वामन पुराण — पृष्ठ 231–240

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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अध्याय ५१ ] मेनाकी तीन कन्याओंका

तदेव माता नामास्याश्चक्रे पितृसुता शुभा ।

उमेत्येव हि कन्यायाः सा जगाम तपोवनम् ॥

ततः सा मनसा देवं शूलपाणिं वृषध्वजम् ।

रुद्रं चेतसि संधाय तपस्तेपे सुदुष्करम् ॥

ततो ब्रह्माऽब्रवीद् देवान् गच्छध्वं हिमवत्सुताम् ।

इहानयध्वं तां कालीं तपस्यन्तीं हिमालये ॥

ततो देवाः समाजग्मुर्ददृशुः शैलनन्दिनीम् ।

तेजसा विजितास्तस्या न शेकुरुपसर्पितुम् ॥

इन्द्रोऽमरगणैः सार्द्धं निर्द्धतस्तेजसा तया ।

ब्रह्मणोऽधिकतेजोऽस्या विनिवेद्य प्रतिष्ठितः ॥

ततो ब्रह्माऽब्रवीत् सा हि ध्रुवं शङ्करवल्लभा ।

यूयं यत्तेजसा नूनं विक्षिप्तास्तु हतप्रभाः ॥

तस्माद् भजध्वं स्वं स्वं हि स्थानं भो विगतज्वराः ।

सतारकं हि महिषं विदध्वं निहतं रणे ॥

इत्येवमुक्ता देवेन ब्रह्मणा सेन्द्रकाः सुराः । जग्मुः स्वान्येव धिष्ण्यानि सद्यो वै विगतज्वराः ।

उमामपि तपस्यन्तीं हिमवान् पर्वतेश्वरः ।

निवर्त्य तपसस्तस्मात् सदारो ह्यनयद्गृहान् ॥

देवोऽप्याश्रित्य तद्रौद्रं व्रतं नाम्ना निराश्रयम् ।

विचचार महाशैलान् मेरुप्राग्र्यान् महामतिः ॥

स कदाचिन्महाशैलं हिमवन्तं समागतः ।

तेनार्चितः श्रद्धयाऽसौ तां रात्रिमवसद्धरः ॥

द्वितीयेऽह्नि गिरीशेन महादेवो निमन्त्रितः ।

इहैव तिष्ठस्व विभो तपः साधनकारणात् ॥

इत्येवमुक्तो गिरिणा हरश्चक्रे मतिं च ताम् ।

तस्थावाश्रममाश्रित्य त्यक्त्वा वासं निराश्रयम् ॥

वसतोऽप्याश्रमे तस्य देवदेवस्य शूलिनः ।

तं देशमगमत् काली गिरिराजसुता शुभा ॥

तामागतां हरो दृष्ट्वा भूयो जातां प्रियां सतीम् ।

स्वागतेनाभिसम्पूज्य तस्थौ योगरतो हरः ॥

जन्म, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन २२१ करनेसे रोका । उसने ' उ ' ' मा ' ऐसा कहा । पितरोंकी २२ पुत्री, कल्याणमयी माता ( मेना ) - ने कन्याका वही दो अक्षरोंसे संयुक्त ' उमा ' यह नाम रखा । उमा भी तपोवनमें चली गयी । उसके बाद उसने मनमें शूलपाणि २३ वृषध्वज रुद्रका ध्यानकर कठिन तपस्या की । फिर ब्रह्माने देवताओंसे कहा- देवताओ! तुमलोग हिमालयपर तप करती हुई हिमालयकी पुत्री कालीके पास जाओ २४ और उसे यहाँ लिवा लाओ ॥ २१-२४ ॥ उसके बाद देवगण ( हिमालयपर ) आये और २५ ( उन लोगोंने ) शैलनन्दिनीको देखा । परंतु उसके तेजसे व्यग्र ( व्याकुल ) हो जानेके कारण वे उसके निकट न जा सके । देवताओंके साथ इन्द्र भी उसके तेजसे २६ कान्तिहीन से हो गये । वे ब्रह्मासे उसके तेजका आधिक्य बतलाकर खड़े हो गये । उसके बाद ब्रह्माने कहा — वह निश्चय ही शङ्करकी पत्नी होगी; क्योंकि उसके तेजसे २७ तुम सब आकुल और प्रभाहीन हो गये हो । अतः देवताओ! तुमलोग चिन्ता छोड़कर अपने - अपने स्थानको जाओ । अब समझ लो कि युद्धमें तारकके २८ । साथ महिष मारा ( ही ) गया ॥ २५ - २८ ॥ इस प्रकार ब्रह्माने जब इन्द्रके साथ सभी देवताओंसे २ ९ कहा तब देवगण चिन्तारहित होकर उसी समय अपने-अपने स्थानपर चले गये । फिर पत्नीसहित पर्वतराज हिमवान् तपश्चर्यामें लगी हुई उमाको भी उस तपश्चर्यासे ३० हटाकर उसे घर ले आये । महाज्ञानी महादेव भी निराश्रय नामके उस कठिन ( रौद्र ) व्रतका आश्रय लेकर मेरु ३१ आदि बड़े - बड़े पर्वतोंपर भ्रमण करने लगे । कभी पर्वतराज हिमाचलपर गये । हिमालयने उनकी श्रद्धासे ३२ पूजा की । उस रात उन्होंने वहीं निवास किया ॥ २ ९ –३२ ॥ दूसरे दिन पर्वतराज ( हिमालय ) - ने महादेवको निमन्त्रित किया ( और ) कहा - हे विभो! आप तपस्या ३३ करनेके लिये यहीं रहें । हिमालयके इस प्रकार कहनेपर शङ्करने भी वही विचार किया और बिना घरका रहना ३४ छोड़कर आश्रममें रहने लगे । देवाधिदेव त्रिशूलधारी शङ्करके आश्रममें रहनेपर गिरिराजकी कल्याणी कन्या काली उस स्थानपर आयी । अपनी प्रिया सतीको पुनः ३५ हिमतनया उमाके रूपमें उत्पन्न हुई और ( अपने ) सामने आयी देखकर शङ्करने उनके आनेका अभिनन्दन ३६ । तो किया, पर वे फिर योगमें लीन हो गये ॥ ३३–३६ ॥

पृष्ठ 232

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२२२ सा चाभ्येत्य वरारोहा कृताञ्जलिपरिग्रहा ववन्दे चरणौ शैवौ सखीभिः सह भामिनी ॥ ततस्तु सुचिराच्छर्वः समीक्ष्य गिरिकन्यकाम् । न युक्तं चैवमुक्त्वाऽथ सगणोऽन्तर्दधे ततः साऽपि शर्ववचो रौद्रं श्रुत्वा ज्ञानसमन्विता अन्तर्दुःखेन दह्यन्ती पितरं प्राह पार्वती तात यास्ये महारण्ये तप्तुं घोरं महत्तपः आराधनाय देवस्य शङ्करस्य पिनाकिनः तथेत्युक्तं वचः पित्रा पादे तस्यैव विस्तृते ललिताख्या तपस्तेपे हराराधनकाम्यया तस्याः सख्यस्तदा देव्याः परिचर्यां तु कुर्वते समित्कुशफलं चापि मूलाहरणमादितः विनोदनार्थं पार्वत्या मृण्मयः शूलधृग् हरः कृतस्तु तेजसा युक्तो भद्रमस्त्विति साऽब्रवीत् पूजां करोति तस्यैव तं पश्यति मुहुर्मुहुः ततोऽस्यास्तुष्टिमगमच्छ्रद्धया त्रिपुरान्तकृत् वटुरूपं समाधाय आषाढी मुञ्जमेखली यज्ञोपवीती छत्री च मृगाजिनधरस्तथा कमण्डलुव्यग्रकरो भस्मारुणितविग्रहः प्रत्याश्रमं पर्यटन् स तं काल्याश्रममागतः तमुत्थाय तदा काली सखीभिः सह नारद पूजयित्वा यथान्यायं पर्यपृच्छदिदं ततः उमोवाच कस्मादागम्यते भिक्षो कुत्र स्थाने तवाश्रमः क्व च त्वं प्रतिगन्तासि मम शीघ्रं निवेदय भिक्षुरुवाच ममाश्रमपदं बाले वाराणस्यां शुचिव्रते अथातस्तीर्थयात्रायां गमिष्यामि पृथूदकम् देव्युवाच किं पुण्यं तत्र विप्रेन्द्र लब्धाऽसि त्वं पृथूदके पथि स्नानेन च फलं केषु किं लब्धवानसि श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५१ । सुन्दर शरीरवाली हिमसुताने वहाँ जानेके बाद ३७ दोनों हाथ जोड़कर सहेलियोंके साथ शिवके दोनों चरणोंमें अभिवादन ( प्रणाम ) किया । उसके बाद शङ्करने देरतक गिरिकन्याको देखा और कहा — यह ॥ ३८ उचित नहीं है । ऐसा कहकर शङ्कर अपने गणोंके साथ तिरोहित हो गये ( छिप गये ) । भय उत्पन्न करनेवाले । शङ्करके वचनको सुनकर आन्तरिक दुःखसे जलती हुई ॥ ३ ९ ज्ञानिनी उन पार्वतीने भी अपने पितासे कहा — तात! पिनाक धारण करनेवाले शङ्करदेवकी आराधना एवं । उत्कट तथा महान् तप करनेके लिये मैं विशाल वनमें ॥ ४० | जाऊँगी ॥ ३७–४० ॥ । पिताने कहा- ठीक है । उसके बाद शङ्करकी ॥ ४१ आराधनाकी इच्छासे ललिता ( पार्वती ) उसी ( हिमालय ) पर्वतकी विस्तृत तलहटीमें तप करने लगीं । उस समय उनकी । सहचरियाँ समिधा, कुश, फल- मूल आदि लाकर देवीकी ॥ ४२ सेवा करने लगीं । ( उन सहचरियोंने ) पार्वतीके विनोदके । लिये तेजस्वी त्रिशूलधारी शङ्करकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी । ॥ ४३ पार्वतीने भी कहा – सखियो! ठीक है । ( फिर तो ) वे ( पार्वतीजी ) उसी मूर्तिकी पूजा करतीं और बार - बार । उसे निहारती रहती थीं । उसके बाद उनकी श्रद्धासे ॥ ४४ त्रिपुरासुरको मारनेवाले शङ्कर प्रसन्न हो गये ॥ ४१–४४ ॥ । उसके बाद पलाशका दण्ड, मुञ्जकी मेखला, ॥ ४५ यज्ञोपवीत, छत्र एवं मृगचर्म, हाथमें कमण्डलु लिये । एवं शरीरमें भस्म रमाये हुए वे ( शङ्कर ) वटुके रूपमें एक - एक आश्रममें घूमते हुए कालीके आश्रम में ॥ ४६ पहुँचे । नारद! उसके बाद सहचरियोंके साथ कालीने । ( उनका ) प्रत्युत्थान किया और यथोचित पूजन कर ॥ ४७ उनसे यह पूछा – ॥ ४५–४७ ॥ उमाने कहा ( पूछा ) – अये भिक्षुक! आप शीघ्र । मुझे बतलायें कि आप कहाँसे आ रहे हैं? आपका ॥ ४८ आश्रम कहाँ है एवं आप कहाँ जायँगे? ॥ ४८ ॥

भिक्षुने कहा- पवित्र व्रतोंवाली बाले! मेरा । आश्रम वाराणसीमें है । अब मैं यहाँसे तीर्थयात्रामें ॥ ४ ९ पृथूदक जाऊँगा ॥ ४ ९ ॥ देवीने कहा – विप्रेन्द्र! पृथूदकतीर्थमें आपको कौन - सा पुण्य प्राप्त होगा? मार्गमें किन - किन तीर्थोंमें । स्नान करनेसे आप कौन - कौन - सा फल प्राप्त कर ॥ ५० | चुके हैं? ॥ ५० ॥

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अध्याय ५१ ] मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, भिक्षुरुवाच मया स्नानं प्रयागे तु कृतं प्रथममेव हि । ततोऽथ तीर्थे कुब्जाम्रे जयन्ते चण्डिकेश्वरे

बन्धुवृन्दे च कर्कन्धे तीर्थे कनखले तथा ।

सरस्वत्यामग्निकुण्डे भद्रायां तु त्रिविष्टपे ॥

कोनटे कोटितीर्थे च कुब्जके च कृशोदरि ।

निष्कामेन कृतं स्नानं ततोऽभ्यागां तवाश्रमम् ॥

इहस्थां त्वां समाभाष्य गमिष्यामि पृथूदकम् ।

पृच्छामि यदहं त्वां वै तत्र न क्रोद्धुमर्हसि ॥

अहं यत्तपसात्मानं शोषयामि कृशोदरि ।

बाल्येऽपि संयततनुस्तत्तु श्लाघ्यं द्विजन्मनाम् ॥

किमर्थं भवती रौद्रं प्रथमे वयसि स्थिता । तपः समाश्रिता भीरु संशयः प्रतिभाति मे । प्रथमे वयसि स्त्रीणां सह भर्त्रा विलासिनि । सुभोगा भोगिता: काले व्रजन्ति स्थिरयौवने

तपसा वाञ्छयन्तीह गिरिजे सचराचराः ।

रूपाभिजनमैश्वर्यं तच्च ते विद्यते बहु ॥

तत् किमर्थमपास्यैतानलंकाराञ्जटा धृताः ।

चीनांशुकं परित्यज्य किं त्वं वल्कलधारिणी ॥

पुलस्त्य उवाच

ततस्तु तपसा वृद्धा देव्याः सोमप्रभा सखी ।

भिक्षवे कथयामास यथावत् सा हि नारद ॥

सोमप्रभोवाच तपश्चर्या द्विजश्रेष्ठ पार्वत्या येन हेतुना । तं शृणुष्व त्वियं काली हरं भर्तारमिच्छति पुलस्त्य उवाच

सोमप्रभाया वचनं श्रुत्वा संकम्प्य वै शिरः ।

विहस्य च महाहासं भिक्षुराह वचस्त्विदम् ॥

भिक्षुरुवाच वदामि पार्वति वाक्यमेवं केन प्रदत्ता तव बुद्धिरेषा । कथं करः पल्लवकोमलस्ते समेष्यते शार्वकरं ससर्पम् ॥ तथा दुकूलाम्बरशालिनी त्वं मृगारिचर्माभिवृतस्तु रुद्रः । त्वं चन्दनाक्ता स च भस्मभूषितो न युक्तरूपं प्रतिभाति मे त्विदम् ॥ शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन २२३ भिक्षुने कहा - कृशोदरि! मैंने पहले प्रयागमें स्नान किया, उसके बाद कुब्जाम्र, जयन्त, चण्डिकेश्वर, ॥ ५१ बन्धुवृन्द, कर्कन्ध, कनखलतीर्थ, सरस्वती, अग्निकुण्ड, ५२ भद्रा, त्रिविष्टप, कोनट, कोटितीर्थ और कुब्जकमें निष्कामभावसे स्नान कर मैं तुम्हारे आश्रममें आया हूँ । ५३ यहाँपर स्थित रहनेवाली तुमसे वार्ता करनेके बाद मैं पृथूदकतीर्थमें जाऊँगा । मैं तुमसे जो कुछ पूछता हूँ, ५४ उसपर क्रोध न करना॥५१–५४ ॥ कृशोदरि! मैं बचपनमें भी शरीरको संयत कर ५५ तपस्यासे जो अपनेको सुखा रहा हूँ, वह तो ब्राह्मणोंके लिये प्रशंसनीय है । परंतु भीरु! तुम इस प्रथम अवस्थामें ही क्यों उग्र तप कर रही हो? ( इसमें मुझे ) शंका हो ५६ रही है । अयि स्थिरयौवने! अयि विलासिनि! प्रथम अवस्थामें स्त्रियाँ पतिके साथ सुन्दर भोगोंका भोग ॥ ५७ करती हैं । पर्वतपुत्रि! चर और अचर सभी प्राणी तपस्यासे संसारमें रूप, उत्तम कुल और सम्पत्ति चाहते हैं, सो तो तुम्हें अधिक - से - अधिक मात्रामें उपलब्ध हैं ५८ ही; फिर सौन्दर्य - साधनोंको छोड़कर तुमने जटा क्यों धारण कर ली है? तुमने रेशमी वस्त्र छोड़कर वल्कल ५ ९ | क्यों पहन लिया है? ॥५५-५९ ॥ पुलस्त्यजी बोले – नारद! उसके बाद तपस्यामें बढ़ी हुई पार्वतीकी सोमप्रभा नामकी सहचरीने उन ६० भिक्षुसे वस्तुस्थिति कही ॥ ६० ॥

सोमप्रभाने कहा – द्विजश्रेष्ठ! पार्वती जिस हेतुसे तपस्या कर रही हैं, उसे सुनिये । ये काली ( तपस्या ॥ ६१ बलसे ) शिवको अपना पति बनाना चाहती हैं ॥ ६१ ॥

पुलस्त्यजी बोले- सोमप्रभाकी बात सुनकर भिक्षुने सिर हिलाते हुए बड़े जोरसे हँसकर यह वचन ६२ | कहा- ॥ ६२ ॥

भिक्षुकने कहा - पार्वति! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ; तुमको यह बुद्धि किसने दी? पल्लवके सदृश कैसे ६३ और तुम शङ्कर ६४ | होता तुम्हारा कोमल कर शङ्करके सर्पयुक्त हाथसे मिलेगा? कहाँ तुम सुन्दर वस्त्र धारण करनेवाली कहाँ व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले ये रुद्र! कहाँ चन्दनसे चर्चित और कहाँ भस्मसे भूषित ! अतः मुझे यह मेल अनुरूप नहीं प्रतीत ॥ ६३-६४ ॥

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२२४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५१ पुलस्त्य उवाच

एवं वादिनि विप्रेन्द्र पार्वती भिक्षुमब्रवीत् ।

मा मैवं वद भिक्षो त्वं हरः सर्वगुणाधिकः ॥

शिवो वाप्यथवा भीमः सधनो निर्धनोऽपि वा ।

अलङ्कृतो वा देवेशस्तथा वाप्यनलङ्कृतः ॥

यादृशस्तादृशो वापि स मे नाथो भविष्यति ।

निवार्यतामयं भिक्षुर्विवक्षुः स्फुरिताधरः ।

न तथा निन्दकः पापी यथा शृण्वशशिप्रभे ॥

पुलस्त्य उवाच

इत्येवमुक्त्वा वरदा समुत्थातुमथैच्छत ।

ततोऽत्यजद् भिक्षुरूपं स्वरूपस्थोऽभवच्छिवः ॥

भूत्वोवाच प्रिये गच्छ स्वमेव भवनं पितुः ।

तवार्थाय प्रहेष्यामि महर्षीन् हिमवद्गृहे ॥

यच्चेह रुद्रमीहन्त्या मृण्मयश्चेश्वरः कृतः ।

असौ भद्रेश्वरेत्येवं ख्यातो लोके भविष्यति ॥

देवदानवगन्धर्वा यक्षाः किंपुरुषोरगाः ।

पूजयिष्यन्ति सततं मानवाश्च शुभेप्सवः ॥

इत्येवमुक्ता देवेन गिरिराजसुता मुने ।

जगामाम्बरमाविश्य स्वमेव भवनं पितुः ॥

शङ्करोऽपि महातेजा विसृज्य गिरिकन्यकाम् ।

पृथूदकं जगामाथ स्नानं चक्रे विधानतः ॥

ततस्तु देवप्रव महेश्वरः पृथूदके स्नानमपास्तकल्मषः । कृत्वा सनन्दिः सगणः सवाहनो महागिरिं मन्दरमाजगाम् ॥ आयाति त्रिपुरान्तके सह गणैर्ब्रह्मर्षिभिः सप्तभि-रारोहत्पुलको बभौ गिरिवरः संहृष्टचित्तः क्षणात् । चक्रे दिव्यफलैर्जलेन शुचिना मूलैश्च कन्दादिभिः पूजां सर्वगणेश्वरैः सह विभोरद्रिस्त्रिनेत्रस्य तु पुलस्त्यजी बोले- विप्रेन्द्र! भिक्षुकके इस प्रकार कहनेपर पार्वतीने उससे कहा - भिक्षुक! तुम ऐसी बात ६५ मत बोलो । शङ्कर सब गुणोंमें श्रेष्ठ हैं । वे देवेश चाहे मङ्गलमूर्ति हों या भयङ्कर रूप, धनी हों या निर्धन तथा अलङ्कार - सम्पन्न हों अथवा अलङ्कार- विहीन – वे जैसे-तैसे ही क्यों न हों - पर वे ही मेरे स्वामी होंगे । ६६ ( सहचरीको निर्देश कर ) शशिप्रभे! इसे ( भिक्षुकको ) मना करो । यह पुनः कुछ कहना चाहता है; क्योंकि इसके ओठ फड़क रहे हैं । देखो, निन्दा करनेवाला व्यक्ति वैसा पापी नहीं होता जैसा कि निन्दाकी बात ६७ सुननेवाला होता है॥६५–६७ ॥ पुलस्त्यजी ( पुनः ) बोले- इस प्रकार कहकर वरदायिनी पार्वतीने ( ज्यों ही ) वहाँसे उठकर जाना ६८ चाहा त्यों ही शङ्कर ( बनावटी ) भिक्षुरूपको छोड़कर अपने वास्तविक रूपमें हो गये । वे अपने वास्तविक रूपमें आनेपर बोले- प्रिये! अपने गृह जाओ । मैं ६ ९ हिमवान्‌के घर तुम्हारे लिये महर्षियोंको भेजूँगा । रुद्रकी कामना करनेवाली तुमने यहाँ जिन पार्थिव ७० रूपको ईश्वर माना है, वे संसारमें भद्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध होंगे । देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, उरग एवं मनुष्य जो भी कल्याणकी कामना करनेवाले होंगे, वे ७१ सदा उनकी पूजा करेंगे ॥ ६८-७१ ॥ मुने! शङ्करके इस प्रकार कहनेपर हिमालय पुत्री ७२ । पार्वतीजी आकाशमार्गसे अपने पिताके घर चली गयीं । महातेजस्वी शङ्कर भी पर्वतराजकी कन्याको विदाकर ७३ पृथूदक नामके तीर्थमें चले गये और वहाँ जाकर उन्होंने यथाविधि स्नान किया । उसके बाद देवोंमें प्रधान महेश्वर पृथूदकतीर्थमें स्नान करके पापसे विमुक्त होकर नन्दी, गणों एवं वाहनके सहित महान् मन्दर गिरिपर आ गये । ७४ सात ब्रह्मर्षियों ( सप्तर्षियों ) तथा अपने गणोंके साथ त्रिपुरासुरको मारनेवाले शङ्करके आ जानेपर पर्वतश्रेष्ठ मन्दर क्षणभरमें ही प्रसन्नचित्त हो गया । पर्वतराजने दिव्य फलों, मूलों, कन्दों एवं पवित्र जलसे समस्त ॥ ७५ गणेश्वरोंके साथ भगवान् शङ्करकी पूजा की॥७२–७५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५१ ॥

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अध्याय ५२ ] शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्‌के यहाँ भेजना २२५ बावनवाँ अध्याय शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्‌के यहाँ भेजना, महर्षियोंका हिमवान्से शिवके लिये उमाकी याचना, हिमालयकी स्वीकृति और सप्तर्षियोंद्वारा शिवको स्वीकृति - सूचना पुलस्त्य उवाच

ततः सम्पूजितो रुद्रः शैलेन प्रीतिमानभूत् ।

सस्मार च महर्षींस्तु अरुन्धत्या समं ततः ॥ १

संस्मृतास्तु ऋषयः शङ्करेण महात्मना ।

समाजग्मुर्महाशैलं मन्दरं चारुकन्दरम् ॥ २

तानागतान् समीक्ष्यैव देवस्त्रिपुरनाशनः ।

अभ्युत्थायाभिपूज्यैतानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३

धन्योऽयं पर्वतश्रेष्ठः श्लाघ्यः पूज्यश्च दैवतैः ।

धूतपापस्तथा जातो भवतां पादपङ्कजैः ॥ ४

स्थीयतां विस्तृते रम्ये गिरिप्रस्थे समे शुभे ।

शिलासु पद्मवर्णासु श्लक्ष्णासु च मृदुष्वपि ॥ ५

पुलस्त्य उवाच

इत्येवमुक्ता देवेन शङ्करेण महर्षयः ।

सममेव त्वरुन्धत्या विविशुः शैलसानुनि ॥ ६

उपविष्टेषु ऋषिषु नन्दी देवगणाग्रणीः ।

अर्घ्यादिना समभ्यर्च्य स्थितः प्रयतमानसः ॥ ७

ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्धर्म्यं वाक्यं हितं सुरान् ।

आत्मनो यशसो वृद्ध्यै सप्तर्षीन् विनयान्वितान् ॥ ८

हर उवाच

कश्यपात्रे वारुणेय गाधेय शृणु गौतम ।

भरद्वाज शृणुष्व त्वमङ्गिरस्त्वं शृणुष्व च ॥ ९

ममासीद् दक्षतनुजा प्रिया सा दक्षकोपतः ।

उत्ससर्ज सती प्राणान् योगदृष्ट्या पुरा किल ॥ १०

साद्य भूयः समुद्भूता शैलराजसुता उमा ।

सा मदर्थाय शैलेन्द्रो याच्यतां द्विजसत्तमाः ॥ ११ ।

पुलस्त्यजी बोले – उसके बाद पर्वतद्वारा सम्यक् रूपसे पूजित होकर भगवान् रुद्र बहुत प्रसन्न हुए । उसके बाद शङ्करने अरुन्धतीसहित सप्त महर्षियोंका स्मरण किया । महात्मा शङ्करके द्वारा स्मृत किये गये वे ऋषिगण सुन्दर कन्दराओंवाले महान् शैल मन्दरपर आ गये । उन ( ऋषियों ) को आये हुए देखकर त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले महादेवने अभ्युत्थानकर उनका पूजन किया; फिर यह वचन कहा - प्रभो! यह पर्वतश्रेष्ठ देवताओं द्वारा प्रशंसनीय एवं पूजनीय होनेसे धन्य है, ( और आज यह ) आपके चरण-कमलोंकी अनुकम्पासे निष्पाप हो गया । अब आप-लोग इस विस्तृत, सम, रम्य तथा शुभ पर्वतशिखरपर बैठें । इसकी शिला कमल वर्णकी तथा चिकनी एवं कोमल है ॥ १-५ ॥ पुलस्त्यजी ( फिर ) बोले – भगवान् शङ्करके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर महर्षिगण अरुन्धतीके साथ शैलशिखरपर बैठ गये । ऋषियोंके बैठ जानेपर देवताओं में अग्रणी तथा संयत - चित्तवाले नन्दी अर्घ्य आदिसे उनकी पूजा कर खड़े हो गये । उसके बाद सुरपालक शिवने विनयसे युक्त सप्तर्षियोंसे अपने यशकी वृद्धि तथा देवताओंके कल्याणके लिये धर्मसे युक्त वचन कहा - ॥६–८ ॥ शङ्करजीने कहा- कश्यप! अत्रि! वसिष्ठ! विश्वामित्र! गौतम! भरद्वाज! अङ्गिरा! आप सभी लोग सुनें - प्राचीन कालमें दक्षकी आत्मजा सती मेरी प्रिया थीं । उसने दक्षके ऊपर कुपित होकर योगदृष्टिसे अपने प्राणोंका त्याग कर दिया । वही आज फिर उमा नामसे गिरिराज हिमालयकी कन्या हुई है । द्विजसत्तमो! आपलोग मेरे लिये पर्वतराजसे उसकी याचना करें ॥९ -११ ॥

पृष्ठ 236

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२२६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५२ पुलस्त्य उवाच

सप्तर्षयस्त्वेवमुक्ता बाढमित्यब्रुवन् वचः ।

ॐ नमः शङ्कुरायेति प्रोक्त्वा जग्मुर्हिमालयम् ॥

ततोऽप्यरुन्धतीं शर्वः प्राह गच्छस्व सुन्दरि ।

पुरन्ध्रयो हि पुरन्ध्रीणां गतिं धर्मस्य वै विदुः ॥

इत्येवमुक्ता दुर्लङ्घ्यं लोकाचारं त्वरुन्धती ।

नमस्ते रुद्र इत्युक्त्वा जगाम पतिना सह ॥

गत्वा हिमाद्रिशिखरमोषधिप्रस्थमेव च ।

ददृशुः शैलराजस्य पुरीं सुरपुरीमिव ॥

ततः सम्पूज्यमानास्ते शैलयोषिद्धिरादरात् ।

सुनाभादिभिरव्यग्रैः पूज्यमानास्तु पर्वतैः ॥

गन्धर्वैः किन्नरैर्यक्षैस्तथान्यैस्तत्पुरस्सरैः ।

विविशुर्भवनं रम्यं हिमाद्रेर्हाटकोज्ज्वलम् ॥

ततः सर्वे महात्मानस्तपसा धौतकल्मषाः ।

समासाद्य महाद्वारं संतस्थुर्द्वाःस्थकारणात् ॥

ततस्तु त्वरितो ऽभ्यागाद् द्वाःस्थोऽद्रिर्गन्धमादनः ।

धारयन् वै करे दण्डं पद्मरागमयं महत् ॥

ततस्तमूचुर्मुनयो गत्वा शैलपतिं शुभम् ।

निवेदयास्मान् सम्प्राप्तान् महत्कार्यार्थिनो वयम् ॥

इत्येवमुक्तः शैलेन्द्रो ऋषिभिर्गन्धमादनः ।

जगाम तत्र यत्रास्ते शैलराजो द्विभिर्वृतः ॥

निषण्णो भुवि जानुभ्यां दत्त्वा हस्तौ मुखे गिरिः ।

दण्डं निक्षिप्य कक्षायामिदं वचनमब्रवीत् ॥

गन्धमादन उवाच

इमे हि ऋषयः प्राप्ताः शैलराज तवार्थिनः ।

द्वारे स्थिताः कार्यिणस्ते तव दर्शनलालसाः ॥

पुलस्त्य उवाच

द्वाःस्थवाक्यं समाकर्ण्य समुत्थायाचलेश्वरः ।

स्वयमभ्यागमद् द्वारि समादायार्घ्यमुत्तमम् ॥

तानर्च्यार्घ्यादिना शैलः समानीय सभातलम् ।

उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः कृतासनपरिग्रहान् ॥

पुलस्त्यजी बोले- शङ्करजीके ऐसा कहनेपर सप्तर्षियोंने ' बहुत अच्छा ' - यह वचन कहा एवं ' ॐ १२ नमः शङ्कराय ' कहकर वे हिमालयके यहाँ गये । उसके पश्चात् शङ्करने अरुन्धतीसे कहा - ' सुन्दरि! तुम भी १३ जाओ । स्त्रियोंके धर्मकी गति स्त्रियाँ ही जानती हैं । ' शङ्करके इस प्रकार कहनेपर लोकाचारको दुर्लङ्घय प्रतिपादित करनेवाली अरुन्धती अपने पतिके साथ १४ ' नमस्ते रुद्र ' ऐसा कहकर हिमालयपर गयीं । उन लोगोंने ओषधियोंसे भरे हिमालयकी चोटीपर जाकर १५ सुरपुरीके समान हिमालयकी पुरीको देखा ॥ १२–१५ ॥ उसके बाद वे पर्वतोंकी पत्नियों, शान्तचित्त-१६ वाले सुनाभादि पर्वतों, गन्धर्वों, किंनरों, यक्षों एवं अन्य दूसरोंसे भी पूजित ( सम्मानित ) होकर स्वर्णकी १७ भाँति प्रकाशमान हिमालयके सुन्दर भवनमें प्रविष्ट हुए । फिर तपस्या करनेसे निष्पाप हुए वे सभी महात्मा महाद्वारपर जाकर द्वारपालके निकट रुक गये । उसके १८ बाद द्वारपर स्थित गन्धमादन पर्वत पद्मरागके बने विशाल दण्डको हाथमें धारण किये हुए शीघ्र उनके

१ ९ पास गया । १६ – १ ९ ॥

उसके बाद मुनियोंने उससे कहा- द्वारपाल! २० तुम श्रीमान् शैलपतिसे जाकर यह शुभ समाचार निवेदित करो कि हम सब विशेष कार्यके लिये यहाँ आये हैं । ऋषियोंके ऐसा कहनेपर शैलेन्द्र गन्धमादन २१ पर्वतोंसे घिरे हुए शैलराजके पास गया और पृथ्वीपर घुटनोंके बल बैठ गया । फिर दण्डको काँखमें दबाकर एवं दोनों हाथ मुखके निकट ले जाकर उसने यह वचन २२ कहा- ॥ २०-२२ ॥ गन्धमादनने कहा - शैलराज! ये ऋषिगण किसी कार्यकी याचनाके हेतु आपसे भेंट करनेकी इच्छावाले २३ । होकर आये हैं और द्वारपर स्थित हैं ॥ २३ ॥

पुलस्त्यजी बोले – द्वारपालकी बात सुननेके बाद पर्वतराज उठकर स्वयं उत्तम अर्घ्य लेकर द्वारपर २४ आये । अर्घ्य आदिसे उन ऋषियोंका अर्चन करनेके बाद उन्हें सभा - स्थानमें लिवा लाये । फिर उनके यथायोग्य आसन ग्रहण कर लेनेपर वक्ताके अभिप्रायको स्पष्टतः समझनेवाले शैलराजने उन ऋषियोंसे यह वाक्य २५ | कहा— ॥ २४-२५ ॥

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अध्याय ५२ ] शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्‌के यहाँ भेजना २२७ हिमवानुवाच

अनभ्रवृष्टिः किमियमुताहो कुसुमं फलम् ।

अप्रतर्क्यमचिन्त्यं च भवदागमनं त्विदम् ॥

अद्यप्रभृति धन्योऽस्मि शैलराडद्य सत्तमाः ।

शुद्धदेहोऽस्म्यद्यैव यद् भवन्तो ममाजिरम् ॥

आत्मसंसर्गसंशुद्धं कृतवन्तो द्विजोत्तमाः ।

दृष्टिपूतं पदाक्रान्तं तीर्थे सारस्वतं यथा ॥

दासोऽहं भवतां विप्राः कृतपुण्यश्च साम्प्रतम् ।

येनार्थिनो हि ते यूयं तन्ममाज्ञातुमर्हथ ॥

सदारोऽहं समं पुत्रैर्भृत्यैर्नप्तृभिरव्ययाः ।

किंकरोऽस्मि स्थितो युष्मदाज्ञाकारी तदुच्यताम् ॥

पुलस्त्य उवाच

शैलराजवचः श्रुत्वा ऋषयः संशितव्रताः ।

ऊचुरङ्गिरसं वृद्धं कार्यमद्रौ निवेदय ॥

इत्येवं चोदितः सर्वैर्ऋषिभिः कश्यपादिभिः ।

प्रत्युवाच परं वाक्यं गिरिराजं तमङ्गिराः ॥

अङ्गिरा उवाच

श्रूयतां पर्वतश्रेष्ठ येन कार्येण वै वयम् ।

समागतास्त्वत्सदनमरुन्धत्या समं गिरे ॥

योऽसौ महात्मा सर्वात्मा दक्षयज्ञक्षयङ्करः ।

शङ्करः शूलधृक् शर्वस्त्रिनेत्रो वृषवाहनः ॥

जीमूतकेतुः शत्रुघ्नो यज्ञभोक्ता स्वयं प्रभुः ।

यमीश्वरं वदन्त्येके शिवं स्थाणुं भवं हरम् ॥

भीममुग्रं महेशानं महादेवं पशोः पतिम् ।

वयं तेन प्रेषिताः स्मस्त्वत्सकाशं गिरीश्वर ॥

इयं या त्वत्सुता काली सर्वलोकेषु सुन्दरी ।

तां प्रार्थयति देवेशस्तां भवान् दातुमर्हति ॥

स एव धन्यो हि पिता यस्य पुत्री शुभं पतिम् ।

रूपाभिजनसम्पत्त्या प्राप्नोति गिरिसत्तम ॥

यावन्तो जङ्गमागम्या भूताः शैल चतुर्विधाः ।

तेषां माता त्वियं देवी यतः प्रोक्तः पिता हरः ॥

हिमवान्ने कहा – [ ऋषियो! मेरे लिये ] आप-लोगोंका यहाँ पधारना ऐसा ही है जैसे बिना बादलकी २६ वृष्टि तथा बिना फूलके फलका उद्गम; यह अतर्क्य एवं अचिन्त्य है । परमपूज्यो! आजसे मैं धन्य हो गया । आज ही मैं ( अन्वर्थक ) शैलराज हुआ । आज ही मेरा २७ शरीर शुद्ध हुआ; क्योंकि आपलोगोंने आज मेरे आँगनको पवित्र किया है । द्विजोत्तमो! जिस प्रकार सारस्वततीर्थका जल पवित्र कर देता है, उसी प्रकार २८ आपलोगोंने चरण रखकर तथा अपनी पवित्र दृष्टिसे देखकर हमें पवित्र कर दिया है । ब्राह्मणो! मैं आप-लोगोंका दास हूँ । इस समय मैं पुण्यवान् हुआ हूँ । जिस २ ९ उद्देश्यसे आपलोग अर्थी - याचना करनेवाले – हुए हैं, उसके लिये मुझे आज्ञा दें । महर्षियो! मैं स्त्री, पुत्र, नाती और भृत्योंके साथ आपका आज्ञाकारी सेवक हूँ; अतः ३० आदेश दीजिये ॥ २६–३० ॥ पुलस्त्यजी बोले – गिरिराजकी बात सुनकर प्रशस्तव्रती ऋषियोंने वृद्ध अङ्गिरामुनिसे कहा-३१ ( मुने! ) आप हिमवान्‌को कार्यका निवेदन करें । इस प्रकार कश्यप आदि ऋषियोंसे प्रेरणा प्राप्तकर अङ्गिरा-मुनि उन गिरिराज हिमालयसे ( उनके अनुरोधके ३२ उत्तर में ) यह श्रेष्ठ वचन बोले - ॥ ३१-३२ ॥ अङ्गिराने कहा - पर्वतराज! हमलोग अरुन्धतीके साथ आपके घर जिस कार्यके लिये आये हैं, उसे ३३ ( आप ) सुनें । गिरीश्वर! जिन महात्मा सर्वात्मा, दक्षयज्ञके ३४ विनाशक, शूलधारी, शर्व, त्रिनेत्र, वृषवाहन, जीमूतकेतु, शत्रुघ्न, यज्ञभोक्ता, स्वयंप्रभु शङ्कर ईश्वरको कुछ लोग ३५ शिव, स्थाणु, भव, हर, भीम, उग्र, महेशान, महादेव एवं पशुपति कहते हैं, उन्होंने ही हमलोगोंको आपके पास ३६ | भेजा है ॥ ३३–३६ ॥ ( बात यह है कि ) आपकी यह ' काली ' कन्या ३७ समस्त लोकोंमें सुन्दर है । इसके लिये देवेश ( भगवान्-शङ्कर ) प्रार्थना कर रहे हैं । आपको उन्हें उसका दान दे देना चाहिये । गिरिसत्तम! वही पिता धन्य है जिसकी ३८ पुत्री रूपवान्, निष्कलङ्क, कुलीन और श्रीमान् शुभ पतिको प्राप्त करती है । शैल! ये देवी चार प्रकारके जितने ३ ९ | जड - जङ्गम प्राणी हैं उनकी माता ( हो जाती ) हैं; क्योंकि

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२२८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५२

प्रणम्य शङ्करं देवाः प्रणमन्तु सुतां तव ।

कुरुष्व पादं शत्रूणां मूर्ध्नि भस्मपरिप्लुतम् ॥

याचितारो वयं शर्वो वरो दाता त्वमप्युमा ।

वधूः सर्वजगन्माता कुरु यच्छ्रेयसे तव ॥

पुलस्त्य उवाच

तद्वचोऽङ्गिरसः श्रुत्वा काली तस्थावधोमुखी ।

हर्षमागत्य सहसा पुनर्दैन्यमुपागता ॥

ततः शैलपतिः प्राह पर्वतं गन्धमादनम् ।

गच्छ शैलानुपामन्त्र्य सर्वानागन्तुमर्हसि ॥

ततः शीघ्रतरः शैलो गृहाद् गृहमगाज्जवी ।

मेर्वादीन् पर्वतश्रेष्ठानाजुहाव समन्ततः ॥

तेऽप्याजग्मुस्त्वरावन्तः कार्यं मत्वा महत्तदा ।

विविशुर्विस्मयाविष्टाः सौवर्णेष्वासनेषु ते ॥

उदयो हेमकूटश्च रम्यको मन्दरस्तथा ।

उद्दालको वारुणश्च वराहो गरुडासनः ॥

शुक्तिमान् वेगसानुश्च दृढशृङ्गोऽथ शृङ्गवान् ।

चित्रकूटस्त्रिकूटश्च तथा मन्दरकाचलः ॥

विन्ध्यश्च मलयश्चैव पारियात्रोऽथ दुर्दरः ।

कैलासाद्रिर्महेन्द्रश्च निषधोऽञ्जनपर्वतः ॥

एते प्रधाना गिरयस्तथाऽन्ये क्षुद्रपर्वताः ।

उपविष्टाः सभायां वै प्रणिपत्य ऋषींश्च तान् ॥

ततो गिरीशः स्वां भार्यां मेनामाहूतवांश्च सः ।

समागच्छत कल्याणी समं पुत्रेण भामिनी ॥

साऽभिवन्द्य ऋषीणां हि चरणांश्च तपस्विनी ।

सर्वाञ् ज्ञातीन् समाभाष्य विवेश ससुता ततः ॥

ततोऽद्रिषु महाशैल उपविष्टेषु नारद ।

उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः सर्वानाभाष्य सुस्वरम् ॥

हिमवानुवाच

इमे सप्तर्षयः पुण्या याचितारः सुतां मम ।

महेश्वरार्थं कन्यां तु तच्चावेद्यं भवत्सु वै ॥

शङ्करजी सबके पिता कहे गये हैं । ( हम सबका निवेदन ४० है कि ) समस्त देवता शङ्करको प्रणामकर तुम्हारी पुत्रीको भी प्रणाम करें; इसलिये इसे समर्पित कर दें । ( और इस प्रकार आप ) अपने शत्रुओंके सिरपर अपना भस्मयुक्त चरण रखें ( शत्रुओंको विजित लोग याचना करनेवाले हैं, शङ्कर वर हैं, और समस्त संसारकी जननी उमा वधू हैं ४१ कल्याणकारी जँचे, उसे करें ॥ ३७ –४१ पुलस्त्यजी बोले – अङ्गिराकी वह कालीने ( लज्जासे ) अपना मुख नीचे ४२ सहसा वे प्रसन्न होकर पुनः उदास हो बाद गिरिराजने गन्धमादन पर्वतसे कहा- ( करें ) । हम-आप दाता हैं ॥ आपको जो ॥ वाणी सुनकर झुका लिया । गयीं । उसके गन्धमादन! ) जाओ! सभी पर्वतोंको आनेके लिये आमन्त्रित कर ४३ | आओ । उसके पश्चात् वेगशाली पर्वत ( गन्धमादन ) -ने चारों ओर शीघ्रतापूर्वक घर - घर जाकर मेरु आदि ४४ सभी श्रेष्ठ पर्वतोंको आनेके लिये निमन्त्रण दे दिया । वे सभी पर्वत भी कार्यकी महत्ता समझकर शीघ्रतासे आ गये और सुवर्णमय आसनोंपर उत्सुकतापूर्वक बैठ ४५ | गये ॥ ४२-४५ ॥ उदय, हेमकूट, रम्यक, मन्दर, उद्दालक, वारुण, ४६ वराह, गरुडासन, शुक्तिमान्, वेगसानु, दृढशृङ्ग, शृङ्गवान्, ४७ चित्रकूट, त्रिकूट, मन्दरकाचल, विन्ध्य, मलय, पारियात्र, दुर्दर, कैलास, महेन्द्र, निषेध, अञ्जन- ये सभी प्रमुख ४८ पर्वत तथा छोटे - छोटे अन्य पर्वत उन ऋषियोंको प्रणाम ४ ९ कर सभामें बैठ गये ॥ ४६–४९ ॥ उसके पश्चात् उन गिरीशने अपनी भार्या मेनाको ५० बुलाया । ( वे ) कल्याणी भामिनी अपने पुत्रके साथ आयीं और तब उन साध्वीने ऋषियोंके चरणोंमें प्रणाम किया एवं समस्त ज्ञातियोंसे अनुज्ञा लेकर वे पुत्रके साथ ५१ बैठ गर्यो । नारदजी! उसके बाद सभी पर्वतोंके भी बैठ जानेपर उनकी अनुमति लेकर उक्तिके अभिप्राय ५२ विज्ञाता महाशैलने मधुर वचन कहा – ॥ ५०-५२ ॥ हिमवान्ने निवेदन किया- ( उपस्थित सज्जनो! ) ये पुण्यात्मा सप्तर्षि भगवान् शङ्करके लिये मेरी कन्याकी ५३ । याचना कर रहे हैं । शङ्करके लिये कन्या देनेका प्रस्ताव है—

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अध्याय ५२ ] शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्‌के यहाँ भेजना २२ ९

तद् वदध्वं यथाप्रज्ञं ज्ञातयो यूयमेव मे ।

नोल्लङ्घय युष्मान् दास्यामि तत्क्षमं वक्तुमर्हथ ॥

पुलस्त्य उवाच

हिमवद्वचनं श्रुत्वा मेर्वाद्याः स्थावरोत्तमाः ।

सर्व एवाब्रुवन् वाक्यं स्थिताः स्वेष्वासनेषु ते ॥

याचितारश्च मुनयो वरस्त्रिपुरहा हरः ।

दीयतां शैल कालीयं जामाताऽभिमतो हि नः ॥

मेनाप्यथाह भर्तारं शृणु शैलेन्द्र मद्वचः ।

पितॄनाराध्य देवैस्तैर्दत्ताऽनेनैव हेतुना ॥

यस्त्वस्यां भूतपतिना पुत्रो जातो भविष्यति ।

स हनिष्यति दैत्येन्द्रं महिषं तारकं तथा ॥

इत्येवं मेनया प्रोक्तः शैलैः शैलेश्वरः सुताम् ।

प्रोवाच पुत्रि दत्ताऽसि शर्वाय त्वं मयाऽधुना ॥

ऋषीनुवाच कालीयं मम पुत्री तपोधनाः ।

प्रणामं शङ्करवधूर्भक्तिनम्रा करोति वः ॥

ततोऽप्यरुन्धती कालीमङ्कमारोप्य चाटुकैः ।

लज्जमानां समाश्वास्य हरनामोदितैः शुभैः ॥

ततः सप्तर्षयः प्रोचुः शैलराज निशामय ।

जामित्रगुणसंयुक्तां तिथिं पुण्यां सुमङ्गलाम् ॥

उत्तराफाल्गुनीयोगं तृतीयेऽह्नि हिमांशुमान् ।

गमिष्यति च तत्रोक्तो मुहूर्तो मैत्रनामकः ॥

तस्यां तियां हरः पाणिं ग्रहीष्यति समन्त्रकम् ।

तव पुत्र्या वयं यामस्तदनुज्ञातुमर्हसि ॥

ततः सम्पूज्य विधिना फलमूलादिभिः शुभैः ।

विसर्जयामास शनैः शैलराड् ऋषिपुङ्गवान् ॥

तेऽप्याजग्मुर्महावेगात् त्वाक्रम्य मरुदालयम् ।

आसाद्य मन्दरगिरिं भूयोऽवन्दन्त शङ्करम् ॥

प्रणम्योचुर्महेशानं भवान् भर्त्ताऽद्रिजा वधूः ।

सब्रह्मकास्त्रयो लोका द्रक्ष्यन्ति घनवाहनम् ॥

। यही आपलोगोंसे निवेदन करना है । आपलोग ही मेरे ५४ ज्ञाति- बन्धु हैं, अतः अपनी बुद्धिके अनुसार परामर्श दें । आप- ( के मत ) - का उल्लङ्घन कर मैं ( कन्याका ) दान नहीं करूँगा; अतः आपलोग उचित परामर्श दें ॥ ५३-५४ ॥ पुलस्त्यजी बोले – हिमवान्‌ के प्रस्तावकी बात सुनकर मेरु आदि सभी श्रेष्ठ गिरिवरोंने अपने - अपने ५५ आसनपर आसीन होते हुए ही कहा – ( गिरिराज! ) याचना करनेवाले सप्तर्षि हैं और त्रिपुरासुरका वध करनेवाले शङ्कर वर हैं । शैलराज! इस कालीको आप ५६ । उनके लिये प्रदान करें । जामाता हमलोगोंके मनपसंद हैं । उसके बाद मेनाने अपने पतिसे कहा— शैलेन्द्र! मेरी ५७ बात सुनिये । पितरोंकी आराधना करनेके बाद उन देवोंने ( इस कन्याको ) मुझे इसीलिये दिया था कि भूतपति ( शिव ) - द्वारा इससे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह ५८ दैत्येन्द्र महिष एवं तारकका वध करेगा ॥ ५५–५८ ॥ मेना तथा पर्वतोंके इस प्रकार कहनेपर हिमवान्ने ५ ९ अपनी कन्यासे कहा – पुत्रि! अब मैंने तुझे शङ्करको दे दिया । फिर उन्होंने ऋषियोंसे कहा- हे तपोधनो! यह मेरी पुत्री तथा शङ्करकी वधू काली भक्तिसहित विनम्र-६० भावसे आपलोगोंको प्रणाम करती है । उसके बाद अरुन्धतीने लज्जित हो रही कालीको ( अपनी ) गोदमें ६ ९ बैठाकर शङ्करके प्रेमभरे शुभ नामोंके उच्चारणसे उसे भलीभाँति आश्वस्त किया । उसके बाद सप्तर्षियोंने कहा-शैलराज! ( अब आप ) जामित्र ( सप्तम भावकी शुद्धता ) ६२ गुणसे संयुक्त मङ्गलमय पवित्र तिथिको सुनिये । ( आजके )

तीसरे दिन चन्द्रमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रसे योग करेगा ।

६३ उसे मैत्र नामक मुहूर्त कहते हैं ॥ ५ ९ -६३ ॥

उस तिथिमें शङ्कर मन्त्रपूर्वक आपकी पुत्रीका ६४ पाणिग्रहण करेंगे । आप अनुमति दें; ( अब ) हमलोग जा रहे हैं । उसके बाद शैलराजने उन ऋषिश्रेष्ठोंको सुन्दर फल - मूलोंसे विधिपूर्वक पूजितकर विदा किया । ६५ वे ऋषि भी आकाशमार्गसे अत्यन्त वेगसे मन्दरगिरिपर आ गये और शङ्करको प्रणाम किया । उन महर्षिजनोंने ६६ पुनः महेशको प्रणाम कर कहा - शङ्कर! आप वर हैं एवं गिरिजा वधू हैं । ब्रह्माके साथ तीनों लोक आप घनवाहन ( शिव ) - का ( इस रूपमें ) दर्शन करेंगे । ( - ऐसी ६७ | सबकी लालसा है ) ॥ ६४-६७ ॥

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२३०

ततो महेश्वरः प्रीतो मुनीन् सर्वाननुक्रमात् ।

पूजयामास विधिना अरुन्धत्या समं हरः ॥

ततः सम्पूजिता जग्मुः सुराणां मन्त्रणाय ते ।

तेऽप्याजग्मुर्हरं द्रष्टुं ब्रह्मविष्विन्द्रभास्कराः ॥

गेहं ततोऽभ्येत्य महेश्वरस्य कृतप्रणामा विविशुर्महर्षे । सस्मार नन्दप्रमुखांश्च सर्वा-नभ्येत्य ते वन्द्य हरं निषण्णाः देवैर्गणैश्चापि वृतो गिरीशः स शोभते मुक्तजटाग्रभारः यथा व कदम्बमध्ये प्ररोहमूलोऽथ वनस्पतिर्वै श्रीवामनपुराण | अध्याय ५३ उसके बाद शङ्करने प्रसन्न होकर क्रमानुसार ६८ | अरुन्धतीके साथ सप्तर्षियोंका विधिपूर्वक पूजन ( सत्कार ) किया । ( शिवद्वारा ) भलीभाँति पूजित होकर वे सभी ६ ९ ऋषि देवोंसे मन्त्रणा करनेके लिये चले गये । फिर ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र एवं सूर्य आदि ( देवता ) भी शिवका दर्शन करने आ गये । ( पुलस्त्यजी कहते हैं - ) महर्षे! वहाँ जाकर ( शङ्करको ) प्रणाम करनेके बाद वे लोग शङ्करके गृहमें प्रविष्ट हुए । उन्होंने नन्दी आदिका स्मरण ॥ ७० किया । ( फलतः ) वे सभी आकर शङ्करको प्रणाम करनेके बाद बैठ गये । देवों एवं गणोंसे घिरे खुली । जटावाले वे शङ्करजी वनमें सर्ज्ज और कदम्बके मध्य प्ररोहयुक्त ( बरोहवाले ) वटवृक्षके समान सुशोभित हो ॥ ७१ रहे थे ॥ ६८-७१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५२ ॥

तिरपनवाँ अध्याय हिमालय पुत्री उमाका भगवान् शिवके साथ विवाह और बालखिल्योंकी उत्पत्ति पुलस्त्य उवाच

समागतान् सुरान् दृष्ट्वा नन्दिराख्यातवान् विभोः ।

अथोत्थाय हरिं भक्त्या परिष्वज्य न्यपीडयत् ॥

ब्रह्माणं शिरसा नत्वा समाभाष्य शतक्रतुम् ।

आलोक्यान्यान् सुरगणान् संभावयत् स शङ्करः ॥

गणाश्च जय देवेति वीरभद्रपुरोगमाः ।

शैवाः पाशुपताद्याश्च विविशुर्मन्दराचलम् ॥

ततस्तस्मान्महाशैलं कैलासं सह दैवतैः ।

जगाम भगवान् शर्वः कर्तुं वैवाहिकं विधिम् ॥

ततस्तस्मिन् महाशैले देवमाताऽदितिः शुभा ।

सुरभिः सुरसा चान्याश्चक्रुर्मण्डनमाकुलाः ॥

महास्थिशेखरी चारुरोचनातिलको हरः ।

सिंहाजनी चालिनीलभुजङ्गकृतकुण्डलः ॥

पुलस्त्यजी बोले – नन्दीने आये हुए सभी देवताओंको देखकर शङ्करको बताया । शङ्करने १ उठकर भक्तिपूर्वक विष्णुका गाढ आलिङ्गन किया । उन शङ्करने ब्रह्माको सिरसे ( झुककर ) प्रणाम किया २ एवं इन्द्रसे कुशल- समाचार पूछा तथा अन्य देवोंकी ओर देखकर उनका आदर किया । वीरभद्र आदि शैव एवं पाशुपतगण ' जय देव ' कहते हुए मन्दराचलमें ३ प्रविष्ट हुए । उसके बाद भगवान् शिव वैवाहिक विधि सम्पन्न करनेके लिये देवताओंके साथ महान् कैलास ४ पर्वतपर गये ॥ १- ४ ॥ तत्पश्चात् उस महान् पर्वतपर कल्याणी देवमाता ५ अदिति, सुरभि, सुरसा एवं अन्य स्त्रियोंने शीघ्रतासे शङ्करका शृङ्गार किया । ( गलेमें ) मुण्डमाल धारण किये, कटिमें व्याघ्रचर्म, कानोंमें भ्रमरके समान नीले ( काले ) ६ | सर्पका कुण्डल, ( कलाईमें ) महान् सर्पोंका रत्नरूपी