वामन पुराण — पृष्ठ 291–300
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300
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अध्याय ६० ] पुनः तेजः प्राप्तिके लिये नारद उवाच कोऽयं सनत्कुमारेति यस्योक्तं ब्रह्मणा स्वयम् तवापि तेन गदितं वद मामनुपूर्वशः पुलस्त्य उवाच धर्मस्य भार्याहिंसाख्या तस्यां पुत्रचतुष्टयम् संजातं मुनिशार्दूल योगशास्त्रविचारकम् ज्येष्ठः सनत्कुमारोऽभूद् द्वितीयश्च सनातनः तृतीयः सनको नाम चतुर्थश्च सनन्दनः सांख्यवेत्तारमपरं कपिलं वोढुमासुरिम् । दृष्ट्वा पञ्चशिखं श्रेष्ठं योगयुक्तं तपोनिधिम् ज्ञानयोगं न ते दद्युर्ज्यायांसोऽपि कनीयसाम् । मानमुक्तं महायोगं कपिलादीनुपासतः सनत्कुमारश्चाभ्येत्य ब्रह्माणं कमलोद्भवम् । अपृच्छद् योगविज्ञानं तमुवाच प्रजापतिः ब्रह्मोवाच कथयिष्यामि ते साध्य यदि पुत्रत्वमिच्छसि यस्य कस्य न वक्तव्यं तत्सत्यं नान्यथेति हि सनत्कुमार उवाच पुत्र एवास्मि देवेश यतः शिष्योऽस्म्यहं विभो । न विशेषोऽस्ति पुत्रस्य शिष्यस्य च पितामह ब्रह्मोवाच विशेषः शिष्यपुत्राभ्यां विद्यते धर्मनन्दन धर्मकर्मसमायोगे तथापि गदतः शृणु पुन्नाम्नो नरकात् त्राति पुत्रस्तेनेह गीयते शेषपापहरः शिष्य इतीयं वैदिकी श्रुतिः सनत्कुमार उवाच कोऽयं पुन्नामको देव नरकात् त्राति पुत्रकः कस्माच्छेषं ततः पापं हरेच्छिष्यश्च तद्वद ब्रह्मोवाच एतत् पुराणं परमं मह योगाङ्गयुक्तं च सदैव यच्च । तथैव चोग्रं भयहारि मानवं वदामि ते साध्य निशामयैनम् शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि २८१ नारदजीने [ फिर ] कहा- इस विषयमें स्वयं ब्रह्माने । जिनसे कहा है, वे सनत्कुमार कौन हैं? और उन्होंने ॥ ६८ भी आपसे जो कहा है उसे क्रमशः मुझसे कहें ॥ ६८ ॥
पुलस्त्यजी बोले - धर्मकी पत्नी अहिंसा है ॥ उससे चार पुत्र हुए । मुनिश्रेष्ठ! वे सभी योगशास्त्र के विचार ॥ ६ ९ करनेमें कुशल थे । उनमें सनत्कुमार ज्येष्ठ, सनातन । द्वितीय, सनक तृतीय एवं चतुर्थ सनन्दन हुए । वे सभी ॥ ७० सांख्यवेत्ता कपिल, वोढु, आसुरी एवं योगसे युक्त तपोनिधि श्रेष्ठ पञ्चशिख नामक ( ऋषि ) - को देखकर ॥ ७१ उनके पास गये । बड़े होनेपर भी उन लोगोंने अपनेसे छोटोंको ज्ञानयोगका उपदेश नहीं दिया । कपिल आदिकी ॥ ७२ उपासना करनेवालोंको महायोगका परिणाममात्र बतला दिया । सनत्कुमारने कमलोद्भव ब्रह्माके पास जाकर योग-॥ ७३ विज्ञान पूछा । प्रजापतिने उनसे कहा ॥ ६ ९ –७३ ॥ ब्रह्माने कहा — साध्य! यदि तुम पुत्र होना चाहो । तो मैं तुमसे कहूँगा । उसे जिस किसीसे नहीं कहना ॥ ७४ चाहिये; क्योंकि यह सत्य है, अन्यथा नहीं है ॥७४ ॥
सनत्कुमारने कहा – देवेश! मैं पुत्र ही हूँ; । क्योंकि विभो! मैं शिष्य हूँ । पितामह! पुत्र और शिष्यमें ॥ ७५ कोई भेद नहीं होता ॥ ७५ ॥
ब्रह्माने कहा – धर्मनन्दन! शिष्य और पुत्रमें । धर्म - कर्मके संयोगमें ( जो ) कुछ भेद होता है उसे ॥ ७६ बताता हूँ, मुझसे सुनो । यह वैदिकी श्रुति है - जो ' पुम् ' नामक नरकसे उद्धार कर देता है उसे ' पुत्र ' कहा जाता । है और शेष पापोंका हरण करनेवाला होनेसे ' शिष्य ' ॥ ७७ कहा जाता है ( — यही दोनोंमें भेद है ) ॥ ७६-७७ ॥ सनत्कुमारने कहा ( पूछा ) – देव! वह ' पुम् ' । नामक नरक कौन है? जिस नरकसे पुत्र रक्षा करता ॥ ७८ है और शिष्य किससे अवशिष्ट पापका हरण करता है; आप कृपया इन्हें बतलाइये ॥ ७८ ॥
ब्रह्माने कहा - महर्षे! मैं तुमको अत्यन्त प्राचीन, योगाङ्गसे युक्त, उग्र भय दूर करनेवाली परम पवित्र
॥ ७ ९ । कथा सुनाता हूँ । हे साध्य! तुम इसे सुनो ॥ ७ ९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें साठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६० ॥
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२८२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६१ इकसठवाँ अध्याय पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र- शिष्यकी सनत्कुमार - ब्रह्माका प्रसंग, ब्रह्मोवाच
परदाराभिगमनं पापीयांसोपसेवनम् ।
पारुष्यं सर्वभूतानां प्रथमं नरकं स्मृतम् ॥
फलस्तेयं महापापं फलहीनं तथाऽटनम् ।
छेदनं वृक्षजातीनां द्वितीयं नरकं स्मृतम् ॥
वर्ज्यादानं तथा दुष्टमवध्यवधबन्धनम् ।
विवादमर्थहेतूत्थं तृतीयं नरकं स्मृतम् ॥
भयदं सर्वसत्त्वानां भवभूतिविनाशनम् ।
भ्रंशनं निजधर्माणां चतुर्थं नरकं स्मृतम् ॥
मारणं मित्रकौटिल्यं मिथ्याऽभिशपनं च यत् । विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, चतुर्मूर्तिका वर्णन और मुरु - वध ब्रह्माने कहा — परस्त्रीसे संगत होना, पापियोंके साथ रहना और सब प्राणियोंके प्रति ( किसी भी १ प्राणीके साथ ) कठोरताका व्यवहार करना पहला नरक कहा गया है । फलोंकी चोरी, ( अच्छे ) उद्देश्यसे रहित घूमना ( अवारापन ) एवं वृक्ष आदि वनस्पतियोंका काटना घोर पाप तथा दूसरा नरक कहा गया है । २ दोषयुक्त एवं वर्जित — ग्रहण न करने योग्य – वस्तुओंका लेना, जो वधके योग्य नहीं है उसे मारना अथवा बन्धनमें डालना ( बन्दी बनाना ) और अर्थ ( धन-रुपये - पैसे ) -के लिये किया जानेवाला विवाद ( मुकदमा ३ उठाना ) तीसरा नरक होता है । सभी प्राणियोंको भय देना, संसारकी सार्वजनिक सम्पत्तिको नष्ट करना तथा अपने नियत धर्म - नियमोंसे विचलित होना चौथे प्रकारका ४ नरक कहलाता है ॥१–४ ॥ पुरश्चरण आदि तान्त्रिक अभिचारोंसे किसीको मिष्काशनमित्युक्तं पञ्चमं तु नृपाचनम् ॥५ मारना, मृत्यु - जैसा अपार कष्ट देना तथा मित्रके साथ
पत्रफलादिहरणं यमनं योगनाशनम् ।
यानयुग्यस्य हरणं षष्ठमुक्तं नृपाचनम् ॥
राजभागहरं मूढं राजजायानिषेवणम् ।
राज्ये त्वहितकारित्वं सप्तमं निरयं स्मृतम् ॥
लुब्धत्वं लोलुपत्वं च लब्धधर्मार्थनाशनम् ।
लालासंकीर्णमेवोक्तमष्टमं नरकं स्मृतम् ॥
विप्रोष्यं ब्रह्महरणं ब्राह्मणानां विनिन्दनम् ।
विरोधं बन्धुभिश्चोक्तं नवमं नरपाचनम् ॥
छल - छद्म, झूठी शपथ और अकेले मधुर पदार्थ खाना पाँचवाँ नरक कहा जाता है । पत्र ( पुष्प आदि ) एवं फल चोराना, किसीको बाँध ( बन्धुवा बनाये ) रखना, किसीके ६ प्राप्तव्यकी प्राप्तिमें विघ्न - बाधा डालकर उसे नष्ट कर देना, घोड़ा गाड़ी आदि सवारीके जूए ( आदि सामानों ) -की चोरी कर लेना छठा पाप कहा गया है । भुलावेमें | पड़कर राजाके अंशका चुरा लेना एवं मूर्खतावश साहस ७ कर राजपत्नीका संसर्ग एवं राज्यका अमङ्गल ( नुकसान ) करना सातवाँ नरक कहा जाता है । किसी वस्तु या व्यक्तिपर लुभा जाना, लालच करना, पुरुषार्थसे प्राप्त धर्मयुक्त अर्थका विनाश करना और लारमिली वाणीको ८ । आठवाँ नरक कहते हैं ॥ ५–८ ॥ ब्राह्मणको देशसे निकाल देना, ब्राह्मणका धन ९ | चुराना, ब्राह्मणोंकी निन्दा करना तथा बन्धुओंसे विरोध
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अध्याय ६१ ] पुन्नामनरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्टाचारविनाशं च शिष्टद्वेषं शिशोर्वधम् । शास्त्रस्तेयं धर्मनाशं दशमं परिकीर्तितम् ॥
षडङ्गनिधनं घोरं षाड्गुण्यप्रतिषेधनम् ।
एकादशममेवोक्तं नरकं सद्भिरुत्तमम् ॥
सत्सु नित्यं सदा वैरमनाचारमसत्क्रिया ।
संस्कारपरिहीनत्वमिदं द्वादशमं स्मृतम् ॥
हानिर्धर्मार्थकामानामपवर्गस्य हारणम् ।
संभेदः संविदामेतत् त्रयोदशममुच्यते ॥
कृपणं धर्महीनं च यद् वर्ज्यं यच्च वह्निदम् ।
चतुर्द्दशममेवोक्तं नरकं तद् विगर्हितम् ॥
अज्ञानं चाप्यसूयत्वमशौचमशुभावहम् ।
स्मृतं तत् पञ्चदशममसत्यवचनानि च ॥
आलस्यं वै षोडशममाक्रोशं च विशेषतः ।
सर्वस्य चाततायित्वमावासेष्वग्निदीपनम् ॥
इच्छा च परदारेषु नरकाय निगद्यते ।
ईर्ष्याभावश्च सत्येषु उद्वृत्तं तु विगर्हितम् ॥
एतैस्तु पापैः पुरुषः पुन्नामाद्यैर्न संशयः ।
संयुक्तः प्रीणयेद् देवं संतत्या जगतः पतिम् ॥
प्रीतः सृष्ट्या तु शुभया स पापाद् येन मुच्यते ।
पुन्नामनरकं घोरं विनाशयति सर्वतः ॥
एतस्मात् कारणात् साध्य सुतः पुत्रेति गद्यते ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि शेषपापस्य लक्षणम् ॥
ऋणं देवर्षिभूतानां मनुष्याणां विशेषतः ।
पितॄणां च द्विजश्रेष्ठ सर्ववर्णेषु चैकता ॥
ओंकारादपि निर्वृत्तिः पापकार्यकृतश्च यः ।
मत्स्यादश्च महापापमगम्यागमनं तथा ॥
घृतादिविक्रयं घोरं चण्डालादिपरिग्रहः ।
स्वदोषाच्छादनं पापं परदोषप्रकाशनम् ॥
मत्सरित्वं वाग्दुष्टत्वं निष्ठुरत्वं तथा परम् ।
टाकित्वं तालवादित्वं नाम्ना वाचाऽप्यधर्मजम् ॥
शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन २८३ । करना नवाँ नरक कहा जाता है । शिष्टाचारका नाश, १० शिष्टजनोंसे विरोध, नादान बालककी हत्या, शास्त्रग्रन्थोंकी चोरी तथा स्वधर्मका नाश करना दसवाँ नरक कहा जाता है । षडङ्गनिधन अर्थात् छः अङ्गोंवाली वेद - विद्याको नष्ट करना और षाड्गुण्य अर्थात् सन्धि विग्रह, यान, आसन-११ द्वैधीभाव, समाश्रय ( राजनीति - गुणों ) -का प्रतिषेध ग्यारहवाँ घोर नरक कहा गया है । सज्जनोंसे सदा वैर - भाव, आचारसे रहित रहना, बुरे कार्यमें लगे रहना एवं संस्कार-१२ विहीनताको बारहवाँ नरक कहा गया है ॥ ९ –१२ ॥ धर्म, अर्थ एवं सत्कामनाकी हानि, मोक्षका नाश १३ एवं इनके समन्वयमें विरोध उत्पन्न करनेको तेरहवाँ नरक कहा जाता है । कृपण, धर्महीन, परित्याज्य एवं १४ । आग लगानेवालेको चौदहवाँ निन्दित नरक कहते हैं । विवेकहीनता, दूसरेके गुणमें दोष निकालना, अमङ्गल करना, अपवित्रता एवं असत्य वचन बोलनेको पंद्रहवाँ १५ नरक कहते हैं । आलस्य करना, विशेष रूपसे क्रोध करना, सभीके प्रति आततायी बन जाना एवं घरमें आग १६ लगाना सोलहवाँ नरक कहलाता है ॥ १३ - १६ ॥ परस्त्रीकी कामना, सत्यके प्रति ईर्ष्या रखना, १७ निन्दित एवं उद्दण्ड व्यवहार करना नरक देनेवाला कहा गया है । इन पुन्नाम आदि पापोंसे युक्त पुरुष १८ ( भी ) निस्सन्देह ' पुत्र ' के द्वारा जगत्पति जनार्दनको प्रसन्न कर सकता है । पापहारी सुसन्ततिसे प्रसन्न होकर भगवान् जनार्दन पुन्नामके घोर नरकको पूर्णतया १ ९ नष्ट कर देते हैं । साध्य! इसीलिये सुतको ‘ पुत्र ' कहा जाता है । अब इसके बाद मैं शेष पापोंका लक्षण २० बतलाता हूँ ॥१७ –२० ॥ द्विजश्रेष्ठ! देवऋण, ऋषिऋण, प्राणियोंके ग्रहण-२१ विशेषतः मनुष्यों एवं पितरोंका ऋण, सभी वर्णोंको एक समझना, ॐकारके उच्चारणमें उपेक्षा भाव रखना, पापकामोंका करना, मछली खाना तथा अगम्या स्त्रीसे २२ संगत होना - ये महापाप हैं । घृत - तैल आदिका बेचना, चाण्डाल आदिसे दान लेना, अपना दोष छिपाना और २३ दूसरेका दोष प्रकट करना – ये घोर पाप । दूसरेका उत्कर्ष देखकर जलना, कड़वी बात बोलना, निर्दयपना, २४ | नाम कहने से भी अधर्मजनक टाकिता और तालवादिता,
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दारुणत्वमधार्मिक्यं नरकावहमुच्यते ।
एतैश्च पापैः संयुक्तः प्रीणयेद् यदि शङ्करम् ॥
ज्ञानाधिकमशेषेण शेषपापं जयेत् ततः ।
शारीरं वाचिकं यत् तु मानसं कायिकं तथा ॥
पितृमातृकृतं यच्च कृतं यच्चाश्रितैर्नरैः ।
भ्रातृभिर्बान्धवैश्चापि तस्मिञ्जन्मनि धर्मज ॥
तत्सर्वं विलयं याति स धर्मः सुतशिष्ययोः ।
विपरीते भवेत् साध्य विपरीतः पदक्रमः ॥
तस्मात् पुत्रश्च शिष्यश्च विधातव्यौ विपश्चिता ।
एतदर्थमभिध्याय शिष्याच्छ्रेष्ठतरः सुतः ।
शेषात् तारयते शिष्यः सर्वतोऽपि हि पुत्रकः ॥
पुलस्त्य उवाच पितामहवचः श्रुत्वा साध्यः प्राह तपोधनः । त्रिः सत्यं तव पुत्रोऽहं देव योगं वदस्व मे तमुवाच महायोगी त्वन्मातापितरौ यदि । दास्येते च ततः सूनुर्दायादो मेऽसि पुत्रक सनत्कुमारः प्रोवाच दायादपरिकल्पना । ये हि भवता प्रोक्ता तां मे व्याख्यातुमर्हसि तदुक्तं साध्यमुख्येन वाक्यं श्रुत्वा पितामहः प्राह प्रहस्य भगवाञ्शृणु वत्सेति नारद ब्रह्मोवाच औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६१ भयङ्करता तथा अधार्मिकताके कार्य नरकके कारण हैं । २५ | इन पापोंसे युक्त मनुष्य ( भी ) यदि परमज्ञानी शङ्करको ( अपनी आराधनासे ) संतुष्ट कर लेता है तो शेष पापोंको वह पूर्णरूपसे जीत लेता है । धर्मपुत्र! उस २६ जन्ममें किये गये ( अपने ) सभी कायिक, वाचिक एवं मानसिक कर्म तथा माता - पिता एवं आश्रितजनों और भाइयों एवं बान्धवोंद्वारा किये गये कर्म भी विलीन हो २७ जाते हैं । साध्य! सुत और शिष्यका यही धर्म है । इसके विपरीत होनेपर विपरीत गति प्राप्त होती है, २८ अतएव विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि पुत्र और शिष्यकी ( परम्परा ) बनाये रखे । इसी अभिप्रायकी दृष्टिसे शिष्यकी अपेक्षा पुत्र अत्यन्त श्रेष्ठ होता है कि शिष्य केवल शेष पापोंसे मुक्त करता है और पुत्र २ ९ । सम्पूर्ण पापोंसे बचा लेता है । २१ - २ ९ ॥ पुलस्त्यजी बोले – पितामहकी बात सुनकर साध्य तपोधन सनत्कुमारने कहा- देव! मैं तीन बार ॥ ३० सत्यका उच्चारण करके कहता हूँ कि मैं आपका पुत्र हूँ । अतः मुझे आप योगका उपदेश दीजिये । तब महायोगी पितामहने उनसे कहा - पुत्र! तुम्हारे माता-॥ ३१ पिता यदि तुमको मुझे दे दें तो तुम मेरे ( स्वत्वप्राप्तिमें अधिकृत ) ' दायाद ' ( भागीदार ) पुत्र हो जाओगे । सनत्कुमारने कहा - भगवन्! आपने जो यह ' दायाद ' ॥ ३२ शब्द कहा है उसका अर्थ क्या है? ( कृपया ) उसकी विवेचना कीजिये । नारदजी! भगवान् पितामह साध्य-। प्रधान सनत्कुमारका वचन सुनकर हँसते हुए बोले-॥ ३३ वत्स! सुनो ॥ ३०–३३ ॥ ब्रह्माने कहा - औरस, क्षेत्रज, दत्त, कृत्रिम, । गूढोत्पन्न और अपविद्ध - ये छः बान्धव दायाद गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवास्तु षट् ॥ ३४ अर्थात् ( दायभागके अधिकारी ) होते हैं । इन छ: अमीषु षट्सु पुत्रेषु ऋणपिण्डधनक्रियाः गोत्रसाम्यं कुले वृत्तिः प्रतिष्ठा शाश्वती तथा कानीनश्च सहोढश्च क्रीतः पौनर्भवस्तथा स्वयंदत्तः पारशवः षड्दायादबान्धवाः अमीभिरृणपिण्डादिकथा नैवेह विद्यते नामधारका एवेह न गोत्रकुलसंमताः । पुत्रोंसे ऋण, पिण्ड, धनकी क्रिया, गोत्रसाम्य, कुलवृत्ति ॥ ३५ और स्थिर प्रतिष्ठा रहती है । ( इसके अतिरिक्त ) कानीन, सहोढ, क्रीत, पौनर्भव, स्वयंदत्त और पारशव-। ये छः दायाद - बान्धव कहे जाते हैं । इनके द्वारा ॥ ३६ ऋण एवं पिण्ड आदिका कार्य नहीं होता । ये केवल । नामधारी होते हैं । ये गोत्र एवं कुलसे सम्मत ॥ ३७ | नहीं होते ॥ ३४–३७ ॥
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अध्याय ६१ ] पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र- शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन २८५ तत् तस्य वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः सनकाग्रजः उवाचैषां विशेषं मे ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्विशेषं शृणु पुत्रक औरसो यः स्वयं जातः प्रतिबिम्बमिवात्मनः क्लीबोन्मत्ते व्यसनिनि पत्यौ तस्याज्ञया तु या भार्या नातुरा पुत्रं जनयेत् क्षेत्रजस्तु सः मातापितृभ्यां यो दत्तः स दत्तः परिगीयते मित्रपुत्रं मित्रदत्तं कृत्रिमं प्राहुरुत्तमाः न ज्ञायते गृहे केन जातस्त्विति स गूढकः बाह्यतः स्वयमानीतः सोऽपविद्धः प्रकीर्तितः कन्याजातस्तु कानीनः सगर्भोढः सहोढकः मूल्यैर्गृहीतः क्रीतः स्याद् द्विविधः स्यात् पुनर्भवः दत्त्वैकस्य च या कन्या हृत्वाऽन्यस्य प्रदीयते तज्जातस्तनयो ज्ञेयो लोके पौनर्भवो मुने दुर्भिक्षे व्यसने चापि येनात्मा विनिवेदितः स स्वयंदत्त इत्युक्तस्तथान्यः कारणान्तरैः ब्राह्मणस्य सुतः शूद्र्यां जायते यस्तु सुव्रत ऊढायां वाप्यनूढायां स पारशव उच्यते एतस्मात् कारणात् पुत्र न स्वयं दातुमर्हसि स्वमात्मानं गच्छ शीघ्रं पितरौ समुपाह्वय ततः स मातापितरौ सस्मार वचनाद् विभोः तावाजग्मतुरीशानं द्रष्टुं वै दम्पती मुने धर्मोऽहिंसा च देवेशं प्रणिपत्य न्यषीदताम् उपविष्टौ सुखासीनौ साध्यो वचनमब्रवीत् ॥ । सनत्कुमारने उनकी बात सुनकर ( पुनः ) कहा— ॥ ३८ ब्रह्मन्! आप इन सभीका विशेष लक्षण मुझे बतलाइये । उसके पश्चात् देवोंके स्वामी ब्रह्माने कहा - पुत्र! इन्हें । मैं विशेषरूपसे बतलाता हूँ; सुनो - अपने द्वारा उत्पन्न ॥ ३ ९ किया गया पुत्र ' औरस ' कहलाता है । यह अपना ही प्रतिबिम्ब होता है । पतिके नपुंसक, उन्मत्त ( पागल ) या व्यसनी होनेपर उसकी आज्ञासे अनातुरा ( कामवासनासे । रहित ) पत्नी जो पुत्र उत्पन्न करती है, उसे ' क्षेत्रज ' ॥ ४० कहते हैं । माता - पिता यदि दूसरेको अपने पुत्रको सौंप दें तो वह ' दत्तक ' ( या गोद लिया हुआ ) कहा जाता । है । श्रेष्ठजन मित्रके पुत्र और मित्रद्वारा दिये गये पुत्रको ॥ ४१ ' कृत्रिम पुत्र ' कहते हैं॥३८–४१ ॥ । वह पुत्र ' गूढ ' होता है, जिसके विषयमें यह ज्ञान ॥ ४२ न हो कि गृहमें किसके द्वारा वह उत्पन्न हुआ है । बाहरसे स्वयं लाये हुए पुत्रको ' अपविद्ध ' कहते हैं । कुमारी कन्या गर्भसे उत्पन्न पुत्रका नाम ' कानीन ' । होता है । गर्भिणी कन्यासे विवाहके बाद उत्पन्न पुत्रको ॥ ४३ ' सहोढ ' कहते हैं । मूल्य देकर खरीदा हुआ पुत्र ' क्रीत ' पुत्र कहलाता है । ' पुनर्भव ' पुत्र दो प्रकारका होता है । एक कन्याको एक पतिके हाथमें देकर । ॥ ४४ पुनः उससे छीनकर दूसरे पतिके हाथमें देनेपर जो पुत्र उत्पन्न होता है उसे ' पौनर्भव ' पुत्र कहते हैं । दुर्भिक्ष, व्यसन या अन्य किसी कारणसे जो स्वयंको ( किसी । दूसरेके हाथमें ) समर्पित कर देता है उसे ' स्वयंदत्त ' पुत्र ॥ ४५ | कहते हैं ॥ ४२-४५ ॥ । सुव्रत! व्याही गयी या क्वाँरी अविवाहित शूद्राके ॥ ४६ । गर्भसे ब्राह्मणका जो पुत्र होता है उसका नाम ' पारशव ' पुत्र है । पुत्र! इन कारणोंसे तुम स्वयं आत्मदान नहीं । कर सकते । अतः शीघ्र जाकर अपने माता - पिताको ॥ ४७ बुला लाओ । [ पुलस्त्यजी कहते हैं - ] मुने! इसके । बाद सनत्कुमारने विभु ब्रह्माके कहनेसे अपने माता-पिताका स्मरण किया । नारदमुनि! वे दम्पति पितामहका ॥ ४८ दर्शन करनेके लिये वहाँ आ गये । धर्म और अहिंसा-। दोनों ब्रह्माको प्रणाम कर बैठ गये । उनके सुखसे बैठ ४ ९ । जानेपर सनत्कुमारने यह वचन कहा ॥ ४६–४९ ॥
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२८६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६१ सनत्कुमार उवाच
योगं जिगमिषुस्तात ब्रह्माणं समचूचुदम् ।
स चोक्तवान् मां पुत्रार्थे तस्मात् त्वं दातुमर्हसि ॥
तावेवमुक्तौ पुत्रेण योगाचार्यं पितामहम् ।
उक्तवन्तौ प्रभोऽयं हि आवयोस्तनयस्तव ॥
अद्यप्रभृत्ययं पुत्रस्तव ब्रह्मन् भविष्यति ।
इत्युक्त्वा जग्मतुस्तूर्णं येनैवाभ्यागतौ यथा ॥
पितामहोऽपि तं पुत्रं साध्यं सद्विनयान्वितम् ।
सनत्कुमारं प्रोवाच योगं द्वादशपत्रकम् ॥
शिखासंस्थं तु ओङ्कारं मेषोऽस्य शिरसि स्थितः ।
मासो वैशाखनामा च प्रथमं पत्रकं स्मृतम् ॥
नकारो मुखसंस्थो हि वृषस्तत्र प्रकीर्तितः ।
ज्येष्ठमासश्च तत्पत्रं द्वितीयं परिकीर्तितम् ॥
मोकारो भुजयोर्युग्मं मिथुनस्तत्र संस्थितः ।
मासो आषाढनामा च तृतीयं पत्रकं स्मृतम् ॥
भकारं नेत्रयुगलं तत्र कर्कटकः स्थितः ।
मासः श्रावण इत्युक्तश्चतुर्थं पत्रकं स्मृतम् ॥
गकारं हृदयं प्रोक्तं सिंहो वसति तत्र च ।
मासो भाद्रस्तथा प्रोक्तः पञ्चमं पत्रकं स्मृतम् ॥
वकारं कवचं विद्यात् कन्या तत्र प्रतिष्ठिता ।
मासश्चाश्वयुजो नाम षष्ठं तत् पत्रकं स्मृतम् ॥
तेकारमस्त्रग्रामं च तुलाराशिः कृताश्रयः ।
मासश्च कार्तिको नाम सप्तमं पत्रकं स्मृतम् ॥
वाकारं नाभिसंयुक्तं स्थितस्तत्र तु वृश्चिकः ।
मासो मार्गशिरो नाम त्वष्टमं पत्रकं स्मृतम् ॥
सुकारं जघनं प्रोक्तं तत्रस्थश्च धनुर्धरः ।
पौषेति गदितो मासो नवमं परिकीर्तितम् ॥
देकारश्चोरुयुगलं मकरोऽप्यत्र संस्थितः ।
माघो निगदितो मास: पत्रकं दशमं स्मृतम् ॥
वाकारो जानुयुग्मं च कुम्भस्तत्रादिसंस्थितः ।
पत्रकं फाल्गुनं प्रोक्तं तदेकादशमुत्तमम् ॥
पादौ यकारो मीनोऽपि स चैत्रे वसते मुने ।
इदं द्वादशमं प्रोक्तं पत्रं वै केशवस्य हि ॥
द्वादशारं तथा चक्रं षण्णाभि द्वियुतं तथा । त्रिव्यूहमेकमूर्तिश्च तथोक्तः परमेश्वरः सनत्कुमारने कहा— तात! मैंने योग जाननेके लिये पितामहसे प्रार्थना की थी । उन्होंने मुझसे अपना ५० पुत्र होनेके लिये कहा था । अतः आप मुझे प्रदान कर दें । पुत्रके इस प्रकार कहनेपर उन दोनों योगाचार्योंने ५१ पितामहसे कहा - प्रभो! हम दोनोंका यह पुत्र आपका हो । ब्रह्मन्! आजसे यह पुत्र आपका होगा । इतना कहकर वे शीघ्र ही जिस मार्गसे आये थे उसीसे ५२ फिर चले गये । पितामहने भी उस विनयी पुत्र सनत्कुमारको द्वादशपत्रयोगका उपदेश किया ( जो ५३ आगे वर्णित है - ) ॥५०–५३ ॥ इन ( भगवान् वासुदेव ) की शिखामें स्थित ५४ ' ओङ्कार ', सिरपर स्थित मेष राशि और वैशाखमास— ये इनके प्रथम पत्रक हैं । मुखमें स्थित ' न ' अक्षर और ५५ वहींपर विद्यमान वृषराशि तथा ज्येष्ठमास - ये उनके । द्वितीय पत्रक कहे गये हैं । दोनों भुजाओंमें स्थित ' मो ' ५६ अक्षर, मिथुनराशि एवं आषाढ़ मास - ये उनके तृतीय पत्रक हैं । उनके नेत्रद्वयमें विद्यमान ' भ ' अक्षर कर्कराशि ५७ और श्रावणमास - ये चतुर्थ पत्रक हैं ॥ ५४–५७ ॥ ( उनके ) हृदयके रूपमें विद्यमान ' ग'अक्षर, ५८ । सिंहराशि और भाद्रपदमास - ये पञ्चम पत्रक हैं । ( उनके ) कवचके रूपमें विद्यमान ' व ' अक्षर, कन्याराशि और ५ ९ आश्विनमास - ये षष्ठ पत्रक हैं । ( उनके ) अस्त्र - समूहके रूपमें विद्यमान ‘ ते’अक्षर, तुलाराशि और कार्तिकमास— ६० ये सप्तम पत्रक हैं । मुने! ( उनके ) नाभिरूपसे विद्यमान ' वा ' अक्षर वृश्चिकराशि और मार्गशीर्षमास - ये अष्टम
६१ पत्रक हैं । ५८- ६१ ॥
( उनके ) जघनरूपमें विद्यमान ' सु ' अक्षर, धनुराशि ६२ और पौषमास - ये नवम पत्रक हैं । ( उनके ) ऊरु-युगलरूपमें विद्यमान ' दे ' अक्षर, मकरराशि और माघमास-६३ ये दशम पत्रक हैं । ( उनके ) दोनों घुटनोंके रूपमें विद्यमान ' वा'अक्षर, कुम्भराशि और फाल्गुनमास - ये ६४ एकादश पत्रक हैं । ( उनके ) चरणद्वयरूपमें विद्यमान
' य ' अक्षर, मीनराशि और चैत्रमास - ये द्वादश पत्रक हैं ।
६५ ये ही केशवके द्वादश पत्र हैं ॥ ६२–६५ ॥
उनका चक्र बारह अरों, बारह नाभियों और तीन ॥ ६६ । व्यूहोंसे युक्त है । इस प्रकारकी उन परमेश्वरकी एक
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अध्याय ६१ ] पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-एतत् तवोक्तं देवस्य रूपं द्वादशपत्रकम् । यस्मिञ्ज्ञाते मुनिश्रेष्ठ न भूयो मरणं भवेत् ॥
द्वितीयमुक्तं सत्त्वाढ्यं चतुर्वर्णं चतुर्मुखम् ।
चतुर्बाहुमुदाराङ्गं श्रीवत्सधरमव्ययम् ॥
तृतीयस्तामसो नाम शेषमूर्तिः सहस्रपात् । सहस्रवदनः श्रीमान् प्रजाप्रलयकारकः चतुर्थो राजसो नाम रक्तवर्णश्चतुर्मुखः । द्विभुजो धारयन् मालां सृष्टिकृच्चादिपूरुषः अव्यक्तात् सम्भवन्त्येते त्रयो व्यक्ता महामुने । अतो मरीचिप्रमुखास्तथान्येऽपि सहस्रशः एतत् तवोक्तं मुनिवर्य रूपं विभोः पुराणं मतिपुष्टिवर्धनम् । चतुर्भुजं तं स मुरुर्दुरात्मा कृतान्तवाक्यात् पुनराससाद तमागतं प्राह मु मधुघ्नः प्राप्तोऽसि केनासुर कारणेन । स प्राह योद्धुं सह वै त्वयाऽद्य तं प्राह भूयः सुरशत्रुहन्ता ॥ मां योद्धुमुपागतोऽसि तत् कम्पते ते हृदयं किमर्थम् । ज्वरातुरस्येव मुहुर्मुहु तन्नास्मि योत्स्ये सह कातरेण इत्येवमुक् मधुसूदनेन मुरुस्तदा स्वे हृदये स्वहस्तम् । कथं क्व कस्येति मुहुस्तथोक्त्वा निपातयामास विपन्नबुद्धिः ॥ हरिश्च चक्रं मृदुलाघवेन मुमोच तद्धृत्कमलस्य शत्रोः । चिच्छेद देवास्तु गतव्यथाभवन् देवं प्रशंसन्ति च पद्मनाभम् ॥ एतत् तवोक्तं मुरदैत्यनाशनं कृतं हि युक्त्या शितचक्रपाणिना । अतः प्रसिद्धिं समुपाजगाम मुरारिरित्येव विभुर्नृसिंहः ॥ शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन २८७ मूर्ति है । मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमसे भगवान्के इस द्वादश-६७ पत्रक ( ' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' – इस ) स्वरूपका वर्णन किया, जिसके जाननेसे पुनः ( जन्म- ) मरण नहीं होता । उनका द्वितीय सत्त्वमय, श्रीवत्सधारी, ६८ अविनाशीस्वरूप चतुर्वर्ण, चतुर्मुख, चतुर्बाहु एवं उदार अङ्गोंसे युक्त है । हजारों पैरों एवं हजारों मुखोंसे सम्पन्न श्रीसंयुक्त तमोगुणमयी उनकी तृतीय शेषमूर्ति ॥ ६ ९ प्रजाओंका प्रलय करती है ॥ ६६-६९ ॥ उनका चतुर्थ रूप राजस है । वह रक्तवर्ण, ॥ ७० चार मुख एवं दो भुजाओंवाला एवं माला धारण किये हुए है । यही सृष्टि करनेवाला आदिपुरुष रूप है । ॥ ७१ महामुने! ये तीन व्यक्त मूर्तियाँ अव्यक्त ( अदृश्य तत्त्व ) -से उत्पन्न होती हैं । इनसे ही मरीचि आदि ऋषि तथा अन्यान्य हजारों पुरुष उत्पन्न हुए हैं । मुनिवर! तुम्हारे सामने मैंने विष्णुके अत्यन्त प्राचीन और मति-पुष्टिवर्द्धक रूपका वर्णन किया है । [ अब आगेकी कथा ॥ ७२ । सुनिये - ] दुरात्मा मुरु यमराजके कहनेसे पुनः उन चतुर्भुज ( विष्णु ) - के पास गया । मुने! मधुसूदनने आये हुए उससे पूछा -असुर! तुम किसलिये आये हो?
उसने कहा – मैं तुम्हारे साथ आज युद्ध करने आया हूँ ।
७३ असुरारि ( विष्णु ) ने फिर उससे कहा ॥ ७०–७३ ॥
यदि तुम मेरे साथ युद्ध करनेके लिये आये हो तो ज्वरसे पीड़ितके सदृश तुम्हारा हृदय बारंबार क्यों
काँप रहा है? मैं तो कातरके साथ युद्ध नहीं करूँगा ।
॥ ७४
मधुसूदनके इस प्रकार कहनेपर ' कैसे, कहाँ? किसका? ' इस प्रकार बार - बार कहते हुए बुद्धिहीन मुरुने अपने हृदयपर हाथ रखा । इसे देखकर हरिने आसानीसे ( अत्यन्त लाघवतासे ) ७५ चक्र निकाला और उस शत्रुके हृदय कमलपर उसे छोड़ दिया ( जिससे उसका हृदय विदीर्ण हो गया ) । उसके बाद सभी देवता सन्तापरहित होकर भगवान् पद्मनाभ ७६ विष्णुकी स्तुति करने लगे । मैंने ( ब्रह्माने ) तुमसे तीक्ष्ण चक्र धारण करनेवाले विष्णुद्वारा ( कौशलसे ) किये गये दैत्यके विनाशका वर्णन किया । इसीसे विभु नृसिंह ७७ । ' मुरारि ' नामसे प्रसिद्ध हुए॥७४–७७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६१ ॥
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२८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६२ बासठवाँ अध्याय शिवके अभिषेक और तप्त - कृच्छ्र- व्रतका उपदेश, हरि - हरके संयोगसे विष्णुके हृदयमें शिवकी संस्थिति, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा, मङ्कणकी कथा और सप्त सारस्वततीर्थका माहात्म्य पुलस्त्य उवाच
ततो मुरारिभवनं समभ्येत्य सुरास्ततः ।
ऊचुर्देवं नमस्कृत्य जगत्संक्षुब्धिकारणम् ॥ १
तच्छ्रुत्वा भगवान् प्राह गच्छामो हरमन्दिरम् ।
स वेत्स्यति महाज्ञानी जगत्क्षुब्धं चराचरम् ॥ २
तथोक्ता वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः ।
जनार्दनं पुरस्कृत्य प्रजग्मुर्मन्दरं गिरिम् ।
न तत्र देवं न वृषं न देवीं न च नन्दिनम् ॥ ३
शून्यं गिरिमपश्यन्त अज्ञानतिमिरावृताः ।
तान् मूढदृष्टीन् संप्रेक्ष्य देवान् विष्णुर्महाद्युतिः ॥ ४
प्रोवाच किं न पश्यध्वं महेशं पुरतः स्थितम् ।
तमूचुर्नैव देवेशं पश्यामो गिरिजापतिम् ॥ ५
न विद्मः कारणं तच्च येन दृष्टिर्हता हि नः ।
तानुवाच जगन्मूर्तिर्यूयं देवस्य सागसः ॥ ६
पापिष्ठा गर्भहन्तारो मृडान्याः स्वार्थतत्पराः ।
तेन ज्ञानविवेको वै हतो देवेन शूलिना ॥ ७
येनाग्रतः स्थितमपि पश्यन्तोऽपि न पश्यथ ।
तस्मात् कायविशुद्ध्यर्थं देवदृष्ट्यर्थमादरात् ॥ ८
तप्तकृच्छ्रेण संशुद्धाः कुरुध्वं स्नानमीश्वरे ।
क्षीरस्त्राने प्रयुञ्जीत सार्द्धं कुम्भशतं सुराः ॥ ९
दधिस्त्राने चतुःषष्टिर्द्वात्रिंशद्धविषोऽर्हणे ।
पञ्चगव्यस्य शुद्धस्य कुम्भाः षोडश कीर्तिताः ॥ १० ।
पुलस्त्यजी ( पुनः ) बोले- उन देव विष्णुभवनमें पहुँचकर उन्हें नमस्कार करनेके बाद जगत्के अशान्त होनेका कारण पूछा । भगवान् विष्णुने उनके प्रश्नको सुनकर कहा- हम सभी लोग शिवजीके पास चलें । वे महान् ज्ञानी हैं । इस चराचर जगत्के व्याकुल होनेका कारण वे जानते होंगे । वासुदेवके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि देवगण जनार्दन भगवान्को आगे कर मन्दरपर्वतपर गये । ( किंतु ) वहाँ उन्होंने न तो महादेवको देखा, न वृषको, न देवी पार्वती और न नन्दीको ही । अज्ञानके अन्धकारमें पड़े हुए उन लोगोंने पर्वतको देवशून्य देखा । ( फिर तो ) महातेजस्वी विष्णुने दर्शन प्राप्त न होनेके कारण चकपकाये हुए देवोंको देखकर कहा- क्या आपलोग सामने स्थित महादेवको नहीं देख रहे हैं? उन्होंने उत्तर दिया- हाँ, हमलोग गिरिजापति देवेशको नहीं देख रहे हैं ॥ १-५ ॥ हमलोग उस कारणको नहीं जानते, जिससे हमारी देखनेकी शक्ति नष्ट हो गयी है । जगन्मूर्ति ( विष्णु ) - ने उनसे कहा- आपलोगोंने देवताओंके साथ अपराध किया है । आपलोग स्वार्थी हैं । आपलोग मृडानीका गर्भ नष्ट करनेके कारण महापापसे ग्रस्त हो गये हैं, इसलिये शूलपाणि महादेवने आपलोगोंके सम्यक् अवबोधको और विचारशक्तिको अपहृत कर लिया है । इस कारण आप सब सामने स्थित ( शङ्कर ) -को देखकर भी नहीं देख रहे हैं । अतः सब लोग विश्वासके साथ शरीरकी पवित्रता और देवका दर्शन प्राप्त करनेके लिये तप्त - कृच्छ्र- व्रतद्वारा पावन होकर स्नान करें । और, हे देवताओ! महादेवको दूधसे स्नान करानेके लिये डेढ़ सौ घड़ोंका प्रयोग करें ॥ ६ - ९ ॥ उनके अभिषेकके लिये दहीके चौंसठ, घीके बत्तीस पञ्चगव्यके शुद्ध सोलह घड़ोंका विधान कहा गया है ।
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अध्याय ६२ ] शिव अभिषेक और तप्तकृच्छ्र- व्रतका उपदेश, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा २८ ९
मधुष्ट जलस्योक्ताः सर्वे ते द्विगुणाः सुराः ।
ततो रोचनया देवमष्टोत्तरशतेन हि ॥
अनुलिम्पेत् कुङ्कुमेन चन्दनेन च भक्तितः ।
बिल्वपत्रैः सकमलैः धत्तूरसुरचन्दनैः ॥
मन्दारैः पारिजातैश्च अतिमुक्तैस्तथाऽर्चयेत् ।
अगुरुं सह कालेयं चन्दनेनापि धूपयेत् ॥
जप्तव्यं शतरुद्रीयं ऋग्वेदोक्तैः पदक्रमैः ।
एवं कृते तु देवेशं पश्यध्वं नेतरेण च ॥
इत्युक्ता वासुदेवेन देवाः केशवमब्रुवन् ।
विधानं तप्तकृच्छ्रस्य कथ्यतां मधुसूदन ।
यस्मिश्चीर्णे कायशुद्धिर्भवते सार्वकालिकी ॥
वासुदेव उवाच
त्र्यहमुष्णं पिबेदापः त्र्यहमुष्णं पयः पिबेत् ।
त्र्यहमुष्णं पिबेत्सर्पिर्वायुभक्षो दिनत्रयम् ॥
पला द्वादश तोयस्य पलाष्टौ पयसः सुराः ।
षट्पलं सर्पिषः प्रोक्तं दिवसे दिवसे पिबेत् ॥
पुलस्त्य उवाच
इत्येवमुक्ते वचने सुराः कायविशुद्धये ।
तप्तकृच्छ्ररहस्यं वै चक्रुः शक्रपुरोगमाः ॥
ततो व्रते सुराचीर्णे विमुक्ताः पापतोऽभवन् ।
विमुक्तपापा देवेशं वासुदेवमथाब्रुवन् ॥
क्वासौ वद जगन्नाथ शंभुस्तिष्ठति केशव ।
यं क्षीराद्यभिषेकेण स्नापयामो विधानतः ॥
अथोवाच सुरान्विष्णुरेष तिष्ठति शङ्करः ।
मद्देहे किं न पश्यध्वं योगश्चायं प्रतिष्ठितः ॥
तमूचुर्नैव पश्यामस्त्वत्तो वै त्रिपुरान्तकम् ।
सत्यं वद सुरेशान महेशानः क्व तिष्ठति ॥
ततोऽव्ययात्मा स हरिः स्वहृत्पङ्कजशायिनम् ।
दर्शयामास देवानां मुरारिर्लिङ्गमैश्वरम् ॥
ततः सुराः क्रमेणैव क्षीरादिभिरनन्तरम् ।
स्त्रापयाञ्चक्रिरे लिङ्गं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ॥
देवताओ! मधुका स्नान आठ घड़ोंसे तथा जलका स्नान ११ इन सभीके दुगुने ( २४० ) घड़ोंसे कहा गया है । उसके बाद भक्तिपूर्वक देवको एक सौ आठ बार गोरोचन, कुङ्कुम और चन्दनका लेपन करनेका विधान है । फिर १२ । उन्हें भक्तिसे मलयचन्दन लगाना चाहिये । पूरे खिले हुए कमलोंके सहित बिल्वपत्र, धतूर एवं हरिचन्दनसे उनकी अर्चा होनी चाहिये । पूर्ण खिले हुए मन्दार और १३ । हरशृङ्गार चढ़ाकर पूजा करनी चाहिये । फिर अगुरु, केशर या काले चन्दन एवं चन्दनसे धूप दे । उसके बाद ऋग्वेदमें कथित ' पद ' और ' क्रम ' शैलियोंसे शतरुद्रीका १४ । जप करना चाहिये । ऐसा करनेसे आपलोग देवेश्वरका दर्शन कर सकेंगे; अन्य किसी उपायसे नहीं । वासुदेवके ऐसा कहनेपर देवताओंने केशवसे कहा- मधुसूदन! आप हमें तप्त - कृच्छ्र ( -व्रत ) - का विधान ( भी ) बतलाइये, जिसके १५ करनेसे सदाके लिये कायशुद्धि हो जाती है ॥१०–१५ ॥ वासुदेवने कहा- देवताओ! ( तप्त - कृच्छ्र- व्रतका विधान इस प्रकार है - ) तीन दिन बारह पल गरम जल १६ पिये, तीन दिन आठ पल गरम दूध पिये, तीन दिन छः पल गरम घी पिये एवं तीन दिन केवल वायु १७ पीकर रहे ॥ १६-१७ ॥ पुलस्त्यजी बोले- इस प्रकार कहनेपर इन्द्र आदि देवताओंने शरीरकी शुद्धिके लिये तप्त - कृच्छ्र - व्रतका एकान्त १८ अनुष्ठान किया । उसके बाद उस व्रतका पालन हो जानेपर देवता पापसे छूट गये । पापसे छूटकर देवताओंने देवोंके १ ९ स्वामी वासुदेवसे कहा- जगन्नाथ! केशव! आप कृपया यह बतलाइये कि शम्भु किस स्थानपर अवस्थित हैं? जिन्हें हमलोग दूध आदिके अभिषेकसे विधिपूर्वक स्नान २० करायें । उसके बाद विष्णुने देवताओंसे कहा- देवताओ! मेरे शरीरमें ये शङ्कर संयुक्त होकर स्थित हैं । क्या २१ आपलोग नहीं देख रहे हैं? ॥ १८-२१ ॥ उन लोगोंने विष्णुसे कहा कि हमलोग तो आपमें २२ त्रिपुरनाशक शङ्करको नहीं देख रहे हैं । सुरेशान! आप सच बतलाइये कि महेश किस स्थानपर स्थित हैं । उसके बाद अव्ययात्मा मुरारि विष्णुने देवताओंको अपने २३ हृदयकमलमें विश्राम करनेवाले शङ्करके लिङ्गका दर्शन करा दिया । उसके बाद देवताओंने क्रमशः दूध आदि २४ । उस नित्य, स्थिर एवं अक्षय लिङ्गको स्नान कराया ।
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२ ९ ० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६२
गोरोचनया त्वालिप्य चन्दनेन सुगन्धिना ।
बिल्वपत्राम्बुजैर्देवं पूजयामासुरञ्जसा ॥
प्रधूप्यागुरुणा भक्त्या निवेद्य परमौषधीः ।
जप्त्वाऽष्टशतनामानं प्रणामं चक्रिरे ततः ॥
इत्येवं चिन्तयन्तश्च देवावेतौ हरीश्वरौ ।
कथं योगत्वमापन्नौ सत्त्वान्धतमसोद्भवौ ॥
सुराणां चिन्तितं ज्ञात्वा विश्वमूर्तिरभूद्विभुः ।
सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वायुधधरोऽव्ययः ॥
सार्द्ध त्रिनेत्रं कमलाहिकुण्डलं जटागुडाकेशखगर्षभध्वजम् समाधवं हारभुजङ्गवक्षसं पीताजिनाच्छन्नकटिप्रदेशम् ॥ चक्रासिहस्तं हलशार्ङ्गपाणिं
पिनाकशूलाजगवान्वितं च ।
कपर्दखट्वाङ्गकपालघण्टा-सशङ्खटङ्काररवं महर्षे ॥
दृष्ट्वैव देवा हरिशङ्करं तं
नमोऽस्तु ते सर्वगताव्ययेति ।
प्रोक्त्वा प्रणामं कमलासनाद्या-श्चकुर्मतिं चैकतरां नियुज्य ॥
तानेकचित्तान् विज्ञाय देवान् देवपतिर्हरिः ।
प्रगृह्याभ्यद्रवत्तूर्णं कुरुक्षेत्रं स्वमाश्रमम् ॥
ततोऽपश्यन्त देवेशं स्थाणुभूतं जले शुचिम् ।
दृष्ट्वा नमः स्थाणवेति प्रोक्त्वा सर्वे ह्युपाविशन् ॥
ततोऽब्रवीत् सुरपतिरेह्येहि दीयतां वरः ।
क्षुब्धं जगज्जगन्नाथ उन्मज्जस्व प्रियातिथे ॥
ततस्तां मधुरां वाणीं शुश्राव वृषभध्वजः ।
श्रुत्वोत्तस्थौ च वेगेन सर्वव्यापी निरञ्जनः ॥
नमोऽस्तु सर्वदेवेभ्यः प्रोवाच प्रहसन् हरः । स चागतः सुरैः सेन्द्रैः प्रणतौ विनयान्वितैः फिर उन लोगोंने गोरोचन और सुगन्धित चन्दनका लेपन कर बिल्वपत्रों और कमलोंसे भक्तिपूर्वक ( यथाविधि २५ उन ) देवकी पूजा की ॥ २२ - २५ ॥ उसके बाद देवोंने प्रेमपूर्वक धूप- दानकर २६ परमौषधियों ( भङ्ग आदि ) को समर्पित किया । फिर ( शङ्करके ) एक सौ आठ नामोंका जप करनेके बाद उन्हें प्रणाम किया । सभी देवता यह विचारने लगे कि २७ सत्त्वगुणकी प्रधानतासे विष्णु एवं तमोगुणकी अधिकता आविर्भूत शिवमें एकता किस प्रकार हुई? देवताओं २८ विचारको जानकर अविनाशी व्यापक भगवान् सभी ( शुभ ) लक्षणोंसे युक्त एवं सब प्रकारके आयुधों को धारण करनेवाले विश्वमूर्ति हो गये । महर्षे! फिर तो देवताओंने एक ही शरीरमें कानमें सर्पके कुण्डल पहने, २ ९ | सिरपर आपसमें चिपके लंबे बालके जटाजूट बाँधे, गलेमें सर्प हार लटकाये, हाथमें पिनाक, शूल, आजगव धनुष, खट्वाङ्ग धारण किये तथा घण्टासे युक्त बाघाम्बर धारण करनेवाले त्रिनेत्रधारी वृषध्वज महादेव और साथ ही कमलके कुण्डलधारी, गरुड़ध्वज, हार और पीताम्बर ३० पहने, हाथोंमें चक्र, असि, हल, शार्ङ्गधनुष, टंकार - सी ध्वनि करनेवाले शङ्खको लिये गुडाकेश विष्णुको देखा । उसके बाद ' सर्वव्यापी अविनाशी प्रभुको नमस्कार है ' – इस प्रकार कहकर ब्रह्मा आदि देवताओंने उन हरि ३१ एवं शङ्करको एक रूप ( अभिन्न ) समझा ॥ २६–३१ ॥ देवोंके स्वामी भगवान् विष्णु उन देवताओंको समान हृदयवाला समझ उन्हें साथ लेकर शीघ्र अपने ३२ आश्रम कुरुक्षेत्र में चले गये । उसके बाद उन लोगोंने जलके भीतर पवित्र स्थाणुभूत उन देवेश ( महादेव ) -को देखा । उन्हें देखकर ' स्थाणवे नमः ' ( स्थाणुको ३३ नमस्कार है ) – यह कहकर वे सभी ( वहीं ) बैठ गये । उसके बाद इन्द्रने कहा- जगन्नाथ! अतिथिप्रिय! संसार अशान्त हो उठा है । आप ( कृपया ) बाहर निकलकर ३४ यहाँ आइये, यहाँ आइये ( और आकर ) हमें वर दीजिये । उसके बाद वृषकेतु महादेवने वह मधुर वाणी । सुनी । फिर उसे सुनकर वे सर्वव्यापी परमविशुद्ध शङ्कर ३५ वेगसे उठ खड़े हुए । उन्होंने हँसते हुए ‘ सभी देवताओंको नमस्कार है ' ऐसा कहा । इन्द्र आदि देवताओंने जलसे ऊपर आये हुए उन शङ्करको और अधिक विनयभावसे || ३६ | प्रणाम किया॥३२–३६ ॥