वामन पुराण — पृष्ठ 151–160
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160
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अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना आषाढमददाद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः ।
कमण्डलुं वसिष्ठश्च कौशं चीरमथाङ्गिराः ।
आसनं चैव पुलहः पुलस्त्यः पीतवाससी ॥
उपतस्थुश्च तं वेदाः प्रणवस्वरभूषणाः ।
शास्त्राण्यशेषाणि तथा सांख्ययोगोक्तयश्च याः ॥
स वामनो जटी दण्डी छत्री धृतकमण्डलुः ।
सर्वदेवमयो देव बलेरध्वरमभ्यगात् ॥
यत्र यत्र पदं विप्रा भूभागे वामनो ददौ ।
ददाति भूमिर्विवरं तत्र तत्राभिपीडिता ॥
स वामनो जडगतिर्मृदु गच्छन् सपर्वताम् ।
साब्धिद्वीपवतीं सर्वां चालयामास मेदिनीम् ॥
बृहस्पतिस्तु शनकैर्मार्गं दर्शयते शुभम् ।
तथा क्रीडाविनोदार्थमतिजाड्यगतोऽभवत् ॥
ततः शेषो महानागो निःसृत्यासौ रसातलात् ।
साहाय्यं कल्पयामास देवदेवस्य चक्रिणः ॥
तदद्यापि च विख्यातमहेर्विलमनुत्तमम् ।
तस्य संदर्शनादेव नागेभ्यो न भयं भवेत् ॥
तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४१ यज्ञोपवीत दिया । ब्रह्मपुत्र मरीचिने उन्हें पलाशदण्ड, वसिष्ठने कमण्डलु और अङ्गिराने रेशमी वस्त्र दिया । ३७ पुलहने आसन तथा पुलस्त्यने दो पीले वस्त्र दिये । ओंकार स्वरसे अलंकृत वेद, सभी शास्त्र तथा सांख्ययोग आदि दर्शनोंकी उक्तियाँ उनका उपस्थान ३८ करने लगीं । समस्त देवताओंके मूर्तिरूप वामनभगवान् जटा, दण्ड, छत्र एवं कमण्डलु धारण करके बलिकी ३ ९ यज्ञभूमिमें पधारे ॥ ३६-३९ ॥ ब्राह्मणो! पृथ्वीपर वामनभगवान् जिस - जिस स्थानपर ४० डग रखते थे, वहाँकी दबी हुई भूमिमें दरार पड़ जाता था - गड्ढा हो जाता था । मधुरभावसे धीरे - धीरे चलते ४१ हुए वामनभगवान्ने समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतोंसे युक्त सारी पृथ्वीको कँपा दिया । बृहस्पति भी शनैः - शनैः उन्हें सारे कल्याणकारी मार्गको दिखाने लगे एवं स्वयं ४२ भी क्रीडापूर्ण मनोरञ्जनके लिये अत्यन्त धीरे - धीरे चलने लगे । उसके बाद महानाग शेष रसातलसे ऊपर ४३ आकर देवदेव चक्रधारी भगवान्की सहायता करने लगे । आज भी वह श्रेष्ठ सर्पोंका बिल विख्यात है और ४४ उसके दर्शनमात्रसे नागोंसे भय नहीं होता ॥ ४०–४४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥३० ॥
इकतीसवाँ अध्याय वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना पगमें नाप लेना और लोमहर्षण उवाच
सपर्वतवनामुर्वीं दृष्ट्वा संक्षुभितां बलिः ।
पप्रच्छोशनसं शुक्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥ १
आचार्य क्षोभमायाति साब्धिभूमिधरा मही ।
कस्माच्च नासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्नयः ॥ २
इति पृष्टोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वरः ।
उवाच दैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः ॥ ३
तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन बलिका पातालमें जाना लोमहर्षण बोले- बलिने वनों और पर्वतों साथ सम्पूर्ण पृथ्वीको क्षोभसे भरी देखकर हाथ जोड़ करके शुक्राचार्यको प्रणाम कर पूछा- आचार्यदेव! समुद्र तथा पर्वतोंके साथ पृथ्वीके क्षुब्ध होनेका क्या कारण है और अग्निदेव असुरोंके भागोंको क्यों नहीं ग्रहण कर रहे हैं? बलिके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ | बुद्धिमान् शुक्राचार्यने चिरकालतक ध्यान लगाकर ( और
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१४२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३१
अवतीर्णो जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरिः ।
वामनेनेह रूपेण परमात्मा सनातनः ॥
स नूनं यज्ञमायाति तव दानवपुंगव ।
तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही ॥
कम्पन्ते गिरयश्चेमे क्षुभिता मकरालयाः ।
नेयं भूतपतिं भूमिः समर्था वोढुमीश्वरम् ॥
सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ।
अनेनैव धृता भूमिरापोऽग्निः पवनो नभः ।
धारयत्यखिलान् देवान् मनुष्यांश्च महासुरान् ॥
इयमस्य जगद्धातुर्माया कृष्णस्य गह्वरी ।
धार्यधारकभावेन यया संपीडितं जगत् ॥
तत्संनिधानादसुरा न भागार्हाः सुरद्विषः ।
भुञ्जते नासुरान् भागानपि तेन त्रयोऽग्नयः ॥
शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा हृष्टरोमाऽब्रवीद् बलिः ।
धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम् ।
यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन् मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान् ॥
यं योगिनः सदोद्युक्ताः परमात्मानमव्ययम् ।
द्रष्टुमिच्छन्ति देवोऽसौ ममाध्वरमुपेष्यति ।
यन्मयाचार्य कर्त्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि ॥
शुक्र उवाच
यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर ।
त्वया तु दानवा दैत्य यज्ञभागभुजः कृताः ॥
अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम् ।
विसृष्टं च तथाऽयं च स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः ॥
भवांस्तु वन्दी भविता नूनं विष्णुः स्थितौ स्थितः ।
विदित्वैवं महाभाग कुरु यत् ते मनोगतम् ॥
तथ्य समझकर ) दैत्येन्द्रसे कहा- कश्यपके घरमें ४ जगद्योनि – संसारको उत्पन्न करनेवाले सनातन परमात्मा वामनके रूपमें अवतीर्ण हो गये हैं ॥ १-४ ॥ दानवश्रेष्ठ! वे ही प्रभु तुम्हारे यज्ञमें आ रहे हैं । ५ | उन्हींके पैर रखनेसे पृथ्वीमें विक्षोभ हो रहा है जिससे यह पृथ्वी काँप रही है, ये पर्वत भी काँप रहे हैं और ६ सिन्धुमें जोरोंकी लहरें उठ रही हैं । इस भूमिमें उन भूतपति भगवान्को वहन करनेकी शक्ति नहीं है । ये ही ( परमात्मा ) देव, असुर, गन्धर्व - देवों, मनुष्यों एवं महासुरोंको धारण करते हैं । जगत्को धारण करनेवाले ७ भगवान् कृष्णकी ही यह गम्भीर ( अचिन्त्य ) माया है, जिस मायाके द्वारा यह संसार धार्यधारकभावसे क्षुब्ध हो ८ रहा है ॥ ५–८ ॥ उनके सन्निधान होनेके कारण देवताओंके शत्रु ९ दैत्यलोग यज्ञ - भाग पानेके योग्य नहीं रह गये हैं, अतएव तीनों अग्निदेव भी असुरोंके भागको नहीं ले रहे हैं । शुक्राचार्यकी बात सुननेके बाद बलिके रोंगटे खड़े हो गये । उसके बाद बलिने ( शुक्राचार्यसे ) कहा – ब्रह्मन्! मैं धन्य एवं कृतकृत्य हो गया, जो १० स्वयं यज्ञके अधिपति भगवान् लगातार मेरे यज्ञमें पधार रहे हैं । कौन दूसरा पुरुष मुझसे श्रेष्ठ है? सदैव सावधान रहनेवाले योगीलोग जिन नित्य परमात्माको देखना चाहते हैं, वे ही देव मेरे यज्ञमें ( कृपाकर ) पधार रहे हैं । आचार्य! मुझे जो करना चाहिये, उसे ११ आप आदिष्ट कीजिये ॥ ९ -११ ॥ शुक्राचार्य बोले- असुर! वेदोंका विधान है कि यज्ञभागके भोक्ता देवता हैं । परंतु दैत्य! तुमने यज्ञभागका भोक्ता दानवोंको बना दिया है । ( यह वेद - विधानके १२ विपरीत किया है –विधानका उल्लङ्घन किया है । ) ये ही देव सत्त्वगुणका आश्रय लेकर विश्वकी स्थिति और पालन करते हैं और ये ही सृष्टि भी करते हैं, फिर ये १३ ही प्रभु स्वयं प्रजाका ( जीवोंका ) अन्त भी करते हैं । विष्णु स्थिति कार्यमें ( कल्याणमय मर्यादाके स्थापनमें ) तत्पर हो गये हैं । अतः आपको निश्चय ही बन्दी होना १४ । है । महाभाग! इसपर विचारकर तुम्हारे मनमें जैसी
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अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना
त्वयाऽस्य दैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि ।
प्रतिज्ञा नैव वोढव्या वाच्यं साम तथाऽफलम् ॥
कृतकृत्यस्य देवस्य देवार्थं चैव कुर्वतः ।
अलं दद्यां धनं देवे त्वेतद्वाच्यं तु याचतः ।
कृष्णस्य देवभूत्यर्थं प्रवृत्तस्य महासुर ॥
बलिरुवाच
ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः ।
नास्तीति किमु देवस्य संसारस्याघहारिणः ॥
व्रतोपवासैर्विविधैर्यः प्रभुर्गृह्यते हरिः ।
स मे वक्ष्यति देहीति गोविन्दः किमतोऽधिकम् ॥
यदर्थं सुमहारम्भा दमशौचगुणान्वितैः ।
यज्ञाः क्रियन्ते यज्ञेशः स मे देहीति वक्ष्यति ॥
तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं च नः ।
यन्मां देहीति विश्वेशः स्वयमेव वदिष्यति ॥
नास्तीत्यहं गुरो वक्ष्ये तमभ्यागतमीश्वरम् ।
प्राणत्यागं करिष्येऽहं न तु नास्ति जने क्वचित् ॥
नास्तीति यन्मया नोक्तमन्येषामपि याचताम् ।
वक्ष्यामि कथमायाते तदद्य चामरेऽच्युते ॥
श्लाघ्य एव हि वीराणां दानाच्चापत्समागमः ।
न बाधाकारि यद्दानं तदङ्ग बलवत् स्मृतम् ॥
मद्राज्ये नासुखी कश्चिन्न दरिद्रो न चातुरः ।
न दुःखितो न चोद्विग्नो न शमादिविवर्जितः ॥
तथा विराद्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४३ इच्छा हो वैसा करो । दैत्यपते! ( देखना ) तुम थोड़ी-१५ सी भी वस्तु देनेके लिये उनसे प्रतिज्ञा मत करना । व्यर्थकी कोमल और मधुर बातें करना । महासुर! कृतकृत्य एवं देवताओंका कार्य पूरा करनेवाले तथा देवताओंके ऐश्वर्यके लिये प्रयत्नशील भगवान् श्रीकृष्णके याचना करनेपर ‘ मैं देवताओंके हेतु पर्याप्त धन दूँगा ' १६ ऐसा कहना ॥ १२–१६ ॥ बलि बोले - ब्रह्मन्! मैं दूसरोंके याचना करनेपर भी ' नहीं है ' – ऐसा कैसे कह सकता हूँ? फिर संसारके पापोंको दूर करनेवाले ( उन ) देवसे कहने की १७ तो बात ही क्या है? विविध प्रकारके व्रतों एवं उपवासोंसे जो परमेश्वर ग्रहण किये जाने योग्य हैं, वे ही गोविन्द मुझसे ' दो ' इस प्रकार कहेंगे तो इससे १८ बढ़कर ( मेरे लिये ) और ( भाग्य ) क्या हो सकता है? जिनके लिये दम- शमादि शौच - भीतरी - बाहरी पवित्रता आदि गुणोंसे युक्त लोग यज्ञीय उपकरणों एवं सम्पत्तियोंको लगाकर यज्ञ करते हैं, वे ही यज्ञेश १ ९ ( यज्ञके स्वामी ) यदि मुझसे ' दो ' इस प्रकार कहेंगे तो मेरे किये हुए सभी कर्म सफल हो गये और हमारा तपश्चरण भी सफल हो गया; क्योंकि विश्वके स्वामी २० स्वयं मुझसे ' दो ' – इस तरह कहेंगे ॥ १७–२० ॥ गुरुदेव! क्या अपने यहाँ ( याचकरूपमें ) आये उन २१ परमेश्वरसे ' नहीं है ' - मैं ऐसा कहूँ? ( यह तो उचित नहीं जँचता ) भले ही प्राणोंका त्याग कर दूँगा; किंतु किसी भी याचक मनुष्यसे ' नहीं है ' - यह नहीं कह सकता । दूसरोंके भी याचना करनेपर जब मैंने ' नहीं २२ है ' - ऐसा नहीं कहा तो आज अपने यहाँ स्वयं पूर्ण परमेश्वरके आ जानेपर मैं यह कैसे कहूँगा कि ' नहीं है '? दानके कारण यदि कठिनाई आती है तो उसे वीर पुरुष प्रशंसनीय ही मानते हैं । क्योंकि दानका महत्त्व उससे और बढ़ जाता है । गुरो! ( हाँ, साधारणतया यह समझा २३ जाता है कि - ) जो दान बाधा डालनेवाला नहीं होता, वह नि: संदेह बलवान् कहा गया है । ( पर ऐसा प्रसङ्ग नहीं आ सकता; क्योंकि ) मेरे राज्यमें ऐसा कोई भी नहीं है, जो सुखी न हो और न कोई रोगी या दुःखी ही है, न २४ | कोई किसीके द्वारा उद्वेजित किया गया है और न कोई
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हृष्टस्तुष्टः सुगन्धी च तृप्तः सर्वसुखान्वितः ।
जन: सर्वो महाभाग किमुताहं सदा सुखी ॥
एतद्विशिष्टमत्राहं दानबीजफलं लभे ।
विदितं मुनिशार्दूल मयैतत् त्वन्मुखाच्छुतम् ॥
मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः ।
मम दानमवाप्यासौ पुष्णाति यदि देवताः ॥
एतद्वीजवरे दानबीजं पतति चेद् गुरौ ।
जनार्दने महापात्रे किं न प्राप्तं ततो मया ॥
विशिष्टं मम तद्दानं परितुष्टाश्च देवताः ।
उपभोगाच्छतगुणं दानं सुखकरं स्मृतम् ॥
मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः ।
तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत् ॥
अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधतः ।
मां निहन्तुं ततो हि स्याद् वधः श्लाघ्यतरो ऽच्युतात् ॥
एतज्ज्ञात्वा मुनिश्रेष्ठ दानविघ्नकरेण मे ।
नैव भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते ॥
लोमहर्षण उवाच
इत्येवं वदतस्तस्य प्राप्तस्तत्र जनार्दनः ।
सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक् ॥
तं दृष्ट्वा यज्ञवाटं तु प्रविष्टमसुराः प्रभुम् । जग्मुः प्रभावतः क्षोभं तेजसा तस्य निष्प्रभाः जेपुश्च मुनयस्तत्र ये समेता महाध्वरे । वसिष्ठो गाधिजो गर्गो अन्ये च मुनिसत्तमाः
बलिश्चैवाखिलं जन्म मेने सफलमात्मनः ।
ततः संक्षोभमापन्नो न कश्चित् किंचिदुक्तवान् ॥
प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास तेजसा ।
अथासुरपतिं प्रह्वं दृष्ट्वा मुनिवरांश्च तान् ॥
श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३१ शम आदि गुणोंसे रहित है । महाभाग! सभी लोग हृष्ट, २५ तुष्ट, पुण्यात्मा - धर्मपरायण तृप्त एवं सुखी हैं । अधिक क्या है? मैं तो सदा सुखी हूँ ॥ २१ - २५ ॥ मुनिशार्दूल! आपके मुखसे सुनकर मुझे यह २६ मालूम हो गया कि मैं यहाँपर विशिष्ट दानरूपी बीजका शुभ फल प्राप्त कर रहा हूँ । वे हरि यदि मुझसे दान लेकर देवताओंकी पुष्टि करते हैं तो यज्ञसे आराधित वे २७ ( हरि ) मुझपर निश्चय ही प्रसन्न हैं । यदि श्रेष्ठ बीज ( ऐसा दान ) महान् ( योग्य ) पात्र, पूज्य जनार्दनको मिल २८ गया तो फिर मुझे क्या नहीं मिला? निश्चय ही मेरा यह दान विशिष्ट गुणोंवाला है और देवता मेरे ऊपर प्रसन्न हैं । दानके उपभोगकी अपेक्षा दान देना सौ गुना सुख २ ९ देनेवाला माना गया है॥२६—२९ ॥ यज्ञसे पूजे गये श्रीहरि निश्चय ही मेरे ऊपर प्रसन्न ३० हैं । तभी तो निस्संदेह मुझे दर्शन देकर मेरा कल्याण करनेवाले वे प्रभु आ रहे हैं, निश्चय ही यही बात है । देवताओंके देवभागकी प्राप्तिमें रुकावट होनेके कारण ३१ यदि वे क्रोधवश मेरा वध करने भी आ रहे हों तो भी उन अच्युतसे होनेवाला मेरा वध भी प्रशंसनीय ही होगा । मुनिश्रेष्ठ! यह समझकर जगन्नाथ गोविन्दके यहाँ समुपस्थित ३२ होनेपर आप मेरे दानमें विघ्न न डालें ॥ ३० - ३२ ॥ लोमहर्षण बोले – शुक्राचार्य और बलिमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य ३३ भगवान् अपनी मायासे अपना वामनरूप धारणकर वहाँ पहुँच गये । उन प्रभुको यज्ञस्थानमें उपस्थित देखकर दैत्यलोग उनके प्रभावसे अशान्त और तीव्र ॥ ३४ तेजसे रहित हो गये । उस महायज्ञमें एकत्र ( उपस्थित ) वसिष्ठ, विश्वामित्र, गर्ग एवं अन्य श्रेष्ठ मुनिजन अपना-अपना जप करने लगे । बलिने भी अपने सम्पूर्ण ॥ ३५ जन्मको सफल माना; किंतु उसके बाद ( इधर ) खलबली मच गयी और संक्षुब्ध होनेके कारण ३६ किसीने कुछ भी नहीं कहा॥३३–३६ ॥ उनके देदीप्यमान तेजके कारण प्रत्येकने देवाधिदेवकी पूजा की । उसके बाद वामनरूपमें प्रत्यक्ष प्रकट हुए विष्णुभगवान् ने लोगोंसे पूजित होनेके बाद एक ३७ | दृष्टिसे ( चारों ओर देखकर ) उन विनम्र दैत्यपति एवं
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अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा देवदेवपतिः साक्षाद् विष्णुर्वामनरूपधृक् ।
तुष्टाव यज्ञं वह्निं च यजमानमथार्चितः ।
यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसम्पदम् ॥ ३८
सदस्याः पात्रमखिलं वामनं प्रति तत्क्षणात् ।
यज्ञवाटस्थितं विप्राः साधु साध्वित्युदीरयन् ॥ ३ ९
स चार्घमादाय बलिः प्रोद्भूतपुलकस्तदा ।
पूजयामास गोविन्दं प्राह चेदं महासुरः ॥ ४०
वलिरुवाच
सुवर्णरत्नसंघातो गजाश्वसमितिस्तथा ।
स्त्रियो वस्त्राण्यलंकारान् गावो ग्रामाश्च पुष्कलाः ॥ ४१
सर्वे च सकला पृथ्वी भवतो वा यदीप्सितम् ।
तद् ददामि वृणुष्वेष्टं ममार्थाः सन्ति ते प्रियाः ॥ ४२
इत्युक्तो दैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः ।
प्राह सस्मितगम्भीरं भगवान् वामनाकृतिः ॥ ४३
ममाग्निशरणार्थाय देहि राजन् पदत्रयम् ।
सुवर्णग्रामरत्नादि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ॥ ४४
बलिरुवाच
त्रिभिः प्रयोजनं किं ते पदैः पदवतां वर ।
शतं शतसहस्त्रं वा पदानां मार्गतां भवान् ॥ ४५
श्रीवामन उवाच
एतावता दैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि मार्गणे ।
अन्येषामर्थिनां वित्तमिच्छया दास्यते भवान् ॥ ४६
एतच्छ्रुत्वा तु गदितं वामनस्य महात्मनः ।
वाचयामास वै तस्मै वामनाय महात्मने ॥ ४७
पाणौ तु पतिते तोये वामनोऽभूदवामनः ।
सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ ४८
चन्द्रसूर्यौ तु नयने द्यौः शिरश्चरणौ क्षितिः ।
पादाङ्गुल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गुल्यश्च गुह्यकाः ॥ ४ ९
विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः ।
यक्षा नखेषु सम्भूता रेखास्वप्सरसस्तथा ॥ ५० ।
विराद्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४५ मुनिवरोंको देखा तथा यज्ञ, अग्नि, यजमान, यज्ञकर्ममें अधिकृत सदस्यों एवं द्रव्यकी सामग्रियोंकी प्रशंसा की । विप्रो! तत्काल ही सभी सदस्यगण यज्ञमण्डपमें उपस्थित पात्रस्वरूप वामनके प्रति ' साधु - साधु ' कहने लगे । उस समय हर्षमें विह्वल होकर महासुर बलिने अर्घ लिया और गोविन्दकी पूजा की तथा उनसे यह कहा ॥ ३७–४० ॥ बलिने कहा - ( वामनदेव! ) अनन्त सुवर्ण और रत्नोंके ढेर तथा हाथी, घोड़े, स्त्रियाँ, वस्त्र, आभूषण, गायें तथा ग्रामसमूह – ये सभी वस्तुएँ, समस्त पृथ्वी अथवा आपकी जो अभिलाषा हो वह मैं देता हूँ । आप अपना अभीष्ट बतलायें । मेरे प्रिय लगनेवाले समस्त अर्थ आपके लिये हैं ॥ ४१-४२ ॥ दैत्यपति बलिके इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक उदार वचन कहनेपर वामनका आकार धारण करनेवाले भगवान्ने हँसते हुए दुर्बोध वाणीमें कहा – राजन्! मुझे अग्निशाला के लिये तीन पग ( भूमि ) दें । सुवर्ण, ग्राम एवं रत्न आदि उनकी इच्छा रखनेवाले याचकोंको प्रदान करें ॥ ४३-४४ ॥ बलिने कहा- हे पदधारियोंमें श्रेष्ठ! तीन पग भूमिसे आपका कौन - सा स्वार्थ सिद्ध होगा । सौ अथवा सौ हजार पग भूमि आप माँगिये ॥ ४५ ॥
श्रीवामनने कहा- हे दैत्यपते! मैं इतना पानेसे ही कृतकृत्य हूँ । ( मेरा स्वार्थ इतनेसे ही सिद्ध हो जायगा । ) आप दूसरे याचना करनेवाले याचकोंको उनके इच्छानुकूल दान दीजियेगा । महात्मा वामनकी यह वाणी सुनकर ( बलिने ) उन महात्मा वामनको तीन पग भूमि देनेके लिये वचन दे दिया । दान देनेके लिये हाथपर जल गिरते ही वामन अवामन ( विराट् ) बन गये । तत्क्षण उन्होंने उन्हें अपना सर्वदेवमय स्वरूप दिखाया । चन्द्र और सूर्य उनके दोनों नेत्र, आकाश सिर, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाच पैरकी अँगुलियाँ एवं गुह्यक हाथोंकी अँगुलियाँ थे ॥ ४६–४९ ॥ जानुओंमें विश्वेदेवगण, दोनों जङ्घाओंमें सुरश्रेष्ठ साध्यगण, नखोंमें यक्ष एवं रेखाओंमें अप्सराएँ थीं ।
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१४६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय: ३१
दृष्टिर्ऋक्षाण्यशेषाणि केशाः सूर्यांशवः प्रभोः ।
तारका रोमकूपाणि रोमेषु च महर्षयः ॥ ५१
बाहवो विदिशस्तस्य दिशः श्रोत्रे महात्मनः ।
अश्विनौ श्रवणे तस्य नासा वायुर्महात्मनः ॥५२
प्रसादे चन्द्रमा देवो मनो धर्मः समाश्रितः ।
सत्यमस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ॥ ५३
ग्रीवाऽदितिर्देवमाता विद्यास्तद्वलयस्तथा ।
स्वर्गद्वारमभून्मैत्रं त्वष्टा पूषा च वै भ्रुवौ ॥ ५४
मुखे वैश्वानरश्चास्य वृषणौ तु प्रजापतिः ।
हृदयं च परं ब्रह्म पुंस्त्वं वै कश्यपो मुनिः ॥ ५५
पृष्ठेऽस्य वसवो देवा मरुतः सर्वसन्धिषु ।
वक्षःस्थले तथा रुद्रो धैर्ये चास्य महार्णवः ॥ ५६
उदरे चास्य गन्धर्वा मरुतश्च महाबलाः ।
लक्ष्मीर्मेधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्याश्च वै कटिः ॥ ५७
सर्वज्योतींषि यानीह तपश्च परमं महत् ।
तस्य देवाधिदेवस्य तेजः प्रोद्भूतमुत्तमम् ॥ ५८
तनौ कुक्षिषु वेदाश्च जानुनी च महामखाः ।
इष्टयः पशवश्चास्य द्विजानां चेष्टितानि च ॥५ ९
तस्य देवमयं रूपं दृष्ट्वा विष्णोर्महात्मनः ।
उपसर्पन्ति ते दैत्याः पतङ्गा इव पावकम् ॥ ६०
चिक्षुरस्तु महादैत्यः पादाङ्गुष्ठं गृहीतवान् ।
दन्ताभ्यां तस्य वै ग्रीवामङ्गुष्ठेनाहनद्धरिः ॥ ६१
प्रमथ्य सर्वानसुरान् पादहस्ततलैर्विभुः ।
कृत्वा रूपं महाकायं संजहाराशु मेदिनीम् ॥ ६२
तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे ।
नभो विक्रममाणस्य सक्थिदेशे स्थितावुभौ ॥ ६३
परं विक्रममाणस्य जानुमूले प्रभाकरौ ।
विष्णोरास्तां स्थितस्यैतौ देवपालनकर्मणि ॥ ६४
जित्वा लोकत्रयं तांश्च हत्वा चासुरपुंगवान् ।
पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः ॥ ६५
समस्त नक्षत्र उनकी दृष्टियाँ, सूर्यकिरणें प्रभुके केश, तारकाएँ उनके रोमकूप एवं महर्षिगण रोमोंमें स्थित थे । विदिशाएँ उनकी बाँहें, दिशाएँ उन महात्माके कर्ण, दोनों अश्विनीकुमार श्रवण एवं वायु उन महात्मा नासिका - स्थानपर थे । उनके प्रसादमें ( मधुर हास्यछटामें ) चन्द्रदेव तथा मनमें धर्म आश्रित थे । सत्य उनकी वाणी तथा जिह्वा सरस्वतीदेवी थीं ॥ ५०–५३ ॥ देवमाता अदिति उनकी ग्रीवा, विद्या उनकी वलियाँ, स्वर्गद्वार उनकी गुदा तथा त्वष्टा एवं पूषा उनकी भौंहें थे । वैश्वानर उनके मुख तथा प्रजापति वृषण थे । परंब्रह्म उनके हृदय तथा कश्यप मुनि उनके पुंस्त्व थे । उनकी पीठमें वसु देवता, सभी सन्धियोंमें मरुद्गण, वक्षःस्थलमें रुद्र तथा उनके धैर्यमें महार्णव आश्रित थे । उनके उदरमें गन्धर्व एवं महाबली मरुद्गण स्थित थे । लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति एवं सभी विद्याएँ उनकी कटिमें स्थित थीं ॥५४–५७ ॥ समस्त ज्योतियाँ एवं परम महत् तप उन देवाधिदेवके उत्तम तेज थे । उनके शरीर एवं कुक्षियोंमें वेद थे तथा बड़े - बड़े यज्ञ इष्टियाँ थीं, पशु एवं ब्राह्मणोंकी चेष्टाएँ उनकी दोनों जानुएँ थीं । उन महात्मा विष्णुके सर्वदेवमय रूपको देखकर वे दैत्य | उनके निकट उसी प्रकार जाते थे, जिस प्रकार अग्निके निकट पतिंगे जाते हैं । महादैत्य चिक्षुरने दाँतोंसे उनके पैर के अँगूठेको दबोच लिया । फिर भगवान्ने अँगूठेसे उसकी ग्रीवापर प्रहार किया और — ॥५८–६१ ॥ अपने पैरों एवं हाथोंके तलवोंसे समस्त असुरोंको रगड़ डाला तथा विराट् शरीर धारण करके शीघ्र ही उन्होंने पृथ्वीको उनसे छीन लिया । भूमिको नापते समय चन्द्र और सूर्य उनके स्तनोंके मध्य स्थित थे तथा आकाशके नापते समय उनके सक्थिप्रदेश ( जाँघ ) -में स्थित हो गये एवं परम ( ऊर्ध्व ) लोकका अतिक्रमण करते समय देवताओंकी रक्षा करनेमें स्थित श्रीविष्णुके जानुमूल ( घुटनेके स्थान ) - में चन्द्र एवं सूर्य स्थित हो गये । उरुक्रम ( लंबी डगोंवाले ) विष्णुने तीनों लोकोंको जीतकर एवं उन बड़े - बड़े असुरोंका वध कर तीनों । लोक इन्द्रको दे दिये ॥ ६२–६५ ॥
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अध्याय ३१ ] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराद्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४७
सुतलं नाम पातालमधस्ताद् वसुधातलात् ।
बलेर्दत्तं भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ६६
अथ दैत्येश्वरं प्राह विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः ।
तत् त्वया सलिलं दत्तं गृहीतं पाणिना मया ॥ ६७
कल्पप्रमाणं तस्मात् ते भविष्यत्यायुरुत्तमम् ।
वैवस्वते तथाऽतीते काले मन्वन्तरे तथा ॥ ६८
सावर्णिके तु संप्राप्ते भवानिन्द्रो भविष्यति ।
इदानीं भुवनं सर्वं दत्तं शक्राय वै पुरा ॥ ६ ९
चतुर्युगव्यवस्था च साधिका ह्येकसप्ततिः ।
नियन्तव्या मया सर्वे ये तस्य परिपन्थिनः ॥ ७०
तेनाहं परया भक्त्या पूर्वमाराधितो बले ।
सुतलं नाम पातालं समासाद्य वचो मम ॥७१
वसासुर ममादेशं यथावत्परिपालयन् ।
तत्र देवसुखोपे प्रासादशतसंकुले ॥७२
प्रोत्फुल्लपद्मसरसि ह्रदशुद्धसरिवरे ।
सुगन्धी रूपसम्पन्नो वराभरणभूषितः ॥ ७३
स्त्रक्चन्दनादिदिग्धाङ्गो नृत्यगीतमनोहरान् ।
उपभुञ्जन् महाभोगान् विविधान् दानवेश्वर ॥ ७४
ममाज्ञया कालमिमं तिष्ठ स्त्रीशतसंवृतः ।
यावत्सुरैश्च विप्रैश्च न विरोधं गमिष्यसि ॥ ७५
तावत् त्वं भुङ्क्ष्व संभोगान् सर्वकामसमन्वितान् ।
यदा सुरैश्च विप्रैश्च विरोधं त्वं करिष्यसि ।
बन्धिष्यन्ति तदा पाशा वारुणा घोरदर्शनाः ॥ ७६
बलिरुवाच तत्रासतो मे पाताले भगवन् भवदाज्ञया ।
किं भविष्यत्युपादानमुपभोगोपपादकम् ।
आप्यायितो येन देव स्मरेयं त्वामहं सदा ॥ ७७
श्रीभगवानुवाच
दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्य श्रोत्रियाणि च ।
हुतान्यश्रद्धया यानि तानि दास्यन्ति ते फलम् ॥ ७८ ।
शक्तिशाली भगवान् विष्णुने पृथ्वीतलके नीचे स्थित सुतल नामक पातालको बलिके लिये दे दिया । तदनन्तर सर्वेश्वर विष्णुने दैत्येश्वरसे कहा – मैंने तुम्हारे द्वारा दानके लिये दिये हुए जलको अपने हाथमें ग्रहण किया है; अतः तुम्हारी उत्तम आयु कल्पप्रमाणकी होगी तथा वैवस्वत मन्वन्तरका काल व्यतीत होनेपर एवं सावर्णिक मन्वन्तरके आनेपर तुम इन्द्रपद प्राप्त करोगे -इन्द्र बनोगे । इस समयके लिये मैंने समस्त भुवनको पहले ही इन्द्रको दे रखा है । इकहत्तर चतुर्युगीके कालसे कुछ अधिक कालतक जो समयकी व्यवस्था है अर्थात् एक मन्वन्तरके कालतक मैं उसके ( इन्द्रके ) विरोधियोंको अनुशासित करूँगा ॥ ६६–७० ॥ बलि! पूर्वकालमें उसने बड़ी श्रद्धासे मेरी आराधना की थी, अतः तुम मेरे कहनेसे सुतल नामक पातालमें जाकर मेरे आदेशका भलीभाँति पालन करो तथा देवताओंके मुखसे भरे - पूरे सैकड़ों प्रासादोंसे पूर्ण विकसित कमलोंवाले सरोवरों, हृदों एवं शुद्ध श्रेष्ठ सरिताओंवाले उस स्थानपर निवास करो । दानवेश्वर! सुगन्धिसे अनुलिप्त हो तथा श्रेष्ठ आभरणोंसे भूषित एवं माला और चन्दन आदिसे अलंकृत सुन्दर स्वरूपवाले तुम नृत्य और गीतसे युक्त विविध भाँतिके महान् भोगोंका उपभोग करते हुए सैकड़ों स्त्रियोंसे आवृत होकर इतने कालतक मेरी आज्ञासे वहाँ निवास । करो । जबतक तुम देवताओं एवं ब्राह्मणोंसे विरोध न करोगे, तबतक समस्त कामनाओंसे युक्त भोगोंको भोगोगे । किंतु जब तुम देवों एवं ब्राह्मणोंके साथ विरोध करोगे तो देखनेमें भयंकर वरुणके पाश तुम्हें बाँध लेंगे ॥ ७१–७६ ॥ बलिने पूछा - हे भगवन्! हे देव! आपकी आज्ञासे वहाँ पातालमें निवास करनेवाले मेरे भोगोंका साधन क्या होगा? जिससे तृप्त होकर मैं सदा आपका स्मरण करूँगा ॥ ७७ ॥
श्रीभगवान्ने कहा— अविधिपूर्वक दिये गये दान, श्रोत्रिय ब्राह्मणसे रहित श्राद्ध तथा बिना श्रद्धाके किये गये जो हवन हैं, वे तुम्हारे भाग होंगे ।
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अदक्षिणास्तथा यज्ञाः क्रियाश्चाविधिना कृताः ।
फलानि तव दास्यन्ति अधीतान्यव्रतानि च ॥
उदकेन विना पूजा विना दर्भेण या क्रिया ।
आज्येन च विना होमं फलं दास्यन्ति ते बले ॥
यश्चेदं स्थानमाश्रित्य क्रियाः काश्चित् करिष्यति ।
न तत्र चासुरो भागो भविष्यति कदाचन ॥
ज्येष्ठाश्रमे महापुण्ये तथा विष्णुपदे ह्रदे ।
ये च श्राद्धानि दास्यन्ति व्रतं नियममेव च ॥
क्रिया कृता च या काचिद् विधिनाऽविधिनापि वा ।
सर्वं तदक्षयं तस्य भविष्यति न संशयः ॥
ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे एकादश्यामुपोषितः ।
द्वादश्यां वामनं दृष्ट्वा स्नात्वा विष्णुपदे हदे ।
दानं दत्त्वा यथाशक्त्या प्राप्नोति परमं पदम् ॥
लोमहर्षण उवाच
बलेर्वरमिमं दत्त्वा शक्राय च त्रिविष्टपम् ।
व्यापिना तेन रूपेण जगामादर्शनं हरिः ॥
शशास च यथापूर्वमिन्द्रस्त्रैलोक्यमूर्जितः ।
निःशेषं च तदा कालं बलिः पातालमास्थितः ॥
इत्येतत् कथितं तस्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ।
शृणुयाद्यो वामनस्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
बलिप्रह्लादसंवादं मन्त्रितं बलिशुक्रयोः । बलेर्विष्णोश्च चरितं ये स्मरिष्यन्ति मानवाः
नाधयो व्याधयस्तेषां न च मोहाकुलं मनः ।
भविष्यति द्विजश्रेष्ठाः पुंसस्तस्य कदाचन ॥
च्युतराज्यो निजं राज्यमिष्टप्राप्तिं वियोगवान् ।
समाप्नोति महाभागा नरः श्रुत्वा कथामिमाम् ॥
ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो जयते महीम् ।
वैश्यो धनसमृद्धिं च शूद्रः सुखमवाप्नुयात् ।
वामनस्य च माहात्म्यं शृण्वन् पापैः प्रमुच्यते ॥
श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३१ दक्षिणारहित यज्ञ, अविधिपूर्वक किये गये कर्म और ७ ९ व्रतसे रहित अध्ययन तुम्हें फल प्रदान करेंगे । हे बलि! जलके बिना की गयी पूजा, बिना कुशकी की ८० गयी क्रिया और बिना घीके किये गये हवन तुमको फल देंगे । इस स्थानका आश्रय कर जो मनुष्य किन्हीं भी क्रियाओंको करेगा, उसमें कभी भी असुरोंका ८१ अधिकार न होगा । अत्यन्त पवित्र ज्येष्ठाश्रम तथा विष्णुपद सरोवरमें जो श्राद्ध, दान, व्रत या नियम- पालन ८२ करेगा तथा विधि या अविधिपूर्वक जो कोई क्रिया वहाँ की जायगी, उसके लिये वे सभी निःसंदेह अक्षय फलदायी होगा । जो मनुष्य ज्येष्ठमासके शुक्ल ८३ पक्षमें एकादशीके दिन उपवास कर द्वादशीके दिन विष्णुपद नामके सरोवरमें स्नान कर वामनका दर्शन करनेके बाद यथाशक्ति दान देगा, वह परम पदको ८४ प्राप्त करेगा ॥ ७८–८४ ॥ लोमहर्षणजी बोले - भगवान् उस सर्वव्यापी रूपसे बलिको यह वरदान तथा इन्द्रको स्वर्ग प्रदानकर ८५ अन्तर्हित हो गये । तबसे बलशाली इन्द्र पहलेकी भाँति तीनों लोकोंका शासन करने लगे और बलि सर्वदा ८६ पातालमें निवास करने लगे । इस प्रकार उन भगवान् ( वामन ) विष्णुका उत्तम माहात्म्य कहा गया; जो इसे ( वामन - माहात्म्यको ) सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त ८७ हो जाता है । द्विजश्रेष्ठो! बलि एवं प्रह्लादके संवाद, | बलि एवं शुक्रकी मन्त्रणा तथा बलि एवं विष्णुके ॥ ८८ चरितका जो मनुष्य स्मरण करेंगे, उन्हें कभी कोई आधि एवं व्याधि न होगी तथा उनका मन भी मोहसे ८ ९ । आकुल नहीं होगा । हे महाभागो! इस कथाको सुनकर राज्यच्युत व्यक्ति अपने राज्यको एवं वियोगी मनुष्य अपने प्रियको प्राप्त करता है । ( इनको सुननेसे ) ९ ० ब्राह्मणको वेदकी प्राप्ति होती है, क्षत्रिय पृथ्वीकी जय प्राप्त करता है तथा वैश्यको धन - समृद्धि एवं शूद्रको सुखकी प्राप्ति होती है । वामनका माहात्म्य सुननेसे ९९ । पापोंसे मुक्ति होती है ॥८५ – ९ १ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३१ ॥
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अध्याय ३२ ] सरस्वती नदीका वर्णन - उसका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना १४ ९ बत्तीसवाँ अध्याय सरस्वती नदीका वर्णन - उसका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना ऋषय ऊचुः
कथमेषा समुत्पन्ना नदीनामुत्तमा नदी ।
सरस्वती महाभागा कुरुक्षेत्रप्रवाहिनी ॥
कथं सरः समासाद्य कृत्वा तीर्थानि पार्श्वतः ।
प्रयाता पश्चिमामाशां दृश्यादृश्यगतिः शुभा ।
एतद् विस्तरतो ब्रूहि तीर्थवंशं सनातनम् ॥
लोमहर्षण उवाच
प्लक्षवृक्षात् समुद्भूता सरिच्छ्रेष्ठा सनातनी ।
सर्वपापक्षयकरी स्मरणादेव नित्यशः ॥
सैषा शैलसहस्त्राणि विदार्य च महानदी ।
प्रविष्टा पुण्यतोयौघा वनं द्वैतमिति स्मृतम् ॥
तस्मिन् प्लक्षे स्थितां दृष्ट्वा मार्कण्डेयो महामुनिः ।
प्रणिपत्य तदा मूर्ध्ना तुष्टावाथ सरस्वतीम् ॥
त्वं देवि सर्वलोकानां माता देवारणिः शुभा ।
सदसद् देवि यत्किंचिन्मोक्षदाय्यर्थवत् पदम् ॥
तत् सर्वं त्वयि संयोगि योगिवद् देवि संस्थितम् ।
अक्षरं परमं देवि यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
अक्षरं परमं ब्रह्म विश्वं चैतत् क्षरात्मकम् ॥
दारुण्यवस्थितो वह्निर्भूमौ गन्धो यथा ध्रुवम् । तथा त्वयि स्थितं ब्रह्म जगच्चेदमशेषतः ।
ॐकाराक्षरसंस्थानं यत् तद् देवि स्थिरास्थिरम् ।
तत्र मात्रात्रयं सर्वमस्ति यद् देवि नास्ति च ॥
यो लोकास्त्रयो वेदास्त्रैविद्यं पावकत्रयम् ।
त्रीणि ज्योतींषि वर्गाश्च त्रयो धर्मादयस्तथा ॥
ऋषियोंने पूछा- ( लोमहर्षणजी! ) कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होनेवाली नदियोंमें श्रेष्ठ भाग्यशालिनी यह १ सरस्वती नदी कैसे उत्पन्न हुई? सरोवरमें जाकर अगल - बगलमें ( अपने दोनों तटोंपर ) तीर्थोंकी स्थापना करती हुई दृश्य और अदृश्यरूपसे यह शुभ नदी किस प्रकार पश्चिम दिशाको गयी? इस सनातन तीर्थ- वंशका २ विस्तारपूर्वक वर्णन करें ॥१-२ ॥ लोमहर्षण कहा— ( ऋषियो! ) स्मरण करनेमात्रसे ही नित्य सभी पापोंको नष्ट करनेवाली यह ३ सनातनी श्रेष्ठ ( सरस्वती ) नदी पाकड़ वृक्षसे उत्पन्न हुई है । यह पवित्र जलधारमयी महानदी हजारों पर्वतोंको ४ तोड़ती - फोड़ती हुई प्रसिद्ध द्वैत वनमें प्रविष्ट हुई, ऐसी प्रसिद्धि है । महामुनि मार्कण्डेयने उस प्लक्षवृक्षमें स्थित सरस्वती नदीको देखकर सिरसे ( सिर झुकाकर नम्रतापूर्वक ) ५ प्रणाम करनेके बाद उसकी स्तुति की - हे देवि! आप सभी लोकोंकी माता एवं देवोंकी शुभ अरणि हैं । देवि! ६ समस्त सद्, असद्, मोक्ष देनेवाले एवं अर्थवान् पद, यौगिक क्रियासे युक्त पदार्थकी भाँति आपमें मिलकर स्थित हैं । देवि! अक्षर परमब्रह्म तथा यह विनाशशील ७ समस्त संसार आपमें प्रतिष्ठित है ॥ ३–७ ॥ जिस प्रकार काठमें आग एवं पृथिवीमें गन्धकी ८ निश्चित स्थिति होती है, उसी प्रकार तुम्हारे भीतर ब्रह्म और यह सम्पूर्ण जगत् नित्य ( सदा ) स्थित हैं । देवि! जो कुछ भी स्थिर ( अचर ) तथा अस्थिर ( चर ) है, वह सब ओंकार अक्षरमें अवस्थित है । जो कुछ भी ९ अस्तित्वयुक्त है या अस्तित्वविहीन, उन सबमें ओंकारकी तीन मात्राएँ ( अनुस्यूत ) हैं । हे सरस्वति! भूः, भुवः, स्वः– ये तीनों लोक; ऋक्, यजुः साम- ये तीनों वेदं; आन्वीक्षिकी, त्रयी और वार्ता - ये तीनों विद्याएँ; गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि- ये तीनों अग्नियाँ; सूर्य, चन्द्र, १० अग्नि – ये तीनों ज्योतियाँ; धर्म, अर्थ, काम – ये तीनों
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यो गुणास्त्रयो वर्णास्त्रयो देवास्तथा क्रमात् ।
त्रैधातवस्तथावस्थाः पितरश्चैवमादयः ॥
एतन्मात्रात्रयं देवि तव रूपं सरस्वति ।
विभिन्नदर्शनामाद्यां ब्रह्मणो हि सनातनीम् ॥
सोमसंस्था हविः संस्था पाकसंस्था सनातनी ।
तास्त्वदुच्चारणाद् देवि क्रियन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥
अनिर्देश्यपदं त्वेतदर्द्धमात्राश्रितं परम् ।
अविकार्यक्षयं दिव्यं परिणामविवर्जितम् ॥
तवैतत् परमं रूपं यन्न शक्यं मयोदितुम् ।
न चास्येन न वा जिह्वाताल्वोष्ठादिभिरुच्यते ॥
स विष्णुः स वृषो ब्रह्मा चन्द्रार्कज्योतिरेव च ।
विश्वावासं विश्वरूपं विश्वात्मानमनीश्वरम् ॥
सांख्यसिद्धान्तवेदोक्तं बहुशाखास्थिरीकृतम् ।
अनादिमध्यनिधनं सदसच्च सदेव तु ॥
एकं त्वनेकधाप्येकभाववेदसमाश्रितम् ।
अनाख्यं षड्गुणाख्यं च बह्वाख्यं त्रिगुणाश्रयम् ॥
नानाशक्तिविभावज्ञं नानाशक्तिविभावकम् ।
सुखात् सुखं महत्सौख्यं रूपं तत्त्वगुणात्मकम् ॥
एवं देवि त्वया व्याप्तं सकलं निष्कलं च यत् ।
अद्वैतावस्थितं ब्रह्म यच्च द्वैते व्यवस्थितम् ॥
येऽर्था नित्या ये विनश्यन्ति चान्ये as स्थूला ये तथा सन्ति सूक्ष्माः । ये वा भूमौ येऽन्तरिक्षेऽन्यतो वा तेषां देवि त्वत्त एवोपलब्धिः ॥ यद्वा यदमूर्त समस्तं यद्वा भूतेष्वेकमेकं च किंचित् । यच्च द्वैते व्यस्तभूतं च लक्ष्यं तत्सम्बद्धं त्वत्स्वरैर्व्यञ्जनैश्च श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३२ वर्ग; सत्त्व, रज, तम – ये तीनों गुण; ब्राह्मण, क्षत्रिय, ११ वैश्य – ये तीनों वर्ण; तीनों देव; वात, पित्त, कफ-ये तीनों धातुएँ तथा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति – ये तीनों अवस्थाएँ एवं पिता, पितामह प्रपितामह - ये तीनों पितर इत्यादि - ये सभी ओंकारके मात्रात्रयस्वरूप आपके रूप हैं । आपको ब्रह्मकी विभिन्न रूपोंवाली १२ आद्या एवं सनातनी मूर्ति कहा जाता है ॥ ८-१२ ॥ देवि! ब्रह्मवादी लोग आपकी शक्तिसे ही १३ उच्चारण करके सोमसंस्था, हविःसंस्था एवं सनातनी पाकसंस्थाको सम्पन्न करते हैं । अर्धमात्रामें आश्रित | आपका यह अनिर्देश्य पद अविकारी, अक्षय, दिव्य १४ तथा अपरिणामी है । यह आपका अनिर्देश्य पद परम रूप है, जिसका वर्णन मैं नहीं कर सकता । न तो मुखसे ही इसका वर्णन हो सकता है और न जिह्वा, १५ तालु, ओष्ठ आदिसे ही । तुम्हारा वह रूप ही विष्णु, वृष ( धर्म ), ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य एवं ज्योति है । उसीको विश्वावास, विश्वरूप, विश्वात्मा एवं अनीश्वर १६ ( स्वतन्त्र ) कहते हैं ॥ १३ - १६ ॥ आपका यह रूप सांख्य - सिद्धान्त तथा वेदद्वारा १७ वर्णित, ( वेदोंकी ) बहुत सी शाखाओं द्वारा स्थिर किया हुआ, आदि - मध्य - अन्तसे रहित, सत् - असत् अथवा एकमात्र सत् ( ही ) है । यह एक तथा अनेक प्रकारका, १८ वेदोंद्वारा एकाग्र भक्तिसे अवलम्बित, आख्या ( नाम ) -विहीन, ऐश्वर्य आदि षड्गुणोंसे युक्त, बहुत नामोंवाला तथा त्रिगुणाश्रय है । आपका यह तत्त्वगुणात्मक रूप १ ९ सुखसे भी परम सुख, महान् सुखरूप नाना शक्तियोंके विभावको जाननेवाला है । हे देवि! वह अद्वैत तथा द्वैतमें आश्रित ' निष्कल ' तथा ' सकल ब्रह्म ' आपके २० द्वारा व्याप्त है ॥ १७–२० ॥ ( सरस्वती ) देवि! जो पदार्थ नित्य हैं तथा जो विनष्ट हो जानेवाले हैं, जो पदार्थ स्थूल हैं तथा जो सूक्ष्म हैं, जो भूमिपर हैं तथा जो अन्तरिक्षमें हैं या जो इनसे २१ भिन्न स्थानोंमें हैं, उन समस्त पदार्थोंकी प्राप्ति आपसे ही होती है । जो मूर्त या अमूर्त है वह सब कुछ और जो सब भूतोंमें एक रूपसे स्थित है एवं केवल एकमात्र है और जो द्वैतमें अलग - अलग रूपसे दिखलायी पड़ता ॥ २२ । है, वह सब कुछ आपके स्वर - व्यञ्जनोंसे सम्बद्ध है ।