्याणकारी उपाय करें । उन पुरुषोंकी बातें सुनकर लोकोंको रचनेवाले सामर्थ्यशाली कश्यपने १५ ब्रह्मलोकमें जानेका विचार किया ॥ १२ – १५ ॥ ( फिर ) कश्यपने कहा - इन्द्र! हम सभी अपनी पराजयकी बात ब्रह्माजीसे कहनेके लिये तैयार होकर १६ । उनके परम अद्भुत लोकको चलें । कश्यपके इस प्रकार कहनेपर अदिति के साथ कश्यपके आश्रममें आये हुए १७ सभी देवताओंने महर्षिगणोंसे सेवित ब्रह्मसदनकी ओर प्रस्थान किया । यथायोग्य इच्छाके अनुसार चलनेवाले दिव्य यानोंसे महाबली एवं तेजस्वी वे सभी देवता १८ क्षणमात्रमें ही ब्रह्मलोकमें पहुँच गये और तब वे लोग तपोराशि अव्यय ब्रह्माको देखनेकी इच्छा करते हुए १ ९ ब्रह्माकी विशाल परम श्रेष्ठ सभामें पहुँचे ॥ १६-१९ ॥ वे ( देवतालोग ) भ्रमरोंकी गुञ्जारसे गुञ्जित, सामगानसे २० मुखरित, कल्याणकी विधायिका और शत्रुओंका विनाश करनेवाली उस सभाको देखकर प्रसन्न हो गये । ( उस स्थानपर ) उन श्रेष्ठ देवगणोंने विस्तृत ( विशाल ) अनेक । २१ । कर्मानुष्ठानोंके समय श्रेष्ठ ऋग्वेदियोंके द्वारा ‘ क्रमपदादि ’ ( वेद पढ़नेकी विशिष्ट शैलियोंसे ) उच्चरित ऋचाओं ( वेदमन्त्रों ) - को सुना । वह सभा यज्ञविद्याके ज्ञाता एवं २२ ' पदक्रम ' प्रभृति वेदपाठके ज्ञानवाले परमर्षियोंके उच्चारणकी ध्वनिसे प्रतिध्वनित हो रही थी । देवोंने वहाँ २३ यज्ञके संस्तवोंके ज्ञाताओं, शिक्षाविदों और वेदमन्त्रोंके अर्थ जाननेवालों, समस्त विद्याओंमें पारङ्गत द्विजों एवं श्रेष्ठ लोकायतिकोंके ( चार्वाकके मतानुयायियों ) - द्वारा २४ उच्चरित स्वरको भी सुना । कश्यपके पुत्रोंने वहाँ सर्वत्र नियमपूर्वक तीर्थ - व्रतको धारण करनेवाले जप- होम करनेमें लगे हुए श्रेष्ठ विप्रोंको देखा । उसी सभामें २५ लोक - पितामह ब्रह्मा विराजमान थे ॥ २०-२५ ॥ ( उस ) सभामें वेदमाया विद्यासे सम्पन्न, सुरों एवं असुरोंके गुरु ( श्रीमान् ब्रह्माजी ) भी उपस्थित थे । २६ प्रजापतिगण उन ( प्रभुता - सम्पन्न ) प्रभुकी उपासना कर

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१२४

दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिश्च द्विजोत्तमाः ।

भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च गौतमो नारदस्तथा ॥

विद्यास्तथान्तरिक्षं च वायुस्तेजो जलं मही ।

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ॥

प्रकृतिश्च विकारश्च यच्चान्यत् कारणं महत् ।

साङ्गोपाङ्गाश्च चत्वारो वेदा लोकपतिस्तथा ॥

नयाश्च क्रतवश्चैव सङ्कल्पः प्राण एव च ।

एते चान्ये च बहवः स्वयंभुवमुपासते ॥

अर्थो धर्मश्च कामश्च क्रोधो हर्षश्च नित्यशः ।

शुक्रो बृहस्पतिश्चैव संवर्त्तोऽथ बुधस्तथा ॥

शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः ।

मरुतो विश्वकर्मा च वसवश्च द्विजोत्तमाः ॥

दिवाकरश्च सोमश्च दिवा रात्रिस्तथैव च ।

अर्द्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् च संस्थिताः ॥

तां प्रविश्य सभां दिव्यां ब्रह्मणः सर्वकामिकाम् ।

कश्यपस्त्रिदशैः सार्द्धं पुत्रैर्धर्मभृतां वरः ॥

सर्वतेजोमयीं दिव्यां ब्रह्मर्षिगणसेविताम् ।

ब्राह्मया श्रिया सेव्यमानामचिन्त्यां विगतक्लमाम् ॥

ब्रह्माणं प्रेक्ष्य ते सर्वे परमासनमास्थितम् ।

शिरोभिः प्रणता देवं देवा ब्रह्मर्षिभिः सह ॥

ततः प्रणम्य चरणौ नियताः परमात्मनः । विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः शान्ता विगतकल्मषाः दृष्ट्वा तु तान् सुरान् सर्वान् कश्यपेन सहागतान् । आह ब्रह्मा महातेजा देवानां प्रभुरीश्वरः श्रीवामनपुराण [ अध्याय २५ रहे थे । द्विजोत्तमो! दक्ष, प्रचेता, पुलह, मरीचि, भृगु, २७ अत्रि, वसिष्ठ, गौतम और नारद एवं सभी विद्याएँ, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस २८ और गन्ध एवं प्रकृति, विकार, अन्यान्य महत् कारण, २ ९ अङ्गों एवं उपाङ्गोंके साथ चारों वेद और लोकपति, नीति, यज्ञ, संकल्प, प्राण – ये तथा अन्यान्य देव, ऋषि, ३० भूत तत्त्वादि ब्रह्माकी उपासना कर रहे थे । द्विजश्रेष्ठो! अर्थ, धर्म, काम, क्रोध, हर्ष, शुक्र, बृहस्पति, संवर्त्त, ३१ बुध, शनैश्चर और राहु आदि सभी ग्रह भी वहाँ ३२ यथास्थान बैठे थे । मरुद्गण, विश्वकर्मा, वसु, सूर्य, चन्द्रमा, दिन, रात्रि, पक्ष, मास तथा छः ऋतुएँ भी वहाँ ३३ उपस्थित थीं ॥ २६-३३ ॥ धार्मिकोंमें श्रेष्ठ कश्यपने अपने पुत्र देवताओंके ३४ साथ ब्रह्माकी उस सर्वमनोरथमयी, सर्वतेजोमयी, दिव्य एवं ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित तथा ब्रह्म- विचारमयी सरस्वती एवं लक्ष्मीसे सेवित अचिन्त्य तथा खिन्नता से रहित ३५ सभामें प्रवेश किया । तब उनके साथमें गये सभी देवताओंने श्रेष्ठ आसनपर विराजमान ब्रह्माजीको देखा ३६ और उन्हें ब्रह्मर्षियोंके साथ झुककर सिरसे प्रणाम किया । नियमका पालन करनेवाले वे सभी परमात्माके चरणों में प्रणाम करके सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर निर्मल ॥ ३७ एवं शान्त हो गये । ( फिर ) महान् तेजस्वी देवेश्वर ब्रह्माने | कश्यपके साथ आये हुए उन सभी देवताओंको देखकर ॥ ३८ | कहा- ॥ ३४-३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २४ ॥

पचीसवाँ अध्याय वामन - चरितके सन्दर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना ब्रह्मोवाच ब्रह्माने कहा – महाबलशाली देवगण! आपलोग यदर्थमिह संप्राप्ता भवन्तः सर्व एव हि । जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हैं, उसके विषयमें मैं चिन्तयाम्यहमप्यग्रे तदर्थं च महाबलाः ॥ १ पहलेसे ही सोच रहा हूँ । सुरश्रेष्ठ! आपलोगोंको जो भविष्यति च वः सर्वं काङ्क्षितं यत् सुरोत्तमाः । अभिलषित है, वह पूर्ण होकर रहेगा । दानवोंमें प्रधान बलेर्दानवमुख्यस्य योऽस्य जेता भविष्यति ॥ २ | बलिको पराजित करनेवाले एवं विश्वको रचनेवाले

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अध्याय २५ ] वामन - चरितके सन्दर्भमें ब्रह्माका

न केवलं सुरादीनां गतिर्मम स विश्वकृत् ।

त्रैलोक्यस्यापि नेता च देवानामपि स प्रभुः ॥

यः प्रभुः सर्वलोकानां विश्वेशश्च सनातनः ।

पूर्वजोऽयं सदाप्याहुरादिदेवं सनातनम् ॥

तं देवापि महात्मानं न विदुः कोऽप्यसाविति ।

देवानस्मान् श्रुतिं विश्वं स वेत्ति पुरुषोत्तमः ॥

तस्यैव तु प्रसादेन प्रवक्ष्ये परमां गतिम् ।

यत्र योगं समास्थाय तपश्चरति दुश्चरम् ॥

क्षीरोदस्योत्तरे कूले उदीच्यां दिशि विश्वकृत् ।

अमृतं नाम परमं स्थानमाहुर्मनीषिणः ॥

भवन्तस्तत्र वै गत्वा तपसा शंसितव्रताः ।

अमृतं स्थानमासाद्य तपश्चरत दुश्चरम् ॥

ततः श्रोष्यथ संघुष्टां स्निग्धगम्भीरनिःस्वनाम् ।

उष्णान्ते तोयदस्येव तोयपूर्णस्य निःस्वनम् ॥

रक्तां पुष्टाक्षरां रम्यामभयां सर्वदा शिवाम् ।

वाणीं परमसंस्कारां वदतां ब्रह्मवादिनाम् ॥

दिव्यां सत्यकरीं सत्यां सर्वकल्मषनाशिनीम् ।

सर्वदेवाधिदेवस्य ततोऽसौ भावितात्मनः ॥

तस्य व्रतसमाप्त्यां तु योगव्रतविसर्जने ।

अमोघं तस्य देवस्य विश्वतेजो महात्मनः ॥

कस्य किं वो वरं देवा ददामि वरदः स्थितः ।

स्वागतं वः सुरश्रेष्ठा मत्समीपमुपागताः ॥

उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना १२५ ( परमात्मा ) न केवल ( आप सब ) देवोंके, प्रत्युत ३ हमारे भी सहारे हैं । वे तीनों लोकोंके स्वामी तथा देवोंके भी शासक हैं । इन्हें ही सनातन आदिदेव भी ४ कहते हैं ॥ १-४ ॥ उन महान् आत्मा ( सनातन आदिदेव ) - को ५ देवता आदि कोई भी वास्तवरूपमें नहीं जानते कि वे कौन हैं; परंतु वे पुरुषोत्तम ( समस्त ) देवोंको, मुझे तथा श्रुति ( वेद ) एवं समस्त विश्वको जानते हैं ( संसारके समस्त क्रिया - कलाप उनकी जानकारीमें ही होते हैं; वे सर्वज्ञ हैं ) । उन्हींके कृपा - प्रसादसे ६ ( आपलोगोंको ) मैं अत्यन्त श्रेष्ठ उपाय बतलाता हूँ । ( आपलोग सुनें । ) आप सभी उत्तर दिशामें क्षीरसागरके उत्तरी तटपर स्थित उस स्थानपर जाइये जिसे विचारशील विद्वान् लोग ( अमृत ) नामसे उच्चारित ७ करते हैं । विश्वकी रचना करनेवाले ( परमात्मा ) वहीं योगधारणामें स्थित होकर कठिन तपस्या कर रहे हैं । आप सभी लोग उस अमृत नामक स्थानपर जायँ और आलस्यरहित होकर आपलोग भी लक्ष्यकी सिद्धिके ८ लिये वहाँ कठिन तपस्या प्रारम्भ कर दें॥५–८ ॥ ( जब आपलोग वहाँ जाकर कठिन तपस्या करने ९ लगेंगे ) तब ग्रीष्मके अन्तमें देवाधिदेवकी शब्दरूपिणी, स्निग्ध- गम्भीर ध्वनिवाली, प्रेमसे भरी हुई शुद्ध और स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त मनोहर एवं निर्भयताकी सूचना देनेवाली, सर्वदा मङ्गलमयी, उच्च स्वरसे अध्ययन १० करनेवाले ब्रह्मवादियोंकी वाणीके समान स्पष्ट, उत्तम संस्कारसे युक्त, दिव्य, सत्य - स्वरूपिणी, सत्यताकी ओर उन्मुख होनेके लिये प्रेरणा देनेवाली और पापोंको ११ नष्ट करनेवाली जलसे पूर्ण मेघके गर्जनके समान गम्भीर वाणीको सुनेंगे । उसके बाद भावितात्माके ( आत्मज्ञानसे परिपूर्ण महात्मा कश्यपके योगव्रतके अवसरपर ) व्रतकी समाप्ति हो जानेके बाद अमोघ तेजसे सम्पन्न वे देव १२ आपसे कहेंगे – सुरश्रेष्ठो! आपलोग मेरे पास आये, आपलोगों का स्वागत है । मैं ( आपलोगोंको ) वरदान देनेके लिये आप सबके समक्ष स्थित हूँ कहो - किसे १३ | कौन - सा वर दूँ ॥ ९ –१३ ॥

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१२६

ततोऽदितिः कश्यपश्च गृह्णीयातां वरं तदा ।

प्रणम्य शिरसा पादौ तस्मै देवाय धीमते ॥

भगवानेव नः पुत्रो भवत्विति प्रसीद नः ।

उक्तश्च परया वाचा तथाऽस्त्विति स वक्ष्यति ॥

देवा ब्रुवन्ति ते सर्वे कश्यपोऽदितिरेव च ।

तथास्त्विति सुराः सर्वे प्रणम्य शिरसा प्रभुम् ।

श्वेतद्वीपं समुद्दिश्य गताः सौम्यदिशं प्रति ॥

तेऽचिरेणैव संप्राप्ताः क्षीरोदं सरितां पतिम् ।

यथोद्दिष्टं भगवता ब्रह्मणा सत्यवादिना ॥

तेक्रान्ताः सागरान् सर्वान् पर्वतांश्च सकाननान् ।

नदीश्च विविधा दिव्याः पृथिव्यां ते सुरोत्तमाः ॥

अपश्यन्त तमो घोरं सर्वसत्त्वविवर्जितम् ।

अभास्करममर्यादं तमसा सर्वतो वृतम् ॥

अमृतं स्थानमासाद्य कश्यपेन महात्मना ।

दीक्षिताः कामदं दिव्यं व्रतं वर्षसहस्रकम् ॥

प्रसादार्थं सुरेशाय तस्मै योगाय धीमते ।

नारायणाय देवाय सहस्त्राक्षाय भूतये ॥

ब्रह्मचर्येण मौनेन स्थाने वीरासनेन च ।

क्रमेण च सुराः सर्वे तप उग्रं समास्थिताः ॥

कश्यपस्तत्र भगवान् प्रसादार्थं महात्मनः ।

उदीरयत वेदोक्तं यमाहुः परमं स्तवम् ॥

श्री वामनपुराण [ अध्याय २५ और, जब भगवान् इस प्रकार वरदान देनेके १४ लिये उपस्थित होंगे तथा अदिति एवं कश्यप उन प्रज्ञावान् प्रभुके चरणोंमें झुककर सिरसे प्रणाम और वरकी याचना करेंगे कि ' भगवान् ही हमारे पुत्र बनें; १५ इसके लिये आप हमारे ऊपर प्रसन्न हों ' तब वे ब्रह्मवाणीके द्वारा ' ऐसा ही हो ' - यह कहेंगे । ( इस प्रकार संकेत है - ) निर्देश पाकर कश्यप, अदिति एवं सभी देवताओंने ' ऐसा ही हो ' – यह कहकर प्रभु ( ब्रह्मा ) - को सिरसे प्रणाम किया और श्वेतद्वीपकी ओर १६ लक्ष्य करके उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया । वे अत्यन्त शीघ्रता से सत्यप्रवक्ता भगवान् ब्रह्माके द्वारा निर्दिष्ट की गयी व्यवस्थाके अनुसार क्षीरसागरके तटपर १७ पहुँच गये ॥ १४–१७ ॥ उन देववरोंने पृथ्वीके सभी समुद्रों, वनसे भरे १८ हुए पर्वतों एवं भाँति - भाँतिकी दिव्य नदियोंको पार किया । उसके बाद ( उसके आगे ) उन लोगोंने ऐसे स्थानको देखा जहाँ न कोई प्राणी था, न सूर्यका १ ९ प्रकाश ही था; प्रत्युत चारों ओर घनघोर अन्धकार था, जिसमें सीमा मालूम ही नहीं होती थी । इस प्रकारके उस ' अमृत ' नामक स्थानपर पहुँचकर महात्मा २० कश्यपने प्रज्ञा - सम्पन्न योगी, देवेश्वर, कल्याणकी मूर्ति, सहस्रचक्षु नारायणदेवकी प्रसन्नताकी प्राप्तिके उद्देश्यसे ( देवताओंको ) सहस्रवार्षिक ( हजारों वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले ) दिव्य ( देव - सम्बन्धी ) इच्छा पूर्ण करनेवाले २१ कामद - व्रतकी दीक्षा दी । फिर वे सभी देवता क्रमशः अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके और मौन धारणकर | उचित स्थानपर वीरासनसे बैठकर कठोर तपस्या करने २२ लगे । वहाँ भगवान् कश्यपने महात्मा विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये वेदमें कहे हुए स्तवका ( सूक्त या स्तोत्रका ) स्पष्ट वाणीमें पाठ किया, जिसे ' परमस्तव ' कहते २३ | हैं ॥ १८-२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५ ॥

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अध्याय २६ ] कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति १२७ छब्बीसवाँ अध्याय कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति कश्यप उवाच नमोऽस्तु ते देवदेव एकशृङ्ग वृषार्चे सिन्धुवृष वृषाकपे सुरवृष अनादिसम्भव रुद्र कपिल विष्वक्सेन सर्वभूतपते ध्रुव धर्माधर्म वैकुण्ठ वृषावर्त्त अनादिमध्यनिधन धनञ्जय शुचिश्रवः पृश्नितेजः निजजय अमृतेशय सनातन त्रिधाम तुषित महातत्त्व लोकनाथ पद्मनाभ विरिञ्चे बहुरूप अक्षय अक्षर हव्यभुज खण्डपरशो शक्र मुञ्जकेश हंस महादक्षिण हृषीकेश सूक्ष्म महानियमधर विरज लोकप्रतिष्ठ अरूप अग्रज धर्मज धर्मनाभ गभस्तिनाभ शतक्रतुनाभ चन्द्ररथ सूर्यतेजः समुद्रवासः अजः सहस्त्रशिरः सहस्रपाद अधोमुख महापुरुष पुरुषोत्तम सहस्त्रबाहो सहस्रमूर्ते सहस्त्रास्य सहस्त्रसम्भव सहस्रसत्त्वं त्वामाहुः । पुष्पहास चरम त्वमेव वौषट् वषट्कारं त्वामाहुरग्र्यं मखेषु प्राशितारं सहस्त्रधारं च भूश्च भुवश्च स्वश्च त्वमेव वेदवेद्य ब्रह्मशय ब्राह्मणप्रिय त्वमेव द्यौरसि मातरिश्वाऽसि धर्मोऽसि होता पोता मन्ता नेता होमहेतुस्त्वमेव अग्रय विश्वधाम्ना त्वमेव दिग्भिः सुभाण्ड इज्योऽसि सुमेधोऽसि समिधस्त्वमेव मतिर्गतिर्दाता त्वमसि । मोक्षोऽसि योगोऽसि । सृजसि । धाता परमयज्ञोऽसि सोमोऽसि दीक्षितोऽसि दक्षिणाऽसि विश्वमसि ॥ स्थविर हिरण्यनाभ नारायण त्रिनयन आदित्यवर्ण आदित्यतेजः महापुरुष पुरुषोत्तम आदिदेव सुविक्रम प्रभाकर शम्भो स्वयम्भो भूतादिः महाभूतोऽसि विश्वभूत विश्वं त्वमेव विश्वगोप्ताऽसि पवित्रमसि कश्यपने कहा- हे देवदेव, एकशृङ्ग, वृषार्चि, सिन्धुवृष, वृषाकपि, सुरवृष, अनादिसम्भव, रुद्र, कपिल, विष्वक्सेन, सर्वभूतपति ( सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी ), ध्रुव, धर्माधर्म, वैकुण्ठ, वृषावर्त्त, अनादिमध्यनिधन, धनञ्जय, शुचिश्रव, पृश्नितेज, निजजय, अमृतेशय, सनातन, त्रिधाम, तुषित, महातत्त्व, लोकनाथ, पद्मनाभ, विरिञ्चि, बहुरूप, अक्षय, अक्षर, हव्यभुज, खण्डपरशु, शक्र, मुञ्जकेश, हंस, महादक्षिण, हृषीकेश, सूक्ष्म, महानियमधर, विरज, लोकप्रतिष्ठ, अरूप, अग्रज, धर्मज, धर्मनाभ, गभस्तिनाभ, शतक्रतुनाभ, चन्द्ररथ, सूर्यतेज, समुद्रवास, अज, सहस्रशिर, सहस्रपाद, अधोमुख, महापुरुष, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रास्य, सहस्रसम्भव! मेरा आपके चरणों में नमस्कार है । ( आपके भक्तजन ) आपको सहस्रसत्त्व कहते हैं । ( खिले हुए पुष्पके समान मधुर मुसकानवाले ) पुष्पहास, चरम ( सर्वोत्तम )! लोग आपको ही वौषट् एवं वषट्कार कहते हैं । आप ही अग्र्य, ( सर्वश्रेष्ठ ) यज्ञोंमें प्राशिता ( भोक्ता ) हैं; सहस्रधार, भूः भुवः एवं स्व: हैं । आप ही वेदवेद्य ( वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य ), ब्रह्मशय, ब्राह्मणप्रिय ( अग्निके प्रेमी ), द्यौः ( आकाशके समान सर्वव्यापी ), मातरिश्वा ( वायुके समान गतिमान् ), धर्म, होता, पोता ( विष्णु ), मन्ता, नेता एवं होमके हेतु हैं । आप ही विश्वतेजके द्वारा अग्र्य ( सर्वश्रेष्ठ ) हैं और दिशाओंके द्वारा सुभाण्ड ( विस्तृत पात्ररूप ) हैं अर्थात् दिशाएँ आपमें समाविष्ट हैं । आप ( यजन करनेयोग्य ) इज्य, सुमेध, समिधा, मति, गति एवं दाता हैं । आप ही मोक्ष, योग, स्रष्टा ( सृष्टि करनेवाले ), धाता ( धारण और पोषण करनेवाले ), परमयज्ञ, सोम, दीक्षित, दक्षिणा एवं विश्व हैं । आप ही स्थविर, हिरण्यनाभ, नारायण, त्रिनयन, आदित्यवर्ण, आदित्यतेज, महापुरुष, पुरुषोत्तम, आदिदेव, सुविक्रम, प्रभाकर, शम्भु, स्वयम्भू, भूतादि, महाभूत, विश्वभूत एवं विश्व हैं । आप ही

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१२८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २७ विश्वभव ऊर्ध्वकर्म अमृत दिवस्पते वाचस्पते घृतार्चे | संसारकी रक्षा करनेवाले, पवित्र, विश्वभव – विश्वकी अनन्तकर्म वंश प्राग्वंश विश्वपातस्त्वमेव । वरार्थिनां वरदोऽ त्वम् ।

चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च ।

हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तुम्भं होत्रात्मने नमः ॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सृष्टि करनेवाले, ऊर्ध्वकर्म ( उत्तमकर्मा ), अमृत ( कभी भी मृत्युको न प्राप्त होनेवाले ), दिवस्पति, वाचस्पति, घृतार्चि, अनन्तकर्म, वंश, प्राग्वंश, विश्वपा ( विश्वका पालन करनेवाले ) तथा वरद - वर चाहनेवालोंके लिये वरदानी हैं । चार ( आश्रावय ), चार ( अस्तु श्रौषड् ), दो ( यज ) तथा पाँच ( ये यजामहे ) और पुन: दो ( वषट् ) अक्षरों - इस प्रकार ४ + ४ + २ + ५ + २ = १७ अक्षरोंसे - जिसके लिये अग्निहोत्र किया जाता है, उन १ आप होत्रात्माको नमस्कार है ॥ १ ॥

छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २६ ॥

सत्ताईसवाँ अध्याय भगवान् नारायणसे देवों और और लोमहर्षण उवाच

नारायणस्तु भगवाञ्छ्रुत्वैवं परमं स्तवम् ।

ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम् ॥

उवाच वचनं सम्यक् तुष्टः पुष्टपदाक्षरम् ।

श्रीमान् प्रीतमना देवो यद्वदेत् प्रभुरीश्वरः ॥

वरं वृणुध्वं भद्रं वो वरदोऽस्मि सुरोत्तमाः । कश्यप उवाच प्रीतोऽसि नः सुरश्रेष्ठ सर्वेषामेव निश्चयः वासवस्यानुजो भ्राता ज्ञातीनां नन्दिवर्धनः । अदित्या अपि च श्रीमान् भगवानस्तु वै सुतः अदितिर्देवमाता च एतमेवार्थमुत्तमम् पुत्रार्थं वरदं प्राह भगवन्तं वरार्थिनी कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या प्रभुसे प्रार्थना लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी द्विजश्रेष्ठ कश्यपने विष्णुकी उत्तम स्तुति की; उसे सुनकर प्रसन्न १ होकर सामर्थ्यशाली एवं ऐश्वर्यसम्पन्न नारायणने अत्यन्त संतुष्ट होकर प्रसन्न मनसे सुसंस्कृत शब्दों एवं अक्षरोंवाला समयानुकूल उचित वचन कहा— श्रेष्ठ देवताओ! वर २ माँगो । तुम सबका कल्याण हो; मैं तुम लोगोंको ( इच्छित ) वर दूँगा ॥२ ॥

कश्यपने कहा - सुरश्रेष्ठ! यदि आप हम सबपर ॥ ३ प्रसन्न हैं तो हम सभीका यह निश्चय है कि श्रीमान् भगवान् आप स्वयं इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिके कुटुम्बियोंके आनन्द बढ़ानेवाले पुत्र बनें । वरकी याचना ॥ ४ करनेवाली देवमाता अदितिने भी वरदानी भगवान्से । पुत्र की प्राप्तिके लिये अपने इस उत्तम अभिप्रायको ॥ ५ प्रकट किया - कहा ॥ ३-५ ॥

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अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १२ ९ देवा ऊचुः

निःश्रेयसार्थं सर्वेषां दैवतानां महेश्वर ।

त्राता भर्त्ता च दाता च शरणं भव नः सदा ॥

ततस्तानब्रवीद्विष्णुर्देवान् कश्यपमेव च ।

सर्वेषामेव युष्माकं ये भविष्यन्ति शत्रवः ।

मुहूर्त्तमपि ते सर्वे न स्थास्यन्ति ममाग्रतः ॥

हत्वाऽसुरगणान् सर्वान् यज्ञभागाग्रभोजिनः ।

हव्यादांश्च सुरान् सर्वान् कव्यादांश्च पितॄनपि ॥

करिष्ये विबुधश्रेष्ठाः पारमेष्ठ्येन कर्मणा ।

यथायातेन मार्गेण निवर्तध्वं सुरोत्तमाः ॥

लोमहर्षण उवाच

एवमुक्ते तु देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना ।

ततः प्रहृष्टमनसः पूजयन्ति स्म तं प्रभुम् ॥

विश्वेदेवा महात्मानः कश्यपोऽदितिरेव च ।

नमस्कृत्य सुरेशाय तस्मै देवाय रंहसा ॥

प्रयाताः प्राग्दिशं सर्वे विपुलं कश्यपाश्रमम् ।

ते कश्यपाश्रमं गत्वा कुरुक्षेत्रवनं महत् ॥

प्रसाद्य ह्यदितिं तत्र तपसे तां न्ययोजयन् ।

सा चचार तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा ॥

तस्या नाम्ना वनं दिव्यं सर्वकामप्रदं शुभम् । आराधनाय कृष्णस्य वाग्जिता वायुभोजना । दैत्यैर्निराकृतान् दृष्ट्वा तनयानृषिसत्तमाः ।

वृथापुत्राऽहमिति सा निर्वेदात् प्रणयाद्धरिम् ।

तुष्टाव वाग्भिरग्र्याभिः परमार्थावबोधिनी ॥

शरण्यं शरणं विष्णुं प्रणता भक्तवत्सलम् ।

देवदैत्यमयं चादिमध्यमान्तस्वरूपिणम् ॥

[ अदितिके अभिप्रायको जानकर ] देवताओंने कहा— महेश्वर! सभी देवताओंके परम कल्याणके ६ लिये आप हम सबकी सदा रक्षा करनेवाले, पालन-पोषण करनेवाले, दान देनेवाले एवं आश्रय बनें । इसके बाद भगवान् विष्णुने उन देवताओंसे तथा कश्यपसे कहा कि आप सभीके जितने भी शत्रु होंगे वे सभी मेरे ७ सम्मुख क्षणमात्र भी नहीं टिक सकेंगे । देवश्रेष्ठो! परमेष्ठी ( ब्रह्मा ) - के द्वारा विधान किये गये कर्मोंके द्वारा मैं समस्त असुरोंको मारकर देवताओंको यज्ञभागके सर्व-८ प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले अधिकारी एवं हव्यभोक्ता और पितरोंको कव्यभोक्ता बनाऊँगा । सुरोत्तमो! अब आपलोग जिस मार्गसे आये हैं, फिर उसी मार्गसे वापस ९ लौट जायँ ॥ ६ - ९ ॥ लोमहर्षणने कहा— प्रभावशाली भगवान् विष्णुने जब ऐसा कहा तब महात्मा देवगण, कश्यप एवं १० अदितिने प्रसन्नचित्तसे उन प्रभुका पूजन किया एवं | देवेश्वरको नमस्कार करनेके बाद पूर्व दिशामें स्थित ११ कश्यपके विस्तृत आश्रमकी ओर शीघ्रतासे चल पड़े । जब देवगण कुरुक्षेत्र - वनमें स्थित महान् आश्रममें पहुँचे १२ तब लोगोंने अदितिको प्रसन्नकर उसे तपस्या करनेके लिये प्रेरित किया । ( फिर ) उसने दस हजार वर्षोंतक

१३ वहाँ कठिन तपस्या की । १० - १३ ॥

श्रेष्ठ ऋषियो! ( जिस वनमें अदितिने तप किया ) १४ । उस दिव्य वनका नाम उसके नामपर अदितिवन पड़ा । वह समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला एवं मङ्गलकारी है । ऋषिश्रेष्ठो! परम अर्थको जाननेवाली ( तत्त्वज्ञा ) अदितिने अपने पुत्रोंको दैत्योंके द्वारा अपमानित देखा; उसने सोचा कि तब मेरा पुत्रका जनना ही व्यर्थ है; इसलिये अपनी वाणीको संयतकर; हवा पीकर नम्रतापूर्वक १५ शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले, भक्तजनप्रिय, देवताओं और दैत्योंके मूर्तिस्वरूप, आदि - मध्य और अन्त रूपमें रहनेवाले भगवान् श्रीविष्णुकी प्रसन्नताके लिये उनकी सत्य एवं मधुर वाणियोंसे उत्तम स्तुति करना १६ | प्रारम्भ कर दिया ॥ १४- १६ ॥

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१३० श्रीवामनपुराण [ अध्याय २७ अदितिरुवाच

नमः कृत्यार्तिनाशाय नमः पुष्करमालिने ।

नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे ॥

नमः पङ्कजनेत्राय नमः पङ्कजनाभये ।

नमः पङ्कजसंभूतिसंभवायात्मयोनये ॥

श्रियः कान्ताय दान्ताय दान्तदृश्याय चक्रिणे ।

नमः पद्मासिहस्ताय नमः कनकरेतसे ॥

तथात्मज्ञानयज्ञाय योगिचिन्त्याय योगिने ।

निर्गुणाय विशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे ॥

जगच्च तिष्ठते यत्र जगतो यो न दृश्यते ।

नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शार्ङ्गिणे ॥

यं न पश्यन्ति पश्यन्तो जगदप्यखिलं नराः ।

अपश्यद्भिर्जगद्यश्च दृश्यते हृदि संस्थितः ॥

बहिर्ज्योतिरलक्ष्यो यो लक्ष्यते ज्योतिषः परः ।

यस्मिन्नेव यतश्चैव यस्यैतदखिलं जगत् ॥

तस्मै समस्तजगताममराय नमो नमः ।

आद्यः प्रजापतिः सोऽपि पितॄणां परमं पतिः ।

पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे ॥

यः प्रवृत्तैर्निवृत्तैश्च कर्मभिस्तु विरज्यते ।

स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते ॥

अदिति बोलीं- कृत्यासे उत्पन्न दुःखका नाश करनेवाले प्रभुको नमस्कार है । कमलकी मालाको १७ धारण करनेवाले पुष्करमाली भगवान्‌को नमस्कार है । परम मङ्गलकारी, कल्याणस्वरूप आदिविधाता प्रभो! आपको नमस्कार है । कमलनयन! आपको नमस्कार है । पद्मनाभ! आपको नमस्कार है । ब्रह्माकी उत्पत्तिके १८ स्थान, आत्मजन्मा! आपको नमस्कार है । प्रभो! आप लक्ष्मीपति, इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, संयमियोंके द्वारा दर्शन पाने योग्य, हाथमें सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले एवं खड्ग ( तलवार ) धारण करते हैं; १ ९ आपको नमस्कार है । स्वामिन्! आत्मज्ञानके द्वारा यज्ञ करनेवाले, योगियोंके द्वारा ध्यान करने योग्य, योगकी साधना करनेवाले योगी, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणसे रहित किंतु ( दयादि ) विशिष्ट गुणोंसे युक्त ब्रह्मरूपी २० श्रीहरि भगवान्‌को नमस्कार है ॥ १७–२० ॥ जिन आप परमेश्वरमें सारा संसार स्थित है, किंतु २१ जो संसारसे दृश्य नहीं हैं, ऐसे स्थूल तथा अतिसूक्ष्म । आप शार्ङ्गधारी देवको नमस्कार है । सम्पूर्ण जगत्की अपेक्षा करनेवाले प्राणी जिन आपके दर्शनसे वञ्चित रहते हैं, आपका वे दर्शन नहीं कर पाते, परंतु जिन्होंने २२ जगत्की अपेक्षा नहीं की, उन्हें आप उनके हृदयमें स्थित दीखते हैं । आपकी ज्योति बाहर है एवं अलक्ष्य सर्वोत्तम ज्योति है; यह सारा जगत् आपमें स्थित है, २३ | आपसे उत्पन्न होता है और आपका ही है, जगत्के देवता उन आपको नमस्कार । जो आप सबके आदिमें प्रजापति रहे हैं एवं पितरोंके श्रेष्ठ स्वामी हैं, देवताओंके स्वामी हैं; उन आप श्रीकृष्णको बार - बार २४ नमस्कार है ॥ २१ - २४ ॥ जो प्रवृत्त एवं निवृत्त कर्मोंसे विरक्त तथा स्वर्ग और मोक्षके फलके देनेवाले हैं, उन गदा २५ । धारण करनेवाले भगवान्‌को नमस्कार है । जो