वामन पुराण — पृष्ठ 181–190
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190
पृष्ठ 181
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ३ ९ ] कुरुक्षेत्रके
त्वदाश्रयाश्च दृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ ।
पूर्वस्त्वमसि देवानां कर्त्ता कारयिता महत् ॥
त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्ते ह्यकुतोभयाः ।
एवं स्तुत्वा महादेवमृषिः स प्रणतोऽब्रवीत् ॥
भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तपो मे न क्षयं व्रजेत् ।
ततो देवः प्रसन्नात्मा तमृषिं वाक्यमब्रवीत् ॥
ईश्वर उवाच
तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्त्रधा ।
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्द्धमहं सदा ॥
सप्तसारस्वते स्नात्वा यो मामर्चिष्यते नरः ।
न तस्य दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च ॥
सारस्वतं च तं लोकं गमिष्यति न संशयः ।
शिवस्य च प्रसादेन प्राप्नोति परमं पदम् ॥
तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन १७१ समस्त संसार में सर्वश्रेष्ठ हैं । अनघ! ब्रह्मा आदि देवता १८ आपके ही आश्रित देखे जाते हैं । आप ही देवताओंमें प्रथम हैं और आप ( सब कुछ ) करने एवं करानेवाले तथा महत्स्वरूप हैं । आपकी कृपासे सभी देवगण निर्भय होकर मोदमग्न होते रहते हैं । ऋषिने इस १ ९ प्रकार महादेवजीकी स्तुति करनेके बाद उन्हें प्रणामकर कहा – भगवन्! आपकी कृपासे मेरे तपका क्षय न हो । तब महादेवजीने प्रसन्न होकर उन ऋषिसे २० यह वचन कहा - ॥१७- २० ॥ ( सदाशिव ) ईश्वरने कहा – विप्र! मेरी कृपासे तुम्हारी तपस्या सहस्रों प्रकारसे बढ़े । मैं तुम्हारे साथ इस २१ आश्रममें सदा निवास करूँगा । जो मनुष्य इस सप्तसारस्वततीर्थमें स्नान करके मेरी पूजा करेगा, उसे २२ इस लोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा । वह नि: संदेह उस सारस्वतलोकको जायगा एवं ( मुझ ) २३ । शिवके अनुग्रहसे परम पदको प्राप्त करेगा ॥ २१ - २३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३८ ॥
उनतालीसवाँ अध्याय कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन लोमहर्षण उवाच
ततस्त्वौशनसं तीर्थं गच्छेत्तु श्रद्धयान्वितः ।
उशना यत्र संसिद्धो ग्रहत्वं च समाप्तवान् ॥
तस्मिन् स्नात्वा विमुक्तस्तु पातकैर्जन्मसम्भवैः ।
ततो याति परं ब्रह्म यस्मान्नावर्तते पुनः ॥
रहोदरो नाम मुनिर्यत्र मुक्तो बभूव ह ।
महता शिरसा ग्रस्तस्तीर्थमाहात्म्यदर्शनात् ॥
ऋषय ऊचुः
कथं रहोदरो ग्रस्तः कथं मोक्षमवाप्तवान् ।
तीर्थस्य तस्य माहात्म्यमिच्छामः श्रोतुमादरात् ॥
लोमहर्षणने कहा - ( ऋषियो! ) सप्तसारस्वतके बाद श्रद्धासे युक्त होकर ' औशनस ' तीर्थमें जाना १ चाहिये, जहाँ शुक्र सिद्धि प्राप्तकर ग्रहत्वको प्राप्त हो गये । उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य अनेक जन्मोंमें किये हुए पातकोंसे छूटकर परब्रह्मको प्राप्त करता है, जहाँसे २ पुनः ( जन्म - मरणके चक्कर में ) लौटना नहीं पड़ता । ( वह तीर्थ ऐसा है ) जहाँ तीर्थ दर्शनकी महिमासे भारी सिरसे जकड़े हुए रहोदर नामके एक मुनि उससे मुक्त ३ हो गये थे ॥१–३ ॥ ऋषियोंने कहा ( पूछा ) - रहोदर मुनि सिरसे ग्रस्त कैसे हो गये थे? और वे उससे मुक्त कैसे हुए? हमलोग उस तीर्थके माहात्म्यको आदरके साथ सुनना ४ चाहते हैं ( जिसकी महिमासे ऐसा हुआ । ) ॥ ४ ॥
पृष्ठ 182
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१७२ लोमहर्षण उवाच
पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना ।
वसता द्विजशार्दूला राक्षसास्तत्र हिंसिताः ॥
तत्रैकस्य शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः ।
क्षुरेण शितधारेण तत् पपात महावने ॥
रहोदरस्य तल्लग्नं जङ्घायां वै यदृच्छया ।
वने विचरतस्तत्र अस्थि भित्त्वा विवेश ह ॥
स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह ।
अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायतनानि च ॥
स पूतिना विस्स्रवता वेदनार्त्तो महामुनिः ।
जगाम सर्वतीर्थानि पृथिव्यां यानि कानि च ॥
श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३ ९ लोमहर्षणजी बोले- द्विजश्रेष्ठो! प्राचीन कालमें दण्डकारण्यमें रहते हुए रघुवंशी महात्मा रामचन्द्रने ५ बहुत - से राक्षसोंको मारा था । वहाँ एक दुष्टात्मा राक्षसका सिर तीक्ष्णधारवाले क्षुर नामक बाणसे कटकर उस ६ महावनमें गिरा । ( फिर वह ) संयोगवश वनमें विचरण करते हुए रहोदर मुनिकी जंघामें उनकी हड्डीको ७ तोड़कर उससे चिपट गया । महाप्राज्ञ वे ब्राह्मणदेव ( जंघेकी टूटी हड्डीमें ) उस मस्तकके लग जानेके कारण ८ तीर्थों और देवालयोंमें नहीं जा पाते थे ॥ ५-८ ॥ वे महामुनि दुर्गन्धपूर्ण पीब आदि बहनेके कारण ९ तथा वेदनासे अत्यन्त दुःखी रहते थे । पृथ्वीके जिन - जिन तीर्थोंमें वे गये, वहाँ - वहाँ उन्होंने पवित्रात्मा ऋषियोंसे ततः स कथयामास ऋषीणां भावितात्मनाम् । ( अपना दुःख ) कहा । ऋषियोंने उन विप्रसे कहा-तेऽब्रुवन् ऋषयो विप्रं प्रयाह्यौशनसं प्रति ॥
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा जगाम स रहोदरः ।
ततस्त्वौशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा ॥
तच्छिरश्चरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले द्विजाः ।
ततः स विरजो भूत्वा पूतात्मा वीतकल्मषः ॥
आजगामाश्रमं प्रीतः कथयामास चाखिलम् । ते श्रुत्वा ऋषयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् । कपालमोचनमिति नाम चक्रुः समागताः तत्रापि सुमहत्तीर्थं विश्वामित्रस्य विश्रुतम् । ब्राह्मण्यं लब्धवान् यत्र विश्वामित्रो महामुनिः
तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते ध्रुवम् ।
ब्राह्मणस्तु विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात् ॥
ततः पृथूदकं गच्छेन्नियतो नियताशनः । तत्र सिद्धस्तु ब्रह्मर्षी रुषङ्गुर्नाम नामतः जातिस्मरो रुषङ्गुस्तु गङ्गाद्वारे सदा स्थितः अन्तकालं ततो दृष्ट्वा पुत्रान् वचनमब्रवीत् । इह श्रेयो न पश्यामि नयध्वं मां पृथूदकम् १० ब्राह्मणदेव! आप औशनस ( तीर्थ ) - में जाइये । ( लोमहर्षणने कहा – ) द्विजो! उनका यह वचन सुनकर रहोदर मुनि वहाँसे औशनसतीर्थमें गये । वहाँ उन्होंने तीर्थ - जलका ११ स्पर्श किया । उनके द्वारा ( जलका ) स्पर्श होते ही वह मस्तक उनसे ( जाँघ ) को छोड़कर जलमें गिर गया । उसके बाद वे मुनि पापसे रहित निर्मल रजोगुणसे रहित १२ अतएव पवित्रात्मा होकर प्रसन्नतापूर्वक ( अपने ) आश्रम में गये और उन्होंने ( ऋषियोंसे ) सारी आपबीती कह सुनायी । फिर तो उन आये हुए सभी ऋषियोंने औशनसतीर्थके इस उत्तम माहात्म्यको सुनकर उसका ॥ १३ नाम ' कपालमोचन ' रख दिया ॥ ९ –१३ ॥ वहीं ( कपालमोचन तीर्थमें ही ) महामुनि विश्वामित्रका ॥ १४ बहुत बड़ा तीर्थ है, जहाँ विश्वामित्रने ब्राह्मणत्वको प्राप्त किया था । उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको निश्चय रूपसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है और वह ब्राह्मण १५ विशुद्धात्मा होकर ब्रह्मके परम पदको प्राप्त करता है । कपालमोचनके बाद पृथूदक नामके तीर्थमें जाय और ॥ १६ नियमपूर्वक नियत मात्रामें आहार करे । वहाँ रुषङ्गु नामके ब्रह्मर्षिने सिद्धि पायी थी । सदा गङ्गाद्वारमें स्थित । । रहते हुए पूर्वजन्मके वृत्तान्तको स्मरण रखनेवाले रुषङ्गुने ( अपना ) अन्तकाल आया देखकर ( अपने ) पुत्रोंसे कहा ॥ १७ । कि यहाँ ( मैं ) अपना कल्याण नहीं देख रहा हूँ । मुझे पृथूदक
पृष्ठ 183
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ३ ९ ] कुरुक्षेत्रके
विज्ञाय तस्य तद्भावं रुषङ्गोस्ते तपोधनाः ।
तं वै तीर्थे उपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ॥
स तैः पुत्रैः समानीतः सरस्वत्यां समाप्लुतः ।
स्मृत्वा तीर्थगुणान् सर्वान् प्राहेदमृषिसत्तमः ॥
सरस्वत्युत्तरे तीर्थे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् ।
पृथूदके जप्यपरो नूनं चामरतां व्रजेत् ॥
तत्रैव ब्रह्मयोन्यस्ति ब्रह्मणा यत्र निर्मिता ।
पृथूदकं समाश्रित्य सरस्वत्यास्तटे स्थितः ॥
चातुर्वर्ण्यस्य सृष्ट्यर्थमात्मज्ञानपरोऽभवत् ।
तस्याभिध्यायतः सृष्टिं ब्रह्मणो व्यक्तजन्मनः ॥
मुखतो ब्राह्मणा जाता बाहुभ्यां क्षत्रियास्तथा ।
ऊरुभ्यां वैश्यजातीयाः पद्भ्यां शूद्रास्ततोऽभवन् ॥
चातुर्वर्ण्यं ततो दृष्ट्वा आश्रमस्थं ततस्ततः ।
एवं प्रतिष्ठितं तीर्थं ब्रह्मयोनीति संज्ञितम् ॥
तत्र स्नात्वा मुक्तिकामः पुनर्योनिं न पश्यति ।
तत्रैव तीर्थं विख्यातमवकीर्णेति नामतः ॥
यस्मिंस्तीर्थे वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रममर्षणम् ।
जुहाव वाहनैः सार्धं तत्राबुध्यत् ततो नृपः ॥
ऋषय ऊचुः
कथं प्रतिष्ठितं तीर्थमवकीर्णेति नामतः ।
धृतराष्ट्रेण राज्ञा च स किमर्थं प्रसादितः ॥
लोमहर्षण उवाच
ऋषयो नैमिषेया ये दक्षिणार्थं ययुः पुरा ।
तत्रैव च वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रमयाचत ॥
तेनापि तत्र निन्दार्थमुक्तं पश्वनृतं तु यत् । तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन १७३ ( तीर्थ ) - में ले चलो । रुषङ्गुके उस भावको जानकर वे तपोधन ( पुत्र ) उन तपके धनीको सरस्वतीके तीर्थमें १८ ले गये ॥ १४–१८ ॥ उन पुत्रोंद्वारा लाये गये उन ऋषिश्रेष्ठने सरस्वतीमें १ ९ स्नान करनेके पश्चात् उस तीर्थके सब गुणोंका स्मरण कर यह कहा था- ' सरस्वतीके उत्तरकी ओर स्थित २० | पृथूदक नामके तीर्थमें अपने शरीरका त्याग करनेवाला जपपरायण मनुष्य निश्चय ही देवत्वको प्राप्त होता है । ' वहीं ब्रह्माद्वारा निर्मित ' ब्रह्मयोनितीर्थ ' है, जहाँ सरस्वतीके २१ किनारे अवस्थित पृथूदकमें स्थित होकर ब्रह्मा चारों वर्णोंकी सृष्टिके लिये आत्मज्ञानमें लीन हुए थे । सृष्टि २२ विषयमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके चिन्तन करनेपर उनके मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, दोनों ऊरुओंसे वैश्य २३ और दोनों पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए ॥ १ ९ –२३ ॥ उसके बाद उन्होंने चारों वर्णोंको विभिन्न २४ आश्रमोंमें स्थित हुआ देखा । इस प्रकार ब्रह्मयोनि नामक तीर्थकी प्रतिष्ठा हुई थी । मुक्तिकी कामना करनेवाला व्यक्ति वहाँ स्नान करनेसे पुनर्जन्म नहीं २५ देखता । वहीं अवकीर्ण नामक एक विख्यात तीर्थ भी है, जहाँपर दाल्भ्य ( दल्भ या दल्भि गोत्रमें उत्पन्न ) वक नामक ऋषिने क्रोधी धृतराष्ट्रको उसके वाहनोंके साथ हवन कर दिया था, तब कहीं राजाको ( अपने २६ किये कर्मका ) ज्ञान हुआ था ॥ २४–२६ ॥ ऋषियोंने पूछा – अवकीर्ण नामक तीर्थ कैसे प्रतिष्ठित हुआ एवं राजा धृतराष्ट्रने उन ( वक दाल्भ्य २७ मुनि ) - को क्यों प्रसन्न किया था? ॥२७ ॥
लोमहर्षणने कहा- प्राचीन कालमें नैमिषारण्य-निवासी जो ऋषि दक्षिणा पानेके लिये ( राजा धृतराष्ट्रके २८ यहाँ ) गये थे, उनमेंसे दल्भिवंशीय वक ऋषिने धृतराष्ट्रसे ( धनकी ) याचना की । उन्होंने ( धृतराष्ट्रने ) भी निन्दापूर्ण ततः क्रोधेन महता मांसमुत्कृत्य तत्र ह ॥२ ९ ग्राम्य और असत्य बात कही । उसके बाद वे ( वक दाल्भ्य ) अत्यन्त क्रुद्ध होकर पृथूदकमें स्थित अवकीर्ण पृथूदके महातीर्थे अवकीर्णेति नामतः । नामक तीर्थमें जा करके मांस काट - काटकर धृतराष्ट्रके जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेस्ततः ॥ ३० राष्ट्रके नाम हवन करने लगे । तब यज्ञमें राष्ट्रका हूयमाने तदा राष्ट्रे प्रवृत्ते यज्ञकर्मणि । हवन प्रारम्भ होनेपर राजाके दुष्कर्मके कारण राष्ट्रका
अक्षीयत ततो राष्ट्रं नृपतेर्दुष्कृतेन वै ॥ ३१ । क्षय होने लगा ॥ २८–३१ ॥
पृष्ठ 184
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१७४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४०
ततः स चिन्तयामास ब्राह्मणस्य विचेष्टितम् ।
पुरोहितेन संयुक्तो रत्नान्यादाय सर्वशः ॥।
प्रसादनार्थं विप्रस्य ह्यवकीर्णं ययौ तदा ।
प्रसादितः स राज्ञा च तुष्टः प्रोवाच तं नृपम् ॥
ब्राह्मणा नावमन्तव्याः पुरुषेण विजानता ।
अवज्ञातो ब्राह्मणस्तु हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम् ॥
एवमुक्त्वा स नृपतिं राज्येन यशसा पुनः ।
उत्थापयामास ततस्तस्य राज्ञे हिते स्थितः ॥
तस्मिंस्तीर्थे तु यः स्नाति श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।
स प्राप्नोति नरो नित्यं मनसा चिन्तितं फलम् ॥
तत्र तीर्थं सुविख्यातं यायातं नाम नामतः ।
यस्येह यजमानस्य मधु सुस्राव वै नदी ॥
तस्मिन् स्त्रात नरो भक्त्या मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।
फलं प्राप्नोति यज्ञस्य अश्वमेधस्य मानवः ॥
मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं पुण्यतमं द्विजाः ।
तस्मिन् स्नात्वा नरो भक्त्या मधुना तर्पयेत् पितॄन् ॥
तत्रापि सुमहत्तीर्थं वसिष्ठोद्वाहसंज्ञितम् ।
तत्र स्नातो भक्तियुक्तो वासिष्ठं लोकमाप्नुयात् ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें ( राष्ट्रको क्षीण होते देख ) उसने विचार किया और ३२ वह इसे ब्राह्मणका विकर्म जानकर ( उस ब्राह्मणको ) प्रसन्न करनेके लिये समस्त रत्नोंको लेकर पुरोहितके साथ अवकीर्णतीर्थमें गया ( और उस ) राजाने उन्हें ३३ प्रसन्न कर लिया । प्रसन्न होकर उन्होंने राजासे कहा -( राजन्! ) विद्वान् मनुष्यको ब्राह्मणका अपमान नहीं करना चाहिये । अपमानित हुआ ब्राह्मण मनुष्यके कुलके तीन ३४ पुरुषों ( पीढ़ियों ) का विनाश कर देता है । ऐसा कहकर उन्होंने पुनः राजाको राज्य एवं यशके साथ सम्पन्न कर ३५ दिया और वे उस राजाके हितकारी हो गये ॥ ३२-३५ ॥ उस ( अवकीर्ण ) तीर्थमें जो जितेन्द्रिय मनुष्य ३६ श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह नित्य मनोऽभिलषित फल प्राप्त करता है । वहाँ ' यायात ' ( ययातिका तीर्थ ) नामसे सुविख्यात तीर्थ है, जहाँ यज्ञ करनेवालेके लिये ३७ नदीने मधु बहाया था । उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है एवं उसे ३८ अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है । द्विजो! वहीं ' मधुस्रव ' नामक पवित्र तीर्थ है । उसमें मनुष्यको भक्तिपूर्वक स्नान कर मधुसे पितरोंका तर्पण करना ३ ९ चाहिये । वहीँपर ' वसिष्ठोद्वाह ' नामक सुन्दर महान् तीर्थ है, वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करनेवाला व्यक्ति महर्षि ४० । वसिष्ठके लोकको प्राप्त करता है ॥ ३६-४० ॥ उन्तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३ ९ ॥ चालीसवाँ अध्याय वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति - प्रसङ्ग ऋषय ऊचुः ऋषियोंने कहा ( पूछा ) - महाराज! वह वसिष्ठस्यापवाहोऽसौ कथं वै सम्बभूव ह । वसिष्ठापवाह कैसे उत्पन्न हुआ? उस श्रेष्ठ सरिताने उन किमर्थ सा सरिच्छ्रेष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत् ॥ १ ऋषिको अपने प्रवाहमें क्यों बहा दिया था? ॥ १ ॥
लोमहर्षण उवाच लोमहर्षण बोले- ( ऋषियो! ) राजर्षि विश्वामित्र विश्वामित्रस्य राजर्षेर्वसिष्ठस्य महात्मनः । एवं महात्मा वसिष्ठमें तपस्याके विषयमें परस्पर भृशं वैरं बभूवेह तपः स्पर्द्धाकृते महत् ॥ २ | चुनौती होनेके कारण बड़ी भारी शत्रुता हो गयी ।
पृष्ठ 185
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ४० ] वसिष्ठापवाह नामक
आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थे बभूव ह ।
तस्य पश्चिमदिग्भागे विश्वामित्रस्य धीमतः ॥ ३
यत्रेष्ट्वा भगवान् स्थाणुः पूजयित्वा सरस्वतीम् । स्थापयामास देवेशो वसिष्ठस्तत्र तपसा तस्येह तपसा हीनो सरस्वतीं समाहूय वसिष्ठं मुनिशार्दूलं इहाहं तं द्विजश्रेष्ठं एतच्छ्रुत्वा तु वचनं लिङ्गाकारां सरस्वतीम् ॥ ४
घोररूपेण संस्थितः ।
विश्वामित्रो बभूव ह ॥ ५
इदं वचनमब्रवीत् ।
स्वेन वेगेन आनय ॥ ६
हनिष्यामि न संशयः ।
व्यथिता सा महानदी ॥ ७
तथा तां व्यथितां दृष्ट्वा वेपमानां महानदीम् ।
विश्वामित्रोऽब्रवीत् क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय ॥ ८
ततो गत्वा सरिच्छ्रेष्ठा वसिष्ठं मुनिसत्तमम् ।
कथयामास रुदतो विश्वामित्रस्य तद् वचः ॥ ९
तपःक्रियाविशीर्णां च भृशं शोकसमन्विताम् ।
उवाच स सरिच्छ्रेष्ठां विश्वामित्राय मां वह ॥ १०
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित् ।
चालयामास तं स्थानात् प्रवाहेणाम्भसस्तदा ॥ ११
स च कूलापहारेण मित्रावरुणयोः सुतः ।
उह्यमानश्च तुष्टाव तदा देवीं सरस्वतीम् ॥ १२
पितामहस्य सरसः प्रवृत्ताऽसि सरस्वति ।
व्याप्तं त्वया जगत् सर्वं तवैवाम्भोभिरुत्तमैः ॥ १३
त्वमेवाकाशगा देवी मेघेषु सृजसे पयः ।
सर्वास्त्वापस्त्वमेवेति त्वत्तो वयमधीमहे ॥ १४
पुष्टिर्धृतिस्तथा कीर्त्तिः सिद्धिः कान्तिः क्षमा तथा ।
स्वधा स्वाहा तथा वाणी तवायत्तमिदं जगत् ॥ ९ ५
त्वमेव सर्वभूतेषु वाणीरूपेण संस्थिता ।
एवं सरस्वती तेन स्तुता भगवती सदा ॥ १६
सुखेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति ।
न्यवेदयत्तदा खिन्ना विश्वामित्राय तं मुनिम् ॥ १७
तीर्थका उत्पत्ति - प्रसङ्ग १७५ | वसिष्ठका आश्रम स्थाणुतीर्थमें था और उसके पश्चिम दिशामें बुद्धिमान् विश्वामित्र महर्षिका आश्रम था; जहाँ देवाधिदेव भगवान् शिवने यज्ञ करनेके बाद सरस्वतीकी पूजा कर मूर्तिके रूपमें सरस्वतीकी स्थापना की थी । वसिष्ठजी वहीं घोर तपस्यामें संलग्न थे । उनकी तपस्यासे विश्वामित्र ( प्रभावतः ) हीन - से होने लगे॥२-५ ॥ ( एक बार ) विश्वामित्रने सरस्वतीको बुलाकर यह वचन कहा – सरस्वति! तुम मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको अपने वेगसे बहा लाओ । मैं उन द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठको यहाँ मारूँगा -इसमें संदेहकी बात नहीं है । इस ( अवाञ्छनीय बात ) -को सुनकर वह महानदी दुःखित हो गयी । ( पर ) विश्वामित्रने उस प्रकार दुःखित एवं काँपती हुई उस महानदीको देखकर क्रोधमें भरकर कहा कि वसिष्ठको शीघ्र लाओ । उसके बाद उस श्रेष्ठ नदीने मुनिश्रेष्ठके पास जाकर उनसे रोते हुए विश्वामित्रकी उस बातको कहा ॥ ६ - ९ ॥ उन वसिष्ठजीने तपश्चर्यासे दुर्बल एवं अतिशय शोक - समन्वित उस श्रेष्ठ सरिता ( सरस्वती ) - से कहा -( तुम ) विश्वामित्रके पास मुझे बहा ले चलो । उन दयालुके उस वचनको सुनकर उस सरस्वती सरिताने जलके ( तेज ) प्रवाहद्वारा उन्हें उस स्थानसे बहाना प्रारम्भ किया । किनारेसे ले जाये जानेके कारण बहते हुए मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठ - ऋषि प्रसन्न होकर देवी सरस्वतीकी स्तुति करने लगे - सरस्वति! आप ब्रह्मा सरोवरसे निकली हैं । आपने अपने उत्तम जलसे समस्त जगत्को व्याप्त कर दिया है ॥ १० - १३ ॥ ' आप ही आकाशगामिनी देवी हैं और मेघोंमें जलको उत्पन्न करती हैं । आप ही सभी जलोंके रूपमें वर्तमान हैं । आपकी ही शक्तिसे हमलोग अध्ययन करते हैं । आप ही पुष्टि, धृति, कीर्ति, सिद्धि, कान्ति, क्षमा, स्वधा, स्वाहा तथा सरस्वती हैं । यह पूरा विश्व आपके ही अधीन है । आप ही समस्त प्राणियों में वाणीरूपसे स्थित हैं । ' वसिष्ठजीने भगवती सरस्वतीकी इस प्रकार स्तुति की और सरस्वती नदीने उन विप्रदेवको विश्वामित्रके आश्रममें सुखपूर्वक पहुँचा दिया और खिन्न होकर उन मुनिको विश्वामित्रके लिये । निवेदित कर दिया ॥ १४–१७ ॥
पृष्ठ 186
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१७६
तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः ।
अथान्विषत् प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ॥
तं तु क्रुद्धमभिप्रेक्ष्य ब्रह्महत्याभयान्नदी ।
अपोवाह वसिष्ठं तं मध्ये चैवाम्भसस्तदा ।
उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् ॥
ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम् ।
अब्रवीत् क्रोधरक्ताक्षो विश्वामित्रो महातपाः ॥
यस्मान्मां सरितां श्रेष्ठे वञ्चयित्वा विनिर्गता ।
शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसंयुता ॥
ततः सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता ।
अवहच्छोणितोन्मिश्रं तोयं संवत्सरं तदा ॥
अथर्षयश्च देवाश्च गन्धर्वाप्सरस्तदा ।
सरस्वतीं तदा दृष्ट्वा बभूवुर्भृशदुःखिताः ॥
तस्मिंस्तीर्थवरे पुण्ये शोणितं समुपावहत् ।
ततो भूतपिशाचाश्च राक्षसाश्च समागताः ॥
ततस्ते शोणितं सर्वे पिबन्तः सुखमासते ।
तृप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वराः ।
नृत्यन्तश्च हसन्तश्च यथा स्वर्गजितस्तथा ॥
कस्यचित्त्वथ कालस्य ऋषयः सतपोधनाः ।
तीर्थयात्रां समाजग्मुः सरस्वत्यां तपोधनाः ॥
तां दृष्ट्वा राक्षसैर्घोरैः पीयमानां महानदीम् ।
परित्राणे सरस्वत्याः परं यत्नं प्रचक्रिरे ॥
तु सर्वे महाभागाः समागम्य महाव्रताः ।
आहूय सरितां श्रेष्ठामिदं वचनमब्रुवन् ॥
किं कारणं सरिच्छ्रेष्ठे शोणितेन ह्रदो ह्यहम् ।
एवमाकुलतां यातः श्रुत्वा वेत्स्यामहे वयम् ॥
ततः सा सर्वमाचष्ट विश्वामित्रविचेष्टितम् ।
ततस्ते मुनयः प्रीताः सरस्वत्यां समानयन् ।
अरुणां पुण्यतोयौघां सर्वदुष्कृतनाशनीम् ॥
श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४० उसके बाद सरस्वतीद्वारा बहाकर लाये गये १८ वसिष्ठको देखकर विश्वामित्र क्रोधसे भर गये और वसिष्ठका अन्त करनेवाला शस्त्र ढूँढ़ने लगे । उन्हें क्रोधसे भरा हुआ देखकर ब्रह्महत्याके भयसे डरती हुई वह सरस्वती नदी गाधिपुत्र विश्वामित्रको वञ्चित कर दोनोंकी १ ९ | बातोंका पालन करती हुई उन वसिष्ठको जलमें ( पुनः ) बहा ले गयी । उसके बाद ऋषिप्रवर वसिष्ठको अपवाहित होते देखकर महातपस्वी विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे लाल २० हो गये । फिर विश्वामित्रने कहा – ओ श्रेष्ठ नदी! यतः तुम मुझे वञ्चितकर चली गयी हो, कल्याणि! अतः श्रेष्ठ राक्षसोंसे संयुक्त होकर तुम शोणितका वहन करो -२१ तुम्हारा जल रक्तसे युक्त हो जाय ॥ १८–२१ ॥ उसके बाद बुद्धिमान् विश्वामित्रसे इस प्रकार शाप २२ प्राप्तकर सरस्वतीने एक वर्षतक रक्तसे मिले हुए जलको बहाया । उसके पश्चात् सरस्वती नदीको रक्तसे मिश्रित जलवाली देखकर ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ २३ अत्यन्त दुःखित हो गयीं । ( यतः ) उस पवित्र श्रेष्ठ तीर्थमें रुधिर ही बहने लगा । अतः वहाँ भूत, पिशाच, २४ राक्षस एकत्र होने लगे । वे सभी रक्तका पान करते हुए वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे । वे उससे अत्यन्त तृप्त, सुखी एवं निश्चिन्त होकर इस प्रकार नाचने एवं हँसने २५ लगे, मानो उन्होंने स्वर्गको जीत लिया हो ॥ २२–२५ ॥ कुछ समय बीतनेपर तपस्याके धनी ऋषिलोग २६ तीर्थयात्रा करते - करते सरस्वतीके तटपर पहुँचे । ( वहाँ ) भयानक राक्षसोंके द्वारा पीती जाती हुई महानदी २७ सरस्वतीको देखकर वे उसकी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न करने लगे । और महान् व्रतोंका अनुष्ठान करनेवाले उन महाभागोंने श्रेष्ठ नदीको ( पास ) बुलाकर २८ उससे यह वचन फिर कहा— श्रेष्ठ सरिते! हम सब आपसे यह जानना चाहते हैं कि यह जलाशय रक्तसे २ ९ भरकर ऐसा क्षुब्ध कैसे हुआ है? ॥२६–२९ ॥ तब उसने विश्वामित्रके समस्त विकर्मोंका ( उनके सामने ही ) वर्णन किया । उसके पश्चात् प्रसन्न हुए मुनिजन सरस्वती तथा समस्त पापोंका विनाश करनेवाली ३० । अरुणा नदीको ले आये । ( जिससे सरस्वती - ह्रदका
पृष्ठ 187
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ४० ] वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति - प्रसङ्ग १७७
दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्या राक्षसा दुःखिता भृशम् ।
ऊचुस्तान् वै मुनीन् सर्वान् दैन्ययुक्ताः पुनः पुनः ॥
वयं हि क्षुधिताः सर्वे धर्महीनाश्च शाश्वताः ।
न च नः कामकारोऽयं यद् वयं पापकारिणः ॥
युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा ।
पक्षोऽयं वर्धतेऽस्माकं यतः स्मो ब्रह्मराक्षसाः ॥
एवं वैश्याश्च शूद्राश्च क्षत्रियाश्च विकर्मभिः ।
ये ब्राह्मणान् प्रद्विषन्ति ते भवन्तीह राक्षसाः ॥
योषितां चैव पापानां योनिदोषेण वर्द्धते ।
इयं संततिरस्माकं गतिरेषा सनातनी ॥
शक्ता भवन्तः सर्वेषां लोकानामपि तारणे ।
तेषां ते मुनयः श्रुत्वा कृपाशीलाः पुनश्च ते ॥
ऊचुः परस्परं सर्वे तप्यमानाश्च ते द्विजाः ।
क्षुतकीटावपन्नं च यच्चोच्छिष्टाशितं भवेत् ॥
केशवपन्नमाधूतं मारुतश्वासदूषितम् ।
एभिः संसृष्टमन्नं च भागं वै रक्षसां भवेत् ॥
तस्माज्ज्ञात्वा सदा विद्वान् अन्नान्येतानि वर्जयेत् ।
राक्षसानामसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्तेऽन्नमीदृशम् ॥
शोधयित्वा तु तत्तीर्थमृषयस्ते तपोधनाः ।
मोक्षार्थं रक्षसां तेषां संगमं तत्र कल्पयन् ॥
अरुणायाः सरस्वत्याः संगमे लोकविश्रुते ।
त्रिरात्रोपोषितः स्नातो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥
प्राप्ते कलियुगे घोरे अधर्मे प्रत्युपस्थिते ।
अरुणासंगमे स्नात्वा मुक्तिमाप्नोति मानवः ॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे स्त्राताः पापविवर्जिताः ।
दिव्यमाल्याम्बरधराः स्वर्गस्थितिसमन्विताः ॥
शोणित पवित्र जल हो गया ) ( पर ) सरस्वतीके जलको ३१ ( इस प्रकार शुद्ध हुआ ) देखकर राक्षस बहुत दुःखित हो गये । वे दीनतापूर्वक उन सभी मुनियोंसे बार - बार कहने लगे कि हम सभी सदा भूखे एवं धर्मसे रहित ३२ रहते हैं । हम अपनी इच्छासे पापकर्म करनेवाले पापी नहीं बने हुए हैं, अपितु आपलोगोंकी अकृपा एवं अशोभन कर्मोंसे ही हमारा पक्ष बढ़ता रहता है; क्योंकि ३३ हम सभी ब्रह्मराक्षस हैं ॥ ३०–३३ ॥ इसी प्रकार जो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ब्राह्मणोंसे ३४ द्वेष करते हैं, वे ( ऐसे ही ) विकर्म करनेके कारण राक्षस हो जाते हैं । पापिनी स्त्रियोंके योनिदोषसे हमारी यह संतति बढ़ती रहती है । यह हमारी प्राचीन ३५ गति है । आपलोग सभी लोकोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं । ( लोमहर्षणजी कहते हैं - ) द्विजो! वे ३६ कृपालु मुनि उन सदाकी रीति ब्रह्मराक्षसोंके इन वचनोंको सुनकर बहुत दुःखी हुए और परस्पर परामर्शकर उनसे बोले - ( ब्रह्मराक्षसो! ) छींक तथा ३७ कीटके संसर्गसे दूषित, उच्छिष्ट भोजन, केशयुक्त, तिरस्कृत एवं श्वासवायुसे दूषित अन्न तुम राक्षसोंका ३८ भाग होगा ॥ ३४ – ३८ ॥ ( पुन: लोमहर्षणजी बोले – ) ऋषियो! इसको ३ ९ | जानकर विद्वान् पुरुषको चाहिये कि इस प्रकारके अन्नोंको त्याग दे । इस प्रकार अन्न खानेवाला व्यक्ति राक्षसों का भाग खाता है । उन तपोधन ऋषियोंने उस ४० | तीर्थको शुद्धकर उन राक्षसोंकी मुक्तिके लिये वहाँ एक सङ्गमकी रचना की । [ उसका फल इस प्रकार है ] लोक- प्रसिद्ध अरुणा और सरस्वतीके सङ्गममें तीन ४१ दिनोंतक व्रतपूर्वक स्नान करनेवाला ( व्यक्ति ) सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है । ( आगे भी ) घोर कलियुग आनेपर तथा अधर्मका अधिक प्रसार हो जानेपर मनुष्य ४२ । अरुणाके सङ्गममें स्नान करके मुक्ति प्राप्त कर लेंगे । इसको सुननेके बाद उन सभी राक्षसोंने उसमें स्नान किया और वे निष्पाप हो गये तथा दिव्य माला और ४३ । वस्त्र धारणकर स्वर्गमें विराजने लगे ॥ ३ ९ -४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४० ॥
पृष्ठ 188
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१७८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४१ इकतालीसवाँ अध्याय कुरुक्षेत्रके तीर्थों— शतसाहस्त्रिक, शतिक, रेणुका, ऋणमोचन, ओजस, संनिहति, प्राची सरस्वती, पञ्चवट, कुरुतीर्थ, लोमहर्षण उवाच
समुद्रास्तत्र चत्वारो दर्विणा आहृताः पुरा ।
प्रत्येकं तु नरः स्नातो गोसहस्रफलं लभेत् ॥
यत्किंचित् क्रियते तस्मिंस्तपस्तीर्थे द्विजोत्तमाः ।
परिपूर्णं हि तत्सर्वमपि दुष्कृतकर्मणः ॥
शतसाहस्त्रिकं तीर्थं तथैव शतिकं द्विजाः ।
उभयोर्हि नरः स्नातो गोसहस्रफलं लभेत् ॥
सोमतीर्थं च तत्रापि सरस्वत्यास्तटे स्थितम् ।
यस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो राजसूयफलं लभेत् ॥
रेणुकाश्रममासाद्य श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।
मातृभक्त्या च यत्पुण्यं तत्फलं प्राप्नुयान्नरः ॥
ऋणमोचनमासाद्य तीर्थं ब्रह्मनिषेवितम् ।
ऋणैर्मुक्तो भवेन्नित्यं देवर्षिपितृसम्भवैः ।
कुमारस्याभिषेकं च ओजसं नाम विश्रुतम् ॥
तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो यशसा च समन्वितः ।
कुमारपुरमाप्नोति कृत्वा श्राद्धं तु मानवः ॥
चैत्रषष्ठ्यां सिते पक्षे यस्तु श्राद्धं करिष्यति ।
गयाश्राद्धे च यत्पुण्यं तत्पुण्यं प्राप्नुयान्नरः ॥
संनिहत्यां यथा श्राद्धं राहुग्रस्ते दिवाकरे ।
तथा श्राद्धं तत्र कृतं नात्र कार्या विचारणा ॥
ओजसे ह्यक्षयं श्राद्धं वायुना कथितं पुरा ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत् ॥
यस्तु स्त्रानं श्रद्दधानश्चैत्रषष्ठ्यां करिष्यति ।
अक्षय्यमुदकं तस्य पितॄणामुपजायते ॥
तत्र पञ्चवटं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
महादेवः स्थितो यत्र योगमूर्तिधरः स्वयम् ॥
अनरकतीर्थ, काम्यकवन आदिका वर्णन लोमहर्षणने कहा - प्राचीन कालको बात है महर्षि दर्वि वहाँ चार समुद्रोंको ले आये थे । उनमेंसे प्रत्येक १ समुद्रमें स्नान करनेसे मनुष्योंको हजार गोदान करनेका फल प्राप्त होता है । द्विजोत्तमो! उस तीर्थमें जो तपस्या की २ जाती है, वह पापीद्वारा की गयी होनेपर भी सिद्ध हो जाती है । द्विजो! वहाँ शतसाहस्रिक एवं शतिक नामके दो तीर्थ हैं । उन दोनों ही तीर्थोंमें स्नान करनेवाला मनुष्य हजार गौ-३ दान करनेका फल प्राप्त करता है । वहीं सरस्वतीके तटपर सोमतीर्थ भी स्थित है, जिसमें स्नान करनेसे पुरुष ४ राजसूययज्ञका फल प्राप्त करता है ॥ १–४ ॥ माताकी सेवा करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उस ५ पुण्य - फलको इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेवाला श्रद्धालु मनुष्य रेणुकातीर्थमें जाकर प्राप्त कर लेता है और ब्रह्माद्वारा सेवित ऋणमोचन नामके तीर्थमें जाकर देव-ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋणसे छूट जाता है । कुमार ६ ( कार्तिकेय ) - का अभिषेकस्थल ओजसनामसे विख्यात है; उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य कीर्ति प्राप्त करता है ७ | और वहाँ श्राद्ध करनेसे उसे कार्तिकेयके लोककी प्राप्ति होती है । चैत्रमासकी शुक्ला षष्ठी तिथिमें जो मनुष्य वहाँ श्राद्ध करेगा, वह गयामें श्राद्ध करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता ८ है, उस पुण्यको प्राप्त करता है ॥ ५८ ॥
राहुद्वारा सूर्यके ग्रस्त हो जानेपर ( सूर्यग्रहण लगनेपर ) ९ सन्निहतितीर्थमें किये गये श्राद्धके समान वहाँका श्राद्ध पुण्यप्रद होता है; इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये । पूर्वसमयमें वायुने कहा था कि ओजसतीर्थमें १० किये गये श्राद्धका क्षय नहीं होता है । इसलिये प्रयत्नपूर्वक वहाँ श्राद्ध करना चाहिये । चैत्रमासके शुक्लपक्षको षष्ठी तिथिके दिन जो उसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करेगा, उसके ११ पितरोंको अक्षय ( कभी भी क्षय न होनेवाले ) जलकी प्राप्ति होगी । तीनों लोकोंमें विख्यात एक ' पञ्चवट ' नामका तीर्थ है, जहाँ स्वयं भगवान् महादेव योगसाधना १२ । करनेकी मुद्रामें विराजमान हैं॥९ –१२ ॥
पृष्ठ 189
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ४१ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका वर्णन १७ ९
तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च देवदेवं महेश्वरम् ।
गाणपत्यमवाप्नोति दैवतैः सह मोदते ॥
कुरुतीर्थं च विख्यातं कुरुणा यत्र वै तपः ।
तप्तं सुघोरं क्षेत्रस्य कर्षणार्थं द्विजोत्तमाः ॥
तस्य घोरेण तपसा तुष्ट इन्द्रोऽब्रवीद् वचः ।
राजर्षे परितुष्टोऽस्मि तपसाऽनेन सुव्रत ॥
यज्ञं ये च कुरुक्षेत्रे करिष्यन्ति शतक्रतोः ।
ते गमिष्यन्ति सुकृताँल्लोकान् पापविवर्जितान् ॥
अवहस्य ततः शक्रो जगाम त्रिदिवं प्रभुः ।
आगम्यागम्य चैवेनं भूयो भूयो वहस्य च ॥
शतक्रतुरनिर्विण्णः पृष्ट्वा पृष्ट्वा जगाम ह ।
यदा तु तपसोग्रेण चकर्ष देहमात्मनः ।
ततः शक्रोऽब्रवीत् प्रीत्या ब्रूहि यत्ते चिकीर्षितम् ॥
कुरुरुवाच
ये श्रद्दधानास्तीर्थेऽस्मिन् मानवा निवसन्ति ह ।
ते प्राप्नुवन्तु सदनं ब्राह्मणः परमात्मनः ॥
अन्यत्र कृतपापा ये पञ्चपातकदूषिताः ।
अस्मिस्तीर्थं नराः स्नात्वा मुक्ता यान्तु परां गतिम् ॥
कुरुक्षेत्रे पुण्यतमं कुरुतीर्थं द्विजोत्तमाः ।
तं दृष्ट्वा पापमुक्तस्तु परं पदमवाप्नुयात् ॥
कुरुतीर्थे नरः स्नातो मुक्तो भवति किल्बिषैः ।
कुरुणा समनुज्ञातः प्राप्नोति परमं पदम् ॥
स्वर्गद्वारं ततो गच्छेच्छिवद्वारे व्यवस्थितम् ।
तत्र स्नात्वा शिवद्वारे प्राप्नोति परमं पदम् ॥
ततो गच्छेदनरकं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
यत्र पूर्वे स्थितो ब्रह्मा दक्षिणे तु महेश्वरः ॥
रुद्रपत्नी पश्चिमतः पद्मनाभोत्तरे स्थितः ।
मध्ये अनरकं तीर्थं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम् ॥
उस ( पञ्चवट ) स्थानपर स्नान करके देवाधिदेव १३ महादेवकी पूजा करनेवाला मनुष्य गणपतिका पद और देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता हुआ प्रसन्न रहता है । श्रेष्ठ द्विजो! ' कुरुतीर्थ ' विख्यात तीर्थ है, जिसमें १४ कुरुने कीर्तिकी प्राप्तिके लिये धर्मकी खेती करनेके लिये तपस्या की थी । उनकी घोर तपस्यासे प्रसन्न १५ होकर इन्द्रने कहा – सुन्दर व्रतोंके करनेवाले राजर्षि! तुम्हारी इस तपस्यासे मैं संतुष्ट हूँ । ( सुनो ) इस कुरुक्षेत्र में जो लोग इन्द्रका यज्ञ करेंगे, वे लोग पापरहित १६ हो जायँगे और पवित्र लोकोंको प्राप्त होंगे । इतना कहकर इन्द्रदेव मुस्कराकर स्वर्ग चले गये । बिना खिन्न १७ हुए इन्द्र बारंबार आये और उपहासपूर्वक उनसे ( उनकी योजनाके सम्बन्धमें कुछ ) पूछ - पूछकर चले गये । कुरुने जब उग्र तपस्याद्वारा अपनी देहका कर्षण किया तो इन्द्रने प्रेमपूर्वक उनसे कहा – ' कुरु! तुम्हें जो १८ कुछ करनेकी इच्छा हो उसे कहो ' ॥ १३–१८ ॥ कुरुने कहा - इन्द्रदेव! जो श्रद्धालु मानव इस तीर्थमें निवास करते हैं, वे परमात्मरूप परब्रह्मके १ ९ लोकको प्राप्त करते हैं । इस स्थानसे अन्यत्र पाप करनेवालों एवं पञ्चपातकोंसे दूषित मनुष्य भी इस २० तीर्थमें स्नान करनेसे मुक्त होकर परमगतिको प्राप्त करता है । ( लोमहर्षणने कहा - ) श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कुरुक्षेत्रमें कुरुतीर्थ सर्वाधिक पवित्र है । उसका दर्शन कर पापात्मा २१ मनुष्य ( भी ) मोक्ष प्राप्त कर लेता है तथा कुरुतीर्थमें स्नानकर पापोंसे छूट जाता है एवं कुरुकी आज्ञासे २२ परमपद ( मोक्ष ) - को प्राप्त करता है ॥ १ ९ –२२ ॥ फिर ( कुरुतीर्थमें स्नान करनेके बाद ) शिवद्वारमें स्थित स्वर्गद्वारको जाय ( और स्नान करे ); क्योंकि २३ वहाँ ( शिवद्वारमें ) स्नान करनेसे मनुष्य परमपदको प्राप्त करता है । शिवद्वार जानेके पश्चात् तीनों लोकोंमें विख्यात अनरक नामके तीर्थमें जाय । उस अनरकके २४ पूर्वमें ब्रह्मा, दक्षिणमें महेश्वर, पश्चिममें रुद्रपत्नी एवं उत्तरमें पद्मनाभ और इन सबके मध्यमें अनरक नामका तीर्थ स्थित है; वह तीनों लोकोंके लिये भी २५ | दुर्लभ है | २३–२५ ॥
पृष्ठ 190
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८०
यस्मिन् स्नातस्तु मुच्येत पातकैरुपपातकैः ।
वैशाखे च यदा षष्ठी मङ्गलस्य दिनं भवेत् ॥
तदा स्नानं तत्र कृत्वा मुक्तो भवति पातकैः ।
यः प्रयच्छेत करकांश्चतुरो भक्ष्यसंयुतान् ॥
कलशं च तथा दद्यादपूपैः परिशोभितम् ।
देवताः प्रीणयेत् पूर्वं करकैरन्नसंयुतैः ॥
ततस्तु कलशं दद्यात् सर्वपातकनाशनम् ।
अनेनैव विधानेन यस्तु स्नानं समाचरेत् ॥
स मुक्तः कलुषैः सर्वैः प्रयाति परमं पदम् ।
अन्यत्रापि यदा षष्ठी मङ्गलेन भविष्यति ॥
तत्रापि मुक्तिफलदा क्रिया तस्मिन् भविष्यति ।
तीर्थे च सर्वतीर्थानां यस्मिन् स्नातो द्विजोत्तमाः ॥
सर्वदेवैरनुज्ञातः परं पदमवाप्नुयात् ।
काम्यकं च वनं पुण्यं सर्वपातकनाशनम् ॥
यस्मिन् प्रविष्टमात्रस्तु मुक्तो भवति किल्बिषैः ।
यमाश्रित्य वनं पुण्यं सविता प्रकटः स्थितः ॥
पूषा नाम द्विजश्रेष्ठा दर्शनान्मुक्तिमाप्नुयात् ।
आदित्यस्य दिने प्राप्ते तस्मिन् स्नातस्तु मानवः ।
विशुद्धदेहो भवति मनसा चिन्तितं लभेत् ॥
श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४२ जिस ( अनरकतीर्थ ) - में स्नान करनेवाला मनुष्य २६ छोटे - बड़े सभी पापोंसे छूट जाता है । जब वैशाखमासकी षष्ठी तिथिको मङ्गल दिन हो तब वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पापोंसे छूट जाता है । ( उस दिन ) खाद्य पदार्थसे २७ संयुक्त चार करक ( करवे या कमण्डलु ) एवं मालपुओं आदिसे सुशोभित कलशका दान करे । पहले अन्नसे २८ युक्त करवोंसे देवताकी पूजा करे, फिर सम्पूर्ण पापोंके नाश करनेवाले कलशका दान करे । जो मानव इस विधानसे स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जायगा २ ९ और परमपदको प्राप्त करेगा । इसके अतिरिक्त ( वैशाखके सिवा ) अन्य समयमें भी मङ्गलके दिन षष्ठी तिथि होनेपर उस तीर्थमें की हुई पूर्वोक्त क्रिया मुक्ति देनेवाली ३० होगी ॥ २६ – ३० ॥ श्रेष्ठ द्विजो! वहीं समस्त पापोंका विनाश करनेवाला ३१ तीर्थ - शिरोमणि काम्यकवन नामका एक तीर्थ है । जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सभी देवोंकी ३२ अनुमतिसे परमपदको प्राप्त करता है । इस वनमें प्रवेश करनेसे ही मनुष्य अपने समस्त पापोंसे छूट जाता है । इस पवित्र वनमें पूषा नामके सूर्यभगवान् प्रत्यक्ष रूपसे ३३ स्थित हैं । द्विजश्रेष्ठो! उन सूर्यभगवान्के दर्शनसे मुक्ति प्राप्त होती है । रविवारको उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य विशुद्ध- देह हो जाता है और अपने मनोरथको ३४ प्राप्त करता है ॥ ३१–३४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४१ ॥
बयालीसवाँ अध्याय काम्यकवन - तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन ऋषय ऊचुः
काम्यकस्य तु पूर्वेण कुञ्जं देवैर्निषेवितम् ।
तस्य तीर्थस्य सम्भूतिं विस्तरेण ब्रवीहि नः ॥
लोमहर्षण उवाच
शृण्वन्तु मुनयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् ।
ऋषीणां चरितं श्रुत्वा मुक्तो भवति किल्बिषैः ॥
ऋषियोंने पूछा – ( लोमहर्षणजी! ) काम्यकवनके पूर्वमें स्थित कुञ्जका आश्रयण देवताओंने किया था, पर उस काम्यकवन - तीर्थकी उत्पत्ति कैसे हुई, इसे आप १ हमें विस्तारसे बतलाइये ॥ १ ॥
लोमहर्षणजी बोले - ( उत्तर दिया ) – मुनियो! आप सभी लोग इस तीर्थके श्रेष्ठ माहात्म्यको सुनें । ऋषियोंके २ । चरित्रको सुननेसे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है ।