वामन पुराण — पृष्ठ 431–440
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440
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अध्याय ८५ ] सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव कथन - प्रसङ्गमें राक्षस - वृत्तान्त ४२१
कासारक्षा न तां वेद्मि वेद्मि नास्याः परायणम् ।
यस्याः संसर्गमासाद्य निर्वेदं प्रापितं परम् ॥
त्वं कृपां कुरु धर्मज्ञ मय्यनुक्रोशमावह ।
यथा पापापनोदो मे भवत्वार्य तथा कुरु ॥
पुलस्त्य उवाच
इत्येवमुक्तः स मुनिस्तदा वै तेन रक्षसा ।
प्रत्युवाच महाभागो विमृश्य सुचिरं मुनिः ॥
ऋषिरुवाच
यन्मामाहोपदेशार्थं निर्विण्णः स्वेन कर्मणा ।
युक्तमेतद्धि पापानां निवृत्तिरुपकारिका ॥
करिष्ये यातुधानानां न त्वहं धर्मदेशनम् ।
तान् सम्पृच्छ द्विजान् सौम्य ये वै प्रवचने रताः ॥
एवमुक्त्वा ययौ विप्रश्चिन्तामाप स राक्षसः ।
कथं पापापनोदः स्यादिति चिन्ताकुलेन्द्रियः ॥
न चखाद स सत्त्वानि क्षुधा सम्बाधितोऽपि सन् ।
षष्ठे षष्ठे तदा काले जन्तुमेकमभक्षयत् ॥
स कदाचित्क्षुधाविष्टः पर्यटन् विपुले वने ।
ददर्शाथ फलाहारमागतं ब्रह्मचारिणम् ॥
गृहीतो रक्षसा तेन स तदा मुनिदारकः ।
निराशो जीविते प्राह सामपूर्वं निशाचरम् ॥
ब्राह्मण उवाच
भोभद्र ब्रूहि यत् कार्यं गृहीतो येन हेतुना ।
तदनुब्रूहि भद्रं ते अयमस्म्यनुशाधि माम् ॥
राक्षस उवाच
षष्ठे काले त्वमाहारः क्षुधितस्य समागतः ।
निः श्रीकस्यातिपापस्य निर्घृणस्य द्विजद्रुहः ॥
ब्राह्मण उवाच
यद्यवश्यं त्वया चाहं भक्षितव्यो निशाचर ।
आयास्यामि तवाद्यैव निवेद्य गुरवे फलम् ॥
मैं यह नहीं समझ पाता हूँ कि जिसका सम्पर्क पाकर ३३ मुझे श्रेष्ठ वैराग्य उत्पन्न हुआ है वह रक्षा क्या है और । उसका आधार कौन है? धर्मज्ञ! आर्य! आप कृपा करें । मेरे ऊपर दया करें । आप वह कार्य करें जिससे मेरे ३४ पापोंका विनाश हो जाय ॥३२-३४ ॥ पुलस्त्यजी बोले – उस राक्षसके इस प्रकार कहनेपर उन महाभाग मुनिने बहुत देरतक विचार कर ३५ | उत्तर दिया ॥ ३५ ॥
ऋषिने उत्तर दिया- अपने कर्मसे पीड़ित होकर तुमने मुझसे जो उपदेश देनेके लिये कहा है, सो ठीक ३६ ही है । पापोंकी निवृत्तिसे उपकार होता है । परंतु मेँ राक्षसोंको धर्मका उपदेश नहीं दूँगा । अतः भले राक्षस! इस विषयको तुम उन ब्राह्मणोंसे पूछो जो विषयोंपर ३७ शास्त्रीय व्याख्यान करते हैं । इस प्रकार कहकर वह ब्राह्मण चला गया । वह राक्षस चिन्तासे आकुल हो गया । ३८ | मेरे पाप किस प्रकार दूर होंगे — इस विषयकी चिन्तासे उसकी इन्द्रियाँ घबड़ा गयीं । ( पर ) भूखसे कष्ट पानेपर भी उसने प्राणियोंका भक्षण करना छोड़ दिया । ( प्रतिदिन ) ३ ९ प्रत्येक छठे समय एक जीवका आहार करने लगा । किसी समय भूखसे पीड़ित होकर विशाल वनमें घूमते ४० हुए उसने फल लेनेके लिये आये हुए एक ब्रह्मचारीको देखा । राक्षसने मुनिपुत्रको पकड़ लिया । उसके बाद जीवनसे निराश होकर उस ब्रह्मचारीने शान्त भाव प्रकट ४१ करनेवाला वचन कहा ॥ ३६–४१ ॥ ब्राह्मणने कहा - भद्र! यह बतलाओ कि तुम्हारा क्या कार्य है, तुमने मुझे क्यों पकड़ा है? तुम्हारा
४२ कल्याण हो । यह मैं प्रस्तुत हूँ । मुझे आज्ञा दो ॥४२ ॥
राक्षसने कहा- ब्रह्मचारिन्! इस समय मैं ब्राह्मणोंसे द्वेष और घृणा करनेके कारण श्रीसे हीन, अत्यन्त पापी और निर्दय हो गया हूँ । मुझे भूख लगी हुई है । आज ४३ छठे समयमें तुम मेरे भोजनके रूपमें आये हो ॥ ४३ ॥
ब्राह्मणने कहा - निशाचर! यदि अवश्य ही तुम ४४ | मुझे खाना चाहते हो तो मैं ये फल गुरुको समर्पित
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गुर्वर्थमेतदागत्य यत्फलग्रहणं कृतम् ।
ममात्र निष्ठा प्राप्तस्य फलानि विनिवेदितुम् ॥
स त्वं मुहूर्तमात्रं मामत्रैव प्रतिपालय ।
निवेद्य गुरवे यावदिहागच्छाम्यहं फलम् ॥
राक्षस उवाच षष्ठे काले न मे ब्रह्मन् कश्चिद् ग्रहणमागतः । प्रतिमुच्येत देवोऽपि इति मे पापजीविका एक एवात्र मोक्षस्य तव हेतुः शृणुष्व तत् । मुञ्चाम्यहमसंदिग्धं यदि तत् कुरुते भवान् ब्राह्मण उवाच गुरोर्यन्न विरोधाय यन्न धर्मोपरोधकम् । तत् करिष्याम्यहं रक्षो यन्न व्रतहरं मम श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८५ करके अभी आ जाता हूँ । यहाँ आकर गुरुके लिये मैंने ४५ जो फल एकत्र किये हैं, उन्हें गुरुको समर्पित करनेके लिये मेरी अत्यन्त श्रद्धा है । अत: तुम यहाँ मुहूर्तमात्र मेरी प्रतीक्षा करो, जबतक कि मैं इन फलोंको गुरुको ४६ देकर लौट आता हूँ॥४४–४६ ॥ राक्षसने कहा — ब्रह्मन्! छठे समयमें मेरे पंजेमें आया हुआ कोई देवता भी छूट नहीं सकता । यही मेरी ॥ ४७ । पापजीविका है । तुम्हारे छूटनेका एक ही उपाय है, उसे सुनो । यदि तुम उसे करो तो नि: संदेह मैं तुमको छोड़ ॥ ४८ | दूँगा ॥ ४७-४८ ॥ ब्राह्मणने कहा- राक्षस! यदि वह कार्य गुरुकी सेवाकार्यमें विरोध डालनेवाला, धर्मके विषयमें बाधा डालनेवाला एवं मेरे व्रतको नष्ट करनेवाला न होगा तो ॥ ४ ९ मैं उसे करूँगा केवल तुमसे अपने छुटकारेके लिये नहीं ॥ ४ ९ ॥ राक्षस उवाच
मया निसर्गतो ब्रह्मन् जातिदोषाद् विशेषतः ।
निर्विवेकेन चित्तेन पापकर्म सदा कृतम् ॥
आबाल्यान्मम पापेषु न धर्मेषु रतं मनः ।
तत्पापसंक्षयान्मोक्षं प्राप्नुयां येन तद् वद ॥
यानि पापानि कर्माणि बालत्वाच्चरितानि च ।
दुष्टां योनिमिमां प्राप्य तन्मुक्तिं कथय द्विज ॥
यद्येतद् द्विजपुत्र त्वं समाख्यास्यस्यशेषतः ।
ततः क्षुधार्तान्मत्तस्त्वं नियतं मोक्षमाप्स्यसि ॥
न चेत् तत्पापशीलोऽहमत्यर्थं क्षुत्पिपासितः ।
षष्ठे काले नृशंसात्मा भक्षयिष्यामि निर्घृणः ॥
पुलस्त्य उवाच
एवमुक्तो मुनिसुतस्तेन घोरेण रक्षसा ।
चिन्तामवाप महतीमशक्तस्तदुदीरणे ॥
राक्षसने कहा – ब्रह्मन्! मैंने स्वभावतः तथा विशेषतः जातिदोषके कारण और विचारशक्तिसे रहित ५० मनके कारण सदा पापका कार्य किया है । बाल्यावस्थासे ही मेरा मन धर्ममें नहीं, अपितु पापमें आसक्त रहा है । इसलिये तुम वह उपाय बताओ जिससे पापका नाश ५१ होकर मेरी मुक्ति हो जाय । द्विज! इस पापयोनिको पाकर अज्ञानवश मैंने जिन पापकर्मोंका आचरण ५२ किया है, उनसे छुटकारा पानेका उपाय बतलाओ । ब्राह्मणपुत्र! यदि तुम मुझे यह भलीभाँति बतलाओ तो मुझ भूखसे पीड़ित हुएसे नि: संदेह छुटकारा पा ५३ जाओगे । यदि ऐसा नहीं हुआ तो अत्यन्त भूखा - प्यासा निर्दय हुआ मैं छठे समयमें ( प्राप्त हुए ) तुमको खा ५४ जाऊँगा ॥ ५०–५४ ॥ पुलस्त्यजी बोले – उस भयंकर राक्षसके इस प्रकार कहनेपर मुनिपुत्र ( राक्षसकी पापसे मुक्तिका ५५ । उपाय ) कहने में असमर्थ होनेसे बहुत चिन्तित हुआ ।
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अध्याय ८५ ] सारस्वतस्तोत्रके संदर्भ में विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव कथन - प्रसङ्गमें राक्षस - वृत्तान्त ४२३
स विमृश्य चिरं विप्रः शरणं जातवेदसम् ।
जगाम ज्ञानदानाय संशयं परमं गतः ॥
यदि शुश्रूषितो वह्निर्गुरुशुश्रूषणादनु ।
व्रतानि वा सुचीर्णानि सप्तार्चिः पातु मां ततः ॥
न मातरं न पितरं गौरवेण यथा गुरुम् ।
सर्वदैवावगच्छामि तथा मां पातु पावकः ॥
यथा गुरुं न मनसा कर्मणा वचसाऽपि वा ।
अवजानाम्यहं तेन पातु सत्येन पावकः ॥
इत्येवं मनसा सत्यान् कुर्वतः शपथान् पुनः ।
सप्तार्चिषा समादिष्टा प्रादुरासीत् सरस्वती ॥
सा प्रोवाच द्विजसुतं राक्षसग्रहणाकुलम् ।
मा भैर्द्विजसुताहं त्वां मोक्षयिष्यामि संकटात् ॥
यदस्य रक्षसः श्रेयो जिह्वाग्रे संस्थिता तव ।
तत् सर्वं कथयिष्यामि ततो मोक्षमवाप्स्यसि ॥
अदृश्या रक्षसा तेन प्रोक्त्वेत्थं सा सरस्वती ।
अदर्शनं गता सोऽपि द्विजः प्राह निशाचरम् ॥
ब्राह्मण उवाच
श्रूयतां तव यच्छ्रेयस्तथाऽन्येषां च पापिनाम् ।
समस्तपापशुद्ध्यर्थं पुण्योपचयदं च यत् ॥
प्रातरुत्थाय जप्तव्यं मध्याह्नेऽह्नःक्षयेऽपि वा ।
असंशयं सदा जप्यो जपतां पुष्टिशान्तिदः ॥
ॐ हरिं कृष्णं हृषीकेशं वासुदेवं जनार्दनम् ।
प्रणतोऽस्मि जगन्नाथं स मे पापं व्यपोहतु ॥
चराचरगुरुं नाथं गोविन्दं शेषशायिनम् ।
प्रणतोऽस्मि परं देवं स मे पापं व्यपोहतु ॥
शङ्खिनं चक्रिणं शार्ङ्गधारिणं स्त्रग्धरं परम् ।
प्रणतोऽस्मि पतिं लक्ष्म्याः स मे पापं व्यपोहतु ॥
बहुत समयतक विचार करनेके पश्चात् अत्यन्त संशययुक्त ५६ । ब्राह्मण ज्ञानदानके हेतु अग्रिके पास गया । ( उसने कहा - ) अग्निदेव! गुरुकी सेवा करनेके बाद यदि मैंने ५७ आपकी सेवा की हो तथा व्रतोंका अच्छी तरह पालन किया हो तो हे सप्तार्चि! आप मेरी रक्षा करें । अग्निदेव! यदि मैंने गौरवमें माता - पितासे गुरुको अधिक महत्त्व ५८ दिया हो तो आप मेरी रक्षा करें । यदि मन, कर्म एवं वाणीसे भी मैंने गुरुका अनादर न किया हो तो उस ५ ९ सत्यके कारण अग्निदेव आप मेरी रक्षा करें । इस प्रकार मनसे सत्य शपथोंके लेनेवाले उसके सामने अग्निदेवके ६० । आदेशसे सरस्वती प्रकट हुईं । उन्होंने राक्षसके द्वारा पकड़े जानेके कारण व्याकुल हुए ब्राह्मणके पुत्रसे कहा— ६१ ब्राह्मणपुत्र! डरो मत । मैं तुम्हें संकटसे मुक्त करूँगी । तुम्हारी जीभ अग्रभागपर स्थित होकर मैं राक्षसके कल्याणकारी समस्त विषयोंका कथन करूँगी । उसके बाद तुम मुक्त हो ६२ जाओगे । उस राक्षससे अदृश्य रहती हुई सरस्वती ऐसा कहनेके बाद अन्तर्धान हो गयी । उस ब्राह्मणने निशाचरसे ६३ ( सरस्वतीकी शक्तिसे ) कहा -- ॥ ५५ - ६३ ॥ ब्राह्मणने कहा – ( निशाचर! ) सुनो! तुम्हारे और दूसरे अन्य पापियोंके लिये कल्याणकर सारे पापोंकी ६४ शुद्धि एवं पुण्य बढ़ानेवाले तत्त्वोंको मैं कहता हूँ । प्रातः काल उठकर, मध्याह्नमें अथवा सायंकाल इस जपने योग्य स्तोत्रका सदा जप करना चाहिये । ६५| यह जप जप करनेवालेको निःसंदेह शान्ति एवं पुष्टि प्रदान करता है । ॐ, हरि, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव, ६६ । जनार्दन, जगन्नाथको मैं प्रणाम करता हूँ । वे मेरे पापको दूर करें । चर और अचरके गुरु, नाथ, शेषशय्यापर विराजमान, परमदेव गोविन्दको मैं प्रणाम करता हूँ । ६७ वे मेरे पापको दूर करें । शङ्ख धारण करनेवाले, चक्र धारण करनेवाले, शार्ङ्ग धारण करनेवाले एवं उत्तम ६८ मालाधारी, लक्ष्मीपतिको मैं प्रणाम करता हूँ । वे मेरे
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दामोदरमुदाराक्षं पुण्डरीकाक्षमच्युतम् ।
प्रणतोऽस्मि स्तुतं स्तुत्यैः स मे पापं व्यपोहतु ॥
नारायणं नरं शौरिं माधवं मधुसूदनम् ।
प्रणतोऽस्मि धराधारं स मे पापं व्यपोहतु ॥
केशवं चन्द्रसूर्याक्षं कंसकेशिनिषूदनम् ।
प्रणतोऽस्मि महाबाहुं स मे पापं व्यपोहतु ॥
श्रीवत्सवक्षसं श्रीशं श्रीधरं श्रीनिकेतनम् ।
प्रणतोऽस्मि श्रियः कान्तं स मे पापं व्यपोहतु ॥
यमीशं सर्वभूतानां ध्यायन्ति यतयोऽक्षरम् ।
वासुदेवमनिर्देश्यं तमस्मि शरणं गतः ॥
समस्तालम्बनेभ्यो यं व्यावृत्य मनसो गतिम् ।
ध्यायन्ति वासुदेवाख्यं तमस्मि शरणं गतः ॥
सर्वगं सर्वभूतं च सर्वस्याधारमीश्वरम् ।
वासुदेवं परं ब्रह्म तमस्मि शरणं गतः ॥
परमात्मानमव्यक्तं यं प्रयान्ति सुमेधसः ।
कर्मक्षयेऽक्षयं देवं तमस्मि शरणं गतः ॥
पुण्यपापविनिर्मुक्ता यं प्रविश्य पुनर्भवम् । न योगिनः प्राप्नुवन्ति तमस्मि शरणं गतः ब्रह्मा भूत्वा जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम् । यः सृजत्यच्युतो देवस्तमस्मि शरणं गतः ब्रह्मत्वे यस्य वक्त्रेभ्यश्चतुर्वेदमयं वपुः । प्रभुः पुरातनो जज्ञे तमस्मि शरणं गतः ब्रह्मरूपधरं देवं जगद्योनिं जनार्दनम् स्स्रष्टृत्वे संस्थितं सृष्टौ प्रणतोऽस्मि सनातनम् ॥ स्रष्टा भूत्वा स्थितो योगी स्थितावसुरसूदनः तमादिपुरुषं विष्णुं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् धृता मही हता दैत्याः परित्रातास्तथा सुराः येन तं विष्णुमाद्येशं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥ श्री वामनपुराण [ अध्याय ८५ । पापको दूर करें । दामोदर, उदाराक्ष, पुण्डरीकाक्ष, स्तवनीय ६ ९ स्तोत्रोंसे स्तुत अच्युतको मैं नमस्कार करता हूँ । वे मेरे पापोंको दूर करें । नारायण, नर, शौरि, माधव, मधुसूदन एवं धराको धारण करनेवाले भगवान्को मैं प्रणाम ७० करता हूँ । वे मेरे पापको दूर करें ॥ ६४–७० ॥ चन्द्र एवं सूर्यरूपी नेत्रोंवाले, कंस और केशीको ७१ मारनेवाले महाबाहु केशवको मैं प्रणाम करता हूँ । वे मेरे पापको दूर करें । वक्षःस्थलपर श्रीवत्स धारण करनेवाले, ७२ श्रीश, श्रीधर, श्रीनिकेतन एवं श्रीकान्तको मैं प्रणाम करता हूँ । वे मेरे पापोंको दूर करें । संयम करनेवाले लोग जिन सब प्राणियोंके स्वामी, अक्षर एवं अनिर्देश्य ७३ वासुदेवका ध्यान करते हैं मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ । ( संन्यासी लोग ) अन्य समस्त सहारोंसे मनकी ७४ गतिको लौटाकर जिस वासुदेव नामक ईश्वरका ध्यान करते हैं, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ । मैं सर्वगत, ७५ सर्वभूत, सर्वाधार ईश्वर एवं वासुदेव नामक परब्रह्मकी शरण जाता हूँ । श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न लोग कर्मका नाश ७६ होनेपर जिन अदृष्ट, अविनाशी, परमात्मदेवको प्राप्त करते हैं, मैं उनकी शरण में जाता हूँ । पुण्य तथा पापसे रहित योगीलोग जिन्हें पाकर फिर जन्म ग्रहण नहीं करते, मैं ॥ ७७ उनकी शरणमें जाता हूँ । ब्रह्माका रूप धारण कर देवता, दैत्य एवं मनुष्योंसे युक्त सारे जगत्की सृष्टि करनेवाले ॥ ७८ अच्युत देवकी मैं शरणमें जाता हूँ॥७१–७८ ॥ ब्रह्माका रूप धारण करनेपर जिनके मुखोंसे चारों ॥ ७ ९ वेदोंसे युक्त शरीर धारण करनेवाले पुरातन प्रभुका । आविर्भाव हुआ था, मैं उनकी शरणमें जाता हूँ । मैं । ८० सृष्टिके लिये स्रष्टारूपसे स्थित ब्रह्मरूप धारण करनेवाले सनातन जगद्योनि जनार्दनको प्रणाम करता हूँ । सृष्टिकर्ता । । होकर योगरूपमें विद्यमान एवं स्थितिकालमें राक्षसोंका ॥ ८१ नाश करनेवाले आदिपुरुष जनार्दनको मैं प्रणाम करता । हूँ । मैं उन आदिपुरुष ईश्वर जनार्दन विष्णुको प्रणाम ८२ | करता हूँ, जिन्होंने पृथ्वीको धारण किया है, दैत्योंको
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अध्याय ८५ ] सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव कथन - प्रसङ्गमें राक्षस - वृत्तान्त ४२५
यज्ञैर्यजन्ति यं विप्रा यज्ञेशं यज्ञभावनम् ।
तं यज्ञपुरुषं विष्णुं प्रणतोऽस्मि सनातनम् ॥
पातालवीथीभूतानि तथा लोकान् निहन्ति यः ।
तमन्तपुरुषं रुद्रं प्रणतोऽस्मि सनातनम् ॥
सम्भक्षयित्वा सकलं यथासृष्टमिदं जगत् ।
यो वै नृत्यति रुद्रात्मा प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥
सुरासुराः पितृगणाः यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
सम्भूता यस्य देवस्य सर्वगं तं नमाम्यहम् ॥
समस्तदेवाः सकला मनुष्याणां च जातयः ।
यस्यांशभूता देवस्य सर्वगं तं नतोऽस्म्यहम् ॥
वृक्षगुल्मादयो यस्य तथा पशुमृगादयः ।
एकांशभूता देवस्य सर्वगं तं नमाम्यहम् ॥
यस्मान्नान्यत् परं किञ्चिद् यस्मिन् सर्वं महात्मनि ।
यः सर्वमध्यगोऽनन्तः सर्वगं तं नमाम्यहम् ॥
यथा सर्वेषु भूतेषु गूढोऽग्निरिव दारुषु ।
विष्णुरेवं तथा पापं ममाशेषं प्रणश्यतु ॥
यथा विष्णुमयं सर्वं ब्रह्मादि सचराचरम् ।
यच्च ज्ञानपरिच्छेद्यं पापं नश्यतु मे तथा ॥
शुभाशुभानि कर्माणि रजः सत्त्वतमांसि च ।
अनेकजन्मकर्मोत्थं पापं नश्यतु मे तथा ॥
यन्निशायां च यत्प्रातर्यन्मध्याह्नापराह्णयोः ।
सन्ध्ययोश्च कृतं पापं कर्मणा मनसा गिरा ॥
यत्तिष्ठता यद् व्रजता यच्च शय्यागतेन मे ।
कृतं यदशुभं कर्म कायेन मनसा गिरा ॥
अज्ञानतो ज्ञानतो वा मदाच्चलितमानसैः ।
तत् क्षिप्रं विलयं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात् ॥
परदारपरद्रव्यवाञ्छाद्रोहोद्भवं च यत् ।
परपीडोद्भवां निन्दां कुर्वता यन्महात्मनाम् ॥
यच्च भोज्ये तथा पेये भक्ष्ये चोष्ये विलेहने ।
तद् यातु विलयं तोये यथा लवणभाजनम् ॥
मारा है एवं देवताओंकी रक्षा की है । ब्राह्मणलोग यज्ञोंके ८३ द्वारा जिनकी अर्चना करते हैं, मैं उन यज्ञपुरुष, यज्ञभावन, यज्ञेश, सनातन विष्णुको प्रणाम करता हूँ । मैं पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियों तथा लोकोंका विनाश ८४ करनेवाले उन अन्तपुरुष सनातन रुद्रको प्रणाम करता हूँ । सृष्ट किये गये इस समस्त जगत्का भक्षणकर नृत्य ८५ करनेवाले रुद्रात्मा जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ । मैं सर्वत्र गमन करनेवाले देवको प्रणाम करता हूँ, जिनसे समस्त सुर, असुर, पितृगण, यक्ष, गन्धर्व एवं राक्षस ८६ उत्पन्न हुए हैं ॥ ७ ९ -८६ ॥ मैं उन सर्वव्यापी देवको प्रणाम करता हूँ जिनके ८७ अंशसे सम्पूर्ण देव एवं मनुष्योंकी सभी जातियाँ उत्पन्न हुई हैं । वृक्ष, गुल्म आदि तथा पशु, मृग आदि ८८ जिन परमदेवके एक अंशरूप हैं, मैं उन सर्वगामी देवको प्रणाम करता हूँ । मैं उन सर्वव्यापी देवको प्रणाम करता हूँ जिनसे पृथक् कोई वस्तु नहीं है एवं ८ ९ जिन महात्मामें सम्पूर्ण पदार्थ स्थित हैं तथा जो सभी अन्तःकरणमें रहनेवाले और अनन्त हैं । काष्ठमें अग्रिके ९ ० समान समस्त प्राणियोंमें व्याप्त विष्णु मेरे सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करें; क्योंकि विष्णुसे ब्रह्मा आदि समस्त ९९ चराचरात्मक जगत् व्याप्त है तथा जो ज्ञानके द्वारा धारण करने योग्य हैं । इसलिये मेरे पाप नष्ट हो जायँ । ९ २ ( विष्णुकी कृपासे ) मेरे शुभ तथा अशुभ कर्म, सत्त्व, रज एवं तमोगुण तथा अनेक जन्मोंके कर्मसे उत्पन्न पाप नष्ट हो जायँ । शरीर, कर्म, मन एवं वाणीके द्वारा ९ ३ रात्रिमें तथा प्रातःकाल, मध्याह्नकाल, अपराह्नकाल | और सन्ध्याकालमें चलते बैठते और शयन करते ९ ४ हुए ज्ञान या अज्ञानपूर्वक अथवा निरहंकार मनसे मैंने जो अशुभ ( पाप ) कर्म किये हों वे वासुदेवके नाम-९ ५ कीर्तनसे शीघ्र नष्ट हो जायँ ॥ ८७ – ९ ५ ॥ परस्त्री और परधनकी कामना, द्रोह, परपीड़ा, ९ ६ महात्माओंकी निन्दा तथा ( निषिद्ध ) भोज्य, पेय, भक्ष्य, चोष्य एवं चाटनेवाले वस्तुके कारण उत्पन्न सम्पूर्ण पाप ९ ७ | इस प्रकार नष्ट हो जायँ जैसे लवण रखनेवाला मिट्टीका
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४२६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८५
यद् बाल्ये यच्च कौमारे यत् पापं यौवने मम ।
वयःपरिणतौ यच्च यच्च जन्मान्तरे कृतम् ॥
नारायण गोविन्द हरिकृष्णेश कीर्तनात् ।
प्रयातु विलयं तोये यथा लवणभाजनम् ॥
विष्णवे वासुदेवाय हरये केशवाय च ।
जनार्दनाय कृष्णाय नमो भूयो नमो नमः ॥
भविष्यन्नरकघ्नाय नमः कंसविघातिने ।
अरिष्टकेशिचाणूरदेवारिक्षयिणे नमः ॥
कोऽन्यो बलेर्वञ्चयिता त्वामृते वै भविष्यति ।
कोऽन्यो नाशयति बलाद् दर्पं हैहयभूपतेः ॥
कः करिष्यत्यथाऽन्यो वै सागरे सेतुबन्धनम् ।
वधिष्यति दशग्रीवं कः सामात्यपुरःसरम् ॥
कस्त्वामृतेऽन्यो नन्दस्य गोकुले रतिमेष्यति ।
प्रलम्बपूतनादीनां त्वामृते मधुसूदन ।
निहन्ताऽप्यथवा शास्ता देवदेव भविष्यति ॥
जपन्नेवं नरः पुण्यं वैष्णवं धर्ममुत्तमम् ।
इष्टानिष्टप्रसंगेभ्यो ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा ॥
कृतं तेन तु यत् पापं सप्तजन्मान्तराणि वै ।
महापातकसंज्ञं वा तथा चैवोपपातकम् ॥
यज्ञादीनि च पुण्यानि जपहोमव्रतानि च ।
नाशयेद् योगिनां सर्वमामपात्रमिवाम्भसि ॥
नरः संवत्सरं पूर्णं तिलपात्राणि षोडश ।
अहन्यहनि यो दद्यात् पठत्येच्च तत्समम् ॥
अविलुप्तब्रह्मचर्यं सम्प्राप्य स्मरणं हरेः ।
विष्णुलोकमवाप्नोति सत्यमेतन्मयोदितम् ॥
यथैतत् सत्यमुक्तं मे न ह्यल्पमपि मे मृषा ।
राक्षसस्त्रस्तसर्वाङ्गं तथा मामेष मुञ्चतु ॥
पुलस्त्य उवाच
एवमुच्चारिते तेन मुक्तो विप्रस्तु रक्षसा ।
अकामेन द्विजो भूयस्तमाह रजनीचरम् ॥
ब्राह्मण उवाच
एतद् भद्र मया ख्यातं तव पातकनाशनम् ।
विष्णोः सारस्वतं स्तोत्रं यज्जगाद सरस्वती ॥
। पात्र पानीमें ( पड़ते ही ) नष्ट हो जाता है । नारायण, ९ ८ गोविन्द, हरि, कृष्ण, ईशका कीर्तन करनेसे बाल्यकाल, कुमारावस्था, यौवन, वार्द्धक्य एवं जन्मान्तरमें किये गये मेरे सम्पूर्ण पाप इस प्रकार नष्ट हो जायँ जैसे जलमें नमक ९९ रखनेवाला मिट्टीका बर्तन विलीन हो जाता ( गल जाता ) है । विष्णु, वासुदेव, हरि, केशव, जनार्दन, कृष्णको पुनः-१०० पुनः प्रणाम है । भावी नरकका नाश करनेवाले तथा कंसको मारनेवालेको नमस्कार है । अरिष्ट, केशी एवं १०१ । चाणूर आदि राक्षसोंके नष्ट करनेवालेको नमस्कार है । आपके सिवाय बलिको कौन छल सकता था एवं आपके बिना हैहयनरेशके घमंडको कौन नष्ट कर सकता था? १०२ आपके सिवाय समुद्रमें सेतुको कौन बाँध सकता था तथा मन्त्री आदिके साथ ही दशग्रीव रावणको कौन मार १०३ सकता था ॥ ९६–१०३ ॥ मधुसूदन! आपके सिवाय कौन ऐसा है जो नन्दके गोकुलमें प्रेममयी क्रीडा कर सके? देवदेव! १०४ आपके सिवा प्रलम्ब और पूतना आदिका वध एवं शासन कौन कर सकता था? इस धर्ममय उत्तम वैष्णव १०५ मन्त्रका जप करनेवाला मनुष्य इष्ट और अनिष्टके प्रसङ्गवश तथा ज्ञान या अज्ञानपूर्वक सात जन्मोंमें किये अपने १०६ महापातकों, उपपातकों, यज्ञ, होम एवं व्रत आदिके पुण्य कर्मोंके भी योगको इस प्रकार नष्ट कर देता है । १०७ जैसे जलमें मिट्टीका कच्चा घड़ा नष्ट हो जाता है । मैं यह सत्य कहता हूँ कि अखण्डित ब्रह्मचर्य एवं हरिस्मरणपूर्वक १०८ एक वर्षतक इस स्तोत्रके पाठके साथ प्रतिदिन तिलसे भरे सोलह पात्रोंका दान करनेवाला मनुष्य विष्णुलोकको १० ९ प्राप्त करता है । यदि मैंने यह सत्य कहा एवं इसमें अल्पमात्र भी असत्य न हो तो यह राक्षस सब अङ्गोंसे ११० पीड़ित हो चुके मुझे छोड़ दे ॥ १०४—११० ॥ पुलस्त्यजी बोले – उसके ऐसा कहते ही राक्षसने ब्राह्मणको छोड़ दिया । पुनः द्विजने निष्कामभावसे १११ राक्षससे कहा- ॥ १११ ॥
ब्राह्मणने कहा— भद्र! सरस्वती देवीने जिस ११२ | पापका नाश करनेवाले सारस्वत विष्णुस्तोत्रको कहा है,
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अध्याय ८६ ] स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर- कथित पापप्रशमनस्तोत्र ४२७
हुताशनेन प्रहिता मम जिह्वाग्रसंस्थिता ।
दैनं स्तवं विष्णोः सर्वेषां चोपशान्तिदम् ॥
अनेनैव जगन्नाथं त्वमाराधय केशवम् ।
ततः शापापनोदं तु स्तुते लप्स्यसि केशवे ॥
अहर्निशं हृषीकेशं स्तवेनानेन राक्षस ।
तुहि भक्तिं दृढां कृत्वा ततः पापाद् विमोक्ष्यसे ॥
स्तुतो हि सर्वपापानि नाशयिष्यत्यसंशयम् ।
स्तुतो हि भक्त्या नृणां वै सर्वपापहरो हरिः ॥
पुलस्त्य उवाच
ततः प्रणम्य तं विप्रं प्रसाद्य स निशाचरः ।
तदैव तपसे श्रीमान् शालग्राममगाद् वशी ॥
अहर्निशं स एवैनं जपन् सारस्वतं स्तवम् ।
देवक्रियारतिर्भूत्वा तपस्तेपे निशाचरः ॥
समाराध्य जगन्नाथं स तत्र पुरुषोत्तमम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्तवान् ॥
एतत्ते कथितं ब्रह्मन् विष्णोः सारस्वतं स्तवम् ।
विप्रवक्त्रस्थयासम्यक् सरस्वत्यासमीरितम् ॥
य एतत् परमं स्तोत्रं वासुदेवस्य मानवः ।
पठिष्यति स सर्वेभ्यः पापेभ्यो मोक्षमाप्स्यति ॥
उसे मैंने तुमसे कह दिया । अग्निदेवसे भेजी गयी एवं ११३ | मेरी जिह्वाके अग्रभागमें स्थित सरस्वतीने सभीको शान्ति । देनेवाले इस विष्णुस्तोत्रको कहा है । तुम इसीसे जगत्स्वामी केशवकी आराधना करो । उसके बाद केशवकी स्तुति ११४ करनेसे तुम शापसे मुक्त हो जाओगे । राक्षस! इस स्तुतिके द्वारा दृढ़ भक्तिपूर्वक दिन - रात हृषीकेशकी स्तुति करो । ११५ तब तुम पापसे मुक्त हो जाओगे । स्तुति किये गये हरि निःसंदेह समस्त पापोंको नष्ट करेंगे । भक्तिपूर्वक स्तुति करनेसे सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले हरि मनुष्यों के ११६ | सब पापोंका नाश कर देते हैं॥११२–११६ ॥ पुलस्त्यजी बोले – उसके बाद आत्मनिष्ठ वह राक्षस ब्राह्मणको प्रणाम एवं प्रसन्न करनेके पश्चात् ११७ उसी समय तपस्याके लिये शालग्राम नामक स्थानमें चला गया । वह राक्षस दिन - रात इसी सारस्वतस्तोत्रका ११८ । जप करते हुए देवक्रियामें लीन होकर तप करने लगा । वहाँ पुरुषोत्तम जगन्नाथकी पूजा कर सम्पूर्ण पापोंसे ११ ९ मुक्त होकर उसने विष्णुलोक प्राप्त किया । ब्रह्मन्! मैंने तुमसे ब्राह्मणके मुखसे सरस्वतीद्वारा कहा गया १२० विष्णुका यह सारस्वतस्तोत्र कहा । वासुदेवके इस श्रेष्ठ स्तोत्रको पढ़नेवाला मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो १२१ | जायगा ॥ ११७–१२१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८५ ॥
छियासीवाँ अध्याय स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर- कथित पापप्रशमनस्तोत्र पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजी बोले - हे जगन्नाथ! आपको नमस्कार नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ देवदेव नमोऽस्तु ते । है । हे देवदेव! आपको नमस्कार है । हे वासुदेव! वासुदेव नमस्तेऽस्तु बहुरूप नमोऽस्तु ते ॥ १ | आपको नमस्कार है । हे अनन्त रूप धारण करनेवाले!
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४२८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८६
एकशृङ्ग नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं वृषाकपे ।
श्रीनिवास नमस्तेऽस्तु नमस्ते भूतभावन ॥
विष्वक्सेन नमस्तुभ्यं नारायण नमोऽस्तु ते ।
ध्रुवध्वज नमस्तेऽस्तु सत्यध्वज नमोऽस्तु ते ॥
यज्ञध्वज नमस्तुभ्यं धर्मध्वज नमोऽस्तु ते ।
तालध्वज नमस्तेऽस्तु नमस्ते गरुडध्वज ॥
वरेण्य विष्णो वैकुण्ठ नमस्ते पुरुषोत्तम ।
नमो जयन्त विजय जयानन्त पराजित ॥
कृतावर्त महावर्त महादेव नमोऽस्तु ते ।
अनाद्याद्यन्त मध्यान्त नमस्ते पद्मजप्रिय ॥
पुरञ्जय नमस्तुभ्यं शत्रुञ्जय नमोऽस्तु ते । शुभञ्जय नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु धनञ्जय
सृष्टिगर्भ नमस्तुभ्यं शुचिश्रवः पृथुश्रवः ।
नमो हिरण्यगर्भाय पद्मगर्भाय ते नमः ॥
नमः कमलनेत्राय कालनेत्राय ते नमः ।
कालनाभ नमस्तुभ्यं महानाभ नमो नमः ॥
वृष्टिमूल महामूल मूलावास नमोऽस्तु ते ।
धर्मावास जलावास श्रीनिवास नमोऽस्तु ते ॥
धर्माध्यक्ष प्रजाध्यक्ष लोकाध्यक्ष नमो नमः ।
सेनाध्यक्ष नमस्तुभ्यं कालाध्यक्ष नमोऽस्तु ते ॥
गदाधर श्रुतिधर चक्रधारिन् श्रियोधर ।
वनमालाधर हरे नमस्ते धरणीधर ॥
आर्चिषेण महासेन नमस्तेऽस्तु पुरुष्टुत ।
बहुकल्प महाकल्प नमस्ते कल्पनामुख ॥
आपको नमस्कार है । हे एकशृङ्ग! आपको नमस्कार है । २ हे वृषाकपे! आपको नमस्कार है । हे श्रीनिवास! आपको नमस्कार है । हे भूतभावन! आपको नमस्कार है । हे विष्वक्सेन! आपको नमस्कार है । हे नारायण! ३ आपको नमस्कार है । हे ध्रुवध्वज! आपको नमस्कार है । हे सत्यध्वज! आपको नमस्कार है । हे यज्ञध्वज! आपको नमस्कार है । हे धर्मध्वज! आपको नमस्कार है । हे तालध्वज! आपको नमस्कार है । हे गरुडध्वज! ४ आपको नमस्कार है । हे वरेण्य! हे विष्णो! हे वैकुण्ठ! हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है । हे जयन्त! हे विजय! हे जय! हे अनन्त! हे पराजित! आपको नमस्कार ५ है । हे कृतावर्त! हे महावर्त! हे महादेव! आपको नमस्कार है । हे अनादि एवं आदि और अन्तमें विद्यमान! हे मध्यान्त! ( मध्य और अन्तवाले ) हे पद्मजप्रिय! ६ आपको प्रणाम है । हे पुरञ्जय! आपको नमस्कार है । हे शत्रुञ्जय! आपको प्रणाम है । हे शुभञ्जय! आपको प्रणाम है । हे धनञ्जय! आपको प्रणाम है । हे सृष्टिको ॥ ७ अपनेमें सुरक्षित रखनेवाले हे सृष्टिगर्भ! श्रवणमात्रसे ही पवित्र कर देनेवाले हे सुचिश्रवः! आर्तजनोंकी पुकारको विशाल कर्णोंसे सुननेवाले हे पृथुश्रवः! आपको नमस्कार है । आप हिरण्यगर्भको नमस्कार है । आप पद्मगर्भको ८ नमस्कार है ॥ १-८ ॥ आप कमलनेत्रको प्रणाम है । आप कालनेत्रको ९ प्रणाम है । हे कालनाभ! आपको प्रणाम है । हे महानाभ! आपको बारम्बार प्रणाम है । हे वृष्टिमूल! हे महामूल! हे मूलावास! आपको प्रणाम है । १० हे धर्मावास! हे जलावास! हे श्रीनिवास! आपको प्रणाम है । हे धर्माध्यक्ष! हे प्रजाध्यक्ष! हे लोकाध्यक्ष! आपको बार - बार प्रणाम है । हे सेनाध्यक्ष! आपको ११ प्रणाम है । हे कालाध्यक्ष! आपको प्रणाम है । हे गदाधर! हे श्रुतिधर! हे चक्रधर! हे श्रीधर! हे १२ वनमाला और पृथ्वीको धारण करनेवाले हे हरे! आपको प्रणाम है । हे आर्चिषेण! हे महासेन! हे पुरुसे स्तुत! आपको प्रणाम है । हे बहुकल्प! १३ । हे महाकल्प! हे कल्पनामुख! आपको प्रणाम है ।
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अध्याय ८६ ] स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा
सर्वात्मन् सर्वग विभो विरिचे श्वेत केशव ।
नील रक्त महानील अनिरुद्ध नमोऽस्तु ते ॥ १४
द्वादशात्मक कालात्मन् सामात्मन् परमात्मक ।
व्योमकात्मक सुब्रह्मन् भूतात्मक नमोऽस्तु ते ॥ १५
हरिकेश महाकेश गुडाकेश नमोऽस्तु ते ।
मुञ्जकेश हृषीकेश सर्वनाथ नमोऽस्तु ते ॥ १६
सूक्ष्म स्थूल महास्थूल महासूक्ष्म शुभङ्कर ।
श्वेतपीताम्बरधर नीलवास नमोऽस्तु ते ॥ १७
कुशेशय नमस्तेऽस्तु पद्मशय जलेशय ।
गोविन्द प्रीतिकर्ता च हंस पीताम्बरप्रिय ॥ १८
अधोक्षज नमस्तुभ्यं सीरध्वज जनार्दन ।
वामनाय नमस्तेऽस्तु नमस्ते मधुसूदन ॥ १ ९
सहस्त्रशीर्षाय नमो ब्रह्मशीर्षाय ते नमः ।
नमः सहस्त्रनेत्राय सोमसूर्यानलेक्षण ॥ २०
नमश्चाथर्वशिरसे महाशीर्षाय ते नमः ।
नमस्ते धर्मनेत्राय महानेत्राय ते नमः ॥ २१
नमः सहस्रपादाय सहस्रभुजमन्यवे ।
नमो यज्ञवराहाय महारूपाय ते नमः ॥ २२
नमस्ते विश्वदेवाय विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।
विश्वरूप नमस्तेऽस्तु त्वत्तो विश्वमभूदिदम् ॥ २३
न्यग्रोधस्त्वं महाशाखस्त्वं मूलकुसुमार्चितः ।
स्कन्धपत्राङ्कुरलतापल्लवाय नमोऽस्तु ते ॥ २४
मूलं ते ब्राह्मणा ब्रह्मन् स्कन्धस्ते क्षत्रियाः प्रभो ।
वैश्याः शाखा दलं शूद्रा वनस्पते नमोऽस्तु ते ॥ २५
ब्राह्मणाः साग्नयो वक्त्राः दोर्दण्डाः सायुधा नृपाः ।
पार्श्वाद् विशश्चोरुयुगाज्जाताः शूद्राश्च पादतः ॥ २६
नेत्राद् भानुरभूत् तुभ्यं पद्भ्यां भूः श्रोत्रयोर्दिशः ।
नाभ्या ह्यभूदन्तरिक्षं शशाङ्को मनसस्तव ॥ २७
उपदिष्ट महेश्वर- कथित पापप्रशमनस्तोत्र ४२ ९ | हे सर्वात्मन्! हे सर्वग! हे विभो! हे विरिञ्चिन्! हे श्वेत! | हे केशव! हे नील! हे रक्त! हे महानील! हे अनिरुद्ध! आपको नमस्कार है । हे द्वादशात्मक! हे कालात्मन्! हे सामात्मन्! हे परमात्मक! हे आकाशात्मक! हे सुब्रह्मन्! हे भूतात्मक! आपको प्रणाम है । हे हरिकेश! हे महाकेश! हे गुडाकेश! आपको प्रणाम है । हे मुञ्जकेश! हे हृषीकेश! । हे सर्वनाथ! आपको प्रणाम है॥९ –१६ ॥ हे सूक्ष्म! हे स्थूल! हे महास्थूल! हे महासूक्ष्म! हे शुभङ्कर! हे उज्ज्वल - पीले वस्त्रको धारण करनेवाले! हे नीलवास! आपको प्रणाम है । हे कुशपर शयन करनेवाले! हे पद्मपर शयन करनेवाले! हे जलमें शयन करनेवाले! हे गोविन्द! हे प्रीतिकर्तः! हे हंस! हे पीताम्बरप्रिय! आपको नमस्कार है । हे अधोक्षज! हे सीरध्वज! हे जनार्दन! आपको प्रणाम है । हे वामन! आपको प्रणाम है । हे मधुसूदन! आपको प्रणाम है । आप सहस्र सिरवालेको नमस्कार है । आप ब्रह्मशीर्षको प्रणाम है । आप सहस्रनेत्र और चन्द्र, सूर्य तथा अग्रिरूपी आँखवालेको प्रणाम है । अथर्वशिराको नमस्कार है । महाशीर्षको प्रणाम है । धर्मनेत्रको प्रणाम है । महानेत्रको प्रणाम है । सहस्रपादको नमस्कार है । सहस्रों भुजाओं एवं सहस्रों यज्ञोंवालेको नमस्कार I यज्ञवराहको नमस्कार है! आप महारूपको नमस्कार है । विश्वदेवको प्रणाम हैं । हे विश्वात्मन्! हे विश्वसम्भव! हे विश्वरूप! आपको नमस्कार है । आपसे यह विश्व उत्पन्न हुआ है । आप न्यग्रोध और महाशाख हैं, आप ही मूलकुसुमार्चित हैं । स्कन्ध, पत्र, अङ्कुर, लता एवं पल्लवस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ १७–२४ ॥ ब्रह्मन्! ब्राह्मण आपके मूल हैं । प्रभो! क्षत्रिय आपके स्कन्ध, वैश्य शाखा एवं शूद्र पत्ते हैं । वनस्पते! आपको नमस्कार है । अग्निसहित ब्राह्मण आपके मुख एवं शस्त्रसहित क्षत्रिय आपकी भुजाएँ हैं । वैश्य आपके दोनों जाँघोंके पार्श्वभागसे तथा शूद्र आपके चरणोंसे उत्पन्न हुए हैं । आपके नेत्रसे सूर्य उत्पन्न हुए हैं । आपके | चरणोंसे पृथ्वी, कानोंसे दिशाएँ, नाभिसे अन्तरिक्ष तथा
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४३० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८६
प्राणाद् वायुः समभवत् कामाद् ब्रह्मा पितामहः ।
क्रोधात् त्रिनयनो रुद्रः शीर्णोः द्यौः समवर्तत ॥
इन्द्राग्नी वदनात् तुभ्यं पशवो मलसम्भवाः ।
ओषध्यो रोमसम्भूता विराजस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥
पुष्पहास नमस्तेऽस्तु महाहास नमोऽस्तु ते ।
ॐकारस्त्वं वषट्कारो वौषट् त्वं च स्वधा सुधा ॥
स्वाहाकार नमस्तुभ्यं हन्तकार नमोऽस्तु ते ।
सर्वाकार निराकार वेदाकार नमोऽस्तु ते ॥
त्वं हि वेदमयो देवः सर्वदेवमयस्तथा ।
सर्वतीर्थमयश्चैव सर्वयज्ञमयस्तथा ॥
नमस्ते यज्ञपुरुष यज्ञभागभुजे नमः । नमः सहस्त्रधाराय शतधाराय ते नमः ।
भूर्भुवःस्वःस्वरूपाय गोदायामृतदायिने ।
सुवर्णब्रह्मदात्रे च सर्वदात्रे च ते नमः ॥
ब्रह्मेशाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मादे ब्रह्मरूपधृक् ।
परब्रह्म नमस्तेऽस्तु शब्दब्रह्म नमोऽस्तु ते ॥
विद्यास्त्वं वेद्यरूपस्त्वं वेदनीयस्त्वमेव च ।
बुद्धिस्त्वमपि बोध्यश्च बोधस्त्वं च नमोऽस्तु ते ॥
होता होमश्च हव्यं च हूयमानश्च हव्यवाट् ।
पाता पोता च पूतश्च पावनीयश्च ॐ नमः ॥
हन्ता च हन्यमानश्च ह्रियमाणस्त्वमेव च ।
हर्त्ता नेता च नीतिश्च पूज्योऽग्र्यो विश्वधार्यसि ॥
स्स्रुक्स्स्रुवौ परधामासि कपालोलूखलोऽरणि: ।
यज्ञपात्रारणेयस्त्वमेकधा बहुधा त्रिधा ॥
यज्ञस्त्वं यजमानस्त्वमीड्यस्त्वमसि याजकः ।
ज्ञाता ज्ञेयस्तथा ज्ञानं ध्येयो ध्याताऽसि चेश्वर ॥
ध्यानयोगश्च योगी च गतिर्मोक्षो धृतिः सुखम् ।
योगाङ्गानि त्वमीशानः सर्वगस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥
मनसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए हैं । आपके प्राणसे वायु, २८ कामसे पितामह ब्रह्मा, क्रोधसे त्रिनेत्र रुद्र और सिरसे द्युलोक आविर्भूत हुए हैं । आपके मुखसे इन्द्र और २ ९ अग्नि, मलसे पशु तथा रोमसे ओषधियाँ उत्पन्न हुईं । आप विराज हैं । आपको नमस्कार हैं । हे पुष्पहास! आपको प्रणाम है । हे महाहास! आपको प्रणाम है । आप ३० ओङ्कार, वषट्कार और वौषट् हैं । आप स्वधा और सुधा हैं । हे स्वाहाकार! आपको प्रणाम है । हे हन्तकार! ३१ आपको प्रणाम है । हे सर्वाकार! हे निराकार! हे वेदाकार! आपको प्रणाम है । आप वेदमय देव तथा सर्वदेवमय ३२ हैं । आप सर्वतीर्थमय और सर्वयज्ञमय हैं ॥ २५–३२ ॥ यज्ञपुरुष! आपको प्रणाम है । हे यज्ञभागके ३३ भोक्तः! आपको प्रणाम है । सहस्रधार और शतधारको प्रणाम है । भूर्भुवःस्वःस्वरूप, गोदाता, अमृतदाता, सुवर्ण और ब्रह्म ( संसारके निमित्त और उपादान कारण ३४ आदि ) के भी जन्मदाता तथा सर्वदाता आपको प्रणाम है । आप ब्रह्मेशको नमस्कार है । हे ब्रह्मादि! हे ३५ ब्रह्मरूपधारिन्! हे परमब्रह्म! आपको प्रणाम है । हे शब्दब्रह्म! आपको प्रणाम है । आप ही विद्या, आप ही ३६ । वेद्यरूप तथा आप ही जानने योग्य हैं । आप ही बुद्धि, बोध्य और बोधरूप हैं । आपको प्रणाम है । आप होता, होम, हव्य, हूयमान द्रव्य तथा हव्यवाट्, पाता, पोता, पूत ३७ तथा पावनीय ओङ्कार हैं । आपको नमस्कार है । आप हन्ता, हन्यमान, ह्रियमाण, हर्ता, नेता, नीति, पूज्य, श्रेष्ठ ३८ तथा संसारको धारण करनेवाले हैं । आप स्रुक्, स्रुव, परधाम, कपाली, उलूखल, अरणि, यज्ञपात्र, आरणेय, ३ ९ एकधा, त्रिधा और बहुधा हैं । आप यज्ञ हैं और आप यजमान हैं । आप स्तुत्य और याजक हैं । आप ज्ञाता, ४० ज्ञेय, ज्ञान, ध्येय, ध्याता तथा ईश्वर हैं । आप ध्यानयोग, योगी, गति, मोक्ष, धृति, सुख, योगाङ्ग, ईशान एवं सर्वग ४१ । हैं । आपको नमस्कार है॥३३–४१ ॥