वामन पुराण — पृष्ठ 321–330

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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अध्याय ६५ ] गालव - प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा - वेदवती - वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची- वृत्तान्त ३११

स एव पुनरायाति वानरस्तात वेगवान् ।

पूर्वं जटास्वेव बलाद्येन बद्धोऽस्मि पादपे ॥

तज्जाबालवचः श्रुत्वा शकुनिः क्रोधसंयुतः ।

सशरं धनुरादाय इदं वचनमब्रवीत् ॥

ब्रह्मन् प्रदीयतां मह्यमाज्ञां तात वदस्व माम् ।

यावदेनं निहन्म्यद्य शरेणैकेन वानरम् ॥

इत्येवमुक्ते वचने सर्वभूतहिते रतः ।

महर्षिः शकुनिं प्राह हेतुयुक्तं वचो महत् ॥

न कश्चित्तात केनापि बध्यते हन्यतेऽपि वा ।

वधबन्धौ पूर्वकर्मवश्यौ नृपतिनन्दन ॥

इत्येवमुक्त्वा शकुनिमृषिर्वानरमब्रवीत् ।

एह्येति वानरास्माकं साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥

इत्येवमुक्तो मुनिना बाले स कपिकुञ्जरः ।

कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्येदमब्रवीत् ।

ममाज्ञा दीयतां ब्रह्मञ् शाधि किं करवाण्यहम् ॥

इत्युक्ते प्राह स मुनिस्तं वानरपतिं वचः ।

मम पुत्रस्त्वयोद्बद्धो जटासु वटपादपे ॥

न चोन्मोचयितुं वृक्षाच्छ्क्नुयामोऽपि यत्नतः ।

तदनेन नरेन्द्रेण त्रिधा कृत्वा तु शाखिनः ॥

शाखां वहति मत्सूनुः शिरसा तां विमोचय ।

दशवर्षशतान्यस्य शाखां वै वहतोऽगमन् ॥

न च सोऽस्ति पुमान् कश्चिद् यो ह्युन्मोचयितुं क्षमः ।

स ऋषेर्वाक्यमाकर्ण्य कपिर्जाबालिनो जटाः ॥

शनैरुन्मोचयामास क्षणादुन्मोचिताश्च ताः ।

ततः प्रीतो मुनिश्रेष्ठो वरदोऽभूदृतध्वजः ॥

कपिं प्राह वृणीष्व त्वं वरं यन्मनसेप्सितम् । ऋतध्वजवचः श्रुत्वा इमं वरमयाचत ।

विश्वकर्मा महातेजाः कपित्वे प्रतिसंस्थितः ।

ब्रह्मन् भवान् वरं मह्यं यदि दातुमिहेच्छति ॥

तत्स्वदत्तो महाघोरो मम शापो निवर्त्यताम् । चित्राङ्गदायाः पितरं मां त्वष्टारं तपोधन । तात! यह वही बन्दर फिर तेजीसे ( यहाँ ) आ रहा ८८ है, जिसने पहले मुझे जबर्दस्ती जटाजालसे बड़के पेड़में बाँध दिया था । जाबालिके उस वचनको सुनकर अत्यन्त ८ ९ कुपित हुए शकुनिने बाणसहित धनुषको लेकर यह वचन कहा – ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये; तात! मुझसे कहिये; ९ ० क्या मैं एक बाणसे ही इस बन्दरको मार डालूँ? ऐसा कहनेपर समस्त प्राणियोंकी भलाईमें लगे रहनेवाले महर्षिने ९९ शकुनिसे अत्यन्त युक्तियुक्त वचन कहा- ॥ ८८ – ९ १ ॥ तात! ( वस्तुतः ) न तो किसीको कोई बाँधता है ९ २ और न मारता ही है । नृपतिनन्दन! वध और बन्धन पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंके फलाधीन होते हैं । शकुनिसे ९ ३ इस प्रकार कहकर मुनिने बन्दरसे कहा - बन्दर! आओ, आओ! तुम्हें हमलोगों की सहायता करनी चाहिये । बाले! मुनि ऐसा कहने पर उस श्रेष्ठ कपिने करबद्ध प्रणाम करते हुए यह कहा - ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये; मुझे निर्देश ९ ४ दीजिये कि मैं क्या करूँ? उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस कपिपतिसे यह वचन कहा – तुमने मेरे पुत्रको ९ ५ बड़के पेड़में जटाओंसे बाँध रखा था॥९ २ – ९ ५ ॥ विशेष यत्न करनेपर भी हमलोग उस पेड़ से ९ ६ इसको उन्मुक्त ( अलग ) नहीं कर सके । इसलिये इस राजाने उस वृक्षके तीन टुकड़े कर दिये । मेरा पुत्र आजतक सिरपर उसकी डालीको ढो रहा है । अब तुम ९ ७ उसे उन्मुक्त कर दो । इस डालीको ढोते हुए उसको एक हजार वर्ष बीत गये हैं । ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो ९ ८ इसे छुड़ानेमें समर्थ हो । उस बन्दरने ऋषिकी बात सुनकर जाबालिकी जटाओंको धीरे - धीरे खोल दिया । वे जटाएँ क्षणभरमें ही खुल गयीं । उसके बाद प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ ९९ ऋतध्वज वर देनेके लिये तैयार हो गये ॥ ९ ६ – ९९ ॥ ( फिर ) उन्होंने बन्दरसे कहा- तुम अपना १०० मनोऽभिलषित वर माँगो । ऋतध्वजकी बात सुनकर कपि-योनिमें स्थित महातेजस्वी विश्वकर्माने यह वर माँगा -१०१ | ब्रह्मन्! यदि आप मुझे वर देनेके लिये इच्छा कर रहे हैं तो मुझे दिये गये अपने महाघोर शापका निवारण कर दें । १०२ । तपोधन! चित्राङ्गदाके पिता मुझ त्वष्टाको आप पहचान लें ।

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३१२

अभिजानीहि भवतः शापाद्वानरतां गतम् ।

सुबहूनि च पापानि मया यानि कृतानि हि ॥

कपिचापल्यदोषेण तानि मे यान्तु संक्षयम् ।

ततो ऋतध्वजः प्राह शापस्यान्तो भविष्यन्ति ॥

यदा घृताच्यां तनयं जनिष्यसि महाबलम् ।

इत्येवमुक्तः संहृष्टः स तदा कपिकुञ्जरः ॥

स्नातुं तूर्णं महानद्यामवतीर्णः कृशोदरि ।

ततस्तु सर्वे क्रमशः स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः ॥

जग्मुर्हृष्टा रथेभ्यस्ते घृताची दिवमुत्पतत् ।

तमन्वेव महावेगः स कपिः प्लवतां वरः ॥

ददृशे रूपसम्पन्नां घृताचीं स प्लवङ्गमः ।

सापि तं बलिनां श्रेष्ठं दृष्ट्वैव कपिकुञ्जरम् ॥

ज्ञात्वाऽथ विश्वकर्माणं कामयामास कामिनी 1

ततोऽनुपर्वतश्रेष्ठे ख्याते कोलाहले कपिः ॥

रमयामास तां तन्वीं सा च तं वानरोत्तमम् ।

एवं रमन्तौ सुचिरं सम्प्राप्तौ विन्ध्यपर्वतम् ॥

रथैः पञ्चापि तत्तीर्थं सम्प्राप्तास्ते नरोत्तमाः ।

मध्याह्नसमये प्रीताः सप्तगोदावरं जलम् ॥

प्राप्य विश्रामहेत्वर्थमवतेरुस्त्वरान्विताः ।

तेषां सारथयश्चाश्चान् स्नात्वा पीतोदकाप्लुतान् ॥

रमणीये वनोद्देशे प्रचारार्थे समुत्सृजन् ।

शाड्वलाढयेषु देशेषु मुहूर्त्तादेव वाजिनः ॥

तृप्ताः समाद्रवन् सर्वे देवायतनमुत्तमम् ।

तुरङ्गखुरनिर्घोषं श्रुत्वा ता योषितां वराः ॥

किमेतदिति चोक्त्वैव प्रजग्मुहाटकेश्वरम् ।

आरुह्य बलभीं तास्तु समुदैक्षन्त सर्वशः ॥

अपश्यंस्तीर्थसलिले स्नायमानान् नरोत्तमान् ।

ततश्चित्राङ्गदा दृष्ट्वा जटामण्डलधारिणम् ।

सुरथं हसती प्राह संरोहत्पुलका सखीम् ॥

योऽसौ युवा नीलघनप्रकाशः संदृश्यते दीर्घभुजः सुरूपः । श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६५ आपके शापसे ( ही ) मैं बन्दर हो गया हूँ । कपिकी १०३ ( स्वाभाविक ) चञ्चलतारूपी दोषसे मैंने जिन बहुत - से पापोंको किया है, वे सभी नष्ट हो जायँ । उसके बाद १०४ ऋतध्वजने कहा – जब तुम घृताचीसे महाबलवान् पुत्र उत्पन्न करोगे तब शापका अन्त होगा । तब ऐसा कहनेपर १०५ वह कपिश्रेष्ठ अत्यन्त हर्षित हो गया ॥ १००–१०५ ॥ कृशोदरि! वह शीघ्र ही महानदीमें स्नान करनेके १०६ । लिये उतरा । उसके बाद वे सब क्रमशः स्नानकर पितरों और देवोंके तर्पण - अर्चन कर रथसे चले गये एवं घृताची स्वर्गमें उड़ गयी । महावेगशाली श्रेष्ठ कपिने भी १०७ उसका अनुसरण किया । उस बन्दरने रूपसे सम्पन्न घृताचीको देखा । उस कामिनी ( घृताची ) ने भी बलवानोंमें १०८ श्रेष्ठ उत्तम कपिको देखकर एवं उसे विश्वकर्मा जानकर उसकी कामना की । उसके बाद कोलाहल नामसे विख्यात श्रेष्ठ पर्वतपर उस बन्दरने घृताचीके साथ एवं १० ९ घृताचीने उस श्रेष्ठ बन्दरके साथ आनन्द - क्रीड़ा की । इस प्रकार बहुत दिनोंतक क्रीड़ा करते हुए वे दोनों ११० विन्ध्यपर्वतपर पहुँचे ॥ १०६–११० ॥ वे पाँचों श्रेष्ठ व्यक्ति भी उल्लसित होकर रथद्वारा ११ ९ दोपहरके समय सप्तगोदावर जलवाले उस तीर्थमें पहुँचे । वहाँ जाकर वे विश्राम करनेके लिये शीघ्रतासे नीचे उतरे । उनके सारथियोंने भी स्नान किया एवं ११२ घोड़ोंको जल पिलाकर तथा नहला - धुलाकर ( उन्हें ) सुन्दर वन- प्रदेशमें विचरण करनेके लिये छोड़ दिया । ११३ मुहूर्तभरमें ही हरियालीसे हरे - भरे स्थानमें वे घोड़े तृप्त हो गये । उसके बाद वे सभी ( घोड़े ) उत्तम देव-मन्दिरके पास दौड़ने लगे । घोड़ोंके टापका शब्द ११४ सुनकर श्रेष्ठ स्त्रियाँ ' यह क्या है ' ऐसा कहकर हाटकेश्वर ( - के मन्दिर में ) गयीं एवं छतपर चढ़कर ११५ सभी ओर देखने लगीं ॥१११–११५ ॥ उन कन्याओंने तीर्थके जलमें स्नान करते हुए उन श्रेष्ठ पुरुषोंको देखा । फिर चित्राङ्गदाने जटा - मण्डल ११६ । धारण करनेवाले नृपति सुरथको देखा । रोमाञ्चित होकर उसने हँसती हुई सखीसे कहा- नीले मेघके समान वर्ण तथा लम्बी भुजाओंवाला वह जो सुन्दर युवा पुरुष

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अध्याय ६५ ] गालव - प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा - वेदवती - वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची- वृत्तान्त ३१३ स एव नूनं नरदेवसूनु-र्वृतो मया पूर्वतरं पतिर्यः ॥ १ ९ ७ यश्चैष जाम्बूनदतुल्यवर्णः श्वेतं जटाभारमधारयिष्यत् । स एष नूनं तपतां वरिष्ठो ऋतध्वजो नात्र विचारमस्ति ॥ ११८

ततोऽब्रवीदथ हृष्टा नन्दयन्ती सखीजनम् ।

एषोऽपरोऽस्यैव सुतो जाबालिनात्र संशयः ॥ ११ ९

इत्येवमुक्त्वा वचनं बलभ्या अवतीर्य च ।

समासताग्रतः शम्भोर्गायन्त्यो गीतिकां शुभाम् ॥ १२०

नमोऽस्तु शर्व शम्भो त्रिनेत्र चारुगात्र त्रैलोक्यनाथ उमापते दक्षयज्ञविध्वंसकर कामाङ्गनाशन घोर पापप्रणाशन महापुरुष महोग्रमूर्ते सर्वसत्त्वक्षयंकर शुभङ्कर महेश्वर त्रिशूलधारिन् स्मरारे गुहावासिन् दिग्वासः महाशङ्खशेखर जटाधर कपालमाला-विभूषितशरीर वामचक्षुः वामदेवप्रजाध्यक्ष भगाक्ष्णोः क्षयङ्कर भीमसेन महासेननाथ पशुपते कामाङ्गदहन । चत्वरवासिन् शिव महादेव ईशान शङ्कर भीम भव वृषभध्वज जटिल प्रौढ महानाट्येश्वर भूरिरत्न अविमुक्तक रुद्र रुद्रेश्वर स्थाणो एकलिङ्ग कालिन्दीप्रिय श्रीकण्ठ नीलकण्ठ अपराजित रिपुभयङ्कर सन्तोषपते वामदेव अघोर तत्पुरुष महाघोर अघोरमूर्ते शान्त सरस्वतीकान्त कीनाट सहस्त्रमूर्ते महोद्भव विभो कालाग्निरुद्र रुद्र हर महीधरप्रिय सर्वतीर्थाधिवास हंस कामेश्वर केदाराधिपते परिपूर्ण मुचुकुन्द मधुनिवासिन् कृपाणपाणे भयङ्कर विद्याराज । दिखलायी पड़ रहा है, निश्चय ही पहले ( जन्ममें ) मैंने उसी राजपुत्रको पतिरूपसे वरण किया था । इसमें कुछ विचारनेकी आवश्यकता नहीं है । स्वर्णके समान वर्णवाले जो व्यक्ति श्वेत जटाभारको धारण किये हुए हैं वे निश्चय ही तपस्वियोंमें श्रेष्ठ ऋतध्वज ही हैं ( इसमें शङ्का नहीं है ) सखियोंसे हर्षित होकर निःसन्देह इन्हीं ऋतध्वजके कहकर वे सभी छतसे बैठकर कल्याण करनेवाले करने लगीं – ॥ ११६ – हे शर्व! हे शम्भो! गात्रवाले! हे तीनों लोकोंके यज्ञको विध्वस्त करनेवाले! । उसके बाद नन्दयन्तीने कहा- वह दूसरा व्यक्ति पुत्र जाबालि हैं । इस प्रकार उतरीं एवं शङ्करके सामने गीतका गान करने ( स्तुति १२० ॥ हे तीन नेत्रवाले! हे सुन्दर स्वामिन्! हे उमापते! हे दक्ष हे कामदेवके नाश करनेवाले! हे घोर! हे पापके नष्ट करनेवाले! हे महापुरुष! हे भयङ्कर मूर्तिवाले! हे सम्पूर्ण प्राणियोंके क्षय करनेवाले! हे शुभ करनेवाले! हे महेश्वर! हे त्रिशूलधारिन्! हे कामशत्रो! हे गुफामें रहनेवाले! हे दिगम्बर! हे महाशङ्ख शिरोभूषणवाले! हे जटाधर! हे कपालमालासे विभूषित शरीरवाले! हे वामचक्षु! हे वामदेव! हे प्रजाध्यक्ष! हे भगाक्षिके क्षयकारिन्! हे भीमसेन! हे महासेननाथ! हे पशुपते! हे कामदेवके जलानेवाले! हे चत्वरवासिन् ( चबूतरेपर वास करनेवाले )! हे शिव! हे महादेव! हे ईशान! हे शङ्कर! हे भीम! हे भव! हे वृषभध्वज! हे जटिल! हे प्रौढ! हे महानाट्येश्वर! हे भूरिरत्र ( रत्नराशि )! हे अविमुक्तक! हे रुद्र! हे रुद्रेश्वर! हे स्थाणो! हे एकलिङ्ग! हे कालिन्दीप्रिय! हे श्रीकण्ठ! हे नीलकण्ठ! हे अपराजित! हे रिपुभयङ्कर! हे सन्तोषपते! हे वामदेव! हे अघोर! हे तत्पुरुष! हे महाघोर! हे अघोरमूर्ते! हे शान्त! हे सरस्वतीकान्त! हे कीनाट! हे सहस्रमूर्ते! हे महोद्भव! हे विभो! हे कालाग्निरुद्र! हे रुद्र! हे हर! हे महीधरप्रिय! हे सर्वतीर्थाधिवास! हे हंस! हे कामेश्वर! हे केदाराधिपते! हे परिपूर्ण! हे मुचुकुन्द! हे मधुनिवासिन्! हे कपालपाणे! हे भयङ्कर! हे विद्याराज!

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३१४ श्री वामनपुराण [ अध्याय ६५ सोमराज कामराज रञ्जक अञ्जनराजकन्याहृदचल - । वसते समुद्रशायिन् गजमुख घण्टेश्वर गोकर्ण ब्रह्मयोने सहस्त्रवक्त्राक्षिचरण हाटकेश्वर नमोऽस्तु ते ॥

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ताः सर्व एवर्षिपार्थिवाः ।

द्रष्टुं त्रैलोक्यकर्तारं त्र्यम्बकं हाटकेश्वरम् ॥ १२१ ।

समारूढाश्च सुस्नाता ददृशुर्योषितश्च ताः ।

स्थितास्तु पुरतस्तस्य गायन्त्यो गेयमुत्तमम् ॥ १२२

ततः सुदेवतनयो विश्वकर्मसुतां प्रियाम् ।

दृष्ट्वा हृषितचित्तस्तु संरोहत्पुलको बभौ ॥ १२३

ऋतध्वजोऽपि तन्वङ्गीं दृष्ट्वा चित्राङ्गदां स्थिताम् ।

प्रत्यभिज्ञाय योगात्मा बभौ मुदितमानसः ॥ १२४

ततस्तु सहसाऽभ्येत्य देवेशं हाटकेश्वरम् ।

सम्पूजयन्तस्त्र्यक्षं ते स्तुवन्तः संस्थिताः क्रमात् ॥ १२५

चित्राङ्गदापि तान् दृष्ट्वा ऋतध्वजपुरोगमान् ।

समं ताभिः कृशाङ्गीभिरभ्युत्थायाभ्यवादयत् ॥ १२६

स च ताः प्रतिनन्द्यैव समं पुत्रेण तापसः ।

समं नृपतिभिर्हष्टः संविवेश यथासुखम् ॥ १२७

ततः कपिवरः प्राप्तो घृताच्या सह सुन्दरि ।

स्नात्वा गोदावरीतीर्थे दिदृक्षुहाटकेश्वरम् ॥ १२८

ततोऽपश्यत् सुतां तन्वीं घृताची शुभदर्शनाम् ।

साऽपि तां मातरे दृष्ट्वा हृष्टाऽभूद्वरवर्णिनी ॥ १२ ९

ततो घृताची स्वां पुत्रीं परिष्वज्य न्यपीडयत् ।

स्नेहात् सवाष्पनयनां मुहुस्तां परिजिघ्रती ॥ १३०

ततो ऋतध्वजः श्रीमान् कपिं वचनमब्रवीत् ।

गच्छानेतुं गुह्यकं त्वमञ्जनाद्रौ महाञ्जनम् ॥ १३१

हे सोमराज! हे कामराज! ( काली ) - के हृदयमें सदा हे गजमुख! हे घण्टेश्वर! हजार मुख, आँख एवं आपको नमस्कार है । इसी बीच समस्त लोकोंके कर्ता भगवान् हे रञ्जक! हे अञ्जनराजकन्या रहनेवाले! हे समुद्रशायिन्! हे गोकर्ण! हे ब्रह्मयोने! हे चरणवाले! हे हाटकेश्वर! ऋषि एवं राजालोग तीनों त्र्यम्बक हाटकेश्वरका दर्शन | करने वहाँ पहुँच गये और भलीभाँति स्नान करनेके बाद ऊपर चढ़कर उन लोगोंने देवताके अभिमुख | बैठकर गीत गाती हुई ( स्तुति करती हुई ) स्त्रियोंको । देखा । उसके बाद वसुदेवके पुत्र अपनी प्रिया विश्वकर्माकी पुत्रीको देखकर हर्षसे गद्गद हो गये । योगी ऋतध्वज भी तन्वङ्गी चित्राङ्गदाको वहाँ स्थित देख एवं पहचानकर महान् हर्षमें भर गये । उसके बाद सभी व्यक्ति शीघ्र ही देवाधिदेव हाटकेश्वर भगवान्‌के निकट गये एवं त्रिलोचनकी पूजाकर क्रमश: खड़े होकर स्तुति करने लगे ॥ १२१–१२५ ॥ चित्राङ्गदाने भी उन ऋतध्वज आदिको देखकर उन तन्वङ्गी ( कन्याओं ) - के साथ उठकर प्रणाम किया । पुत्रसहित उन तपस्वीने उन्हें आशीर्वाद दिया और वे प्रसन्नतासे राजाओंके साथ सुखपूर्वक बैठ गये । सुन्दरि! उसके बाद गोदावरीतीर्थमें स्नानकर हाटकेश्वर भगवान्‌का | दर्शन करनेकी इच्छावाला वह श्रेष्ठ बन्दर भी घृताचीके साथ वहाँ पहुँचा । फिर घृताचीने अपनी शोभाशालिनी कृशाङ्गी पुत्रीको देखा । वह सुन्दरी भी अपनी उस । माताको देखकर हर्षित हो गयी ॥ १२६–१२९ ॥ उसके बाद घृताचीने अपनी पुत्रीको भलीभाँति गले लगाया । स्नेहसे आँखोंमें आँसू भरकर वह ( अपनी ) पुत्रीको बार - बार सूँघने लगी – आशीर्वादात्मक शुभ भावना करने लगी । उसके बाद श्रीमान् ऋतध्वजने | कपिसे कहा – तुम महाजन नामके गुह्यकको ले आनेके

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अध्याय ६५ ] गालव - प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा - वेदवती - वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची- वृत्तान्त ३१५ पातालादपि दैत्येशं वीरं कन्दरमालिनम् स्वर्गाद् गन्धर्वराजानं पर्जन्यं शीघ्रमानय इत्येवमुक्ते मुनिना प्राह देववती कपिम् गालवं वानरश्रेष्ठ इहानेतुं त्वमर्हसि इत्येवमुक्ते वचने कपिर्मारुतविक्रमः गत्वाऽञ्जनं समामन्त्र्य जगामामरपर्वतम् पर्जन्यं तत्र चामन्त्र्य प्रेषयित्वा महाश्रमे सप्तगोदावरे तीर्थे पातालमगमत् कपिः तत्रामन्त्र्य महावीर्यं कपिः कन्दरमालिनम् पातालादभिनिष्क्रम्यं महीं पर्यचरज्जवी गालवं तपसो योनिं दृष्ट्वा माहिष्मतीमनु समुत्पत्यानयच्छीघ्रं सप्तगोदावरं जलम् तत्र स्नात्वा विधानेन सम्प्राप्तो हाटकेश्वरम् । ददृशे नन्दयन्ती च स्थितां देववतीमपि तं दृष्ट्वा गालवं चैव समुत्थायाभ्यवादयत्

स चार्चिष्यन्महादेवं महर्षीनभ्यवादयत् ।

ते चापि नृपतिश्रेष्ठास्तं सम्पूज्य तपोधनम् ॥

प्रहर्षमतुलं गत्वा उपविष्टा यथासुखम् ।

तेषूपविष्टेषु तदा वानरोपनिमन्त्रिताः ॥

समायाता महात्मानो यक्षगन्धर्वदानवाः । तानागतान् समीक्ष्यैव पुत्र्यस्ताः पृथुलोचनाः स्नेहार्द्रनयनाः सर्वास्तदा सस्वजिरे पितॄन् । नन्दयन्त्यादिका दृष्ट्वा सपितृका वरानना । सवाष्यनयना जाता विश्वकर्मसुता तदा । अथ तामाह स मुनिः सत्यं सत्यध्वजो वचः मा विषादं कृथाः पुत्रि पिताऽयं तव वानरः । सा तद्वचनमाकर्ण्य व्रीडोपहतचेतना कथं तु विश्वकर्माऽसौ वानरत्वं गतोऽधुना । दुष्पुत्र्यां मयि जातायां तस्मात् त्यक्ष्ये कलेवरम् इति संचिन्त्य मनसा ऋतध्वजमुवाच ह ॥ लिये अञ्जन नामक पर्वतपर चले जाओ । फिर पातालसे ॥ १३२ वीर दैत्येश्वर कन्दरमालीको और स्वर्गसे गन्धर्वराज पर्जन्यको यहाँ शीघ्र बुला लाओ । मुनिके इस प्रकार । कहनेपर देववतीने बन्दरसे कहा- कपिश्रेष्ठ! गालवको ॥ १३३ | भी आप यहाँ बुला लावें ॥ १३० - १३३ ॥ । ऐसा कहनेपर वायुके समान पराक्रमवाला कपि ॥१३४ अञ्जनपर्वतपर पहुँच गया और ( गुह्यकको ) आमन्त्रित कर पुनः सुमेरुपर्वतपर प्रविष्ट हो गया । वहाँ उसने । पर्जन्यको आमन्त्रित किया और सप्तगोदावरतीर्थमें ॥ १३५ स्थित महाश्रममें उन्हें भेजनेके बाद वह फिर पाताललोकमें प्रविष्ट हो गया । वहाँ ( जाकर उसने ) महापराक्रमी । कन्दरमालीको आमन्त्रित किया । वेगशाली बन्दर फिर ॥ १३६ पातालसे निकलकर पृथ्वीपर घूमने - फिरने लगा । तपोनिधि । गालवको माहिष्मतीके निकट देखकर उसने छलाँग ॥ १३७ भरी और उन्हें शीघ्र सप्तगोदावरके जलके निकट ला दिया । वहाँ विधानसे स्नान करनेके बाद वह हाटकेश्वरके समीप पहुँचा और उसने वहाँ बैठी हुई नन्दयन्ती तथा ॥ १३८ देववतीको भी देखा ॥ १३४–१३८ ॥ उन सभीने गालवको देखकर उठकर उनको । प्रणाम किया । उन्होंने भी महादेवकी पूजा कर महर्षियोंको १३ ९ प्रणाम किया । उन श्रेष्ठ राजाओंने भी उन तपस्वीकी पूजा की तथा वे अत्यन्त हर्षित होकर सुखपूर्वक बैठ १४० गये । उनके बैठ जानेपर कपिद्वारा आमन्त्रित किये गये यक्ष, महानुभाव गन्धर्व एवं दानव वहाँ आ गये । उन्हें आया हुआ देखते ही उन विशालनयना पुत्रियोंके नेत्रोंमें ॥ १४१ स्नेहसे आँसू भर आये । वे सभी अपने - अपने पिताके गले लग गयीं । नन्दयन्ती आदिको पिताके साथ उपस्थित १४२ हुई देखकर विश्वकर्माकी सुन्दरी पुत्रीके नेत्रोंमें ( पिताकी स्मृतिमें ) आँसू छलक आये । उसके बाद ऋतध्वज मुनिने ॥ १४३ | उससे सच्ची बात कह दी – ॥ १३ ९ – १४३ ॥ पुत्रि! तुम उदास मत होओ । यह बन्दर ही ॥ १४४ तुम्हारा पिता है । उस वचनको सुनकर वह लजा गयी; क्योंकि मुझ कुपुत्रीके जन्म लेनेके कारण ये विश्वकर्मा ॥ १४५ इस समय बन्दर हो गये हैं; अतः ( उसने सोचा- ) मैं अपने शरीरका त्याग करूँगी । मनमें इस प्रकार

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३१६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६५ परित्रायस्व मां ब्रह्मन् पापोपहतचेतनाम् ॥

पितृघ्नी मर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि ।

अथोवाच मुनिस्तन्वीं मा विषादं कृथाधुना ॥

भाव्यस्य नैव नाशोऽस्ति तन्मा त्याक्षीः कलेवरम् ।

भविष्यति पिता तुभ्यं भूयोऽप्यमरवर्द्धकिः ॥

जातेऽपत्ये घृताच्यां तु नात्र कार्या विचारणा ।

इत्येवमुक्ते वचने मुनिना भावितात्मना ॥

घृताची तां समभ्येत्य प्राह चित्राङ्गदां वचः ।

पुत्रि त्यजस्व शोकं त्वं मासैर्दशभिरात्मजः ॥

भविष्यति पितुस्तुभ्यं मत्सकाशान्न संशयः ।

इत्येवमुक्ता संहृष्टा बभौ चित्राङ्गदा तदा ॥

प्रतीक्षन्ती सुचार्वङ्गी विवाहे पितृदर्शनम् ।

सर्वास्ता अपि तावन्तं कालं सुतनुकन्यकाः ॥

प्रत्यैक्षन्त विवाहं हि तस्या एव प्रियेप्सया ।

ततो दशसु मासेषु समतीतेष्वथाप्सराः ॥

तस्मिन् गोदावरीतीर्थे प्रसूता तनयं नलम् ।

जातेऽपत्ये कपित्वाच्च विश्वकर्माप्यमुच्यत ॥

समभ्येत्य प्रियां पुत्रीं पर्यष्वजत चादरात् ।

ततः प्रीतेन मनसा सस्मार सुरवर्द्धकिः ॥

सुराणामधिपं शक्रं सहैव सुरकिन्नरैः ।

त्वष्टाऽथ संस्मृतः शक्रो मरुद्गणवृतस्तदा ॥

सुरैः सरुद्रैः सम्प्राप्तस्तत्तीर्थं हाटकाह्वयम् ।

समायातेषु देवेषु गन्धर्वेष्वप्सरस्सु च ॥

इन्द्रद्युम्नो मुनिश्रेष्ठमृतध्वजमुवाच ह ।

जाबालेर्दीयतां ब्रह्मन् सुता कन्दरमालिनः ॥

गृह्णातु विधिवत् पाणिं दैतेय्यास्तनयस्तव ।

नन्दयन्तीं च शकुनिः परिणेतुं स्वरूपवान् ॥

ममेयं वेदवत्यस्तु त्वाष्ट्रेयी सुरथस्य च ।

बाढमित्यब्रवीद्धष्टो मुनिर्मनुसुतं नृपम् ॥

१४६ | विचारकर उसने ऋतध्वजसे कहा – ब्रह्मन्! मैं पापसे नष्टमतिवाली हूँ । आप मेरी रक्षा करें । पिताका घात करनेवाली मैं मरना चाहती हूँ । अतः आप स्वीकृति दें । तब मुनिने उस तन्वङ्गीसे कहा- अब विषाद १४७ मत करो ॥ १४४ – १४७ ॥ भवितव्यताका विनाश नहीं होता - होनी होकर १४८ रहती है । इसलिये देहका परित्याग मत करो । घृताचीकी कोख से पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर तुम्हारे पिता फिर १४ ९ देवताओंके शिल्पी हो जायँगे – इसमें संदेह नहीं है । मनके ऊपर नियन्त्रण रखनेवाले मुनिके इस प्रकार कहनेपर घृताचीने चित्राङ्गदाके पास जाकर उससे १५० कहा - पुत्रि! तुम चिन्ता करना छोड़ दो । तुम्हारे | पिताद्वारा मुझसे दस महीनोंमें नि: संदेह एक पुत्र उत्पन्न होगा । ( फिर सुतरां शाप विमोचन हो जायगा । ) ऐसा १५१ कहनेपर चित्राङ्गदा हर्षित हो गयी॥१४८–१५१ ॥ सुन्दरी ( चित्राङ्गदा ) अपने विवाहमें मिलनेवाले १५२ पिताके दर्शनकी ( उत्सुकतासे ) प्रतीक्षा करने लगी । वे सुन्दरी सभी कन्याएँ भी प्रियकी प्राप्तिकी वाञ्छासे उसके विवाह के समयकी प्रतीक्षा करने लगीं । दस १५३ महीने बीत जानेपर अप्सराने उस गोदावरीतीर्थमें पुत्रको उत्पन्न किया, जो ( आगे चलकर ) नल १५४ ( नामक ) हुआ । पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर विश्वकर्मा भी वानरत्वसे छूट गये ॥ १५२ – १५४ ॥ अपनी प्रिय पुत्रीके पास जाकर उन्होंने उसको १५५ स्नेहपूर्वक गले लगाया । उसके बाद प्रसन्न मनसे देवशिल्पीने देवताओं एवं किन्नरोंसहित देवराज इन्द्रका १५६ स्मरण किया । देवशिल्पीके स्मरण करनेपर इन्द्र मरुद्गणों, देवों एवं रुद्रोंके साथ हाटक नामके तीर्थमें आ गये । १५७ देवताओं, गन्धर्वों और अप्सराओंके आनेपर इन्द्रद्युम्नने मुनिश्रेष्ठ ऋतध्वजसे कहा – ब्रह्मन्! जाबालिको १५८ कन्दरमालीकी कन्याका दान कर दें । आपका पुत्र विधिवत् दैत्यनन्दिनीका पाणिग्रहण कर ले । स्वरूपवान् १५ ९ शकुनि नन्दयन्तीसे विवाह करें ॥ १५५–१५९ ॥ यह वेदवती मेरी ( इन्द्रद्युम्नकी ) और त्वष्टा ( विश्वकर्मा ) - की पुत्री ( चित्राङ्गदा ) सुरथकी पत्नी १६० । हो । मुनिने मनुपुत्र राजासे कहा – ठीक है ।

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अध्याय ६६ ] दण्डक - अरजाके प्रसङ्गमें

ततोऽनुचक्रुः संहृष्टा विवाहविधिमुत्तमम् ।

ऋत्विजोऽभूद् गालवस्तु हुत्वा हव्यं विधानतः ॥

गायन्ते तत्र गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा ।

आदौ जाबालिनः पाणिर्गृहीतो दैत्यकन्यया ॥

इन्द्रद्युम्नेन तदनु वेदवत्या विधानतः ।

ततः शकुनिना पाणिर्गृहीतो यक्षकन्यया ॥

चित्राङ्गदायाः कल्याणि सुरथः पाणिमग्रहीत् ।

एवं क्रमाद् विवाहस्तु निर्वृत्तस्तनुमध्यमे ॥

वृत्ते मुनिर्विवाहे तु शक्रादीन् प्राह दैवतान् ।

अस्मिंस्तीर्थे भवद्भिस्तु सप्तगोदावरे सदा ॥

स्थेयं विशेषतो मासमिमं माधवमुत्तमम् ।

बाढमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा दिवं क्रमात् ॥

मुनयो मुनिमादाय सपुत्रं जग्मुरादरात् ।

भार्याश्चादाय राजानः स्वं स्वं नगरमागताः ॥

प्रहृष्टाः सुखिनस्तस्थुः भुञ्जते विषयान् प्रियान् ।

चित्राङ्गदायाः कल्याणि एवं वृत्तं पुरा किल ।

तन्मां कमलपत्राक्षि भजस्व ललनोत्तमे ॥

इत्येवमुक्त्वा नरदेवसूनु-स्तां भूमिदेवस्य सुतां वरोरुम् । स्तुवन्मृगाक्षीं मृदुना क्रमेण सा चापि वाक्यं नृपतिं बभाषे ॥। शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक- शिव - सन्दर्भ ३१७ उसके बाद उन लोगोंने प्रसन्नतापूर्वक भलीभाँति १६१ विवाहकी विधिको पूरा किया । विधिसे हव्यका हवन करनेवाले गालव ऋत्विक् बने । उस समय वहाँ गन्धर्वोंने गाना गाया और अप्सराओंने नृत्य किया । १६२ सबसे पहले दैत्य - कन्याने जाबालिका पाणिग्रहण किया । कल्याणि! उसके बाद विधिपूर्वक इन्द्रद्युम्नने १६३ वेदवतीका, शकुनिने यक्ष- कन्याका तथा सुरथने चित्राङ्गदाका पाणिग्रहण किया । ( कृशोदरि! ) इस प्रकार १६४ विवाहकार्य क्रमशः सम्पन्न हुआ ॥ १६० – १६४ ॥ विवाह - कार्य सम्पन्न हो जानेपर मुनि ( ऋतध्वज ) -१६५ ने इन्द्र आदि देवताओंसे कहा - इस सप्तगोदावर तीर्थमें आपलोग सदा निवास करें । विशेषरूपसे इस उत्तम वैशाखके महीनेमें आपलोग यहाँ अवश्य रहें । १६६ देवतालोग ' ऐसा ही हो ' – ( ऐसा ) कहकर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग चले गये । मुनिलोग पुत्रसहित मुनि ( ऋतध्वज ) -१६७ को सादर साथ लेकर चले गये । राजालोग भी अपनी - अपनी पत्नीके साथ अपने - अपने नगरमें आ गये । सभी लोग प्रिय विषयोंका उपभोग करते हुए आनन्दपूर्वक रहने लगे । कल्याणि! चित्राङ्गदाका पूर्व १६८ वृत्तान्त इस प्रकारका है । इसलिये सरोजनयने! ललनोत्तमे! तुम मुझे अङ्गीकार करो । ऐसा कहकर राजपुत्र ( दण्ड ) ब्राह्मणकी उस सुन्दरी मृगनयनी पुत्रीकी कोमल वाणीसे स्तुति करने लगे । उसने भी राजासे १६ ९ | ( आगेवाला वचन ) कहा – ॥ १६५–१६९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पैंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६५ ॥

छाछठवाँ अध्याय दण्डक - अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप, प्रह्लादका अन्धकको उपदेश और अन्धक- शिव - सन्दर्भ अरजा उवाच अरजाने कहा - पृथिवीपते! आपके अधिक कहने से क्या लाभ? ( थोड़ेमें समझ लीजिये कि पिताके ) शापसे नात्मानं तव दास्यामि बहुनोक्तेन किं तव । आपकी और अपनी रक्षा करती हुई ( ही ) मैं अपनेको रक्षन्ती भवतः शापादात्मानं च महीपते ॥ १ आपके लिये समर्पित नहीं करूँगी ॥ १ ॥

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३१८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६६ प्रह्लाद उवाच

इत्थं विवदमानां तां भार्गवेन्द्रसुतां बलात् ।

कामोपहतचित्तात्मा व्यध्वंसयत मन्दधीः ॥

तां कृत्वा च्युतचारित्रां मदान्धः पृथिवीपतिः ।

निश्चक्रामाश्रमात् तस्माद् गतश्च नगरं निजम् ॥

साऽपि शुक्रसुता तन्वी अरजा रजसाप्लुता ।

आश्रमादथ निर्गत्य बहिस्तस्थावधोमुखी ॥

चिन्तयन्ती स्वपितरं रुदती च मुहुर्मुहुः ।

महाग्रहोपतप्तेव रोहिणी शशिनः प्रिया ॥

ततो बहुतिथे काले समाप्ते यज्ञकर्मणि ।

पातालादागमच्छुक्रः स्वमाश्रमपदं मुनिः ॥

आश्रमान्ते च ददृशे सुतां दैत्य रजस्वलाम् ।

मेघलेखामिवाकाशे संध्यारागेण रञ्जिताम् ॥

तां दृष्ट्वा परिपप्रच्छ पुत्रि केनासि धर्षिता ।

कः क्रीडति सरोषेण सममाशीविषेण हि ॥

कोऽद्यैव याम्यां नगरीं गमिष्यति सुदुर्मतिः ।

कस्त्वां शुद्धसमाचारां विध्वंसयति पापकृत् ॥

ततः स्वपितरं दृष्ट्वा कम्पमाना पुनः पुनः ।

रुदन्ती व्रीडयोपेता मन्दं मन्दमुवाच ह ॥

तव शिष्येण दण्डेन वार्यमाणेन चासकृत् ।

बलादनाथा रुदती नीताऽहं वचनीयताम् ॥

एतत् पुत्र्या वचः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः ।

उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥

यस्मात् तेनाविनीतेन मत्तो ह्यभयमुत्तमम् ।

गौरवं च तिरस्कृत्य च्युतधमाऽरजा कृता ॥

तस्मात् सराष्ट्रः सबलः सभृत्यो वाहनैः सह ।

सप्तरात्रान्तराद् भस्म ग्राववृष्ट्या भविष्यति ॥

प्रह्लादने कहा – कामसे अंधे हुए उस मूर्खने इस प्रकार विवाद ( निषेध ) करती हुई श्रेष्ठ भार्गव २ कुलमें प्रसूत उस कन्याको हठात् अपावन ( ध्वस्तशील ) कर दिया । मदसे अंधा बना हुआ वह चरित्रसे च्युत हो ३ करके उस आश्रमसे बाहर निकलकर अपने नगर चला गया । उसके बाद रजसे लपटायी वह कृशाङ्गी शुक्रपुत्री अरजा भी आश्रमसे बाहर निकलकर नीचे मुख ४ लटकाये बैठ गयी । राहुसे पीड़ित चन्द्र- प्रिया रोहिणीके समान वह अपने पिताका चिन्तन करती हुई बारम्बार ५ ( बिलख - बिलखकर ) रोने लगी ॥२-५ ॥ उसके बाद जब बहुत तिथिवाला समय बीत गया ६ और यज्ञ समाप्त हो गया तब शुक्रमुनि पातालसे अपने आश्रममें आये । दैत्य! उन्होंने आश्रमसे बाहर आकाशमें ७ | सन्ध्याके समय लालिमासे रञ्जित मेघमालाकी तरह धूलसे लिपटी हुई अपनी पुत्रीको देखा । उसे देखकर उन्होंने पूछा – - पुत्रि! किसने तुम्हारा धर्षण ( अपमान ) ८ किया है? क्रोधभरे साँपसे कौन खेल कर रहा है? पवित्र आचरणवाली तुम्हें शीलसे च्युत कर कौन दुर्बुद्धि ९ पापी आज ही यमपुरी जानेवाला है? उसके बाद अपने पिताको देखकर बारम्बार काँपती, रोती एवं लजाती हुई १० अरजाने धीरे - धीरे कहा – ॥ ६-१० ॥ बार - बार बरजनेपर भी आपके शिष्य दण्डने ११ रोती हुई मुझ अनाथाको बलपूर्वक निन्दनीया बना दिया है - हमारा शीलभ्रंश कर दिया है । कन्याकी इस बातको सुनकर शुक्राचार्यकी आँखें क्रोधसे अत्यन्त १२ लाल हो गयीं । उन्होंने आचमन करके शुद्ध होकर यह ( शाप ) वचन कहा - यतः उस उद्दण्डने मुझसे प्राप्त उत्तम अभय एवं गौरवको तिरस्कृतकर अरजाको १३ धर्मसे किया है, अतः वह सात रात्रियों ( दिनों ) -में उपवृष्टि कारण राष्ट्र, सेना, भृत्य एवं वाहनोंसहित १४ विनष्ट हो जायगा – हो जाय॥११–१४ ॥ उन मुनिश्रेष्ठने ऐसा कहकर दण्डको शाप देनेके शप्त्वा स दण्डं स्वसुतामुवाच । बाद अपनी पुत्रीसे कहा – पुत्रि! कल्याणि! पापसे त्वं पापमोक्षार्थमिहैव पुत्रि तिष्ठस्व कल्याणि तपश्चरन्ती ॥ १५ | छुटकारा पानेके लिये तुम तपस्या करती हुई यहीं रहो ।

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अध्याय ६६ ] दण्डक - अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक - शिव - सन्दर्भ ३१ ९

शप्त्वेथं भगवाञ् शुक्रो दण्डमिक्ष्वाकुनन्दनम् ।

जगाम शिष्यसहितः पातालं दानवालयम् ॥

दण्डोऽपि भस्मसाद् भूतः सराष्ट्रबलवाहनः ।

महता ग्राववर्षेण सप्तरात्रान्तरे तदा ॥

एवं दण्डकारण्यं परित्यजन्ति देवताः ।

आलयं राक्षसानां तु कृतं देवेन शम्भुना ॥

एवं परकलत्राणि नयन्ति सुकृतीनपि ।

भस्मभूतान् प्राकृतांस्तु महान्तं च पराभवम् ॥

तस्मादन्धक दुर्बुद्धिर्न कार्या भवता त्वियम् ।

प्राकृताऽपि दहेन्नारी किमुताहोद्रिनन्दिनी ॥

शङ्करोऽपि न दैत्येश शक्यो जेतुं सुरासुरैः ।

द्रष्टुमप्यमितौजस्कः किमु योधयितुं रणे ॥

पुलस्त्य उवाच

इत्येवमुक्ते वचने क्रुद्धस्ताम्रेक्षणः श्वसन् ।

वाक्यमाह महातेजाः प्रह्लादं चान्धकासुरः ॥

किं ममासौ रणे योद्धुं शक्तस्त्रिणयनोऽसुर ।

एकाकी धर्मरहितो भस्मारुणितविग्रहः ॥

नान्धको बिभियादिन्द्रान्नामरेभ्यः कथंचन ।

स कथं वृषपत्राक्षाद् बिभेति स्त्रीमुखेक्षकात् ॥

तच्छ्रुत्वाऽस्य वचो घोरं प्रह्लादः प्राह नारद ।

न सम्यगुक्तं भवता विरुद्धं धर्मतोऽर्थतः ॥

हुताशनपतङ्गाभ्यां सिंहक्रोष्टुकयोरिव ।

गजेन्द्रमशकाभ्यां च रुक्मपाषाणयोरिव ॥

एतेषाभिरुदितं यावदन्तरमन्धक ।

तावदेवान्तरं चास्ति भवतो वा हरस्य च ॥

वारितोऽसि मया वीर भूयो भूयश्च वार्यसे ।

शृणुष्व वाक्यं देवर्षेरसितस्य महात्मनः ॥

भगवान् शुक्र इक्ष्वाकुनन्दन दण्डको इस प्रकार शाप १६ देकर शिष्यके साथ दानवोंके निवास स्थान पाताललोकमें चले गये । उसके बाद दण्ड भी बहुत बड़ी उपलवृष्टिके कारण सात रात्रियोंके भीतर ही अपने राष्ट्र, सेना और १७ वाहनोंके साथ नष्ट हो गया । यही कारण है कि देवताओंने दण्डकारण्यको छोड़ दिया और शम्भुने उसे १८ । राक्षसोंका स्थान बना दिया ॥ १५ – १८ ॥ इस प्रकार ( जैसा कि ऊपर वर्णित है ) १ ९ परनारियाँ ( अपनेको अपवित्र करनेवाले ) पुण्यात्माओंको भी जलाकर राख ( नष्ट ) कर देती हैं, फिर साधारण मनुष्य तो बहुत बड़ा तिरस्कार प्राप्त करते हैं । अतः अन्धक! आपको ऐसी दुर्बुद्धि नहीं करनी चाहिये । २० साधारण स्त्री भी जला सकती है तो पार्वतीका क्या कहना । दैत्येश! सुर या असुर कोई भी महादेवको नहीं जीत सकता । जब रणमें अत्यधिक ओजसे सम्पन्न शंकरको देखा भी नहीं जा सकता तब उनसे २१ युद्ध करना कैसे सम्भव है ॥१ ९ –२१ ॥ पुलस्त्यजी बोले- ऐसा वचन कहनेपर क्रुद्ध एवं लाल - लाल आँखें किये हुए महातेजस्वी अन्धकासुरने २२ | लंबी साँस लेते हुए प्रह्लादसे कहा - असुर! क्या शरीरपर राख लपेटे, ( किंतु, लोक ) धर्मसे रहित अकेला वह त्रिनयन लड़ाईके मैदानमें मुझसे युद्ध कर २३ सकता है? जो अन्धक इन्द्र या ( अन्य ) देवताओंसे कभी नहीं डरता वह बैलकी सवारी करनेवाले तथा स्त्रीका मुख निहारनेवाले त्रिनेत्र ( शंकर ) - से कैसे डर २४ सकता है? नारद! उसके उस कठोर वचनको सुनकर प्रह्लादने कहा- आप यह उचित नहीं कह रहे हैं । आपका २५ कहना धर्म एवं अर्थके विपरीत है ॥ २२–२५ ॥ अन्धक! अनि और जुगनू, सिंह और सियार, २६ गजेन्द्र और मशक तथा सोने और पत्थरमें जितना अन्तर कहा जाता है, उतना ही अन्तर आप और शङ्करकी २७ तुलनामें है । वीर! आपको मैंने रोका है और ( अब भी ) २८ । बार - बार रोक रहा हूँ । आप देवर्षि असितका वचन सुनें-

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३२० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६६ यो धर्मशील जितमानरोषो विद्याविनीतो न परोपतापी । स्वदारतुष्टः परदारवर्जी न तस्य लोके भयमस्ति किंचित् ॥ यो धर्महीनः कलहप्रियः सदा परोपतापी श्रुतिशास्त्रवर्जितः । परार्थदारेप्सुरवर्णसंगमी सुखं न विन्देत परत्र चेह ॥ धर्मान्वितोऽभूद् भगवान् प्रभाकरः संत्यक्तरोषश्च मुनिः स वारुणिः । विद्याऽन्वितोऽभून्मनुरर्कपुत्रः स्वदारसंतुष्टमनास्त्वगस्त्यः ॥ एतानि पुण्यानि कृतान्यमभि-र्मया निबद्धानि कुलक्रमोक्त्या । तेजोऽन्विताः शापवरक्षमाश्च जाताश्च सर्वे सुरसिद्धपूज्याः ॥ अधर्मऽयुक्तोऽङ्गसुतो बभूव विभुश्च नित्यं कलहप्रियोऽभूत् । परोपतापी नमुचिर्दुरात्मा पराबलेप्सुर्नहुषश्च राजा ॥ परार्थलिप्सुर्दितिजो हिरण्यदृक् मूर्खस्तु तस्याप्यनुजः सुदुर्मतिः । अवर्ण संगी दुरुत्तमौजा एते विनष्टास्त्वनयात् पुरा हि ॥

तस्माद् धर्मो न संत्याज्यो धर्मो हि परमा गतिः ।

धर्महीना नरा यान्ति रौरवं नरकं महत् ॥

धर्मस्तु गदितः पुम्भिस्तारणे दिवि चेह च ।

पतनाय तथाऽधर्म इह लोके परत्र च ॥

त्याज्यं धर्मान्वितैर्नित्यं परदारोपसेवनम् ।

नयन्ति परदारा हि नरकानेकविंशतिम् ।

सर्वेषामपि वर्णानामेष धर्मो ध्रुवोऽन्धक ॥

परार्थपरदारेषु यदा वाञ्छां करिष्यति ।

स याति नरकं घोरं रौरवं बहुलाः समाः ॥

जो व्यक्ति धर्मनिष्ठ, अभिमान और क्रोधको जीतनेवाला, विद्यासे विनम्र, किसीको दुःख न देनेवाला, अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट तथा परस्त्रीका त्याग करनेवाला होता है, उसे २ ९ संसारमें कोई भय नहीं होता ॥ २६- २ ९ ॥ जो व्यक्ति धर्मसे हीन, कलहसे प्रेम रखनेवाला, सदा दूसरोंको दुःख देनेवाला, वेद - शास्त्र ( - के अध्ययन ) -से रहित, दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीकी इच्छा ३० रखनेवाला तथा भिन्न वर्णके साथ सम्बन्ध करनेवाला होता है, वह इस लोक और परलोकमें सुख नहीं पा सकता । भगवान् सूर्य धर्मसे युक्त थे, महर्षि वारुणि ( वसिष्ठ ) ने क्रोध छोड़ दिया था, सूर्यपुत्र मनु विद्यावान् ३१ थे और अगस्त्य ऋषि अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट थे । मैंने कुलके क्रमानुसार इन पुण्य करनेवालोंका उल्लेख किया है । शाप और वर देनेमें समर्थ ये सभी ३२ तेजस्वीलोग देवताओं और सिद्धोंके पूज्य हुए । अङ्गपुत्र ( वेन ) अधार्मिक और शक्तिशाली तथा नित्य कलहप्रिय था । दुरात्मा नमुचि परसंतापी एवं राजा नहुष परस्त्रीपर ३३ अधिकार प्राप्त करना चाहता था ॥ ३० – ३३ ॥ दितिका पुत्र हिरण्याक्ष परधनका लालची था । उसका छोटा भाई दुर्बुद्धि एवं मूर्ख था तथा पराक्रमी यदु भिन्न जातिके साथ सम्बन्ध करनेवाला था । ये ३४ सभी पूर्वकालमें दुर्नीतिके कारण नष्ट हो गये । इसलिये धर्मको नहीं छोड़ना चाहिये; क्योंकि धर्म ही उत्तम ३५ गति है । धर्मसे हीन मनुष्य महान् रौरव नरकमें जाते हैं । पूर्वजोंने धर्मको ही परलोकको पार करनेवाला बताया है तथा अधर्मको इस लोक और परलोकमें ३६ पतनका हेतु बताया है । धर्मनिष्ठ व्यक्तियोंको परस्त्रीका सेवन करना सदैव वर्जनीय बताया है यतः परस्त्रियाँ इक्कीस नरकोंमें ले जाती हैं । अन्धक! सभी वर्णों के ३७ लिये यह निश्चित धर्म है॥३४–३७ ॥ जो मनुष्य दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीमें कामना ३८ | करता है, वह बहुत वर्षोंके लिये भयंकर रौरव नरकमें