वामन पुराण — पृष्ठ 281–290
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290
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अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके सुनाभमभ्येत्य हिमाचलस्तु
प्रगृह्य हस्तेऽन्यत एव नीतवान् ।
हरिः कुमारं सशिखण्डिनं नय-द्वेगाद्दिवं पन्नगशत्रुपत्रः ॥ ११२
गुहः प्राह सुरेशं
मोहेन नष्टो भगवन् विवेकः ।
भ्राता मया मातुलजो निरस्त -स्तस्मात् करिष्ये स्वशरीरशोषम् ॥ ११३
तं प्राह विष्णुर्व्रज तीर्थवर्यं पृथूदकं पापतरोः कुठारम् । स्नात्वौघवत्यां हरमीक्ष्य भक्त्या भविष्यसे सूर्यसमप्रभावः ॥ ११४ इत्येवमुक्तो हरिणा कुमार-स्त्वभ्येत्व तीर्थं प्रसमीक्ष्य शम्भुम् । स्नात्वार्च्य देवान् स रविप्रकाशो जगाम शैलं सदनं हरस्य ॥ ११५ सुचक्रनेत्रोऽपि महाश्रमे तप-श्चचार शैले पवनाशनस्तु । आराधयानो वृषभध्वजं तदा हरोऽस्य तुष्टो वरदो बभूव ॥ ११६ देवात् स वव्रे वरमायुधा चक्रं तथा वै रिपुबाहुषण्डम् । छिन्द्याद्यथा त्वप्रतिमं करेण तमाह बाणस्य वरे निपत्य एवं क्रौञ्चस्य बाणस्य तन्मे भगवान् ददातु ॥ १ ९ ७ शम्भु दत्तमेतद् वरं हि चक्रस्य तवायुधस्य । तद्बाहुबलं प्रवृद्धं संछेत्स्यते नात्र विचारणाऽस्ति ॥ ११८ प्रदत्ते त्रिपुरान्तकेन गणेश्वरः स्कन्दमुपाजगाम । पादौ प्रतिवन्ध हृष्टो निवेदयामास हरप्रसादम् ॥ ११ ९ तवोक्तं महिषासुरस्य वधं त्रिनेत्रात्मजशक्तिभेदात् । मृत्युः शरणागतार्थं पापापहं पुण्यविवर्धनं च ॥ १२० लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर वध २७१ । रोक दिया । हिमालय सुनाभके निकट आये और उनका हाथ पकड़कर दूसरी ओर ले गये तथा गरुडवाहन विष्णु मयूरसहित कुमारको जल्दीसे स्वर्गमें लिये चले गये । इसके बाद गुहने सुरेश्वर हरिसे कहा – भगवन्! मोहसे मेरी विचार - शक्ति नष्ट हो गयी और मैंने अपने ममेरे भाईका संहार कर दिया है । अतः ( प्रायश्चित्तमें ) मैं अपने शरीरको सुखा डालूँगा ॥ ११० - ११३ ॥ विष्णुने उनसे कहा – कुमार! तुम पापरूपी वृक्षके लिये कुठारस्वरूप श्रेष्ठ तीर्थ पृथूदकमें जाओ । वहाँ ओघवतीके जलमें स्नानकर भक्तिपूर्वक महादेवका दर्शन करनेसे तुम ( निष्पाप होकर ) सूर्यके समान कान्तियुक्त हो जाओगे । हरिके इस प्रकार कहनेपर कुमार ( पृथूदक ) तीर्थमें गये और उन्होंने महादेवका दर्शन किया । स्नान करनेके बाद देवताओंकी पूजा करके वे सूर्यके समान तेजस्वी होकर महादेवके निवासस्थल पर्वतपर चले गये । सुचक्रनेत्र भी केवल | वायु पीकर पर्वतके महान् आश्रममें शंकरकी आराधना करता हुआ तपस्या करने लगा । तब प्रसन्न होकर शंकरने उसे वर देनेका वचन दिया । उसने अस्त्र-प्राप्तिके हेतु वर माँगा - हे भगवन्! शत्रुकी भुजाओंको काटनेवाला ऐसा अनुपम चक्र मुझे दें, जिससे मैं हाथसे ही बाणासुरकी भुजाओंको काट सकूँ ॥ ११४ – ११७ ॥ महादेवजीने उससे कहा- जाओ! तुमने चक्रके निमित्त जो वर माँगा, उसे मैंने दे दिया । यह बाणासुरके अत्यन्त बढ़े हुए बाहुबलको निःसन्देह काट डालेगा । त्रिपुराको मारनेवाले महेश्वरके वर देनेपर गणेश्वर ( सुचक्रनेत्र ) स्कन्दके निकट गया और ( उसने ) उनके चरणोंमें गिरकर वन्दना की । उसके बाद उनसे प्रसन्नतापूर्वक । महादेवकी कृपाका वर्णन किया ॥ ११८-११९ ॥ इस प्रकार मैंने ( पुलस्त्यने ) तुमसे शंकरके पुत्रके द्वारा शक्तिसे महिषासुरके संहार किये जानेका वर्णन किया । शरणागतके हेतु क्रौञ्चकी मृत्यु हुई । यह आख्यान । पापका विनाश एवं पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है ॥ १२० ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अट्ठावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५८ ॥
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२७२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५ ९ उनसठवाँ अध्याय ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर करनेके लिये नारद उवाच
योऽसौ मन्त्रयतां प्राप्तो दैत्यानां शरताडितः ।
स केन वद निर्भिन्नः शरेण दितिजेश्वरः ॥ १
पुलस्त्य उवाच आसीन्नृपो रघुकुले रिपुजिन्महर्षे तस्यात्मजो गुणगणैकनिधिर्महात्मा । शूरोऽरिसैन्यदमनो बलवान् सुहृत्स विप्रान्धदीनकृपणेषु समानभावः ॥ २ ऋतध्वजो नाम महान् महीयान् स गालवार्थे तुरगाधिरूढः । पातालकेतुं निजघान पृष्ठे चन्द्रार्धनिभेन वेगात् ॥ ३ नारद उवाच
किमर्थं गालवस्यासौ साधयामास सत्तमः ।
येनासौ पत्रिणा दैत्यं निजघान नृपात्मजः ॥ ४
पुलस्त्य उवाच पुरा गालवर्षि-महाश्रमे स्वे सततं निविष्टः । पातालकेतुस्तपसोऽस्य विघ्नं करोति मौढ्यात् स समाधिभङ्गम् ॥ ५ न चेष्यतेऽसौ तपसो व्ययं हि शक्तोऽपि कर्त्तुं त्वथ भस्मसात् तम् । आकाशमीक्ष्याथ स दीर्घमुष्णं मुमोच निःश्वासमनुत्तमं हि ॥ ६ ततोऽम्बराद् वाजिवरः पपात बभूव वाणी त्वशरीरिणी च । असौ तुरङ्गो बलवान् क्रमेत अह्ना सहस्राणि तु योजनानाम् ॥ ७ स तं प्रगृह्याश्ववरं नरेन्द्र
ऋतध्वजं योज्य तदात्तशस्त्रम् ।
स्थितस्तपस्येव महर्षि-दैत्यं समेत्य विशिखैर्नृपजो बिभेद ॥ ८
नारद उवाच
केनाम्बरतलाद् वाजी निसृष्टो वद सुव्रत ।
वाक् कस्याऽदेहिनी जाता परं कौतूहलं मम ॥ ९
प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त प्रयत्न करना नारदने पूछा- आप हमें यह बतलायें कि सलाह करते हुए दैत्योंमेंसे जो वह दैत्य बाणद्वारा बिंध गया था उसे किसने बाणसे विदीर्ण कर दिया था ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी बोले- महर्षे! रघुकुलमें रिपुजित् नाम एक राजा थे । उनके ऋतध्वज नामका एक पुत्र था । वह सभी गुणोंकी निधि, महात्मा, वीर, शत्रुकी सेनाओंका नाश करनेवाला, बली, मित्रों, ब्राह्मणों, अन्धों, गरीबों एवं दयापात्र दीनोंमें समान भाव रखनेवाला था । उसने गालवके लिये घोड़ेपर सवार होकर पातालकेतुकी पीठमें अर्धचन्द्रके सदृश बाणसे बड़ी तेजीसे मारा था॥२-३ ॥ नारदने कहा ( पूछा ) – उस श्रेष्ठ राजपुत्रने जिस कारण बाणसे उस दैत्यको मारा, उससे गालवका कौन - सा कार्य सिद्ध किया? ॥४ ॥
पुलस्त्यजी बोले- पहले समयकी बात है कि गालव अपने आश्रममें तपस्यामें सदा लीन रहा करते थे । दैत्य पातालकेतु मूर्खताके कारण उनकी तपस्यामें बाधा डाला करता और उनकी समाधि ( ध्यान ) - को भंग किया करता था । वे उसको जलाकर राख कर देनेमें समर्थ होते हुए भी अपनी तपस्या क्षीण नहीं करना चाहते थे; ( क्योंकि तपोबलसे दूसरोंका अनिष्ट करनेपर तपस्या क्षीण हो जाती है । ) उन्होंने ऊपरकी ओर देखकर लंबा, गर्म निःश्वास छोड़ा । वह सर्वथा अनुपम था । उसके बाद आकाशसे एक सुन्दर घोड़ा गिरा और अशरीरिणी वाणी - आकाशवाणी हुई कि यह बलवान् अश्व एक दिनमें हजारों योजन जा सकता है । शस्त्रसे सजे हुए उस राजा ऋतध्वजको वह घोड़ा सौंपकर वे महर्षि ( पुनः ) तपस्या करने लगे । उसके बाद राजपुत्रने दैत्यके पास जाकर उसे बाणसे घायल कर दिया ॥ ५–८ ॥ नारदने कहा ( पुनः पूछा ) - सुव्रत! आप यह बतलायें कि किसने आकाशसे इस अश्वको गिराया था एवं आकाशवाणी किसकी थी? ( इस विषयमें ) मुझे । बड़ी उत्सुकता है॥९॥
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अध्याय ५ ९ ] ऋतध्वजका पातालकेतुपर पुलस्त्य उवाच विश्वावसुर्नाम महेन्द्रगायनो गन्धर्वराजो बलवान् यशस्वी । निसृष्टवान् भूवलये तुरङ्गं ऋतध्वजस्यैव सुतार्थमाशु ॥ १० नारद उवाच
कोऽर्थो गन्धर्वराजस्य येनाप्रैषीन्महाजवम् ।
राज्ञः कुवलयाश्वस्य कोऽर्थो नृपसुतस्य च ॥ ११
पुलस्त्य उवाच विश्वावसोः शीलगुणोपपन्ना आसीत्पुरंध्रीषु वरा त्रिलोके । लावण्यराशिः शशिकान्तितुल्या मदालसा नाम मदालसैव ॥ १२ तां नन्दने देवरिपुस्तरस्वी संक्रीडतीं रूपवतीं ददर्श । पातालकेतुस्तु जहार तन्वीं तस्यार्थतः सोऽश्ववरः प्रदत्तः ॥ १३ हत्वा च दैत्यं नृपतेस्तनूजो लब्ध्वा वरोरूमपि संस्थितोऽभूत् । दृष्टो यथा देवपतिर्महेन्द्रः शच्या तथा राजसुतो मृगाक्ष्या ॥ १४ नारद उवाच एवं निरस्ते महिषे तारके च महासुरे । हिरण्याक्षसुतो धीमान् किमचेष्टत वै पुनः । १५ पुलस्त्य उवाच
तारकं निहतं दृष्ट्वा महिषं च रणेऽन्धकः ।
क्रोधं चक्रे सुदुर्बुद्धिर्देवानां देवसैन्यहा ॥ १६
ततः स्वल्पपरीवारः प्रगृह्य परिघं करे ।
निर्जगामाथ पातालाद् विचचार च मेदिनीम् ॥ १७
ततो विचरता तेन मन्दरे चारुकन्दरे ।
दृष्टा गौरी च गिरिजा सखीमध्ये स्थिता शुभा ॥ १८
ततोऽभूत् कामबाणार्त्तः सहसैवान्धकोऽसुरः ।
तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं गिरिराजसुतां वने ॥ १ ९
अथोवाचासुरो मूढो वचनं मन्मथान्धकः ।
कस्येयं चारुसर्वाङ्गी वने चरति सुन्दरी ॥ २०
इयं यदि भवेन्नैव ममान्तः पुरवासिनी ।
तन्मदीयेन जीवेन क्रियते निष्फलेन किम् ॥ २१ ।
आक्रमण कर प्रहार करना २७३ पुलस्त्यजी बोले – महेन्द्रका गुणगान करनेवाले बलशाली विश्वावसु नामके यशस्वी गन्धर्वराजने अपनी पुत्रीके लिये ऋतध्वजके हेतु उस समय अश्वको पृथ्वीपर गिराया था ॥ १० ॥
नारदने कहा ( फिर पूछा ) – महान् वेगशाली इस अश्वको भेजनेमें गन्धर्वराजका क्या उद्देश्य था तथा राजपुत्र राजा कुवलयाश्वका इसमें क्या लाभ था?
( कृपया इसे भी बतलाइये । ) ॥ ११ ॥
पुलस्त्यजी बोले- विश्वावसुकी मदसे अलसायी-सी मदालसा नामकी एक ( भोलीभाली ) कन्या थी । वह शील और गुणसे सम्पन्न, त्रिलोककी स्त्रियोंमें उत्तम, सुन्दरताकी खानि और चन्द्रमाकी कान्तिके समान ( कोमलकिशोरी ) थी । नन्दनवनमें क्रीडा कर रही उस सौन्दर्यशालिनीको देवताओंके शत्रु पातालकेतुने । देखा और तुरन्त उसे उठा ले गया । उसीके कारण वह श्रेष्ठ घोड़ा दिया गया था । दैत्यको मारनेके बाद श्रेष्ठ ऊरूवाली स्त्रीको पाकर राजपुत्र निश्चिन्त हो गये । राजपुत्र ( उस ) मृगनयनीके साथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे शचीके साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं॥१२–१४ ॥ नारदने पुनः पूछा - इस प्रकार महान् असुर तारक और महिषके निरस्त - समाप्त हो जानेपर हिरण्याक्षके बुद्धिमान् पुत्र ( अन्धक ) - ने पुनः क्या किया? ॥ १५ ॥
पुलस्त्यजी बोले- तारक और महिष दोनोंको संग्राममें मारे गये देखकर देवसेनाके समूहोंका नाश करनेवाला, महामूर्ख अन्धक देवताओंपर कुपित हो गया । उसके बाद थोड़ी - सी सेनाके साथ वह हाथमें परिघ लेकर पातालसे बाहर निकल आया और पृथ्वीपर विचरण करने लगा । उसके बाद घूमते हुए ही उसने सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दर गिरिपर सखियोंके बीचमें गिरिनन्दिनी कल्याणी गौरीको देखा । उस सर्वाङ्गसुन्दरी गिरिराजनन्दिनीको वनमें देखकर अन्धकासुर एकाएक काम - बाणसे पीड़ित हो गया ॥ १६-१९ ॥ तब कामसे अंधे हुए उस मूर्ख असुर अन्धकने कहा- वनमें भ्रमण कर रही यह सर्वाङ्गसुन्दरी ललना किसकी है? यदि यह मेरे अन्तः पुरमें निवास करनेवाली न हुई तो मेरे इस व्यर्थके जीवनसे क्या लाभ? यदि
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२७४
यदस्यास्तनुमध्याया न परिष्वङ्गवानहम् ।
अतो धिङ् मां रूपेण किं स्थिरेण प्रयोजनम् ॥
स मे बन्धुः स सचिवः स भ्राता साम्परायिकः ।
यो मामसितकेशां तां योजयेन्मृगलोचनाम् ॥
इत्थं वदति दैत्येन्द्रे प्रह्लादो बुद्धिसागरः ।
पिधाय कर्णौ हस्ताभ्यां शिरः कम्पं वचोऽब्रवीत् ॥
मा मैवं वद दैत्येन्द्र जगतो जननी त्वियम् ।
लोकनाथस्य भार्येयं शङ्करस्य त्रिशूलिनः ॥
मा कुरुष्व सुदुर्बुद्धिं सद्यः कुलविनाशिनीम् ।
भवतः परदारेयं मा निमज्ज रसातले ॥
सत्सु कुत्सितमेवं हि असत्स्वपि हि कुत्सितम् ।
शत्रवस्ते प्रकुर्वन्तु परदारावगाहनम् ॥
किंचित् त्वया न श्रुतं दैत्यनाथ गीतं श्लोकं गाधिना पार्थिवेन । दृष्ट्वा सैन्यं विप्रधेनुप्रसक्तं तथ्यं पथ्यं सर्वलोके हितं च ॥ वरं प्राणास्त्याज्या न च पिशुनवादेष्वभिरति-वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतम् । वरं क्लीबैर्भाव्यं न च परकलत्राभिगमनं श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५ ९ इस कृशोदरी सुन्दरी ललनाका आलिङ्गन मुझे प्राप्त न २२ हुआ तो मुझे धिक्कार है! मेरी इस स्थायी सुन्दरतासे क्या लाभ? मेरा वही बन्धु, वही सचिव, वही भ्राता तथा वही संकटकालका साथी है जो इस काले केशवाली २३ मृगनयनी सुन्दरीको मुझसे मिला दे ॥ २० - २३ ॥ दैत्यराजके इस प्रकार कहनेपर महाबुद्धिमान् २४ प्रह्लाद दोनों हाथोंसे दोनों कानोंको ढँककर सिर हिलाते हुए बोले- दैत्येन्द्र! इस प्रकार मत कहो । ये तो संसारकी जननी और लोकस्वामी, त्रिशूलधारी शङ्करकी २५ पत्नी हैं । तुम कुलका सद्यः विनाश करनेवाली ऐसी दुर्बुद्धि मत करो । तुम्हारे लिये ये परस्त्री हैं । अतः | रसातलमें मत गिरो; क्योंकि ( ऐसा दुष्कर्म ) सज्जनोंमें २६ तो अत्यन्त निन्दित है ही, असत् पुरुषोंमें भी निन्दित है । ऐसा दुष्कर्म – परदारा - अभिगमन तुम्हारे शत्रु करें २७ ( जिससे उनका विनाश हो जाय ) ॥ २४ –२७ ॥ दैत्येश! ब्राह्मणकी गौपर प्रसक्त सेनाको देखकर गाधिराजने समस्त जगत् के लिये कल्याणकारी, सत्य एवं उचित जो श्लोक कहा है क्या उसे आपने नहीं २८ सुना है? ( उन्होंने कहा है – ) प्राणोंका छोड़ देना अच्छा है, परंतु चुगलखोरोंकी बातमें दिलचस्पी लेना उचित नहीं । मौन रहना अच्छा है, किंतु असत्य बोलना ठीक नहीं । नपुंसक होकर रहना ठीक है, परंतु परस्त्रीगमन उचित नहीं । भीख माँगना अच्छा है, किंतु वरं भिक्षार्थित्वं न च परधनास्वादमसकृत् ॥ २ ९ बार - बार दूसरेके धनका उपभोग करना उचित नहीं । स प्रह्लादवचः श्रुत्वा क्रोधान्धो मदनार्दितः । इयं सा शत्रुजननीत्येवमुक्त्वा प्रदुद्रुवे ततोऽन्वधावन् दैतेया यन्त्रमुक्ता इवोपलाः तान् रुरोध बलान्नन्दी वज्रोद्यतकरोऽव्ययः मयतारपुरोगास्ते वारिता द्रावितास्तस्था । कुलिशेनाहतास्तूर्णं जग्मुर्भीता दिशो दश तानर्दितान् रणे दृष्ट्वा नन्दिनाऽन्धकदानवः परिघेण समाहत्य पातयामास नन्दिनम् शैलादिं पतितं दृष्ट्वा धावमानं तथान्धकम् शतरूपाऽभवद् गौरी भयात् तस्य दुरात्मनः प्रह्लादका वचन सुननेके बाद काम पीड़ित अन्धक क्रोधसे अंधा होकर ' यह वही शत्रुकी जननी है ' – यह ॥ ३० कहते हुए दौड़ पड़ा । उसके बाद दूसरे और दानव भी यन्त्रसे छूटे हुए पत्थरकी गोलीके समान उसके पीछे । दौड़ चले । परंतु अव्यय नन्दीने हाथमें वज्र उठाकर ॥ ३१ बलपूर्वक उन सबको रोक दिया ॥ २८ - ३१ ॥ वज्रकी मारसे रोक दिये गये और भगाये जाते हुए । ३२ वे मय एवं तारक आदि सभी दैत्य डरकर दसों । दिशाओंमें भाग गये । संग्राममें अन्धकासुरने उन सभीको ॥ ३३ नन्दीद्वारा पीड़ित देखकर नन्दीको परिघसे मारकर गिरा । । दिया । नन्दीको गिरा हुआ और अन्धकको दौड़कर आते ॥ ३४ । हुए देखकर गौरी उस दुष्टात्माके भयसे सैकड़ों रूपवाली
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अध्याय ५ ९ ] ऋतध्वजका पातालकेतुपर ततः स देवीगणमध्यसंस्थितः परिभ्रमन् भाति महाऽसुरेन्द्रः । यथा वने मत्तकरी परिभ्रमन् कमध्ये मदलोलदृष्टिः ॥ ३५
न परिज्ञातवांस्तत्र का तु सा गिरिकन्यका ।
नात्राश्चर्यं न पश्यन्ति चत्वारोऽमी सदैव हि ॥ ३६
न पश्यतीह जात्यन्धो रागान्धोऽपि न पश्यति ।
न पश्यति मदोन्मत्तो लोभाक्रान्तो न पश्यति ।
सोऽपश्यमानो गिरिजां पश्यन्नपि तदान्धकः ॥ ३७
प्रहारं नाददत् तासां युवत्य इति चिन्तयन् ।
ततो देव्या स दुष्टात्मा शतावर्या निराकृतः ॥ ३८
कुट्टितः प्रवरैः शस्त्रैर्निपपात महीतले ।
वीक्ष्यान्धकं निपतितं शतरूपा विभावरी ॥ ३ ९
तस्मात् स्थानादपाक्रम्य गताऽन्तर्धानमम्बिका ।
पतितं चान्धकं दृष्ट्वा दैत्यदानवयूथपाः ॥ ४०
कुर्वन्तः सुमहाशब्दं प्राद्रवन्त रणार्थिनः ।
तेषामापततां शब्दं श्रुत्वा तस्थौ गणेश्वरः ॥ ४१ ।
आदाय वज्रं बलवान् मघवानिव कोपितः ।
दानवान् समयान् वीरः पराजित्य गणेश्वरः ॥ ४२
समभ्येत्याम्बिकां दृष्ट्वा ववन्दे चरणौ शुभौ ।
देवी च ता निजा मूर्ती: प्राह गच्छध्वमिच्छया ॥ ४३
विहरध्वं महीपृष्ठे पूज्यमाना नरैरिह ।
वसतिर्भवतीनां च उद्यानेषु वनेषु च ॥ ४४
वनस्पतिषु वृक्षेषु गच्छध्वं विगतज्वराः ।
तास्त्वेवमुक्ताः शैलेय्या प्रणिपत्याम्बिकां क्रमात् ॥ ४५
दिक्षु सर्वासु जग्मुस्ताः स्तूयमानाश्च किन्नरैः ।
अन्धकोऽपि स्मृतिं लब्ध्वा अपश्यन्नद्रिनन्दिनीम् ।
स्वबलं निर्जितं दृष्ट्वा ततः पातालमाद्रवत् ॥ ४६ ।
ततो दुरात्मा स तदान्धको मुने पातालमभ्येत्य दिवा न भुङ्क्ते । रात्रौ न मदनेषुताडितो गौरीं स्मरन्कामबलाभिपन्नः ॥ ४७ आक्रमण कर प्रहार करना २७५ हो गयीं । उसके बाद देवियोंके बीच घूमता हुआ ( वह ) दैत्य ऐसा लग रहा था जैसे कि वनमें हथिनियोंके बीच घूमता हुआ मदसे चञ्चल दृष्टिवाला मतवाला हाथी सुशोभित होता है ॥ ३२–३५ ॥ ( पर ) वह नहीं समझ रहा था कि उनमें वे गिरिनन्दिनी कौन हैं? इसमें ( उसके न समझनेमें ) कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि संसारमें ये चार प्रकारके व्यक्ति सदा ही ( ठीक - ठीक ) नहीं देख पाते । जन्मका अन्धा नहीं देखता, प्रेममें अन्धा हुआ नहीं देखता, मदोन्मत्त नहीं देखता एवं लोभसे पराभूत भी नहीं देखता है । अतः अन्धक उस समय देखते हुए भी गिरिजाको नहीं देख पा रहा था । उस दानवने उन सभीको युवती समझकर उनपर आघात नहीं किया, फिर तो शतावरीदेवीने ( ही ) उस दुष्टात्मापर आघात कर दिया । उत्कृष्ट कोटिके शस्त्रोंसे बिंधकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा । अन्धकको गिरा हुआ देखकर शतरूपोंवाली विभावरी अम्बिका उस स्थानसे हटकर अन्तर्हित हो गयीं । अन्धकको गिरा हुआ देख दैत्यों एवं दानवोंके सेनापति युद्धके लिये ललकारते हुए दौड़ पड़े । आक्रमण करनेवाले उन ( दैत्यों ) -के शब्दको सुनकर गणेश्वर खड़े हो गये ॥ ३६-४१ ॥ क्रुद्ध हुए गणेश्वर इन्द्रके समान वज्र लेकर मयसहित दानवोंको हराकर अम्बिकाके निकट गये और ( उन्होंने ) उनके शुभ चरणों में प्रणाम किया । देवीने भी अपनी उन मूर्तियोंसे कहा – तुम सभी इच्छानुरूप स्थानोंको जाओ और मनुष्योंकी आराधना प्राप्त करती हुई पृथ्वीपर भ्रमण करो । तुम सबका निवास उद्यानों, वनों, वनस्पतियों एवं वृक्षोंमें होगा । अब तुम सभी निश्चिन्त होकर जाओ । पार्वतीके इस प्रकार कहनेपर वे सभी देवियाँ अम्बिकाको प्रणामकर किन्नरोंसे स्तुत होती हुई ( दसों दिशाओंमें चली गयीं । अन्धक भी होशमें आनेके बाद गिरिजाको न देखकर तथा अपनी सेनाको हारी हुई समझकर पातालमें चला गया । मुने! उसके बाद कामबाणसे घायल एवं कामके वेगसे पीड़ित दुष्टात्मा अन्धक पातालमें जाकर गौरीका चिन्तन करता हुआ न दिनमें खाता था और न रातमें सोता था - वह बेचैन - सा हो गया था ॥ ४२-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥५ ९ ॥
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२७६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६० साठवाँ अध्याय पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि, शिवका सरस्वतीमें निमग्न होना, मुरासुरका नारद उवाच
क्व गतः शङ्करो ह्यासीद् येनाम्बा नन्दिना सह ।
अन्धकं योधयामास एतन्मे वक्तुमर्हसि ॥
पुलस्त्य उवाच
यदा वर्षसहस्त्रं तु महामोहे स्थितोऽभवत् ।
तदाप्रभृति निस्तेजाः क्षीणवीर्यः प्रदृश्यते ॥
स्वमात्मानं निरीक्ष्याथ निस्तेजोऽङ्गं महेश्वरः ।
तपोऽर्थाय तथा चक्रे मतिं मतिमतां वरः ॥
स महाव्रतमुत्पाद्य समाश्वास्याम्बिकां विभुः ।
शैलादिं स्थाप्य गोप्तारं विचचार महीतलम् ॥
महामुद्रार्पितग्रीवो महाहिकृतकुण्डलः ।
धारयाणः कटीदेशे महाशङ्खस्य मेखलाम् ॥
कपालं दक्षिणे हस्ते सव्ये गृह्य कमण्डलुम् ।
एकाहवासी वृक्षे हि शैलसानुनदीष्वटन् ॥
स्थानं त्रैलोक्यमास्थाय मूलाहारोऽम्बुभोजनः ।
वाय्वाहारस्तदा तस्थौ नववर्षशतं क्रमात् ॥
ततो वीटां मुखे क्षिप्य निरुच्छ्वासोऽभवद् यतिः ।
विस्तृते हिमवत्पृष्ठे रम्ये समशिलातले ॥
ततो वीटा विदायैव कपालं परमेष्ठिनः ।
सार्चिष्मती जटामध्यान्निषण्णा धरणीतले ॥
वीटया तु पतन्त्याऽद्रिर्दारितः क्ष्मासमोऽभवत् ।
जातस्तीर्थवरः पुण्यः केदार इति विश्रुतः ॥
ततो हरो वरं प्रादात् केदाराय वृषध्वजः ।
पुण्यवृद्धिकरं ब्रह्मन् पापघ्नं मोक्षसाधनम् ॥
प्रसंग और सनत्कुमारका प्रसंग नारदने कहा ( पूछा ) – आप मुझे यह बतलायें कि शङ्कर कहाँ चले गये थे, जिससे नन्दिसहित १ अम्बिकाने अन्धकसे ( स्वयं ) युद्ध किया ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी बोले – वे ( शंकरजी ) जिस समय एक हजार वर्षतक महामोहमें पड़ गये थे, उस समयसे २ वे तेजरहित एवं शक्तिहीन - से दिखायी दे रहे थे । मतिमानोंमें श्रेष्ठ महेश्वरने स्वयं अपने अङ्गोंको निस्तेज देखकर तप ३ करनेके लिये निश्चय किया । उन व्यापक शङ्करने महाव्रतका निर्णय करनेके बाद अम्बिकाको धैर्य धारण कराया और वे शैल आदि ( नन्दी ) - को उनकी रक्षाके लिये नियुक्त ४ कर पृथ्वीपर विचरण करने लगे । उन्होंने गलेमें तन्त्रानुसार महामुद्रा पहन ली । महासर्पोंके कुण्डल एवं कमरमें ५ महाशङ्खकी मेखला धारण कर ली ॥ २–५ ॥ दाहिने हाथमें कपाल एवं बायें हाथमें कमण्डलु ६ लेकर वे वृक्षोंके नीचे ( कभी ) पड़े रहते, कभी पहाड़ोंकी चोटियोंपर तथा नदियोंके तटपर चक्कर लगाते रहते । प्रथम ( आरम्भमें ) मूल फल खाकर फिर जल पीकर, ७ उसके बाद वायु पीकर ( यम - नियमका ) व्रत पालन करनेवाले उन्होंने क्रमशः तीनों लोकोंमें नौ सौ वर्ष व्यतीत किये । उसके बाद उन्होंने हिमालयके ऊपर रमणीय तथा समतल पर्वतीय चट्टानपर आसन लगा लिया और ८ अपने मुखमें काष्ठकी बनी गुल्ली डालकर श्वास रोक लिया – कुम्भक प्राणायाम कर लिया । उसके बाद शंकर के कपालको फोड़कर ज्वालामयी वह गुल्ली ( उनकी ) ९ जटाके बीचसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ६ – ९ ॥ उस गुल्लीके गिरनेसे पर्वत टूट - फूटकर पृथ्वीके १० समान ( समतल ) हो गया और वहाँ केदार नामका प्रसिद्ध तीर्थ बन गया । ब्रह्मन्! उसके बाद वृषध्वज महादेवने केदारको पुण्यकी वृद्धि करनेवाले एवं पापके ११ | विनाश करनेवाले और मोक्षके साधनका वर दिया तथा
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अध्याय ६० ] पुनः तेजः प्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि २७७
ये जलं तावके तीर्थे पीत्वा संयमिनो नराः ।
मधुमांसनिवृत्ता ये ब्रह्मचारिव्रते स्थिताः ॥
षण्मासाद् धारयिष्यन्ति निवृत्ताः परपाकतः ।
तेषां हृत्पङ्कजेष्वेव मल्लिङ्गं भविता ध्रुवम् ॥
न चास्य पापाभिरतिर्भविष्यति कदाचन ।
पितॄणामक्षयं श्राद्धं भविष्यति न संशयः ॥
स्नानदानतपांसीह होमजप्यादिकाः क्रियाः ।
भविष्यन्त्यक्षया नॄणां मृतानामपुनर्भवः ॥
एतद् वरं हरात् तीर्थं प्राप्य पुष्णाति देवताः ।
पुनाति पुंसां केदारस्त्रिनेत्रवचनं यथा ॥
केदाराय वरं दत्त्वा जगाम त्वरितो हरः ।
स्नातुं भानुसुतां देवीं कालिन्दीं पापनाशिनीम् ॥
तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा जगामाथ सरस्वतीम् ।
वृतां तीर्थशतैः पुण्यैः प्लक्षजां पापनाशिनीम् ॥
अवतीर्णस्ततः स्नातुं निमग्नश्च महाम्भसि ।
द्रुपदां नाम गायत्रीं जजापान्तर्जले हरः ॥
निमग्ने शङ्करे देव्यां सरस्वत्यां कलिप्रिय ।
साग्रः संवत्सरो जातो न चोन्मज्जत ईश्वरः ॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् भुवनाः सप्त सार्णवाः ।
चेलुः पेतुर्धरण्यां च नक्षत्रास्तारकैः सह ॥
आसनेभ्यः प्रचलिता देवाः शक्रपुरोगमाः ।
स्वस्त्यस्तु लोकेभ्य इति जपन्तः परमर्षयः ॥
ततः क्षुब्धेषु लोकेषु देवा ब्रह्माणमागमन् ।
दृष्ट्वोचुः किमिदं लोकाः क्षुब्धाः संशयमागताः ॥
तानाह पद्मसम्भूतो नैतद् वेद्मि च कारणम् ।
तदागच्छत वो युक्तं द्रष्टुं चक्रगदाधरम् ॥
पितामहेनैवमुक्ता देवाः शक्रपुरोगमाः ।
पितामहं पुरस्कृत्य मुरारिसदनं गताः ॥
यह भी वर दिया कि जो संयमी मनुष्य परान्न-१२ भोजनको त्यागकर तथा ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर तुम्हारा जल पीते हुए यहाँ छः महीनेतक निवास करेंगे उनके हृदयकमलमें निश्चय ही मेरे लिङ्गकी सत्ता प्रत्यक्ष प्रकट १३ | होगी ॥ १० - १३ ॥ उन्हें कभी पापमें अभिरुचि नहीं होगी तथा उनसे १४ किया गया पितरोंका श्राद्ध अक्षय होगा- इसमें कोई सन्देह नहीं है । मनुष्योंद्वारा यहाँ की गयी स्नान, दान, तपस्या, होम एवं जप आदिकी क्रियाएँ अक्षय होंगी तथा १५ इस स्थानपर मनुष्योंके मरनेपर उनका पुनर्जन्म नहीं होगा । महादेवसे इस प्रकारका वर पाकर वह केदारतीर्थ १६ त्रिनेत्र महादेवके वचनके अनुकूल प्राणिवर्गको पवित्र एवं देवताओंका पोषण करने लगा । केदारतीर्थको वर देकर महादेव पापविनाशिनी रवितनया देवी कालिन्दी ( यमुना ) -१७ में स्नान करनेके लिये शीघ्र चले गये ॥ १४ -१७ ॥ वहाँ स्नान करके पवित्र होकर भगवान् शंकर १८ सैकड़ों पवित्र तीर्थोंसे घिरी ( वृत ) और प्लक्षवृक्षसे । उत्पन्न पापनाशिनी सरस्वतीके निकट गये । उसके बाद वे स्नान करनेके लिये उसमें उतरे एवं अगाध जलमें १ ९ भलीभाँति स्नान कर द्रुपदा गायत्रीका जप करने लगे । कलिप्रिय! देवी सरस्वतीके जलमें शङ्करको डुबकी २० लगाये हुए एक वर्षसे अधिक बीत गया; परंतु भगवान् ऊपर नहीं उठे । ब्रह्मन्! उस समय समुद्रोंसहित सातों भुवन काँपने लगे और ताराओंके साथ नक्षत्र ( टूट-२१ टूटकर ) भूतलपर गिरने लगे॥१८–२१ ॥ इन्द्र प्रमुख हैं जिनमें ऐसे देवता अपने - अपने २२ आसनोंसे उचक पड़े और महर्षिगण ' संसारका कल्याण हो ' – इस भावनासे जप करने लगे । तत्पश्चात् जगत्के अशान्त हो जानेपर देवगण ब्रह्माके निकट आये और २३ उन्हें देखकर उन लोगोंने पूछा- ब्रह्मन्! संसार अशान्त होकर क्यों सन्देहके झोंके खा रहा है? कमलयोनि ब्रह्माने उनसे कहा- मैं इसके कारणको नहीं जान पा २४ रहा हूँ । तुमलोग जाओ, ( इसके लिये ) चक्र - गदाधारी विष्णुका दर्शन करना उचित है । पितामहके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र आदि सभी देवता पितामहको आगे कर २५ । मुरारिलोक ( विष्णुलोक ) - में गये ॥ २२ - २५ ॥
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२७८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६० नारद उवाच
कोऽसौ मुरारिर्देवर्षे देवो यक्षो नु किन्नरः ।
दैत्यो राक्षसो वापि पार्थिवो वा तदुच्यताम् ॥
पुलस्त्य उवाच
योऽसौ रजः सत्त्वमयो गुणवांश्च तमोमयः ।
निर्गुणः सर्वगो व्यापी मुरारिर्मधुसूदनः ॥
नारद उवाच
Dist मुर इति ख्यातः कस्य पुत्रः स गीयते ।
कथं च निहतः संख्ये विष्णुना तद् वदस्व मे ॥
पुलस्त्य उवाच
श्रूयतां कथयिष्यामि मुरासुरनिबर्हणम् ।
विचित्रमिदमाख्यानं पुण्यं पापप्रणाशनम् ॥
कश्यपस्यौरसः पुत्रो मुरो नाम दनूद्भवः ।
स ददर्श रणे शस्तान् दितिपुत्रान् सुरोत्तमैः ॥
ततः स मरणाद् भीतस्तप्त्वा वर्षगणान्बहून् ।
आराधयामास विभुं ब्रह्माणमपराजितम् ॥
ततोऽस्य तुष्टो वरदः प्राह वत्स वरं वृणु ।
स च वव्रे वरं दैत्यो वरमेनं पितामहात् ॥
यं यं करतलेनाहं स्पृशेयं समरे विभो ।
स स मद्धस्तसंस्पृष्टस्त्वमरोऽपि मरत्वतः ॥
बाढमित्याह भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।
ततोऽभ्यागान्महातेजा मुरः सुरगिरिं बली ॥
समेत्याह्वयते देवं यक्षं किन्नरमेव वा ।
न कश्चिद् युयुधे तेन समं दैत्येन नारद ॥
ततोऽमरावतीं क्रुद्धः स गत्वा शक्रमाह्वयत् ।
न चास्य सह योद्धुं वै मतिं चक्रे पुरंदरः ॥
ततः स करमुद्यम्य प्रविवेशामरावतीम् ।
प्रविशन्तं न तं कश्चिन्निवारयितुमुत्सहेत् ॥
स गत्वा शक्रसदनं प्रोवाचेन्द्रं मुरस्तदा ।
देहि युद्धं सहस्त्राक्ष नो चेत् स्वर्गं परित्यज ॥
इत्येवमुक्तो मुरुणा ब्रह्मन् हरिहयस्तदा ।
स्वर्गराज्यं परित्यज्य भूचरः समजायत ॥
नारदने पूछा- देवर्षे! आप यह बतलायें कि ये मुरारि कौन हैं? ये देवता हैं या यक्ष, किन्नर हैं या दैत्य, २६ राक्षस हैं या मनुष्य? ॥ २६ ॥
पुलस्त्यजीने कहा- देवताओ! जो ये मुरारि हैं | वे मधु नामके राक्षसके विनाशकारी हैं; वे सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणसे युक्त हैं; निर्गुण और सगुण हैं; २७ सर्वगामी और सर्वव्यापी हैं ॥ २७ ॥
नारदने ( पुलस्त्यजीसे ) पूछा- आप मुझे यह बतलायें कि यह मुर- नामधारी दानव किसका पुत्र है और लड़ाईके मैदानमें भगवान् विष्णुने उसे किस २८ प्रकार मारा? ॥ २८ ॥
पुलस्त्यजी बोले – नारद! मुर असुरके विनाशकी कथा अद्भुत है; वह पापका विनाश करनेवाली और २ ९ पवित्रकारिणी है; मैं उसे कहूँगा; तुम सुनो । दनुकी कोखसे कश्यपका औरस पुत्र मुर उत्पन्न हुआ । उसने श्रेष्ठ ३० देवोंद्वारा संग्राममें दैत्योंको पराजित देखा । उसके बाद मृत्युसे भयभीत होकर उसने बहुत वर्षोंतक तपस्या करते ३१ हुए व्यापक अजेय ब्रह्माकी आराधना की । उसके बाद
। उसके ऊपर संतुष्ट होकर ब्रह्माने कहा - वत्स! वर माँगो ।
३२ उस दैत्यने पितामहसे यह श्रेष्ठ वर माँगा - ॥ २ ९ –३२ ॥
विभो! युद्धमें मैं जिसे हाथसे छू दूँ वह मेरे हाथसे ३३ छूते ही अमर ( देवता ) होनेपर भी मृत्युको प्राप्त हो जाय । लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने कहा - बहुत ठीक; ऐसा ही होगा । उसके बाद महातेजस्वी बलशाली मुर ३४ । देवगिरिपर जा पहुँचा । [ पुलस्त्यजी कहते हैं कि ] नारदजी! वहाँ पहुँचकर उसने देवता, यक्ष, किन्नर आदिको युद्धके लिये ललकारा, किंतु किसीने भी ३५ । उसके साथ युद्ध नहीं किया । उसके बाद क्रुद्ध होकर वह अमरावतीकी ओर चला गया और इन्द्रको संग्राम । करनेके लिये ललकारने लगा । किंतु इन्द्रने भी उसके ३६ साथ युद्ध करनेका विचार नहीं किया ॥ ३३ – ३६ ॥ उसके बाद हाथ उठाये हुए उसने अमरावतीमें ३७ प्रवेश किया । परंतु किसीने भी प्रवेश करते हुए उसको । रोकनेका साहस नहीं किया । उसके बाद इन्द्रके भवनमें ३८ जाकर मुरने इन्द्रसे कहा - सहस्राक्ष! मुझसे संग्राम करो, अन्यथा स्वर्गको छोड़ दो । ब्रह्मन्! मुरके इस प्रकार ३ ९ | कहनेपर इन्द्र ( युद्ध न कर ) स्वर्गका राज्य छोड़कर
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अध्याय ६० ] पुनः तेजः प्राप्तिके लिये
ततो गजेन्द्रकुलिशौ हृतौ शक्रस्य शत्रुणा ।
सकलत्रो महातेजाः सह देवैः सुतेन च ॥
कालिन्द्या दक्षिणे कूले निवेश्य स्वपुरं स्थितः ।
मुरुश्चापि महाभोगान् बुभुजे स्वर्गसंस्थितः ॥
दानवाश्चापरे रौद्रा मयतारपुरोगमाः ।
मुरमासाद्य मोदन्ते स्वर्गे सुकृतिनो यथा ॥
स कदाचिन्महीपृष्ठं समायातो महासुरः ।
एकाकी कुञ्जरारूढः सरयूं निम्नगां प्रति ॥
स सरय्वास्तटे वीरं राजानं सूर्यवंशजम् ।
ददृशे रघुनामानं दीक्षितं यज्ञकर्मणि ॥
तमुपेत्याब्रवीद् दैत्यो युद्धं मे दीयतामिति ।
नो चेन्निवर्ततां यज्ञो नेष्टव्या देवतास्त्वया ॥
तमुपेत्य महातेजा मित्रावरुणसंभवः ।
प्रोवाच बुद्धिमान् ब्रह्मन् वसिष्ठस्तपतां वरः ॥
किं ते जितैर्नरैर्दैत्य अजिताननुशासय ।
प्रहर्तुमिच्छसि यदि तं निवारय चान्तकम् ॥
स बली शासनं तुभ्यं न करोति महासुर ।
तस्मिञ्जिते हि विजितं सर्वं मन्यस्व भूतलम् ॥
स तद् वसिष्ठवचनं निशम्य दनुपुङ्गवः ।
जगाम धर्मराजानं विजेतुं दण्डपाणिनम् ॥
तमायान्तं यमः श्रुत्वा मत्वाऽवध्यं च संयुगे ।
स समारुह्य महिषं केशवान्तिकमागमत् ॥
समेत्य चाभिवाद्यैनं प्रोवाच मुरचेष्टितम् ।
स चाह गच्छ मामद्य प्रेषयस्व महासुरम् ॥
स वासुदेववचनं श्रुत्वाऽभ्यागात् त्वरान्वितः ।
एतस्मिन्नन्तरे दैत्यः सम्प्राप्तो नगरीं मुरः ॥
तमागतं यमः प्राह किं मुरो कर्त्तुमिच्छसि ।
वदस्व वचनं कर्त्ता त्वदीयं दानवेश्वर ॥
मुरुरुवाच
यम प्रजासंयमनान्निवृत्तिं कर्तुमर्हसि ।
नो चेत् तवाद्य छित्त्वाऽहं मूर्धानं पातये भुवि ॥
शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि २७ ९ पृथ्वीपर विचरण करने लगे । उसके बाद ( उस ) शत्रुने ४० इन्द्रके गजराज ( ऐरावत ) और वज्रको छीन लिया । महातेजस्वी इन्द्र अपनी पत्नी, पुत्र और देवताओंके साथ कालिन्दीके दक्षिण तटपर अपना नगर बसाकर रहने लगे और मुर स्वर्गमें रहते हुए महान् भोगोंका उपभोग ४१ करने लगा ॥ ३७–४१ ॥ मय और तारक आदि दूसरे भयङ्कर दानव भी ४२ मुरके निकट पहुँचकर स्वर्गमें पुण्यात्माओंके समान आमोद - प्रमोद करने लगे । वह महान् असुर किसी ४३ समय पृथ्वीपर आया और अकेला ही हाथीपर चढ़कर सरयू नदीके तटपर उपस्थित हुआ । उसने सरयूके किनारे सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए एवं यज्ञकर्ममें दीक्षित रघु नामके ४४ राजाको देखा । उनके पास जाकर उस दैत्यने कहा— मुझसे संग्राम करो, नहीं तो यज्ञ करना बंद कर दो । तुम ४५ देवताओंकी पूजा नहीं कर सकते ॥ ४२–४५ ॥ ब्रह्मन्! मित्रावरुणके पुत्र महातेजस्वी, बुद्धिमान् ४६ और तपस्वियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठने उस दैत्यके पास जाकर कहा— दैत्य! मनुष्योंको जीत लेनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? जो नहीं जीते गये हैं उनको पराजित करो । यदि ४७ तुम ( चढ़ाई कर ) प्रहार करना चाहते हो तो उन यमराजका अवरोध करो । महासुर! वे बलशाली हैं । ४८ तुम्हारा शासन नहीं मानते । उनको जीत लेनेपर समस्त भूतलको पराजित हुआ समझो । वसिष्ठका वह वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ दण्ड धारण करनेवाले धर्मराजको ४ ९ । जीतनेके लिये चल पड़ा ॥ ४६ - ४ ९ ॥ उसे आता हुआ सुनकर तथा संग्राममें वह अवध्य ५० है - ऐसा विचारकर वे यमराज महिषपर सवार होकर भगवान् केशवके पास चले गये । उनके पास जाकर प्रणाम ५१ करनेके पश्चात् ( यमराजने ) मुरके कृत्योंको बताया । उन्होंने कहा- तुम जाकर अभी उस महासुरको मेरे पास भेज दो । वासुदेवके वचनको सुनकर वे शीघ्र चले आये । इतनेमें ५२ मुर दैत्य उनकी नगरीमें आया । उसके आनेपर यमने कहा - हे मुर! बतलाओ तुम क्या करना चाहते हो? ५३ दानवेश्वर! मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा ॥ ५०–५३ ॥ मुरु या मुरने कहा - यम! तुम प्रजाओंके ऊपर ५४ | नियन्त्रण करना बंद कर दो, नहीं तो मैं तुम्हारा सिर
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२८० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६०
तमाह धर्मराड् ब्रह्मन् यदि मां संयमाद् भवान् ।
गोपायति मुरो सत्यं करिष्ये वचनं तव ॥
मुरस्तमाह भवतः कः संयन्ता वदस्व माम् ।
अहमेनं पराजित्य वारयामि न संशयः ॥
मस्तं प्राह मां विष्णुर्देवश्चक्रगदाधरः ।
श्वेतद्वीपनिवासी यः स मां संयमतेऽव्ययः ॥
तमाह दैत्यशार्दूलः क्वासौ वसति दुर्जयः ।
स्वयं तत्र गमिष्यामि तस्य संयमनोद्यतः ॥
तमुवाच यमो गच्छ क्षीरोदं नाम सागरम् ।
तत्रास्ते भगवान् विष्णुर्लोकनाथो जगन्मयः ॥
मुरस्तद्वाक्यमाकर्ण्य प्राह गच्छामि केशवम् ।
किंतु त्वया न तावद्धि संयम्या धर्म मानवाः ॥
स प्राह गच्छ त्वं तावत् प्रवर्तिष्ये जयं प्रति ।
संयन्तुर्वा यथा स्याद्धि ततो युद्धं समाचर ॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं दुग्धाब्धिमगमन्मुरः ।
यत्रास्ते शेषपर्यङ्के चतुर्मूर्तिर्जनार्दनः ॥
नारद उवाच
चतुर्मूर्त्तिः कथं विष्णुरेक एव निगद्यते ।
सर्वगत्वात् कथमपि अव्यक्तत्वाच्च तद्वद ॥
पुलस्त्य उवाच
अव्यक्तः सर्वगोऽपीह एक एव महामुने ।
चतुर्मूर्त्तिर्जगन्नाथो यथा ब्रह्मंस्तथा शृणु ॥
अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं शुक्लं शान्तं परं पदम् ।
वासुदेवाख्यमव्यक्तं स्मृतं द्वादशपत्रकम् ॥
नारद उवाच
कथं शुक्लं कथं शान्तमप्रतर्क्यमनिन्दितम् ।
कान्यस्य द्वादशैवोक्ता पत्रका तानि मे वद ॥
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्व गुह्यं परमं परमेष्ठिप्रभाषितम् ।
श्रुतं सनत्कुमारेण तेनाख्यातं च तन्मम ॥
काटकर पृथ्वीपर फेंक दूँगा । ब्रह्मन्! धर्मराजने उससे ५५ कहा - यदि तुम मेरे ऊपर संयम करनेवालेसे मेरी रक्षा कर सको तो मैं सत्य कहता हूँ कि तुम्हारे वचनका पालन करूँगा । मुरने उनसे कहा- मुझे बतलाओ कि ५६ तुम्हारा संयन्ता ( शासक ) कौन है? मैं निस्सन्देह उसे पराजित कर रोक दूँगा । यमने उससे कहा- जो श्वेतद्वीप निवासी, चक्र - गदा धारण करनेवाले, अविनाशी भगवान् ५७ विष्णु हैं, वे ही मुझे शासित करते हैं॥५४–५७ ॥ दैत्योंमें श्रेष्ठ मुरने यमराजसे कहा — यम! वह कहाँ ५८ रहता है, जिसे कठिनतासे जीता जा सकता है? उसका संयमन करनेके लिये मैं तैयार होकर वहाँ स्वयं जाऊँगा । यमराजने उससे कहा- तुम क्षीरसागरमें जाओ । वहाँ ५ ९ लोकस्वामी जगन्मूर्ति भगवान् विष्णु रहते हैं । मुरने उनकी बात सुनकर कहा- धर्मराज! मैं केशवके पास जा रहा हूँ, ६० परंतु तुम तबतक मनुष्योंका नियमन मत करना । उस ( मुर ) - ने कहा- तुम जाओ । तबतक मैं तुम्हारे नियामकको जैसे भी हो जीतनेका प्रयत्न करूँगा । उसके बाद तुम युद्ध ६१ करना । इतना कहकर मुरु या मुर दैत्य क्षीरसागरमें जा पहुँचा । वहाँ ( जाकर उसने देखा कि ) चतुर्भुजाधारी जनार्दन ६२ अनन्त नागकी शय्यापर ( पड़े हुए ) हैं ॥ ५८- ६२ ॥ नारदजीने पूछा- आप ( कृपया ) यह बतलायें कि विष्णु एक होनेपर भी चतुर्मूर्ति क्यों कहे जाते हैं । क्या सर्वगत एवं अव्यक्त होनेके कारण तो नहीं कहा ६३ जाता? ( आप ) उसे कहें ॥ ६३ ॥
पुलस्त्यजी बोले- ब्रह्मन्! अव्यक्त एवं सर्वव्यापी होनेपर भी वे एक ही हैं । जिस कारणसे जगन्नाथ चतुर्मूर्ति कहे जाते हैं, उसे बताता हूँ, सुनो । वासुदेव नामक श्रेष्ठ पद ६४ ( तर्क या अनुमानद्वारा अज्ञेय ) एवं निर्देश किये जानेमें अशक्य, शुक्ल ( शुद्ध ), शान्तियुक्त, अव्यक्त ( अप्रकट ) एवं द्वादशपत्रक ( ' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' - ) द्वादशाक्षर ६५ मन्त्रवाला कहा गया है ॥ ६४-६५ ॥ नारदजीने [ पुनः ] पूछा- किस प्रकार वे शुक्ल, शान्त, अप्रतर्क्स एवं अनिन्दित हैं? मुझे बतलाइये कि ६६ उनके कथित द्वादशपत्रक कौन हैं ॥ ६६ ॥
पुलस्त्यजी बोले- पितामह ब्रह्माने जिस परम । गुह्य वचनको कहा है, उसे सुनिये । सनत्कुमारने उसे ६७ । सुना था और उन्होंने मुझसे कहा था ॥ ६७ ॥