वामन पुराण — पृष्ठ 171–180

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180

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अध्याय ३६ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य

य आपगां नदीं गत्वा तिलैः संतर्पयिष्यति ।

तेन तृप्ता भविष्यामो यावत्कल्पशतं गतम् ॥ ५

नभस्ये मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे विशेषतः ।

चतुर्दश्यां तु मध्याह्ने पिण्डदो मुक्तिमाप्नुयात् ॥ ६

ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ।

ब्रह्मोदुम्बरमित्येवं सर्वलोकेषु विश्रुतम् ॥ ७

तत्र ब्रह्मर्षिकुण्डेषु स्त्रातस्य द्विजसत्तमाः ।

सप्तर्षीणां प्रसादेन सप्तसोमफलं भवेत् ॥ ८

भरद्वाजो गौतमश्च जगदग्निश्च कश्यपः ।

विश्वामित्रो वसिष्ठश्च अत्रिश्च भगवानृषिः ॥ ९

एतैः समेत्य तत्कुण्डं कल्पितं भुवि दुर्लभम् ।

ब्रह्मणा सेवितं यस्माद् ब्रह्मोदुम्बरमुच्यते ॥ १०

तस्मिंस्तीर्थवरे स्नातो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।

ब्रह्मलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ११

देवान् पितॄन् समुद्दिश्य यो विप्रं भोजयिष्यति ।

पितरस्तस्य सुखिता दास्यन्ति भुवि दुर्लभम् ॥ १२

सप्तर्षीश्च समुद्दिश्य पृथक् स्नानं समाचरेत् ।

ऋणीणां च प्रसादेन सप्तलोकाधिपो भवेत् ॥ १३

कपिस्थति विख्यातं सर्वपातकनाशनम् ।

यस्मिन् स्थितः स्वयं देवो वृद्धकेदारसंज्ञितः ॥ १४

तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च रुद्रं दिण्डिसमन्वितम् ।

अन्तर्धानमवाप्नोति शिवलोके स मोदते ॥ १५

यस्तत्र तर्पणं कृत्वा पिबते चुलकत्रयम् ।

दिण्डिदेवं नमस्कृत्य केदारस्य फलं लभेत् ॥ १६

यस्तत्र कुरुते श्राद्धं शिवमुद्दिश्य मानवः ।

चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १७

कलस्यां तु ततो गच्छेद् यत्र देवी स्वयं स्थिता ।

दुर्गा कात्यायनी भद्रा निद्रा माया सनातनी ॥ १८

कलस्यां च नरः स्नात्वा दृष्ट्वा दुर्गां तटे स्थिताम् ।

संसारगहनं दुर्गं निस्तरेन्नात्र संशयः ॥ १ ९

एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन १६१ ऐसा पुत्र या पौत्र उत्पन्न होगा, जो आपगा नदीके तटपर जाकर तिलसे तर्पण करेगा, जिससे हम सभी सैकड़ों कल्पतक ( अनन्त कालतक ) तृप्त रहेंगे ॥ १–५ ॥ भाद्रपदके महीनेमें, विशेषकर कृष्णपक्षमें, चतुर्दशी तिथिको मध्याह्न कालमें पिण्डदान करनेवाला मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता । विप्रवरो! उसके बाद समस्त लोकोंमें ' ब्रह्मोदुम्बर ' नामसे प्रसिद्ध ब्रह्माके श्रेष्ठ स्थानमें जाना चाहिये । द्विजवरो! वहाँ ब्रह्मर्षिकुण्डमें स्नान करनेवाले व्यक्तिको सप्तर्षियोंकी कृपासे सात सोमयज्ञोंका फल प्राप्त होता है । भरद्वाज, गौतम, जमदग्नि, कश्यप, विश्वामित्र, वसिष्ठ एवं भगवान् अत्रि ( - इन सात ) ऋषियोंने मिलकर पृथ्वीमें दुर्लभ इस कुण्डको बनाया था । ब्रह्माद्वारा सेवित होनेके कारण यह स्थान ' ब्रह्मोदुम्बर ' कहलाता है ॥ ६ – १० ॥ अव्यक्त जन्मवाले ब्रह्माके उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है – इसमें कोई संदेहकी बात नहीं है । जो मनुष्य वहाँ देवताओं और | पितरोंके उद्देश्य से ब्राह्मणोंको भोजन करायेगा, उसके पितर सुखी होकर उसे संसारमें दुर्लभ वस्तु प्रदान करेंगे । सात ऋषियोंके उद्देश्यसे जो ( व्यक्ति ) अलगसे स्नान करेगा, वह । ऋषियोंके अनुग्रहसे सात लोकोंका स्वामी होगा । वहाँ सभी पापोंका विनाश करनेवाला विख्यात कपिस्थल नामक तीर्थ है, जहाँ वृद्धकेदार नामके देव स्वयं विद्यमान हैं । वहाँ स्नान करनेके बाद दिण्डिके साथ रुद्रदेवका अर्चन करनेसे मनुष्यको अन्तर्धानकी शक्ति प्राप्त होती है और वह शिवलोकमें आनन्द प्राप्त करता है ॥ ११-१५ ॥ जो व्यक्ति उस स्थानपर तर्पण करके दिण्डि भगवान्‌को प्रणाम कर तीन चुल्लू जल पीता है, वह केदारतीर्थमें जानेका फल प्राप्त करता है । जो व्यक्ति वहाँ शिवजीके उद्देश्यसे चैत्र शुक्ला चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करता है, वह परम पद ( मोक्ष ) को प्राप्त कर । लेता है । उसके बाद कलसी नामके तीर्थमें जाना चाहिये जहाँ भद्रा, निद्रा, माया, सनातनी, कात्यायनीरूपा दुर्गादेवी स्वयं अवस्थित हैं । कलसी तीर्थमें स्नानकर उसके तीरपर स्थित दुर्गादेवीका दर्शन करनेवाला मनुष्य दुस्तर संसार-दुर्ग ( सांसारिक भवबन्धन ) - को पार कर जाता है । इसमें । ( तनिक भी ) संदेह नहीं करना चाहिये ॥ १६-१९ ॥

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१६२

ततो गच्छेत सरकं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम् ।

कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ॥

लभते सर्वकामांश्च शिवलोकं स गच्छति । तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां सरके द्विजसत्तमाः

रुद्रकोटिस्तथा कूपे सरोमध्ये व्यवस्थिता ।

तस्मिन् सरे च यः स्नात्वा रुद्रकोटिं स्मरेन्नरः ॥

पूजिता रुद्रकोटिश्च भविष्यति न संशयः ।

रुद्राणां च प्रसादेन सर्वदोषविवर्जितः ॥

ऐन्द्रज्ञानेन संयुक्तः परं पदमवाप्नुयात् । श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३६ दुर्गादेवीके दर्शनके बाद तीनों लोकोंमें दुर्लभ २० सरकतीर्थमें जाना चाहिये । वहाँ कृष्णपक्षको चतुर्दशी तिथिको माहेश्वरदेवका दर्शन करके मनुष्य ( अपने ) सभी मनोरथोंको प्राप्त करता और ( अन्तमें ) शिवलोकमें ॥ २१ चला जाता है । द्विजश्रेष्ठो! सरकतीर्थमें तीन करोड़ तीर्थ विद्यमान हैं । सरके बीच कूपमें रुद्रकोटि स्थित है । उस सरमें यदि व्यक्ति स्नान कर रुद्रकोटिका २२ स्मरण करता है तो नि: संदेह ( उसके द्वारा ) रुद्रकोटि पूजित हो जाते हैं और रुद्रोंके प्रसादसे वह व्यक्ति २३ समस्त दोषोंसे छूट जाता है । वह इन्द्रसम्बन्धी ज्ञानसे पूरित होकर परम पदको प्राप्त कर लेता है । वहीं पापों और भयोंका दूर करनेवाला इडास्पद नामका इडास्पदं च तत्रैव तीर्थं पापभयापहम् ॥ २४ तीर्थ वर्तमान है ॥२०–२४ ॥ अस्मिन् मुक्तिमवाप्नोति दर्शनादेव मानवः । तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितृदेवगणानपि न दुर्गतिमवाप्नोति मनसा चिन्तितं लभेत् । केदारं च महातीर्थं सर्वकल्मषनाशनम् तत्र स्नात्वा तु पुरुषः सर्वदानफलं लभेत् ।

किंरूपं च महातीर्थं तत्रैव भुवि दुर्लभम् ।

तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषः सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥

सरकस्य तु पूर्वेण तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् अन्यजन्म सुविख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् नारसिंहं वपुः कृत्वा हत्वा दानवमूर्जितम् तिर्यग्योनौ स्थितो विष्णुः सिंहेषु रतिमाप्नुवन् ततो देवाः सगन्धर्वा आराध्य वरदं शिवम् ऊचुः प्रणतसर्वाङ्गा विष्णुदेहस्य लम्भने ततो देवो महात्माऽसौ शारभं रूपमास्थितः युद्धं च कारयामास दिव्यं वर्षसहस्रकम् युध्यमानौ तु तौ देवौ पतितौ सरमध्यतः तस्मिन् सरस्तटे विप्रो देवर्षिर्नारदः स्थितः अश्वत्थवृक्षमाश्रित्य ध्यानस्थस्तौ ददर्श ह इस इडास्पद नामके तीर्थके दर्शनसे ही मनुष्य ॥ २५ मुक्तिको प्राप्त कर लेता है । वहाँ स्नान करके पितरों एवं देवोंका पूजन करनेसे मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती और उसे मनोवाञ्छित वस्तु प्राप्त होती है । सभी पापोंका ॥ २६ विनाश करनेवाला केदार नामक महातीर्थ है । वहाँ जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको सभी प्रकारके दानोंका फल प्राप्त होता है । वहींपर पृथ्वीमें दुर्लभ किंरूप २७ नामका ( भी ) तीर्थ है । उसमें स्नान करनेवाले मनुष्यको सभी प्रकारके यज्ञोंका फल प्राप्त होता है । सरकके । पूर्वमें तीनों लोकोंमें सुप्रसिद्ध सम्पूर्ण पापोंका विनाश ॥ २८ करनेवाला अन्यजन्म नामका तीर्थ है ॥ २५–२८ ॥ । नरसिंहका शरीर धारण कर शक्तिशाली दानव ॥ २ ९ ( हिरण्याक्ष ) - का वध करनेके बाद विष्णु पशुयोनिमें स्थित सिंहोंमें प्रेम करने लगे । उसके बाद गन्धर्वोके । साथ सभी देवताओंने वरदाता शिवकी आराधना कर ॥ ३० साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए विष्णुसे पुनः स्वदेह ( स्वरूप ) । धारण करनेकी प्रार्थना की । उसके बाद ( फिर ) । महादेवने शरभ ( सिंहोंसे भी बलवान् पशु - विशेष ) -का ॥ ३१ रूप धारण करके ( नरसिंहसे ) हजारों दिव्य वर्षोंतक युद्ध किया - कराया । दोनों देवता ( आपसमें ) युद्ध करते । हुए सरोवरमें गिर पड़े । उस सरोवरके तीरपर ( स्थित ) ॥ ३२ । अश्वत्थ ( पीपल ) - वृक्षके नीचे देवर्षि नारद ध्यान लगाये

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अध्याय ३६ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन १६३ विष्णुश्चतुर्भुजो जज्ञे लिङ्गाकारः शिवः स्थितः तौ दृष्ट्वा तत्र पुरुषौ तुष्टाव भक्तिभावितः नमः शिवाय देवाय विष्णवे प्रभविष्णवे हरये च उमाभर्त्रे स्थितिकालभृते नमः हराय बहुरूपाय विश्वरूपाय विष्णवे त्र्यम्बकाय सुसिद्धाय कृष्णाय ज्ञानहेतवे धन्योऽहं सुकृती नित्यं यद् दृष्टौ पुरुषोत्तमौ ममाश्रममिदं पुण्यं युवाभ्यां विमलीकृतम् अद्यप्रभृति त्रैलोक्ये अन्यजन्मेति विश्रुतम् य इहागत्य स्नात्वा च पितॄन् संतर्पयिष्यति तस्य श्रद्धान्वितस्येह ज्ञानमैन्द्रं भविष्यति अश्वत्थस्य तु यन्मूलं सदा तत्र वसाम्यहम् अश्वत्थवन्दनं कृत्वा यमं रौद्रं न पश्यति ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा नागस्य हृदमुत्तमम् । पौण्डरीके नरः स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत् दशम्यां शुक्लपक्षस्य चैत्रस्य तु विशेषतः । स्नानं जपं तथा श्राद्धं मुक्तिमार्गप्रदायकम् ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत् तीर्थं देवनिषेवितम् । तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रमोचनी

तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् ।

सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छत्येव परां गतिम् ॥

ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा रसावर्त्तमनुत्तमम् ।

तत्र स्नात्वा भक्तियुक्तः सिद्धिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥

। बैठे थे । उन्होंने उन दोनोंको देखा । ( फिर तो ) विष्णु चतुर्भुजरूपमें और शिव लिङ्गरूपमें ( परिवर्तित ) हो ॥ ३३ गये । उन दोनों पुरुषों ( देवों ) को देखकर उन्होंने भक्तिभावसे उनकी स्तुति की ॥ २ ९ - ३३ ॥ । [ नारदजीने स्तुति की ] - देवाधिदेव शिवको ॥ ३४ नमस्कार है । प्रभावशाली विष्णुको नमस्कार है । स्थिति ( प्रजापालन ) करनेवाले श्रीहरिको नमस्कार है । संहारके आधारभूत उमापति भगवान् शिवको नमस्कार है ॥ बहुरूपधारी शङ्करजी एवं विश्वरूपधारी ( विश्वात्मा ) ॥ ३५ विष्णुको नमस्कार है । परमसिद्ध ( योगीश्वर ) शङ्कर एवं ज्ञानके मूल कारण भगवान् कृष्णको नमस्कार है । मैं धन्य तथा सदा पुण्यवान् हूँ; क्योंकि मुझे ( आज ) आप । दोनों ( श्रेष्ठ ) पुरुषों ( देवों ) - के दर्शन प्राप्त हुए । आप । दोनों पुरुषोंद्वारा पवित्र किया गया मेरा यह आश्रम ॥ ३६ । पुण्यमय हो गया । आजसे तीनों लोकोंमें यह ' अन्यजन्म ' नामसे प्रसिद्ध हो जायगा । जो व्यक्ति यहाँ आकर इस तीर्थमें स्नान कर अपने पितरोंका तर्पण करेगा श्रद्धासे । सम्पन्न उस पुरुषको यहाँ इन्द्र - सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त हो ॥ ३७ जायगा ॥ ३४–३७ ॥ । मैं पीपल वृक्षके मूलमें सदा निवास करूँगा । उस ॥ ३८ अश्वत्थ ( पीपल वृक्ष ) - को प्रणाम करनेवाला व्यक्ति भयंकर यमराजको नहीं देखेगा । श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसके बाद ( उस तीर्थसेवीको ) उत्तम नागह्रदमें जाना चाहिये । ॥ ३ ९ पौण्डरीकमें स्नान करके मनुष्य पुण्डरीक ( एक प्रकारके यज्ञ ) - का फल प्राप्त करता है । शुक्लपक्षकी दशमी, विशेषकर चैत्रमासकी ( शुक्ला ) दशमी तिथिमें ॥ ४० वहाँ किया गया स्नान, जप और श्राद्ध मोक्षपथकी प्राप्ति करानेवाला होता है । पुण्डरीकमें स्नान करनेके बाद देवताओं द्वारा पूजित ' त्रिविष्टप ' नामक तीर्थमें जाना चाहिये । वहाँ पापोंसे विमुक्त करनेवाली पवित्र ॥ ४१ वैतरणी नदी है । वहाँ स्नानकर शूलपाणि वृषध्वज ( शिव ) - की पूजा कर मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा विशुद्ध होकर निश्चय ही परमगतिको ४२ प्राप्त कर लेता है ॥ ३८–४२ ॥ विप्रश्रेष्ठो! तत्पश्चात् सर्वश्रेष्ठ रसावर्त्त ( तीर्थ ) - में ४३ । जाना चाहिये । वहाँ भक्तिसहित स्नान करनेवाला सर्वश्रेष्ठ

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चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां तीर्थे स्नात्वा ह्यलेपके ।

पूजयित्वा शिवं तत्र पापलेपो न विद्यते ॥

ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः फलकीवनमुत्तमम् ।

यत्र देवाः सगन्धर्वाः साध्याश्च ऋषयः स्थिताः ।

तपश्चरन्ति विपुलं दिव्यं वर्षसहस्त्रकम् ॥

दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ।

अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति मानवः ॥

सोमक्षये च सम्प्राप्ते सोमस्य च दिने तथा ।

यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

गयायां च यथा श्राद्धं पितॄन् प्रीणाति नित्यशः ।

तथा श्राद्धं च कर्तव्यं फलकीवनमाश्रितैः ॥

मनसा स्मरते यस्तु फलकीवनमुत्तमम् ।

तस्यापि पितरस्तृप्तिं प्रयास्यन्ति न संशयः ॥

तत्रापि तीर्थं सुमहत् सर्वदेवैरलंकृतम् ।

तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो गोसहस्रफलं लभेत् ॥

पाणिखाते नरः स्नात्वा पितॄन् संतर्प्य मानवः ।

अवाप्नुयाद् राजसूयं सांख्यं योगं च विन्दति ॥

ततो गच्छेत सुमहत्तीर्थं मिश्रकमुत्तमम् ।

तत्र तीर्थानि मुनिना मिश्रितानि महात्मना ॥

व्यासेन मुनिशार्दूला दधीच्यर्थं महात्मना ।

सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः ॥

ततो व्यासवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः । श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३६ सिद्धि ( मुक्ति ) प्राप्त करता है । चैत्रमासके शुक्लपक्षकी ४४ चतुर्दशी ( चौदस ) तिथिको ' अलेपक ' नामक तीर्थमें स्नान कर वहाँ शिवकी पूजा करनेसे पापसे लिप्त नहीं होता – पाप दूर भाग जाता है । विप्रवरो! वहाँसे उत्तम फलकीवनमें जाना चाहिये । वहाँ देवता, गन्धर्व, साध्य ४५ और ऋषिलोग रहते हैं एवं दिव्य सहस्र वर्षोंतक बहुत तप करते हैं । दृषद्वती ( कग्गर ) नदीमें स्नानकर देवताओंका तर्पण करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्र नामक ४६ यज्ञोंसे मिलनेवाले फलको प्राप्त करता है॥४३–४६ ॥ सोमवारके दिन चन्द्रमाके क्षीण हो जानेपर अर्थात् ४७ सोमवती अमावास्याको जो मनुष्य श्राद्ध करता है, उसका पुण्यफल सुनो । जैसे गया क्षेत्रमें किया गया श्राद्ध पितरोंको नित्य तृप्त करता है, वैसे ही फलकीवनमें रहनेवालोंको ४८ श्राद्ध करनेसे पितरोंको तृप्ति होती है । जो मनुष्य मनसे फलकीवनका स्मरण करता है, उसके भी पितर निःसंदेह ४ ९ तृप्ति प्राप्त करते हैं । वहीं सभी देवोंसे सुशोभित एक | ' सुमहत् ' तीर्थ है; उसमें स्नान करनेवाला पुरुष हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त करता है । मानव पाणिखात ५० तीर्थमें स्नान करके एवं पितरोंका तर्पण कर राजसूय-यज्ञ तथा सांख्य ( ज्ञान ) और योग ( कर्म ) - के अनुष्ठान ५१ करनेसे होनेवाले फलको प्राप्त करता है ॥ ४७ – ५१ ॥ पाणिखातके बाद ' मिश्रक ' नामक महान् एवं श्रेष्ठ ५२ तीर्थमें जाना चाहिये । मुनिश्रेष्ठो! वहाँ महात्मा व्यासदेवने दधीचिऋषिके हेतु तीर्थोंको एकमें मिश्रित किया था । इस मिश्रकतीर्थमें स्नान कर लेनेवाला मनुष्य ( मानो ) ५३ सभी तीर्थोंमें स्नान कर लेता है । फिर संयमशील तथा नियमित आहार करनेवाला होकर व्यासवनमें जाना मनोजवे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवमणिं शिवम् ॥ ५४ चाहिये । ‘ मनोजव ' तीर्थमें स्नानकर ' देवमणि ' शङ्करका

मनसा चिन्तितं सर्व सिध्यते नात्र संशयः ।

गत्वा मधुवटीं चैव देव्यास्तीर्थं नरः शुचिः ॥

तत्र स्नात्वाऽर्चयेद् देवान् पितॄंश्च प्रयतो नरः ।

स देव्या समनुज्ञातो यथा सिद्धिं लभेन्नरः ॥

कौशिक्याः संगमे यस्तु दृषद्वत्यां नरोत्तमः । स्नायीत नियताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते दर्शन करनेसे मनुष्यको अभीष्ट सिद्धिकी प्राप्ति होती है - इसमें संदेह नहीं । मनुष्यको देवीके मधुवटी नामक ५५ तीर्थमें जाकर स्नान करके संयत होकर देवों एवं पितरोंकी पूजा करनी चाहिये । ऐसा करनेवाला व्यक्ति देवीकी आज्ञासे ( जैसी चाहता है, वैसी ) सिद्धि प्राप्त ५६ कर लेता है ॥५२–५६ ॥ जो मनुष्य ' कौशिकी ' और ' दृषद्वती ' ( कग्गर ) नदियोंके संगममें स्नान करता और नियत भोजन करता ॥ ५७ । है, वह श्रेष्ठ पुरुष सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ।

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अध्याय ३६ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन १६५

ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता ।

पुत्रशोकाभिभूतेन देहत्यागाय निश्चयः ॥

कृतो देवैश्च विप्रेन्द्राः पुनरुत्थापितस्तदा ।

अभिगम्य स्थलीं तस्य पुत्रशोकं न विन्दति ॥

किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च ।

गच्छेत परमां सिद्धिं ऋणैर्मुक्तिमवाप्नुयात् ॥

अह्नं च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे भुवि दुर्लभे ।

तयोः स्नात्वा विशुद्धात्मा सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥

कृतजप्यं ततो गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।

तत्राभिषेकं कुर्वीत गङ्गायां प्रयतः स्थितः ॥

अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत् ।

कोटितीर्थं च तत्रैव दृष्ट्वा कोटीश्वरं प्रभुम् ॥

तत्र स्नात्वा श्रद्दधानः कोटियज्ञफलं लभेत् ।

ततो वामनकं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥

यत्र वामनरूपेण विष्णुना प्रभविष्णुना ।

बलेरपहृतं राज्यमिन्द्राय प्रतिपादितम् ॥

तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा च वामनम् ।

सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥

ज्येष्ठाश्रमं च तत्रैव सर्वपातकनाशनम् ।

तं तु दृष्ट्वा नरो मुक्तिं संप्रयाति न संशयः ॥

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे एकादश्यामुपोषितः ।

द्वादश्यां च नरः स्नात्वा ज्येष्ठत्वं लभते नृषु ॥

तत्र प्रतिष्ठिता विप्रा विष्णुना प्रभविष्णुना ।

दीक्षाप्रतिष्ठासंयुक्ता विष्णुप्रीणनतत्पराः ॥

तेभ्यो दत्तानि श्राद्धानि दानानि विविधानि च ।

अक्षयाणि भविष्यन्ति यावन्मन्वन्तरस्थितिः ॥

तत्रैव कोटितीर्थं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।

तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा कोटियज्ञफलं लभेत् ॥

श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ' व्यासस्थली ' नामका एक स्थान है, जहाँ ५८ पुत्रशोकसे दुःखी होकर वेदव्यासने अपने शरीरत्यागका निश्चय कर लिया था, पर देवोंने उन्हें पुन: सँभाल लिया । उसके बाद उस भूमिमें जानेवाले मनुष्यको ५ ९ पुत्रशोक नहीं होता । ' किंदत्त कूप ' में जाकर एक पसर ( तौलका एक परिमाण ) तिलका दान करनेसे मनुष्य ६० परमसिद्धि और ऋणसे मुक्ति प्राप्त करता है । ' अह्न ' एवं ' सुदिन ' नामक ये दो तीर्थ पृथ्वीमें दुर्लभ हैं । इन दोनोंमें स्नान करनेसे मनुष्य विशुद्धात्मा होकर सूर्यलोकको ६१ प्राप्त करता है ॥ ५७ – ६१ ॥ उसके बाद तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध ' कृतजप्य ' ६२ नामके तीर्थमें जाना चाहिये । वहाँ नियमपूर्वक संयत रहते हुए गङ्गामें स्नान करना चाहिये । वहाँपर महादेवका पूजन करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है । ६३ वहींपर कोटितीर्थ स्थित है । वहाँ श्रद्धापूर्वक स्नानकर ' कोटीश्वर ' नाथका दर्शन करनेसे मनुष्य कोटि यज्ञोंका ६४ फल प्राप्त कर लेता है । उसके बाद तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध ' वामनक ' तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ प्रभावशाली विष्णुने वामनरूप धारणकर बलिका राज्य छीन कर ६५ इन्द्रको दे दिया था ॥ ६२–६५ ॥ वहाँ ' विष्णुपद ' तीर्थमें स्नान कर वामनदेवकी ६६ पूजा कर समस्त पापोंसे शुद्ध होकर ( छूटकर ) मनुष्य विष्णुके लोकको प्राप्त कर लेता है । वहींपर सभी पापोंको नष्ट करनेवाला ज्येष्ठाश्रम नामका तीर्थ है, ६७ उसका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है - इसमें संदेह नहीं । ज्येष्ठ महीनेके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिको उपवास कर द्वादशी तिथिके दिन स्नानकर मानव मनुष्योंमें श्रेष्ठता ( बड़प्पन ) प्राप्त करता है । वहाँ ६८ ( सर्वाधिक ) प्रभावशाली विष्णुभगवान्ने यज्ञादिमें दीक्षित ( लगे हुए ), प्रतिष्ठित एवं सम्मान्य तथा विष्णु-भगवान्‌की आराधनामें परायण ब्राह्मणोंको सम्मानित ६ ९ किया था ॥ ६६–६९ ॥ उन्हें दिये गये ( पात्रक ) श्राद्ध और अनेक ७० प्रकारके दान अक्षय एवं मन्वन्तरतक स्थिर रहते हैं । वहीं तीनों लोकोंमें विख्यात ' कोटितीर्थ ' है । उस तीर्थमें ७१ । स्नानकर मनुष्य करोड़ों यज्ञोंके फल प्राप्त करता है ।

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कोटीश्वरं नरो दृष्ट्वा तस्मिंस्तीर्थे महेश्वरम् ।

महादेवप्रसादेन गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥

तत्रैव सुमहत् तीर्थं सूर्यस्य च महात्मनः ।

तस्मिन् स्नात्वा भक्तियुक्तः सूर्यलोके महीयते ॥

ततो गच्छेत विप्रेन्द्रास्तीर्थं कल्मषनाशनम् ।

कुलोत्तारणनामानं विष्णुना कल्पितं पुरा ॥

वर्णानामाश्रमाणां च तारणाय सुनिर्मलम् ।

ब्रह्मचर्यात्परं मोक्षं य इच्छन्ति सुनिर्मलम् ।

तेऽपि तत्तीर्थमासाद्य पश्यन्ति परमं पदम् ॥

ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा ।

कुलानि तारयेत् स्त्रातः सप्त सप्त च सप्त च ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये तत्परायणाः ।

स्नाता भक्तियुताः सर्वे पश्यन्ति परमं पदम् ॥

दूरस्थोऽपि स्मरेद् यस्तु कुरुक्षेत्रं सवामनम् । सोऽपि मुक्तिमवाप्नोति किं पुनर्निवसन्नरः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३७ उस तीर्थमें ' कोटीश्वर महादेवका दर्शन कर मनुष्य उन ७२ महादेवकी कृपासे गाणपत्य पद ( गणनायकत्वकी उपाधि ) प्राप्त करता है । और वहीं महात्मा सूर्यदेवका महान् तीर्थ है । उसमें भक्तिपूर्वक स्नानकर मनुष्य सूर्यलोकमें ७३ महान् माना जाता है ॥ ७०–७३ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कोटि तीर्थके बाद पापका नाश ७४ करनेवाले ' कुलोत्तारण तीर्थ ' में जाना चाहिये, जिसे प्राचीनकालमें विष्णुने वर्णाश्रम धर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंको तारनेके लिये बनाया था । जो मनुष्य ब्रह्मचर्यव्रतसे विशुद्ध मुक्तिकी इच्छा करते हैं ऐसे लोग ७५ भी उस तीर्थमें जाकर परम पदका दर्शन कर लेते हैं । ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी वहाँ स्नानकर अपने कुलके ( ७ + ७ + ७ = २१ ) इक्कीस पूर्व पुरुषोंका ७६ उद्धार कर देते हैं । जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र उस तीर्थमें तीर्थपरायण होकर एवं भक्तिसे स्नान करते ७७ हैं, वे सभी परम पदका दर्शन करते हैं । और जो दूर रहता हुआ भी वामनसहित कुरुक्षेत्रका स्मरण करता है, वह भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है; फिर वहाँ निवास ॥ ७८ । करनेवालेका तो कहना ही क्या? ॥ ७४ – ७८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३६ ॥

सैंतीसवाँ अध्याय कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन लोमहर्षण उवाच पवनस्य हृदे स्नात्वा दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् । विमुक्तः कलुषैः सर्वैः शैवं पदमवाप्नुयात् पुत्रशोकेन पवनो यस्मिल्लीनो बभूव ह ततः सब्रह्मकैर्देवैः प्रसाद्य प्रकटीकृतः अतो गच्छेत अमृतं स्थानं तच्छूलपाणिनः यत्र देवैः सगन्धर्वैः हनुमान् प्रकटीकृतः लोमहर्षण बोले- पवनके ह्रदमें, पुत्र ( हनुमानूजी ) -के शोकके कारण जिस सरोवरमें पवन लीन हो गये थे, ॥ १ । उसमें स्नान करके महेश्वरदेवका दर्शन कर मनुष्य समस्त पापोंसे विमुक्त हो शिवपदको प्राप्त करता है । उसके । बाद ब्रह्माके साथ सभी देवोंने मिलकर उन्हें प्रसन्न एवं ॥ २ प्रत्यक्ष प्रकट किया । यहाँसे शूलपाणि ( भगवान् शंकर ) -। के अमृत नामक स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ गन्धर्वोके ॥ ३ । साथ देवताओंने हनुमानजीको प्रकट किया था ।

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अध्याय ३७ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य और क्रमका पूर्वानुक्रान्त वर्णन १६७

तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा अमृतत्वमवाप्नुयात् ।

कुलोत्तारणमासाद्य तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ॥

कुलानि तारयेत् सर्वान् मातामहपितामहान् ।

शालिहोत्रस्य राजर्षेस्तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥

तत्र स्नात्वा विमुक्तस्तु कलुषैर्देहसंभवैः ।

श्रीकुञ्जं तु सरस्वत्यां तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥

तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या अग्निष्टोमफलं लभेत् ।

ततो नैमिषकुञ्जं तु समासाद्य नरः शुचिः ॥

नैमिषस्य च स्नानेन यत् पुण्यं तत् समाप्नुयात् ।

तत्र तीर्थं महाख्यातं वेदवत्या निषेवितम् ॥

रावणेन गृहीतायाः केशेषु द्विजसत्तमाः ।

तद्बधाय च सा प्राणान् मुमुचे शोककर्शिता ॥

ततो जाता गृहे राज्ञो जनकस्य महात्मनः ।

सीता नामेति विख्याता रामपत्नी पतिव्रता ॥

साहृता रावणेनेह विनाशायात्मनः स्वयम् ।

रामेण रावणं हत्वा अभिषिच्य विभीषणम् ॥

समानीता गृहं सीता कीर्तिरात्मवता यथा ।

तस्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा कन्यायज्ञफलं लभेत् ॥

विमुक्तः कलुषैः सर्वैः प्राप्नोति परमं पदम् ।

ततो गच्छेत सुमहद् ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ॥

यत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः ।

ब्राह्मणश्च विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात् ॥

ततो गच्छेत सोमस्य तीर्थं त्रैलोक्यदुर्लभम् ।

यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा द्विजराज्यमवाप्नुयात् ॥

तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च स्वपितॄन् दैवतानि च ।

निर्मलः स्वर्गमायाति कार्तिक्यां चन्द्रमा यथा ॥

उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य अमृतपदको पा लेता है । ४ नियमानुसार तीर्थका सेवन करनेवाला श्रेष्ठ ब्राह्मण ' कुलोत्तारण'तीर्थमें जाकर अपने मातामह और पितामहके समस्त वंशोंका उद्धार कर देता है । तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध ५ राजर्षि शालिहोत्रके तीर्थमें स्नान कर मुक्त हो मनुष्य शारीरिक पापोंसे सर्वथा छूट जाता है । सरस्वती - क्षेत्रमें ६ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध श्रीकुञ्ज नामक तीर्थ है । उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त कर लेता है । मनुष्य वहाँसे नैमिषकुञ्जतीर्थमें ७ जाकर पवित्र हो जाता है और नैमिषारण्यतीर्थमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, उसे प्राप्त कर लेता है । वहाँ पर ८ ' वेदवती ' से निषेवित बहुत प्रसिद्ध तीर्थ है ॥ १–८ ॥ द्विजश्रेष्ठो! रावणके द्वारा अपने केशके पकड़े ९ जानेपर शोकसे संतप्त होकर ( वेदवतीने ) उसके ( रावणके ) वधके लिये अपने प्राणोंको छोड़ दिया था और उसके बाद महात्मा राजा जनकके घरमें वे उत्पन्न १० हुईं और उनका नाम ' सीता ' विख्यात हुआ तथा वे रामकी पतिव्रता पत्नी हुईं । उस सीताको रावणने स्वयं अपने विनाशके लिये अपहृत कर लिया । सीताके ११ अपहरण हो जानेपर राम - रावण युद्ध हुआ, जिसमें रावणको मारनेके बाद विभीषणको ( लङ्काके राज्यपर ) अभिषिक्त कर राम सीताको वैसे ही घर लौटा लाये, जैसे आत्मवान् ( जितेन्द्रिय ) पुरुष कीर्तिको प्राप्त करता १२ है । उनके तीर्थमें स्नान कर मनुष्य कन्यायज्ञ ( कन्यादान ) -का फल एवं समस्त पापोंसे मुक्त होकर परम पदको । प्राप्त करता है । उस वेदवतीतीर्थके बाद ब्रह्माके उत्तम १३ | और महान् स्थानमें जाना चाहिये, जहाँ स्नान करनेसे अवर वर्णका व्यक्ति ( जन्मान्तरमें ) ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है और ब्राह्मण विशुद्ध अन्तःकरणवाला होकर ९ ४ परम पदकी प्राप्ति करता है ॥ ९ – १४ ॥ उस ब्रह्माके तीर्थस्थलपर जानेके बाद तीनों १५ लोकोंमें दुर्लभ ' सोमतीर्थ ' में जाना चाहिये, जहाँ चन्द्रमाने तपस्या करके द्विजराजत्व - पदको प्राप्त किया था । वहाँ स्नानकर अपने पितरों और देवताओंकी पूजा करनेसे १६ मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान निर्मल

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१६८

सप्तसारस्वतं तीर्थं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम् ।

यत्र सप्त सरस्वत्य एकीभूता वहन्ति च ॥

सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला मानसह्रदा ।

सरस्वत्योघनामा च सुरेणुर्विमलोदका ॥

पितामहस्य यजतः पुष्करेषु स्थितस्य ह ।

अब्रुवन् ऋषयः सर्वे नाऽयं यज्ञो महाफलः ॥

न दृश्यते सरिच्छ्रेष्ठा यस्मादिह सरस्वती ।

तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सस्माराथ सरस्वतीम् ॥

पितामहेन यजता आहूता पुष्करेषु वै ।

सुप्रभा नाम सा देवी तत्र ख्याता सरस्वती ॥

तां दृष्ट्वा मुनयः प्रीता वेगयुक्तां सरस्वतीम् । श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३७ होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है । तीनों लोकोंमें दुर्लभ १७ ' सप्तसारस्वत ' नामक एक तीर्थ है, जहाँ सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, विशाला, मानसहृदा, सरस्वती, ओघवती, विमलोदका एवं सुरेणु नामकी सातों सरस्वतियाँ ( नदियाँ ) एकत्र १८ मिलकर प्रवाहित होती हैं॥१५–१८ ॥ पुष्करतीर्थमें स्थित ब्रह्माजीके यज्ञके अनुष्ठानमें १ ९ | लग जानेपर सभी ऋषियोंने उनसे कहा – आपका यह यज्ञ महाफलजनक नहीं होगा; क्योंकि यहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती ( नदी ) नहीं दिखलायी पड़ रही है । उसे २० सुनकर भगवान्ने प्रसन्नतापूर्वक सरस्वतीका स्मरण किया । पुष्करमें यज्ञ कर रहे ब्रह्माजीद्वारा आहूत की गयी ' सुप्रभा ' नामकी देवी वहाँ सरस्वती नामसे प्रसिद्ध २१ हुईं । ब्रह्माजीका मान करनेवाली उस वेगवती सरस्वतीको देखकर मुनिजन प्रसन्न हो गये और उन सबोंने उनका पितामहं मानयन्तीं तु तां बहु मेनिरे ॥२२ अत्यधिक सम्मान किया ॥१ ९ –२२ ॥

एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करस्था सरस्वती ।

समानीता कुरुक्षेत्रे मङ्कणेन महात्मना ॥

नैमिषे मुनयः स्थित्वा शौनकाद्यास्तपोधनाः ।

ते पृच्छन्ति महात्मानं पौराणं लोमहर्षणम् ॥

कथं यज्ञफलोऽस्माकं वर्ततां सत्पथे भवेत् ।

ततोऽब्रवीन्महाभागः प्रणम्य शिरसा ऋषीन् ॥

सरस्वती स्थिता यत्र तत्र यज्ञफलं महत् । एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो नानास्वाध्यायवेदिनः समागम्य ततः सर्वे सस्मरुस्ते सरस्वतीम् । सा तु ध्याता ततस्तत्र ऋषिभिः सत्रयाजिभिः समागता प्लावनार्थं यज्ञे तेषां महात्मनाम् । नैमिषे काञ्चनाक्षी तु स्मृता मङ्कणकेन सा समागता कुरुक्षेत्रं पुण्यतोया सरस्वती । गयस्य यजमानस्य गयेष्वेव महाक्रतुम् आहूता च सरिच्छ्रेष्ठा गययज्ञे सरस्वती । विशालां नाम तां प्राहुऋषयः संशितव्रताः

सरित् सा हि समाहूता मङ्कणेन महात्मना ।

कुरुक्षेत्रं समायाता प्रविष्टा च महानदी ॥

उत्तरे कोशलाभागे पुण्ये देवर्षिसेविते । उद्दालकेन मुनिना तत्र ध्याता सरस्वती इस प्रकार पुष्करतीर्थमें स्थित एवं नदियोंमें श्रेष्ठ २३ इस सरस्वतीको महात्मा मङ्कण कुरुक्षेत्रमें लाये । एक समय नैमिषारण्यमें रहनेवाले तपस्याके धनी शौनक २४ आदि मुनियोंने पुराणोंके ज्ञाता महात्मा लोमहर्षणसे पूछा - सत्पथगामी हमलोगोंको यज्ञका फल कैसे प्राप्त होगा? ( - इसे कृपाकर समझाइये । ) उसके बाद महानुभाव २५ लोमहर्षणजीने ऋषियोंको सिरसे प्रणाम कर कहा कि ऋषियो! जहाँ सरस्वती नदी अवस्थित है, वहाँ ( रहनेसे ) ॥ २६ यज्ञका महान् फल प्राप्त होता है । इसको सुनकर विविध वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले मुनियोंने एकत्र होकर सरस्वतीका स्मरण किया । दीर्घकालिक यज्ञ ॥ २७ करनेवाले उन ऋषियोंके ध्यान ( स्मरण ) करनेपर वे ( सरस्वती ) वहाँ नैमिषक्षेत्रमें उन महात्माओंके यज्ञमें ॥ २८ प्लावन करनेके लिये काञ्चनाक्षी नामसे उपस्थित हो गयीं । वे ही प्रसिद्ध नदी मङ्कणके द्वारा स्मृत होनेपर पवित्र-॥ २ ९ सलिला सरस्वतीके रूपमें कुरुक्षेत्रमें ( भी ) आयीं और महान् व्रती ऋषियोंने गया - क्षेत्रमें महायज्ञका अनुष्ठान करनेवाले गयके यज्ञमें आहूत की गयी उन श्रेष्ठ सरस्वती ॥ ३० नदीको ' विशाला ' के नामसे स्मरण किया ॥ २३–३० ॥ महात्मा मङ्कण ऋषिद्वारा समाहूत की गयी वही ३१ नदी कुरुक्षेत्रमें आकर प्रवेश कर गयी । ( फिर ) उद्दालक ॥ ३२ । मुनिने देवर्षियोंके द्वारा सेवित परम पवित्र उत्तरकोसल

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अध्याय ३८ ] मङ्कणक - प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति १६ ९

आजगाम सरिच्छ्रेष्ठा तं देशं मुनिकारणात् ।

पूज्यमाना मुनिगणैर्वल्कलाजिनसंवृतैः ॥

मनोहरेति विख्याता सर्वपापक्षयावहा ।

आहूता सा कुरुक्षेत्रे मङ्कणेन महात्मना ।

ऋषेः संमाननार्थाय प्रविष्टा तीर्थमुत्तमम् ॥

सुवेणुरिति विख्याता केदारे या सरस्वती ।

सर्वपापक्षया ज्ञेया ऋषिसिद्धनिषेविता ॥

सापि तेनेह मुनिना आराध्य परमेश्वरम् ।

ऋषीणामुपकारार्थं कुरुक्षेत्रं प्रवेशिता ॥

दक्षेण यजता सापि गङ्गाद्वारे सरस्वती ।

विमलोदा भगवती दक्षेण प्रकटीकृता ॥

समाहूता ययौ तत्र मङ्कणेन महात्मना ।

कुरुक्षेत्रे तु कुरुणा यजिता च सरस्वती ॥

सरोमध्ये समानीता मार्कण्डेयेन धीमता ।

अभिष्टृय महाभागां पुण्यतोयां सरस्वतीम् ॥

यत्र मङ्कणकः सिद्धः सप्तसारस्वते स्थितः ।

नृत्यमानश्च देवेन शंकरेण निवारितः ॥

प्रदेशमें सरस्वतीका ध्यान किया । उन मुनिके कारण ३३ नदियोंमें श्रेष्ठ वह सरस्वती नदी उस देशमें आ गयी एवं वह वल्कल तथा मृगचर्मको धारण करनेवाले मुनियोंद्वारा पूजित हुई । तब सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली वह ' मनोहरा ' नामसे विख्यात हुई । फिर वह महात्मा ३४ मङ्कणद्वारा आहूत होकर ऋषिको सम्मानित करनेके लिये कुरुक्षेत्रके उत्तम तीर्थमें प्रविष्ट हुई । केदारतीर्थमें जो सरस्वती ‘ सुवेणु ' नामसे प्रसिद्ध है, वह ऋषियों ३५ और सिद्धोंके द्वारा सेवित तथा सर्वपापनाशक रूपसे जानी जाती है ॥ ३१–३५ ॥ ३६ परमेश्वरकी आराधना कर उन मुनिने उसे ( सुवेणुको ) भी ऋषियोंका उपकार करनेके लिये इस ३७ कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित कराया । गङ्गाद्वारमें यज्ञ कर रहे दक्षने ' विमलोदा ' नामसे भगवती सरस्वतीको प्रकट किया । ३८ कुरुक्षेत्रमें कुरुद्वारा पूजित सरस्वती मङ्कणद्वारा बुलायी जानेपर वहाँ गयी । फिर बुद्धिमान् मार्कण्डेयजी उस पवित्र जलवाली महाभागा सरस्वतीकी स्तुति कर उसे ३ ९ सरोवरके मध्यमें ले गये । वहीं सप्तसारस्वततीर्थमें उपस्थित एवं नृत्य करते हुए सिद्ध मङ्कणकको नृत्य ४० करनेसे शंकरजीने रोका था ॥ ३६ -४० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३७ ॥

अड़तीसवाँ अध्याय मङ्कणक - प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति ऋषय ऊचुः

कथं मङ्कणकः सिद्धः कस्माज्जातो महानृषिः ।

नृत्यमानस्तु देवेन किमर्थं स निवारितः ॥

लोमहर्षण उवाच

कश्यपस्य सुतो जज्ञे मानसो मङ्कणो मुनिः ।

स्नानं कर्तुं व्यवसितो गृहीत्वा वल्कलं द्विजः ॥

तत्र गता ह्यप्सरसो रम्भाद्याः प्रियदर्शनाः ।

स्नायन्ति रुचिराः स्निग्धास्तेन सार्धमनिन्दिताः ॥

ऋषियोंने कहा - ( प्रभो! ) मङ्कणक किस प्रकार सिद्ध हुए? वे महान् ऋषि किससे उत्पन्न हुए थे? नृत्य १ करते हुए उन मङ्कणकको महादेवने क्यों रोका? ॥१ ॥

लोमहर्षणने कहा - ( ऋषियो! ) मङ्कणकमुनि महर्षि कश्यपके मानसपुत्र थे । ( एक समय ) वे ब्राह्मण २ देवता वल्कल - वस्त्र लेकर स्नान करने गये । वहाँ रम्भा आदि सुन्दरी अप्सराएँ भी गयी थीं । अनिन्द्य, कोमल एवं ३ मनोहर ( रूपवाली वे सभी ) अप्सराएँ उनके साथ ( ही )

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१७०

ततो मुनेस्तदा क्षोभाद्रेतः स्कन्नं यदम्भसि ।

तद्रेतः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः ॥

सप्तधा प्रविभागं तु कलशस्थं जगाम ह ।

तत्रर्षयः सप्त जाता विदुर्यान् मरुतां गणान् ॥

वायुवेगो वायुबलो वायुहा वायुमण्डलः ।

वायुज्वालो वायुरेतो वायुचक्रश्च वीर्यवान् ॥

एते ह्यपत्यास्तस्यर्षेर्धारयन्ति चराचरम् ।

पुरा मङ्कणकः सिद्धः कुशाग्रेणेति मे श्रुतम् ॥

क्षतः किल करे विप्रास्तस्य शाकरसोऽस्त्रवत् ।

स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान् ॥

ततः सर्वं प्रनृत्तं च स्थावरं जङ्गमं च यत् ।

प्रनृत्तं च जगद् दृष्ट्वा तेजसा तस्य मोहितम् ॥

ब्रह्मादिभिः सुरैस्तत्र ऋषिभिश्च तपोधनैः । विज्ञप्तो वै महादेवो मुनेरर्थे द्विजोत्तमाः नायं नृत्येद् यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि । श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३८ स्नान करने लगीं । उसके बाद मुनिके मनमें विकृति हो ४ गयी; फलतः उनका शुक्र जलमें स्खलित हो गया । उस रेतको उन महातपस्वीने उठाकर घड़ेमें रख लिया । वह कलशस्थ ( रेत ) सात भागोंमें विभक्त हो गया । उससे ५ सात ऋषि उत्पन्न हुए, जिन्हें मरुद्गण कहा जाता है । ( उनके नाम हैं - ) वायुवेग, वायुबल, वायुहा, वायुमण्डल, ६ वायुज्वाल, वायुरेता एवं वीर्यवान् वायुचक्र । उन ( मङ्कणक ) ऋषिके ये सात पुत्र चराचरको धारण करते हैं । ब्राह्मणो! मैंने यह सुना है कि प्राचीन कालमें सिद्ध मङ्कणकके ७ हाथमें कुशके अग्रभागसे छिद जानेके कारण घाव हो गया था; उससे शाकरस निकलने लगा । वे ( अपने हाथसे निकलते हुए उस ) शाकरसको देखकर प्रसन्न ८ हो गये और नाचने लगे ॥ २-८ ॥ इससे ( उनके नृत्य करनेसे उनके साथ ) सम्पूर्ण ९ अचर चर जगत् भी नाचने लगा । उनके तेजसे मोहित जगत्‌को नाचते देखकर ब्रह्मा आदि देव एवं तपस्वी ऋषियोंने मुनिके ( हितके ) लिये महादेवसे कहा-॥ १० देव! आप ऐसा ( कार्य ) करें, जिससे ये नृत्य न करें ( उन्हें नृत्यसे विरत करनेका उपाय करें ) । उसके बाद ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव हि ॥ ११ हर्षसे अधिक मग्न उन मुनिको देखकर एवं देवोंके सुराणां हितकामार्थं महादेवोऽभ्यभाषत ।

हर्षस्थानं किमर्थं च तवेदं मुनिसत्तम ।

तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम ॥

ऋषिरुवाच

किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम् ।

यं दृष्ट्वाऽहं प्रनृत्तो वै हर्षेण महताऽन्वितः ॥

तं प्रहस्याब्रवीद् देवो मुनिं रागेण मोहितम् ।

अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीह प्रपश्यताम् ॥

एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं देवदेवो महाद्युतिः । अङ्गुल्यग्रेण विप्रेन्द्राः स्वाङ्गुष्ठं ताडयद् भवः

ततो भस्मक्षतात् तस्मान्निर्गतं हिमसन्निभम् ।

तद् दृष्ट्वा व्रीडितो विप्रः पादयोः पतितोऽब्रवीत् ॥

नान्यं देवादहं मन्ये शूलपाणेर्महात्मनः । चराचरस्य जगतो वरस्त्वमसि शूलधृक् हितकी इच्छासे महादेवने कहा - मुनिसत्तम! ब्राह्मणश्रेष्ठ! आप तो तपस्वी एवं धर्मपथमें स्थित रहनेवाले हैं । फिर १२ आपके इस हर्षका क्या कारण है? ॥९ –१२ ॥ ऋषिने कहा— ब्रह्मन्! क्या आप नहीं देखते कि मेरे हाथसे शाकका रस चू रहा है; जिसे देखकर मैं १३ अत्यन्त आनन्दमग्न होकर नृत्य कर रहा हूँ । महादेवजीने हँसकर आसक्तिसे मोहित हुए उन मुनिसे कहा-विप्रवर! मुझे आश्चर्य नहीं हो रहा है । ( किंतु ) आप १४ इधर देखें । विप्रेन्द्रो! श्रेष्ठ मुनिसे ऐसा कहकर देदीप्यमान भगवान् देवाधिदेव महादेवने अपनी अंगुलिके अग्रभागसे अपने अंगूठेको ठीक किया । उसके बाद उस चोटसे ॥ १५ हिमतुल्य ( स्वच्छ ) भस्म निकलने लगा । उसे देखनेके बाद ब्राह्मण लज्जित होकर ( महादेवके ) चरणोंमें गिर १६ पड़े और बोले - ॥ १३ – १६ ॥ मैं महात्मा शूलपाणि महादेवके अतिरिक्त किसीको ॥ १७ । नहीं मानता । शूलपाणे! मेरी दृष्टिमें आप ही चराचर