वामन पुराण — पृष्ठ 141–150
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150
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अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी
यस्तु संचिन्त्यमानोऽपि सर्वं पापं व्यपोहति ।
नमस्तस्मै विशुद्धाय परस्मै हरिमेधसे ॥ २६
ये पश्यन्त्यखिलाधारमीशानमजमव्ययम् ।
न पुनर्जन्ममरणं प्राप्नुवन्ति नमामि तम् ॥ २७
यो यज्ञो यज्ञपरमैरिज्यते यज्ञसंस्थितः ।
तं यज्ञपुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम् ॥ २८ ।
गीयते सर्ववेदेषु वेदविद्भिर्विदां गतिः ।
यस्तस्मै वेदवेद्याय नित्याय विष्णवे नमः ॥ २ ९
यतो विश्वं समुद्भूतं यस्मिन् प्रलयमेष्यति ।
विश्वोद्भवप्रतिष्ठाय नमस्तस्मै महात्मने ॥ ३०
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं व्याप्तं येन चराचरम् ।
मायाजालसमुन्नद्धं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३१ ।
योऽत्र तोयस्वरूपस्थो बिभर्त्यखिलमीश्वरः ।
विश्वं विश्वपतिं विष्णुं तं नमामि प्रजापतिम् ॥ ३२
मूर्त्तं तमोऽसुरमयं तद्विधो विनिहन्ति यः ।
रात्रिजं सूर्यरूपी च तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३३
यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम् ।
पश्यतः कर्म सततं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् ॥ ३४
यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्वं सत्यमेतन्मयोदितम् ।
नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाव्ययम् ॥ ३५
यद्येतत्सत्यमुक्तं मे भूयश्चातो जनार्दन ।
सत्येन तेन सकलाः पूर्यन्तां मे मनोरथाः ॥ ३६ ।
प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १३१ स्मरण करनेवालेके सारे पाप नष्ट कर देते हैं, उन विशुद्ध हरिमेधाको मेरा नमस्कार है । जो प्राणी अविनाशी भगवान्को अखिलाधार, ईशान एवं अजके रूपमें देखते हैं, वे कभी भी जन्म - मरणको नहीं प्राप्त होते । प्रभो! मैं आपको प्रणाम करती हूँ । आपकी आराधना यज्ञोंद्वारा होती है, आप यज्ञकी मूर्ति हैं, यज्ञमें आपकी स्थिति है; यज्ञपुरुष! आप ईश्वर, प्रभु विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ ॥ २५–२८ ॥ वेदोंमें आपका गुणगान हुआ है - इसे वेदज्ञ गाते 1 आप विद्वज्जनोंके आश्रय हैं, वेदोंसे जानने योग्य एवं नित्यस्वरूप हैं; आप विष्णुको मेरा नमस्कार है । विश्व जिनसे समुद्भूत हुआ है और जिनमें विलीन होगा तथा जो विश्वके उद्भव एवं प्रतिष्ठाके स्वरूप हैं, उन महान् आत्मा ( परमात्मा ) - को मेरा नमस्कार है । जिनके द्वारा मायाजालसे बँधा हुआ ब्रह्मासे लेकर चराचर ( विश्व ) व्याप्त है, उन उपेन्द्र-भगवान्को मैं नमस्कार करती हूँ । जो ईश्वर जल-स्वरूपमें स्थित होकर अखिल विश्वका भरण करते हैं, उन विश्वपति एवं प्रजापति विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ ॥२ ९ –३२ ॥ जो सूर्यरूपी उपेन्द्र असुरमय रात्रिसे उत्पन्न, रूपधारी तमका विनाश करते हैं, मैं उनको प्रणाम करती हूँ । जिनकी सूर्य तथा चन्द्रमा - रूप दोनों आँखें समस्त लोकोंके शुभाशुभ कर्मोंको सतत देखती रहती हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ । जिन सर्वेश्वरके विषयमें मेरा यह समस्त उद्गार सत्य है - असत्य नहीं है, उन अजन्मा, अव्यय एवं स्रष्टा विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ । हे जनार्दन! यदि मैंने यह सत्य कहा है तो उस सत्यके प्रभावसे मेरे मनकी सारी अभिलाषाएँ परिपूर्ण हों ॥ ३३–३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २७ ॥
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१३२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २८ अट्ठाईसवाँ अध्याय अदितिकी प्रार्थनापर भगवान्का प्रकट होना तथा भगवान्का अदितिको वर देना लोमहर्षण उवाच
एवं स्तुतोऽथ भगवान् वासुदेव उवाच ताम् ।
अदृश्यः सर्वभूतानां तस्याः संदर्शने स्थितः ॥
श्रीभगवानुवाच
मनोरथांस्त्वमदिते यानिच्छस्यभिवाञ्छितान् ।
तांस्त्वं प्राप्स्यसि धर्मज्ञे मत्प्रसादान्न संशयः ॥
शृणु त्वं च महाभागे वरो यस्ते हृदि स्थितः ।
मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचिद् भविष्यति ॥
यश्चेह त्वद्वने स्थित्वा त्रिरात्रं वै करिष्यति ।
सर्वे कामाः समृध्यन्ते मनसा यानिहेच्छति ॥
दूरस्थोऽपि वनं यस्तु अदित्याः स्मरते नरः ।
सोऽपि याति परं स्थानं किं पुनर्निवसन् नरः ॥
यश्चेह ब्राह्मणान् पञ्च त्रीन् वा द्वावेकमेव वा ।
भोजयेच्छ्रद्धया युक्तः स याति परमां गतिम् ॥
अदितिरुवाच
यदि देव प्रसन्नस्त्वं भक्त्या मे भक्तवत्सल ।
त्रैलोक्याधिपतिः पुत्रस्तदस्तु मम वासवः ॥
हृतं राज्यं हृतश्चास्य यज्ञभाग इहासुरैः ।
त्वयि प्रसन्ने वरद तत् प्राप्नोतु सुतो मम ॥
हृतं राज्यं न दुःखाय मम पुत्रस्य केशव ।
प्रपन्नदायविभ्रंशो बाधां मे कुरुते हृदि ॥
श्रीभगवानुवाच
कृतः प्रसादो हि मया तव देवि यथेप्सितम् ।
स्वांशेन चैव ते गर्भे सम्भविष्यामि कश्यपात् ॥
लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार स्तुति किये जानेपर समस्त प्राणियोंके दृष्टि- पथमें न आनेवाले भगवान् वासुदेव उसके सामने प्रकट हुए और उससे १ ( इस प्रकार ) बोले – ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले- धर्मज्ञे ( धर्मके मर्मको जाननेवाली ) अदिति! तुम मुझसे जिन मनचाही कामनाओंकी पूर्ति चाहती हो, उन्हें तुम मेरी कृपासे २ प्राप्त करोगी, इसमें कोई संदेह नहीं । महाभागे! सुनो, तुम्हारे मनमें जिन वरोंकी इच्छा उन्हें तुम मुझसे ३ माँगो; क्योंकि मेरे दर्शन करनेका फल कभी व्यर्थ नहीं होता । तुम्हारे इस ( अदिति ) वनमें रहकर जो तीन रातोंतक निवास करेगा, उसकी सभी मनचाही ४ कामनाएँ पूरी होंगी । जो मनुष्य दूर देशमें स्थित रहकर भी तुम्हारे इस वनका स्मरण करेगा, वह परम धामको प्राप्त कर लेगा । फिर यहाँ रहनेवाले मनुष्यको परम ५ धामकी प्राप्ति हो जाय, इसमें क्या आश्चर्य? जो मानव इस स्थानपर पाँच, तीन अथवा दो या एक ही ब्राह्मणको श्रद्धापूर्वक भोजन करायेगा, वह उत्तम गति ६ ( मोक्ष ) को प्राप्त करेगा ॥२-६ ॥ अदितिने कहा- भक्तवत्सल देव! यदि आप मेरी भक्ति मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र इन्द्र तीनों लोकोंका स्वामी हो जाय । असुरोंने उसके राज्यको तथा ७ यज्ञमें मिलनेवाले भागको छीन लिया है । अतः वरदाता प्रभो! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र उसे ८ ( राज्यको ) प्राप्त कर ले । केशव! मेरे पुत्रके राज्यके असुरोंद्वारा छीने जानेका मुझे दुःख नहीं है, किंतु ( उसके ) प्राप्त होनेवाले उचित भागका छिन जाना मेरे ९ हृदयको कुरेद रहा है ॥७ – ९ ॥ श्रीभगवान् बोले- देवि! तुम्हारी इच्छाके अनुकूल मैंने तुम्हारे ऊपर कृपा प्रसाद प्रकट किया है । ( सुनो, ) १० | कश्यपसे तुम्हारे गर्भमें मैं अपने अंशसे जन्म लूँगा और
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अध्याय २ ९ ] बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन १३३
तव गर्भे समुद्भूतस्ततस्ते ये त्वरातयः ।
तानहं च हनिष्यामि निवृत्ता भव नन्दिनि ॥
अदितिरुवाच प्रसीद देवदेवेश नमस्ते विश्वभावन ।
नाहं त्वामुदरे वोढुमीश शक्ष्यामि केशव ।
यस्मिन् प्रतिष्ठितं सर्वं विश्वयोनिस्त्वमीश्वरः ॥
श्रीभगवानुवाच
अहं त्वां च वहिष्यामि आत्मानं चैव नन्दिनि ।
न च पीडां करिष्यामि स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥
इत्युक्त्वान्तर्हिते देवेऽदितिर्गर्भं समादधे ।
गर्भस्थिते ततः कृष्णे चचाल सकला क्षितिः ।
चकम्पिरे महाशैला जग्मुः क्षोभं महाब्धयः ॥
यतो यतोऽदितिर्याति ददाति पदमुत्तमम् ।
ततस्ततः क्षितिः खेदान्ननाम द्विजपुंगवाः ॥।
दैत्यानामपि सर्वेषां गर्भस्थे मधुसूदने ।
बभूव तेजसो हानिर्यथोक्तं परमेष्ठिना ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तुम्हारी कोख से जन्म लेकर फिर तुम्हारे जितने शत्रु हैं, उन ( सभी ) - का वध करूँगा । नन्दिनि! तुम शोक ११ छोड़कर स्वस्थ हो जाओ ॥ १०-११ ॥ अदितिने कहा- देवदेवेश! आप ( मुझपर ) प्रसन्न हों । विश्वभावन! आपको मेरा नमस्कार है । हे केशव! श! आप विश्व उत्पत्ति स्थान और ईश्वर हैं । जिन आप प्रभु सारा संसार प्रतिष्ठित है, उन आपके भारको १२ मैं अपनी कोखमें वहन न कर सकूँगी ॥ १२ ॥
श्रीभगवान्ने कहा- नन्दिनि! मैं स्वयं अपना और तुम्हारा – दोनोंका भार वहन कर लूँगा; मैं १३ तुम्हें पीड़ा नहीं करूँगा । तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ । यह कहकर भगवान्के चले जानेपर अदितिने गर्भको धारण कर लिया । भगवान् ( कृष्ण ) -के गर्भमें आ जानेपर सारी पृथ्वी डगमगा गयी । बड़े-१४ | बड़े पर्वत हिलने लगे एवं विशाल समुद्र विक्षुब्ध हो गये । द्विजश्रेष्ठो! अदिति जहाँ - जहाँ जाती या पैर रखती थीं, वहाँ - वहाँकी पृथ्वी खेद ( भार ) - के कारण झुक १५ जाती थी । जैसा कि ब्रह्माने ( पहले ) बतलाया था, मधुसूदनके गर्भ में आनेपर सभी दैत्योंके तेजकी हानि १६ | हो गयी ॥ १३ – १६ ॥ अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २८ ॥
उन्तीसवाँ अध्याय बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, प्रह्लादका अदितिके गर्भमें वामनागमन एवं विष्णु - महिमाका कथन तथा स्तवन लोमहर्षण उवाच लोमहर्षण बोले- उसके बाद ( दैत्योंके तेजके निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा समस्तानसुरेश्वरः । समाप्त हो जानेपर ) असुरराज बलिने समस्त असुरोंको प्रह्लादमथ पप्रच्छ बलिरात्मपितामहम् ॥ १ श्रीहीन देखकर अपने पितामह प्रह्लादजीसे पूछा – ॥ १ ॥
बलिने कहा - तात! ( इस समय ) दैत्यलोग बलिरुवाच आगसे झुलसे हुए - से कान्तिहीन हो गये हैं । आज ये तात निस्तेजसो दैत्या निर्दग्धा इव वह्निना । ऐसे क्यों हो गये हैं? प्रतीत होता है कि मानो इन्हें किमेते सहसैवाद्य ब्रह्मदण्डहता इव ॥ २ ब्राह्मणका अभिशाप लग गया है- ये ब्रह्मदण्डसे जैसे
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दुरिष्टं किं तु दैत्यानां किं कृत्या विधिनिर्मिता ।
नाशायैषां समुद्भूता येन निस्तेजसोऽसुराः ॥
लोमहर्षण उवाच
इत्यसुरवरस्तेन पृष्टः पौत्रेण ब्राह्मणाः ।
चिरं ध्यात्वा जगादेदमसुरं तं तदा बलिम् ॥
प्रह्लाद उवाच
चलन्ति गिरयो भूमिर्जहाति सहसा धृतिम् ।
सद्यः समुद्राः क्षुभिता दैत्या निस्तेजसः कृताः ॥
सूर्योदये यथा पूर्वं तथा गच्छन्ति न ग्रहाः ।
देवानां च परा लक्ष्मीः कारणेनानुमीयते ॥
महदेतन्महाबाहो कारणं दानवेश्वर ।
न ह्यल्पमिति मन्तव्यं त्वया कार्यं कथंचन ॥
लोमहर्षण उवाच
इत्युक्त्वा दानवपतिं प्रह्लादः सोऽसुरोत्तमः ।
अत्यर्थभक्तो देवेशं जगाम मनसा हरिम् ॥
स ध्यानपथगं कृत्वा प्रह्लादश्च मनोऽसुरः ।
विचारयामास ततो यथा देवो जनार्दनः ॥
स ददर्शोदरेऽदित्याः प्रह्लादो वामनाकृतिम् । तदन्तश्च वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा
साध्यान् विश्वे तथादित्यान् गन्धर्वोरगराक्षसान् ।
विरोचनं च तनयं बलिं चासुरनायकम् ॥
जम्भं कुजम्भं नरकं बाणमन्यांस्तथासुरान् ।
आत्मानमुर्वीं गगनं वायुं वारि हुताशनम् ॥
समुद्राद्रिसरिद्वीपान् सरांसि च पशून् महीम् । वयोमनुष्यानखिलांस्तथैव च सरीसृपान् समस्तलोकस्त्रष्टारं ब्रह्माणं भवमेव च । ग्रहनक्षत्रताराश्च दक्षाद्यांश्च प्रजापतीन् सम्पश्यन् विस्मयाविष्टः प्रकृतिस्थः क्षणात् पुनः । प्रह्लादः प्राह दैत्येन्द्रं बलिं वैरोचनिं ततः श्रीवामनपुराण [ अध्याय २ ९ पीड़ित हो गये हैं! क्या दैत्योंका कोई अशुभ होनेवाला है? अथवा इनके नाशके लिये ब्रह्माने कृत्या ( पुरश्चरणसे ३ उत्पन्न की गयी मारिकाशक्ति ) - को उत्पन्न कर दिया है, जिससे ये असुरलोग इस प्रकार तेजसे रहित हो गये हैं ॥ २-३ ॥ लोमहर्षण बोले- ब्राह्मणो! अपने पौत्र ( पुत्रके पुत्र ) राजा बलिके इस प्रकार पूछनेपर ४ दैत्योंमें प्रधान प्रह्लादने देरतक ध्यान करके तब असुर बलिसे कहा - ॥४ ॥
प्रह्लादने कहा- दानवाधिप! इस समय पहाड़ डगमगा रहे हैं, पृथ्वी एकाएक अपनी ( स्वाभाविक ) ५ धीरता छोड़ रही है, समुद्रमें जोरोंकी लहरें उठ रही हैं और दैत्य तेजसे रहित हो गये हैं । सूर्योदय होनेपर अब पहलेके समान ग्रहोंकी चाल नहीं दीखती है । इन कारणों ( लक्षणों ) से अनुमान होता है कि देवताओंका ६ अभ्युदय होनेवाला है । महाबाहु! दानवेश्वर! यह कोई विशेष कारण अवश्य है । इस कारणको छोटा नहीं मानना चाहिये और आपको इसका कोई प्रतियत्न ७ ( उपाय ) करना चाहिये ॥ ५–७ ॥ लोमहर्षणने कहा- असुरोंमें श्रेष्ठ महान् भक्त प्रह्लादने दैत्यराज बलिसे इस प्रकार कहकर मनसे ८ श्रीहरिका ध्यान किया । असुर प्रह्लादने अपने मनको भगवान्के ध्यान- पथमें लगाकर चिन्तन किया – जैसा ९ कि भगवान्का स्वरूप है । उन्होंने उस समय ( चिन्तन करते समय ) अदितिकी कोखमें वामनके रूपमें भगवान्को देखा । उनके भीतर वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों, ॥ १० मरुतों, साध्यों, विश्वेदेवों, आदित्यों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों तथा अपने पुत्र विरोचन एवं असुरनायक बलि, ११ जम्भ, कुजम्भ, नरक, बाण तथा इस प्रकारके दूसरे बहुत - से असुरों एवं अपनेको और पृथ्वी, आकाश, १२ वायु, जल, अग्नि, समुद्रों, पर्वतों, नदियों, द्वीपों, सरों, पशुओं, भूसम्पत्तियों, पक्षियों, सम्पूर्ण मनुष्यों, सरकनेवाले ॥ १३ जीवों, समस्त लोकोंके स्रष्टा ब्रह्मा, शिव, ग्रहों, नक्षत्रों, ताराओं तथा दक्ष आदि प्रजापतियोंको भी देखा । प्रह्लाद ॥ १४ इन्हें देखकर आश्चर्यमें पड़ गये, किंतु क्षणमात्रमें ही पुनः पूर्ववत् प्रकृतिस्थ हो गये और विरोचन - पुत्र दैत्योंके ॥ १५ । राजा बलिसे बोले – ॥८–१५ ॥
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अध्याय २ ९ ] बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, अदितिके गर्भमें वामनागमन १३५
तत्संज्ञातं मया सर्वं यदर्थं भवतामियम् ।
तेजसो हानिरुत्पन्ना शृण्वन्तु तदशेषतः ॥
देवदेवो जगद्योनिरयोनिर्जगदादिजः ।
अनादिरादिर्विश्वस्य वरेण्यो वरदो हरिः ॥
परावराणां परमः परापरसतां गतिः ।
प्रभुः प्रमाणं मानानां सप्तलोकगुरोर्गुरुः ।
स्थितिं कर्तुं जगन्नाथं सोऽचिन्त्यो गर्भतां गतः ॥
प्रभुः प्रभूणां परमः पराणा-मनादिमध्य भगवाननन्तः । त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेकः कर्तुं महात्माऽदितिजोऽवतीर्णः ॥ न यस्य रुद्रा न च पद्मयोनि-नेंन्द्रो न सूर्येन्दुमरीचिमिश्राः । जानन्ति दैत्याधिप यत्स्वरूपं स वासुदेवः कलयावतीर्णः ॥ यमक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यं ज्ञानविधूतपापाः । यस्मिन् प्रविष्टा न पुनर्भवन्ति तं वासुदेवं प्रणमामि देवम् ॥ भूतान्यशेषाणि यतो भवन्ति यथोर्मयस्तोयनिधेरजस्त्रम् I लयं च यस्मिन् प्रलये प्रयान्ति तं वासुदेवं प्रणतोऽस्म्यचिन्त्यम् ॥ न यस्य रूपं न बलं प्रभावो
न च प्रतापः परमस्य पुंसः ।
विज्ञाय सर्वपितामहाद्यै-स्तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम् ॥
रूपस्य त्वषा स्पर्शग्रहित्री रसना रसस्य । घ्राणं च गन्धग्रहणे नियुक्तं न घ्राणचक्षुः श्रवणादि तस्य ॥ स्वयंप्रकाशः परमार्थतो यः सर्वेश्वरो वेदितव्यः स युक्त्या । शक्यं तमीड्यमनघं च देवं ग्राह्यं नतोऽहं हरिमीशितारम् ॥ ( दैत्यो! ) मैंने तुमलोगोंकी कान्तिहीनताके १६ ( वास्तविक ) सब कारणको – अच्छी तरहसे समझ लिया है । ( अब ) उसे तुमलोग भलीभाँति सुनो । देवोंके देव, जगद्योनि, ( विश्वको उत्पन्न करनेवाले ) १७ किंतु स्वयं अयोनि, विश्वके प्रारम्भमें विद्यमान पर स्वयं अनादि, फिर भी विश्वके आदि, वर देनेवाले वरणीय हरि, सर्वश्रेष्ठों में भी परम ( श्रेष्ठ ), बड़े - छोटे सज्जनोंकी गति, मानोंके भी प्रमाणभूत प्रभु, सातों लोकोंके १८ गुरुओंके भी गुरु एवं चिन्तनमें न आने योग्य विश्वके स्वामी मर्यादा ( धर्महेतु ) - की स्थापना करनेके लिये ( अदितिके ) गर्भमें आ गये हैं । प्रभुओंके प्रभु, श्रेष्ठोंमें श्रेष्ठ, आदि - मध्यसे रहित, अनन्त भगवान् तीनों लोकोंको सनाथ करनेके लिये अदितिके पुत्रके रूपमें १ ९ । अंशावतारस्वरूपसे अवतीर्ण हुए हैं॥१६–१९ ॥ दैत्यपते! जिन वासुदेव भगवान्के वास्तविक स्वरूपको रुद्र, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्र एवं मरीचि आदि श्रेष्ठ पुरुष नहीं जानते, वे ही वासुदेव भगवान् अपनी २० एक कलासे अवतीर्ण हुए हैं । वेदके जाननेवाले जिन्हें अक्षर कहते हैं तथा ब्रह्मज्ञानके होनेसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं – ऐसे निष्पाप शुद्ध प्राणी जिनमें प्रवेश पाते २१ हैं और जिनके भीतर प्रविष्ट हुए लोग पुनः जन्म नहीं लेते – ऐसे उन वासुदेव भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ । समुद्रकी लहरोंके समान जिनसे समस्त जीव निरन्तर उत्पन्न होते रहते हैं तथा प्रलयकालमें जिनके भीतर २२ विलीन हो जाते हैं, उन अचिन्त्य वासुदेवको मैं प्रणाम करता हूँ । ब्रह्मा आदि जिन परम पुरुषके रूप, बल, प्रभाव और प्रतापको नहीं जान पाते उन वासुदेवको मैं २३ नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ २० - २३ ॥ जिन परमेश्वरने रूप देखनेके लिये आँखोंको, स्पर्शज्ञानके लिये त्वचाको, खट्टे - मीठे स्वाद लेनेके लिये जीभको और सुगन्ध - दुर्गन्ध सूँघनेके लिये नाकको २४ नियत किया है; पर स्वयं उनके नाक, आँख और कान आदि नहीं हैं । जो वस्तुतः स्वयं प्रकाशस्वरूप हैं, वे सर्वेश्वर युक्ति द्वारा ( कुछ - कुछ ) जाने जा सकते हैं; उन सर्वसमर्थ, स्तुतिके योग्य, किसी भी प्रकारके मलसे २५ । रहित, ( भक्तिसे ) ग्राह्य, ईश हरिदेवको मैं प्रणाम करता हूँ ।
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१३६ येनैकदंष्ट्रेण समुद्धृतेयं
धरा चला धारयतीह सर्वम् ।
शेते ग्रसित्वा सकलं जगद् य-स्तमीड्यमीशं प्रणतोऽस्मि विष्णुम् ॥
अंशावतीर्णेन च येन गर्भे
हृतानि तेजांसि महासुराणाम् ।
नमामि तं देवमनन्तमीश-मशेषसंसारतरोः कुठारम् ॥
देवो जगद्योनिरयं महात्मा स षोडशांशेन महाऽसुरेन्द्राः । सुरेन्द्रमातुर्जठरं प्रविष्ट हृतानि वस्तेन बलं वपूंषि ॥ बलिरुवाच
तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम् ।
सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः ॥
विप्रचित्तिः शिबिः शङ्कुरयःशङ्कुस्तथैव च ।
हयशिरा अश्वशिरा भङ्गकारो महाहनुः ॥
प्रतापी प्रघशः शम्भुः कुक्कुराक्षश्च दुर्जयः ।
एते चान्ये च मे सन्ति दैतेया दानवास्तथा ॥
महाबला महावीर्या भूभारधरणक्षमाः । एषामेकैकशः कृष्णो न वीर्यार्द्धन सम्मितः लोमहर्षण उवाच
पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादो दैत्यसत्तमः ।
सक्रोधश्च बलिं प्राह वैकुण्ठाक्षेपवादिनम् ॥
विनाशमुपयास्यन्ति दैत्या ये चापि दानवाः ।
येषां त्वमीदृशो राजा दुर्बुद्धिरविवेकवान् ॥
देवदेवं महाभागं वासुदेवमजं विभुम् ।
त्वामृते पापसंकल्प कोऽन्य एवं वदिष्यति ॥
य एते भवता प्रोक्ताः समस्ता दैत्यदानवाः ।
सब्रह्मकास्तथा देवाः स्थावरान्ता विभूतयः ॥
त्वं चाहं च जगच्चेदं साद्रिद्रुमनदीवनम् ।
ससमुद्रद्वीपलोकोऽयं यश्चेदं सचराचरम् ॥
यस्याभिवाद्यवन्द्यस्य व्यापिनः परमात्मनः ।
एकांशांशकलाजन्म कस्तमेवं प्रवक्ष्यति ॥
श्रीवामनपुराण [ अध्याय २ ९ जिनके द्वारा एक मोटे तथा बड़े दाँतसे निकाली गयी चिरस्थायिनी पृथ्वी सभी कुछ धारण करनेमें समर्थ है तथा जो समस्त संसारको अपनेमें स्थान देकर सोनेका २६ स्वाँग धारण करते हैं, उन स्तुत्य ईश विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ । जिन्होंने अपने अंशसे अदितिके गर्भ में आकर महासुरोंके तेजका अपहरण कर लिया, उन समस्त संसाररूपी वृक्षके लिये कुठाररूप धारण करनेवाले २७ अनन्त देवाधीश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ । हे महासुरो! जगत्की उत्पत्तिके स्थान वे ही महात्मा देव अपने सोलहवें अंशकी कलासे इन्द्रकी माताके गर्भमें प्रविष्ट हुए हैं और उन्होंने ही तुमलोगोंके शारीरिक बलको २८ | अपहृत कर लिया है ॥ २४–२८ ॥ बलिने कहा - तात! जिनसे हम सबको डर है वे हरि कौन हैं? हमारे पास वासुदेवसे अधिक २ ९ शक्तिशाली सैकड़ों दैत्य हैं; जैसे - विप्रचित्ति, शिबि, शङ्कु, अय: शङ्कु, हयशिरा, अश्वशिरा, ( विघटन ३० करनेवाला ) भङ्गकार, महाहनु, प्रतापी, प्रघश, शम्भु, कुक्कुराक्ष एवं दुर्जय । ये तथा अन्य भी ऐसे अनेक दैत्य एवं दानव हैं । ये सभी महाबलवान् तथा महापराक्रमी ३१ एवं पृथ्वीके भारको धारण करनेमें समर्थ हैं । कृष्ण तो हमारे इन बलवान् दैत्योंमेंसे पृथक् - पृथक् एक - एकके ॥ ३२ आधे बलके समान भी नहीं हैं ॥ २ ९ - ३२ ॥ लोमहर्षणने कहा - अपने पौत्रकी इस उक्तिको सुनकर दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद क्रुद्ध हो गये और भगवान्की ३३ निन्दा करनेवाले बलिसे बोले –बलि! तेरे - जैसे विवेकहीन एवं दुर्बुद्धि राजाके साथ ये सारे दैत्य एवं दानव मारे ३४ जायँगे । हे पापको ही सोचनेवाले पापबुद्धि! तुम्हारे सिवा ऐसा कौन है, जो देवाधिदेव महाभाग अज एवं ३५ सर्वव्यापी वासुदेवको इस तरह कहेगा ॥ ३३ – ३५ ॥ तुमने जिन - जिनका नाम लिया है, वे सभी दैत्य ३६ एवं दानव तथा ब्रह्माके साथ सभी देवता एवं चराचरकी समस्त विभूतियाँ, तुम और मैं, पर्वत तथा वृक्ष, नदी ३७ और वनसे युक्त सारा जगत् तथा समुद्र एवं द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण लोक तथा चर और अचर जिन सर्ववन्द्य श्रेष्ठ ३८ | सर्वव्यापी परमात्माके एक अंशकी अंशकलासे उत्पन्न
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अध्याय २ ९ ] बलिका पितामह प्रह्लादसे
ऋते विनाशाभिमुखं त्वामेकमविवेकिनम् ।
दुर्बुद्धिमजितात्मानं वृद्धानां शासनातिगम् ॥ ३ ९
शोच्योऽहं यस्य मे गेहे जातस्तव पिताऽधमः ।
यस्य त्वमीदृशः पुत्रो देवदेवावमानकः ॥ ४०
तिष्ठत्यनेकसंसारसंघातौघविनाशिनि कृष्ण भक्तिरहं तावदवेक्ष्यो भवता न किम् ॥ ४१
न मे प्रियतरः कृष्णादपि देहोऽयमात्मनः ।
इति जानात्ययं लोको भवांश्च दितिनन्दन ॥ ४२
जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम ।
निन्दां करोषि तस्य त्वमकुर्वन् गौरवं मम ॥ ४३
विरोचनस्तव गुरुर्गुरुस्तस्याप्यहं बले ।
ममापि सर्वजगतां गुरुर्नारायणो हरिः ॥ ४४
निन्दां करोषि तस्मिंस्त्वं कृष्णे गुरुगुरोर्गुरौ ।
यस्मात् तस्मादिहैव त्वमैश्वर्याद् भ्रंशमेष्यसि ॥ ४५
स देवो जगतां नाथो बले प्रभुर्जनार्दनः ।
नन्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते भक्तिमानत्र मे गुरुः ॥ ४६
एतावन्मात्रमप्यत्र निन्दता जगतो गुरुम् ।
नापेक्षितस्त्वया यस्मात् तस्माच्छापं ददामि ते ॥ ४७
यथा मे शिरसश्छेदादिदं गुरुतरं बले ।
त्वयोक्तमच्युताक्षेपं राज्यभ्रष्टस्तथा पत ॥ ४८
यथा न कृष्णादपरः परित्राणं भवार्णवे ।
तथाऽचिरेण पश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम् ॥ ४ ९
प्रश्न, अदितिके गर्भ में वामनागमन १३७ हुए हैं, उनके विषयमें विनाशकी ओर चलनेवाले विवेकहीन, मूर्ख, इन्द्रियोंके गुलाम, वृद्धोंके आदेशोंका उल्लङ्घन करनेवाले तुम्हारी अपेक्षा कौन ऐसा ( कृत्या नामसे ) कह सकेगा? ॥ ३६-३९ ॥ मैं ( ही सचमुच ) शोचनीय हूँ, जिसके घरमें तुम्हारा अधम पिता उत्पन्न हुआ, जिसका तुम्हारे जैसा देवदेव ( विष्णु ) - का तिरस्कार करनेवाला पुत्र है । जो अनेक संसारके समूहोंके प्रवाहका विनाश करनेवाले हैं, ऐसे कृष्णमें भक्तिके लिये तुम्हें क्या मेरा भी ध्यान नहीं रहा । दितिनन्दन! मेरे विषयमें समस्त संसार एवं तुम भी यह जानते हो कि मुझे यह मेरी देह भी कृष्णसे अधिक प्रिय नहीं है । फिर यह समझते हुए भी कि भगवान् कृष्ण मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, फिर भी तुम मेरी मर्यादापर ध्यान न देकर ठेस पहुँचाते हुए उनकी निन्दा कर रहे हो । बलि! तुम्हारा गुरु ( पिता ) विरोचन है, उसका गुरु ( पिता ) मैं हूँ तथा मेरे भी गुरु सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् नारायण श्रीहरि हैं ॥ ४०–४४ ॥ जिस कारण तुम अपने गुरु ( पिता विरोचन ) -के गुरु ( पिता मैं प्रह्लाद ) - के भी गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो, इस कारण तुम यहीं ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाओगे । बलि! वे प्रभु जनार्दनदेव जगत्के स्वामी हैं । इस विषयमें मेरा गुरु ( अर्थात् मैं ) भक्तिमान् हूँ, यह विचारकर तुझे मेरी अवहेलना नहीं करनी चाहिये । जिस कारणसे जगद्गुरुकी निन्दा करनेवाले तुमने मेरी इतनी भी अपेक्षा नहीं की, इस कारण मैं तुम्हें शाप देता हूँ; क्योंकि बलि! तुम्हारे द्वारा अच्युतके प्रति अपमानजनित ये वचन मेरे लिये सिर कट जानेसे भी अधिक कष्टदायी हैं, अतः तुम राज्यसे भ्रष्ट होकर गिर जाओ । भवसागरमें भगवान् विष्णुको छोड़कर दूसरा कोई रक्षक नहीं है, अतः शीघ्र ही मैं तुम्हें राज्यसे । भ्रष्ट हुआ देखूँगा ॥ ४५–४९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २ ९ ॥
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१३८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३० तीसवाँ अध्याय बलिका प्रह्लादको संतुष्ट करना, अदिति के गर्भसे वामनका प्राकट्य; ब्रह्माद्वारा स्तुति, वामनका बलिके यज्ञमें जाना लोमहर्षण उवाच
इति दैत्यपतिः श्रुत्वा वचनं रौद्रमप्रियम् ।
प्रसादयामास गुरुं प्रणिपत्य पुनः पुनः ॥
बलिरुवाच
प्रसीद तात मा कोपं कुरु मोहहते मयि ।
बलावलेपमूढेन मयैतद्वाक्यमीरितम् ॥
मोहापहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम ।
यच्छप्तोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता कृतम् ॥
राज्यभ्रंशं यशोभ्रंशं प्राप्स्यामीति ततस्त्वहम् ।
विषण्णोऽसि यथा तात तथैवाविनये कृते ॥
त्रैलोक्यराज्यमैश्वर्यमन्यद्वा नातिदुर्लभम् ।
संसारे दुर्लभास्तात गुरवो ये भवद्विधाः ॥
प्रसीद तात मा कोपं कर्तुमर्हसि दैत्यप ।
त्वत्कोपपरिदग्धोऽहं परितप्ये दिवानिशम् ॥
प्रह्लाद उवाच
वत्स कोपेन मे मोहो जनितस्तेन ते मया ।
शापो दत्तो विवेकश्च मोहेनापहृतो मम ॥
यदि मोहेन मे ज्ञानं नाक्षिप्तं स्यान्महासुर ।
तत्कथं सर्वगं जानन् हरिं कच्चिच्छपाम्यहम् ॥
यो यः शापो मया दत्तो भवतोऽसुरपुंगव ।
भाव्यमेतेन नूनं ते तस्मात्त्वं मा विषीद वै ॥
अद्यप्रभृति देवेशे भगवत्यच्युते हरौ ।
भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति ॥
शापं प्राप्य च मे वीर देवेशः संस्मृतस्त्वया ।
तथा तथा वदिष्यामि श्रेयस्त्वं प्राप्स्यसे यथा ॥
लोमहर्षणने कहा- दैत्यपति बलि प्रह्लादकी इस प्रकार कठोर एवं अप्रिय उक्तिको सुनकर उनके १ चरणोंमें बार - बार सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए मनाने लगा ॥ १ ॥
बलिने कहा— तात! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों, मैं मूढ़ हो गया था, मेरे ऊपर क्रोध न करें । बलके २ घमण्डसे विवेकहीन होनेके कारण मैंने यह वचन कहा था । दैत्य श्रेष्ठ! मोहके कारण मेरी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, मैं अधम हूँ । मैंने सदाचारका पालन नहीं किया, जिससे ३ मुझ पापाचारीको आपने जो शाप दिया, वह बहुत ठीक किया । तात! आप ( यतः ) मेरी उद्दण्डताके कारण बहुत दुःखी हैं, अतः मैं राज्यसे च्युत और अपनी कीर्तिसे रहित ४ हो जाऊँगा । तात! संसारमें तीनों लोकोंका राज्य, ऐश्वर्य अथवा अन्य किसी ( वस्तु ) - का मिलना बहुत कठिन ५ नहीं है, परंतु आप - जैसे जो गुरुजन हैं, वे संसारमें दुर्लभ हैं । दैत्योंकी रक्षा करनेवाले तात! आप प्रसन्न हों, क्रोध न करें । आपका क्रोध मुझे जला रहा है, इसलिये मैं ६ दिन - रात ( आठों प्रहर ) संतप्त हो रहा हूँ ॥२-६ ॥ प्रह्लाद बोले - वत्स! क्रोधके कारण हमें मोह उत्पन्न हो गया था और उसीने मेरी विचार करनेवाली ७ बुद्धि भी नष्ट कर दी थी, इसीसे मैंने तुम्हें शाप दे दिया । महासुर! यदि मोहवश मेरा ज्ञान दूर नहीं हुआ होता तो ८ मैं भगवान्को सब जगह विद्यमान जानता हुआ भी तुम्हें शाप कैसे देता । असुरश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें जो क्रोधवश शाप दिया है, वह तो तुम्हारे लिये होगा, किंतु तुम दुःखी ९ मत हो; बल्कि आजसे तुम उन देवोंके भी ईश्वर भगवान् अच्युत हरिकी भक्ति करनेवाले बन जाओ -१० भक्त हो जाओ । वे ही तुम्हारे रक्षक हो जायँगे । वीर! मेरा शाप पाकर तुमने देवेश्वर भगवान्का स्मरण किया है, अतः मैं तुमसे वही कहूँगा, जिससे तुम कल्याणको ११ प्राप्त करो ॥ ७ – ११ ॥
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अध्याय ३० ] बलिका प्रह्लादको संतुष्ट लोमहर्षण उवाच
अदितिर्वरमासाद्य सर्वकामसमृद्धिदम् ।
क्रमेण ह्युदरे देवो वृद्धिं प्राप्तो महायशाः ॥ १२
ततो मासेऽथ दशमे काले प्रसव आगते ।
अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः ॥ १३
अवतीर्णे जगन्नाथे तस्मिन् सर्वामरेश्वरे ।
देवाश्च मुमुचुर्दुःखं देवमाताऽदितिस्तथा ॥ १४
ववुर्वाताः सुखस्पर्शा नीरजस्कमभून्नभः ।
धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत ॥ १५
नोद्वेगश्चाप्यभूद् देहे मनुजानां द्विजोत्तमाः ।
तदा हि सर्वभूतानां धर्मे मतिरजायत ॥ १६
तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।
जातकर्मादिकां कृत्वा क्रियां तुष्टाव च प्रभुम् ॥ १७
ब्रह्मोवाच
जयाधीश जयाजेय जय विश्वगुरो हरे ।
जन्ममृत्युजरातीत जयानन्त जयाच्युत ॥ १८
जयाजित जयाशेष जयाव्यक्तस्थिते जय ।
परमार्थार्थ सर्वज्ञ ज्ञानज्ञेयार्थनिःसृत ॥ १ ९
जयाशेष जगत्साक्षिञ्जगत्कर्त्तुर्जगद्गुरो ।
जगतोऽजगदन्तेश स्थितौ पालयते जय ॥२०
जयाखिल जयाशेष जय सर्वहृदिस्थित ।
जयादिमध्यान्तमय सर्वज्ञानमयोत्तम ॥ २१
मुमुक्षुभिरनिर्देश्य नित्यष्ट जयेश्वर ।
योगिभिर्मुक्तिकामैस्तु दमादिगुणभूषण ॥ २२
जयातिसूक्ष्म दुर्ज्ञेय जय स्थूल जगन्मय ।
जय सूक्ष्मातिसूक्ष्म त्वं जयानिन्द्रिय सेन्द्रिय ॥ २३
जय स्वमायायोगस्थ शेषभोग जयाक्षर ।
जयैकदंष्ट्रप्रान्तेन समुद्धृतवसुंधर ॥ २४
करना, वामनका प्राकट्य १३ ९ लोमहर्षणने कहा – ( उधर ) अदितिने सभी कामनाओंकी समृद्धि करनेवाले वरको प्राप्त कर लिया तब उसके उदरमें महायशस्वी देव ( भगवान् ) धीरे-धीरे बढ़ने लगे । इसके बाद दसवें महीनेमें जब प्रसवका समय आया तब भगवान् गोविन्द वामनाकारमें उत्पन्न हो गये । संसारके स्वामी उन अखिलेश्वरके अवतार ले लेनेपर देवता और देवमाता अदिति दुःखसे मुक्त हो गये । फिर तो ( संसारमें ) आनन्ददायी वायु बहने लगी, गगनमण्डल बिना धूलिका ( स्वच्छ ) हो गया एवं सभी जीवोंकी बुद्धि धर्म करनेमें लग गयी । द्विजोत्तमो! उस समय मनुष्योंकी देहमें कोई घबड़ाहट नहीं थी और तब समस्त प्राणियोंकी बुद्धि धर्ममें लग गयी । उनके उत्पन्न होते ही लोकपितामह ब्रह्माने | उनकी तत्काल जातकर्म आदि क्रिया ( संस्कार ) सम्पन्न करके उन प्रभुकी स्तुति की ॥ १२–१७ ॥ ब्रह्मा बोले - अधीश! आपकी जय हो । अजेय! आपकी जय हो । विश्वके गुरु हरि! आपकी जय हो । जन्म - मृत्यु तथा जरासे अतीत अनन्त! आपकी जय हो । अच्युत! आपकी जय हो । अजित! आपकी जय हो । अशेष! आपकी जय हो । अव्यक्त स्थितिवाले भगवन्! आपकी जय हो । परमार्थार्थकी ( उत्तम अभिप्रायकी ) पूर्तिमें निमित्त! ज्ञान और ज्ञेयके अर्थके उत्पादक सर्वज्ञ! आपकी जय हो । अशेष जगत्के साक्षी! जगत्के कर्ता! जगद्गुरु! आपकी जय हो । जगत् ( चर ) एवं अजगत् ( अचर ) - के स्थिति, पालन एवं प्रलयके स्वामी! आपकी जय हो । अखिल! आपकी जय हो । अशेष! आपकी जय हो । सभीके हृदयमें रहनेवाले प्रभो! आपकी जय हो । आदि, मध्य और अन्तस्वरूप! समस्त ज्ञानकी मूर्ति, उत्तम! आपकी जय हो । मुमुक्षुओंके द्वारा अनिर्देश्य, नित्य - प्रसन्न ईश्वर! आपकी जय हो । हे मुक्तिकी कामना करनेवाले योगियोंसे सेवित, दम आदि गुणोंसे विभूषित परमेश्वर! आपकी जय हो ॥ १८-२२ ॥ अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूपवाले! हे दुर्ज्ञेय ( कठिनता से समझमें आनेवाले )! आपकी जय हो । हे स्थूल और जगत् - मूर्ति! आपकी जय हो । हे सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म प्रभो! आपकी जय हो । हे इन्द्रियोंसे । रहित तथा इन्द्रियोंसे युक्त ( नाथ )! आपकी जय हो ।
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नृकेसरिन् सुरारातिवक्षःस्थलविदारण ।
साम्प्रतं जय विश्वात्मन् मायावामन केशव ॥
निजमायापरिच्छिन्न जगद्धातर्जनार्दन ।
जयाचिन्त्य जयानेकस्वरूपैकविध प्रभो ॥
वर्द्धस्व वर्धितानेकविकारप्रकृते हरे ।
त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः ॥
न त्वामहं न चेशानो नेन्द्राद्यास्त्रिदशा हरे । ज्ञातुमीशा न मुनयः सनकाद्या न योगिनः त्वं मायापटसंवीतो जगत्यत्र जगत्पते । कस्त्वां वेत्स्यति सर्वेश त्वत्प्रसादं विना नरः त्वमेवाराधितो यस्य प्रसादसुमुखः प्रभो । स एव केवलं देवं वेत्ति त्वां नेतरो जनः तदीश्वरेश्वरेशान विभो वर्द्धस्व भावन । प्रभवायास्य विश्वस्य विश्वात्मन् पृथुलोचन लोमहर्षण उवाच
एवं स्तुतो हृषीकेशः स तदा वामनाकृतिः ।
प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचारूढसम्पदम् ॥
स्तुतोऽहं भवता पूर्वमिन्द्राद्यैः कश्यपेन च ।
मया च वः प्रतिज्ञातमिन्द्रस्य भुवनत्रयम् ॥
भूयश्चाहं स्तुतोऽदित्या तस्याश्चापि मया श्रुतम् ।
यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् ॥
सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः । भविष्यति सहस्त्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान् । यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्य बृहस्पतिः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३० हे अपनी मायासे योगमें स्थित रहनेवाले ( स्वामी )! २५ आपकी जय हो । शेषकी शय्यापर सोनेवाले अविनाशी । शेषशायी प्रभो! आपकी जय हो । एक दाँतके कोनेपर | पृथ्वीको उठानेवाले वराहरूपधारी भगवन्! आपकी जय हो । हे देवताओंके शत्रु ( हिरण्यकशिपु ) - के वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले नृसिंहभगवान् तथा विश्वकी आत्मा एवं अपनी मायासे वामनका रूप धारण करनेवाले २६ केशव! आपकी जय हो । हे अपनी मायासे आवृत तथा संसारको धारण करनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो । हे ध्यानसे परे अनेक स्वरूप धारण करनेवाले तथा एकविध प्रभो! आपकी जय हो । हरे! आपने प्रकृतिके
भाँति - भाँति विकार बढ़ाये हैं । आपकी वृद्धि हो ।
२७ जगत्का यह धर्ममार्ग आप प्रभुमें स्थित है ॥ २३-२७ ॥
हे हरे! मैं, शंकर, इन्द्र आदि देव, सनकादि मुनि ॥ २८ तथा योगिगण आपको जाननेमें असमर्थ हैं । हे जगत्पते! आप इस संसारमें मायारूपी वस्त्रसे ढके हैं । हे सर्वेश! आपकी प्रसन्नताके बिना कौन ऐसा मनुष्य है जो ॥ २ ९ आपको जान सके । प्रभो! जो मनुष्य आपकी आराधना करता है और आप उसपर प्रसन्न होते हैं, वही आपको ॥ ३० जानता है, अन्य नहीं । हे ईश्वरोंके भी ईश्वर! हे ईशान! हे विभो! हे भावन! हे विश्वात्मन्! हे पृथुलोचन! इस | विश्वके प्रभव ( उत्पत्ति - सृष्टिके कारण ) विष्णु! आपकी ॥ ३१ | वृद्धि हो – जय हो ॥ २८-३१ ॥ लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार जब वामनरूपमें अवतीर्ण भगवान्की स्तुति सम्पन्न हुई, तब हृषीकेश ३२ भगवान् हँसकर अभिप्रायपूर्ण ऐश्वर्ययुक्त वाणीमें बोले– पूर्वकालमें आपने, इन्द्र आदि देवों तथा कश्यपने मेरी ३३ स्तुति की थी । मैंने भी आपलोगोंसे इन्द्रके लिये त्रिभुवनको देनेकी प्रतिज्ञा की थी । इसके बाद अदितिने मेरी स्तुति की तो उससे भी मैंने प्रतिज्ञा की थी कि ३४ मैं बाधाओंसे रहित तीनों लोकोंको इन्द्रको दूँगा । अतः मैं ऐसा करूँगा, जिससे हजारों नेत्रोंवाले ( इन्द्र ) संसारके
॥ ३५ स्वामी होंगे । मेरा यह कथन सत्य है ॥ ३२-३५ ॥
( हृषीकेश भगवान्के इस प्रकार अपने वचनकी सत्यता घोषित करनेके बाद ) ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्ण ॥ ३६ मृगचर्म समर्पित किया एवं भगवान् बृहस्पतिने उन्हें