वामन पुराण — पृष्ठ 311–320

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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अध्याय ६४ ] चित्राङ्गदा - सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर

ततो मामब्रवीत् तातो नाम कृत्वा शुभानने ।

जाबालीति परिख्याय तच्छृणुष्व शुभानने ॥

पञ्चवर्षसहस्राणि बाल एव भविष्यसि ।

दशवर्षसहस्त्राणि कुमारत्वे चरिष्यसि ॥

विंशतिं यौवनस्थायी वीर्येण द्विगुणं ततः ।

पञ्चवर्षशतान् बालो भोक्ष्यसे बन्धनं दृढम् ॥

दशवर्षशतान्येव कौमारे कायपीडनम् ।

यौवने परमान् भोगान् द्विसहस्रसमास्तथा ॥

चत्वारिंशच्छतान्येव वार्धके क्लेशमुत्तमम् ।

लप्स्यसे भूमिशय्याढ्यं कदन्नाशनभोजनम् ॥

इत्येवमुक्तः पित्राऽहं बालः पञ्चाब्ददेशिकः ।

विचरामि महीपृष्ठं गच्छन् स्नातुं हिरण्वतीम् ॥

ततोऽपश्यं कपिवरं सोऽवदन्मां क्व यास्यसि ।

इमां देववतीं गुह्यं मूढ न्यस्तां महाश्रमे ॥

ततोऽसौ मां समादाय विस्फुरन्तं प्रयत्नतः ।

वटाग्रेऽस्मिन्नुद्बबन्ध जटाभिरपि सुन्दरि ॥

तथा च रक्षा कपिना कृता भीरु निरन्तरैः ।

लतापाशैर्महायन्त्रमधस्ताद् दुष्टबुद्धिना ॥

अभेद्योऽयमनाक्रम्य उपरिष्टात् तथाप्यधः ।

दिशां मुखेषु सर्वेषु कृतं यन्त्रं लतामयम् ॥

संयम्य मां कपिवरः प्रयातोऽमरपर्वतम् ।

यथेच्छया मया दृष्टमेतत् ते गदितं शुभे ॥

भवती का महारण्ये ललना परिवर्जिता ।

समायाता सुचार्वङ्गी केन सार्थेन मां वद ॥

साऽब्रवीदञ्जनो नाम गुह्यकेन्द्रः पिता मम ।

नन्दयन्तीति मे नाम प्रम्लोचागर्भसम्भवा ॥

तत्र मे जातके प्रोक्तमृषिणा मुद्गलेन हि ।

इयं नरेन्द्रमहिषी भविष्यति न संशयः ॥

होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन- मोचन ३०१ शुभानने! पिताजीने मेरा नाम जाबालि रखकर २ ९ । मुझसे जो कुछ कहा, उसे सुनो । उन्होंने कहा — तुम पाँच हजार वर्षोंतक बालक रहोगे एवं दस हजार वर्षोंतक कुमार रहोगे । बीस वर्षोंतक तुम्हारा पराक्रमपूर्ण ३० यौवन रहेगा और उसके बाद उसके दुगुने समयतक बुढ़ापेकी स्थिति रहेगी । बाल्यावस्थामें पाँच सौ वर्षोंतक ३१ तुम्हें दृढ़ बन्धन भोगना पड़ेगा । उसके बाद एक हजार वर्षोंतक कुमारावस्थामें तुम्हें शारीरिक कष्ट भोगना पड़ेगा तथा युवावस्थामें दो हजार वर्षोंतक तुम उत्तम ३२ भोगोंको प्राप्त करोगे ॥ २ ९ –३२ ॥ बुढ़ापेमें चालीस सौ वर्षोंतक अत्यन्त क्लेश ३३ भोगना होगा । उस समय तुम्हें भूमिपर सोना तथा कुत्सित - अन्न - कदन्न - साँवा, कोदो ( आदि ) - का भोजन करना पड़ेगा । पिताके इस प्रकार कहनेके बाद पाँच ३४ वर्षकी अवस्थामें मैं हिरण्वतीमें स्नान करनेके उद्देश्यसे पृथ्वीपर विचरता हुआ जा रहा था । उस समय मैंने एक श्रेष्ठ बन्दरको देखा । उसने मुझसे कहा- अरे मूढ़! इस ३५ | महान् आश्रममें रखी हुई इस देववतीको लेकर तू कहाँ जा रहा है? सुन्दरि! उसके बाद उसने छटपटाते हुए मुझको पकड़कर प्रयत्नपूर्वक इस वटवृक्षके शिखरपर ३६ । जटाओं ( बरोहों ) - से बाँध दिया ॥ ३३ - ३६ ॥ भीरु! उस कुमति बन्दरने बहुत - से लता-३७ | जालोंसे एक महान् यन्त्र ( छज्जा ) बनाकर उसके नीचे मुझे स्थापित कर दिया और सदा मेरी रक्षा करता रहा । सभी दिशाओंमें चारों ओरसे बनाया गया यह लतायन्त्र ३८ न तो टूट सकता है और न किसी प्रकार ऊपर या नीचेसे इसके ऊपर आक्रमण ही किया जा सकता है । वह श्रेष्ठ बन्दर मुझको बाँधकर स्वेच्छासे अमर-३ ९ पर्वतपर चला गया । शुभे! मैंने जो कुछ देखा था उसे । तुमसे कह दिया । सुन्दरि! मुझे बतलाओ कि तुम कौन हो एवं इस विस्तृत वनमें अकेली तुम किसके साथ ४० आयी हो? ॥ ३७–४० ॥ उसने कहा- गुह्यकराज अञ्जन मेरे पिता हैं । ४१ मेरा नाम नन्दयन्ती है । मेरा जन्म प्रम्लोचाके गर्भसे हुआ है । मेरे जन्मके समय मुद्गल ऋषिने ४२ । कहा था कि यह कन्या भविष्यमें राजरानी बनेगी ।

पृष्ठ 312

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३०२

तद्वाक्यसमकालं च व्यनदद् देवदुन्दुभिः ।

शिवा चाशिवनिर्घोषा ततो भूयोऽब्रवीन्मुनिः ॥

नसंदेहो नरपतेर्महाराज्ञी भविष्यति ।

महान्तं संशयं घोरं कन्याभावे गमिष्यसि ।

ततो जगाम स ऋषिरेवमुक्त्वा वचोऽद्भुतम् ॥

पिता मामपि चादाय समागन्तुमथैच्छत ।

तीर्थं ततो हिरण्वत्यास्तीरात् कपिरथोत्पतत् ॥

तद्भयाच्च मया ह्यात्मा क्षिप्तः सागरगाजले ।

तयाऽस्मि देशमानीता इमं मानुषवर्जितम् ॥

श्रुत्वा जाबालिरथ तद् वचनं वै तयोदितम् ।

प्राह सुन्दरि गच्छस्व श्रीकण्ठं यमुनातटे ॥

तत्रागच्छति मध्याह्ने मत्पिता शर्वमर्चितुम् ।

तस्मै निवेदयात्मानं तत्र श्रेयोऽधिलप्स्यसे ॥

ततस्तु त्वरिता काले नन्दयन्ती तपोनिधिम् ।

परित्राणार्थमगमद्धिमाद्रेर्यमुनां नदीम् ॥

सा त्वदीर्घेण कालेन कन्दमूलफलाशना ।

सम्प्राप्ता शङ्करस्थानं यत्रागच्छति तापसः ॥

ततः सा देवदेवेशं श्रीकण्ठं लोकवन्दितम् । प्रतिवन्ध ततोऽपश्यदक्षरांस्तान्महामुने तेषामर्थं हि विज्ञाय सा तदा चारुहासिनी तज्जाबाल्युदितं श्लोकमलिखच्चान्यमात्मनः मुद्गलेनास्मि गदिता राजपत्नी भविष्यति । सा चावस्थामिमां प्राप्ता कश्चिन्मां त्रातुमीश्वरः इत्युल्लिख्य शिलापट्टे गता स्नातुं यमस्वसाम् । ददृशे चाश्रमवरं मत्तकोकिलनादितम् ततोऽमन्यत सात्रर्षिर्नूनं तिष्ठति सत्तमः इत्येवं चिन्तयन्ती सा सम्प्रविष्टा महाश्रमम् ॥ ततो ददर्श देवाभां स्थितां देववतीं शुभाम् । संशुष्कास्यां चलन्नेत्रां परिम्लानामिवाब्जिनीम् श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६४ उनके कहनेके समय ही स्वर्गमें दुन्दुभि बजने लगी ४३ तथा तत्काल ही अमङ्गलसूचक शब्दवाली सियारिन बोलने लगी । उसके बाद मुनिने पुनः कहा- इसमें संदेह नहीं कि यह बालिका महाराजकी महारानी होगी । परंतु कन्या - अवस्थामें ही यह भयङ्कर विपत्तिमें पड़ जायगी । इस प्रकारका अद्भुत वचन कहकर वे ४४ ऋषि चले गये ॥ ४१–४४ ॥ उसके बाद मेरे पिताने तीर्थयात्रा करनेकी इच्छा की । ४५ इसी बीच मुझे ( अपने साथ ) लेकर बन्दर हिरण्वतीके तटसे उछला । उसके डरसे मैंने अपनेको समुद्रमें गिरनेवाली नदीके जलमें गिरा दिया ( मैं नदीमें कूद पड़ी ) । उस नदी ४६ भीषण प्रवाहसे मैं इस निर्जन देशमें आ गयी हूँ । जाबालिने उसकी कही हुई बातको सुनकर कहा - सुन्दरि! तुम ४७ यमुनाके किनारे श्रीकण्ठके पास जाओ । वहाँ मेरे पिताजी मध्याह्नमें शिवजीकी पूजा करनेके लिये आते हैं । तुम वहाँ जाकर उनको अपना समाचार सुनाओ । इससे तुम्हारा ४८ कल्याण होगा ॥ ४५ –४८ ॥ उसके बाद नन्दयन्ती अपनी रक्षाके लिये ४ ९ | शीघ्रतापूर्वक हिमाचलसे चल पड़ी और यमुनाके तीरपर स्थित तपोनिधि ( ऋतध्वज ) - के पास पहुँच । गयी । कन्द - मूल - फल खाती हुई वह कुछ ही समय में ५० शङ्करके ( भी ) उस स्थानपर पहुँची जहाँ तपस्वी आया करते थे । महामुने! उसके बाद उसने विश्ववन्दित ॥ ५१ देवाधिदेव श्रीकण्ठकी पूजा कर उन ( लिखे ) अक्षरोंको देखा । उनका अर्थ जानकर मधुर मुस्कान करती हुई । उसने जाबालिद्वारा कथित श्लोक तथा अपना एक ॥ ५२ अन्य श्लोक लिखा – ॥ ४ ९ –५२ ॥ ' महर्षि मुद्गलने कहा था कि मैं राजपत्नी होऊँगी, ॥ ५३ किंतु मैं इस अवस्थामें आ गयी हूँ । क्या कोई मेरा उद्धार करने में समर्थ है? ' शिलापट्टपर यह लिखकर वह स्नान करनेके लिये यमुनाके किनारे चली गयी और उस ॥ ५४ स्थानपर मतवाली कोकिलोंके स्वरों ( काकली ) - से निनादित । एक सुन्दर आश्रम देखा । उसने सोचा - इस स्थानपर श्रेष्ठ ५५ ऋषि अवश्य रहते होंगे । ऐसा सोचती हुई उस महान् आश्रम में प्रविष्ट हुई । उसके बाद उसने दैवी शोभासे युक्त, मुर्झायी हुई कमलिनीके समान सूखे मुख एवं चञ्चल ॥ ५६ । नेत्रोंवाली देववतीको वहाँ बैठी हुई देखा॥५३–५६ ॥

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अध्याय ६४ ] चित्राङ्गदा - सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन - मोचन ३०३

सा चापतन्तीं ददृशे यक्षजां दैत्यनन्दिनी ।

केयमित्येव संचिन्त्य समुत्थाय स्थिताभवत् ॥

ततोऽन्योन्यं समालिङ्ग्य गाढं गाढं सुहृत्तया ।

पप्रच्छतुस्तथान्योऽन्यं कथयामासतुस्तदा ॥

ते परिज्ञाततत्त्वार्थे अन्योन्यं ललनोत्तमे ।

समासीने कथाभिस्ते नानारूपाभिरादरात् ॥

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः श्रीकण्ठं स्नातुमादरात् ।

स तत्त्वज्ञो मुनिश्रेष्ठो अक्षराण्यवलोकयन् ॥

स दृष्ट्वा वाचयित्वा च तमर्थमधिगम्य च ।

मुहूर्तं ध्यानमास्थाय व्यजानाच्च तपोनिधिः ॥

ततः सम्पूज्य देवेशं त्वरया स ऋतध्वजः ।

अयोध्यामगमत् क्षिप्रं द्रष्टुमिक्ष्वाकुमीश्वरम् ॥

तं दृष्ट्वा नृपतिश्रेष्ठं तापसो वाक्यमब्रवीत् ।

श्रूयतां नरशार्दूल विज्ञप्तिर्मम पार्थिव ॥

मम पुत्रो गुणैर्युक्तः सर्वशास्त्रविशारदः ।

उद्बद्धः कपिना राजन् विषयान्ते तवैव हि ॥

तं हि मोचयितुं नान्यः शक्तस्त्वत्तनयादृते ।

शकुनिर्नाम राजेन्द्र स ह्यस्त्रविधिपारगः ॥

तन्मुनेर्वाक्यमाकर्ण्य पिता मम कृशोदरि ।

आदिदेश प्रियं पुत्रं शकुनिं तापसान्वये ॥

ततः स प्रहितः पित्रा भ्राता मम महाभुजः ।

सम्प्राप्तो बन्धनोद्देशं समं हि परमर्षिणा ॥

दृष्ट्वा न्यग्रोधमत्युच्चं प्ररोहास्तृतदिङ्मुखम् ।

ददर्श वृक्षशिखरे उद्धद्धमृषिपुत्रकम् ॥

तांश्च सर्वांल्लतापाशान् दृष्टवान् स समन्ततः ।

दृष्ट्वा स मुनिपुत्रं तं स्वजटासंयतं वटे ॥

धनुरादाय बलवानधिज्यं स चकार ह ।

लाघवादृषिपुत्रं तं रक्षंश्चिच्छेद मार्गणैः ॥

देववतीने यक्षपुत्रीको आती हुई देखा और यह ५७ कौन है - ऐसा विचारकर वह उठ खड़ी हुई । उसके बाद सखीभावसे उन दोनोंने आपसमें गाढ़ आलिङ्गन किया- वे एक - दूसरेके गले लगीं तथा परस्पर पूछ-५८ ताछ और बातचीत करने लगीं । वे दोनों उत्तम ललनाएँ एक दूसरीकी सच्ची घटनाओंको जानकर बैठ गयीं एवं ५ ९ आदरपूर्वक अनेक प्रकारकी कथाएँ कहने लगीं । इसी बीच वे तत्त्वज्ञाता मुनिश्रेष्ठ श्रीकण्ठके निकट स्नान करनेके लिये आये और उन्होंने पत्थरपर लिखे हुए ६० अक्षरोंको देखा ॥ ५७–६० ॥ उन्हें देख और पढ़कर तथा उनका अर्थ समझकर ६१ वे तपोनिधि एक क्षणमें ध्यान लगाकर ( सब कुछ ठीक-ठीक ) जान गये । उसके बाद महर्षि ऋतध्वज शीघ्रतासे ६२ देवेश्वरकी पूजा कर राजा इक्ष्वाकुका दर्शन करनेके लिये तुरंत ही अयोध्या चले गये । श्रेष्ठ नरपतिका दर्शन करके तपस्वी ऋतध्वजने कहा- नरशार्दूल! राजन्! मेरी विज्ञप्ति ६३ ( याचिका ) सुनिये - राजन्! आपके ही राज्यकी सीमा में एक बन्दरने सर्वशास्त्रोंमें निपुण, अच्छे गुणोंसे युक्त मेरे ६४ पुत्रको बाँध रखा है ॥ ६१–६४ ॥ राजेन्द्र! अस्त्र - विधिमें पारङ्गत आपके शकुनि ६५ नामक पुत्रके सिवाय दूसरा कोई उसे छुड़ा नहीं सकता । कृशोदरि! मुनिके उस वचनको सुनकर मेरे पिताने अपने पुत्र ( मेरे भाई ) शकुनिको उन तपस्वीके पुत्रके ( बन्धन ६६ छुड़ानेके ) सम्बन्धमें उचित आदेश दिया । उसके बाद पिताके द्वारा भेजा गया वह शक्तिशाली मेरा भाई उन श्रेष्ठ ६७ ऋषिके साथ ही बन्धनके स्थानपर आया । चारों ओर बरोहोंसे ढके हुए अत्यन्त ऊँचे वटवृक्षको देखनेके बाद उसने वृक्षकी ऊँची चोटीपर बँधे हुए ऋषिके पुत्रको ६८ ( बँधा हुआ ) देखा ॥ ६५–६८ ॥ ( फिर ) उसने ( फैले हुए ) उन समस्त लताजालोंको ६ ९ चारों ओरसे ( अच्छी तरह ) देखा एवं बड़के पेड़में अपनी जटाओंसे बँधे मुनिपुत्रको देखकर उस पराक्रमीने धनुष लेकर उसकी प्रत्यञ्चा ( डोरी ) चढ़ायी एवं वह ऋषि-७० | पुत्रकी रक्षा करते हुए निपुणतासे बाणोंद्वारा लताजालोंको

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३०४

कपिना यत् कृतं सर्वं लतापाशं चतुर्दिशम् ।

पञ्चवर्षशते काले गते शक्तस्तदा शरैः ॥

लताच्छन्नं ततस्तूर्णमारुरोह मुनिर्वटम् ।

प्राप्तं स्वपितरं दृष्ट्वा जाबालिः संयताऽपि सन् ॥

आदरात् पितरं मूर्ध्ना ववन्दे तु विधानतः ।

सम्परिष्वज्य स मुनिर्मूर्व्याघ्राय सुतं ततः ॥

उन्मोचयितुमारब्धो न शशाक सुसंयतम् ।

ततस्तूर्णं धनुर्न्यस्य बाणांश्च शकुनिर्बली ॥

आरुरोह वटं तूर्णं जटा मोचयितुं तदा ।

न च शक्नोति संच्छन्नं दृढं कपिवरेण हि ॥

यदा न शकितास्तेन सम्प्रमोचयितुं जटाः ।

तदाऽवतीर्णः शकुनिः सहितः परमर्षिणा ॥

जग्राह च धनुर्बाणांश्चकार शरमण्डपम् ।

लाघवादर्द्धचन्द्रैस्तां शाखां चिच्छेद स त्रिधा ॥

शाखया कृत्तया चासौ भारवाही तपोधनः ।

शरसोपानमार्गेण अवतीर्णोऽथ पादपात् ॥

तस्मिंस्तदा स्वे तनये ऋतध्वज-स्त्राते नरेन्द्रस्य सुतेन धन्विना । जाबालिना भारवहेन संयुतः समाजगामाथ नदीं स सूर्यजाम् ॥ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६५ काटने लगा । पाँच सौ वर्ष बीत जानेपर चारों ओर बन्दरके ७१ द्वारा बनाया गया लताजाल बाणोंसे जब काट दिया गया तब ऋषि ऋतध्वज लताओंसे ढके उस वटवृक्षपर शीघ्र ७२ चढ़ गये । जाबालिने अपने पिताको आया देखकर बँधे रहनेपर भी अत्यन्त आदरके साथ यथाविधि सिरसे ( सिर झुकाकर ) प्रणाम किया । उन मुनिने ( पुत्रका ) मस्तक ७३ सूँघकर उसको अच्छी तरह गले लगाया ॥ ६ ९ –७३ ॥ फिर वे बन्धन खोलने लगे; परंतु अत्यन्त दृढ़ ७४ बन्धनको वे खोल न सके । तब पराक्रमी शकुनि शीघ्र ही धनुष और बाणोंको रखकर जटा खोलनेके लिये ७५ बरगद के पेड़पर चढ़ गया । पर ( वह भी ) कपिद्वारा दृढ़तापूर्वक बनाये गये बन्धनको खोल न सका । जब ७६ वह जटाओंको नहीं खोल सका, तब श्रेष्ठ ऋषिके साथ शकुनि नीचे उतर आया । फिर उसने धनुष एवं बाण ७७ लिया तथा एक शरमण्डप बनाया । उसके बाद उसने हल्के हाथ अर्द्धचन्द्राकार बाणोंसे उस शाखाको तीन ७८ टुकड़ोंमें काट दिया । कटी हुई शाखाके साथ ही भारवाही तपोधन बाणकी सीढ़ियोंके मार्गसे वृक्षके नीचे उतर आये । राजा धनुर्धारी पुत्रद्वारा अपने पुत्रकी रक्षा हो जानेके बाद ऋतध्वज भारवाही जाबालिके साथ ७ ९ । सूर्यपुत्री ( यमुना ) नदीके तटपर गये ॥ ७४–७९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६४ ॥

पैंसठवाँ अध्याय गालव - प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा - वेदवती - वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची- वृत्तान्त, जाबालिकी जटाओंसे मुक्ति, विश्वकर्माकी शाप मुक्ति, इन्द्रद्युम्नादिका सप्तगोदावरमें आना, शिव - स्तुति, सप्तगोदावरमें सम्मेलन, कन्याओंका विवाह दण्डक उवाच दण्डकने कहा- बाले! इसी बीच यक्ष और एतस्मिन्नन्तरे बाले यक्षासुरसुते शुभे । असुरकी दोनों कन्याएँ योगीश्वर श्रीकण्ठ महादेवका दर्शन समागते हरं द्रष्टुं श्रीकण्ठं योगिनां वरम् ॥ १ करनेके लिये आयीं । उन ऋतध्वजके चले जानेपर उन ददृशाते परिम्लानसंशुष्ककुसुमं विभुम् । दोनोंने महादेवके चारों ओर मुर्झाये तथा सूखे हुए फूल बहुनिर्माल्यसंयुक्तं गते तस्मिन् ऋतध्वजे ॥ २ | और विसर्जनके बाद समर्पित की गयी अन्य बहुत - सी

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अध्याय ६५ ] गालव - प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा - वेदवती - वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची- वृत्तान्त ३०५

ततस्तं वीक्ष्य देवेशं ते उभे अपि कन्यके ।

स्नापयेतां विधानेन पूजयेतामहर्निशम् ॥

ताभ्यां स्थिताभ्यां तत्रैव ऋषिरभ्यागमद् वनम् ।

द्रष्टुं श्रीकण्ठमव्यक्तं गालवो नाम नामतः ॥

स दृष्ट्वा कन्यकायुग्मं कस्येदमिति चिन्तयन् ।

प्रविवेश शुचिः स्नात्वा कालिन्द्या विमले जले ॥

ततोऽनुपूजयामास श्रीकण्ठं गालवो मुनिः ।

गायेते सुस्वरं गीतं यक्षासुरसुते ततः ॥

ततः स्वरं समाकर्ण्य गालवस्ते अजानत ।

गन्धर्वकन्यके चैते संदेहो नात्र विद्यते ॥

सम्पूज्य देवमीशानं गालवस्तु विधानतः ।

कृतजप्यः समध्यास्ते कन्याभ्यामभिवादितः ॥

ततः पप्रच्छ स मुनिः कन्यके कस्य कथ्यताम् ।

कुलालङ्कारकरणे भक्तियुक्ते भवस्य हि ॥

तमूचतुर्मुनिश्रेष्ठं याथातथ्यं शुभानने ।

जातो विदितवृत्तान्तो गालवस्तपतां वरः ॥

समुष्य तत्र रजनीं ताभ्यां सम्पूजितो मुनिः ।

प्रातरुत्थाय गौरीशं सम्पूज्य च विधानतः ॥

ते उपेत्याब्रवीद्यास्ये पुष्करारण्यमुत्तमम् ।

आमन्त्रयामि वां कन्ये समनुज्ञातुमर्हथः ॥

ततस्ते ऊचतुर्ब्रह्मन् दुर्लभं दर्शनं तव ।

किमर्थं पुष्करारण्यं भवान् यास्यत्यथादरात् ॥

ते उवाच महातेजा महत्कार्यसमन्वितः ।

कार्तिकी पुण्यदा भाविमासान्ते पुष्करेषु हि ॥

ते ऊचतुर्वयं यामो भवान् यत्र गमिष्यति ।

न त्वया स्म विना ब्रह्मन्निह स्थातुं हि शक्नुवः ॥

बाढमाह ऋषिश्रेष्ठस्ततो नत्वा महेश्वरम् ।

गते ते ऋषिणा सार्द्धं पुष्करारण्यमादरात् ॥

वस्तुएँ पड़ी हुई देखीं । उसके बाद उन देवेशका दर्शन ३ कर वे दोनों कन्याएँ विधिसे दिन - रात श्रीकण्ठ भगवान्‌को स्नान करातीं एवं उनका पूजन करती थीं । उसी स्थानपर उन दोनोंके रहते हुए गालव नामके ऋषि अव्यक्तस्वरूपवाले श्रीकण्ठका दर्शन करनेके लिये इस ४ वनमें आये ॥ १-४ ॥ उन्होंने उन दोनों कन्याओंको देखकर ' ये किसकी ५ कन्याएँ हैं ' – इस प्रकार सोचते - विचारते हुए कालिन्दीके विमल जलमें प्रवेश किया । गालव ऋषिने स्नान करनेके बाद पवित्र होकर श्रीकण्ठ महादेवकी पूजा की । उसके ६ बाद यक्ष और असुरकी दोनों कन्याओंने मधुर स्वरसे गीत गाया । तब ( उनके ) स्वरको सुनकर गालवने यह ७ जान लिया कि ये दोनों निस्सन्देह गन्धर्वकी ही कन्याएँ हैं । गालवने विधिसे श्रीकण्ठदेवकी पूजा कर जप किया । उसके बाद दोनों कन्याओंसे अभिवन्दित ८ होकर वे बैठ गये॥५–८ ॥ उसके बाद उन मुनिने उन दोनों कन्याओंसे ९ पूछा - कन्याओ! तुम दोनों यह बतलाओ कि शङ्करमें भक्ति करनेवाली कुलकी शोभारूपा तुम दोनों किनकी कन्याएँ हो? शुभानने! उन दोनों कन्याओंने उन मुनिश्रेष्ठसे सत्य बातें बतलायीं । तब तपस्वियोंमें श्रेष्ठ गालवने १० सम्पूर्ण वृत्तान्त ( पूर्णतः ) जान लिया । उन दोनोंसे सत्कृत होकर मुनिने वहाँ रात्रिमें निवास किया और प्रातः काल उठकर विधिपूर्वक गौरीपति शङ्करका पूजन ११ किया । उसके बाद उन दोनोंके पास जाकर उन्होंने कहा- मैं परम उत्तम पुष्कर वनमें जाऊँगा । मैं तुम दोनोंसे अनुरोधकर विदा लेना चाहता हूँ । तुम दोनों मुझे १२ अनुज्ञा ( अनुमति ) दो ॥ ९ –१२ ॥ उसके बाद उन दोनोंने कहा- ब्रह्मन्! आपका १३ दर्शन दुर्लभ है । किस कारण आप पुष्करारण्यमें जा रहे हैं । इसके बाद धार्मिक कृत्य करनेवाले महातेजस्वी ( मुनि ) -ने उन दोनोंसे आदरपूर्वक कहा- आगे महीनेके १४ । अन्तमें पुष्करमें पुण्यदायिनी कार्तिकी पूर्णिमा होगी । उन दोनोंने कहा – ( तो ) आप जहाँ जायँगे, वहीं हम भी चलेंगी । ब्रह्मन्! आपके बिना हम दोनों यहाँ नहीं १५ रह सकतीं । ऋषिश्रेष्ठने कहा- ठीक है । उसके बाद आदरपूर्वक महेश्वरको प्रणामकर ऋषिके साथ वे दोनों १६ । ( कन्याएँ ) पुष्करारण्य चली गयीं ॥१३–१६ ॥

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३०६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६५

तथाऽन्ये ऋषयस्तत्र समायाताः सहस्रशः ।

पार्थिवा जानपद्याश्च मुक्त्वैकं तमृतध्वजम् ॥

ततः स्नाताश्च कार्तिक्यामृषयः पुष्करेष्वथ ।

राजानश्च महाभागा नाभागेक्ष्वाकुसंयुताः ॥

गालवोऽपि समं ताभ्यां कन्यकाभ्यामवातरत् ।

स्नातुं स पुष्करे तीर्थे मध्यमे धनुषाकृतौ ॥

निमनश्चापि ददृशे महामत्स्यं जलेशयम् ।

बह्वीभिर्मत्स्यकन्याभिः प्रीयमाणं पुनः पुनः ॥

सताश्चाह तिमिर्मुग्धा यूयं धर्मं न जानथ ।

जनापवादं घोरं हि न शक्तः सोढुमुल्बणम् ॥

तास्तमूचुर्महामत्स्यं किं न पश्यसि गालवम् ।

तापसं कन्यकाभ्यां वै विचरन्तं यथेच्छ्या ॥

यद्यसावपि धर्मात्मा न बिभेति तपोधनः ।

जनापवादात् तत्किं त्वं बिभेषि जलमध्यगः ॥

ततस्ताश्चाह स तिमिनैष वेत्ति तपोधनः ।

गान्धो नापि च भयं विजानाति सुबालिशः ॥

तच्छ्रुत्वा मत्स्यवचनं गालवो व्रीडया युतः ।

नोत्ततार निमग्नोऽपि तस्थौ स विजितेन्द्रियः ॥

स्नात्वा ते अपि रम्भोरू समुत्तीर्य तटे स्थिते ।

प्रतीक्षन्त्यौ मुनिवरं तद्दर्शनसमुत्सुके ॥

वृत्ता च पुष्करे यात्रा गता लोका यथागतम् ।

ऋषयः पार्थिवाश्चान्ये नाना जानपदास्तदा ॥

तत्र स्थितैका सुदती विश्वकर्मतनूरुहा ।

चित्राङ्गदा सुचार्वङ्गी वीक्षन्ती तनुमध्यमे ॥

ते स्थिते चापि वीक्षन्त्यौ प्रतीक्षन्त्यौ च गालवम् ।

संस्थिते निर्जने तीर्थे गालवोऽन्तर्जले तथा ॥

वहाँ केवल उन ऋतध्वजके सिवाय अन्य हजारों १७ ऋषि, राजा एवं जनपद निवासी भी आये । उसके बाद ऋषियों एवं नाभाग तथा इक्ष्वाकु आदि महाभाग्यवान् १८ | राजाओंने कार्तिकी पूर्णिमाके दिन पुष्करतीर्थमें स्नान किया । गालव भी उन दोनों कन्याओंके साथ धनुष की आकृतिवाले मध्यम पुष्करतीर्थमें स्नान करनेके लिये १ ९ उतरे । ( जलमें ) निमग्न होनेपर उन्होंने देखा कि एक जलचर महामत्स्य जलमें स्थित है और अनेक मत्स्य - कन्याएँ २० उसे पुनः पुनः प्रसन्न करनेमें लगी हुई हैं ॥१७- २० ॥ उस मत्स्यने उन ( मछलियों ) से कहा - भोली २१ प्रकृति होनेके कारण तुम सभी लोक - धर्म नहीं जानती हो । मैं जनताद्वारा किये जानेवाले कठोर अपवाद ( निन्दा ) सहन नहीं कर सकता । ( तब ) उन सभी ( मछलियों ) ने कहा- क्या तुम स्वच्छन्दतासे विचरते २२ हुए तपस्वी गालवको दो कन्याओंके साथ नहीं देख रहे हो? यदि धर्मात्मा एवं तपस्वी होते हुए भी वे लोक-| निन्दासे नहीं डरते तो जलमें रहनेवाले तुम क्यों डर रहे २३ हो? उसके बाद उस तिमि ( मत्स्य ) - ने उनसे कहा— तपस्वी लोक - निन्दाको नहीं जानते एवं प्रेममें अन्धा होनेसे प्रचण्डमूर्ख बनकर लोक - निन्दाके भयको भी २४ नहीं समझते ॥ २१–२४ ॥ मत्स्यके उस वचनको सुनकर गालव लज्जित २५ हो गये । ( फिर तो ) वे जितेन्द्रिय मुनि जलमें निमग्न होनेपर भी ऊपर नहीं आये, भीतर ही डूबे रहे । वे दोनों कदली - सदृश ऊरूवाली सुन्दरियाँ स्नान करनेके बाद जलसे बाहर निकल कर तीरपर खड़ी हो गयीं २६ एवं मुनिश्रेष्ठका दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित होकर उनकी प्रतीक्षा करने लगीं । पुष्करकी यात्रा पूरी होनेपर सभी ऋषि, राजा और नगरवासी लोग जहाँसे २७ आये थे, वहाँ चले गये । वहाँ केवल सुन्दर दाँतोंवाली एवं पतली सुन्दर शरीरवाली विश्वकर्माकी कन्या चित्राङ्गदा उन दोनों कृशोदरियों ( कन्याओं ) -को २८ देखती हुई रह गयी ॥ २५ – २८ ॥ वे दोनों भी ( उसे ) देखती एवं गालवकी प्रतीक्षा २ ९ | करती हुई निर्जन तीर्थमें पड़ी रहीं और गालव जलके

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अध्याय ६५ ] गालव - प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा वेदवती वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची- वृत्तान्त ३०७ ततोऽभ्यागाद् वेदवती नाम्ना गन्धर्वकन्यका । पर्जन्यतनया साध्वी घृताचीगर्भसम्भवा

सा चाभ्येत्य जले पुण्ये स्नात्वा मध्यमपुष्करे ।

ददर्श कन्यात्रितयमुभयोस्तटयोः स्थितम् ॥

चित्राङ्गदामथाभ्येत्य पर्यपृच्छदनिष्ठुरम् ।

कासि केन च कार्येण निर्जने स्थितवत्यसि ॥

सा तामुवाच पुत्रीं मां विन्दस्व सुरवर्धकेः ।

चित्राङ्गदेति सुश्रोणि विख्यातां विश्वकर्मणः ॥

साहमभ्यागता भद्रे स्नातुं पुण्यां सरस्वतीम् ।

नैमिषे काञ्चनाक्षीं तु विख्यातां धर्ममातरम् ॥

तत्रागताथ राज्ञाऽहं दृष्ट्वा वैदर्भकेण हि ।

सुरथेन स कामार्तो मामेव शरणं गतः ॥

मयात्मा तस्य दत्तश्च सखीभिर्वार्यमाणया ।

ततः शप्ताऽस्मि तातेन वियुक्तास्मि च भूभुजा ॥

मर्तुं कृतमतिर्भद्रे वारिता गुह्यकेन च ।

श्रीकण्ठमगमं द्रष्टुं ततो गोदावरं जलम् ॥

तस्मादिमं समायाता तीर्थप्रवरमुत्तमम् ।

न चापि दृष्टः सुरथः स मनोह्लादनः पतिः ॥

भवती चात्र का बाले वृत्ते यात्राफलेऽधुना ।

समागता हि तच्छंस मम सत्येन भामिनि ॥

साब्रवीच्छ्रयतां याऽस्मि मन्दभाग्या कृशोदरी ।

यथा यात्राफले वृत्ते समायाताऽस्मि पुष्करम् ॥

पर्जन्यस्य घृताच्यां तु जाता वेदवतीति हि ।

रममाणा वनोद्देशे दृष्टाऽस्मि कपिना सखि ॥

स चाभ्येत्याब्रवीत् का त्वं यासि देववतीति हि ।

आनीतास्याश्रमात् केन भूपृष्ठान्मेरुपर्वतम् ॥

ततो मयोक्तो नैवास्मि कपे देववतीत्यहम् ।

नाम्ना वेदवतीत्येवं मेरोरपि कृताश्रया ॥

भीतर ही स्थित रहे । उसके बाद वेदवती नामकी ॥ ३० गन्धर्व कन्या वहाँ आयी । वह साध्वी घृताचीके गर्भसे उत्पन्न हुई थी एवं पर्जन्य नामक गन्धर्वकी पुत्री थी । उसने आकर मध्यम पुष्करतीर्थके पवित्र जलमें स्नान ३१ किया और दोनों तटोंपर स्थित ( उन ) तीनों कन्याओंको देखा । इसके बाद चित्राङ्गदाके समीप जाकर उसने सरलतासे पूछा- तुम कौन हो? और किस कार्यसे इस ३२ निर्जन स्थानमें स्थित हो? ॥ २ ९ -३२ ॥ उस ( चित्राङ्गदा ) -ने उस ( वेदवती ) - से कहा - हे ३३ सुश्रोणि! मुझे देवशिल्पी विश्वकर्माकी चित्राङ्गदा नामसे प्रसिद्ध पुत्री जानो । भद्रे! मैं नैमिषमें धर्मकी जननी काञ्चनाक्षी नामसे प्रसिद्ध पवित्र सरस्वती नदीमें स्नान ३४ करने आयी थी । वहाँ आनेपर विदर्भवंशमें उत्पन्न राजा सुरथने मुझे देखा और कामपीड़ित होकर मेरी शरणमें ३५ आया । सखियोंके रोकनेपर भी मैंने उन्हें अपनेको समर्पित कर दिया । उसके बाद पिताजीने मुझे शाप दे ३६ । दिया और मैं राजासे वियोगिनी हो गयी ॥ ३३–३६ ॥ भद्रे! मैंने मरनेका विचार किया; परंतु गुह्यक ३७ मुझे रोक दिया । उसके बाद मैं श्रीकण्ठभगवान्का दर्शन करनेके लिये गयी और वहाँसे गोदावर जलके निकट गयी, ( और अब ) वहाँसे मैं इस श्रेष्ठ उत्तम तीर्थमें आ ३८ गयी हूँ । किंतु मनको आनन्दित करनेवाले उन सुरथ पतिको मैंने नहीं देखा । बाले! यात्राफलके समाप्त होनेपर ( पर्वकी समाप्ति हो जानेपर ) आज यहाँ ३ ९ आनेवाली आप कौन हैं? भामिनि! मुझे सच - सच बतलाओ । उसने कहा- कृशोदरि! मैं मन्दभागिनी कौन हूँ तथा यात्राफलके समाप्त होनेपर पुष्करमें क्यों आयी ४० हूँ, उसे सुनो ॥ ३७–४० ॥ मैं पर्जन्य नामक गन्धर्वकी पुत्री हूँ तथा ४१ घृताचीके गर्भसे उत्पन्न हुई हूँ । मेरा नाम वेदवती है । सखि! वनप्रदेशमें भ्रमण कर रही मुझको एक बन्दरने देखा । उसने समीपमें आकर मुझसे कहा- तुम कौन ४२ हो? कहाँ जा रही हो? ( निश्चय ही तुम ) देववती हो । पृथ्वीपर रहनेवाले आश्रमसे मेरुपर्वतपर तुम्हें कौन लाया है? इसपर मैंने कहा- कपे! मैं देववती नहीं ४३ । हूँ, मेरा नाम वेदवती है । मेरुपर्वतपर ही मैंने अपना

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३०८

ततस्तेनातिदुष्टेन वानरेण ह्यभिद्रुता ।

समारूढास्मि सहसा बन्धुजीवं नगोत्तमम् ॥

तेनापि वृक्षस्तरसा पादाक्रान्तस्त्वभज्यत ।

ततोऽस्य विपुलां शाखां समालिङ्गय स्थिता त्वहम् ॥

ततः प्लवङ्गमो वृक्षं प्राक्षिपत् सागराम्भसि ।

सह तेनैव वृक्षेण पतितास्म्यहमाकुला ॥

ततोऽम्बरतलाद् वृक्षं निपतन्तं यदृच्छया ।

ददृशुः सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ॥

ततो हाहाकृतं लोकैर्मां पतन्तीं निरीक्ष्य हि । ऊचुश्च सिद्धगन्धर्वाः कष्टं सेयं महात्मनः

इन्द्रद्युम्नस्य महिषी गदिता ब्रह्मणा स्वयम् ।

मनोः पुत्रस्य वीरस्य सहस्त्रक्रतुयाजिनः ॥

तां वाणीं मधुरां श्रुत्वा मोहमस्म्यागता ततः । न च जाने स केनापि वृक्षश्छिन्नः सहस्रधा

ततोऽस्मि वेगाद् बलिना हृतानलसखेन हि ।

समानीतास्म्यहमिमं त्वं दृष्टा चाद्य सुन्दरि ॥

तदुत्तिष्ठस्व गच्छावः पृच्छावः क इमे स्थिते । कन्यके अनुपश्ये हि पुष्करस्योत्तरे तटे एवमुक्त्वा वराङ्गी सा तया सुतनुकन्यया जगाम कन्यके द्रष्टुं प्रष्टुं कार्यसमुत्सुका

ततो गत्वा पर्यपृच्छत् ते ऊचतुरुभे अपि ।

याथातथ्यं तयोस्ताभ्यां स्वमात्मानं निवेदितम् ॥

ततस्ताश्चतुरोपीह सप्तगोदावरं जलम् ।

सम्प्राप्य तीर्थे तिष्ठन्ति अर्चन्त्यो हाटकेश्वरम् ॥

ततो बहून् वर्षगणान् बभ्रमुस्ते जनास्त्रयः । तासामर्थाय शकुनिर्जाबालिः स ऋतध्वजः

भारवाही ततः खिन्नो दशाब्दशतिके गते ।

काले जगाम निर्वेदात् समं पित्रा तु शाकलम् ॥

श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६५ आश्रम बना लिया है । उसके बाद अत्यन्त दुष्ट उस ४४ बन्दरसे खदेड़ी जाती हुई मैं बन्धुजीव ( गुलदुपहरिया ) -के उत्तम वृक्षपर शीघ्रतासे चढ़ गयी ॥ ४१–४४ ॥ उसने शीघ्र ही पैरके आघातसे उस वृक्षको तोड़ ४५ दिया । उसके बाद मैं उस वृक्षकी एक बड़ी डालीको पकड़कर स्थित रही । फिर बन्दरने उस वृक्षको समुद्रके जलमें फेंक दिया । मैं अत्यन्त घबड़ाकर उस वृक्षके ४६ साथ ही जलमें गिर पड़ी । उसके बाद चर और अचर सभी प्राणियोंने आकाशसे गिरनेवाले उस वृक्षको देखा । ४७ उसके बाद उसीके साथ मुझको भी गिरती हुई देखकर सभी लोग हाहाकार करने लगे । सिद्ध और गन्धर्वलोग कहने लगे- हाय! यह कष्टकी बात है । इसके सम्बन्धमें ॥ ४८ तो ब्रह्माने स्वयं कहा था कि यह कन्या हजारों यज्ञोंके करनेवाले मनुके वीर पुत्र इन्द्रद्युम्नकी राजरानी होगी

४ ९ ( पर यह क्या हो गया! ) । ४५ - ४ ९ ॥

उस मधुर वाणीको सुननेके बाद मुझे मूर्च्छा आ ॥ ५० गयी । मैं यह नहीं जानती कि उस वृक्षको किसने सहस्रों टुकड़ोंमें काट डाला । उसके बाद अग्निके सखा बलवान् वायुने मुझे शीघ्रतासे यहाँ ला दिया है । सुन्दरि! ५१ तुमको आज मैंने यहाँ देखा है । इसलिये उठो, हम दोनों चलें; और फिर पूछें तथा देखें कि पुष्करतीर्थके उत्तरी तटपर दिखायी देनेवाली ये दोनों कन्याएँ कौन हैं? ऐसा ॥ ५२ कहकर इस कार्यके करनेमें उत्कण्ठित वह सुन्दरी उस सुन्दर तथा दुर्बल देहवाली कन्याके साथ उस पारकी । दोनों कन्याओंको देखने तथा वस्तुस्थिति पूछनेके लिये ॥ ५३ वहाँ गयी ॥ ५० - ५३ ॥ उसके बाद वहाँ जाकर उसने उन दोनोंसे पूछा । ५४ उन दोनोंने अपनी सच्ची घटना उन दोनोंसे बतायीं । उसके बाद चारों कन्याएँ सप्तगोदावर जलके समीप ५५ जाकर हाटकेश्वर भगवान्‌की पूजा करती हुई तीर्थमें रहने लगीं । इधर शकुनि, जाबालि और ऋतध्वज - ये तीनों व्यक्ति उन कन्याओंके लिये अनेक वर्षोंतक ॥ ५६ भ्रमण करते रहे । तब एक हजार वर्ष बीत जानेपर भार-वहन करनेवाले ( जाबालि ) खिन्न होकर पिताके साथ ५७ शाकल जनपदमें चले गये॥५४–५७ ॥

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अध्याय ६५ ] गालव - प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा - वेदवती - वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची- वृत्तान्त ३० ९ तस्मिन्नरपतिः श्रीमानिन्द्रद्युम्नो मनोः सुतः । समध्यास्ते स विज्ञाय सार्घपात्रो विनिर्ययौ सम्यक् सम्पूजितस्तेन सजाबालिऋतध्वजः । स चेक्ष्वाकुसुतो धीमान् शकुनिर्भ्रातृजोऽर्चितः

ततो वाक्यं मुनिः प्राह इन्द्रद्युम्नमृतध्वजः ।

राजन् नष्टाऽबलास्माकं नन्दयन्तीति विश्रुता ॥

तस्यार्थे चैव वसुधा अस्माभिरटिता नृप ।

तस्मादुत्तिष्ठ मार्गस्व साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥

अथोवाच नृपो ब्रह्मन् ममापि ललनोत्तमा ।

नष्टा कृतश्रमस्यापि कस्याहं कथयामि ताम् ॥

आकाशात् पर्वताकारः पतनामो नगोत्तमः ।

सिद्धानां वाक्यमाकर्ण्य बाणैश्छिन्नः सहस्त्रधा ॥

न चैव सा वरारोहा विभिन्ना लाघवान्मया ।

न च जानामि सा कुत्र तस्माद् गच्छामि मार्गितुम् ॥

इत्येवमुक्त्वा स नृपः समुत्थाय त्वरान्वितः ।

स्यन्दनानि द्विजाभ्यां स भ्रातृपुत्राय चार्पयत् ॥

तेऽधिरुह्य रथांस्तूर्णं मार्गन्ते वसुधां क्रमात् ।

बदर्याश्रममासाद्य ददृशुस्तपसां निधिम् ॥

तपसा कर्शितं दीनं मलपङ्कजटाधरम् ।

निःश्वासायासपरमं प्रथमे वयसि स्थितम् ॥

तमुपेत्याब्रवीद् राजा इन्द्रद्युम्नो महाभुजः ।

तपस्विन् यौवने घोरमास्थितोऽसि सुदुश्चरम् ॥

तपः किमर्थं तच्छंस किमभिप्रेतमुच्यताम् ।

सोऽब्रवीत् को भवान् ब्रूहि ममात्मानं सुहृत्तया ॥

परिपृच्छसि शोकार्तं परिखिन्नं तपोऽन्वितम् ।

प्राह राजाऽस्मि विभो तपस्विञ्शाकले पुरे ॥

मनोः पुत्रः प्रियो भ्राता इक्ष्वाकोः कथितं तव ।

स चास्मै पूर्वचरितं सर्वं कथितवान् नृपः ॥

वहाँ मनुके पुत्र श्रीमान् राजा इन्द्रद्युम्न निवास कर ॥ ५८ रहे थे । वे इस समाचारको जानकर अर्घपात्र हाथमें लिये बाहर निकले । उन्होंने विधिपूर्वक सुन्दर रीतिसे जाबालि और ऋतध्वजकी पूजा की तथा उस इक्ष्वाकुनन्दन ॥ ५ ९ बुद्धिमान् भतीजे शकुनिकी भी अर्चना की । उसके बाद ऋतध्वज मुनिने इन्द्रद्युम्नसे कहा- राजन्! हमलोगोंकी ६० नन्दयन्ती नामसे प्रसिद्ध ( अयानी ) कन्या खो गयी है । राजन्! उसके लिये हमलोगोंने सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया है । इसलिये ( कृपया ) उठिये, पता लगाइये और ६१ हमारी सहायता कीजिये ॥ ५८–६१ ॥ इसके बाद राजाने कहा - ब्रह्मन्! मेरी भी एक ६२ उत्तम लाडिली कन्या खो गयी है । उसे ढूँढ़नेमें मैं परिश्रम कर चुका हूँ । उसके विषयमें मैं किससे कहूँ । सिद्धोंका वचन सुनकर आकाशसे नीचे गिरनेवाले ६३ पर्वतके समान श्रेष्ठ वृक्षको मैंने बाणोंसे हजारों टुकड़ोंमें काट डाला । मेरे हस्तकौशलसे उस सुन्दरी कन्याको चोट नहीं लगी । मैं नहीं जानता हूँ कि वह कहाँ है? ६४ अतः उसे ढूँढ़नेके लिये मैं ( भी ) चल रहा हूँ । ऐसा कहनेके बाद वे राजा शीघ्रतासे उठे । उन्होंने उन दोनों ब्राह्मणों ६५ तथा अपने भतीजेके लिये रथ दे दिये ॥ ६२–६५ ॥ वे रथोंपर चढ़कर शीघ्रतासे क्रमशः पृथ्वीपर ६६ खोज करने लगे । ( इस क्रममें ) उन लोगोंने बदरिकाश्रममें जाकर तपस्या करनेसे दुबले और धूल - मिट्टी से भरे, जटा धारण किये हुए, जोर - जोरसे साँस ले रहे एक ६७ तपोमूर्ति युवकको देखा । महाबाहु राजा इन्द्रद्युम्नने उसके पास जाकर कहा- तपस्विन्! यह बतलाओ कि युवा-अवस्थामें ही तुम अत्यन्त दुष्कर कठोर तप क्यों कर ६८ रहे हो? यह भी बतलाओ कि तुम्हारी अभिलाषा क्या है? उसने कहा- आप मुझसे यह बतलायें कि चिन्तासे ६ ९ ग्रस्त अत्यन्त दुःखी एवं तपश्चर्यासे युक्त मुझसे प्रेमपूर्वक पूछनेवाले आप कौन हैं? उसने कहा-तपस्विन्! विभो! मैं मनुका पुत्र एवं इक्ष्वाकुका प्रिय ७० भाई शाकलपुरका राजा हूँ । मैंने अपना परिचय कह दिया । उस राजाने भी उनसे पहलेकी सारी कथा ७१ | कह सुनायी ॥ ६६-७१ ॥

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३१० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६५

श्रुत्वा प्रोवाच राजर्षिर्मा मुञ्चस्व कलेवरम् ।

आगच्छ यामि तन्वङ्गीं विचेतुं भ्रातृजोऽसि मे ॥

इत्युक्त्वा सम्परिष्वज्य नृपं धमनिसंततम् ।

समारोप्य रथं तूर्णं तापसाभ्यां न्यवेदयत् ॥

ऋतध्वजः सपुत्रस्तु तं दृष्ट्वा पृथिवीपतिम् ।

प्रोवाच राजन्नेह्येहि करिष्यामि तव प्रियम् ॥

यासौ चित्राङ्गदा नाम त्वया दृष्टा हि नैमिषे ।

सप्तगोदावरं तीर्थं सा मयैव विसर्जिता ॥

तदागच्छथ गच्छामः सौदेवस्यैव कारणात् ।

तत्रास्माकं समेष्यन्ति कन्यास्तिस्त्रस्तथापराः ॥

इत्येवमुक्त्वा स ऋषिः समाश्वास्य सुदेवजम् ।

शकुनिं पुरतः कृत्वा सेन्द्रद्युम्नः सपुत्रकः ॥

स्यन्दनेनाश्वयुक्तेन गन्तुं समुपचक्रमे ।

सप्तगोदावरं तीर्थं यत्र ताः कन्यका गताः ॥

एतस्मिन्नन्तरे तन्वी घृताची शोकसंयुता ।

विचचारोदयगिरिं विचिन्वन्ती सुतां निजाम् ॥

तमाससाद च कपिं पर्यपृच्छत् तथाप्सराः ।

किं बाला न त्वया दृष्टा कपे सत्यं वदस्व माम् ॥

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स कपिः प्राह बालिकाम् ।

दृष्टा देववती नाम्ना मया न्यस्ता महाश्रमे ॥

कालिन्द्या विमले तीर्थे मृगपक्षिसमन्विते ।

श्रीकण्ठायतनस्याग्रे मया सत्यं तवोदितम् ॥

सा प्राह वानरपते नाम्ना वेदवतीति सा ।

न हि देववती ख्याता तदागच्छ व्रजावहे ॥

घृताच्यास्तद्वचः श्रुत्वा वानरस्त्वरितक्रमः ।

पृष्ठतोऽस्याः समागच्छन्नदीमन्वेव कौशिकीम् ॥

ते चापि कौशिकीं प्राप्ता राजर्षिप्रवरास्त्रयः ।

द्वितयं तापसाभ्यां च रथैः परमवेगिभिः ॥

अवतीर्य रथेभ्यस्ते स्त्रातुमभ्यागमन् नदीम् ।

घृताच्यपि नदीं स्नातुं सुपुण्यामाजगाम ह ॥

तामन्वेव कपिः प्रायाद् दृष्टो जाबालिना तथा ।

दृष्ट्वैव पितरं प्राह पार्थिवं च महाबलम् ॥

( ऊपर कही बातोंको ) सुनकर राजर्षिने कहा-७२ तुम अपने शरीरका त्याग मत करो । तुम मेरे भतीजे हो । आओ, मैं उस सुन्दरीकी खोज करने जा रहा हूँ । इतना कहकर उन्होंने उभरी शिराओंसे भरे हुए राजाको गले ७३ लगाया और उन्हें रथपर चढ़ाकर शीघ्र उन दोनों तपस्वियोंके पास पहुँचा दिया । पुत्रके सहित ऋतध्वजने उन राजाको देखकर कहा- राजन्! आइये! आइये! मैं ७४ आपका प्रिय कार्य करूँगा । आपने नैमिषारण्यमें जिस चित्राङ्गदाको देखा था, उसे मैंने ही सप्तगोदावर नामके ७५ तीर्थमें छोड़ दिया था ॥ ७२-७५ ॥ तो आइये, हमलोग सुदेवके पुत्रके कार्यसे ही ७६ वहाँ चलें । वहाँपर हमलोगोंको अन्य तीन कन्याएँ भी मिलेंगी । इस प्रकार कहकर उन्होंने ऋषि सुदेवके ७७ पुत्रको सान्त्वना दे करके एवं शकुनिको आगे कर इन्द्रद्युम्र और पुत्रके साथ घोड़े जुते रथसे सप्तगोदावर तीर्थमें जानेकी योजना बनायी - जहाँ वे कन्याएँ गयी ७८ थीं । इस बीच दुर्बलाङ्गी घृताची शोकसे चिन्तित होकर अपनी कन्याको ढूँढ़ती हुई उदयगिरिपर ७ ९ विचरण करने लगी ॥७६–७९ ॥ वहाँ घृताची अप्सराको वह बन्दर मिल गया । ८० घृताची अप्सराने उससे पूछा - कपे! मुझसे सच कहो कि क्या तुमने लड़कीको नहीं देखा है? उसके वचनको सुनकर उस कपिने कहा- मैंने देववती नामकी बालिकाको ८१ देखा है और उसे मृगों तथा पक्षियोंसे भरे कालिन्दीके विमलतीर्थमें श्रीकण्ठके मन्दिरके सामने स्थित महाश्रममें ८२ रख दिया है । मैंने तुमसे यह सत्य बात कही है । उस ( घृताची ) ने कहा- कपिराज! वह वेदवती नामसे विख्यात है, वह देववती नहीं है । तो आओ; हम दोनों ८३ वहाँ चलें ॥ ८०-८३ ॥ घृताचीकी उस बातको सुनकर बन्दर शीघ्रतासे पग ८४ बढ़ाता हुआ उसके पीछे - पीछे कौशिकी नदीकी ओर चला । वे तीनों श्रेष्ठ राजर्षि भी दोनों तपस्वियों ( जाबालि और ८५ ऋतध्वज ) - के साथ बहुत तेज चलनेवाले रथोंपर चढ़कर कौशिकी नदीके समीप पहुँचे । वे लोग रथसे उतरकर स्नान करनेके लिये नदीके निकट आये । घृताची भी उस ८६ परम पवित्र नदीमें स्नान करने आयी । बन्दर भी उनके पीछे ही आ गया । जाबालिने उसे देखा । देखते ही उन्होंने ८७ । पिता एवं महाबलशाली राजासे कहा – ॥ ८४–८७ ॥