वामन पुराण — पृष्ठ 421–430

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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अध्याय ८४ ] प्रह्लादके तीर्थयात्रा - प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४११ चौरासीवाँ अध्याय प्रह्लादके तीर्थयात्रा - प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना, गजेन्द्रद्वारा विष्णुकी स्तुति, गज - ग्राहका उद्धार एवं ' गजेन्द्रमोक्षणस्तोत्र ' की फलश्रुति नारद उवाच

यान् जप्यान् भगवद्भक्त्या प्रह्लादो दानवोऽजपत् ।

गजेन्द्रमोक्षणादींस्तु चतुरस्तान् वदस्व मे ॥

पुलस्त्य उवाच

शृणुष्व कथयिष्यामि जप्यानेतांस्तपोधन ।

दुःस्वप्ननाशो भवति यैरुक्तैः संश्रुतैः स्मृतैः ॥

गजेन्द्रमोक्षणं त्वादौ शृणुष्व तदनन्तरम् ।

सारस्वतं ततः पुण्यौ पापप्रशमनौ स्तवौ ॥

सर्वरत्नमयः श्रीमांस्त्रिकूटो नाम पर्वतः ।

सुतः पर्वतराजस्य सुमेरोर्भास्करद्युतेः ॥

क्षीरोदजलवीच्यग्रैधतामलशिलातलः I उत्थितः सागरं भित्त्वा देवर्षिगणसेवितः ॥ नारदजीने कहा- दनुवंशमें उत्पन्न हुए प्रह्लादने भगवान्‌की भक्तिसे भावित होकर जप ( पाठ ) करनेयोग्य १ गजेन्द्रमोक्षणादि जिन चार स्तोत्रोंका जप किया था उन चारों स्तोत्रोंको आप मुझे बतलावें ॥ १ ॥

पुलस्त्यजी बोले – तपोधन! मैं उन ( जप करनेयोग्य ) स्तोत्रोंका वर्णन करता हूँ जिनके कहने, २ सुनने और स्मरण करनेसे दुःस्वप्नोंका विनाश होता है उसे आप सुनें । पहले गजेन्द्रमोक्षणस्तोत्र सुनिये । उसके बाद सारस्वतस्तोत्र एवं उसके बाद पापोंके प्रशमन ३ करनेवाले ( दो पवित्र ) स्तोत्रोंका वर्णन करूँगा । सूर्य सदृश कान्तिवाले पर्वतराज सुमेरुका पुत्र सर्वरत्नोंसे भरा श्रीसे सम्पन्न त्रिकूट नामका एक पर्वत है । क्षीरसागरके ४ जलकी लहरोंसे धुले हुए निर्मल शिलातलवाला वह पर्वत समुद्रका भेदन कर उसके ऊपर निकल आया है एवं ५ देवता और ऋषिगण वहाँ सदा निवास करते हैं॥२–५ ॥

अप्सरोभिः परिवृतः श्रीमान् प्रस्रवणाकुलः ।

गन्धर्वैः किन्नरैर्यक्षैः सिद्धचारणपन्नगैः ॥

विद्याधरैः सपत्नीकैः संयतैश्च तपस्विभिः ।

वृकद्वीपिगजेन्द्रैश्च वृतगात्रो विराजते ॥

पुन्नागैः कर्णिकारैश्च बिल्वामलकपाटलैः ।

चूतनीपकदम्बैश्च चन्दनागुरुचम्पकैः ॥

शालैस्तालैस्तमालैश्च सरलार्जुनपर्पटैः ।

तथान्यैर्विविधैर्वृक्षैः सर्वतः समलङ्कृतः ॥

अप्सराओंसे घिरा, झरते हुए झरनोंवाला, गन्धर्वों, ६ किन्नरों, यक्षों, सिद्धों, चारणों, पन्नगों, पत्नीके साथ विद्याधरों, संयमका पालन करनेवाले तपस्वियों और ७ भेड़ियों, चीतों एवं गजेन्द्रोंसे भरा - पूरा वह शोभाशाली पर्वत अत्यन्त सुशोभित है । पुंनाग, कर्णिकार, बिल्व, आमलक, पाटल, आम्र, नीप, कदम्ब, चन्दन, अगुरु, ८ चम्पक, शाल, ताल, तमाल, सरल, अर्जुन, पर्पट तथा दूसरे बहुत प्रकारके वृक्षोंसे वह पर्वत सब तरहसे ९ | सुशोभित है ॥६ – ९ ॥

पृष्ठ 422

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४१२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८४

नानाधात्वङ्कितैः शृङ्गैः प्रस्रवद्भिः समन्ततः ।

शोभितो रुचिरप्रख्यैस्त्रिभिर्विस्तीर्णसानुभिः ॥

मृगैः शाखामृगैः सिंहैर्मातङ्गैश्च सदामदैः ।

जीवंजीवकसंघुष्टैश्चकोरशिखिनादितैः ॥

तस्यैकं काञ्चनं शृङ्गं सेवते यं दिवाकरः ।

नानापुष्पसमाकीर्णं नानागन्धादिवासितम् ॥

द्वितीयं राजतं शृङ्गं सेवते यं निशाकरः ।

पाण्डुराम्बुदसंकाशं तुषारचयसंनिभम् ॥

वज्रेन्द्रनीलवैडूर्यतेजोभिर्भासयन् दिशः ।

तृतीयं ब्रह्मसदनं प्रकृष्टं शृङ्गमुत्तमम् ॥

न तत् कृतघ्नाः पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः ।

नातप्ततपसो लोके ये च पापकृतो जनाः ॥

तस्य सानुमतः पृष्ठे सरः काञ्चनपङ्कजम् ।

कारण्डवसमाकीर्णं राजहंसोपशोभितम् ॥

कुमुदोत्पलकह्लारैः पुण्डरीकैश्च मण्डितम् ।

कमलैः शतपत्रैश्च काञ्चनैः समलङ्कृतम् ॥

पत्रैर्मरकतप्रख्यैः पुष्पैः काञ्चनसंनिभैः ।

गुल्मैः कीचकवेणूनां समन्तात् परिवेष्टितम् ॥

तस्मिन् सरसि दुष्टात्मा विरूपोऽन्तर्जलेशयः ।

आसीद् ग्राहो गजेन्द्राणां रिपुराकेकरेक्षणः ॥

अथ दन्तोज्ज्वलमुखः कदाचिद् गजयूथपः ।

मदस्त्रावी जलाकाङ्क्षी पादचारीव पर्वतः ॥

वासयन्मदगन्धेन गिरिमैरावतोपमः ।

गजो ह्यञ्जनसंकाशो मदाच्चलितलोचनः ॥

तृषितः पातुकामोऽसौ अवतीर्णश्च तज्जलम् ।

सलीलः पङ्कजवने यूथमध्यगतश्चरन् ॥

वह पर्वत भाँति - भाँतिकी धातुओंसे चमकती १० चोटियों, चारों ओरसे बहनेवाले झरनों और अत्यन्त | मनोहर तथा सुदूर देशमें फैले हुए तीन शिखरोंसे शोभित है । वह पर्वत हरिण, बन्दर, सिंह, मदसे मतवाले हाथी, ११ चातक, चकोर एवं मोर आदिके शब्दोंसे सदा शब्दायमान होता रहता है । कई प्रकारके फूलोंसे भरे - पूरे एवं तरह-१२ तरहकी सुगन्धोंसे सुवासित उसके एक सुनहले शिखरका सेवन सूर्य करते हैं । सफेद बादलोंकी तरह एवं बर्फके ढेरके समान चाँदी जैसी उसकी दूसरी चोटीका सेवन १३ चन्द्रमा करते हैं ॥ १०–१३ ॥ हीरा, इन्द्रनील, वैडूर्य आदि रत्नोंकी चमकसे दिशाओंको प्रकाशित करनेवाला उसका अत्यन्त उत्तम १४ तीसरा शिखर ब्रह्माका निवास स्थान है । कृतघ्न, क्रूर, नास्तिक, तपस्यासे हीन एवं लोकमें पापकर्म करनेवाले १५ मनुष्य उसे नहीं देख सकते । उस पर्वतके पीछेकी ओर कमलोंसे युक्त, कारण्डव पक्षियोंसे भरे, राजहंसोंसे सुशोभित, कुमुद, उत्पल, कहार, पुण्डरीक आदि १६ अनेक प्रकारके सुनहले कमलोंसे अलङ्कृत एवं सुनहले शतपत्रोंवाले तथा अन्य प्रकारके कमलोंसे ( और भी ) सुशोभित एवं मरकतके सदृश पत्तों १७ तथा सोनेके समान पुष्पों और हवासे चूँ - चूँ शब्द करनेवाले बाँसके झाड़ोंसे चारों ओरसे घिरा एक १८ सरोवर है ॥ १४ – १८ ॥ उस सरोवरके जलमें हाथियोंका शत्रु दुष्ट १ ९ स्वभावका आधी खुली आँखोंवाला कुरूप एक मगर रहता था । एक समय उज्ज्वल दाँतोंवाला, मदस्रावी, २० पैरसे चलनेवाले पर्वतके समान, मदके गन्धसे वासित ऐरावतके सदृश अञ्जनकी भाँति काला, मदके कारण २१ चञ्चल नेत्रोंवाला, प्यासा एक गजयूथपति पानी पीनेकी इच्छासे उस सरोवरके जलमें पैठा और कमलोंके समूहमें २२ । अपने झुंडके बीचमें रहकर क्रीडा करने लगा ।

पृष्ठ 423

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अध्याय ८४ ] प्रह्लादके तीर्थयात्रा - प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१३

गृहीतस्तेन रौद्रेण ग्राहेणाव्यक्तमूर्तिना ।

पश्यन्तीनां करेणूनां क्रोशन्तीनां च दारुणम् ॥

ह्रियते पङ्कजवने ग्राहेणातिबलीयसा ।

वारुणैः संयतः पाशैर्निष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥

वेष्ट्यमानः सुघोरैस्तु पाशैर्नागो दृढैस्तथा ।

विस्फूर्य च यथाशक्ति विक्रोशंश्च महारवान् ॥

व्यथितः स निरुत्साहो गृहीतो घोरकर्मणा ।

परमापदमापन्नो मनसाऽचिन्तयद्धरिम् ॥

स तु नागवरः श्रीमान् नारायणपरायणः ।

तमेव शरणं देवं गतः सर्वात्मना तदा ॥

एकात्मा निगृहीतात्मा विशुद्धेनान्तरात्मना । जन्मजन्मान्तराभ्यासाद् भक्तिमान् गरुडध्वजे ।

नान्यं देवं महादेवात् पूजयामास केशवात् ।

मथितामृतफेनाभं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥

सहस्रशुभनामानमादिदेवमजं विभुम् ।

प्रगृह्य पुष्कराग्रेण काञ्चनं कमलोत्तमम् ।

आपद्विमोक्षमन्विच्छन् गजः स्तोत्रमुदीरयत् ॥

गजेन्द्र उवाच

ॐ नमो मूलप्रकृतये अजिताय महात्मने ।

अनाश्रिताय देवाय निःस्पृहाय नमोऽस्तु ते ॥

नम आद्याय बीजाय आर्षेयाय प्रवर्तिने ।

अनन्तराय चैकाय अव्यक्ताय नमो नमः ॥

नमो गुह्याय गूढाय गुणाय गुणवर्तिने ।

अप्रतर्क्याप्रमेयाय अतुलाय नमो नमः ॥

नमः शिवाय शान्ताय निश्चिन्ताय यशस्विने ।

सनातनाय पूर्वाय पुराणाय नमो नमः ॥

( जलके भीतर ) अपने शरीरको छिपाये हुए एक २३ भयंकर ग्राहने उसे पकड़ लिया । करुण स्वरसे चिग्घाड़ कर रही हथिनियोंके देखते - ही - देखते अत्यन्त बलवान् ग्राह उसे कमलोंसे संकुल जलमें खींच ले गया और वरुणके पाशोंसे बाँधकर उसे चेष्टारहित एवं गतिहीन २४ ( विवश ) कर दिया ॥ १ ९ –२४ ॥ वहाँ सुदृढ और भयङ्कर पाशोंसे आबद्ध हो २५ जानेके कारण गजराज यथाशक्ति छटपटाकर ऊँचे स्वरसे चिग्घाड़ने लगा । क्रूर कर्मवाले ( उस ग्राह ) -के द्वारा पकड़े जानेपर वह पीड़ित और उत्साहरहित हो गया । २६ भारी विपत्तिमें पड़कर वह मनसे भगवान् श्रीहरिका ध्यान करने लगा । वह सुन्दर गजराज ( पूर्वजन्मका ) २७ नारायणका भक्त था । इसलिये वह उस समय सर्वतोभावेन उन्हीं देवकी शरणमें प्रपन्न हो गया । वह गजराज जन्म-जन्मान्तरके अभ्याससे एकाग्र एवं संयतचित्त होकर विशुद्ध अन्तःकरणसे गरुडध्वज भगवान् विष्णुकी भक्ति में २८ लग गया था । उसने महान् देव केशव ( श्रीविष्णु ) -के सिवा अन्य देवताओंकी पूजा नहीं की । उस गजने मथे हुए अमृतके २ ९ और गदाको आदिदेव एवं ध्यान किया स्वर्ण - कमल ३० इच्छासे इस गजेन्द्र फेनके समान कान्तिवाले, शङ्ख तथा चक्र धारण करनेवाले, सहस्रों शुभ नामोंवाले, अजन्मा सर्वव्यापक विष्णु ( नारायण ) - का और अपने शुण्डके अग्रभागमें एक उत्तम लेकर ( इस ) आपत्तिसे मुक्ति प्राप्त करनेकी स्तोत्रका पाठ करने लगा ॥ २५ – ३० ॥ बोला - ॐ मूलप्रकृतिस्वरूप महान् आत्मा अजित विष्णुभगवान्‌को नमस्कार है । अन्योंपर आश्रित न रहनेवाले एवं ( किसी वस्तुकी प्राप्तिकी ) इच्छासे ३१ रहित आप देवको नमस्कार है । आद्यबीजस्वरूप, ऋषियोंके आराध्यदेव संसारचक्रके प्रवर्तक आपको नमस्कार है । अन्तररहित - सर्वत्र व्याप्त एकमात्र ३२ अव्यक्तको पुनः पुनः नमस्कार है । गुह्य, गूढ़, गुणस्वरूप एवं गुणोंमें रहनेवालेको नमस्कार है । तर्कसे अतीत, ३३ निर्णयात्मिका बुद्धिसे भी नहीं समझे जानेयोग्य, अतुलनीय ( आप ) - को बार - बार नमस्कार है । प्रथम मङ्गलमय, शान्त, निश्चिन्त, यशस्वी, सनातन और पुराणपुरुषको ३४ बार - बार नमस्कार है ॥ ३१-३४ ॥

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४१४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८४

नमो देवाधिदेवाय स्वभावाय नमो नमः ।

नमो जगत्प्रतिष्ठाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ ३५

नमोऽस्तु पद्मनाभाय नमो योगोद्भवाय च ।

विश्वेश्वराय देवाय शिवाय हरये नमः ॥ ३६

नमोऽस्तु तस्मै देवाय निर्गुणाय गुणात्मने ।

नारायणाय विश्वाय देवानां परमात्मने ॥ ३७

नमो नमः कारणवामनाय नारायणायामितविक्रमाय । श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥ ३८ गुह्याय वेदनिलयाय महोदराय सिंहाय दैत्यनिधनाय चतुर्भुजाय । ब्रह्मेन्द्ररुद्रमुनिचारणसंस्तुताय देवोत्तमाय वरदाय नमोऽच्युताय ॥ ३ ९ नागेन्द्रदेहशयनासनसुप्रियाय गोक्षीरहेमशुकनीलघनोपमाय 1 पीताम्बराय मधुकैटभनाशनाय विश्वाय चारुमुकुटाय नमोऽजराय ॥ ४० नाभिप्रजातकमलस्थचतुर्मुखाय क्षीरोदकार्णवनिकेतयशोधराय । नानाविचित्रमुकुटाङ्गदभूषणाय सर्वेश्वराय वरदाय नमो वराय ॥ ४१ भक्तिप्रियाय वरदीप्तिसुदर्शनाय फुल्लारविन्दविपुलायतलोचनाय । देवेन्द्रविघ्नशमनोद्यतपौरुषाय योगेश्वराय विरजाय नमो वराय ॥ ४२ ब्रह्मायनाय त्रिदशायनाय लोकाधिनाथाय भवापनाय । नारायणायात्महितायनाय महावराहाय नमस्करोमि ॥ ४३ कूटस्थमव्यक्तमचिन्त्यरूपं नारायणं कारणमादिदेवम् । आप देवाधिदेवको नमस्कार है । स्वभावस्वरूपी आपको बार - बार नमस्कार है । जगत्की प्रतिष्ठा करनेवाले ( आप ) - को नमस्कार है । गोविन्दको बार - बार नमस्कार है । पद्मनाभको नमस्कार है और योगसे उत्पन्न होनेवाले ( आप ) योगोद्भवको नमस्कार है । विश्वेश्वर, देव, शिव, हरिको नमस्कार है । निर्गुण और गुणात्मा उन ( प्रसिद्ध ) देवको नमस्कार है । विश्वात्मा, नारायण एवं देवोंके परम आत्मा ( आप ) - को नमस्कार है । कारणवश वामनरूप धारण करनेवाले, अतुल विक्रमवाले नारायणको नमस्कार है । श्री, शार्ङ्ग, चक्र, तलवार एवं गदा धारण करनेवाले उन पुरुषोत्तमको नमस्कार है ॥ ३५-३८ ॥ गुह्य, वेदनिलय, महोदर, दैत्यके निधनके लिये सिंहरूप धारण करनेवाले, चार भुजाओंवाले, ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मुनि तथा चारणोंके द्वारा स्तुत किये गये वरदानी देवोत्तम अच्युतभगवान्‌को नमस्कार है । शेषनागके शरीरपर प्रसन्नतापूर्वक शयन करनेवाले, गोदुग्ध, स्वर्ण, शुक एवं नीलघनकी उपमासे युक्त, पीला वस्त्र धारण करनेवाले, मधु - कैटभका विनाश करनेवाले, सुन्दर मुकुट धारण करनेवाले, वृद्धावस्था रहित, विश्वकी आत्मा आप देवको नमस्कार है । नाभिसे उत्पन्न हुए कमलपर स्थित ब्रह्मासे युक्त, क्षीरसमुद्रको अपना निवास बनानेवाले, यशस्वी, अनेक प्रकारके विचित्र मुकुट एवं अङ्गद आदि आभूषणोंसे युक्त, वरदानी तथा वरस्वरूप सर्वेश्वरको नमस्कार है । भक्तिके प्रेमी, श्रेष्ठ दीप्तिसे सर्वथा पूर्ण सुन्दर दिखलायी देनेवाले, खिले हुए कमलके समान विशाल आँखोंवाले, देवेन्द्र के विघ्नोंका विनाश करनेके लिये पुरुषार्थ करनेको उद्यत वरस्वरूप, विरज योगेश्वरको नमस्कार है ॥ ३ ९ -४२ ॥ ब्रह्मा और अन्य देवोंके आधारस्वरूप, लोकाधि-नाथ, भवहर्त्ता, नारायण आत्महितके आश्रय-स्थान महावराहको नमस्कार करता हूँ । मैं कूटस्थ, अव्यक्त, अचिन्त्य रूपवाले, कारणस्वरूप, आदिदेव

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अध्याय ८४ ] प्रह्लादके तीर्थयात्रा - प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१५ युगान्तशेषं पुरुषं तं देवदेवं शरणं प्रपद्ये ॥ योगेश्वरं चारुविचित्रमौलि -मज्ञेयमग्र्यं प्रकृतेः परस्थम् । क्षेत्रज्ञमात्मप्रभवं वरेण्यं तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये ॥ अदृश्यमव्यक्तमचिन्त्यमव्ययं महर्षयो ब्रह्ममयं सनातनम् । वदन्ति यं वै पुरुषं सनातनं तं देवगुह्यं शरणं प्रपद्ये ॥ यदक्षरं ब्रह्म वदन्ति सर्वगं निशम्य यं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते । तमीश्वरं तृप्तमनुत्तमैर्गुणैः परायणं विष्णुमुपैमि शाश्वतम् ॥ कार्यं क्रिया कारणमप्रमेयं हिरण्यबाहु वरपद्मनाभम् । महाबलं वेदनिधिं सुरेशं व्रजामि विष्णुं शरणं जनार्दनम् ॥ किरीटकेयूरमहार्हनिष्कै-र्मण्युत्तमालङ्कृतसर्वगात्रम् I पीताम्बरं काञ्चनभक्तिचित्रं मालाधरं केशवमभ्युपैमि ॥ ४ ९ भवोद्भवं वेदविदां वरिष्ठं योगात्मनां सांख्यविदां वरिष्ठम् । आदित्यरुद्राश्विवसुप्रभावं प्रभुं प्रपद्येऽच्युतमात्मवन्तम् ॥

श्रीवत्साङ्कं महादेवं देवगुह्यमनौपमम् ।

प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम् ॥

प्रभवं सर्वभूतानां निर्गुणं परमेश्वरम् ।

प्रपद्ये मुक्तसङ्गानां यतीनां परमां गतिम् ॥

भगवन्तं गुणाध्यक्षमक्षरं पुष्करेक्षणम् ।

शरण्यं शरणं भक्त्या प्रपद्ये भक्तवत्सलम् ॥

त्रिविक्रमं त्रिलोकेशं सर्वेषां प्रपितामहम् ।

योगात्मानं महात्मानं प्रपद्येऽहं जनार्दनम् ॥

नारायण, युगान्तमें शेष रहनेवाले पुराणपुरुष, देवाधिदेवकी ४४ शरण ग्रहण करता हूँ । मैं योगेश्वर, सुन्दर विचित्र रंगोंसे युक्त मुकुटको धारण करनेवाले, अज्ञेय, सर्वश्रेष्ठ, प्रकृतिके ४५ परे अवस्थित, क्षेत्रज्ञ, आत्मप्रभव, वरेण्य उन वासुदेवकी शरण ग्रहण करता हूँ । ब्रह्मर्षिजन जिन्हें अदृश्य, अव्यक्त, अचिन्तनीय, अव्यय, ब्रह्ममय और सनातन पुरुष कहते ४६ हैं, उन देवगुह्यकी में शरण ग्रहण करता हूँ॥४३–४६ ॥ ( ब्रह्मवेत्ता ) जिसे अक्षर एवं सर्वव्यापी ब्रह्म कहते हैं तथा जिसके श्रवणसे मृत्युके मुखसे मुक्ति मिल जाती है, मैं उसी श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त, आत्मतृप्त, शाश्वत ४७ आश्रयस्वरूप ईश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ । मैं कार्य, क्रिया और कारणस्वरूप, प्रमाणसे अगम्य, हिरण्यबाहु, नाभि श्रेष्ठ कमल धारण करनेवाले, महाबलशाली, वेदोंकी निधि, सुरेश्वर जनार्दन विष्णुकी शरणमें जाता ४८हूँ । मैं किरीट, केयूर एवं अतिमूल्यवान् श्रेष्ठ मणियोंसे सुसज्जित समस्त शरीरवाले, पीताम्बर धारण करनेवाले, स्वर्णिम पत्र - रचनासे अलङ्कृत, माला धारण करनेवाले केशवकी शरणमें जाता हूँ । मैं संसारको उत्पन्न करनेवाले, वेदके जाननेवालोंमें श्रेष्ठ, योगात्माओं तथा सांख्यशास्त्रके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ, आदित्य, रुद्र, अश्विनीकुमार एवं वसुओंके प्रभावसे युक्त अच्युत, आत्मस्वरूप ५० प्रभुकी शरण ग्रहण करता हूँ ॥ ४७–५० ॥ मैं श्रीवत्स - चिह्न धारण करनेवाले, महान् देव, ५१ देवताओं में गुह्य, उपमासे रहित, सूक्ष्म, अचल तथा अभय देनेवाले वरेण्य देवकी शरण ग्रहण करता हूँ । मैं समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले, निर्गुण, निःसङ्ग, ५२ यम और नियमका पालन करनेवाले संन्यासियोंकी परम गतिस्वरूप परमेश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ । मैं गुणाध्यक्ष, अक्षर, कमलनयन, आश्रय ग्रहण करनेयोग्य, ५३ शरण देनेवाले, भक्तोंसे प्रेम रखनेवाले भगवान्‌की श्रद्धापूर्वक शरण ग्रहण करता हूँ । मैं तीन पगोंमें तीनों लोकोंको नाप लेनेवाले, तीनों लोकोंके ईश्वर, सभीके ५४ | प्रपितामह, योगकी मूर्ति, महात्मा जनार्दनकी शरण ग्रहण

पृष्ठ 426

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४१६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८४

आदिदेवमजं शम्भुं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ।

नारायणमणीयांसं प्रपद्ये ब्राह्मणप्रियम् ॥

नमो वराय देवाय नमः सर्वसहाय च ।

प्रपद्ये देवदेवेशमणीयांसमणोः सदा ॥

एकाय लोकतत्त्वाय परतः परमात्मने ।

नमः सहस्रशिरसे अनन्ताय महात्मने ॥

त्वामेव परमं देवमृषयो वेदपारगाः ।

कीर्तयन्ति च यं सर्वे ब्रह्मादीनां परायणम् ॥

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामभयप्रद ।

सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम् ॥

पुलस्त्य उवाच

भक्तिं तस्यानुसंचिन्त्य नागस्यामोघसम्भवः ।

प्रीतिमानभवद् विष्णुः शङ्खचक्रगदाधरः ॥

सान्निध्यं कल्पयामास तस्मिन् सरसि केशवः । गरुडस्थो जगत्स्वामी लोकाधारस्तपोधनः ।

ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं तं तं च ग्राहं जलाशयात् ।

उज्जहाराप्रमेयात्मा तरसा मधुसूदनः ॥

स्थलस्थं दारयामास ग्राहं चक्रेण माधवः ।

मोक्षयामास नागेन्द्रं पाशेभ्यः शरणागतम् ॥

स हि देवलशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तमः ।

ग्राहत्वमगमत् कृष्णाद् वधं प्राप्य दिवंगतः ॥

गजोऽपि विष्णुना स्पृष्टो जातो दिव्यवपुः पुमान् ।

आपद्विमुक्तौ युगपद् गजगन्धर्वसत्तमौ ॥

प्रीतिमान् पुण्डरीकाक्षः शरणागतवत्सलः ।

अभवत् त्वथ देवेशस्ताभ्यां चैव प्रपूजितः ॥

इदं च भगवान् योगी गजेन्द्रं शरणागतम् ।

प्रोवाच मुनिशार्दूल मधुरं मधुसूदनः ॥

श्रीभगवानुवाच

ये मां त्वां च सरश्चैव ग्राहस्य च विदारणम् ।

गुल्मकीचकरेणूनां रूपं मेरोः सुतस्य च ॥

करता हूँ । मैं आदिदेव, अजन्मा, शम्भु, व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप, सनातन, परम सूक्ष्म, ब्राह्मणप्रिय नारायणकी ५५ शरण ग्रहण करता हूँ ॥ ५१–५५ ॥ श्रेष्ठ देवको नमस्कार है । सर्वशक्तिमान्‌को ५६ नमस्कार है । मैं सदा सूक्ष्म से सूक्ष्म देवदेवेशकी शरण हूँ । लोकतत्त्वस्वरूप, एकमात्र परात्पर परमात्मा, ५७ सहस्रशीर्ष महात्मा अनन्तको नमस्कार है । वेदोंके पारगामी ऋषिगण आपको ही परम देव एवं ब्रह्मा आदि देवोंका आश्रयस्थान कहते हैं । हे पुण्डरीकाक्ष! हे ५८ भक्तोंको अभयदान देनेवाले! आपको नमस्कार है । सुब्रह्मण्य! आपको नमस्कार है । आप मुझ शरणागतकी ५ ९ रक्षा करें ॥ ५६-५९ ॥ पुलस्त्यजी बोले – शङ्ख, चक्र एवं गदाको धारण करनेवाले, सफलताके आश्रय विष्णु उस गजेन्द्रकी ६० भक्तिका विचार कर प्रसन्न हो गये । उसके बाद संसारके आधार जगत्स्वामी तपोधन केशव गरुड़पर सवार हो उस ६१ सरोवरके निकट गये । अप्रमेय आत्मस्वरूप मधुसूदनने ग्राहके द्वारा पकड़े गये उस गजेन्द्र तथा उस ग्राहको ६२ वेगपूर्वक सरोवरसे बाहर निकाला । माधवने पृथ्वीपर स्थित ग्राहको चक्रके द्वारा विदीर्ण कर शरणापन्न ६३ गजेन्द्रको बन्धनसे मुक्त कर दिया । देवलके शापसे ग्राह बना हुआ गन्धर्वश्रेष्ठ हूहू भगवान् श्रीकृष्णसे मृत्यु पाकर ६४ स्वर्ग चला गया ॥ ६०–६४ ॥ भगवान् विष्णुका स्पर्श होनेसे वह हाथी भी दिव्य ६५ शरीर धारण करनेवाला पुरुष हो गया । इस प्रकार हाथी । एवं गन्धर्वश्रेष्ठ दोनों एक ही साथ संकटसे मुक्त हो गये । मुनिवर! उसके बाद उन दोनोंसे पूजित होकर ६६| शरणागतवत्सल पुण्डरीकाक्ष देवेश प्रसन्न हुए और उन योगी भगवान् मधुसूदनने शरणागत गजेन्द्रसे यह मधुर ६७ | वचन कहा- ॥ ६५ - ६७ ॥ श्रीभगवान्ने कहा— स्थिर बुद्धिसे पवित्र व्रत धारण करनेवाले जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक मेरा तुम्हारा तथा ६८ | इस सरोवरका एवं ग्राहके विदारण, गुल्म, कीचक, रेणु

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अध्याय ८४ ] प्रह्लादके तीर्थयात्रा - प्रसङ्गमें त्रिकूटगिरिस्थित सरोवरमें ग्राहद्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना ४१७

अश्वत्थं भास्करं गङ्गां नैमिषारण्यमेव च ।

संस्मरिष्यन्ति मनुजाः प्रयताः स्थिरबुद्धयः ॥

कीर्तयिष्यन्ति भक्त्याच श्रोष्यन्ति चशुचिव्रताः ।

दुःस्वप्नो नश्यते तेषां सुस्वप्रश्च भविष्यति ॥

मात्स्यं कौर्मञ्च वाराहं वामनं तार्क्ष्यमेव च ।

नारसिंहं च नागेन्द्रं सृष्टिप्रलयकारकम् ॥

एतानि प्रातरुत्थाय संस्मरिष्यन्ति ये नराः ।

सर्वपापैः प्रमुच्यन्ते पुण्यं लोकमवाप्नुयुः ॥

पुलस्त्य उवाच

एवमुक्त्वा हृषीकेशो गजेन्द्रं गरुडध्वजः ।

स्पर्शयामास हस्तेन गजं गन्धर्वमेव च ॥

ततो दिव्यवपुर्भूत्वा गजेन्द्रो मधुसूदनम् ।

जगाम शरणं विप्र नारायणपरायणः ॥

ततो नारायणः श्रीमान् मोक्षयित्वा गजोत्तमम् ।

पापबन्धाच्च शापाच्च ग्राहं चाद्भुतकर्मकृत् ॥

ऋषिभि: स्तूयमानश्च देवगुह्यपरायणैः ।

गतः स भगवान् विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः ॥

गजेन्द्रमोक्षणं दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ।

ववन्दिरे महात्मानं प्रभुं नारायणं हरिम् ॥

महर्षयश्चारणाश्च दृष्ट्वा गजविमोक्षणम् ।

विस्मयोत्फुल्लनयनाः संस्तुवन्ति जनार्दनम् ॥

प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा चक्रपाणिविचेष्टितम् ।

गजेन्द्रमोक्षणं दृष्ट्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥

य इदं शृणुयान्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः ।

प्राप्नुयात् परमां सिद्धिं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति ॥

गजेन्द्रमोक्षणं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।

कथितेन स्मृतेनाथ श्रुतेन च तपोधन ।

गजेन्द्रमोक्षणेनेह सद्यः पापात् प्रमुच्यते ॥

एतत्पवित्रं परमं सुपुण्यं संकीर्तनीयं चरितं मुरारेः । यस्मिन् किलोक्ते बहुपापबन्धनात् लभ्येत मोक्षो द्विरदेन यद्वत् ॥ अजं वरेण्यं वरपद्मनाभं नारायणं ब्रह्मनिधिं सुरेशम् । एवं मेरु पुत्रके रूप, पीपल, सूर्य, गङ्गा और नैमिषारण्यका ६ ९ श्रद्धापूर्वक स्मरण एवं कीर्तन तथा श्रवण करेंगे उनके दुःस्वप्रका विनाश हो जायगा एवं सुस्वप्रकी सृष्टि होगी । ७० जो मनुष्य प्रातः काल उठकर मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वराहावतार, वामनावतार, गरुड़, नरसिंहावतार, गजेन्द्र ७१ और सृष्टि - प्रलय करनेवाले ( भगवान् ) - का स्मरण करेंगे, वे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यलोकको प्राप्त ७२ | करेंगे ॥ ६८-७२ ॥ पुलस्त्यजी बोले - ( नारदजी! ) गजेन्द्रसे ऐसा कहकर गरुड़ध्वज हृषीकेशने हाथसे गजेन्द्र और गन्धर्व ७३ दोनोंका स्पर्श किया । हे विप्र! उसके बाद नारायणकी आराधना करनेमें लीन गजेन्द्र दिव्य शरीर धारणकर ७४ मधुसूदनकी शरणमें चला गया । उसके बाद अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीमान् नारायणने गजोत्तम एवं ग्राहको पाप-७५ बन्धसे एवं शापसे मुक्त किया । भगवद्भक्त ऋषियोंद्वारा स्तुत होते हुए वे अविज्ञेय गतिवाले प्रभु भगवान् विष्णु ७६ ( अपने धाम ) चले गये॥७३–७६ ॥ गजेन्द्रके मोक्षको देखकर इन्द्र आदि देवोंने ७७ महात्मा प्रभु नारायण श्रीहरिकी वन्दना की । गजको ग्राहसे मुक्त हुए देखकर विस्मयसे खिले नेत्रोंवाले ७८ । महर्षियों एवं चारणोंने जनार्दनकी स्तुति की । चक्रपाणिके गजेन्द्रमोक्षणरूपी कर्मको देखकर प्रजापति ब्रह्माने यह ७ ९ वचन कहा- जो मनुष्य प्रातः काल उठकर प्रतिदिन इसे सुनेगा, वह परमसिद्धिको प्राप्त करेगा और उसका ८० दुःस्वप्न विनष्ट हो जायगा ॥ ७७-८० ॥ तपोधन! गजेन्द्रमोक्ष पवित्र और सब प्रकारके पापोंका नाश करनेवाला है । इस गजेन्द्रमोक्षके कहने, स्मरण करने ८१ और सुननेसे मनुष्य तुरंत सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है । मुरारि विष्णुका यह पवित्र चरित्र पुण्य प्रदान करनेवाला तथा कीर्तन करने योग्य है । इसे कहनेसे मनुष्य गजेन्द्रके ८२ समान अनेक पापोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है । मैं अज, वरेण्य, श्रेष्ठ, पद्मनाभ, नारायण, ब्रह्मनिधि, सुरेश,

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४१८ तं देवगुह्यं पुरुषं पुराणं वदाम्यहं लोकपतिं वरेण्यम् ॥ पुलस्त्य उवाच एतत् तवोक्तं प्रवरं स्तवानां स्तवं मुरारेर्वरनागकीर्तनम् । यं कीर्त्य संश्रुत्य तथा विचिन्त्य पापापनोदं पुरुषो लभेत श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८५ | देवगुह्य, पुराणपुरुष उन लोक- स्वामीकी वन्दना ८३ करता हूँ ॥ ८१-८३ ॥ पुलस्त्यजी बोले- स्तुतियोंमें श्रेष्ठ गजेन्द्रद्वारा कीर्तित मुरारिके इस श्रेष्ठ स्तोत्रको मैंने तुमसे कहा । इसके कीर्तन, श्रवण तथा चिन्तन करनेसे मनुष्य पापोंसे ॥ ८४ विमुक्ति पा जाता है ॥ ८४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौरासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥८४ ॥

पचासीवाँ अध्याय सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव कथन - प्रसङ्गमें राक्षस - वृत्तान्त, राक्षसग्रस्त मुनिकी अग्नि प्रार्थना, सारस्वतस्तोत्र और मुनिद्वारा राक्षसको उपदेश पुलस्त्य उवाच

कश्चिदासीद् द्विजद्रोग्धा पिशुनः क्षत्रियाधमः ।

परपीडारुचिः क्षुद्रः स्वभावादपि निर्घृणः ॥

पर्यासिताः सदा तेन पितृदेवद्विजातयः ।

स त्वायुषि परिक्षीणे जज्ञे घोरो निशाचरः ॥

तेनैव कर्मदोषेण स्वेन पापकृतां वरः ।

क्रूरैश्चक्रे ततो वृत्तिं राक्षसत्वाद् विशेषतः ॥

तस्य पापरतस्यैवं जग्मुर्वर्षशतानि तु ।

तेनैव कर्मदोषेण नान्यां वृत्तिमरोचयत् ॥

यं यं पश्यति सत्त्वं स तं तमादाय राक्षसः ।

चखाद रौद्रकर्मासौ बाहुगोचरमागतम् ॥

एवं तस्यातिदुष्टस्य कुर्वतः प्राणिनां वधम् ।

जगाम च महान् कालः परिणामं तथा वयः ॥

स कदाचित् तपस्यन्तं ददर्श सरितस्तटे ।

महाभागमूर्ध्वभुजं यथावत्संयतेन्द्रियम् ॥

पुलस्त्यजी बोले - ( नारदजी! ) ब्राह्मणसे वैर और घृणा रखनेवाला, चुगलखोर, दूसरोंको कष्ट देनेवाला, १ नीच, स्वभावसे भी निर्दय एक अधम क्षत्रिय था । उसने सदा ही पितरों, देवों एवं द्विजातियोंका अपमान किया । २ आयु समाप्त होनेपर वह भयंकर राक्षस हुआ । अपने उसी कर्मके दोष एवं विशेषकर राक्षस होनेके कारण ३ | वह नीच पापी अशुभ कर्मोंद्वारा जीवनका निर्वाह करता रहा । पापकर्म करते हुए उसके सौ वर्ष बीत गये । उसी | कर्म - दोषके कारण जीविकाके दूसरे साधनोंमें उसकी ४ इच्छा नहीं होती थी । वह निन्दनीय कर्म करनेवाला राक्षस जिस प्राणीको देखता उसे अपनी भुजाओंसे ५ पकड़कर खा जाता था॥१–५ ॥ इस प्रकार प्राणियों का संहार करते हुए उस अतिदुष्टका ६ अधिक समय बीत गया और उसकी अवस्था ढलने लगी । किसी समय उसने नदी तीरपर बाँह ऊपर उठाये ७ एवं भलीभाँति इन्द्रियोंपर संयत किये हुए महाभाग्यशाली

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अध्याय ८५ ] सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव कथन - प्रसङ्गमें राक्षस - वृत्तान्त ४१ ९

अनया रक्षया ब्रह्मन् कृतरक्षं तपोनिधिम् ।

योगाचार्यं शुचिं दक्षं वासुदेवपरायणम् ॥

विष्णुः प्राच्यां स्थितश्चक्री विष्णुर्दक्षिणतो गदी ।

प्रतीच्यां शार्ङ्गधृग्विष्णुर्विष्णुः खड्गी ममोत्तरे ॥

हृषीकेशो विकोणेषु तच्छिद्रेषु जनार्दनः ।

क्रोडरूपी हरिर्भूमौ नारसिंहोऽम्बरे मम ॥

क्षुरान्तममलं चक्रं भ्रमत्येतत् सुदर्शनम् ।

अस्यांशुमाला दुष्प्रेक्ष्या हन्तुं प्रेतनिशाचरान् ॥

गदा चेयं सहस्त्रार्चिरुद्वमन् पावको यथा ।

रक्षोभूतपिशाचानां डाकिनीनां च शातनी ॥

शार्ङ्ग विस्फूर्जितं चैव वासुदेवस्य मद्रिपून् ।

तिर्यङ्मनुष्यकूष्माण्डप्रेतादीन् हन्त्वशेषतः ॥

खड्गधाराज्वलज्ज्योत्स्नानिर्धूता ये ममाहिताः ।

ते यान्तु सौम्यतां सद्यो गरुडेनेव पन्नगाः ॥

ये कूष्माण्डास्तथा यक्षा दैत्या ये च निशाचराः ।

प्रेता विनायकाः क्रूरा मनुष्या जृम्भकाः खगाः ॥

सिंहादयो ये पशवो दन्दशूकाश्च पन्नगाः ।

सर्वे भवन्तु मे सौम्या विष्णुचक्ररवाहताः ॥

ऋषिको तपस्या करते हुए देखा । ब्रह्मन्! तपोनिधि पवित्र दक्ष ८ और वासुदेवकी आराधना करनेमें तत्पर उस योगाचार्यने अपनी रक्षा इस रक्षामन्त्रके द्वारा कर ली थी कि ' पूर्व दिशामें चक्र धारण करनेवाले विष्णु, दक्षिण दिशामें गदा धारण करनेवाले विष्णु, पश्चिम दिशामें शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले ९ विष्णु और उत्तर दिशामें खड्ग धारण करनेवाले विष्णु मेरी रक्षा करें । दिशाओंके कोणों ( अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण, ईशानकोणों ) - में हृषीकेश, उन दिशाओं और कोणोंके मध्य १० अवशिष्ट स्थानोंमें जनार्दन, भूमिमें वराहरूप धारण करनेवाले हरि एवं आकाशमें नृसिंहभगवान् मेरी रक्षा करें । प्रेतों एवं निशाचरोंके संहारके लिये छुरेकी धारके समान अत्यन्त तीक्ष्ण यह निर्मल सुदर्शन चक्र घूम रहा है । इसकी किरणमालाका ११ दर्शन होना प्रयत्न करनेपर भी सम्भव नहीं है ॥ ६–११ ॥ ज्वाला उगलनेवाली अग्रिकी भाँति हजारों किरणोंसे १२ युक्त यह गदा राक्षसों, भूतों, पिशाचों और डाकिनियोंका संहार करे । वासुदेवका चमकनेवाला शार्ङ्गधनुष मेरे १३ साथ शत्रुका काम करनेवाले हिंसक पशु - पक्षियों, मनुष्यों, दानवों तथा प्रेतोंका जड़ - मूलसे विनाश करे । जैसे गरुड़को देखकर साँप शान्त हो जाते हैं, उसी प्रकार ( विष्णुके ) १४ | खड्गकी चमकती हुई तेज धारसे मेरा अहित करनेवाले निष्प्रभ होकर तत्काल शान्त हो जायँ । सारे कूष्माण्ड, १५ यक्ष, दैत्य, निशाचर, प्रेत, विनायक, क्रूर मनुष्य, जृम्भक, पक्षी, सिंहादि पशु एवं तीव्र दाँतोंसे काट खानेवाले सर्प आदि- ये सभी विष्णुके चक्रकी तीव्र गतिसे घायल १६ होकर मेरे प्रति सरल बन जायँ॥१२–१६ ॥

चित्तवृत्तिहरा ये च ये जनाः स्मृतिहारकाः ।

बलौजसां च हर्तारश्छायाविध्वंसकाश्च ये ॥

ये चोपभोगहर्तारो ये च लक्षणनाशकाः ।

कूष्माण्डास्ते प्रणश्यन्तु विष्णुचक्ररवाहताः ॥

बुद्धिस्वास्थ्यं मनःस्वास्थ्यं स्वास्थ्यमैन्द्रियकं तथा ।

ममास्तु देवदेवस्य वासुदेवस्य कीर्तनात् ॥

जो चित्तकी वृत्तियों - मानसिक आचार - व्यवहारोंका १७ हरण करनेवाले, स्मृतिको हरण करनेवाले, बल और ओजको अपहरण करनेवाले, कान्तिका विध्वंस करनेवाले, सुखों का विनाश करनेवाले तथा सुलक्षणोंके विनाशक १८ हैं, वे सभी कूष्माण्डादि ( भूत - प्रेत ) विष्णुके चक्रकी तीव्र गतिसे घायल होकर नष्ट हो जायँ । देवदेव १ ९ | वासुदेवके कीर्तनसे मुझे बुद्धि, मन तथा इन्द्रियोंकी

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४२० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८५ पृष्ठे पुरस्तादथ दक्षिणोत्तरे सबलता प्राप्त हो । जनार्दन हरि मेरे पीछे, आगे, दायें, विकोणतश्चास्तु जनार्दनो हरिः । बायें एवं दिशाओंके कोणों ( अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण, ईशानकोण ) - में स्थित रहें । स्तुतियोग्य तमीड्यमीशानमनन्तमच्युतं उन ईशान, अनन्त, अच्युत जनार्दनको साष्टाङ्ग प्रणिपात जनार्दनं प्रणिपतितो न सीदति ॥ २० करनेवाला मनुष्य दुःखी नहीं होता ॥ १७ –२० ॥ यथा परं ब्रह्म हरिस्तथा परं जगत्स्वरूपश्च स एव केशवः । ऋतेन तेनाच्युतनामकीर्तनात् प्रणाशमेतु त्रिविधं ममाशुभम् ॥

इत्यसावात्मरक्षार्थं कृत्वा वै विष्णुपञ्जरम् ।

संस्थितोऽसावपि बली राक्षसः समुपाद्रवत् ॥

ततो द्विजनियुक्तायां रक्षायां रजनीचरः ।

निर्धूतवेगः सहसा तस्थौ मासचतुष्टयम् ॥

यावद् द्विजस्य देवर्षे समाप्तिर्वै समाधितः ।

जाते जप्यावसानेऽसौ तं ददर्श निशाचरम् ॥

दीनं हतबलोत्साहं कान्दिशीकं हतौजसम् ।

तं दृष्ट्वा कृपयाविष्टः समाश्वास्य निशाचरम् ॥

पप्रच्छागमने हेतुं स चाचष्ट यथातथम् ।

स्वभावमात्मनो द्रष्टुं रक्षया तेजसः क्षितिम् ॥

कथयित्वा च तद्रक्षः कारणं विविधं ततः । प्रसीदेत्यब्रवीद् विप्रं निर्विण्णः स्वेन कर्मणा बहूनि पापानि मया कृतानि बहवो हताः । कृताः स्त्रियो मया बयो विधवाः पुत्रवर्जिताः । अनागसां च सत्त्वानामल्पकानां क्षयः कृतः

तस्मात् पापादहं मोक्षमिच्छामि त्वत्प्रसादतः ।

पापप्रशमनायालं कुरु मे धर्मदेशनम् ॥

पापस्यास्य क्षयकरमुपदेशं प्रयच्छ मे । तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसस्य द्विजोत्तमः वचनं प्राह धर्मात्मा हेतुमच्च सुभाषितम् । कथं क्रूरस्वभावस्य सतस्तव निशाचर सहसैव समायाता जिज्ञासा धर्मवर्त्मनि राक्षस उवाच त्वां वै समागतोऽस्म्यद्य क्षिप्तोऽहं रक्षया बलात् तव संसर्गतो ब्रह्मन् जातो निर्वेद उत्तमः जैसे ब्रह्म श्रेष्ठ है उसी प्रकार हरि भी श्रेष्ठ हैं । वे केशव ही जगत्के ( नित्य ) स्वरूप हैं । अच्युतभगवान्के नाम - कीर्तनके उस सत्यद्वारा मेरे तीनों प्रकारके अमङ्गल नष्ट हो जायँ । इस प्रकार अपनी रक्षाके लिये २१ विष्णुपञ्जरस्तोत्रका पाठकर वे खड़े थे । वह बलवान् राक्षस उनकी ओर दौड़ा । देवर्षे! उसके बाद द्विजद्वारा २२ रक्षाकी व्यवस्था रहनेपर वह राक्षस गतिहीन होकर चार मासतक, जबतक कि ब्राह्मणकी समाधि समाप्त नहीं २३ हुई तबतक, रुका रहा । जप समाप्त होनेपर उन्होंने उस निशाचरको देखा । उन्होंने दीन, बलसे हीन, उत्साहसे २४ रहित, भयसे आकुल तथा निस्तेज हुए उस निशाचरको देखकर दयापूर्वक उसे निर्भयता प्रदान कर दी तथा २५ उसके आनेका कारण पूछा । उसने अपने यथार्थ स्वभाववश देखनेकी इच्छा एवं आनेपर तेजका नाश होना बताया । २६ उसके बाद दूसरे और भी बहुत - से कारणोंका वर्णन कर अपने कर्मसे दुखी हुए उस राक्षसने ब्राह्मणसे कहा— ॥ २७ आप प्रसन्न हो जायँ ॥ २१–२७ ॥ मैंने बहुत पाप किये हैं । मैंने बहुत - से मनुष्योंको मारा है । मैंने बहुत - सी स्त्रियोंको विधवा एवं पुत्रसे हीन ॥ २८ कर दिया है तथा निर्दोष और निर्बल प्राणियोंका विनाश किया है । आपकी दयासे मैं उन पापोंसे मुक्त होना चाहता हूँ; अतः आप मुझे पापोंका नाश करनेवाले २ ९ धर्माचरणका उपदेश दें । आप मुझे इस पापको नष्ट करनेवाला उपदेश प्रदान करें । उस राक्षसके उस ॥ ३० वचनको सुनकर धर्मात्मा द्विजोत्तमने युक्तियुक्त मधुर वचन कहा - निशाचर! क्रूर स्वभावके होते हुए भी । एकाएक धर्मके मार्गमें तुम्हारी जिज्ञासा कैसे ॥ ३१ उत्पन्न हुई? ॥ २८ - ३१ ॥ राक्षसने कहा- मैं आज आपके निकट आते । ही बलपूर्वक रक्षाद्वारा फेंक दिया गया । ब्रह्मन्! ॥ ३२ । आपके सम्पर्कसे मुझे श्रेष्ठ वैराग्य प्राप्त हो गया ।