वामन पुराण — पृष्ठ 191–200

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200

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अध्याय ४२ ] काम्यकवन - तीर्थका प्रसङ्ग,, नैमिषेयाश्च ऋषयः कुरुक्षेत्रे समागताः सरस्वत्यास्तु स्नानार्थं प्रवेशं ते न लेभिरे ततस्ते कल्पयामासुस्तीर्थं यज्ञोपवीतिकम् शेषास्तु मुनयस्तत्र न प्रवेशं हि लेभिरे रन्तुकस्याश्रमात्तावद् यावत्तीर्थं सचक्रकम् । ब्राह्मणैः परिपूर्णं तु दृष्ट्वा देवी सरस्वती हितार्थं सर्वविप्राणां कृत्वा कुञ्जानि सा नदी प्रयाता पश्चिमं मार्गं सर्वभूतहिते स्थिता पूर्वप्रवाहे यः स्नाति गङ्गास्नानफलं लभेत् प्रवाहे दक्षिणे तस्या नर्मदा सरितां वरा पश्चिमे तु दिशाभागे यमुना संश्रिता नदी यदा उत्तरतो याति सिन्धुर्भवति सा नदी ॥ एवं दिशाप्रवाहेण याति पुण्या सरस्वती तस्यां स्नातः सर्वतीर्थे स्नातो भवति मानवः ततो गच्छेद् द्विजश्रेष्ठा मदनस्य महात्मनः । तीर्थं त्रैलोक्यविख्यातं विहारं नाम नामतः

यत्र देवाः समागम्य शिवदर्शनकाङ्क्षिणः ।

समागता न चापश्यन् देवं देव्या समन्वितम् ॥

स्तुवन्तो महादेवं नन्दिनं गणनायकम् ।

ततः प्रसन्नो नन्दीशः कथयामास चेष्टितम् ॥

भवस्य उमया सार्धं विहारे क्रीडितं महत् ।

तच्छ्रुत्वा देवतास्तत्र पत्नीराहूय क्रीडिताः ॥

तेषां क्रीडाविनोदेन तुष्टः प्रोवाच शंकरः ।

यो s स्मिंस्तीर्थे नरः स्त्राति विहारे श्रद्धयान्वितः ॥

धनधान्यप्रियैर्युक्तो भवते नात्र संशयः ।

दुर्गातीर्थं ततो गच्छेद् दुर्गया सेवितं महत् ॥

यत्र स्नात्वा पितॄन् पूज्य न दुर्गतिमवाप्नुयात् ।

तत्रापि च सरस्वत्याः कूपं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥

सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन १८१ । ( एक बारकी बात है — ) नैमिषारण्यके निवासी ऋषि ॥ ३ सरस्वती नदीमें स्नान करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये । परंतु वे सरस्वतीमें स्नान करनेके लिये प्रवेश न पा सके । तब । उन्होंने यज्ञोपवीतिक नामके एक तीर्थकी कल्पना कर ॥ ४ ली । ( पर फिर भी ) शेष मुनिलोग उसमें भी प्रवेश न पा सके । सरस्वतीने देखा कि रन्तुक आश्रमसे सचक्रकतक जितने भी तीर्थस्थल हैं, वे सब - के - सब ब्राह्मणोंसे भर ॥ ५ गये हैं । इसलिये सभी ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये उस सरस्वती नदीने कुञ्ज बना दिया और सभी प्राणियों की । भलाईमें तत्पर होकर वह पश्चिम मार्गको ( पश्चिमवाहिनी ॥ ६ बनकर ) चल पड़ी॥२–६ ॥ । जो मनुष्य सरस्वतीके पूर्वी प्रवाहमें स्नान करता ॥ ७ है, उसे गङ्गामें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है । उसके दक्षिणी प्रवाहमें सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा एवं पश्चिम । दिशाकी ओर यमुना नदी संश्रित है । किंतु जब वह उत्तर ८ दिशाकी ओर बहने लगती है तो वह सिन्धु हो जाती है । इस प्रकार विभिन्न दिशाओंमें वह पवित्र सरस्वती । नदी ( भिन्न - भिन्न रूपोंमें ) प्रवाहित होती है । उस ॥ ९ सरस्वती नदीमें स्नान करनेवाला मनुष्य मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लेता है । द्विजश्रेष्ठो! सरस्वती नदीमें स्नान करनेके बाद तीर्थसेवीको तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध महात्मा ॥ १० मदनके ' विहार ' नामक तीर्थमें जाना चाहिये ॥ ७ – १० ॥ जहाँपर भगवान् शिवके दर्शनाभिलाषी देवता ११ आये, पर वे उमासहित शिवका दर्शन न कर पाये । वे लोग गणनायक महादेव नन्दीकी स्तुति करने लगे । इससे नन्दीश्वर प्रसन्न हो गये और ( उन्होंने ) उमाके १२ साथ की जा रही शिवकी महती विहार - क्रीडाका वर्णन किया । यह सुनकर देवताओंने भी अपनी पत्नियोंको १३ बुलाया और उनके साथ ( उन लोगोंने भी ) क्रीडा की । उनके क्रीडा - विनोदसे शंकर प्रसन्न हो गये और बोले- इस विहार - तीर्थमें जो श्रद्धाके साथ स्नान करेगा, १४ वह नि: संदेह धन - धान्य एवं प्रिय सम्बन्धियोंसे सम्पन्न होगा । उमा - शिव विहार- स्थलकी यात्राके बाद दुर्गासे १५ । प्रतिष्ठित उस महान् दुर्गातीर्थमें जाना चाहिये ॥ ११–१५ ॥ जहाँ स्नानकर पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्यको १६ दुर्गतिकी प्राप्ति नहीं होती । उसी स्थानपर तीनों लोकोंमें

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१८२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४२

दर्शनान्मुक्तिमाप्नोति सर्वपातकवर्जितः ।

यस्तत्र तर्पयेद् देवान् पितॄंश्च श्रद्धयान्वितः ॥

अक्षय्यं लभते सर्वं पितृतीर्थं विशिष्यते ।

मातृहा पितृहा यश्च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥

स्नात्वा शुद्धिमवाप्नोति यत्र प्राची सरस्वती ।

देवमार्गप्रविष्टा च देवमार्गेण निःसृता ॥

प्राची सरस्वती पुण्या अपि दुष्कृतकर्मणाम् ।

त्रिरात्रं ये करिष्यन्ति प्राचीं प्राप्य सरस्वतीम् ॥

न तेषां दुष्कृतं किंचिद् देहमाश्रित्य तिष्ठति ।

नरनारायणौ देवौ ब्रह्मा स्थाणुस्तथा रविः ॥

प्राचीं दिशं निषेवन्ते सदा देवाः सवासवाः ।

ये तु श्राद्धं करिष्यन्ति प्राचीमाश्रित्य मानवाः ॥

तेषां न दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च ।

तस्मात् प्राची सदा सेव्या पञ्चम्यां च विशेषतः ॥

पञ्चम्यां सेवमानस्तु लक्ष्मीवाञ्जायते नरः ।

तत्र तीर्थमौशनसं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम् ॥

उशना यत्र संसिद्ध आराध्य परमेश्वरम् ।

ग्रहमध्येषु पूज्यते तस्य तीर्थस्य सेवनात् ॥

एवं शुक्रेण मुनिना सेवितं तीर्थमुत्तमम् ।

ये सेवन्ते श्रद्दधानास्ते यान्ति परमां गतिम् ॥

यस्तु श्राद्धं नरो भक्त्या तस्मिंस्तीर्थे करिष्यति ।

पितरस्तारितास्तेन भविष्यन्ति न संशयः ॥

चतुर्मुखं ब्रह्मतीर्थं सरो मर्यादया स्थितम् ।

ये सेवन्ते चतुर्दश्यां सोपवासा वसन्ति च ॥

अष्टम्यां कृष्णपक्षस्य चैत्रे मासि द्विजोत्तमाः ।

ते पश्यन्ति परं सूक्ष्मं यस्मान्नावर्तते पुनः ॥

स्थाणुतीर्थं ततो गच्छेत् सहस्रलिङ्गशोभितम् ।

तत्र स्थाणुवटं दृष्ट्वा मुक्तो भवति किल्बिषैः ॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें प्रसिद्ध सरस्वतीका एक कूप है । उसका दर्शन करनेमात्रसे १७ ही मनुष्य सभी पापोंसे रहित हो जाता है और मुक्ति प्राप्त करता है । जो वहाँ श्रद्धापूर्वक देवता और पितरों का तर्पण करता है, वह व्यक्ति समस्त अक्षय्य ( कभी भी नष्ट न १८ । होनेवाले ) पदार्थोंको प्राप्त करता है । पितृतीर्थकी विशेष महत्ता है । उस तीर्थमें माता, पिता और ब्राह्मणका घातक तथा गुरुपत्नीगामी भी स्नान करनेसे ( ही ) शुद्ध हो जाता है । वहीं पूर्व दिशाकी ओर बहनेवाली सरस्वती देवमार्गमें १ ९ प्रविष्ट होकर देवमार्गसे ही निकली हुई है ॥ १६-१९ ॥ पूर्ववाहिनी सरस्वती दुष्कर्मियोंके लिये भी पुण्य २० देनेवाली है । जो प्राची सरस्वतीके निकट जाकर त्रिरात्रव्रत करता है, उसके शरीरमें कोई पाप नहीं रह जाता । नर और नारायण – ये दोनों देव, ब्रह्मा, स्थाणु तथा सूर्य एवं २१ इन्द्रसहित सभी देवता प्राची दिशाका सेवन करते हैं । जो मानव प्राची सरस्वतीमें श्राद्ध करेंगे, उन्हें इस लोक २२ तथा परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा । अतः प्राची सरस्वतीका सर्वदा सेवन करना चाहिये - विशेषतः २३ पञ्चमीके दिन | पञ्चमी तिथिको प्राची सरस्वतीका सेवन करनेवाला मनुष्य लक्ष्मीवान् होता है । वहीं तीनों लोकोंमें २४ दुर्लभ औशनस नामका तीर्थ है, जहाँ परमेश्वरकी आराधना । कर शुक्राचार्य सिद्ध हो गये थे । उस तीर्थका सेवन २५ करनेसे ग्रहोंके मध्य उनकी पूजा होती है ॥ २०-२५ ॥ इस प्रकार शुक्रमुनिके द्वारा सेवित उत्तमतीर्थका जो श्रद्धापूर्वक ( स्वयं ) सेवन करते हैं, वे परम गतिको २६ प्राप्त होते हैं । उस तीर्थमें भक्तिपूर्वक जो व्यक्ति श्राद्ध करेगा, उसके द्वारा उसके पितर निःसन्देह तर जायँगे । २७ द्विजोत्तमो! जो सरोवरकी मर्यादासे स्थित चतुर्मुख ब्रह्मतीर्थमें चतुर्दशीके दिन उपवासव्रत करते हैं तथा २८ चैत्रमासके कृष्णपक्षकी अष्टमीतक निवास करके तीर्थका सेवन करते हैं, उन्हें परम सूक्ष्म ( तत्त्व ) - का दर्शन प्राप्त होता है; जिससे वे पुनः संसारमें नहीं आते । २ ९ ब्रह्मतीर्थंके नियम पालन करनेके बाद सहस्रलिङ्गसे शोभित स्थाणुतीर्थ जाय । वहाँ स्थाणुवटका दर्शन प्राप्त ३० । कर मनुष्य पापोंसे विमुक्त हो जाता है॥२६–३० ॥ बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४२ ॥

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अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८३ तिरालीसवाँ अध्याय स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और ब्रह्माके हवालेसे लोमहर्षणका उत्तर ऋषय ऊचुः स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं वटस्य च महामुने सांनिहत्यसरोत्पत्तिं पूरणं पांशुना ततः लिङ्गानां दर्शनात् पुण्यं स्पर्शनेन च किं फलम् तथैव सरमाहात्म्यं ब्रूहि सर्वमशेषतः लोमहर्षण उवाच शृण्वन्तु मुनयः सर्वे पुराणं वामनं महत् यच्छ्रुत्वा मुक्तिमाप्नोति प्रसादाद् वामनस्य तु सनत्कुमारमासीनं स्थाणोर्वटसमीपतः ऋषिभिर्बालखिल्याद्यैर्ब्रह्मपुत्रैर्महात्मभिः मार्कण्डेयो मुनिस्तत्र विनयेनाभिगम्य च पप्रच्छ सरमाहात्म्यं प्रमाणं च स्थितिं तथा मार्कण्डेय उवाच ब्रह्मपुत्र महाभाग सर्वशास्त्रविशारद ब्रूहि मे सरमाहात्म्यं सर्वपापक्षयावहम् कानि तीर्थानि दृश्यानि गुह्यानि द्विजसत्तम लिङ्गानि ह्यतिपुण्यानि स्थाणोर्यानि समीपतः येषां दर्शनमात्रेण मुक्तिं प्राप्नोति मानवः वटस्य दर्शनं पुण्यमुत्पत्तिं कथयस्व मे प्रदक्षिणायां यत्पुण्यं तीर्थस्नानेन यत्फलम् गुह्येषु चैव दृष्टेषु यत्पुण्यमभिजायते देवदेवो यथा स्थाणुः सरोमध्ये व्यवस्थितः किमर्थं पांशुना शक्रस्तीर्थं पूरितवान् पुनः स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं चक्रतीर्थस्य यत्फलम् । सूर्यतीर्थस्य माहात्म्यं सोमतीर्थस्य ब्रूहि मे ( स्थाणुतीर्थमें जाने तथा स्थाणुवटके दर्शनसे मुक्ति-। प्राप्ति होनेकी बात सुननेके बाद ) ऋषियोंने पूछा-॥ १ महामुने! आप स्थाणुतीर्थ एवं स्थाणुवटके माहात्म्य तथा सांनिहत्य सरोवरकी उत्पत्ति और इन्द्रद्वारा उसके धूलसे भरे जानेके कारणका वर्णन करें । ( इसी प्रकार ) लिङ्गोंके । दर्शनसे होनेवाले पुण्य तथा स्पर्शसे होनेवाले फल और ॥ २ । सरोवरके माहात्म्यका भी पूर्णतः वर्णन करें ॥ १-२ ॥ लोमहर्षणजी बोले- मुनियो! आपलोग महान् । वामनपुराणको श्रवण करें, जिसका श्रवण कर मनुष्य ॥ ३ वामनभगवान्की कृपासे मुक्ति पा लेता है । ( एक समय ) । ब्रह्माके पुत्र सनत्कुमार महात्मा बालखिल्य आदि ऋषियोंके ॥ ४ साथ स्थाणुवटके पास बैठे हुए थे । महर्षि मार्कण्डेयने । उनके निकट जाकर नम्रतापूर्वक सरोवरके माहात्म्य, ॥ ५ उसके विस्तार और स्थितिके विषयमें पूछा — ॥३–५ ॥ मार्कण्डेयजीने कहा ( पूछा ) - सर्वशास्त्रविशारद । महाभाग ब्रह्मपुत्र ( सनत्कुमार )! आप मुझसे सभी ॥ ६ पापोंके नष्ट करनेवाले सरोवरके माहात्म्यको कहिये ॥ द्विजश्रेष्ठ! स्थाणुतीर्थके पास कौन - कौन से तीर्थ दृश्य हैं ॥ ७ और कौन - कौन - से अदृश्य और कौन - से लिङ्ग अत्यन्त पवित्र हैं, जिनका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता । है । मुने! आप स्थाणुवटके दर्शनसे होनेवाले पुण्य तथा ॥ ८ उसकी उत्पत्तिके विषयमें भी कहिये – बताइये । इनकी । प्रदक्षिणा करनेसे होनेवाले पुण्य तीर्थमें स्नान करनेसे ॥ ९ मिलनेवाले फल एवं गुप्त तीर्थों तथा प्रकट तीर्थोके दर्शनसे मिलनेवाले पुण्यका भी वर्णन करें । प्रभो! । सरोवरके मध्यमें देवाधिदेव स्थाणु ( शिव ) किस प्रकार ॥ १० स्थित हुए और किस कारणसे इन्द्रने इस तीर्थको पुनः धूलिसे भर दिया? आप स्थाणुतीर्थका माहात्म्य, चक्रतीर्थका ॥ ११ । फल एवं सूर्यतीर्थ तथा सोमतीर्थका माहात्म्य – इन

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१८४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४३

शंकरस्य च गुह्यानि विष्णोः स्थानानि यानि च ।

कथयस्व महाभाग सरस्वत्याः सविस्तरम् ॥

ब्रूहि देवाधिदेवस्य माहात्म्यं देव तत्त्वतः ।

विरिञ्चस्य प्रसादेन विदितं सर्वमेव च ॥

लोमहर्षण उवाच

मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा ब्रह्मात्मा स महामुनिः ।

अतिभक्त्या तु तीर्थस्य प्रवणीकृतमानसः ॥

पर्यङ्कं शिथिलीकृत्वा नमस्कृत्वा महेश्वरम् ।

कथयामास तत्सर्वं यच्छुतं ब्रह्मणः पुरा ॥

सनत्कुमार उवाच

नमस्कृत्य महादेवमीशानं वरदं शिवम् ।

उत्पत्तिं च प्रवक्ष्यामि तीर्थानां ब्रह्मभाषिताम् ॥

पूर्वमेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे ।

बृहदण्डमभूदेकं प्रजानां बीजसम्भवम् ॥

तस्मिन्नण्डे स्थितो ब्रह्मा शयनायोपचक्रमे ।

सहस्त्रयुगपर्यन्तं सुप्त्वा स प्रत्यबुध्यत ॥

सुप्तोत्थितस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमपश्यत ।

सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य रजसा मोहितस्य च ॥

रजः सृष्टिगुणं प्रोक्तं सत्त्वं स्थितिगुणं विदुः ।

उपसंहारकाले च तमोगुणः प्रवर्तते ॥

गुणातीतः स भगवान् व्यापकः पुरुषः स्मृतः ।

तेनेदं सकलं व्याप्तं यत्किंचिज्जीवसंज्ञितम् ॥

स ब्रह्मा स च गोविन्द ईश्वरः स सनातनः ।

यस्तं वेद महात्मानं स सर्व वेद मोक्षवित् ॥

किं तेषां सकलैस्तीर्थैराश्रमैर्वा प्रयोजनम् ।

येषामनन्तकं चित्तमात्मन्येव व्यवस्थितम् ॥

आत्मा नदी संयमपुण्यतीर्था सत्योदका शीलसमाधियुक्ता । सबको मुझसे कहिये । महाभाग! सरस्वतीके निकट १२ | शंकर तथा विष्णुके जो - जो गुप्त स्थान हैं उनका भी आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें । देव! देवाधिदेवके माहात्म्यको आप भलीभाँति बतावें; क्योंकि ब्रह्माकी १३ कृपासे आपको सब कुछ विदित है ॥ ६-१३ ॥ लोमहर्षणने कहा ( उत्तर दिया ) - मार्कण्डेयके वचनको सुनकर ब्रह्मस्वरूप महामुनिका मन उस तीर्थके प्रति अत्यन्त भक्ति- प्रवण होनेसे गद्गद हो १४ गया । उन्होंने आसनसे उठकर भगवान् शंकरको प्रणाम किया तथा प्राचीन कालमें ब्रह्मासे इसके विषयमें जो १५ कुछ सुना था उन सबका वर्णन किया ॥ १४-१५ ॥ सनत्कुमारने कहा- मैं कल्याणकर्ता, वरदानी महादेव ईशानको नमस्कार कर ब्रह्मासे कहे हुए तीर्थक १६ उत्पत्तिके विषयमें वर्णन करूँगा । प्राचीन कालमें जब महाप्रलय हो गया और सर्वत्र केवल जल - ही - जल हो गया एवं उसमें समस्त चर - अचर जगत् नष्ट हो गया, १७ तब प्रजाओंके बीजस्वरूप एक ' अण्ड ' उत्पन्न हुआ । ब्रह्मा उस अण्डमें स्थित थे । उन्होंने उसमें अपने सोनेका उपक्रम किया । फिर तो वे हजारों युगों तक १८ सोते रहे । उसके बाद जगे । ब्रह्मा जब सोकर उठे, तब उन्होंने संसारको शून्य देखा । ( जब उन्होंने संसारमें कुछ भी नहीं देखा ) तब रजोगुणसे आविष्ट हो गये और १ ९ सृष्टिके विषयमें विचार करने लगे ॥ १६ – १ ९ ॥ रजोगुणको सृष्टिकारक तथा सत्त्वगुणको स्थिति-२० कारक माना गया है । उपसंहार करनेके समयमें तमोगुणकी प्रवृत्ति होती है । परंतु भगवान् वास्तवमें व्यापक एवं गुणातीत हैं । वे पुरुष नामसे कहे जाते हैं । २१ जीव नामसे निर्दिष्ट सारे पदार्थ उन्हींसे ओतप्रोत हैं । वे ही ब्रह्मा हैं, वे ही विष्णु हैं और वे ही सनातन महेश्वर हैं । मोक्षके ज्ञानी जिस प्राणीने उन महान् २२ आत्माको समझ लिया, उसने सब कुछ जान लिया । • जिस मनुष्यका अनन्त ( बहुमुखी ) चित्त उन परमात्मामें ही भलीभाँति स्थित है, उनके लिये सारे तीर्थ एवं २३ आश्रमोंसे क्या प्रयोजन? ॥ २०–२३ ॥ यह आत्मारूपी नदी शील और समाधिसे युक्त है । इसमें संयमरूपी पवित्र तीर्थ है, जो सत्यरूपी जलसे

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अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८५ तस्यां स्नातः पुण्यकर्मा पुनाति न वारिणा शुद्ध्यति चान्तरात्मा ॥ एतत्प्रधानं पुरुषस्य कर्म ज्ञेयं नैतादृशं शीले

यदात्मसम्बोधसुखे प्रविष्टम् ।

तदेव प्रवदन्ति सन्त-स्तत्प्राप्य देही विजहाति कामान् ॥

ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं

यथैकता समता सत्यता च ।

स्थितिर्दण्डविधानवर्जन-मक्रोधनश्चोपरमः क्रियाभ्यः ॥

एतद् ब्रह्म समासेन मयोक्तं ते द्विजोत्तम ।

यज्ज्ञात्वा ब्रह्म परमं प्राप्स्यसि त्वं न संशयः ॥

इदानीं शृणु चोत्पत्तिं ब्रह्मणः परमात्मनः ।

इमं चोदाहरन्त्येव श्लोकं नारायणं प्रति ॥

आपो नारा वै तनव इत्येवं नाम शुश्रुमः ।

तासु शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः ॥

विबुद्धः सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतं जगत् । अण्डं बिभेद भगवांस्तस्मादोमित्यजायत ।

ततो भूरभवत् तस्माद् भुव इत्यपरः स्मृतः ।

स्वः शब्दश्च तृतीयोऽभूद् भूर्भुवः स्वेति संज्ञितः ॥

तस्मात्तेजः समभवत् तत्सवितुर्वरेण्यं यत् ।

उदकं शोषयामास यत्तेजोऽण्डविनिःसृतम् ॥

तेजसा शोषितं शेषं कललत्वमुपागतम् ।

कललाद् बुबुदं ज्ञेयं ततः काठिन्यतां गतम् ॥

काठिन्याद् धरणी ज्ञेया भूतानां धारिणी हि सा ।

यस्मिन् स्थाने स्थितं ह्यण्डं तस्मिन् संनिहितं सरः ॥

यदाद्यं निःसृतं तेजस्तस्मादादित्य उच्यते ।

अण्डमध्ये समुत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

उल्बं तस्याभवन्मेरुर्जरायुः पर्वताः स्मृताः ।

गर्भोदकं समुद्राश्च तथा नद्यः सहस्रशः ॥

परिपूर्ण है । जो पुण्यात्मा इस ( नदी ) - में स्नान करता है, २४ वह पवित्र हो जाता है, ( पिये जानेवाले सामान्य ) जलसे अन्तरात्माकी शुद्धि नहीं होती । इसलिये पुरुषका मुख्य कर्तव्य है कि वह आत्मज्ञानरूपी सुखमें प्रविष्ट रहे । महात्मा लोग उसीको ' ज्ञेय ' कहते हैं । शरीर धारण करनेवाला देही जब उसे पा लेता है, तब सभी २५ इच्छाओंको छोड़ देता है । ब्राह्मणके लिये एकता, समता, सत्यता, मर्यादामें स्थिति, दण्ड विधानका त्याग, क्रोध न करना एवं ( सांसारिक ) क्रियाओंसे विराग ही धन है, इनके समान उनके लिये कोई अन्य धन नहीं २६ । है । द्विजोत्तम! मैंने थोड़ी मात्रामें तुमसे यह जो ज्ञानके विषयमें कहा है, इसे जानकर तुम निःसंदेह परम २७ ब्रह्मको प्राप्त करोगे । अब तुम परमात्मा ब्रह्मकी उत्पत्तिके विषयमें सुनो । उस नारायणके विषयमें लोग २८ इस श्लोकका उदाहरण दिया करते हैं— ॥ २४–२८ ॥ 4 ' आप् ' ( जल ) ही को ' नार ', ( एवं परमात्मा ) -२ ९ को ' तनु ' – ऐसा हमने सुन रखा है । वे ( परमात्मा ) उसमें शयन करते हैं, जिससे वे ( शब्दव्युत्पत्तिसे ) ' नारायण ' शब्दसे स्मरण किये गये हैं । जलमें सोनेके बाद जाग जानेपर उन्होंने जगत्‌को अपनेमें प्रविष्ट ३० जानकर अण्डको तोड़ दिया, उससे ' ॐ ' शब्दकी उत्पत्ति हुई । इसके बाद उससे ( पहली बार ) भूः, दूसरी बार भुवः एवं तीसरी बार स्व: की उत्पत्ति ३१ ( ध्वनि ) हुई । इन तीनोंका नाम क्रमशः मिलकर ' भूर्भुवः स्वः ' हुआ । उस सविता देवताका जो वरेण्य तेज है, वह उसीसे उत्पन्न हुआ । अण्डसे जो तेज ३२ निकला, उसने जलको सुखा दिया ॥ २ ९ –३२ ॥ तेजसे जलके सोखे जानेपर शेष जल कललकी ३३ आकृतिमें बदल गया । कललसे बुद्बुद हुआ और उसके बाद वह कठोर हो गया । कठोर हो जानेके कारण वह बुद्बुद भूतोंको धारण करनेवाली धरणी बन गया । जिस ३४ स्थानपर अण्ड स्थित था, वहीं संनिहित नामका सरोवर है । तेजके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण उसे ' आदित्य ' नामसे कहा जाता है । फिर सारे संसारके पितामह ब्रह्मा ३५ अण्डके मध्यमें उत्पन्न हुए । उस अण्डका उल्ब ( गर्भका आवरण ) मेरु पर्वत है एवं अन्य पर्वत उसके ३६ । जरायु ( झिल्ली ) माने जाते हैं । समुद्र एवं सहस्रों नदियाँ

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१८६

नाभिस्थाने यदुदकं ब्रह्मणो निर्मलं महत् ।

महत्सरस्तेन पूर्णं विमलेन वराम्भसा ॥

तस्मिन् मध्ये स्थाणुरूपी वटवृक्षो महामनाः ।

तस्माद् विनिर्गता वर्णा ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः ॥

शूद्राश्च तस्मादुत्पन्नाः शुश्रूषार्थं द्विजन्मनाम् ।

ततश्चिन्तयतः सृष्टिं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।

मनसा मानसा जाताः सनकाद्या महर्षयः ॥

पुनश्चिन्तयतस्तस्य प्रजाकामस्य धीमतः ।

उत्पन्ना ऋषयः सप्त ते प्रजापतयोऽभवन् ॥

पुनश्चिन्तयतस्तस्य रजसा मोहितस्य च ।

बालखिल्याः समुत्पन्नास्तपःस्वाध्यायतत्पराः ॥

ते सदा स्त्राननिरता देवार्चनपरायणाः ।

उपवासैर्व्रतैस्तीत्रैः शोषयन्ति कलेवरम् ॥

वानप्रस्थेन विधिना अग्निहोत्रसमन्विताः ।

तपसा परमेणेह शोषयन्ति कलेवरम् ॥

दिव्यं वर्षसहस्त्रं ते कृशा धमनिसंतताः । आराधयन्ति देवेशं न च तुष्यति शंकरः

ततः कालेन महता उमया सह शंकरः ।

आकाशमार्गेण तदा दृष्ट्वा देवी सुदुःखिता ॥

प्रसाद्य देवदेवेशं शंकरं प्राह सुव्रता ।

क्लिश्यन्ते ते मुनिगणा देवदारुवनाश्रयाः ॥

तेषां क्लेशक्षयं देव विधेहि कुरु मे दयाम् ।

किं वेदधर्मनिष्ठानामनन्तं देव दुष्कृतम् ॥

नाद्यापि येन शुद्धयन्ति शुष्कस्नाय्वस्थिशोषिताः । तच्छ्रुत्वा वचनं देव्याः पिनाकी पातितान्धकः । प्रोवाच प्रहसन् मूर्ध्नि चारुचन्द्रांशुशोभितः श्रीमहादेव उवाच न वेत्सि देवि तत्त्वेन धर्मस्य गहना गतिः । नैते धर्म विजानन्ति न च कामविवर्जिताः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४३ गर्भ जल हैं । ब्रह्माके नाभि स्थानमें जो विशाल निर्मल जल राशि है, उस स्वच्छ श्रेष्ठ जलसे महान् ३७ सरोवर भरा - पूरा है ॥ ३३–३७ ॥ उस सरोवरके मध्यमें स्थाणुके आकारका महान् ३८ विशाल एक वटवृक्ष है । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य— ये तीनों वर्ण उससे निकले और द्विजोंकी शुश्रूषा करनेके लिये उसीसे शूद्रोंकी भी उत्पत्ति हुई । ( इस प्रकार चारों वर्णोंकी सृष्टि सरोवरके मध्यमें स्थाणुरूपसे ३ ९ स्थित वटवृक्षसे हुई । ) उसके बाद सृष्टिकी चिन्ता करते हुए अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके मनसे सनकादि महर्षियोंकी उत्पत्ति हुई । फिर प्रजाकी इच्छासे चिन्तन कर रहे ४० मतिमान् ब्रह्मासे सात ऋषि उत्पन्न हुए । वे प्रजापति हुए । रजोगुणसे मोहित होकर ब्रह्माने जब पुनः चिन्तन किया, तब तप एवं स्वाध्यायमें परायण बालखिल्य ४१ ऋषियोंकी उत्पत्ति हुई॥३८–४१ ॥ वे सर्वदा स्नान ( शुद्धि ) करनेमें निरत तथा ४२ देवताओंकी पूजा करनेमें विशेषरूपसे लगे रहते तथा उपवासों एवं तीव्र व्रतोंसे अपने शरीरको सुखाये जा रहे थे । अग्निहोत्रसे युक्त होकर वानप्रस्थकी विधिसे वे ४३ । उत्कृष्ट तपस्या करते और अपने शरीर सुखाते जाते थे । वे लोग अत्यन्त दुर्बल एवं कंकाल - काय होकर सहस्र दिव्य वर्षोंतक देवेशकी उपासना करते रहे; परंतु ॥ ४४ भगवान् शंकर प्रसन्न न हुए । उसके बहुत दिनोंके बाद उमाके साथ भगवान् शंकर आकाश मार्गसे भ्रमण कर रहे थे । धार्मिक कार्योंको करनेवाली उमा ( बालखिल्योंकी ) ४५ इस प्रकारकी दशा ( कंकालमात्र ) देखकर दुःखी हो गयीं और दुःखी होकर देवदेवेश शंकरको प्रसन्नकर ४६ कहने लगीं - देव! देवदारु - वनमें रहनेवाले वे मुनिगण क्लेश उठा रहे हैं । देव! मेरे ऊपर दया करें । आप उनके क्लेशका विनाश करें । देव! वैदिक धर्ममें निष्ठा ४७ रखनेवाले इन ( तपस्वियों ) के कौन ऐसा अनन्त दुष्कृत है, जिससे ये कङ्कालमात्र होनेपर भी अबतक शुद्ध नहीं हुए? अन्धकको मार गिरानेवाले, चन्द्रमाकी मनोहर किरणोंसे सुशोभित सिरवाले पिनाकधारी शंकरजी उमाकी ॥ ४८ । बातको सुनकर हँसते हुए बोले - ॥ ४२ - ४८ ॥ श्रीमहादेवजी बोले - देवि! धर्मकी गति गहन होती ॥ ४ ९ है । तुम उसे तत्त्वतः नहीं जानती । ये लोग न तो धर्मज्ञ हैं

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अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८७

न च क्रोधेन निर्मुक्ताः केवलं मूढबुद्धयः ।

एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद् देवी मा मैवं शंसितव्रतान् ॥

देव प्रदर्शयात्मानं परं कौतूहलं हि मे ।

स इत्युक्त उवाचेदं देवीं देवः स्मिताननः ॥

तिष्ठ त्वमत्र यास्यामि यत्रैते मुनिपुंगवाः ।

साधयन्ति तपो घोरं दर्शयिष्यामि चेष्टितम् ॥

इत्युक्ता तु ततो देवी शंकरेण महात्मना ।

गच्छस्वेत्याह मुदिता भर्त्तारं भुवनेश्वरम् ॥

यत्र ते मुनयः सर्वे काष्ठलोष्ठसमाः स्थिताः ।

अधीयाना महाभागाः कृताग्निसदनक्रियाः ॥

तान् विलोक्य ततो देवो नग्नः सर्वाङ्गसुन्दरः ।

वनमालाकृतापीडो युवा भिक्षाकपालभृत् ॥

आश्रमे पर्यटन् भिक्षां मुनीनां दर्शनं प्रति ।

देहि भिक्षां ततश्चोक्त्वा ह्याश्रमादाश्रमं ययौ ॥

तं विलोक्याश्रमगतं योषितो ब्रह्मवादिनाम् ।

सकौतुकस्वभावेन तस्य रूपेण मोहिताः ॥

प्रोचुः परस्परं नार्य एहि पश्याम भिक्षुकम् ।

परस्परमिति चोक्त्वा गृह्य मूलफलं बहु ॥

गृहाण भिक्षामूचुस्तास्तं देवं मुनियोषितः ।

स तु भिक्षाकपालं तं प्रसार्य बहु सादरम् ॥

देहि देहि शिवं वोऽस्तु भवतीभ्यस्तपोवने ।

हसमानस्तु देवेशस्तत्र देव्या निरीक्षितः ।

तस्मै दत्त्वैव तां भिक्षां पप्रच्छुस्तं स्मरातुराः ॥

नार्य ऊचुः ौ नाम व्रतविधिस्त्वया तापस सेव्यते ।

यत्र नग्नेन लिङ्गेन वनमालाविभूषितः ।

भवान् वै तापसो हृद्यो हृद्याः स्मो यदि मन्यसे ॥

और न कामशून्य । ये क्रोधसे मुक्त भी नहीं हैं और विचार-५० रहित हैं । यह सुनकर उमादेवीने कहा- नहीं, व्रत धारण करनेवाले इन लोगोंको ऐसा मत कहिये; ( प्रत्युत ) देव! आप अपनेको प्रकट करें । निश्चय ही मुझे बड़ा कौतूहल ५१ है । उमाके ऐसा कहनेपर शंकरने मुस्कुराकर देवीसे इस प्रकार कहा - अच्छा, तुम यहाँ रुको । ये मुनिश्रेष्ठ जहाँ घोर तपस्याकी साधना कर रहे हैं, वहाँ जाकर मैं इनकी ५२ । चेष्टा कैसी है, उसे दिखलाता हूँ ॥ ४ ९ –५२ ॥ जब महात्मा शंकरने देवी उमासे इस प्रकार कहा ५३ तब उमादेवी प्रसन्न हो गयीं और भुवनोंके पालन करनेवाले भुवनेश्वर शिवसे बोलीं- अच्छा, जिस स्थानपर लकड़ी और मिट्टीके ढेलेके समान निश्चेष्ट, अग्निहोत्री एवं अध्ययनमें लगे हुए मुनिगण रहते हैं, उस स्थानपर ५४ । आप जायँ । ( फिर उमाद्वारा इस प्रकार प्रेरित किये जानेपर शंकरजी मुनिमण्डलीकी ओर जानेके लिये प्रस्तुत हो गये ) फिर शंकरने उस मुनिमण्डलीको ५५ । देखकर वनमाला धारण कर लिया । तब वे सर्वाङ्गसुन्दर ( पर ) नग्न - सुडौल देह धारण कर युवाके रूपमें हो गये और भिक्षा पात्र हाथमें लेकर मुनियोंके सामने भिक्षाके लिये भ्रमण करते हुए ' भिक्षा दो ' यह कहते हुए एक ५६ आश्रमसे दूसरे आश्रममें जाने लगे ॥ ५३–५६ ॥ एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें घूम रहे उन नग्न ५७ युवाको देखकर ब्रह्मवादियोंकी स्त्रियाँ उत्सुकताके साथ स्वभाववश उनके रूपसे मोहित हो गयीं और परस्परमें कहने लगीं - आओ, भिक्षुकको देखा जाय । आपसमें ५८ इस प्रकार कहकर बहुत - सा मूल फल लेकर मुनि-पत्नियोंने उन देवसे कहा- आप भिक्षा ग्रहण करें । ५ ९ उन्होंने भी अत्यन्त आदरसे उस भिक्षापात्रको फैलाकर ( सामने दिखाकर ) कहा - तपोवनवासिनियो! ( भिक्षा ) दो, दो! आप सबका कल्याण हो । पार्वतीजी वहाँ हँसते हुए शंकरको देख रही थीं । कामातुर मुनिपत्नियोंने उस ६० नग्न युवाको भिक्षा देकर उनसे पूछा – ॥ ५७–६० ॥ मुनिपत्त्रियोंने पूछा - तापस! आप किस व्रतके विधानका पालन कर रहे हैं, जिसमें वनमालासे विभूषित हृदयहारी तपस्वीका सुन्दर स्वरूप धारण कर नग्न मूर्ति बनना पड़ा है? आप हमारे हृदयके आनन्दप्रद ६१ | तापस हैं, यदि आप मानें तो हम भी आपकी

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१८८

इत्युक्तस्तापसीभिस्तु प्रोवाच हसिताननः ।

इदमीदृग् व्रतं किंचिन्न रहस्यं प्रकाश्यते ॥

शृण्वन्ति बहवो यत्र तत्र व्याख्या न विद्यते ।

अस्य व्रतस्य सुभगा इति मत्वा गमिष्यथ ॥

एवमुक्तास्तदा तेन ताः प्रत्यूचुस्तदा मुनिम् ।

रहस्ये हि गमिष्यामो मुने नः कौतुकं महत् ॥

इत्युक्त्वा तास्तदा तं वै जगृहुः पाणिपल्लवैः । काचित् कण्ठे सकन्दर्पा बाहुभ्यामपरास्तथा

जानुभ्यामपरा नार्यः केशेषु ललितापराः ।

अपरास्तु कटीरन्ध्रे अपराः पादयोरपि ॥

क्षोभं विलोक्य मुनय आश्रमेषु स्वयोषिताम् ।

हन्यतामिति संभाष्य काष्ठपाषाणपाणयः ॥

पातयन्ति स्म देवस्य लिङ्गमुद्धृत्य भीषणम् ।

पातिते तु ततो लिङ्गे गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ॥

देव्या स भगवान् रुद्रः कैलासं नगमाश्रितः ।

पतिते देवदेवस्य लिङ्गे नष्टे चराचरे ॥

क्षोभो बभूव सुमहानृषीणां भावितात्मनाम् ।

एवं देवे तदा तत्र वर्तति व्याकुलीकृते ॥

उवाचैको मुनिवरस्तत्र बुद्धिमतां वरः ।

न वयं विद्मः सद्भावं तापसस्य महात्मनः ॥

विरिञ्चिं शरणं यामः स हि ज्ञास्यति चेष्टितम् ।

एवमुक्ताः सर्व एव ऋषयो लज्जिता भृशम् ॥

ब्रह्मणः सदनं जग्मुर्देवैः सह निषेवितम् ।

प्रणिपत्याथ देवेशं लज्जया धोमुखाः स्थिताः ॥

अथ तान् दुःखितान् दृष्ट्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् । अहो मुग्धा यदा यूयं क्रोधेन कलुषीकृताः न धर्मस्य क्रिया काचिज्ज्ञायते मूढबुद्धयः । श्रूयतां धर्मसर्वस्वं तापसाः क्रूरचेष्टिताः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४३ मनोऽनुकूल प्रिया हो सकती हैं । उन्होंने तपस्विनियोंके ६२ | इस प्रकार कहनेपर हँसते हुए कहा - यह व्रत ऐसा है कि इसका कुछ भी रहस्य प्रकट नहीं किया जा सकता । सौभाग्यशालिनियो! जहाँ बहुत - से सुननेवाले हों वहाँ इस व्रतकी व्याख्या नहीं की जा सकती । ६३ इसलिये यह जानकर आप सभी चली जायँ । उनके ऐसा कहनेपर उन्होंने मुनिसे कहा - मुने! हम सब ( यह जाननेके लिये ) एकान्तमें चलेंगी; ( क्योंकि ) हमें ६४ महान् कौतूहल हो रहा है ॥ ६१–६४ ॥ यह कहकर उन सभीने उनको अपने कोमल ॥ ६५ हाथोंसे पकड़ लिया । कुछ कामसे आतुर होकर कण्ठसे लिपट गयीं और कुछने उन्हें भुजाओंमें बाँध लिया; कुछ स्त्रियोंने उन्हें घुटनोंसे पकड़ लिया; कुछ ६६ सुन्दरी स्त्रियाँ उनके केश छूने लगीं; और कुछ उनकी कमरसे लिपट गयीं एवं कुछने उनके पैरोंको पकड़ लिया । मुनियोंने आश्रम में अपनी स्त्रियोंकी अधीरता ६७ | देख ' मारो मारो ' – इस प्रकार कहते हुए हाथोंमें डंडा और पत्थर लेकर शिवके लिङ्गको ही उखाड़कर फेंक दिया । लिङ्गके गिरा दिये जानेपर भगवान् शंकर ६८ अन्तर्हित हो गये॥६५–६८ ॥ वे भगवान् रुद्र उमादेवीके साथ कैलास पर्वतपर ६ ९ चले गये । देवदेव शंकरके लिङ्गके गिरनेपर प्रायः समस्त चर - अचर जगत् नष्ट हो गया । इससे आत्मनिष्ठ ७० महर्षियोंको व्याकुलता हुई । इसी प्रकार देवके ( भी ) व्याकुल हो जानेपर एक अत्यन्त बुद्धिमान् श्रेष्ठ मुनिने कहा- हम उन महात्मा तापसके सद्भाव ( सदाशय ) -७१ को नहीं जानते । हम ब्रह्माकी शरणमें चलें । वे ही उनकी चेष्टा ( रहस्य ) समझ सकेंगे । ऐसा कहनेपर सभी ७२ ऋषि अत्यन्त लज्जित हो गये ॥६ ९ –७२ ॥ फिर, वे लोग देवताओंसे उपासित ब्रह्माके ७३ लोकमें गये । वहाँ देवेश ( ब्रह्मा ) - को प्रणाम कर लज्जासे मुख नीचा कर खड़े हो गये । उसके बाद ब्रह्माने उन्हें दुःखी देखकर यह वचन कहा – अहो, ॥ ७४ क्रोध करनेसे तुम सबका मन कलुषित हो गया है, इसलिये मूढ़ हो गये हो । मूढ बुद्धिवालो! तुम सब धर्मकी कोई वास्तविक क्रिया नहीं जानते । अप्रिय कर्म ॥ ७५ करनेवाले तापसो! धर्मके सारभूत रहस्यको सुनो, जिसे

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अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८ ९

विदित्वा यद् बुधः क्षिप्रं धर्मस्य फलमाप्नुयात् ।

योऽसावात्मनि देहेऽस्मिन् विभुर्नित्यो व्यवस्थितः ॥

सोऽनादिः स महास्थाणुः पृथक्त्वे परिसूचितः ।

मणिर्यथोपधानेन धत्ते वर्णोज्ज्वलो s पि वै ॥

तन्मयो भवते तद्वदात्माऽपि मनसा कृतः ।

मनसो भेदमाश्रित्य कर्मभिश्चोपचीयते ॥

ततः कर्मवशाद् भुङ्गे संभोगान् स्वर्गनारकान् ।

तन्मनः शोधयेद् धीमाञ्ज्ञानयोगाद्युपक्रमैः ॥

तस्मिञ्शुद्धे ह्यन्तरात्मा स्वयमेव निराकुलः ।

न शरीरस्य संक्लेशैरपि निर्दहनात्मकैः ॥

शुद्धिमाप्नोति पुरुषः संशुद्धं यस्य नो मनः ।

क्रिया हि नियमार्थाय पातकेभ्यः प्रकीर्तिताः ॥

यस्मादत्याविलं देहं न शीघ्रं शुद्धयते किल ।

तेन लोकेषु मार्गोऽयं सत्पथस्य प्रवर्त्तितः ॥

वर्णाश्रमविभागोऽयं लोकाध्यक्षेण केनचित् ।

निर्मितो मोहमाहात्म्यं चिह्नं चोत्तमभागिनाम् ॥

भवन्तः क्रोधकामाभ्यामभिभूताश्रमे स्थिताः ।

ज्ञानिनामाश्रमो वेश्म अनाश्रममयोगिनाम् ॥

क्व च न्यस्तसमस्तेच्छा क्व च नारीमयो भ्रमः ।

क्व क्रोधमीदृशं घोरं येनात्मानं न जानथ ॥

यत्क्रोधनो यजति यच्च ददाति नित्यं यद् वा तपस्तपति यच्च जुहोति तस्य । प्राप्नोति नैव किमपीह फलं हि लोके मोघं फलं भवति तस्य हि क्रोधनस्य ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शीघ्र ही कर्मका फल प्राप्त ७६ करता है । हम सबके इस शरीरमें रहनेवाला जो नित्य विभु ( परमेश्वर ) हैं, वह आदि - अन्त - रहित एवं महा स्थाणु है । ( विचार करनेपर ) वह ( देही ) इस शरीरसे ७७ अलग प्रतीत होता है । जिस प्रकार उज्ज्वल वर्णकी मणि भी आश्रयके प्रभावसे उसी रूपकी भासती है, उसी प्रकार आत्मा भी मनसे संयुक्त होकर मनके भेदका आश्रय कर कर्मोंसे ढक जाता ७८ है । उसके बाद कर्मवश वह स्वर्गीय तथा नारकीय भोगोंको भोगता रहता है । बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि ज्ञान तथा योग आदि उपायोंद्वारा मनका ७ ९ शोधन करे ॥ ७३–७९ ॥ मनके शुद्ध होनेपर अन्तरात्मा अपने - आप निर्मल ८० हो जाता है । जिसका मन शुद्ध नहीं है, ऐसा पुरुष शरीरको सुखानेवाले क्लेशोंके द्वारा शुद्ध नहीं होता । पापोंसे बचनेके लिये ही ( धर्म्य ) क्रियाओंका विधान ८१ हुआ है, अतः अत्यन्त पापपूर्ण शरीर ( स्वतः ) शीघ्र शुद्ध नहीं होता । इसीलिये लोकमें सत्पथ - शास्त्रविहित ८२ क्रियाओंका यह मार्ग प्रवर्तित हुआ है । किसी दिव्यद्रष्टा लोक- स्वामीने उत्तम भाग्यवालोंके निमित्त मोह - माहात्म्यके प्रतीकस्वरूप इस वर्णाश्रम विभागका निर्माण किया ८३ है ॥ ८० – ८३ ॥ आपलोग आश्रममें रहते हुए भी क्रोध तथा ८४ कामके वशीभूत हैं । ज्ञानियोंके लिये घर ही आश्रम है और अयोगियों ( अज्ञानियों ) के लिये आश्रम भी अनाश्रम है । कहाँ समस्त कामनाओंका त्याग और कहाँ ८५ नारीमय यह भ्रम जाल । ( कहाँ तप और ) कहाँ तो इस प्रकारका क्रोध, जिससे तुमलोग अपने आत्मा ( शिव ) - को नहीं पहचान पाते । क्रोधी पुरुष लोकमें जो सदा यज्ञ करता है, जो दान देता है अथवा जो तप या

हवन करता है, उसका कोई फल उसे नहीं मिलता ।

८६ उस क्रोधीके सभी फल व्यर्थ होते हैं ॥ ८४-८६ ॥

तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४३ ॥

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१ ९ ० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४४ चौवालीसवाँ अध्याय ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन; स्थाण्वीश्वरप्रसङ्ग और हस्तिरूप शंकरकी स्तुति एवं लिङ्गमें संनिधान सनत्कुमार उवाच

ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा ऋषयः सर्व एव ते ।

पुनरेव च पप्रच्छुर्जगतः श्रेयकारणम् ॥

ब्रह्मोवाच

गच्छामः शरणं देवं शूलपाणिं त्रिलोचनम् ।

प्रसादाद् देवदेवस्य भविष्यथ यथा पुरा ॥

इत्युक्ता ब्रह्मणा सार्धं कैलासं गिरिमुत्तमम् ।

ददृशुस्ते समासीनमुमया सहितं हरम् ॥

ततः स्तोतुं समारब्धो ब्रह्मा लोकपितामहः ।

देवाधिदेवं वरदं त्रैलोक्यस्य प्रभुं शिवम् ॥

ब्रह्मोवाच

अनन्ताय नमस्तुभ्यं वरदाय पिनाकिने ।

महादेवाय देवाय स्थाणवे परमात्मने ॥

नमोऽस्तु भुवनेशाय तुभ्यं तारक सर्वदा ।

ज्ञानानां दायको देवस्त्वमेकः पुरुषोत्तमः ॥

नमस्ते पद्मगर्भाय पद्मेशाय नमो नमः ।

घोरशान्तिस्वरूपाय चण्डक्रोध नमोऽस्तु ते ॥

नमस्ते देव विश्वेश नमस्ते सुरनायक ।

शूलपाणे नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन ॥

एवं स्तुतो महादेवो ब्रह्मणा ऋषिभिस्तदा ।

उवाच मा भैर्व्रजत लिङ्गं वो भविता पुनः ॥

क्रियतां मद्वचः शीघ्रं येन मे प्रीतिरुत्तमा ।

भविष्यति प्रतिष्ठायां लिङ्गस्यात्र न संशयः ॥

लिङ्गं पूजयिष्यन्ति मामकं भक्तिमाश्रिताः ।

न तेषां दुर्लभं किंचिद् भविष्यति कदाचन ॥

सनत्कुमारने कहा— उन सभी ऋषियोंने ब्रह्माकी इस वाणीको सुनकर संसारके कल्याणार्थ पुनः उपाय १ | पूछा ॥ १ ॥

ब्रह्माने कहा – ( उत्तर दिया ) ( आओ ), हम सभी लोग हाथमें शूल धारण करनेवाले, त्रिनेत्रधारी २ भगवान् शंकरकी शरणमें चलें । तुम सब लोग उन्हीं देवदेव प्रसादसे पहले जैसे हो जाओगे । ब्रह्माके ऐसा कहनेपर वे लोग उनके साथ श्रेष्ठ पर्वत कैलासपर चले ३ गये और वहाँ उन लोगोंने उमा ( पार्वती ) के साथ बैठे हुए शंकरका दर्शन किया । उसके बाद संसारके पितामह ब्रह्माने देवोंके इष्टदेव, तीनों लोकोंके स्वामी वरदानी ४ भगवान् शंकरकी स्तुति करनी आरम्भ की - ॥२–४ ॥ पिनाक धारण करनेवाले वरदानी अनन्त महादेव! स्थाणुस्वरूप परमात्मदेव! आपको मेरा नमस्कार है । ५ भुवनोंके स्वामी भुवनेश्वर तारक भगवान्! आपको सदा नमस्कार है । पुरुषोत्तम! आप ज्ञान देनेवाले अद्वितीय ६ देव हैं । आप कमलगर्भ एवं पद्मेश हैं । आपको बारम्बार नमस्कार है । ( प्रचण्ड ) घोर - स्वरूप एवं शान्तिमूर्ति! आपको नमस्कार है । विश्वके शासकदेव! आपको ७ नमस्कार है । सुरनायक! आपको नमस्कार है । शूलपाणि शंकर! आपको नमस्कार है । ( संसारके रचनेवाले ) ८ विश्वभावन! आपको मेरा नमस्कार है॥५–८ ॥ ऋषियों और ब्रह्माने जब इस प्रकार शंकरकी ९ स्तुति की तब महादेव शङ्करने कहा - भय मत करो; जाओ ( तुमलोगोंके कल्याणार्थ ) लिङ्ग फिर भी ( उत्पन्न ) हो जायगा । मेरे वचनका शीघ्र पालन करो । १० लिङ्गकी प्रतिष्ठा कर देनेपर निस्सन्देह मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी । जो व्यक्ति भक्तिके साथ मेरे लिङ्गकी पूजा ११ । करेंगे उनके लिये कोई भी पदार्थ कभी दुर्लभ न होगा ।