वामन पुराण — पृष्ठ 251–260

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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अध्याय ५५ ] देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड - मुण्डका विनाश २४१ पूजयिष्यन्ति चैवास्य लोका देवि चराचराः इत्येवमुक्त्वा देव्यास्तु दत्तवांस्तनयाय हि सहायं तु गणश्रेष्ठं नाम्ना ख्यातं घटोदरम् तथा मातृगणा घोरा भूता विघ्नकराश्च ये ते सर्वे परमेशेन देव्याः प्रीत्योपपादिताः देवी च स्वसुतं दृष्ट्वा परां मुदमवाप च रेमेऽथ शम्भुना सार्धं मन्दरे चारुकन्दरे एवं भूयोऽभवद् देवी इयं कात्यायनी विभो या जघान महादैत्यौ पुरा शुम्भनिशुम्भकौ एतत् तवोक्तं वचनं शुभाख्यं यथोद्भवं पर्वततो मृडान्याः स्वर्ग्य यशस्यं च आख्यानमूर्जस्करमद्रिपुत्र्याः । ॥ ७३ करेगा लिये । प्रेमसे ॥७४ कार्य । की । देवि! सारा चर और अचर जगत् इसकी पूजा । देवीसे इस प्रकार कहकर उन्होंने पुत्र विनायकके घटोदर नामके श्रेष्ठ गणको दे दिया । फिर देवीके घोर मातृगणों तथा विघ्नकारी भूतोंको अधीनता में करनेवाला बना दिया - परमेशने उन सबकी सृष्टि अपने पुत्रको देखकर पार्वतीदेवीको भी परम ॥ ७५ प्रसन्नता प्राप्त हुई । इसके बाद देवी शम्भुके साथ सुन्दर । कन्दराओंवाले मन्दराचलपर विचरण करने लगीं । विभो! । यह देवी फिर कात्यायनी हुईं, जिन्होंने प्राचीन कालमें शुम्भ और निशुम्भ नामके दो महान् दैत्योंका विनाश ॥ ७६ किया । ( पुलस्त्यजी प्रकृत प्रसङ्गका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि ) मृडानी जैसे पर्वतसे उत्पन्न हुई, उस । शुभ आख्यानको मैंने आपसे कहा । पर्वतनन्दिनीका यह आख्यान स्वर्ग एवं यशको देनेवाला, पापका हरण ॥ ७७ करनेवाला एवं ओजस्वी है ॥ ७३–७७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौवनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५४ ॥

पचपनवाँ अध्याय देवीद्वारा नमुचिका वध; शुम्भ - निशुम्भका वृत्तान्त, धूम्रलोचनका वध, देवीका चण्ड-मुण्डसे युद्ध और असुरसैन्यसहित चण्ड - मुण्डका विनाश पुलस्त्य उवाच

कश्यपस्य दनुर्नाम भार्यासीद् द्विजसत्तम ।

तस्याः पुत्रत्रयं चासीत् सहस्राक्षाद् बलाधिकम् ॥ १

ज्येष्ठः शुम्भ इति ख्यातो निशुम्भश्चापरोऽसुरः ।

तृतीयो नमुचिर्नाम महाबलसमन्वितः ॥२

योऽसौ नमुचिरित्येवं ख्यातो दनुसुतोऽसुरः ।

तं हन्तुमिच्छति हरिः प्रगृह्य कुलिशं करे ॥ ३ ।

त्रिदिवेशं समायान्तं नमुचिस्तद्भयादथ ।

प्रविवेश रथं भानोस्ततो नाशकदच्युतः ॥ ४

शक्रस्तेनाथ समयं चक्रे सह महात्मना ।

अवध्यत्वं वरं प्रादाच्छस्त्रैरस्त्रैश्च नारद ॥ ५

ततोऽवध्यत्वमाज्ञाय शस्त्रादस्त्राच्च नारद ।

संत्यज्य भास्कररथं पातालमुपयादथ ॥ ६

पुलस्त्यजी बोले- द्विजसत्तम! कश्यपकी दनु नामकी पत्नी थी । उसके इन्द्रसे अधिक बलशाली तीन पुत्र थे । उनमें बड़ेका नाम था शुम्भ, मझलेका नाम निशुम्भ और महाबलशाली तृतीय पुत्रका नाम नमुचि था । इन्द्रने हाथमें वज्र धारणकर नमुचि नामसे विख्यात ( उस ) दनुपुत्र असुरको मारना चाहा; तब नमुचि इन्द्रको

आते देखकर उनके भयसे सूर्यके रथमें प्रवेश कर गया ।

इससे इन्द्र उसे मार न सके ॥ १-४ ॥

नारद! इसके बाद महात्मा इन्द्रने उससे समझौता कर लिया और उसे अस्त्र - शस्त्रोंसे न मारे जानेका वर दे दिया । नारदजी! उसके बाद तो वह ( नमुचि ) | अपनेको अस्त्र - शस्त्रोंसे न मारे जानेवाला जानकर सूर्यके

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२४२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५५

स निमज्जन्नपि जले सामुद्रं फेनमुत्तमम् ।

ददृशे दानवपतिस्तं प्रगृह्येदमब्रवीत् ॥

यदुक्तं देवपतिना वासवेन वचोऽस्तु तत् ।

अयं स्पृशतु मां फेनः कराभ्यां गृह्य दानवः ॥

मुखनासाक्षिकर्णादीन् सम्ममा यथेच्छया ।

तस्मिञ्छक्रोऽसृजद् वज्रमन्तर्हितमपीश्वरः ॥

तेनासौ भग्ननासास्यः पपात च ममार च ।

समये च तथा नष्टे ब्रह्महत्याऽस्पृशद्धरिम् ॥

स वै तीर्थं समासाद्य स्नातः पापादमुच्यत ।

ततोऽस्य भ्रातरौ वीरौ क्रुद्धौ शुम्भनिशुम्भकौ ॥

उद्योगं सुमहत्कृत्वा सुरान् बाधितुमागतौ ।

सुरास्तेऽपि सहस्त्राक्षं पुरस्कृत्य विनिर्ययुः ॥

जितास्त्वाक्रम्य दैत्याभ्यां सबलाः सपदानुगाः ।

शक्रस्याहृत्य च गजं याम्यं च महिषं बलात् ॥

वरुणस्य मणिच्छत्रं गदां वै मारुतस्य च ।

निधयः पद्मशङ्खाद्या हृतास्त्वाक्रम्य दानवैः ॥

त्रैलोक्यं वशगं चास्ते ताभ्यां नारद सर्वतः ।

तदाजग्मुर्महपृष्ठ ददृशुस्ते महासुरम् ॥

रक्तबीजमथोचुस्ते को भवानिति सोऽब्रवीत् ।

स चाह दैत्योऽस्मि विभो सचिवो महिषस्य तु ॥

रक्तबीजेति विख्यातो महावीर्यो महाभुजः ।

अमात्य रुचिरौ वीरौ चण्डमुण्डाविति श्रुतौ ॥

तावास्तां सलिले मग्नौ भयाद् देव्या महाभुजौ ।

यस्त्वासीत् प्रभुरस्माकं महिषो नाम दानवः ॥

निहतः स महादेव्या विन्ध्यशैले सुविस्तृते ।

भवन्तौ कस्य तनयौ कौ वा नाम्ना परिश्रुतौ ।

किंवीर्यौ किंप्रभावौ च एतच्छंसितुमर्हथ ॥

रथको त्यागकर पाताललोकमें चला गया । उस दानवपतिने ७ | जलमें स्नान करते हुए समुद्रके उत्तम फेनको देखा और उसे ग्रहण कर यह वचन कहा - ' देवराज इन्द्रने जो वचन कहा है वह सफल हो । यह फेन मेरा स्पर्श करे । ' ८ ऐसा कहकर वह दानव दोनों हाथोंसे फेन उठाकर अपनी इच्छाके अनुसार उससे अपने मुख, नाक और कर्ण आदिका मार्जन करने लगा । उस ( फेन ) - में छिपे ९ हुए इन्द्रदेवने वज्रकी सृष्टि की ॥५ – ९ ॥ उससे उसकी नाक और मुख भग्न हो गये और १० वह गिर पड़ा तथा मर गया । प्रतिज्ञाके भङ्ग हो जानेसे इन्द्रको ब्रह्महत्याका पाप लगा । ( फिर ) वे तीर्थोंमें जाकर स्नान करनेसे पापमुक्त हुए । उसके बाद ( नमुचिके ११ मर जानेपर ) शुम्भ और निशुम्भ नामके उसके दो वीर भाई अत्यन्त कुपित हुए । वे दोनों बहुत बड़ी तैयारी कर देवताओंको मारनेके लिये चढ़ आये । ( फिर तो ) १२ वे सभी देवता भी इन्द्रको आगे कर निकल पड़े । उन दोनों दैत्योंने धावा बोलकर सेना और अनुचरोंके साथ १३ देवताओंको पराजित कर दिया । दानवोंने आक्रमणकर इन्द्रके हाथी, यमके महिष, वरुणके मणिमय छत्र, | वायुकी गदा तथा पद्म और शङ्ख आदि निधियोंको भी १४ | छीन लिया ॥ १० – १४ ॥ नारदजी! उन दोनोंने तीनों लोकोंको अपने १५ अधीन कर लिया । तब वे सभी ( देवतालोग ) पृथ्वीतलपर आ गये तथा उन लोगोंने रक्तबीज नामके एक महान् असुरको देखा और उससे पूछा- आप कौन हैं? उसने · १६ उत्तर दिया - विभो! मैं महिषासुरका मन्त्री एक दैत्य हूँ । मैं रक्तबीज नामसे विख्यात महापराक्रमी एवं विशाल भुजाओंवाला ( दैत्य ) हूँ । सुन्दर श्रेष्ठ और विशाल १७ भुजाओंवाले चण्ड और मुण्ड नामसे विख्यात, महिषके दो मन्त्री देवीके डरसे जलमें छिप गये हैं । महादेवीने सुविस्तृत विन्ध्यपर्वतपर हमारे स्वामी महिष नामके १८ दानवको मार डाला है । फिर ( देवताओंने पूछा— ) आपलोग ( हमें ) यह बतलावें कि आप दोनों किसके | पुत्र हैं तथा आपलोग किस नामसे विख्यात हैं? ( और आप दोनों यह भी बतलावें कि ) आपलोगोंमें कितना १ ९ | बल एवं प्रभाव है? ॥१५–१९ ॥

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अध्याय ५५ ] देवीद्वारा नमुचिका वध; शुम्भनिशुम्भावूचतुः

अहं शुम्भ इति ख्यातो दनोः पुत्रस्तथैौरसः ।

निशुम्भोऽयं मम भ्राता कनीयान् शत्रुपूगहा ॥

अनेन बहुशो देवाः सेन्द्ररुद्रदिवाकराः ।

समेत्य निर्जिता वीरा येऽन्ये च बलवत्तराः ॥

तदुच्यतां कया दैत्यो निहतो महिषासुरः ।

यावत्तां घातयिष्यावः स्वसैन्यपरिवारितौ ॥

इत्थं तयोस्तु वदतोर्नर्मदायास्तटे मुने ।

जलवासाद् विनिष्क्रान्तौ चण्डमुण्डौ च दानवौ ॥

ततोऽभ्येत्यासुरश्रेष्ठौ रक्तबीजं समाश्रितौ ।

ऊचतुर्वचनं श्लक्ष्णं कोऽयं तव पुरस्सरः ॥

सोभौ प्राह दैत्योऽसौ शुम्भो नाम सुरार्दनः ।

कनीयानस्य च भ्राता द्वितीयो हि निशुम्भकः ॥

एतावाश्रित्य तां दुष्टां महिषघ्नीं न संशयः ।

अहं विवाहयिष्यामि रत्नभूतां जगत्त्रये ॥

चण्ड उवाच

न सम्यगुक्तं भवता रत्नार्होऽसि न साम्प्रतम् ।

यः प्रभुः स्यात्स रत्नार्हस्तस्माच्छुम्भाय योज्यताम् ॥

तदाचचक्षे शुम्भाय निशुम्भाय च कौशिकीम् ।

भूयोऽपि तद्विधां जातां कौशिकीं रूपशालिनीम् ॥

ततः शुम्भो निजं दूतं सुग्रीवं नाम दानवम् ।

दैत्यं च प्रेषयामास सकाशं विन्ध्यवासिनीम् ॥

स गत्वा तद्वचः श्रुत्वा देव्यागत्य महासुरः ।

निशुम्भशुम्भावाहेदं मन्युनाभिपरिप्लुतः ॥

सुग्रीव उवाच

युवयोर्वचनाद् देवीं प्रदेष्टुं दैत्यनायकौ ।

गतवानहमद्यैव तामहं वाक्यमब्रुवम् ॥

यथा शुम्भोऽतिविख्यातः ककुद्मी दानवेष्वपि ।

स त्वां प्राह महाभागे प्रभुरस्मि जगत्त्रये ॥

यानि स्वर्गे महीपृष्ठे पाताले चापि सुन्दरि ।

रत्नानि सन्ति तावन्ति मम वेश्मनि नित्यशः ॥

त्वमुक्ता चण्डमुण्डाभ्यां रत्नभूता कृशोदरि ।

तस्माद् भजस्व मां वा त्वं निशुम्भं वा ममानुजम् ॥

असुरसैन्यसहित चण्ड - मुण्डका विनाश २४३ शुम्भ और निशुम्भने कहा – ( पहले शुम्भ बोला - ) मैं दनुका औरस पुत्र हूँ और शुम्भ नामसे २० प्रसिद्ध हूँ । यह मेरा छोटा भाई है । इसका नाम निशुम्भ है । यह शत्रुसमूहका विनाश करनेवाला ( वीर ) है । इसने इन्द्र, रुद्र, दिवाकर आदि देवताओं तथा अन्य २१ | अनेक अत्यन्त बलशाली वीरोंको भी ( बहुत बार चढ़ाई करके ) पराजित कर दिया है । अब तुम बतलाओ कि किस देवीने दैत्य महिषासुरको मार दिया २२ है? हम दोनों अपनी सेनाओंको साथ लेकर उस देवीका विनाश करेंगे । मुने! नर्मदाके किनारे इस प्रकार दोनोंके बात करते समय चण्ड और मुण्ड नामके दोनों २३ दानव जलसे बाहर निकल आये ॥ २०–२३ ॥ उसके बाद असुरश्रेष्ठ उन दोनोंने रक्तबीजके २४ निकट जाकर मधुर शब्दोंमें पूछा- तुम्हारे सामने यह कौन खड़ा है? उसने उन दोनोंसे कहा- यह देवताओंको कष्ट देनेवाला शुम्भ नामका दैत्य है एवं यह २५ दूसरा इसका छोटा भाई निशुम्भ है । मैं निश्चय ही इन दोनोंकी सहायतासे उस तीनों लोकोंमें रत्नस्वरूपा, ( पर ) दुष्टासे विवाह करूँगा, जिसने महिषासुरका विनाश २६ किया है ॥ २४–२६ ॥ चण्डने कहा- आपका कहना उचित नहीं है; ( क्योंकि ) आप अभी उस रत्नके योग्य नहीं हैं । राजा ही २७ रत्नके योग्य होता है । अतः शुम्भके लिये ही यह संयोग बैठाइये । उसके बाद उन्होंने शुम्भ और निशुम्भसे उस २८ प्रकार सम्पन्न स्वरूपवाली कौशिकीका वर्णन किया । तब शुम्भ अपने दूत सुग्रीव नामके दानवको विन्ध्यवासिनी २ ९ समीप भेजा । वह महान् असुर सुग्रीव वहाँ गया एवं देवीकी बात सुनकर क्रोधसे तिलमिला उठा । फिर उसने ३० आकर निशुम्भ और शुम्भसे कहा ॥ २७ – ३० ॥ सुग्रीवने कहा— दैत्यनायको! आपलोगोंके कथनके अनुसार देवीसे ( संवाद ) कहनेके लिये मैं गया था । मैंने ३१ आज ही जाकर उससे कहा कि भाग्यशालिनि! सुप्रसिद्ध ३२ दानवश्रेष्ठ शुम्भने तुमसे कहा है कि मैं तीनों लोकोंका समर्थ स्वामी हूँ । सुन्दरि! स्वर्ग, पृथ्वी एवं पातालके सारे ३३ रत्न मेरे घरमें सदा भरे रहते हैं । कृशोदरि! चण्ड और मुण्डने तुम्हें रत्नस्वरूपा बतलाया है । अत: तुम मेरा या ३४ । मेरे छोटे भाई निशुम्भका वरण करो ॥ ३१–३४ ॥

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२४४

सा चाह मां विहसती शृणु सुग्रीव मद्वचः ।

सत्यमुक्तं त्रिलोकेशः शुम्भो रत्नार्ह एव च ॥

किं त्वस्ति दुर्विनीताया हृदये मे मनोरथः । यो मां विजयते युद्धे स भर्ता स्यान्महासुर ।

मया चोक्ताऽवलिप्ताऽसि यो जयेत् ससुरासुरान् ।

स त्वां कथं न जयते सा त्वमुत्तिष्ठ भामिनी ॥

साऽथ मां प्राह किं कुर्मि यदनालोचितः कृतः । मनोरथस्तु तद् गच्छ शुम्भाय त्वं निवेदय ।

तयैवमुक्तस्त्वभ्यागां त्वत्सकाशं महासुर ।

सा चाग्निकोटिसदृशी मत्वैवं कुरु यत्क्षमम् ॥

पुलस्त्य उवाच

इति सुग्रीववचनं निशम्य स महासुरः ।

प्राह दूरस्थितं शुम्भो दानवं धूम्रलोचनम् ॥

शुम्भ उवाच

धूम्राक्ष गच्छ तां दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम् ।

सापराधां यथा दासीं कृत्वा शीघ्रमिहानय ॥

यश्चास्याः पक्षकृत् कश्चिद् भविष्यति महाबलः । स हन्तव्योऽविचार्यैव यदि हि स्यात् पितामहः

स एवमुक्तः शुम्भेन धूम्राक्षोऽक्षौहिणीशतैः ।

वृतः षड्भिर्महातेजा विन्ध्यं गिरिमुपाद्रवत् ॥

स तत्र दृष्ट्वा तां दुर्गा भ्रान्तदृष्टिरुवाच ह । एह्येहि मूढे भर्तारं शुम्भमिच्छस्व कौशिकी । न चेद् बलान्नयिष्यामि केशाकर्षणविह्वलाम् श्रीदेव्युवाच प्रेषितोऽसीह शुम्भेन बलान्नेतुं हि मां किल । तत्र किं ह्यबला कुर्याद् यथेच्छसि तथा कुरु श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५५ ( उसके बाद ) हँसती हुई उसने मुझसे कहा कि ३५ सुग्रीव! मेरी बात सुनो । तुमने यह ठीक कहा है कि तीनों लोकोंका स्वामी शुम्भ रत्नके अर्ह ( उपयुक्त ) है । परंतु महासुर! मुझ अविनीताके हृदयकी यह अभिलाषा है कि युद्धमें मुझे पराजित करनेवाला ही मेरा पति हो । ३६ उत्तरमें ( तब ) मैंने ( उससे ) कहा कि तुम्हें घमण्ड हो गया है । भला जिस असुरने सारे देवताओं और राक्षसोंको पराजित कर अपने अधीन कर लिया है । वह तुम्हें क्यों नहीं पराजित कर देगा? इसलिये अये ३७ क्रोधवाली! तुम उठो – बात मान लो । उसके बाद उसने मुझसे कहा- मैं क्या करूँ? बिना विचार किये ही मैंने इस प्रकारका पण कर लिया है । अतः ३८ ( तुम ) जाकर शुम्भसे मेरी बात कहो । फलतः महासुर! उसके इस प्रकार कहनेपर मैं आपके निकट आ गया हूँ । वह जलती हुई आगकी लौकी भाँति तेजस्विनी है; यह जानकर आप जैसा उचित हो, वैसा ३ ९ कार्य करें ॥ ३५-३९ ॥ पुलस्त्यजी बोले- सुग्रीवकी इस बातको सुनकर उस महान् असुर शुम्भने कुछ दूरपर खड़े धूम्रलोचन ४० | दानवसे कहा ॥४० ॥

शुम्भने कहा - धूम्राक्ष! तुम जाओ । उस दुष्टाको अपराधिनी दासीकी तरह केश खींचनेसे व्याकुल ४१ बनाकर यहाँ शीघ्र ले आओ । यदि कोई पराक्रमी उसका पक्ष ले तो तुम बिना विचारे उसे मार डालना - चाहे ब्रह्मा ही क्यों न हो । शुम्भ इस प्रकार ॥ ४२ कहनेपर उस महान् तेजस्वी धूम्राक्षने छः सौ अक्षौहिणी * सेनाके साथ विन्ध्यपर्वतपर चढ़ाई कर दी । किन्तु वहाँ ४३ उन दुर्गाको देखकर दृष्टि चौंधिया जानेसे उसने कहा - मूढ़े! आओ, आओ! कौशिकि! तुम शुम्भको अपना पति बनानेकी इच्छा करो; अन्यथा मैं बलपूर्वक तुम्हारे केश पकड़कर तुम्हें घसीटता हुआ व्याकुल-॥ ४४ रूपमें ( यहाँसे ) ले जाऊँगा॥४१–४४ ॥ श्रीदेवीने कहा- शुम्भने तुमको मुझे बलपूर्वक ले जानेके लिये निश्चय ही भेजा है तो इस विषयमें एक ॥ ४५ । अबला क्या करेगी! तुम जैसा चाहो वैसा करो ॥ ४५ ॥

* एक अक्षौहिणी सेनामें १० ९ ३५० पैदल सिपाही, ६५६१० घुड़सवार, २१८७० रथी और २१८७० गजारोही रहते हैं ।

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अध्याय ५५ ] देवीद्वारा नमुचिका पुलस्त्य उवाच एवमुक्तो विभावर्या बलवान् धूम्रलोचनः समभ्यधावत् त्वरितो गदामादाय वीर्यवान् तमापतन्तं सगदं हुंकारेणैव कौशिकी सबलं भस्मसाच्चक्रे शुष्कमग्निरिवेन्धनम् ॥ हाहाकृतमभूज्जगत्यस्मिंश्चराचरे सबलं भस्मसान्नीतं कौशिक्या वीक्ष्य दानवम् तच्च शुम्भोऽपि शुश्राव महच्छब्दमुदीरितम् अथादिदेश बलिनौ चण्डमुण्डौ महासुरौ

रुरुं च बलिनां श्रेष्ठं तथा जग्मुर्मुदान्विताः ।

तेषां च सैन्यमतुलं गजाश्वरथसंकुलम् ॥

समाजगाम सहसा यत्रास्ते कोशसम्भवा ।

तदायान्तं रिपुबलं दृष्ट्वा कोटिशतावरम् ॥

सिंहोऽद्रवद् धुतसटः पाटयन् दानवान् रणे । कांश्चित् करप्रहारेण कांश्चिदास्येन लीलया नखरैः कांश्चिदाक्रम्य उरसा प्रममाथ च । ते वध्यमानाः सिंहेन गिरिकन्दरवासिना

भूतैश्च देव्यनुचरैश्चण्डमुण्डौ समाश्रयन् ।

तावार्त्तं स्वबलं दृष्ट्वा कोपप्रस्फुरिताधरौ ॥

समाद्रवेतां दुर्गां वै पतङ्गाविव पावकम् ।

तावापतन्तौ रौद्रौ वै दृष्ट्वा क्रोधपरिप्लुता ॥

त्रिशाखां भ्रुकुटीं वक्त्रे चकार परमेश्वरी ।

भ्रुकुटीकुटिलाद् देव्या ललाटफलकाद्द्भुतम् ।

काली करालवदना निःसृता योगिनी शुभा ॥

खट्वाङ्गमादाय करेण रौद्र-मसिञ्च कालाञ्जनकोशमुग्रम् । शुक रुधिराप्लुताङ्गी नरेन्द्रमूर्ध्ना जमुद्वहन्ती ॥ वध; असुरसैन्यसहित चण्ड - मुण्डका विनाश २४५ पुलस्त्यजी बोले- विभावरी ( देवी ) - के इस । प्रकार कहनेपर बलवान् एवं पराक्रमी धूम्रलोचन गदा ॥ ४६ । लेकर झट दौड़ पड़ा । कौशिकीने गदा लेकर आ । रहे उस असुरको, साथ ही उसकी सेनाको भी ४७ हुंकारसे ही ऐसे भस्म कर दिया जैसे आग सूखी लकड़ीको जला देती है । कौशिकीद्वारा सेनाके साथ । बलवान् दानवको भस्म किये जाते देखकर सारे ॥ ४८ संसारमें हाहाकार मच गया ॥ ४६ – ४८ ॥ । शुम्भने भी ( हाहाकारका ) वह महान् शब्द सुना । ॥ ४ ९ उसके बाद उसने चण्ड एवं मुण्ड नामके दोनों महान् एवं बलवान् असुरों तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ रुरुको आदेश दिया और वे प्रसन्नतापूर्वक ( युद्धके लिये ) चल पड़े । ५० हाथियों और रथोंसे भरी उनकी बड़ी सेना शीघ्र ही वहाँ पहुँच गयी, जहाँ कौशिकी खड़ी थीं । उस समय शत्रुकी सैकड़ों सेनाओंको आते देखकर सिंह युद्धमें अपनी ५१ गर्दनके बालोंको फटकारने लगा तथा खेल - खेल में-बिना किसी परिश्रमके ही दानवोंको पछाड़ - पछाड़कर मारने लगा । उसने कुछको पंजोंके थपेड़ोंसे, कुछको ॥ ५२ मुखसे, कुछको तेज नखोंसे एवं कुछको अपनी छातीके धक्के देकर भयत्रस्त कर दिया । फिर तो पर्वतकी गुफा में रहनेवाले सिंहसे एवं देवीके अनुगत भूतोंसे मारे ॥ ५३ जा रहे वे सभी दानव ( भागकर ) चण्ड - मुण्डकी शरणमें चले गये । चण्ड और मुण्ड अपनी सेनाको घबरायी एवं दुखी हुई देखकर कुपित हो गये और ५४ अपने ओठ फड़फड़ाने लगे ॥ ४ ९ –५४ ॥ अग्निकी ओर उड़कर जानेवाले ( जलकर मरनेवाले ) ५५ पतिंगोंके समान वे दोनों दैत्य देवीकी ओर दौड़े । उन दोनों भयङ्कर दानवोंको सामने आते हुए देखकर देवी अत्यन्त क्रुद्ध हो गयीं । परमेश्वरीने मुखके ऊपर तीन रेखाओंवाली भृकुटि चढ़ायी । देवीके टेढ़ी भौंहोंसे युक्त ५६ भालस्थलसे शीघ्र ही विकराल मुखवाली, ( भक्तोंके लिये ) मङ्गलदायिनी योगिनी काली निकल आयीं । उनके हाथमें भयङ्कर खट्वाङ्ग ( नामक ) हथियार तथा काले अञ्जनके समान तरकससे युक्त भयङ्कर तलवार थी । उनका शरीर कंकाल और खूनसे सना हुआ था ५७ | तथा उनके गलेमें राजाओंके कटे हुए सिरोंकी बनी हुई

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२४६

कांश्चित् खड्गेन चिच्छेद खट्वाङ्गेन परान् रणे ।

न्यषूदयद् भृशं क्रुद्धा सरथाश्वगजान् रिपून् ॥

चर्माङ्कुशं मुद्गरं च सधनुष्कं सघण्टिकम् ।

कुञ्जरं सह यन्त्रेण प्रचिक्षेप मुखेऽम्बिका ॥

सचक्रकूबररथं ससारथितुरङ्गमम् ।

समं योधेन वदने क्षिप्य चर्वयतेऽम्बिका ॥

एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामपरं तथा ।

पादेनाक्रम्य चैवान्यं प्रेषयामास मृत्यवे ॥

ततस्तु तद् बलं देव्या भक्षितं सबलाधिपम् ।

रुरुर्दृष्ट्वा प्रदुद्राव तं चण्डी ददृशे स्वयम् ॥

आजघानाथ शिरसि खट्वाङ्गेन महासुरम् ।

स पपात हतो भूम्यां छिन्नमूल इव द्रुमः ॥

ततस्तं पतितं दृष्ट्वा पशोरिव विभावरी ।

कोशमुत्कर्तयामास कर्णादिचरणान्तिकम् ॥

साच कोशं समादाय बबन्ध विमला जटाः ।

एका न बन्धमगमत् तामुत्पाट्याक्षिपद् भुवि ॥

सा जाता सुतरां रौद्री तैलाभ्यक्तशिरोरुहा ।

कृष्णार्धमर्धशुक्लं च धारयन्ती स्वकं वपुः ॥

साऽब्रवीद् वरमेकं तु मारयामि महासुरम् ।

तस्या नाम तदा चक्रे चण्डमारीति विश्रुतम् ॥

प्राह गच्छस्व सुभगे चण्डमुण्डाविहानय ।

स्वयं हि मारयिष्यामि तावानेतुं त्वमर्हसि ॥

श्रुत्वैवं वचनं देव्याः साऽभ्यद्रवत तावुभौ ।

प्रदुद्रुवतुर्भयात्त दिशमाश्रित्य दक्षिणाम् ॥

ततस्तावपि वेगेन प्राधावत् त्यक्तवाससौ । साऽधिरुह्य महावेगं रासभं गरुडोपमम् यतो गतौ च तौ दैत्यौ तत्रैवानुययौ शिवा सा ददर्श तदा पौण्ड्रं महिषं वै यमस्य च श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५५ मुण्डमाला थी । उन्होंने बहुत अधिक क्रुद्ध होकर युद्धमें कुछको तलवारके घाट उतार दिया और हाथी, रथ एवं ५८ घोड़ोंसे युक्त कुछ अन्य असुर - शत्रुओंको खट्वाङ्गसे मार डाला ॥ ५५-५८ ॥ अम्बिकादेवी चर्म, अङ्कुश, मुद्गर, धनुष, ५ ९ घंटियों और यन्त्रके साथ हाथियोंको अपने मुखमें झोंकने लगीं और चक्र तथा सारथी, घोड़े और योद्धा साथ कूबरसे युक्त रथको अपने मुखमें डालकर वे ६० चबाने लगीं । फिर उन्होंने किसीको सिरके केश पकड़कर, किसीको गला पकड़कर और अन्य किसीको ६१ पैरोंसे रौंद - रौंदकर मृत्युके समीप पहुँचा दिया । उसके बाद सेनापतिके साथ उस सेनाको देवीद्वारा भक्षण किया जाता हुआ देखकर रुरु दौड़ पड़ा । चण्डीने स्वयं उसे ६२ देखा और खट्वाङ्गसे उस महान् असुरके सिरपर । आघात कर दिया । वह मरकर जड़से कटे हुए वृक्षके ६३ समान पृथ्वीपर ( धड़ामसे ) गिर पड़ा ॥ ५ ९ - ६३ ॥ देवीने उसे जमीनपर गिरा हुआ देखकर पशुके ६४ समान उसके कानसे पैरतकका कोश काट दिया— उसकी चमड़ी उधेड़ ली । उस कोश ( चमड़ी ) -को लेकर उन्होंने अपनी निर्मल जटाओंको बाँध लिया । ६५ उनमें एक जटा नहीं बाँधी गयी । उसे उखाड़कर उन्होंने जमीनपर फेंक दिया । वह जटा एक भयावनी देवी हो गयी । उसके सिरके बाल तेलसे सिक्त ( सने ) थे एवं ६६ | वह आधा काला तथा आधा सफेद वर्णका शरीर धारण किये हुए थी । उसने कहा- मैं एक श्रेष्ठ महान् असुरको मारूँगी । तब देवीने उसका चण्डमारी - यह प्रसिद्ध नाम ६७ | रख दिया ॥ ६४–६७ ॥ देवीने कहा – सुभगे! तुम जाओ और चण्ड-६८ मुण्डको यहाँ पकड़ लाओ! उन्हें पकड़ लानेमें तुम समर्थ हो । मैं स्वयं उन्हें मारूंगी । इस प्रकार देवीके उस कथनको सुनकर वह उन दोनोंकी ओर दौड़ पड़ी । वे ६ ९ दोनों भयसे दुःखी होकर दक्षिण दिशाकी ओर भाग गये । तब चण्डमारी गरुड़के समान वेगवान् गदहेपर सवार होकर वेगसे भगनेके कारण वस्त्रहीन हुए उन ॥ ७० दोनोंके पीछे दौड़ पड़ी । ( फिर तो ) जहाँ - जहाँ चण्ड और मुण्ड दोनों दैत्य गये, वहाँ - वहाँ उनके पीछे शिवा । भी पहुँचती गयीं । उस समय उन्होंने यमराजके पौण्ड्र ॥ ७१ | नामक महिषको देखा ॥ ६८–७१ ॥

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अध्याय ५५ ] देवीद्वारा नमुचिका

सा तस्योत्पाटयामास विषाणं भुजगाकृतिम् ।

तं प्रगृह्य करेणैव दानवावन्वगाज्जवात् ॥

तौ चापि भूमिं संत्यज्य जग्मतुर्गगनं तदा ।

वेगेनाभिसृता सा च रासभेन महेश्वरी ॥

ततो ददर्श गरुडं पन्नगेन्द्रं चिषादिषुम् ।

कर्कोटकं स दृष्ट्वैव ऊर्ध्वरोमा व्यजायत ॥

भयान्मार्याश्च गरुडो मांसपिण्डोपमो बभौ ।

न्यपतंस्तस्य पत्राणि रौद्राणि हि पतत्रिणः ॥

खगेन्द्रपत्राण्यादाय नागं कर्कोटकं तथा ।

वेगेनानुसरद् देवी चण्डमुण्डौ भयातुरौ ॥

सम्प्राप्तौ च तदा देव्या चण्डमुण्डौ महासुरौ ।

बद्धौ कर्कोटकेनैव बद्ध्वा विन्ध्यमुपागमत् ॥

निवेदयित्वा कौशिक्यै कोशमादाय भैरवम् ।

शिरोभिर्दानवेन्द्राणां तार्क्ष्यपत्रैश्च शोभनैः ॥

कृत्वा स्रजमनौपम्यां चण्डिकायै न्यवेदयत् ।

घर्घरां च मृगेन्द्रस्य चर्मणः सा समार्पयत् ॥

स्रजमन्यैः खगेन्द्रस्य पत्रैर्मूर्ध्नि निबध्य च ।

आत्मना सा पपौ पानं रुधिरं दानवेष्वपि ॥

चण्डा त्वादाय चण्डं च मुण्डं चासुरनायकम् ।

चकार कुपिता दुर्गा विशिरस्कौ महासुरौ ॥

तयोरेवाहिना देवी शेखरं शुष्करेवती ।

कृत्वा जगाम कौशिक्याः सकाशं मार्यया सह ॥

समेत्य साब्रवीद् देवि गृह्यतां शेखरोत्तमः ।

ग्रथितो दैत्यशीर्षाभ्यां नागराजेन वेष्टितः ॥

तं शेखरं शिवा गृह्य चण्डाया मूर्ध्नि विस्तृतम् ।

बबन्ध प्राह चैवैनां कृतं कर्म सुदारुणम् ॥

शेखरं चण्डमुण्डाभ्यां यस्माद् धारयसे शुभम् ।

तस्माल्लोके तव ख्यातिश्चामुण्डेति भविष्यत ॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं त्रिनेत्रा सा चण्डमुण्डस्रजधारिणीं वै । दिग्वाससं चाभ्यवदत् प्रतीता निषूदय स्वारिबलान्यमूनि ॥ वध; असुरसैन्यसहित चण्ड - मुण्डका विनाश २४७ उसने ( चण्डमारीने ) उस महिषकी साँपके ७२ आकारवाली सींगको उखाड़ लिया और उसे हाथमें लेकर वह शीघ्रतासे दानवोंके पीछे पील पड़ी । तब वे दोनों दैत्य पृथ्वी छोड़कर आकाशमें चले गये । फिर ७३ महेश्वरीने अपने गधेके साथ शीघ्रतासे उन दोनोंका पीछा किया । ( देवीने ) सर्पराज कर्कोटकको खानेकी इच्छावाले ७४ गरुड़को देखा । ( फिर तो देवीको ) देखते ही उनके रोंगटे खड़े हो गये; वे डर गये । चण्डमारीके भयसे गरुड़ मांसपिण्डके समान — लोथड़े - से हो गये । उन पक्षिराजके ७५ । भयङ्कर पाँख ( भयके कारण ) गिर पड़े॥७२–७५ ॥ पक्षिराज ( गिरे हुए ) पाँखों तथा कर्कोटक सर्पको ७६ लेकर चण्डमारी भयसे आर्त चण्ड और मुण्डके पीछे दौड़ी । उसके बाद तुरंत ही वह देवी चण्ड और मुण्ड नामक महान् असुरोंके निकट पहुँच गयी एवं उन ७७ दोनोंको कर्कोटक नागसे बाँधकर विन्ध्यपर्वतपर ले आयी । उस चण्डमारीने देवीके पास उन दानवोंको ७८ निवेदित करनेके बाद भयङ्कर कोश लेकर दानवोंके मस्तकों तथा गरुडके सुन्दर पाँखोंसे बनी अनुपम माला निर्मितकर देवीको दे दी एवं सिंहचर्मका घाघरा भी ७ ९ । देवीको समर्पित किया॥७६–७९ ॥ उन्होंने स्वयं गरुड़के अन्य पाँखोंसे दूसरी माला ८० बनाकर उसे अपने सिरमें बाँध लिया और ( फिर वे ) दानवोंका खून पीने लगीं । उसके बाद प्रचण्ड दुर्गाने चण्ड और असुरनायक मुण्डको पकड़ लिया एवं कुपित ८१ होकर उन दोनों महासुरोंका सिर काट डाला । शुष्करेवती देवीने सर्पद्वारा उनके सिरका अलंकार बनाया और वह ८२ चण्डमारीके साथ कौशिकीके पास गयी । वहाँ जाकर उसने कहा- देवि! दैत्योंके सिरसे गुँथे एवं नागराजसे लपेटकर सिरपर पहने जानेवाले इस श्रेष्ठ अलंकारको धारण ८३ करें । शिवा देवीने उस विस्तृत सिरके आभूषणको लेकर उसे चामुण्डाके मस्तकपर बाँध दिया और उनसे ८४ कहा- आपने अत्यन्त भयंकर कार्य किया है ॥ ८०–८४ ॥ यतः आपने चण्ड और मुण्डके सिरोंका शुभ ८५ आभूषण धारण किया है, अतः आप लोकमें चामुण्डा नामसे प्रख्यात होंगी । चण्ड और मुण्डकी माला धारण करनेवाली उन देवीसे त्रिनेत्राने इस प्रकार कहकर दिगम्बरासे ८६ । कहा- तुम अपने इन शत्रुसैनिकोंका विनाश करो ।

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२४८ सा त्वेवमुक्ताऽथ विषाणकोट्या सुवेगयुक्तेन च रासभेन निषूदयन्ती रिपुसैन्यमुग्रं चचार चान्यानसुरांश्चखाद ततोऽम्बिकायास्त्वथ चर्ममुण्डया मार्या च सिंहेन च भूतसंघैः निपात्यमाना दनुपुङ्गवास् ककुद्मिनं शुम्भमुपाश्रयन्त श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५६ ऐसा कहनेपर बहुत तेज गतिवाले गधेके साथ वह । देवी सींगकी नोकसे उग्र शत्रु सेनाके दलोंका संहार करती हुई विचरण करने लगी और ( इस प्रकार ) ॥ ८७ असुरोंको चबाने लगी । उसके बाद अम्बिकाकी । अनुगामिनियों - चर्ममुण्डा, मारी, सिंह एवं भूतगणोंद्वारा मारे जा रहे वे महादानव अपने नायक शुम्भकी ॥ ८८ शरणमें गये ॥ ८५-८८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचपनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५५ ॥

छप्पनवाँ अध्याय चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज - निशुम्भ-शुम्भ - वध, देवताओंके द्वारा देवीकी स्तुति, देवीद्वारा वरदान और भविष्यमें प्रादुर्भावका कथन पुलस्त्य उवाच चण्डमुण्डौ च निहतौ दृष्ट्वा सैन्यं च विद्रुतम् ।

समादिदेशातिबलं रक्तबीजं महासुरम् ।

अक्षौहिणीनां त्रिंशद्भिः कोटिभिः परिवारितम् ॥

तमापतन्तं दैत्यानां बलं दृष्ट्वैव चण्डिका ।

मुमोच सिंहनादं वै ताभ्यां सह महेश्वरी ॥

निनदन्त्यास्ततो देव्या ब्रह्माणी मुखतोऽभवत् ।

हंसयुक्तविमानस्था साक्षसूत्रकमण्डलुः ॥

माहेश्वरी त्रिनेत्रा च वृषारूढा त्रिशूलिनी ।

महाहिवलया रौद्रा जाता कुण्डलिनी क्षणात् ॥

कण्ठादथ च कौमारी बर्हिपत्रा च शक्तिनी ।

समुद्भूता च देवर्षे मयूरवरवाहना ॥

बाहुभ्यां गरुडारूढा शङ्खचक्रगदासिनी ।

शार्ङ्गबाणधरा जाता वैष्णवी रूपशालिनी ॥

महोग्रमुशला रौद्रा दंष्ट्रोल्लिखितभूतला ।

वाराही पृष्ठतो जाता शेषनागोपरि स्थिता ॥

पुलस्त्यजी बोले - ( नारदजी! ) शुम्भने चण्ड और मुण्डको मृत तथा सैनिकोंको भगा हुआ देखकर अत्यन्त बलवान् महान् असुर रक्तबीजको ( लड़नेके १ लिये ) आज्ञा दी । उसके बाद महेश्वरी चण्डिकाने दैत्योंकी तीस करोड़ अक्षौहिणीवाली उस सेनाको आती हुई देखकर उन दोनों देवियोंके साथ सिंहके २ समान गर्जन किया । उसके बाद सिंहके समान निनाद ( हुंकार ) करती हुई देवीके मुखसे हंसके विमानपर ३ बैठी हुई तथा अक्षमाला और कमण्डलु लिये ब्रह्माणी उत्पन्न हो गयी । क्षणभरमें ही वृषपर आरूढ़ त्रिशूलधारिणी महासर्पके कंगन पहने और कुण्डल धारण किये हुए ४ तीन नेत्रोंवाली माहेश्वरी भी उत्पन्न हो गयी ॥१-४ ॥ देवर्षि नारदजी! मोरपंखसे सुशोभित, शक्तिरूपिणी ५ एवं श्रेष्ठ मोरके वाहनपर आरूढ ' कौमारी ' देवीके कण्ठसे उत्पन्न हुई । गरुडपर सवार, शङ्ख, चक्र, गदा, तलवार एवं धनुष - बाण धारण करनेवाली सौन्दर्यशालिनी ' वैष्णवी ' ६ शक्ति देवीकी दोनों भुजाओंसे उत्पन्न हुई । भारी भयङ्कर मूसल लिये, दाढ़ोंसे पृथ्वीको खोदनेवाली, शेषनागके ७ । ऊपर स्थित ' वाराही ' शक्ति देवीकी पीठसे उत्पन्न हुई ।

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अध्याय ५६ ] चण्डिकासे मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज - निशुम्भ - शुम्भ - वध २४ ९ वज्राङ्कुशोद्यतकरा नानालङ्कारभूषिता जाता गजेन्द्रपृष्ठस्था माहेन्द्री स्तनमण्डलात् विक्षिपन्ती सटाक्षेपैर्ग्रहनक्षत्रतारकाः नखिनी हृदयाज्जाता नारसिंही सुदारुणा ताभिर्निपात्यमानं तु निरीक्ष्य बलमासुरम् ।

ननाद भूयो नादान् वै चण्डिका निर्भया रिपून् ।

तन्निनादं महच्छ्रुत्वा त्रैलोक्यप्रतिपूरकम् ॥

समाजगाम देवेशः शूलपाणिस्त्रिलोचनः ।

अभ्येत्य वन्द्य चैवैनां प्राह वाक्यं तदाऽम्बिके ॥

समायातोऽस्मि वै दुर्गे देह्याज्ञां किं करोमि ते ।

तद्वाक्यसमकालं च देव्या देहोद्भवा शिवा ॥

जाता सा चाह देवेशं गच्छ दौत्येन शंकर ।

ब्रूहि शुम्भ निशुम्भं च यदि जीवितुमिच्छथ ॥

तद् गच्छध्वं दुराचाराः सप्तमं हि रसातलम् ।

वासवो लभतां स्वर्गं देवाः सन्तु गतव्यथाः ॥

यजन्तु ब्राह्मणाद्यामी वर्णा यज्ञांश्च साम्प्रतम् ।

नोचेद् बलावलेपेन भवन्तो योद्धुमिच्छथ ॥

तदागच्छध्वमव्यग्रा एषाऽहं विनिषूदये यतस्तु सा शिवं दौत्ये न्ययोजयत नारद ॥ ततो नाम महादेव्याः शिवदूतीत्यजायत ।

ते चापि शंकरवचः श्रुत्वा गर्वसमन्वितम् ।

हुंकृत्वाऽभ्यद्रवन् सर्वे यत्र कात्यायनी स्थिता ॥

ततः शरैः शक्तिभिरङ्कुशैर्वरैः

परश्वधैः शूलभुशुण्डिपट्टिशैः ।

प्रासैः सुतीक्ष्णैः परिघैश्च विस्तृतै-वर्षतुर्दैत्यव सुरेश्वरीम् ॥

सा चापि बाणैर्वरकार्मुकच्युतै-श्चिच्छेद शस्त्राण्यथ बाहुभिः सह । जघान चान्यान् रणचण्डविक्रमा महासुरान् बाणशतैर्महेश्वरी ॥ मारी त्रिशूलेन जघान चान्यान् खट्वाङ्गपातैरपरांश्च कौशिकी । महाजलक्षेपहतप्रभावान् ब्राह्मी तथान्यानसुरांश्चकार ॥ । हाथमें वज्र और अंकुशको लिये, भाँति - भाँतिके आभूषणोंसे ॥ ८ विभूषित, गजराजकी पीठपर बैठी हुई ' माहेन्द्री ' शक्ति उनके स्तन - मण्डलसे उत्पन्न हुई ॥ ५-८ ॥ । गर्दनके बालोंको फटकारनेसे ग्रह, नक्षत्र और ॥ ९ । ताराओंको विक्षुब्ध करती हुई तीक्ष्ण नखोंवाली अत्यन्त भयङ्कर नारसिंही शक्ति देवीके हृदयसे उत्पन्न हुई । फिर चण्डिकाने उन शक्तियोंद्वारा संहार की जाती हुई असुर - सेना एवं शत्रुओंको देखकर भयरहित होकर १० घोर गर्जना की । तीनों लोकोंको ध्वनिसे गुँजा देनेवाले उस गर्जनको सुनकर शूलपाणि त्रिलोचन महादेवजी ११ देवीके निकट आये और उनको प्रणामकर ( उन्होंने ) यह कहा - अम्बिके! दुर्गे! मैं आ गया हूँ । मैं आपका कौन - सा कार्य करूँ? मुझे आज्ञा दीजिये । उस उक्तिके १२ साथ ही देवीकी देहसे शिवा उत्पन्न हो गयीं । उन्होंने देवेश्वरसे कहा – शङ्कर! आप दूत बनकर जाइये और शुम्भ - निशुम्भसे कहिये कि अये दुराचारियो! यदि तुम १३ सब जानेकी इच्छा करते हो तो सातवें ( लोक ) रसातलमें चले जाओ । इन्द्रको स्वर्गकी प्राप्ति हो एवं १४ । देवगण पीड़ा ( बाधासे ) रहित हो जायँ ॥ ९ –१४ ॥ ये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्ण विधि - विधान से १५ यज्ञ ( अनुष्ठान ) करें । यदि तुम ( सब ) अपने पूरे बलके घमण्डसे युद्ध करना चाहते हो, तो आओ । यह मैं बिना १६ किसी घबराहटके – आसानीसे तुमलोगोंका विनाश करूँ – किये देती हूँ । नारदजी! उन्होंने शिवको दूत बनाया, अतः महादेवीका नाम शिवदूती हुआ । वे सारे १७ असुर भी शङ्करके गर्वीले वचनको सुनकर हुंकार करते हुए, जहाँ कात्यायनी स्थित थीं वहाँ दौड़ पड़े । उसके बाद दोनों असुर सुरेश्वरीके ऊपर बाण, शक्ति, अङ्कुश, श्रेष्ठ कुठार, शूल, भुशुण्डी, पट्टिश, तीक्ष्ण प्रास और बहुत १८ । बड़े परिघ आदि अस्त्रोंकी बौछार करने लगे ॥ १५–१८ ॥ युद्धमें प्रचण्ड पराक्रमशालिनी उस महेश्वरीने भी श्रेष्ठ धनुषसे निकले बाणोंसे असुरोंक शस्त्रोंको उनकी भुजाओं सहित १ ९ काट दिया एवं सैकड़ों बाणोंसे अन्य असुरोंको मौतके घाट उतार दिया । मारीने त्रिशूलसे बहुतोंको मारा, कौशिकीने खट्वाङ्गके प्रहारसे बहुतोंका वध किया तथा ब्राह्मीने जलराशि २० । फेंककर दूसरे बहुत से असुरोंको प्रभाहीन कर दिया ।

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२५० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५६ माहेश्वरी शूलविदारितोरस-श्चकार दग्धानपरांश्च वैष्णवी । शक्त्या कुमारी कुलिशेन चैन्द्री तुण्डेन चक्रेण वराहरूपिणी ॥ नखैर्विभिन्नानपि नारसिंही अट्टाट्टहासैरपि रुद्रदूती । रुद्रस्त्रिशूलेन तथैव चान्यान् विनायक श्चापि परश्वधेन ॥

एवं हि देव्या विविधैस्तु रूपै-र्निपात्यमाना दनुपुङ्गवास्ते ।

पेतुः पृथिव्यां भुवि चापि भूतै-स्ते भक्ष्यमाणाः प्रलयं प्रजग्मुः ॥

ते वध्यमानास्त्वथ देवताभि-महासुरा मातृभिराकुलाश्च । विमुक्तकेशास्तरलेक्षणा भयात् ते रक्तबीजं शरणं हि जग्मुः ॥ स रक्तबीज: सहसाभ्युपेत्य वरास्त्रमादाय च मातृमण्डलम् । विद्रावयन् भूतगणान् समन्ताद् विवेश कोपात् स्फुरिताधरश्च ॥ तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य मातरः शस्त्रैः शिताग्रैर्दितिजं ववर्षुः । यो रक्तबिन्दुपत् पृथिव्यां स तत्प्रमाणस्त्वसुरोऽपि जज्ञे ॥ ततस्तदाश्चर्यमयं निरीक्ष्य

सा कौशिकी केशिनिमभ्युवाच ।

पिबस्व चण्डे रुधिरं त्वराते-र्वितत्य वक्त्रं वडवानलाभम् ॥

सा त्वेवमुक्ता वरदाऽम्बिका हि वितत्य वक्त्रं विकरालमुग्रम् । ओष्ठं नभस्पृक् पृथिवीं स्पृशन्तं कृत्वाऽधरं तिष्ठति चर्ममुण्डा ॥ ततोऽम्बिका केशविकर्षणाकुलं कृत्वा रिपुं प्राक्षिपत स्ववको । बिभेद शूलेन तथाऽप्युरस्तः क्षतोद्भवान्ये न्यपतंश्च वक्त्रे ॥ ततस्तु शोषं प्रजगाम रक्तं रक्तक्षये हीनबलो बभूव । तं ही वीर्य शतधा चकार चक्रेण चामीकरभूषितेन ॥ माहेश्वरीने शूलसे बहुत से असुरोंकी छाती छेदकर जर्जर कर दिया । वैष्णवीने बहुतोंको जला कर भस्म कर डाला । कुमारीने शक्तिसे, ऐन्द्रीने वज्रसे, वाराहीने २१ मुखसे एवं चक्रसे असुरोंका संहार किया । नारसिंहीने नखोंके प्रहारसे दैत्योंको चीर डाला, शिवदूतीने अट्टहाससे, रुद्रने त्रिशूलसे एवं विनायकने फरसेकी मारसे अन्य २२ असुरोंको विनष्ट कर दिया ॥ १ ९ -२२ ॥ इस प्रकार देवीके बहुत से रूपोंद्वारा संहार किये जाते हुए दानव धराशायी होने लगे । भूतगण पृथ्वीपर २३ ( गिरे हुए ) उन दानवोंको खा - खाकर उन्हें नष्ट करने लगे । देवताओं और मातृशक्तियोंद्वारा संहार किये जा रहे एवं व्याकुल किये गये वे सारे महान् असुर खुले बालों एवं भयसे इधर - उधर देखते हुए रक्तबीजकी शरण में २४ गये । क्रोधसे ओठको फड़फड़ाते हुए रक्तबीज तेज धारवाले अस्त्रोंको लेकर एकाएक आ धमका एवं भूतगणोंको इधर - उधर खदेड़ते हुए मातृव्यूहमें प्रवेश २५ कर गया । उसको आते हुए देखकर मातृशक्तियोंने उस असुरपर अपने तेज शस्त्रोंकी बौंछार कीं । ( उनके शरीरसे ) रक्तकी जो बूँदें पृथ्वीपर गिरती थीं उनसे उतने २६ ही बलवान् असुर उत्पन्न हो जाते थे ॥ २३-२६ ॥ उसके बाद उस अद्भुत दृश्यको देखकर कौशिकीने केशिनीसे कहा- चण्डिके! वडवानल ( समुद्रकी आग ) -की भाँति अपने मुखको फैलाकर शत्रुका खून पी २७ डालो । ऐसा कहनेपर वरदायिनी अम्बिकाने अपना विशाल भयङ्कर मुँह फैलाया । ऊपरी ओठसे आकाश एवं निचले ओठसे पृथ्वीका स्पर्श करती हुई चामुण्डा सामने खड़ी हो गयी । उसके बाद अम्बिकाने शत्रुके २८ बालोंको पकड़ करके उसे घसीटकर व्याकुल कर दिया और उसे अपने मुखमें डाल लिया और उसकी छातीमें शूलका प्रहार कर दिया । तब रक्तसे उत्पन्न २ ९ होनेवाले दूसरे राक्षस भी उनके मुखमें ही गिरने लगे । उसके बाद उसका रक्त सूख गया । रक्तके नष्ट हो जानेसे वह बलहीन हो गया । निर्बल हो जानेपर उसको देवीने सुवर्णसे विभूषित चक्रसे सौ टुकड़ोंमें काट ३० | डाला ॥ २७-३० ॥