वामन पुराण — पृष्ठ 261–270
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270
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अध्याय ५६ ] चण्डिका मातृकाओंकी उत्पत्ति, असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज - निशुम्भ - शुम्भ - वध २५१ तस्मिन् विशस्ते दनुसैन्यनाथे ते दानवा दीनतरं विनेदुः । हा तात हा भ्रातरिति ब्रुवन्तः क्व यासि तिष्ठस्व मुहूर्त्तमेहि ॥ तथाऽपरे विलुलितकेशपाशा विशीर्णवर्माभरणा दिगम्बराः । निपातिता धरणितले मृडान्या प्रदुद्रुवुर्गिरिवरमुह्य दैत्याः ॥ विशीर्णवर्मायुधभूषणं तद् बलं निरीक्ष्यैव हि दानवेन्द्रः । विशीर्णचक्राक्षरथो निशुम्भः क्रोधान्मृडानीं समुपाजगाम ॥ खड्गं समादाय च चर्म भास्वरं धुन्वशिरः प्रेक्ष्य च रूपमस्याः । सस्तम्भमोहज्वरपीडितोऽथ चित्रे यथाऽसौ लिखितो बभूव ॥ तं स्तम्भितं वीक्ष्य सुरारिमग्रे प्रोवाच देवी वचनं विहस्य । अनेन वीर्येण सुरास्त्वया जिता अनेन मां प्रार्थयसे बलेन ॥
श्रुत्वा तु वाक्यं कौशिक्या दानवः सुचिरादिव ।
प्रोवाच चिन्तयित्वाऽथ वचनं वदतां वरः ॥
सुकुमारशरीरोऽयं मच्छस्त्रपतनादपि ।
शतधा यास्यते भीरु आमपात्रमिवाम्भसि ॥
एतद् विचिन्तयन्नर्थं त्वां प्रहर्तुं न सुन्दरि ।
करोमि बुद्धिं तस्मात् त्वं मां भजस्वायतेक्षणे ॥
मम खड्गनिपातं हि नेन्द्रो धारयितुं क्षमः ।
निवर्तय मतिं युद्धाद् भार्या मे भव साम्प्रतम् ॥
इत्थं निशुम्भवचनं श्रुत्वा योगीश्वरी मुने ।
विहस्य भावगम्भीरं निशुम्भं वाक्यमब्रवीत् ॥
नाजिताऽहं रणे वीर भवे भार्या हि कस्यचित् ।
भवान् यदिह भार्यार्थी ततो मां जय संयुगे ॥
इत्येवमुक्ते वचने खड्गमुद्यम्य दानवः ।
प्रचिक्षेप तदा वेगात् कौशिकीं प्रति नारद ॥
तमापतन्तं निस्त्रिंशं षड्भिर्बर्हिणराजितैः ।
चिच्छेद चर्मणा सार्द्ध तदद्भुतमिवाभवत् ॥
उस दानव सेनापतिके मारे जानेपर वे सभी दानव हातात! हा भाई! कहाँ जा रहे हो, क्षणभर रुको, यहाँ आओ - ऐसा कहते हुए करुण क्रन्दन करने लगे । ३१ मृडानीने खुले और बिखरे बालोंवाले तथा टुकड़े-टुकड़े हुए कवचवाले अनेक नंगे दैत्योंको पृथ्वीपर गिरा दिया । वे दैत्य पर्वत श्रेष्ठको छोड़कर भाग गये । ३२ टूटे कवच, हथियारों एवं आभूषणोंसे युक्त अपनी सेनाको देखकर टूटे ( ही ) चक्र एवं धुरीवाले रथपर चढ़कर दानवश्रेष्ठ निशुम्भ क्रोधपूर्वक मृडानी ( देवी ) -३३ के पास गया । चमकती हुई तलवार और ढाल लेकर सिर हिलाते हुए वह देवीका रूप देखकर मोहज्वरसे पीड़ित हो चित्र - लिखे हुएकी भाँति ठिठक ३४ गया॥३१–३४ ॥ देवीने उस स्तब्ध हुए देवताओंके शत्रुको सामने देखकर हँसते हुए यह वचन कहा- क्या इसी शक्तिके बलपर तुमने देवताओंको पराजित किया है? और क्या ३५ इसी बलपर मुझको ( पत्नीरूपमें ) पानेके लिये याचना करते रहे? कौशिकीकी बात सुननेके बाद देरतक विचार करके बोलनेवालों में श्रेष्ठ वह दानव यह वचन बोला-३६ भीरु! यह तुम्हारा अत्यन्त कोमल शरीर मेरे शस्त्रोंकी मारसे जलमें कच्चे बर्तनकी तरह सैकड़ों टुकड़ों में ३७ अलग - अलग हो जायगा । सुन्दरि! यह सोचकर मैं तुम्हारे ऊपर आघात करनेका विचार नहीं कर रहा हूँ । अतः ३८ विशालनयने! तुम मुझे अङ्गीकार कर लो ॥ ३५-३८ ॥ मेरी तलवारकी मारको इन्द्र भी नहीं सह सकते । ३ ९ तुम युद्धका विचार छोड़ दो एवं अब मेरी पत्नी बन जाओ । मुने! योगीश्वरीने निशुम्भकी यह बात सुनकर ४० हँसते हुए उससे भावभरे वचनमें कहा – वीर! लड़ाईके मैदानमें बिना हारे हुए मैं किसीकी पत्नी नहीं बन सकती । यदि तुम मुझे अपनी स्त्री बनाना चाहते हो तो ४१ संग्राममें मुझे जीत लो । नारदजी! इस बातके कहनेपर उस दानवने तलवार उठाकर कौशिकीकी ओर उसे ४२ वेगसे चलाया ॥ ३ ९ —४२ ॥ देवीने अपनी ओर आती हुई उस तलवारको ढालसहित मोरके पंखसे सुशोभित छ: बाणोंसे ४३ काट दिया । वह ( दृश्य ) बड़ा ही विचित्र हुआ ।
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खड्गे सचर्मणि छिन्ने गदां गृह्य महासुरः ।
समाद्रवत् कोशभवां वायुवेगसमो जवे ॥
तस्यापतत एवाशु करौ श्लिष्टौ समौ दृढौ ।
गदया सह चिच्छेद क्षुरप्रेण रणेऽम्बिका ॥
तस्मिन्निपतिते रौद्रे सुरशत्रौ भयंकरे ।
चण्डाद्या मातरो हृष्टाश्चकुः किलकिलाध्वनिम् ॥
गगनस्थास्ततो देवाः शतक्रतुपुरोगमाः ।
जयस्व विजयेत्यूचुर्हष्टाः शत्रौ निपातिते ॥
ततस्तूर्याण्यवाद्यन्त भूतसङ्घैः समन्ततः ।
पुष्पवृष्टिं च मुमुचुः सुराः कात्यायनीं प्रति ॥
निशुम्भं पतितं दृष्ट्वा शुम्भः क्रोधान्महामुने ।
वृन्दारकं समारुह्य पाशपाणिः समभ्यगात् ॥
तमापतन्तं दृष्ट्वाऽथ सगजं दानवेश्वरम् ।
जग्राह चतुरो बाणांश्चन्द्रार्धाकारवर्चसः ॥
क्षुरप्राभ्यां समं पादौ द्वौ चिच्छेद द्विपस्य सा । द्वाभ्यां कुम्भे जघानाथ हसन्ती लीलया म्बिका निकृत्ताभ्यां गजः पद्भ्यां निपपात यथेच्छया । शक्रवज्रसमाक्रान्तं शैलराजशिरो यथा तस्यावर्जितनागस्य शुम्भस्याप्युत्पतिष्यतः । शिरश्चिच्छेद बाणेन कुण्डलालंकृतं शिवा छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रो निपतात सकुञ्जरः यथा समहिषः क्रौञ्चो महासेनसमाहतः श्रुत्वा सुराः सुररिपू निहतौ मृडान्या सेन्द्राः ससूर्यमरुदश्विवसुप्रधानाः आगत्य तं गिरिवरं विनयावनम्रा देव्यास्तदा स्तुतिपदं त्विदमीरयन्तः देवा ऊचुः नमोऽस्तु ते भगवति पापनाशिनि नमोऽस्तु ते सुररिपुदर्पशातनि नमोऽस्तु हरिहरराज्यदायिनि नमोऽस्तु ते मखभुजकार्यकारिणि श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५६ ढालके साथ तलवारके कट जानेपर वह महा असुर गदा ४४ लेकर हवाके समान तेजीसे कौशिकीकी ओर दौड़ा । अम्बिकाने लड़ाईमें चढ़ाई करनेवाले उस असुरकी, गदाके साथ सुपुष्ट, सुडौल, गठीली भुजाओंको क्षुरप्र ४५ ( खुरपे या बाण ) - से उसी समय काट गिराया । उस अत्यन्त भयङ्कर देवशत्रुके गिरनेपर चण्डी आदि मातृकाएँ प्रसन्न होकर किलकिलाध्वनि ( हर्षसूचक ध्वनि ) ४६ करने लगीं ॥ ४३ – ४६ ॥ उसके बाद आकाशमें स्थित इन्द्र आदि देवगण ४७ शत्रुको मारकर गिराये जानेपर हर्षित होते हुए बोले-विजये! तुम्हारी जय हो । फिर चारों ओर भूतगण भेरी ४८ | बजाने लगे और देवगण कात्यायनीके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे । महामुनि नारदजी! निशुम्भको गिरा हुआ देखकर शुम्भ क्रोधसे हाथमें पाश लिये हुए ४ ९ हाथीपर चढ़कर आया । हाथीपर चढ़कर दानवेश्वरको आते देख ( देवीने ) चमकते हुए अर्धचन्द्राकार चार ५० बाणोंको उठा लिया ॥ ४७ –५० ॥ हँसते हुए उस अम्बिकाने खेल - खेलमें दो ॥ ५१ तीखे बाणोंसे उस हाथीके दो पैरोंको काट दिया एवं दो बाणोंसे उसके कुम्भस्थलपर आघात किया । दो | पैरोंके कट जानेपर वह हाथी इन्द्रके वज्रसे घायल ॥ ५२ पर्वतराजकी ऊँची चोटीकी तरह अपने - आप ही गिर पड़ा | शिवाने घायल हुए हाथीपरसे उछलनेवाले शुभका ॥ ५३ । कुण्डलसे सुशोभित मस्तक बाणसे ( झट ) काट दिया । सिरके कट जानेपर दैत्येन्द्र हाथीके साथ ऐसे गिरा जैसे । महासेन कार्तिकेयद्वारा घायल हुआ क्रौञ्चासुर महिषके ॥ ५४ साथ गिरा था । मृडानी ( देवी ) - द्वारा दोनों देवशत्रुओंका संहार किया जाना सुनकर इन्द्रसहित सूर्य, मरुत्, । अश्विनीकुमार एवं वसुगण आदि देवता उस श्रेष्ठ पर्वतपर आये एवं विनयपूर्वक देवीकी इस प्रकार स्तुति ॥ ५५ करने लगे ॥ ५१-५५ ॥ देवताओंने स्तुति की — भगवति! पापनाशिनि! आपको नमस्कार है । सुर शत्रुओंके दर्पका दलन । करनेवाली! आपको नमस्कार है । विष्णु और शङ्करको राज्य देनेवाली! आपको नमस्कार है । यज्ञके भाग ॥ ५६ । भोक्ता देवोंका कार्य करनेवाली! आपको नमस्कार है ।
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अध्याय ५६ ] चण्डिकासे मातृकाओं की उत्पत्ति, नमोऽस्तु ते त्रिदशरिपुक्षयंकरि नमोऽस्तु ते शतमखपादपूजिते । नमोऽस्तु ते महिषविनाशकारिणि नमोऽस्तु ते हरिहरभास्करस्तुते ॥ नमोऽस्तु तेऽष्टादशबाहुशालिनि नमोऽस्तु ते शुम्भनिशुम्भघातिनि । लोकार्त्तिहरे त्रिशूलिनि नमोऽस्तु नारायणि चक्रधारिणि ॥ नमोऽस्तु वाराहि सदा धराधरे त्वां नारसिंहि प्रणता नमोऽस्तु ते । नमोऽस्तु ते वज्रधरे गजध्वजे नमोऽस्तु कौमारि मयूरवाहिनि ॥ नमोऽस्तु पैतामहहंसवाहने नमोऽस्तु मालाविकटे सुकेशिनि । नमोऽस्तु ते रासभपृष्ठवाहिनि नमोऽस्तु सर्वार्तिहरे जगन्मये ॥ विश्वेश्वरि पाहि विश्वं निषूदयारीन् द्विजदेवतानाम् । ते सर्वमयि त्रिनेत्रे नमो नमस्ते वरदे प्रसीद ॥ ब्रह्माणी त्वं मृडानी वरशिखिगमना शक्तिहस्ता कुमारी वाराही त्वं सुवक्त्रा खगपतिगमना वैष्णवी त्वं सशार्ङ्ग । दुर्दृश्या नारसिंही घुरघुरितरवा त्वं तथैन्द्री सवज्रा त्वं मारी चर्ममुण्डा शवगमनरता योगिनी योगसिद्धा ॥ नमस्ते त्रिनेत्रे भगवति तव चरणानुषिता ये अहरहर्विनतशिरसोऽवनताः । नहि नहि परिभवमस्त्यशुभं च स्तुतिबलिकुसुमकराः सततं ये ॥ असुरोंसे उनका युद्ध, रक्तबीज - निशुम्भ - शुम्भ - वध २५३ देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाली! आपको नमस्कार है । इन्द्रके द्वारा पूजित चरणोंवाली! आपको नमस्कार है । महिषासुरका विनाश करनेवाली! आपको ५७ नमस्कार है । विष्णु, शङ्कर एवं सूर्यसे स्तुति की जानेवाली! आपको नमस्कार है । अष्टादश भुजाओंवाली! आपको नमस्कार है । शुम्भ और निशुम्भका वध करनेवाली! आपको नमस्कार है । समस्त संसारका दुःख हरण करनेवाली! त्रिशूल धारण करनेवाली! ५८ । आपको नमस्कार है । चक्र धारण करनेवाली नारायणि! आपको नमस्कार है । वाराहि! धराको सदा धारण करनेवाली! आपको नमस्कार है । नारसिंहि! आपके चरणोंपर हम प्रणत हैं, आपको नमस्कार है । वज्र धारण करनेवाली! गजध्वजे! आपको नमस्कार है । कौमारि! ५ ९ मयूरवाहिनि! आपको नमस्कार है॥५६–५९ ॥ ब्रह्माके हंसपर बैठनेवाली! आपको नमस्कार है । विकट माला धारण करनेवाली! सुन्दर केशोंवाली! आपको नमस्कार है । गर्दभकी पीठपर बैठनेवाली! ६० आपको नमस्कार है । समस्त क्लेशोंका नाश करनेवाली! जगन्मये! आपको नमस्कार है । विश्वेश्वरि! आपको नमस्कार है । आप विश्वकी रक्षा करें तथा ब्राह्मणों और देवताओंके शत्रुओंका संहार करें । त्रिनेत्रे! सर्वमयि! आपको नमस्कार है । वरदायिनि! आपको बारम्बार ६१ नमस्कार है । आप प्रसन्न हों । ब्रह्माणी और मृडानी आप ही हैं । आप ही सुन्दर मोरपर चलनेवाली और हाथमें शक्ति धारण करनेवाली कुमारी हैं । सुन्दर मुखवाली वाराही आप ही हैं तथा गरुड़पर चलनेवाली, शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाली वैष्णवी आप ही हैं । घुर-घुर शब्द करनेवाली, देखनेमें भयंकर नारसिंही आप ही हैं । आप ही वज्र धारण करनेवाली ऐन्द्री एवं महामारी चर्ममुण्डा हैं । शवपर चलनेवाली तथा योग सिद्ध कर चुकनेवाली योगिनी भी आप ही हैं । तीन ६२ नेत्रोंवाली भगवति! आपको नमस्कार है । आपके चरणोंका आश्रय कर नम्रतासे प्रतिदिन अपना सिर झुकानेवालों तथा बलि एवं फूलोंको हाथमें लिये सर्वदा आपकी स्तुति करनेवालोंका कोई पराजय, अनादर ६३ । और अकल्याण नहीं होता ॥ ६०–६३ ॥
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२५४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५६ एवं स्तुता सुरवरैः सुरशत्रुनाशिनी प्राह प्रहस्य सुरसिद्धमहर्षिवर्यान् । प्राप्तो मयाऽद्भुततमो भवतां प्रसादात् संग्राममूर्ध्नि सुरशत्रुजयः प्रमर्दात् ॥ इमां स्तुतिं भक्तिपरा नरोत्तमा भवद्भिरुक्तामनुकीर्त्तयन्ति 1 दुःस्वप्ननाशो भविता न संशयो यदि पुनरपि भूयो वरस्तथान्यो व्रियतामभीप्सितः ॥ देवा ऊचुः वरदा भवती त्रिदशानां द्विजशिशुगोषु यतस्व हिताय । देवरिपूनपरांस्त्वं प्रदह हुताशनतुल्यशरीरे ॥ देव्युवाच भविष्याम्यसृगुक्षितानना हराननस्वेदजलोद्भवा सुराः । अन्धासुरस्याप्रतिपोषणे रता नाम्ना प्रसिद्धा भुवनेषु चर्चिका ॥ भू I धिष्यामि सुरारिमुत्तमं सम्भूय नन्दस्य गृहे यशोदया । तं विप्रचित्तिं लवणं तथाऽपरौ भूयः सम्भूय भूयो शुम्भं निशुम्भं दशनप्रहारिणी ॥ सुरास्तिष्ययुगे निराशिनी निरीक्ष्य मारी च गृहे शतक्रतोः । देव्याऽमितसत्यधामया सुरा भरिष्यामि च शाकम्भरी वै विपक्षक्षपणा देवा विन्ध्ये भविष्याम्यृषिरक्षणार्थम् । दुर्वृत्तचेष्टान् विनिहत्य दैत्यान् भूयः समेष्यामि सुरालयं हि यदाऽरुणाक्षो भविता महासुरः तदा भविष्यामि हिताय देवताः महालिरूपेण विनष्टजीवितं कृत्वा समेष्यामि पुनस्त्रिविष्टपम् श्रेष्ठ देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर देवताओंके शत्रुओंका संहार करनेवाली देवीने देवताओं, सिद्धों और श्रेष्ठ महर्षियोंसे हँसकर कहा- मैंने आप-६४ लोगोंकी कृपासे युद्धभूमिमें ( शत्रुका ) मर्दन कर देवशत्रुओं ( दानवों ) - पर अत्यन्त अनूठी विजय प्राप्त की है । आप-लोगोंसे कही गयी इस स्तुतिको पढ़नेवाले भक्तिपरायण
श्रेष्ठ मनुष्योंके दुःस्वप्नोंका निस्सन्देह नाश होगा ।
६५ ( अब ) आपलोग दूसरे इच्छित वरको माँगें ॥६४-६५ ॥
देवताओंने कहा - यदि आप देवताओंको वर देना चाहती हैं तो ब्राह्मणों, बच्चों और गौओंके कल्याणके लिये यत्न कीजिये । अग्निके सदृश शरीरवाली! आप ( हम सबके ) अन्य देवशत्रुओंको भविष्यमें भी ६६ जलाकर भस्म करें ॥ ६६ ॥
देवीने कहा— देवो! मैं पुनः शङ्करके मुखके पसीनेके जलसे उत्पन्न हो करके रक्तसे रञ्जित मुखवाली होकर संसारमें चर्चिका नामसे प्रसिद्ध ६७ होऊँगी और अन्धकासुरका संहार करूँगी । फिर मैं नन्दके गृहमें यशोदासे उत्पन्न होकर प्रबल देव-शत्रुका वध करूँगी । वहाँ मैं अवतार लेकर दाँतोंके आघातसे विप्रचित्ति, लवणासुर एवं अन्य शुम्भ-६८ निशुम्भ दानवोंका विनाश करूँगी । देवताओ! कलि-युगमें भोजन न करती हुई इन्द्रके घरमें मारीको देखकर मैं पुनः अमितसत्यधामा देवीके साथ इन्द्रके ॥ ६ ९ घर शाकम्भरीके रूपमें प्रकट होकर भरण - पोषण करूँगी । देवताओ! पुनः मैं शत्रुओंके संहार तथा ऋषियोंकी रक्षा के लिये विन्ध्याचलमें उपस्थित होऊँगी । | देवो! वहाँ दुराचारी दैत्योंका नाश करनेके बाद पुनः ॥ ७० स्वर्ग चली जाऊँगी । देवताओ! अरुणाक्ष नामक महासुर । उत्पन्न होनेपर महाभ्रमरके रूपसे पुनः उत्पन्न होऊँगी एवं उसका संहार कर फिर स्वर्ग चली ॥ ७१ | जाऊँगी ॥ ६७–७१ ॥
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अध्याय ५७ ] कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५५ पुलस्त्य उवाच इत्येवमुक्त्वा वरदा कृत्वा प्रणामं द्विजपुङ्गवानाम् । विसृज्य भूतानि जगाम देवी खं सिद्धसङ्घैरनुगम्यमाना ॥ इदं परमं पवित्रं देव्या जयं मङ्गलदायि पुंसाम् । श्रोतव्यमेतन्नियतैः सदैव रक्षोघ्नमेतद्भगवानुवाच ॥ पुलस्त्यजी बोले – ऐसा कहनेके बाद देवी श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रणाम करके अन्य प्राणियोंको बिदाकर एवं देवोंको वर देकर सिद्धोंके साथ स्वर्गमें चली गयीं । ७२ देवीकी यह विजय - कथा परम पवित्र और प्राचीन है, यह पुरुषोंको मङ्गल देनेवाली है, संयतचित्त मनुष्योंको इसे सदा सुननी चाहिये । भगवान् ने इसे ' रक्षोघ्न ' कहा ७३ है ॥ ७२-७३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छप्पनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५६ ॥
सत्तावनवाँ अध्याय कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और तथा उनका गण, मयूर, नारद उवाच
कथं समहिषः क्रौञ्चो भिन्नः स्कन्देन सुव्रत ।
एतन्मे विस्तराद् ब्रह्मन् कथयस्वामितद्युते ॥ १
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्व कथयिष्यामि कथां पुण्यां पुरातनीम् ।
यशोवृद्धिं कुमारस्य कार्तिकेयस्य नारद ॥ २
यत्तत्पीतं हुताशेन स्कन्नं शुक्रं पिनाकिनः ।
तेनाक्रान्तोऽभवद् ब्रह्मन् मन्दतेजा हुताशनः ॥ ३
ततो जगाम देवानां सकाशममितद्युतिः ।
तैश्चापि प्रहितस्तूर्णं ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ ४
स गच्छन् कुटिलां देवीं ददर्श पथि पावकः ।
तां दृष्ट्वा प्राह कुटिले तेज एतत्सुदुर्द्धरम् ॥ ५
महेश्वरेण संत्यक्तं निर्दहेद् भुवनान्यपि ।
तस्मात् प्रतीच्छ पुत्रोऽयं तव धन्यो भविष्यति ॥ ६
इत्यग्निना सा कुटिला स्मृत्वा स्वमतमुत्तमम् ।
प्रक्षिपस्वाम्भसि मम प्राह वह्निं महापगा ॥ ७
चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका सेनापति होना शक्ति और दण्डादिका पाना नारदजीने पूछा – दृढ़तासे व्रतका सुपालन करनेवाले अमित तेजस्वी ब्रह्मन्! आप मुझे विस्तारसे यह बतलाइये कि स्कन्दने महिषके सहित क्रौञ्चको किस प्रकार मारा? ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी बोले – नारद! सुनो, मैं कीर्तिको बढ़ानेवाली कुमार कार्तिकेयकी पवित्र प्राचीन कथा कहता हूँ । ब्रह्मन्! अग्निने शङ्करके उस च्युत शुक्रका पान कर लिया था । उससे ग्रस्त होनेके कारण अग्निका तेज फीका हो गया । उसके बाद अत्यन्त तेजस्वी अग्नि देवताओंके निकट गये । फिर उन देवोंके भेजे जानेपर वे शीघ्र ही ब्रह्मलोक चले गये । मार्गमें जाते हुए अग्निने कुटिला नामकी देवीको देखा । उसको देखकर अग्रिने कहा – कुटिले! इस तेजको धारण करना कठिन है ॥ २५ ॥
शङ्करके द्वारा त्यागा गया यह तेज समस्त लोकोंको दग्ध कर देगा, अतः तुम इसे ग्रहण कर लो । इससे तुम्हें एक भाग्यशाली पुत्र होगा । अनिके इस प्रकार कहनेपर अपने उत्तम मनोरथका स्मरणकर | महानदी कुटिलाने अग्निसे कहा - इसे मेरे जलमें छोड़
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२५६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५७
ततस्त्वधारयद्देवी शार्वं तेजस्त्वपूपुषत् ।
हुताशनोऽपि भगवान् कामचारी परिभ्रमन् ॥
पञ्चवर्षसहस्राणि धृतवान् हव्यभुक् ततः ।
मांसमस्थीनि रुधिरं मेदोऽन्वरेतसी त्वचः ॥
रोमश्मश्र्वक्षिकेशाद्याः सर्वे जाता हिरण्मयाः ।
हिरण्यरेता लोकेषु तेन गीतश्च पावकः ॥
पञ्चवर्षसहस्राणि कुटिला ज्वलनोपमम् ।
धारयन्ती तदा गर्भं ब्रह्मणः स्थानमागता ॥
तां दृष्टवान् पद्मजन्मा संतप्यन्तीं महापगाम् ।
दृष्ट्वा पप्रच्छ केनायं तव गर्भः समाहितः ॥
सा चाह शाङ्करं यत्तच्छुक्रं पीतं हि वह्निना ।
तदशक्तेन तेनाद्य निक्षिप्तं मयि सत्तम ॥
पञ्चवर्षसहस्राणि धारयन्त्याः पितामह ।
गर्भस्य वर्तते कालो न पपात च कर्हिचित् ॥
तच्छ्रुत्वा भगवानाह गच्छ त्वमुदयं गिरिम् ।
तत्रास्ति योजनशतं रौद्रं शरवणं महत् ॥
तत्रैनं क्षिप सुश्रोणि विस्तीर्णे गिरिसानुनि ।
दशवर्षसहस्त्रान्ते ततो बालो भविष्यति ॥
साश्रुत्वा ब्रह्मणो वाक्यं रूपिणी गिरिमागता ।
आगत्य गर्भं तत्याज मुखेनैवाद्रिनन्दिनी ॥
सा तु संत्यज्य तं बालं ब्रह्माणं सहसागमत् ।
आपोमयी मन्त्रवशात् संजाता कुटिला सती ॥
तेजसा चापि शार्वेण रौक्मं शरवणं महत् ।
तन्निवासरताश्चान्ये पादपा मृगपक्षिणः ॥
दशसु पूर्णेषु शरद्दशशतेष्वथ ।
बालार्कदीप्तिः संजातो बालः कमललोचनः ॥
उत्तानशायी भगवान् दिव्ये शरवणे स्थितः ।
मुखेऽङ्गुष्ठं समाक्षिप्य रुरोद घनराडिव ॥
एतस्मिन्नन्तरे देव्यः कृत्तिकाः षट् सुतेजसः ।
ददृशुः स्वेच्छया यान्त्यो बालं शरवणे स्थितम् ॥
। दें । ( ऐसा करनेपर ) उसके बाद वह देवी शङ्करके तेजको ग्रहणकर उसका पालन - पोषण करने लगी । ८ भगवान् अग्निदेव भी इच्छाके अनुसार विचरण करने लगे । अग्निने उस तेजको पाँच हजार वर्षोंतक धारण ९ किया था । इसलिये अग्निके मांस, हड्डी, रक्त, मेदा, आँत, रेतस्, त्वचा, रोम, दाढ़ी - मूँछ, नेत्र एवं केश आदि सभी सुवर्णमय बन गये । इसीसे संसारमें १० अग्निको ' हिरण्यरेता ' कहा जाने लगा॥६–१० ॥ तब अग्निके समान उस गर्भको पाँच हजार १ ९ वर्षोंतक धारण करती हुई कुटिला ब्रह्माके स्थानपर गयी । कमलजन्मा ब्रह्माने उस महानदीको सन्तप्त होती १२ देखकर पूछा- तुम्हारा यह गर्भ किसके द्वारा स्थापित है? उसने उत्तर दिया – सत्तम! अग्निने पिये हुए शङ्करके उस शुक्रको अपनेमें धारण करनेकी शक्ति न १३ होनेके कारण मुझमें त्याग दिया । पितामह! गर्भ धारण किये हुए मेरा पाँच हजार वर्षका समय बीत गया; परंतु किसी १४ प्रकार यह बाहर नहीं निकल रहा है ॥११–१४ ॥ उसको सुनकर भगवान् ब्रह्माने कहा- तुम उदयाचलपर १५ जाओ । वहाँपर सौ योजनमें फैला हुआ सरपतोंका विशाल घनघोर वन है । अयि सुन्दर कटिवाली! उस विस्तृत पर्वतकी ऊँची चोटीपर इसे छोड़ दो । यह दस १६ हजार वर्षोंके बाद बालक हो जायगा । ब्रह्माकी बात सुननेके बाद वह गिरिनन्दिनी सुन्दरी पर्वतपर गयी १७ एवं मुखसे ही ( उसने ) गर्भका परित्याग कर दिया । वह उस ( जन्म लेनेवाले ) बालकको छोड़कर शीघ्र ही ब्रह्माके समीप चली गयी । सती कुटिला मन्त्र ( शाप ) - के कारण १८ जलरूपमें हो गयी ॥१५–१८ ॥ शङ्करके तेजसे वह विशाल सरपतोंका वन सुवर्णमय १ ९ बन गया । उस वनमें रहनेवाले वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी सुवर्णमय हो गये । उसके बाद दस हजार वर्षोंके बीत जानेपर उगते हुए बाल सूर्यके सदृश दीप्तिमान् तथा २० कमलके समान आँखोंवाला बालक उत्पन्न हुआ । उस दिव्य सरपतके वनमें उतान सोये हुए भगवान् कुमार अपने २१ मुखमें अपना अंगूठा डालकर बादलकी ध्वनिके समान अस्पष्ट ध्वनिमें रोने लगे । इसी बीच स्वेच्छासे जाती हुई दिव्य तेजस्विनी छहों कृत्तिकाओंने सरपतके वनमें स्थित २२ | उस बालकको देखा ॥ १ ९ –२२ ॥
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अध्याय ५७ ] कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और
कृपायुक्ताः समाजग्मुर्यत्र स्कन्दः स्थितोऽभवत् ।
अहं पूर्वमहं पूर्वं तस्मै स्तन्येऽभिचुक्रुशुः ॥ २३ ।
विवदन्तीः स ता दृष्ट्वा षण्मुखः समजायत ।
अबीभरंश्च ताः सर्वाः शिशुं स्नेहाच्च कृत्तिकाः ॥ २४ ।
भ्रियमाणः स ताभिस्तु बालो वृद्धिमगान्मुने ।
कार्त्तिकेयेति विख्यातो जातः स बलिनां वरः ॥ २५
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् पावकं प्राह पद्मजः ।
कियत्प्रमाणः पुत्रस्ते वर्त्तते साम्प्रतं गुहः ॥ २६ ।
स तद्वचनमाकर्ण्य अजानंस्तं हरात्मजम् ।
प्रोवाच पुत्रं देवेश न वेद्मि कतमो गुहः ॥ २७
तं प्राह भगवान् यत्तु तेजः पीतं पुरा त्वया ।
त्रैयम्बकं त्रिलोकेश जातः शरवणे शिशुः ॥ २८ ।
श्रुत्वा पितामहवचः पावकस्त्वरितोऽभ्यगात् ।
वेगिनं मेषमारुह्य कुटिला तं ददर्श ह ॥ २ ९
ततः पप्रच्छ कुटिला शीघ्रं क्व व्रजसे कवे ।
सोऽब्रवीत् पुत्रदृष्ट्यर्थं जातं शरवणे शिशुम् ॥ ३०
साऽब्रवीत् तनयो मह्यं ममेत्याह च पावकः ।
विवदन्तौ ददर्शाथ स्वेच्छाचारी जनार्दनः ॥ ३१
तौ पप्रच्छ किमर्थं वा विवादमिह चक्रथः ।
तावूचतुः पुत्रहेतो रुद्रशुक्रोद्भवाय हि ॥ ३२
तावुवाच हरिर्देवो गच्छ तं त्रिपुरान्तकम् ।
स यद् वक्ष्यति देवेशस्तत्कुरुध्वमसंशयम् ॥ ३३
इत्युक्तौ वासुदेवेन कुटिलाग्ग्री हरान्तिकम् ।
समभ्येत्योचतुस्तथ्यं कस्य पुत्रेति नारद ॥ ३४ ।
रुद्रस्तद्वाक्यमाकर्ण्य हर्षनिर्भरमानसः ।
दिष्ट्या दिष्ट्येति गिरिजां प्रोद्भूतपुलकोऽब्रवीत् ॥ ३५
चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५७ ये कृत्तिकाएँ दयापूर्वक वहाँ गयीं जहाँ कुमार स्कन्द थे । उन्हें दूध पिलानेके लिये वे आपसमें ‘ हम पहले, हम पहले ' ( पिलायेंगी - ) कहकर विवाद करने लगीं । उन्हें आपसमें विवाद करती हुई देखकर वह कुमार षण्मुख ( छह मुखवाले ) बन गये । फिर तो उन ( छहों ) कृत्तिकाओंने प्रेमपूर्वक बच्चेका पोषण किया । मुने! उनके द्वारा रक्षित होकर वह शिशु बड़ा हुआ । वह बलवानोंमें श्रेष्ठ कार्तिकेय नामसे प्रसिद्ध हुआ । ब्रह्मन्! इसी बीच ब्रह्माने अग्निसे प्रश्न किया कि अग्निदेव! तुम्हारा पुत्र गुह ( कार्तिकेय ) इस समय कितना बड़ा हुआ है? ॥ २३–२६ ॥ ब्रह्माके प्रश्नको सुनकर अग्निने शङ्करके उस पुत्रको न जाननेके कारण उत्तरमें कहा – देवेश! मैं पुत्रको नहीं जानता; कौन - सा गुह है? भगवान्ने उनसे कहा— त्रिलोकेश! पूर्वकालमें तुमने शङ्करका जो तेज पी लिया था, वह शरवण ( सरपतके वन ) - में शिशुरूपसे उत्पन्न हुआ है । पितामहका वचन सुननेके बाद अग्निदेव तीव्र गतिवाले बकरेपर चढ़कर शीघ्र ( वहाँ ) गये । कुटिलाने उन्हें जाते हुए देखा । तब कुटिलाने उनसे पूछा - अग्निदेव! आप कहाँ जा रहे हैं? उन्होंने कहा – कुटिले! शरवणमें उत्पन्न हुए बालक पुत्रको देखने जा रहा हूँ ॥ २७–३० ॥ उसने कहा कि ' पुत्र मेरा है ' और अग्निने कहा कि ' मेरा है ' । स्वेच्छासे विचरण कर रहे जनार्दनने उन दोनोंको परस्पर विवाद करते हुए देखा । उन्होंने उन दोनोंसे पूछा- तुम दोनों आपसमें किसलिये विवाद कर रहे हो । ( तो ) उन दोनोंने कहा- रुद्रके शुक्रसे उत्पन्न हुए पुत्रके लिये । विष्णुने उन दोनोंसे कहा- तुमलोग त्रिपुरासुरका विनाश करनेवाले शिवके पास जाओ । वे देवेश जो कहें, उसे निस्सन्देह करो । ( पुलस्त्यजी कहते हैं कि ) नारदजी! वासुदेवके इस प्रकार कहनेपर कुटिला एवं अग्नि शङ्करके पास गये और उन्होंने ( उनसे ) यह गूढ रहस्य पूछा कि पुत्र किसका है? ॥ ३१–३४ ॥ उनके वचनको सुनकर शङ्करका मन हर्षसे भर गया । उन्होंने हर्षगद्गद होकर गिरिजासे कहा – अहो
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२५८
ततोऽम्बिका प्राह हरं देव गच्छाम तं शिशुम् ।
प्रष्टुं समाश्रयेद् यं स तस्य पुत्रो भविष्यति ॥
बाढमित्येव भगवान् समुत्तस्थौ वृषध्वजः ।
सहोमया कुटिलया पावकेन च धीमता ॥
सम्प्राप्तास्ते शरवणं हराग्निकुटिलाम्बिकाः ।
ददृशुः शिशुकं तं च कृत्तिकोत्सङ्गशायिनम् ॥
ततः स बालकस्तेषां मत्वा चिन्तितमादरात् ।
योगी चतुर्मूर्तिरभूत् षण्मुखः स शिशुस्त्वपि ॥
कुमारः शङ्करमगाद् विशाखो गौरिमागमत् ।
कुटिलामगमच्छाखो महासेनोऽग्निमभ्ययात् ॥
ततः प्रीतियुतो रुद्र उमा च कुटिला तथा ।
पावकश्चापि देवेशः परां मुदमवाप च ॥
ततोऽब्रुवन् कृत्तिकास्ताः षण्मुखः किं हरात्मजः । ता अब्रवीद्धरः प्रीत्या विधिवद् वचनं मुने नाम्ना तु कार्त्तिकेयो हि युष्माकं तनयस्त्वसौ । कुटिलायाः कुमारेति पुत्रोऽयं भविताऽव्ययः स्कन्द इत्येव विख्यातो गौरीपुत्रो भवत्वसौ । गुह इत्येव नाम्ना च ममासौ तनयः स्मृतः महासेन इति ख्यातो हुताशस्यास्तु पुत्रकः शारद्वत इति ख्यातः सुतः शरवणस्य च एवमेष महायोगी पृथिव्यां ख्यातिमेष्यति षडास्यत्वान्महाबाहुः षण्मुखो नाम गीयते इत्येवमुक्त्वा भगवाञ्शूलपाणिः पितामहम् सस्मार दैवतैः सार्द्धं तेऽयाजग्मुस्त्वरान्विताः प्रणिपत्य च कामारिमुमां च गिरिनन्दिनीम् दृष्ट्वा हुताशनं प्रीत्या कुटिलां कृत्तिकास्तथा ददृशुर्बालमत्युग्रं षण्मुखं सूर्यसंनिभम् मुष्णन्तमिव चक्षूंषि तेजसा स्वेन देवताः कौतुकाभिवृताः सर्वे एवमूचुः सुरोत्तमाः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५७ भाग्य! अहो भाग्य!! तब अम्बिकाने शङ्करसे कहा-३६ देव! हम सब उस शिशुसे ही पूछने चलें । वह जिसका आश्रय स्वीकार करेगा उसीका पुत्र होगा । ठीक है - ऐसा कहकर वृषध्वज भगवान् शङ्कर ३७ पार्वती, कुटिला तथा बुद्धिमान् पावकके साथ चलनेके लिये उठ खड़े हुए । शङ्कर, पार्वती, कुटिला एवं पावक शरवणमें गये । इन लोगोंने कृत्तिकाकी गोदमें ३८ लेटे हुए उस बालकको देखा॥३५–३८ ॥ उसके बाद छः मुखोंवाला वह बालक उन ३ ९ लोगोंको चिन्तित जान करके उनमें आदर रखकर बच्चा होते हुए भी योगीके समान कुमार, विशाख, शाख, महासेन - ( इन ) चार मूर्तियोंवाला हो गया । कुमार ४० शङ्करके, विशाख गिरिजाके, शाख कुटिलाके और महासेन अनिके समीप चले गये । फिर तो रुद्र, उमा, ४ ९ कुटिला तथा देवेश्वर अग्नि – ये चारों ही अत्यन्त हर्षित हो गये । उसके बाद उन कृत्तिकाओंने पूछा-॥ ४२ क्या षड्वदन शङ्करके पुत्र हैं? मुने! शङ्करने उन सभीसे प्रेमपूर्वक विधिवत् ( आगेका ) वचन कहा - ॥ ३ ९ –४२ ॥ ॥ ४३ कृत्तिकाओ! ' कार्तिकेय ' नामसे ये तुम्हारे पुत्र होंगे तथा ये अविनाशी ' कुमार ' नामसे कुटिलाके पुत्र ॥ ४४ होंगे । ये ही ' स्कन्द ' नामसे विख्यात गौरीके पुत्र होंगे तथा ' गुह ' नामसे मेरे पुत्र होंगे । ' महासेन ' नामसे ये । अनि प्रख्यात पुत्र होंगे तथा ' शारद्वत ' – इस नामसे ॥ ४५ विख्यात ये शरवणके पुत्र होंगे । इस प्रकार ये महायोगी । भूमण्डलमें विख्यात होंगे । छः मुखवाले होनेके कारण ॥ ४६ ये महाबाहु षण्मुख नामसे प्रसिद्ध होंगे ॥ ४३–४६ ॥ । इस प्रकार कहकर शूलपाणि शङ्करने देवताओंके ॥ ४७ साथ पितामह ब्रह्माका स्मरण किया । वे सभी सहसा वहाँ आ गये और कामरिपु शङ्कर तथा गिरिनन्दिनी । ॥ ४८ पार्वतीको प्रणामकर एवं अग्निदेव, कुटिला और कृत्तिकाओं को स्नेहपूर्वक देखकर उन देवोंने अतिशय । दीप्तिमान् सूर्यके सदृश एवं अपने तेजसे सभीके ॥ ४ ९ । नेत्रोंको चकाचौंधमें डालनेवाले उस षडानन बालकको देखा । प्रसन्नतासे भरे उन श्रेष्ठ देवोंने कहा- देव! । आपने, देवीने एवं अग्निने देवताओंका कार्य सम्पन्न
देवकार्यं त्वया देव कृतं देव्याऽग्निना तथा ॥ ५० । कर दिया ॥ ४७–५० ॥
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अध्याय ५७ ] कार्तिकेयका जन्म, उनके छः मुख और
तदुत्तिष्ठ व्रजामोऽद्य तीर्थमौजसमव्ययम् ।
कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यामभिषिञ्चाम षण्मुखम् ॥ ५१
सेनायाः पतिरस्त्वेष देवगन्धर्वकिंनराः ।
महिषं घातयत्वेष तारकं च सुदारुणम् ॥ ५२
बाढमित्यब्रवीच्छर्वः समुत्तस्थुः सुरास्ततः ।
कुमारसहिता जग्मुः कुरुक्षेत्रं महाफलम् ॥ ५३
तत्रैव देवताः सेन्द्रा रुद्रब्रह्मजनार्दनाः ।
यत्नमस्याभिषेकार्थं चक्रुर्मुनिगणैः सह ॥५४
सप्तसमुद्रवाहिनी
नदीजलेनापि महाफलेन ।
वरौषधीभिश्च सहस्रमूर्तिभि-स्तदाभ्यषिञ्चन् गुहमच्युताद्याः ॥ ५५
अभिषिञ्चति सेनान्यां कुमारे दिव्यरूपिणि ।
गुर्गन्धर्व ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ५६
अभिषिक्तं कुमारं च गिरिपुत्री निरीक्ष्य हि ।
स्नेहादुत्सङ्गगं स्कन्दं मूर्म्यजिघ्रन्मुहुर्मुहुः ॥ ५७
जिघ्रती कार्तिकेयस्य अभिषेकार्द्रमाननम् ।
भात्यद्रिजा यथेन्द्रस्य देवमाताऽदितिः पुरा ॥ ५८
तदाऽभिषिक्तं तनयं दृष्ट्वा शर्वो मुदं ययौ ।
पावकः कृत्तिकाश्चैव कुटिला च यशस्विनी ॥ ५ ९
ततोऽभिषिक्तस्य हरः सेनापत्ये गुहस्य तु ।
प्रमथांश्चतुरः प्रादाच्छक्रतुल्यपराक्रमान् ॥ ६०
घण्टाकर्णं लोहिताक्षं नन्दिसेनं च दारुणम् ।
चतुर्थं बलिनां मुख्यं ख्यातं कुमुदमालिनम् ॥ ६१
हरदत्तान् गणान् दृष्ट्वा देवाः स्कन्दस्य नारद । प्रददुः प्रमथान् स्वान् स्वान् सर्वे ब्रह्मपुरोगमाः । ६२
स्थाणुं ब्रह्माणं प्रादाद् विष्णुः प्रादाद् गणत्रयम् ।
संक्रमं विक्रमं चैव तृतीयं च पराक्रमम् ॥ ६३
उत्केशं पङ्कजं शक्रो रविर्दण्डकपिङ्गलौ ।
चन्द्रो मणिं वसुमणिमश्विनौ वत्सनन्दिनौ ॥ ६४ ।
चतुर्मूर्ति होनेका हेतु, उनका दण्डादिका पाना २५ ९ तो आप उठें । अब हमलोग अविनाशी औजस तीर्थको चलें । कुरुक्षेत्रमें चलकर सरस्वती ( नदी ) -में हमलोग षण्मुखका अभिषेक करें । देवो, गन्धर्वो और किन्नरो! ये हमारे सेनापति बनें और महिष तथा भयंकर तारकका संहार करें । शङ्करने कहा- बहुत अच्छा । उसके बाद सभी देवता उठे और कुमारके साथ महान् फलदायी कुरुक्षेत्रमें चले गये । वहीं मुनियोंके साथ इन्द्र, रुद्र, प्रजापति ब्रह्मा, जनार्दन आदि समस्त देवताओंने उस कुमारके अभिषेकका उपाय किया ॥ ५१–५४ ॥ उसके बाद अच्युत ( विष्णु ) आदि देवताओंने ( सरस्वतीके तथा ) सातों समुद्रोंमें मिलकर बहनेवाली नदियोंके महान् फलदायक जलसे एवं सहस्रों प्रकारकी उत्तमोत्तम ओषधियोंसे गुहका ( सेनापतिके पदपर ) अभिषेक किया । दिव्य रूप धारण करनेवाले सेनापति कुमारके अभिषिक्त हो जानेपर गन्धर्वराज गाने लगे एवं अप्सराएँ नृत्य करने लगीं । गिरिजाने कुमारको अभिषिक्त देखकर स्नेहसे गोदमें ले लिया और वे बार - बार उनके सिरको सूँघने लगीं । अभिषेकसे आर्द्र हुए कार्तिकेयके मुखको ( आशीर्वाद देनेकी प्रक्रियामें ) सूँघती हुई पार्वती पूर्वकालमें ( आशीर्वाद देती हुई ) इन्द्रके मुखको सूँघनेवाली देवमाता अदिति जैसी सुशोभित हुईं ॥ ५५-५८ ॥ उस समय शङ्कर, पावक, कृत्तिकाएँ एवं यशस्विनी कुटिला ( - ये सभी ) अपने पुत्रको अभिषिक्त देखकर अत्यन्त हर्षित हुए । उसके बाद शङ्करने सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किये गये गुहको इन्द्रके सदृश शक्तिवाले चार प्रमथों - घण्टाकर्ण, लोहिताक्ष, दारुण नन्दिसेन और चौथे बलवानोंमें श्रेष्ठ विख्यात कुमुदमालीको दिया । नारदजी! शङ्करद्वारा दिये गये गणोंको देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने ( सेनापति ) स्कन्दके लिये अपने - अपने प्रमथोंको ( भी ) दे दिया ॥ ५ ९ -६२ ॥ ब्रह्माने अपने गण स्थाणुको दिया और विष्णुने संक्रम, विक्रम और पराक्रम नामके तीन गणोंको दिया । इन्द्रने उत्केश और पङ्कजको, रविने दण्डक और पिङ्गलको, चन्द्रमाने मणि एवं वसुमणिको, अश्विनीकुमारोंने वत्स और नन्दीको दिया ।
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ज्योतिर्हुताशनः प्रादाज्ज्वलज्जिह्वं तथापरम् ।
कुन्दं मुकुन्दं कुसुमं त्रीन् धाताऽनुचरान् ददौ ॥
चक्रानुचक्रौ त्वष्टा च वेधातिस्थिरसुस्थिरौ । पाणित्यजं कालकञ्च प्रादात् पूषा महाबलौ ।
स्वर्णमालं घनाह्वं च हिमवान् प्रमथोत्तमौ ।
प्रादादेवोच्छ्रितो विन्ध्यस्त्वतिशृङ्गं च पार्षदम् ॥
सुवर्चसं च वरुणः प्रददौ चातिवर्चसम् । संग्रहं विग्रहं चाब्धिर्नागा जयमहाजयौ ।
उन्मादं शङ्कुकर्णं च पुष्पदन्तं तथाऽम्बिका ।
घसं चातिघसं वायुः प्रादादनुचरावुभौ ॥
परिघं चटकं भीमं दहतिदहनौ तथा ।
प्रददावंशुमान् पञ्च प्रमथान् षण्मुखाय हि ॥
यमः प्रमाथमुन्माथं कालसेनं महामुखम् ।
तालपत्रं नाडिजङ्कं षडेवानुचरान् ददौ ॥
सुप्रभं च सुकर्माणं ददौ धाता गणेश्वरौ ।
सुव्रतं सत्यसन्धं च मित्रः प्रादाद् द्विजोत्तम ॥
अनन्तः शङ्कुपीठश्च निकुम्भः कुमुदोऽम्बुजः ।
एकाक्षः कुनटी चक्षुः किरीटी कलशोदरः ॥
सूचीवक्त्रः कोकनदः प्रहासः प्रियकोऽच्युतः ।
गणाः पञ्चदशैते हि यक्षैर्दत्ता गुहस्य तु ॥
कालिन्द्याः कालकन्दश्च नर्मदाया रणोत्कटः ।
गोदावर्याः सिद्धयात्रस्तमसायाद्रिकम्पकः ॥
सहस्रबाहुः सीताया वञ्जुलायाः सितोदरः । मन्दाकिन्यास्तथा नन्दो विपाशायाः प्रियङ्करः ऐरावत्याश्चतुर्दंष्ट्रः षोडशाक्षो वितस्तया । मार्जारं कौशिकी प्रादात् क्रथक्रौञ्चौ च गौतमी बाहुदा शतशीर्षं च वाहा गोनन्दनन्दिकौ । भीमं भीमरथी प्रादाद् वेगारिं सरयूर्ददौ अष्टबाहुं ददौ काशी सुबाहुमपि गण्डकी । महानदी चित्रदेवं चित्रा चित्ररथं ददौ कुहूः कुवलयं प्रादान्मधुवर्णं मधूदका जम्बूकं धूतपापा च वेणा श्वेताननं ददौ श्रुतवर्णं च पर्णासा रेवा सागरवेगिनम् श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५७ अग्निने ज्योति तथा दूसरे ज्वलज्जिह्वको दिया । धाताने ६५ कुन्द, मुकुन्द तथा कुसुम नामके तीन अनुचरोंको दिया । त्वष्टाने चक्र और अनुचक्रको, वेधाने अतिस्थिर और सुस्थिरको एवं पूषाने महाबलशाली पाणित्यज तथा ६६ कालकको दिया ॥ ६३-६६ ॥ हिमालयने प्रमथोंमें श्रेष्ठ स्वर्णमाल और घनाह्वको ६७ तथा ऊँचे विन्ध्याचलने अतिशृङ्ग नामक पार्षदको दिया । वरुणने सुवर्चा एवं अतिवर्चाको, समुद्रने संग्रह ६८ तथा विग्रहको एवं नागोंने जय तथा महाजयको दिया । अम्बिकाने उन्माद, शङ्कुकर्ण और पुष्पदन्तको तथा ६ ९ पवनने घस और अतिघस नामके दो अनुचरोंको दिया । अंशुमान्ने षडाननको परिघ, चटक, भीम, दहति तथा ७० दहन नामके पाँच प्रमथोंको दिया ॥ ६७ – ७० ॥ यमराजने प्रमाथ, उन्माथ, कालसेन, महामुख, ७१ तालपत्र और नाडिजङ्घ नामके छ: अनुचरोंको दिया । द्विजोत्तम! धाताने सुप्रभ और सुकर्मा नामके दो ७२ | गणेश्वरोंको तथा मित्रने सुव्रत तथा सत्यसन्ध नामके दो अनुचरोंको दिया । यक्षोंने अनन्त, शङ्कुपीठ, निकुम्भ, ७३ कुमुद, अम्बुज, एकाक्ष, कुनटी, चक्षु, किरीटी, कलशोदर, सूचीवक्त्र, कोकनद, प्रहास, प्रियक एवं अच्युत — इन ७४ पंद्रह गणोंको कार्तिकेयको दे दिया ॥ ७१–७४ ॥ कालिन्दीने कालकन्दको, नर्मदाने रणोत्कटको, ७५ गोदावरीने सिद्धयात्रको एवं तमसाने अद्रिकम्पकको दिया । सीताने सहस्रबाहुको, वञ्जुलाने सितोदरको, मन्दाकिनीने ॥ ७६ नन्दको एवं विपाशाने प्रियङ्करको दिया । ऐरावतीने चतुर्दंष्ट्रको वितस्ताने षोडशाक्षको, कौशिकीने मार्जारको ॥ ७७ एवं गौतमीने क्रथ और क्रौञ्चको दिया । बाहुदाने शतशीर्षको, वाहाने गोनन्द और नन्दिकको, भीमरथीने ॥ ७८ भीमको और सरयूने वेगारिको दिया ॥ ७५–७८ ॥ काशीने अष्टबाहुको, गण्डकीने सुबाहुको, महानदीने ॥ ७ ९ चित्रदेवको तथा चित्राने चित्ररथको दिया । कुहूने कुवलयको, । मधूदकाने मधुवर्णको, धूतपापाने जम्बूकको और वेणाने ॥ ८० श्वेताननको समर्पित किया । पर्णासाने श्रुतवर्णको, रेवाने । सागरवेगीको, प्रभावाने अर्थ और सहको एवं काञ्चनाने प्रभावार्थं सहं प्रादात् काञ्चना कनकेक्षणम् ॥ ८१ कनकेक्षणको दिया । विमलाने गृध्रपत्रको, मनोहराने गृध्रपत्रं च विमला चारुवक्त्रं मनोहरा । चारुवक्त्रको, धूतपापाने महारावको एवं कर्णाने
धूतपापा महारावं कर्णा विद्रुमसंनिभम् ॥८२ । विद्रुमसंनिभको दिया ॥७ ९ –८२ ॥