वामन पुराण — पृष्ठ 461–470
वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470
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अध्याय ९ ० ] भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता ४५१ ममासक्ता वंशगुल्मे दुर्मोक्षे प्राणनाशने तत्रासक्तस्य षड्रात्रान्ममाभूज्जीवितक्षय: गतोऽस्मि नरकं भूयस्तस्मान्मुक्तोऽभवं शुकः महारण्ये तथा बद्धः शबरेण दुरात्मना पञ्जरे क्षिप्य विक्रीतो वणिक्पुत्राय शालिने तेनाप्यन्तः पुरवरे युवतीनां समीपतः शब्दशास्त्रविदित्येवं दोषघ्नश्चेत्यवस्थितः तत्रासतस्तरुण्यस्ता ओदनाम्बुफलादिभिः भक्ष्यैश्च दाडिमफलैः पुष्णन्त्यहरहः पितः कदाचित् पद्मपत्राक्षी श्यामा पीनपयोधरा सुश्रोणी तनुमध्या च वणिक्पुत्रप्रिया शुभा नाम्ना चन्द्रावली नाम समुद्घाट्याथ पञ्जरम् मां जग्राह सुचार्वङ्गी कराभ्यां चारुहासिनी चकारोपरि पीनाभ्यां स्तनाभ्यां सा हि मां ततः
ततोऽहं कृतवान् भावं तस्यां विलसितुं प्लवन् ।
ततोऽनुप्लवतस्तत्र हारे मर्कटबन्धनम् ॥
बद्धोऽहं पापसंयुक्तो मृतश्च तदनन्तरम् ।
भूयोऽपि नरकं घोरं प्रपन्नोऽस्मि सुदुर्मतिः ॥
तस्माच्चाहं वृषत्वं वै गतश्चाण्डालपक्कणे ।
स चैकदा मां शकटे नियोज्य स्वां विलासिनीम् ॥
समारोप्य महातेजा गन्तुं कृतमतिर्वनम् ।
ततोऽग्रतः स चण्डालो गतस्त्वेवास्य पृष्ठतः ॥
गायन्ती याति तच्छ्रुत्वा जातोऽहं व्यथितेन्द्रियः ।
पृष्ठतस्तु समालोक्य विपर्यस्तस्तथोत्प्लुतः ॥
पतितो भूमिमगमं तदक्षे क्षणविक्रमात् ।
योक्त्रे सुबद्ध एवास्मि पञ्चत्वमगमं ततः ॥
भूयो निमग्नो नरके दशवर्षशतान्यपि ।
अतस्तव गृहे जातस्त्वहं जातिमनुस्मरन् ॥
तावन्त्येवाद्य जन्मानि स्मरामि चानुपूर्वशः ।
पूर्वाभ्यासाच्च शास्त्राणि बन्धनं चागतं मम ॥
। मेरी लगामकी रस्सी प्राणघातिनी बाँसकी ॥ ९ ३ विकट झाड़ीमें फँस गयी । वहाँ फँसा हुआ मैं छः रात बाद मर गया । उसके बाद मुझे फिर नरकमें जाना पड़ा ॥ वहाँसे छुटकारा पानेके बाद मैं शुक पक्षीकी योनिमें ॥ ९ ४ उत्पन्न हुआ । उस योनिमें विशाल वनमें दुष्टात्मा शबरने । मुझे बाँध लिया । पिंजड़े में रखकर ( उसने मुझे ) एक ॥ ९ ५ गृहस्थ वणिक्पुत्रके हाथ बेच दिया । उसने भी उत्तम । महलमें युवतियोंके पास मुझे सम्पूर्ण शास्त्रका जाननेवाला तथा दोषोंको दूर करनेवाला समझकर रख दिया । ॥ ९ ६ पिताजी! वहाँ रहते समय वे युवतियाँ प्रतिदिन मुझे । भात, जल, अनारके फल तथा अन्य भक्ष्य पदार्थ ॥ ९ ७ खिलाकर पालने लगीं । एक समय वणिक्पुत्रकी कमलदलके समान नेत्रोंवाली श्यामा, विशाल स्तनों । तथा सुन्दर जंघाओं एवं सूक्ष्म कटिवाली कल्याणी ॥ ९ ८ चन्द्रावली नामकी प्रियाने पिंजड़ेको खोला । मधुर । मुसकानवाली सुन्दरीने मुझे दोनों हाथोंमें पकड़ लिया ॥ ९९ और अपने दोनों स्तनोंपर रख लिया ॥ ९ २ – ९९ ॥ उसके बाद मैंने चन्द्रावलीके साथ विहार करनेका १०० आशय प्रकट किया । तब पापमें आसक्त होकर घूमता हुआ मैं उसके हारमें बंदरके बन्धनकी भाँति बँधकर १०१ मर गया । मैं पुनः अत्यन्त पापमय बुद्धि होनेके कारण भयंकर नरकमें पड़ गया । उसके बाद मेँ बैल होकर चाण्डालके घरमें पहुँचा । उसने एक दिन मुझे गाड़ीमें १०२ जोतकर उस गाड़ीपर अपनी स्त्रीको चढ़ाया । इस प्रकार वनमें जानेकी इच्छासे वह महातेजस्वी चाण्डाल आगे १०३' चला और उसके पीछे वह गाती हुई चली । उसका गान सुनकर मेरी इन्द्रियाँ विकल हो उठीं । मैंने पीछे घूमकर १०४ देखा और कूदा तथा उलट गया । क्षणमात्रके विपरीत गतिके कारण मैं भूमिपर गिर पड़ा और रस्सीमें अत्यन्त १०५ बँध जानसे मृत्युको प्राप्त हो गया । मैं फिर हजार वर्षतक नरकमें पड़ा रहा । वहाँसे अपने पूर्वजन्मका १०६ स्मरण करता हुआ मैं आपके गृहमें उत्पन्न हुआ हूँ । मैं आज उन्हीं जन्मोंका क्रमशः स्मरण कर रहा हूँ । पूर्व १०७ । अभ्याससे मुझे शास्त्रोंका ज्ञान तथा बन्धन मिला है ।
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४५२
तदहं जातविज्ञानो नाचरिष्ये कथंचन ।
पापानि घोररूपाणि मनसा कर्मणा गिरा ॥
शुभं वाप्यशुभं वाऽपि स्वाध्यायं शास्त्रजीविका ।
बन्धनं वा वधो वाऽपि पूर्वाभ्यासेन जायते ॥
जातिं यदा पौर्विकीं तु स्मरते तात मानवः ।
तदा स तेभ्यः पापेभ्यो निवृत्तिं हि करोति वै ॥
तस्माद् गमिष्ये शुभवर्धनाय पापक्षयायाथ मुने ह्यरण्यम् । भवान् दिवाकीर्तिमिमं सुपुत्रं गार्हस्थ्यधर्मे विनियोजयस्व ॥ बलिरुवाच इत्येवमुक्त्वा स निशाकरस्तदा प्रणम्य मातापितरौ महर्षे । जगाम पुण्यं सदनं मुरारेः ख्यातं बदर्याश्रममाद्यमीड्यम् ॥ एवं पुराभ्यासरतस्य पुंसो भवन्ति दानाध्ययनादिकानि । तस्माच्च पूर्वं द्विजवर्य वै मया अभ्यस्तमासीन्ननु ते ब्रवीमि ॥ दानं पो वाऽध्ययनं महर्षे स्तेयं महापातकमग्निदाहम् । ज्ञानानि चैवाभ्यसतां हि पूर्वं भवन्ति धर्मार्थयशांसि नाथ ॥ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ९ ० अतः ज्ञानी होकर मैं मन, कर्म और वाणीसे कभी घोर १०८ पापकर्मोंका आचरण नहीं करूँगा ॥ १००–१०८ ॥ मङ्गल, अमङ्गल, स्वाध्याय, शास्त्रजीविका, १० ९ बन्धन या वध पूर्व अभ्यासवश ही होते हैं । तात! मनुष्यको जब अपने पूर्वजन्मका स्मरण होता है ११० तब वह उन पापोंसे दूर रहता है । अतः मुने! शुभकी वृद्धि और पापके क्षयके लिये मैं वनमें जाऊँगा । आप इस सुपुत्र दिवाकीर्तिको गृहस्थधर्ममें ११ ९ लगायें ॥ १० ९ - १११ ॥ बलिने कहा- महर्षे! इस प्रकार कहने के बाद माता - पिताको प्रणाम कर वह निशाकर भगवान् नारायणके श्रेष्ठ सुप्रसिद्ध पवित्र निवास बदरिकाश्रममें चला गया । ११२ इसी प्रकार पूर्वके अभ्यासवश मनुष्यके दान एवं अध्ययन आदि कार्य होते हैं । द्विजवर्य! इसीसे निश्चय ११३ ही मैं आपसे अपने पूर्व अभ्यासके तथ्यको कह रहा हूँ । महर्षे! नाथ! दान, तप, अध्ययन, चोरी, महापातक, अग्निदाह, ज्ञान, धर्म, अर्थ एवं यश आदि सभी ११४ पूर्वजन्मोंके अभ्याससे उत्पन्न होते हैं ॥ ११२ – ११४ ॥ पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजी बोले – दैत्येश्वर बलवान् बलि अपने इत्येवमुक्त्वा बलवान् स शुक्रं गुरु और नियमन करनेवाले शुक्राचार्यसे इस प्रकार दैत्येश्वरः स्वं गुरुमीशितारम् । ध्यायंस्तदास्ते मधुकैटभघ्नं कहकर मधुकैटभके संहारकारी चक्र - गदा तथा खड्ग
नारायणं चक्रगदासिपाणिम् ॥ ११ ९ ५ । धारण करनेवाले नारायणका ध्यान करने लगा ॥ ११५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें नब्बेवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ ० ॥
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अध्याय ९ १ ] वामनकी बलिके यज्ञमें जाकर उससे तीन पग भूमिकी याचना ४५३ इक्यानबेवाँ अध्याय वामनकी बलिके यज्ञमें जाकर उससे तीन पग भूमिकी याचना, वामनका विराट्रूप ग्रहण करना एवं त्रिविक्रमत्व, वामनका बलिबन्धन - विषयक प्रश्न, बलिको वर, बलिका पाताल और वामनका स्वर्ग - गमन पुलस्त्य उवाच
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो भगवान् वामनाकृतिः ।
यज्ञवाटमुपागम्य उच्चैर्वचनमब्रवीत् ॥
ॐकारपूर्वाः श्रुतयो मखेऽस्मिन् तिष्ठन्ति रूपेण तपोधनानाम् । यज्ञोऽश्वमेधः प्रवरः क्रतूनां मुख्यस्तथा सत्रिषु दैत्यनाथः ॥
इत्थं वचनमाकर्ण्य दानवाधिपतिर्वशी ।
सार्घपात्रः समभ्यागाद्यत्र देवः स्थितोऽभवत् ॥
ततोऽर्च्य देवदेवेशमर्च्यमर्घादिनासुरः ।
भरद्वाजर्षिणा सार्धं यज्ञवाटं प्रवेशयत् ॥
प्रविष्टमात्रं देवेशं प्रतिपूज्य विधानतः । प्रोवाच भगवन् ब्रूहि किं दद्मि तव मानद ।
ततोऽब्रवीत् सुरश्रेष्ठो दैत्यराजानमव्ययः ।
विहस्य सुचिरं कालं भरद्वाजमवेक्ष्य च ॥
गुरोर्मदीयस्य गुरुस्तस्यास्त्यग्निपरिग्रहः ।
न स धारयते भूम्यां पारक्यां जातवेदसम् ॥
तदर्थमभियाचेऽहं मम दानवपार्थिव ।
मच्छरीरप्रमाणेन देहि राजन् पदत्रयम् ॥
मुरारेर्वचनं श्रुत्वा बलिर्भार्यामवेक्ष्य च ।
बाणं च तनयं वीक्ष्य इदं वचनमब्रवीत् ॥
पुलस्त्यजी बोले- इतनेमें वामनके रूपमें भगवान् आ गये । यज्ञशालाके निकट आकर वे ऊँचे स्वरसे १ | बोले - ओंकारपूर्वक वेदमन्त्र तपस्वी ऋषियोंके रूपमें इस यज्ञमें स्थित हैं । यज्ञोंमें अश्वमेधयज्ञ सर्वोत्तम है और दैत्योंके स्वामी बलि यज्ञ करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं । २ इस प्रकारकी बातको सुनकर इन्द्रियोंको जीत लेनेवाले दानवोंके स्वामी बलि अर्घ्यपात्र लेकर, जहाँ वामनदेव ३ स्थित थे, वहाँ गये । इसके बाद अर्घ्य आदिसे देवोंके देवकी अर्चना करके दानवोंके स्वामी बलिने भरद्वाज ऋषिके साथ उन्हें यज्ञशालामें प्रवेश कराया । यज्ञशालामें ४ प्रवेश करते ही बलिने वामनभगवान्की विधिपूर्वक पूजा की और कहा - मान देनेवाले भगवन्! बोलिये, ५ मैं आपको क्या दूँ? ॥१–५ ॥ इसके बाद देवोंमें श्रेष्ठ अविनाशी भगवान्ने ६ देरतक हँसकर और भरद्वाजको देखकर दैत्यराजसे । कहा - मेरे गुरुके गुरु अग्रिहोत्री ( यज्ञके अनुष्ठाता ) हैं । वे दूसरेकी भूमिमें अग्निस्थापन नहीं करते । दानवपते! ७ राजन्! मैं उनके लिये आपसे याचना करता हूँ कि मेरे शरीरके परिमाणसे आप तीन पग ( भूमि ) ८ मुझे देनेकी कृपा करें । मुरारि ( भगवान् ) -का वचन सुननेके बाद बलिने पत्नी और पुत्र बाणको ९ | देखकर ( अपनी पत्नीसे ) यह वचन कहा – प्रिये!
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४५४
न केवलं प्रमाणेन वामनोऽयं लघुः प्रिये ।
येन क्रमत्रयं मौर्य्याद् याचते बुद्धितोऽपि च ॥
प्रायो विधाताऽल्पधियां नराणां बहिष्कृतानां च महानुभाग्यैः । धनादिकं भूरि न वै ददाति यथेह विष्णोर्न बहुप्रयासः ॥
न ददाति विधिस्तस्य यस्य भाग्यविपर्ययः ।
मयि दातरि यश्चायमद्य याचेत् पदत्रयम् ॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा भूयोऽप्युवाचाथ हरिं दनूजः । याचस्व विष्णो गजवाजिभूमिं दासीहिरण्यं यदभीप्सितं च ॥
भवान् याचयिता विष्णो अहं दाता जगत्पतिः ।
दातुर्याचयितुर्लज्जा कथं न स्यात् पदत्रये ॥
रसातलं वा पृथिवीं भुवं नाकमथापि वा ।
एतेभ्यः कतमं दद्यां स्थानं याचस्व वामन ॥
वामन उवाच
गजाश्वभूहिरण्यादि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ।
एतावता त्वहं चार्थी देहि राजन् पदत्रयम् ॥
इत्येवमुक्ते वचने वामनेन महासुरः बलिर्भृङ्गारमादाय ददौ विष्णोः क्रमत्रयम् पाणौ तु पतिते तोये दिव्यं रूपं चकार ह त्रैलोक्यक्रमणार्थाय बहुरूपं जगन्मयम् ॥
पादे भूमिस्तथा जङ्घे नभस्त्रैलोक्यवन्दितम् ।
सत्यं तपो जानुयुग्मे उरुस्तो मेरुमन्दरौ ॥
विश्वेदेवा कटीभागे मरुतो वस्तिशीर्षगाः लिङ्गे स्थितो मन्मथश्च वृषणाभ्यां प्रजापतिः कुक्षिभ्यामर्णवाः सप्त जठरे भुवनानि च वलिषु त्रिषु नद्यश्च यज्ञास्तु जठरे स्थिताः श्रीवामनपुराण [ अध्याय ९ १ यह वामन केवल प्रमाणसे ही छोटा नहीं है, बल्कि यह १० बुद्धिका भी छोटा है; क्योंकि अज्ञानवश यह मुझसे । केवल तीन पग ( भूमि ) - की याचना करता है ॥ ६ – १० ॥ विधाता प्रायः कम बुद्धिवाले अभागे मनुष्योंको अधिक धन आदि नहीं देते - जैसे इस यज्ञमें विष्णुने अधिकके लिये प्रयत्न नहीं किया । जिसका भाग्य ११ अनुकूल नहीं होता है, उसे ईश्वर नहीं देते हैं । मेरे-| जैसे दानीसे भी आज ये तीन पग ( भूमि ) - की याचना १२ करते हैं! इस प्रकार कहकर महात्मा बलिने फिर हरिसे कहा - विष्णो! हाथी, घोड़ा, भूमि, दासी तथा सोना आदि ( इसके अतिरिक्त और भी ) जो आप चाहते हों, वह माँगिये । विष्णो! आप याचना करनेवाले हैं और मैं १३ जगत्पति देनेवाला हूँ । ऐसी अवस्थामें केवल तीन पग ( भूमि ) - का दान करनेमें देने एवं लेनेवालेको क्या १४ लज्जा न होगी? वामन! यदि आप याचना करते हैं तो ( कहिये ) रसातल, पृथ्वी, भुवर्लोक अथवा स्वर्गलोकमेंसे १५ मैं किस स्थानका दान करूँ? उसे माँगिये ॥ ११–१५ ॥ ( भगवान् ) वामन बोले- हाथी, घोड़ा, भूमि, सोना आदि वस्तुएँ उन्हें चाहनेवालेको ही दीजिये । १६ राजन्! मैं इतनेकी ही याचना करता हूँ । इसलिये मुझे तीन पग ( भूमि ) प्रदान करें । वामनभगवान्के इस । प्रकार कहनेपर महान् असुर बलिने कमण्डलु लेकर ॥ १७ विष्णुको तीन पग ( भूमि ) का दान दिया । हाथपर । जल गिरते ही तीनों लोकोंको नापनेके लिये विष्णुने १८ दिव्य रूप धारण कर लिया । तीनों लोकोंको नापनेके लिये जगन्मय विशाल रूप बना लिया । उनके पैरोंमें १ ९ भूमि, जंघाओंमें तीनों लोकोंसे सत्कार - प्राप्त आकाश, । दोनों जानुओंमें सत्यलोक और तपोलोक दोनों ऊरुओंमें मेरु और मन्दरपर्वत, कटिप्रदेशमें विश्वेदेव, ॥ २० वस्तिप्रदेशके शीर्षस्थानपर मरुद्गण, लिङ्गमें कामदेव, । वृषणोंमें प्रजापति, कुक्षियोंमें सातों समुद्र, जठरमें सम्पूर्ण ॥ २१ । भुवन, त्रिवलीमें नदियाँ एवं उनके जठरमें यज्ञ स्थित थे ।
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अध्याय ९ १ ] वामनकी बलिके यज्ञमें जाकर उससे तीन पग भूमिकी याचना ४५५
इष्टापूर्तादयः सर्वाः क्रियास्तत्र तु संस्थिताः ।
पृष्ठस्था वसवो देवाः स्कन्धौ रुद्रैरधिष्ठितौ ॥
बाहवश्च दिशः सर्वा वसवोऽष्टौ करे स्मृताः ।
हृदये संस्थितो ब्रह्मा कुलिशो हृदयास्थिषु ॥
श्रीसमुद्रा उरोमध्ये चन्द्रमा मनसि स्थितः ।
ग्रीवादितिर्देवमाता विद्यास्तद्वलयस्थिताः ॥
मुखे तु साग्नयो विप्राः संस्कारा दशनच्छदाः ।
धर्मकामार्थमोक्षीयाः शास्त्राः शौचसमन्विताः ॥
लक्ष्म्या सह ललाटस्थाः श्रवणाभ्यामथाश्विनौ ।
श्वासस्थो मातरिश्वा च मरुतः सर्वसंधिषु ॥
सर्वसूक्तानि दशना जिह्वा देवी सरस्वती ।
चन्द्रादित्यौ च नयने पक्ष्मस्थाः कृत्तिकादयः ॥
शिखायां देवदेवस्य ध्रुवो राजा न्यषीदत ।
तारका रोमकूपेभ्यो रोमाणि च महर्षयः ॥
गुणैः सर्वमयो भूत्वा भगवान् भूतभावनः ।
क्रमेणैकेन जगतीं जहार सचराचराम् ॥
भूमिं विक्रममाणस्य महारूपस्य तस्य वै ।
दक्षिणोऽभूत् स्तनश्चन्द्रः सूर्योऽभूदथ चोत्तरः ।
नभश्चाक्रमतो नाभिं सूर्येन्दू सव्यदक्षिणौ ॥
द्वितीयेन क्रमेणाथ स्वर्महर्जनतापसाः ।
क्रान्तार्थार्थेन वैराजं मध्येनापूर्यताम्बरम् ॥
ततः प्रतापिना ब्रह्मन् बृहद्विष्ण्वङ्घ्रिणाम्बरे ।
ब्रह्माण्डोदरमाहत्य निरालोकं जगाम ह ॥
विश्वाङ्घ्रिणा प्रसरता कटाहो भेदितो बलात् ।
कुटिला विष्णुपादे तु समेत्य कुटिला ततः ॥
तस्या विष्णुपदीत्येवं नामाख्यातमभून्मुने ।
तथा सुरनदीत्येवं तामसेवन्त तापसाः ।
भगवानप्यसम्पूर्णे तृतीये तु क्रमे विभुः ॥
जठरमें ही इष्टापूर्त आदि समस्त क्रियाएँ भी अवस्थित थीं । उनकी पीठमें वसुगण और देवगण तथा कन्धोंमें २२ रुद्रगण स्थित थे ॥ १६–२२ ॥ सारी दिशाएँ उनके बाहुस्वरूप थीं । उनके हाथोंमें २३ आठों वसु, हृदयमें ब्रह्मा एवं हृदयकी हड्डियोंमें कुलिश स्थित था । छातीके बीच श्री तथा समुद्र, मनमें चन्द्रमा, २४ ग्रीवामें देवमाता अदिति तथा वलयोंमें सारी विद्याएँ व्यवस्थित थीं । मुखमें अग्निके सहित ब्राह्मण, ओष्ठमें सभी धार्मिक संस्कार, ललाटमें लक्ष्मीसहित तथा २५ पवित्रताके साथ धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षसम्बन्धी शास्त्र, कर्णोंमें अश्विनीकुमार, श्वासमें वायु एवं सभी २६ जोड़के स्थानोंमें मरुद्गण स्थित थे । उनके दाँतोंमें सम्पूर्ण सूक्त, जिह्वामें सरस्वती देवी, दोनों नेत्रोंमें चन्द्र २७ और सूर्य तथा बरौनियोंमें कृत्तिका आदि नक्षत्र स्थित थे । देवदेवकी शिखामें राजा ध्रुव, रोमकूपोंमें ताराग्र और २८ रोमोंमें महर्षि लोग अवस्थित थे । भूतभावन भगवान्ने गुणोंद्वारा सर्वमय होकर एक पदमें ही चराचरसहित २ ९ सारी पृथ्वीका हरण कर लिया ॥ २३–२९ ॥ भूमिको नापते हुए उन विशाल रूपधारीके चन्द्रमा और सूर्य दक्षिण तथा उत्तर स्तन हो गये । इसी प्रकार आकाशकी ओर पग बढ़ाते समय सूर्य और ३० चन्द्रमा उनकी नाभिके वाम तथा दक्षिणभागमें अवस्थित हुए । इसके बाद उन्होंने द्वितीय चरणके आधेसे ३१ स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक और तपोलोक तथा पग बढ़ाकर शेष आधेसे वैराजलोक और मध्यभागसे आकाशको पूरा किया । ब्रह्मन्! इसके बाद विष्णुका ३२ प्रतापी विशाल चरण आकाशमें ब्रह्माण्डके उदरभागको भेदकर निरालोकमें चला गया । विष्णुके बढ़ते चरणने बलपूर्वक कटाहका भेदन कर दिया । विष्णुका ३३ चरण कुटिला नदीके निकट पहुँच गया । मुने! इससे कुटिला विष्णुपदी नामसे प्रसिद्ध हुई । तपस्या करनेवाले लोग देवनदीके रूपमें उसकी सेवा करने ३४ । लगे । सर्वसमर्थ भगवान् तीसरे चरणके पूर्ण न होनेपर
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४५६ समभ्येत्य बलिं प्राह ईषत् प्रस्फुरिताधरः ।
ऋणाद् भवति दैत्येन्द्र बन्धनं घोरदर्शनम् ।
त्वं पूरय पदं तन्मे नो चेद् बन्धं प्रतीच्छ भोः ॥
तन्मुरारिवचः श्रुत्वा विहस्याथ बलेः सुतः ।
बाणः प्राहामरपतिं वचनं हेतुसंयुतम् ॥
बाण उवाच कृत्वा महीमल्पतरां जगत्पते स्वायम्भुवादिभुवनानि वै षट् । कथं बलिं प्रार्थयसे सुविस्तृतां यां प्राग्भवान् नो विपुलामथाकरोत् ॥ विभो मही यावतीयं त्वयाऽद्य सृष्टा समेता भुवनान्तरालैः । दत्ता च तातेन हि तावतीयं किं वाक्छलेनैष निबध्यतेऽद्य ॥ या नैव शक्या भवता हि पूरितुं कथं वितन्याद् दितिजेश्वरोऽसौ । शक्तस्तु सम्पूजयितुं मुरारे प्रसीद मा बन्धनमादिशस्व प्रोक्तं श्रुतौ भवतापीश वाक्यं दानं पात्रे भवते सौख्यदायि । देशे सुपुण्ये वरदे यच्च काले तच्चाशेषं दृश्यते चक्रपाणे ॥ दानं भूमिः सर्वकामप्रदेयं भवान् पात्रं देवदेवो जितात्मा । कालो ज्येष्ठामूलयोगे मृगाङ्कः कुरुक्षेत्रं पुण्यदेशं प्रसिद्धम् ॥ किं वा देवोऽस्मद्विधैर्बुद्धिहीनैः शिक्षापनीयः साधु वाऽसाधु चैव स्वयं श्रुतीनामपि चादिकर्ता व्याप्य स्थितः सदसद् यो जगद् वै कृत्वा प्रमाणं स्वयमेव पदत्रयं याचितवान् भुवश्च किं त्वं न गृह्णासि जगत्त्रयं भो रूपेण लोकत्रयवन्दितेन श्रीवामनपुराण [ अध्याय ९९ बलिके समीप गये और ओठको किंचित् स्फुरित करते | हुए बोले- दैत्येन्द्र! ऋण न चुकानेपर देखनेमें भयंकर ३५ बन्धन प्राप्त होता है । अतः तुम मेरे शेष पदको पूरा करो, नहीं तो बन्धन स्वीकार करो । मुरारि ( भगवान् ) -| के उस वचनको सुनकर बलिके पुत्र बाणने अमरपतिसे ३६ हँसकर हेतुसे युक्त वचन कहा ॥ ३०–३६ ॥ बाणने कहा — जगत्पते! आपने स्वायम्भुव आदि छः भुवनोंका ही निर्माणकर पृथ्वीको छोटा बनाया है । आपने भूमिको पहले ही विशाल नहीं बनाया, अतः आप बलिसे अत्यन्त विशाल भूमि कैसे माँगते हैं । विभो! ३७ भुवनोंके मध्यवर्ती स्थानोंके साथ जितनी पृथ्वीकी सृष्टि आपने की थी उसे मेरे पिताने आज आपको दे दिया । अतः आप कपटके द्वारा उन्हें क्यों बाँधते हैं? मुरारे! ३८ जिस पृथ्वीकी कमीको आप पूरा नहीं कर सकते, उसको ये दानवपति कैसे विस्तृत कर सकेंगे? ये आपकी पूजा करनेमें समर्थ हैं । अतः आप प्रसन्न हों और इन्हें बन्धन प्राप्त करनेका आदेश न दें । ( प्रभो! ) आपने ही ॥ ३ ९ श्रुतिमें यह कहा है कि पवित्र देश, काल एवं वर देनेके समय सत्पात्रमें दिया गया दान सुख देनेवाला होता है । चक्रपाणे! वह सम्पूर्ण ( सुयोग ) दिखलायी पड़ रहा ४० है ॥ ३७ - ४० ॥ समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला भूमिका दान हो रहा है, देवोंके अधिदेव अपने - आपको नियन्त्रित | रखनेवाले आप पात्र हैं, ज्येष्ठा एवं मूलके योगमें स्थित ४१ चन्द्रमासे युक्त काल है तथा प्रसिद्ध पवित्र कुरुक्षेत्रका | देश है अथवा हम जैसे बुद्धिहीन लोगोंके द्वारा आप । भगवान्को उचित और अनुचित शिक्षा क्या दी जाय? आप स्वयं वेदोंके भी आदिस्रष्टा और सदसद् विश्वको ॥ ४२ व्याप्त कर अवस्थित हैं । आपने स्वयं अपने प्रमाण । ( शारीरिक आकार ) - को छोटा बनाकर तीन पग भूमि माँगी थी । देव! क्या आपने तीनों लोकोंमें अपने वन्दित ॥ ४३ । रूपसे तीनों लोकोंको ग्रहण नहीं कर लिये हैं?
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अध्याय ९ १ ] वामनकी बलिके यज्ञमें जाकर नात्राश्चर्यं यज्जगद् वै समग्रं क्रमत्रयं नैव पूर्णं तवाद्य । क्रमेण त्वं लङ्घयितुं समर्थो लीलामेतां कृतवान् लोकनाथ ॥४४ प्रमाणहीनां स्वयमेव कृत्वा वसुन्धरां माधव पद्मनाभ । विष्णो न बध्नासि बलिं न दूरे प्रभुर्यदेवेच्छति तत्करोति ॥ ४५ पुलस्त्य उवाच
इत्येवमुक्ते वचने बाणेन बलिसूनुना ।
प्रोवाच भगवान् वाक्यमादिकर्ता जनार्दनः ॥ ४६ ।
त्रिविक्रम उवाच
यान्युक्तानि वचांसीत्थं त्वया बालेय साम्प्रतम् ।
तेषां वै हेतुसंयुक्तं शृणु प्रत्युत्तरं मम ॥ ४७
पूर्वमुक्तस्तव पिता मया राजन् पदत्रयम् ।
देहि मह्यं प्रमाणेन तदेतत् समनुष्ठितम् ॥ ४८
किं न वेत्ति प्रमाणं मे बलिस्तव पितासुर ।
प्रायच्छद् येन निःशङ्कं ममानन्तं क्रमत्रयम् ॥ ४ ९
सत्यं क्रमेण चैकेन क्रमेयं भूर्भुवादिकम् ।
बलेरपि हितार्थाय कृतमेतत् क्रमत्रयम् ॥ ५०
तस्माद् यन्मम बालेय त्वत्पित्राम्बु करे महत् ।
दत्तं तेनायुरेतस्य कल्पं यावद् भविष्यति ॥ ५१
गते मन्वन्तरे बाण श्राद्धदेवस्य साम्प्रतम् ।
सावर्णिके च सम्प्राप्ते बलिरिन्द्रो भविष्यति ॥ ५२
इत्थं प्रोक्त्वा बलिसुतं बाणं देवस्त्रिविक्रमः ।
प्रोवाच बलिमभ्येत्य वचनं मधुराक्षरम् ॥ ५३
श्रीभगवानुवाच
आपूरणाद् दक्षिणाया गच्छ राजन् महाफलम् ।
सुतलं नाम पातालं वस तत्र निरामयः ॥ ५४
बलिरुवाच
सुतले वसतो नाथ मम भोगाः कुतोऽव्ययाः ।
भविष्यन्ति तु येनाहं निवत्स्यामि निरामयः ॥ ५५ ।
उससे तीन पग भूमिकी याचना ४५७ आपके तीन पगोंको सारा संसार पूरा नहीं कर सका— इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि आप इसको अपने एक पगसे ही लाँघ सकते हैं । लोकनाथ! आपने तो यह लीला ही की है । माधव! पद्मनाभ! विष्णो! पृथ्वीको अपने - आप छोटे पैमानेमें बनाकर बलिको बाँधना उचित नहीं । ( ठीक है, आप ) प्रभु जो चाहते हैं वही करते हैं ॥ ४१–४५ ॥ पुलस्त्यजी बोले- बलिपुत्र बाणके इस प्रकार कहनेपर आदिस्रष्टा भगवान् जनार्दनने यह वचन कहा ॥ ४६ ॥
त्रिविक्रमने कहा- बलिनन्दन! तुमने इस समय इस प्रकार जिन वचनोंको कहा है उनका कारण-सहित प्रत्युत्तर मुझसे सुनो । मैंने पहले ही तुम्हारे पितासे यह कहा था कि ' राजन्! मेरे प्रमाणके अनुसार मुझे तीन पग भूमि दो । ' उन्होंने भलीभाँति उसका सम्मान किया । असुर! क्या तुम्हारे पिता बलि मेरा प्रमाण नहीं जानते थे, जो उन्होंने निःशङ्क होकर मेरे अनन्त तीन पगोंका दान किया । सचमुच ही मैं अपने एक पैरसे समस्त भूः भुवः आदि जगत्को नाप सकता हूँ । बलिके कल्याणके लिये ही मैंने ये तीन पग किये हैं । अतः बलिपुत्र! तुम्हारे पिताने मेरे हाथमें शुद्ध जल दिया है, इससे उनकी आयु एक कल्पकी होगी । बाण! श्राद्धदेवका वर्तमान मन्वन्तर बीत जानेके बाद सावर्णिक मन्वन्तरके आनेपर बलि इन्द्र बनेंगे । बलिके पुत्र बाणसे इस प्रकार कहनेके बाद त्रिविक्रम देव बलिके निकट गये और उससे मधुर वचन कहे - ॥ ४७-५३ ॥ श्रीभगवान् ने कहा- राजन्! दक्षिणाकी सम्पन्नता होनेतक तुम्हें यह महान् फल प्राप्त करना होगा । तुम सुतल नामक पातालमें नीरोग - स्वस्थ होकर निवास करो ॥ ५४ ॥
बलिने कहा - नाथ! सुतलमें निवास करते समय नीरोग - स्वस्थरूपसे रहनेके लिये अक्षय अविनाशी-स्वास्थ्यप्रद भोग कहाँसे प्राप्त होंगे? ॥ ५५ ॥
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४५८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ९ १ त्रिविक्रम उवाच
सुतलस्थस्य दैत्येन्द्र यानि भोगानि तेऽधुना ।
भविष्यन्ति महार्हाणि तानि वक्ष्यामि सर्वशः ॥ ५६
दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्य श्रोत्रियाणि च ।
तथाधीतान्यव्रतिभिर्दास्यन्ति भवतः फलम् ॥ ५७
तथान्यमुत्सवं पुण्यं वृत्ते शक्रमहोत्सवे ।
द्वारप्रतिपदा नाम तव भावी महोत्सवः ॥ ५८
तत्र त्वां नरशार्दूला हृष्टाः पुष्टाः स्वलंकृताः ।
पुष्पदीपप्रदानेन अर्चयिष्यन्ति यत्नतः ॥५ ९ ।
तत्रोत्सव मुख्यम भविष्यति दिवानिशं हृष्टजनाभिरामम् । यथैव भवतस्तु साम्प्रतं तथैव सा भाव्यथ कौमुदी च ॥ ६० इत्येवमुक्त्वा मधुहा दितीश्वरं विसर्जयित्वा सुतलं सभार्यम् । यज्ञं समादाय जगाम तूर्णं स शक्रसद्मामरसङ्घजुष्टम् ॥ ६१ दत्त्वा मघोने च विभुस्त्रिविष्टपं अन्तर्दधे स्वर्गं कृत्वा मयस्तु कृत्वा च देवान् मखभागभोक्तॄन् । विश्वपतिर्महर्षे सम्पश्यतामेव सुराधिपानाम् ॥ ६२ ग वासुदेवे शाल्वोऽसुराणां महता बलेन । पुरं सौभमिति प्रसिद्धं तदान्तरिक्षे विचचार कामात् ॥ ६३ कृत्वा त्रिपुरं महात्मा सुवर्णताम्रायसमग्र्यसौख्यम् स तारकाक्षः सह वैद्यु संतिष्ठते भृत्यकलत्रवान् सः ॥ ६४ बाणोऽपि देवेन हृते त्रिविष्टपे बद्धे बलौ चापि रसातलस्थे । कृत्वा सुगुप्तं भुवि शोणिताख्यं पुरं स चास्ते सह दानवेन्द्रैः ॥ ६५ त्रिविक्रमने कहा — दैत्येन्द्र! मैं इस समय तुम्हारे सामने उन सम्पूर्ण बहुमूल्य भोगोंका वर्णन करता हूँ जो पृथ्वीके तलमें निवास करते समय तुम्हें प्राप्त होंगे । अविधिपूर्वक किये गये दान, अश्रोत्रियद्वारा किये गये श्राद्ध एवं ब्रह्मचर्यव्रतरहित अध्ययन आपको फल प्रदान करेंगे । इन्द्र- पूजनके बाद आनेवाली प्रतिपदाको तुम्हारे पूजनके निमित्त दूसरा उत्सव मनाया जायगा, जिसका नाम होगा - ' द्वारप्रतिपदा ' । उस उत्सवके समय हृष्ट-पुष्ट, नरश्रेष्ठ लोग सुन्दर रूपसे सज - धजकर पुष्प और दीप देकर प्रयत्नपूर्वक आपकी अर्चना करेंगे । आपके राज्यमें इस समय जिस प्रकार दिन - रात जनसमुदायके प्रसन्न रहनेके कारण सुन्दर महोत्सव बना रहता है, उसी प्रकार उत्सवोंमें श्रेष्ठ वह ' कौमुदी ' नामका उत्सव होगा ॥ ५६–६० ॥ मधुसूदनने दानवेश्वर बलिसे इस प्रकार कहकर । उसे पत्नीके साथ सुतल लोकमें भेज दिया । इसके बाद वे शीघ्र यज्ञको – अग्निदेवको साथ ले देव - समूहसे सेवित इन्द्रभवन चले गये । महर्षे! उसके बाद सबका पालन - पोषण करनेवाले व्यापक भगवान् विष्णु, इन्द्रको स्वर्ग देकर और देवताओंको यज्ञ - भागका अधिकारी बनाकर देवताओंके देखते - ही - देखते अन्तर्धान हो गये । ब्रह्मा, वासुदेवके स्वर्ग चले जानेपर दानव शाल्व दैत्यकी बड़ी सेना लेकर सौभ नामका प्रसिद्ध नगर बनाकर इच्छानुसार आकाशमें घूमने लगा । नौकरों और | अपनी पत्नी के साथ महात्मा मय सोने, ताँबे एवं लोहेके तीन नगरोंका निर्माण करके तारकाक्ष तथा वैद्युतके साथ अत्यन्त सुखपूर्वक उनमें रहने लगा ॥ ६१ - ६४ ॥ बाणासुर भी विष्णु द्वारा स्वर्ग छीन लिये जानेपर और बलिके बँधने तथा रसातलमें रहनेपर अत्यन्त | सुरक्षित शोणित नामके पुरका निर्माण कर दानवेन्द्रोंके
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अध्याय ९ २ ] ब्रह्मलोकमें वामनभगवान्की एवं पुरा चक्रधरेण विष्णुना बद्धो बलिर्वामनरूपधारिणा । शक्रप्रियार्थं सुरकार्यसिद्धये हिताय विप्रर्षभगोद्विजानाम् ॥ ६६ प्रादुर्भव कथितो महर्षे पुण्यः शुचिर्वामनस्याघहारी । श्रुते यस्मिन् संस्मृते कीर्तिते च पापं याति प्रक्षयं पुण्यमेति ॥ ६७ एतत् प्रोक्तं भवतः पुण्यकीर्तेः प्रादुर्भावो बलिबन्धोऽव्ययस्य । यच्चाप्यन्यछ्रोतुकामोऽसि विप्र तत्प्रोच्यतां कथयिष्याम्यशेषम् ॥ ६८ पूजा, ब्रह्मकृत वामनकी स्तुति ४५ ९ साथ रहने लगा । इस प्रकार प्राचीन कालमें चक्र धारण करनेवाले विष्णुने वामनरूप धारण कर इन्द्रकी भलाई, देवताओंकी कार्यसिद्धि तथा ब्राह्मणों, ऋषियों ( गायोंके समूह ) और द्विजोंके हितके लिये बलिको बाँधा था । महर्षे! मैंने आपसे वामनके पापहारी, पुण्ययुक्त एवं पवित्र प्रादुर्भावका वर्णन किया । इसके सुनने और कीर्तनसे पापका नाश एवं पुण्यकी प्राप्ति होती है । विप्र! मैंने अक्षय पुण्यकीर्तिवाले वामनदेवके आविर्भाव तथा बलिको बाँधनेकी कथाका आपसे वर्णन किया । अब आप अन्य जो कुछ सुनना चाहते हों, उसे कहिये । मैं पूर्णतया उसका वर्णन करूँगा ॥ ६५–६८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९ १ ॥ बानबेवाँ अध्याय ब्रह्मलोकमें वामनभगवान्की पूजा, ब्रह्मकृत वामनकी स्तुति और वामनरूपमें विष्णुका स्वर्गमें निवास नारद उवाच श्रुतं यथा भगवता बलिर्बद्धो महात्मना किंत्वस्त्यन्यत्तु प्रष्टव्यं तच्छ्रुत्वा कथयाद्य मे भगवान् देवराजाय दत्त्वा विष्णुस्त्रिविष्टपम् अन्तर्धानं गतः क्वासौ सर्वात्मा तात कथ्यताम् सुतलस्थश्च दैत्येन्द्रः किमकार्षीत् तथा वद का चेष्टा तस्य विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि नारदजीने कहा - महात्मा भगवान् ने जिस प्रकार बलिको बाँधा था उसे मैंने सुना । परंतु प्रभो! आपसे । और अन्य विषय भी मुझे पूछना है । उसे सुनकर आप ॥१ मुझे उसके सम्बन्धमें बतलाइये । तात! आप यह बतलाइये कि देवराज इन्द्रको स्वर्ग देनेके बाद वे । सर्वात्मस्वरूप भगवान् विष्णु अन्तर्हित होकर कहाँ ॥ २ चले गये । इसके सिवाय यह भी बतलाइये कि सुतलमें रहनेवाले दैत्यश्रेष्ठने क्या किया और विप्रवर! । आप मुझे विशेषरूपसे यह बतायें कि उसके बाद ॥ ३ । उसकी कौन - सी चेष्टा रही? ॥ १-३ ॥
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४६० श्रीवामनपुराण अध्याय ९ २ पुलस्त्य उवाच
अन्तर्धाय सुरावासं वामनोऽभूदवामनः ।
जगाम ब्रह्मसदनमधिरुह्योरगाशनम् ॥ ४
वासुदेवं समायान्तं ज्ञात्वा ब्रह्माऽव्ययात्मकः ।
समुत्थायाथ सौहार्दात् सस्वजे कमलासनः ॥ ५
परिष्वज्यर्च्य विधिना वेधाः पूजादिना हरिम् ।
पप्रच्छ किं चिरेणेह भवतागमनं कृतम् ॥ ६
अथोवाच जगत्स्वामी मया कार्यं महत्कृतम् ।
सुराणां क्रतुभागार्थं स्वयंभो बलिबन्धनम् ॥ ७
पितामहस्तद् वचनं श्रुत्वा मुदितमानसः ।
कथं कथमिति प्राह त्वं मां दर्शितुमर्हसि ॥ ८
इत्येवमुक्ते वचने भगवान् गरुडध्वजः ।
दर्शयामास तद्रूपं सर्वदेवमयं लघु ॥ ९
तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं योजनायुतविस्तृतम् ।
तावानेवोर्ध्वमानेन ततोऽजः प्रणतोऽभवत् ॥ १०
ततः प्रणम्य सुचिरं साधु साध्वित्युदीर्य च ।
भक्तिनम्रो महादेवं पद्मजः स्तोत्रमीरयत् ॥ ११
ॐ नमस्ते देवाधिदेव वासुदेव एकशृङ्ग बहुरूप वृषाकपे भूतभावन सुरासुरवृष सुरासुरमथन पीतवासः श्रीनिवास असुरनिर्मितान्त अमितनिर्मित कपिल महाकपिल विष्वक्सेन नारायण । ध्रुवध्वज सत्यध्वज खड्गध्वज तालध्वज वैकुण्ठ पुरुषोत्तम वरेण्य विष्णो अपराजित जय जयन्त विजय कृतावर्त महादेव अनादे अनन्त आद्यन्तमध्यनिधन पुरञ्जय धनञ्जय शुचिश्रव पृश्निगर्भ । कमलगर्भ कमलायताक्ष श्रीपते विष्णुमूल मूलाधिवास धर्माधिवास धर्मवास धर्माध्यक्ष प्रजाध्यक्ष गदाधर श्रीधर श्रुतिधर वनमालाधर लक्ष्मीधर धरणीधर पद्मनाभ । विरिचे पुलस्त्यजी बोले – वामनदेवने अन्तर्धान होनेके बाद अपना वामनस्वरूप छोड़ दिया एवं गरुडपर चढ़कर वे देवोंके स्थान ब्रह्मलोकको चले गये । वासुदेवको आया हुआ जानकर कमलके आसनपर बैठे हुए नित्य स्वरूपवाले ब्रह्मा ( अपने आसनसे ) उठे और सौहार्द्रभावसे विष्णुको गले लगा लिये । आलिङ्गनके बाद विधिपूर्वक अर्चा आदिद्वारा हरिकी पूजा कर ब्रह्माने पूछा – ( भगवन् ) ' बहुत समयके बाद आपके यहाँ आनेका क्या कारण है? ' उसके बाद जगत्पतिने कहा— ब्रह्मन्! ' मैंने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है । एक-देवोंके यज्ञभागके लिये मैंने बलिको बाँधा है । ' यह वचन सुनकर ब्रह्माने प्रसन्न होकर कहा - यह कैसे! यह कैसे! आप उस ( बाँधनेके लिये धृत ) रूपको मुझे दिखलाइये | ऐसा वचन कहे जानेपर भगवान् गरुडध्वज ( विष्णु ) - ने शीघ्रतासे वह सर्वदेव - स्वरूप अपना रूप दिखला दिया । कमलनयन भगवान् के दस हजार योजन विस्तृत तथा उतने ऊँचे उस रूपको देखकर पितामहने प्रणाम किया । उसके बाद देरतक प्रणाम कर | ब्रह्माने साधु, साधु कहा और श्रद्धापूर्वक नम्रतासे ( उन ) महादेवकी स्तुति करने लगे - ॥ ४ – ११ ॥ हे देवोंके देव! वासुदेव! एकशृङ्ग! बहुरूप! वृषाकपे! भूतभावन! सुरों और असुरोंमें श्रेष्ठ! देवताओं और असुरोंका मथन करनेवाले पीतवस्त्रधारी! श्रीनिवास! असुरनिर्मितान्त! अमितनिर्मित! कपिल! महाकपिल! विष्वक्सेन! नारायण! आपको नमस्कार है । ध्रुवध्वज! सत्यध्वज! खड्गध्वज! तालध्वज! वैकुण्ठ! पुरुषोत्तम! वरेण्य! विष्णो! अपराजित! जय! जयन्त! विजय! कृतावर्त! महादेव! अनादे! अनन्त! आद्यन्त! मध्यनिधन! पुरञ्जय! धनञ्जय! शुचिश्रव! पृश्निगर्भ! ( आपको नमस्कार है । ) कमलगर्भ! कमलायताक्ष! श्रीपते! विष्णुमूल! मूलाधिवास! धर्माधिवास! धर्मवास! धर्माध्यक्ष! प्रजाध्यक्ष! गदाधर! श्रीधर! श्रुतिधर! वनमालाधर! लक्ष्मीधर! । धरणीधर! पद्मनाभ! ( आपको नमस्कार है । ) विरिञ्चे!