वामन पुराण — पृष्ठ 71–80

वामन पुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

वामन पुराण, पृष्ठ 71 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ११ ] सुकेशिकी कथा, ऋषियोंका धर्मोपदेश

मोदन्ते देववत्तेषां धर्मो दिव्य उदाहृतः ।

कल्पान्ते प्रलयस्तेषां निगद्येत महाभुज ॥ ४५

ये जनाः पुष्करद्वीपे वसन्ते रौद्रदर्शने ।

पैशाचमाश्रिता धर्मे कर्मान्ते ते विनाशितः ॥ ४६

सुकेशिरुवाच

किमर्थं पुष्करद्वीपो भवद्भिः समुदाहृतः ।

दुर्दर्शः शौचरहितो घोरः कर्मान्तनाशकृत् ॥ ४७

ऋषय ऊचुः

तस्मिन् निशाचर द्वीपे नरकाः सन्ति दारुणाः ।

रौरवाद्यास्ततो रौद्रः पुष्करो घोरदर्शनः ॥ ४८

सुकेशिरुवाच

कियन्त्येतानि रौद्राणि नरकाणि तपोधनाः ।

कियन्मात्राणि मार्गेण का च तेषु स्वरूपता ॥ ४ ९ ।

ऋषय ऊचुः

शृणुष्व राक्षसश्रेष्ठ प्रमाणं लक्षणं तथा ।

सर्वेषां रौरवादीनां संख्या या त्वेकविंशतिः ॥ ५०

द्वे सहस्त्रे योजनानां ज्वलिताङ्गारविस्तृते ।

रौरवो नाम नरकः प्रथमः परिकीर्तितः ॥ ५१

तप्तताम्रमयी भूमिरधस्ताद्वह्नितापिता ।

द्वितीयो द्विगुणस्तस्मान्महारौरव उच्यते ॥ ५२

ततोऽपि द्विःस्थितश्चान्यस्तामिस्त्रो नरकः स्मृतः ।

अन्धतामिस्त्रको नाम चतुर्थो द्विगुणः परः ॥ ५३ ।

ततस्तु कालचक्रेति पञ्चमः परिगीयते ।

अप्रतिष्ठं च नरकं घटीयन्त्रं च सप्तमम् ॥ ५४

असिपत्रवनं चान्यत्सहस्त्राणि द्विसप्ततिः ।

योजनानां परिख्यातमष्टमं नरकोत्तमम् ॥ ५५

नवमं तप्तकुम्भं च दशमं कूटशाल्मलिः ।

करपत्रस्तथैवोक्तस्तथाऽन्यः श्वानभोजनः ॥ ५६

संदंशो लौहपिण्डश्च करम्भसिकता तथा ।

घोरा क्षारनदी चान्या तथान्यः कृमिभोजनः ।

तथाऽष्टादशमी प्रोक्ता घोरा वैतरणी नदी ॥ ५७

तथा परः शोणितपूयभोजनः क्षुराग्रधारो निशितश्च चक्रकः । संशोषणो नाम तथाप्यनन्तः प्रोक्तास्तवैते नरकाः सुकेशिन् ॥ ५८ । , देवादिके धर्म एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन ६१ महाबाहो! वे देवताओंके समान सुखभोग करते हैं । उनका धर्म दिव्य कहा जाता है । कल्पके अन्तमें उनका प्रलयमात्र होना वर्णित है । पुष्करद्वीप देखनेमें भयंकर है । वहाँके निवासी पैशाच धर्मोका पालन करते हैं । कर्मके अन्तमें उनका नाश होता है ॥ ४१-४६ ॥ सुकेशिने कहा- आपलोगोंने पुष्करद्वीपको भयंकर, पवित्रतारहित, घोर एवं कर्मके अन्तमें नाश करनेवाला क्यों बतलाया? कृपाकर यह बात हमें समझायें ॥४७ ॥

ऋषियोंने कहा - निशाचर! उस द्वीपमें रौरव । आदि भयानक नरक हैं । इसीसे पुष्करद्वीप देखनेमें बड़ा भयंकर है ॥ ४८ ॥

सुकेशिने पूछा— तपस्विगण! वे रौद्र नरक कितने हैं? उनका मार्ग कितना है? उनका स्वरूप कैसा है? ॥ ४ ९ ॥ ऋषियोंने कहा— राक्षस श्रेष्ठ! उन समस्त रौरव आदि नरकोंका लक्षण और प्रमाण सुनो, जिन ( मुख्य नरकों ) की संख्या इक्कीस है । उनमें प्रथम रौरव नरक कहा जाता है । वह दो हजार योजन विस्तृत एवं प्रज्वलित अङ्गारमय है । उससे द्विगुणित महारौरव नामक द्वितीय नरक है । उसकी भूमि जलते हुए ताँबेसे बनी है, जो नीचेसे अग्निद्वारा तापित होती रहती है । उससे द्विगुणित विस्तृत तीसरा तामिस्र नामक नरक कहा जाता है । उससे द्विगुणित अन्धतामिस्र नामक चतुर्थ नरक है । उसके बाद पञ्चम नरकको कालचक्र कहते हैं । अप्रतिष्ठ नामक नरक षष्ठ और घटीयन्त्र सप्तम है ॥ ५०–५४ ॥ नरकोंमें श्रेष्ठ असिपत्रवन नामक आठवाँ नरक बहत्तर हजार योजन विस्तृत कहा जाता है । नवाँ तप्तकुम्भ, दसवाँ कूटशाल्मलि, ग्यारहवाँ करपत्र और बारहवाँ नरक श्वानभोजन है । उसके बाद क्रमशः संदंश, लोहपिण्ड, करम्भसिकता, भयंकर क्षार नदी, कृमिभोजन और अठारहवेंको घोर वैतरणी नदी कहा जाता है । उनके अतिरिक्त शोणित- पूयभोजन, क्षुराग्रधार, निशितचक्रक तथा संशोषण नामक अन्तरहित नरक हैं । सुकेशिन्! हमलोगोंने तुमसे इन नरकोंका वर्णन कर दिया ॥ ५५-५८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ११ ॥

पृष्ठ 72

वामन पुराण, पृष्ठ 72 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १२ बारहवाँ अध्याय सुकेशिका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, ऋषियोंका उत्तर और नरकोंका वर्णन सुकेशिरुवाच

कर्मणा नरकानेतान् केन गच्छन्ति वै कथम् ।

एतद् वदन्तु विप्रेन्द्राः परं कौतूहलं मम ॥

ऋषय ऊचुः

कर्मणा येन येनेह यान्ति शालकटंकट * ।

स्वकर्मफलभोगार्थं नरकान् मे शृणुष्व तान् ॥

वेददेवद्विजातीनां यैर्निन्दा सततं कृता ।

ये पुराणेतिहासार्थान् नाभिनन्दन्ति पापिनः ॥

गुरुनिन्दाकरा ये च मखविघ्नकराश्च ये ।

दातुर्निवारका ये च तेषु ते निपतन्ति हि ॥

सुहृद्दम्पतिसौदर्यस्वामिभृत्यपितासुतान् याज्योपाध्याययोर्यैश्च कृता भेदोऽधमैर्मिथः ॥

कन्यामेकस्य दत्वा च ददत्यन्यस्य येऽधमाः ।

करपत्रेण पाट्यन्ते ते द्विधा यमकिंकरैः ॥

परोपतापजनकाश्चन्दनोशीरहारिणः बालव्यजनहर्त्तारः करम्भसिकताश्रिताः ॥ निमन्त्रितोऽन्यतो भुङ्गे श्राद्धे दैवे सपैतृके सद्विधा कृष्यते मूढस्तीक्ष्णतुण्डैः खगोत्तमैः ॥

मर्माणि यस्तु साधूनां तुदन् वाग्मिर्निकृन्तति ।

तस्योपरि तुदन्तस्तु तुण्डैस्तिष्ठन्ति पतत्रिणः ॥

यः करोति च पैशुन्यं साधूनामन्यथामतिः ।

वज्रतुण्डनखा जिह्वामाकर्षन्ते ऽस्य वायसाः ॥

मातापितृगुरूणां च येऽवज्ञां चक्रुरुद्धताः ।

मज्जन्ते पूयविण्मूत्रे त्वप्रतिष्ठे ह्यधोमुखाः ॥

सुकेशिने पूछा- हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! इन नरकोंमें लोग

किस कर्मसे और कैसे जाते हैं, यह आपलोग बतलायें ।

१ इस विषयको जाननेकी मेरी बड़ी उत्सुकता है ॥ १ ॥

ऋषिगण बोले- ( सुकेशिन्! ) मनुष्य अपने जिन-जिन कर्मोंके फल भोग करनेके लिये इन नरकोंमें जाते २ हैं, उन्हें हमसे सुनो । जिन लोगोंने वेद, देवता एवं द्विजातियोंकी सदा निन्दा की है, जो पुराण एवं इतिहासके अर्थोंमें आदरबुद्धि या श्रद्धा नहीं रखते और ३ जो गुरुओंकी निन्दा करते हैं तथा यज्ञोंमें विघ्न डालते हैं, जो दाताको दान देनेसे रोकते हैं, वे सभी उन ४ ( वर्णित हो रहे ) नरकोंमें गिरते हैं । जो अधम व्यक्ति मित्र, स्त्री - पुरुष, सहोदर भाई, स्वामी सेवक, पिता - पुत्र एवं आचार्य तथा यजमानोंमें परस्पर झगड़ा लगाते हैं ५ तथा जो अधम व्यक्ति एकको कन्या देकर पुनः दूसरेको दे देते हैं, वे सभी यमदूतोंद्वारा नरकोंमें आरासे ६ दो भागोंमें चीरे जाते हैं॥२-६ ॥ ( इसी प्रकार ) जो दूसरोंको संताप देते, चन्दन ७ और खसकी चोरी करते और बालोंसे बने व्यजनों-चँवरोंको चुराते हैं, वे करम्भसिकता नामक नरकमें जाते हैं । जो देव या पितृश्राद्धमें निमन्त्रित होकर अन्यत्र ८ भोजन करता है, उस मूर्खको नरकमें तीक्ष्ण चोंचवाले बड़े - बड़े नरकपक्षी पकड़कर दोनों ओर खींचते हैं । जो तीखे वचनोंके द्वारा चोट करते हुए साधुओंके हृदयको ९ दुखाता है, उसके ऊपर भयंकर पक्षी अपने चोंचोंसे कठोर प्रहार करते हैं । जो दुष्टबुद्धि मनुष्य साधुओंकी चुगली - निन्दा करता है, उसकी जीभको वज्रतुल्य चोंच १० और नखवाले कौए खींच लेते हैं ॥ ७-१० ॥ जो उद्धत लड़के अपने माता - पिता एवं गुरुकी आज्ञाका | उल्लङ्घन करते हैं, वे पीव, विष्ठा एवं मूत्रसे पूर्ण अप्रतिष्ठ ११ । नामक नरकमें नीचेकी ओर मुँह कर डुबाये जाते हैं । * शालकटंकट महाभारत ७ । १० ९ । २२ - ३१ में अलम्बुषका तथा यहाँ सुकेशीका नामान्तर है । सुकेशि और सुकेशी भी चलते हैं ।

पृष्ठ 73

वामन पुराण, पृष्ठ 73 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १२ ] सुकेशिका नरक देनेवाले

देवतातिथिभूतेषु भृत्येष्वभ्यागतेषु च ।

अभुक्तवत्सु ये श्नन्ति बालपित्रग्निमातृषु ॥

दुष्टासृक्पूयनिर्यासं भुञ्जते त्वधमा इमे ।

सूचीमुखाश्च जायन्ते क्षुधार्त्ता गिरिविग्रहाः ॥

एकपङ्क्त्युपविष्टानां विषमं भोजयन्ति ये ।

विड्भोजनं राक्षसेन्द्र नरकं ते व्रजन्ति च ॥

एकसार्धप्रयातं ये पश्यन्तश्चार्थिनं नराः ।

संविभज्य भुञ्जन्ति ते यान्ति श्लेष्मभोजनम् ॥

गोब्राह्मणाग्नयः स्पृष्टा पैरुच्छिष्टैः क्षपाचर ।

छिप्यन्ते हि करास्तेषां तप्तकुम्भे सुदारुणे ॥

सूर्येन्दुतारका दृष्टा यैरुच्छिष्टैश्च कामतः ।

तेषां नेत्रगतो वह्निर्धम्यते यमकिंकरैः ॥

मित्रजायाथ जननी ज्येष्ठो भ्राता पिता स्वसा ।

जामयो गुरुवो वृद्धा यैः संस्पृष्टाः पदानृभिः ॥

बद्धाङ्घ्रयस्ते निगडैर्लोहैर्वह्निप्रतापितैः ।

क्षिप्यन्ते रौरवे घोरे ह्याजानुपरिदाहिनः ॥

पायसं कृशरं मांसं वृथा भुक्तानि यैर्नरैः ।

तेषामयोगुडास्तप्ताः क्षिप्यन्ते वदनेऽद्भुताः ॥

गुरुदेवद्विजातीनां वेदानां च नराधमैः ।

निन्दा निशामिता यैस्तु पापानामिति कुर्वताम् ॥

तेषां लोहमयाः कीला वह्निवर्णाः पुनः पुनः ।

श्रवणेषु निखन्यन्ते धर्मराजस्य किंकरैः ॥

प्रपादेवकुलारामान् विप्रवेश्मसभामठान् ।

कूपवापीतडागांश्च भङ्क्त्वा विध्वंसयन्ति ये ॥

तेषां विलपतां चर्म देहतः क्रियते पृथक् ।

कर्तिकाभिः सुतीक्ष्णाभिः सुरौद्रैर्यमकिंकरैः ॥

गोब्राह्मणार्कमग्निं च ये वै मेहन्ति मानवाः ।

तेषां गुदेन चान्त्राणि विनिष्कृन्तन्ति वायसाः ॥

स्वपोषणपरो यस्तु परित्यजति मानवः । पुत्रभृत्यकलत्रादिबन्धुवर्गमकिंचनम् 1 दुर्भिक्षे संभ्रमे चापि श्वभोज्ये निपात्यते ॥

शरणागतं ये त्यजन्ति ये च बन्धनपालकाः ।

पतन्ति यन्त्रपीडे ते ताड्यमानास्तु किंकरैः ॥

कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, नरकोंका वर्णन ६३ जो देवता, अतिथि, अन्य प्राणी, सेवक, बाहरसे आये व्यक्ति, १२ बालक, पिता, अग्नि एवं माताओंको बिना भोजन कराये पहले ही खा लेते हैं, वे अधम पुरुष पर्वततुल्य शरीर एवं १३ सूची - सदृश मुखवाले होकर भूखसे व्याकुल रहते हुए दूषित रक्त एवं पीबका सार भक्षण करते हैं । हे राक्षसराज! एक ही पतिमें बैठे हुए लोगोंको जो समानरूपसे भोजन नहीं १४ कराते, वे विड्भोजन नामक नरकमें जाते हैं ॥ ११-१४ ॥ जो लोग एक साथ चलनेवाले किसी बहुत तीव्र ९ ५ चाहवालेको देखते हुए भी उसे अन्न नहीं देते – अकेले भोजन करते हैं, वे श्लेष्मभोजन नामक नरकमें जाते हैं । १६ हे राक्षस! जो उच्छिष्टावस्थामें ( जूठे रहते हुए ) गाय, ब्राह्मण और अग्रिको स्पर्श करते हैं, उनके हाथ भयंकर तप्तकुम्भमें डाले जाते हैं । जो उच्छिष्टावस्थामें स्वेच्छासे १७ सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रको देखते हैं, उनके नेत्रोंमें यमदूत अग्नि जलाते हैं । जो मित्रकी पत्नी, माता, जेठ भाई, पिता, बहन, १८ पुत्री, गुरु और वृद्धोंको पैरसे छूते हैं, उन मनुष्योंके पैर खूब जलते हुए बेड़ीसे बाँधकर उन्हें रौरव - नरकमें डाला १ ९ जाता है, जहाँ वे घुटनोंतक जलते रहते हैं ॥ १५–१९ ॥ जो बिना विशेष प्रयोजनके खीर, खिचड़ी एवं मांसका २० भोजन करते हैं, उनके मुँहमें जलता हुआ लोहेका पिण्ड डाला जाता है । जो पापियोंद्वारा की गयी गुरु, देवता, ब्राह्मण २१ और वेदोंकी निन्दाको सुनते हैं, उन नीच मनुष्योंके कानोंमें धर्मराजके किंकर अग्निवर्ण लोहेकी कीलें बार - बार ठोंकते २२ रहते हैं । जो प्याऊ ( पौसार ), देवमन्दिर, बगीचा, ब्राह्मणगृह, सभा, मठ, कुआँ, बावली एवं तडागको तोड़कर नष्ट करते २३ हैं, उन मनुष्योंके विलाप करते रहनेपर भी भयंकर यमकिंकर सुतीक्ष्ण छुरिकाओंद्वारा उनकी चमड़ी उधेड़ते हैं – उनकी २४ देहसे चर्मको काटकर पृथक् करते रहते हैं ॥ २०–२४ ॥ जो गाय, ब्राह्मण, सूर्य और अग्निके सम्मुख मल-२५ मूत्रादिका त्याग करते हैं, उनकी गुदासे कौए उनकी आँतोंको नोच - नोचकर काटते हैं । जो दुर्भिक्ष ( अकाल ) एवं विप्लवके समय अकिंचन, पुत्र, भृत्य एवं कलत्र ( स्त्री ) आदि बन्धुवर्गको छोड़कर आत्म - पोषण करता २६ है, वह यमदूतोंद्वारा श्वभोजन नामक नरकमें डाला जाता है । जो रक्षाके लिये शरणमें आये व्यक्तिका परित्याग करता है, वह मनुष्य बन्दीगृह रक्षक यमदूतोंके २७ । द्वारा पीटे जाते हुए यन्त्रपीड नामक नरकमें गिरते हैं ।

पृष्ठ 74

वामन पुराण, पृष्ठ 74 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १२

क्लेशयन्ति हि विप्रादीन् ये ह्यकर्मसु पापिनः ।

ते पिष्यन्ते शिलापेषे शोष्यन्तेऽपि च शोषकैः ॥

न्यासापहारिणः पापा वध्यन्ते निगडैरपि ।

क्षुत्क्षामाः शुष्कताल्वोष्ठाः पात्यन्ते वृश्चिकाशने ॥

पर्वमैथुनिनः पापाः परदाररताश्च ये ।

ते वह्नितप्तां कूटाग्रामालिङ्गन्ते च शाल्मलीम् ॥

उपाध्यायमधःकृत्य यैरधीतं द्विजाधमैः ।

तेषामध्यापको यश्च स शिलां शिरसा वहेत् ॥

मूत्रश्लेष्मपुरीषाणि यैरुत्सृष्टानि वारिणि ।

ते पात्यन्ते च विण्मूत्रे दुर्गन्धे पूयपूरिते ॥

श्राद्धातिर्थयमन्योन्यं यैर्मुक्तं भुवि मानवैः ।

परस्परं भक्षयन्ते मांसानि स्वानि बालिशाः ॥

वेदवह्निगुरुत्यागी भार्यापित्रोस्तथैव च ।

गिरिशृङ्गादधःपातं पात्यन्ते यमकिंकरैः ॥

पुनर्भूपतयो ये च कन्याविध्वंसकाश्च ये ।

तद्गर्भश्राद्धभुग् यश्च कृमीन्भक्षेत्पिपीलिकाः ॥

चाण्डालादन्त्यजाद्वापि प्रतिगृह्णाति दक्षिणाम् ।

याजको यजमानश्च सो श्मान्तः स्थूलकीटकः ॥

पृष्ठमांसाशिनो मूढास्तथैवोत्कोचजीविनः ।

क्षिप्यन्ते वृकभक्षे ते नरके रजनीचर ॥

स्वर्णस्तेयी च ब्रह्मघ्नः सुरापी गुरुतल्पगः ।

तथा गोभूमिहर्त्तारो गोस्त्रीबालहनाश्च ये ॥

एते नरा द्विजा ये च गोषु विक्रयिणस्तथा ।

सोमविक्रयिणो ये च वेदविक्रयिणस्तथा ॥

कूटसभ्यास्त्वशौचाश्च नित्यनैमित्तनाशकाः ।

कूटसाक्ष्यप्रदा ये च ते महारौरवे स्थिताः ॥

दशवर्षसहस्राणि तावत् तामित्रके स्थिताः ।

तावच्चैवान्धतामिस्त्रे असिपत्रवने ततः ॥

तावच्चैव घटीयन्त्रे तप्तकुम्भे ततः परम् ।

प्रपातो भवते तेषां यैरिदं दुष्कृतं कृतम् ॥

जो लोग ब्राह्मणोंको कुकर्मोंमें लगाकर उन्हें क्लेश देते २८ हैं, वे पापी मनुष्य शिलाओंपर पीसे जाते हैं और अग्नि-सूर्य आदिद्वारा शोषित भी किये जाते हैं ॥ २५–२८ ॥ जो धरोहरको चुरा लेते हैं, उन्हें बेड़ी लगाकर भूखसे २ ९ पीड़ित एवं सूखे तालु और ओठकी अवस्थामें वृश्चिकाशन नामक नरकमें गिराया जाता है । जो पर्वोंमें मैथुन करते तथा परस्त्री - संग करते हैं, उन पापियोंको वह्नितप्त कीलोंवाले ३० शाल्मलिका ( विवशतासे ) आलिङ्गन करना पड़ता है । जो द्विज उपाध्यायको स्वयंकी अपेक्षा निम्नासनपर बैठाकर ३१ अध्ययन करता है, उन अधम द्विजों एवं उनके अध्यापकको सिरपर शिला वहन करनी पड़ती है । जो जलमें मूत्र, कफ एवं मलका त्याग करते हैं, उन्हें दुर्गन्धयुक्त विष्टा और पीबसे ३२ पूर्ण विण्मूत्र नामक नरकमें गिराया जाता है ॥ २ ९ –३२ ॥ जो इस संसार में श्राद्धके अवसरपर अतिथिके निमित्त ३३ तैयार किये गये पदार्थको परस्पर भक्षण कर लेते हैं, उन मूर्खोको परलोकमें एक - दूसरेका मांस खाना पड़ता है । जो वेद, अग्नि, गुरु, भार्या, पिता एवं माताका त्याग करते ३४ हैं, उन्हें यमदूत गिरिशिखरके ऊपरसे नीचे गिराते हैं । जो विधवासे विवाह कराते, अविवाहित कन्याको दूषित करते एवं उक्त प्रकारसे उत्पन्न व्यक्तियोंकी सन्तानके ३५ यहाँ श्राद्धमें भोजन करते हैं, उन्हें कृमि तथा पिपीलिकाका भक्षण करना पड़ता है । जो ब्राह्मण चाण्डाल और अन्त्यजोंसे दक्षिणा लेते हैं उन्हें तथा उनके यजमानको पत्थरोंमें ३६ रहनेवाला स्थूल कीट बनना पड़ता है ॥ ३३-३६ ॥ राक्षस! जो पीठपीछे शिकायत करते हैं - चुगली ३७ करते एवं घूस लेते हैं, उन्हें वृकभक्ष नामक नरकमें डाला जाता है । इसी प्रकार सोना चुरानेवाले, ब्रह्महत्यारे, मद्यपी, ३८ गुरुपत्नीगामी, गाय तथा भूमिकी चोरी करनेवाले एवं स्त्री तथा बालकको मारनेवाले मनुष्यों तथा गो, सोम एवं वेदका विक्रय करनेवाले, दम्भी, टेढ़ी भाषामें झूठी ३ ९ गवाही देनेवाले तथा पवित्रताके आचरणको छोड़ देनेवाले और नित्य एवं नैमित्तिक कर्मोंके नाश करनेवाले द्विजोंको ४० महारौरव नामक नरकमें रहना पड़ता है ॥ ३७–४० ॥ उपर्युक्त प्रकारके पापियोंको दस हजार वर्ष तामिस्र ४१ नरकमें तथा उतने ही वर्षोंतक अन्धतामिस्र और असिपत्र-वन नामक नरक में रहनेके बादमें भी उतने ही वर्षोंतक ४२ । घटीयन्त्र और तप्तकुम्भमें रहना पड़ता है । जिन भयंकर

पृष्ठ 75

वामन पुराण, पृष्ठ 75 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १२ ] सुकेशिका नरक ये त्वेते नरका रौद्रा रौरवाद्यास्तवोदिताः ते सर्वे क्रमशः प्रोक्ताः कृतघ्ने लोकनिन्दिते यथा सुराणां प्रवरो जनार्दन यथा गिरीणामपि शैशिराद्रिः यथायुधानां प्रवरं सुदर्शनं यथा खगानां विनतातनूजः महोरगाणां प्रवरोऽप्यनन्तो यथा च भूतेषु मही प्रधाना नदीषु गङ्गा जलजेषु पद्मं सुरारिमुख्येषु हराङ्घ्रिभक्तः क्षेत्रेषु युद्वत्कुरुजाङ्गलं वरं तीर्थेषु यद्वत् प्रवरं पृथूदकम् ॥ सरस्सु चैवोत्तरमानसं यथा वनेषु पुण्येषु हि नन्दनं यथा लोकेषु यद्वत्सदनं विरिञ्चे: सत्यं यथा धर्मविधिक्रियासु यथाश्वमेधः प्रवरः क्रतूनां पुत्रो यथा स्पर्शवतां वरिष्ठः तपोधनानामपि कुम्भयोनिः श्रुतिर्वरा यद्वदिहागमेषु ॥ मुख्यः यथैव मात्स्यः स्वायंभुवोक्तिस्त्वपि संहितासु मनुः स्मृतीनां प्रवरो यथैव तिथीषु दर्शो विषुवेषु दानम् तेजस्विनां यद्वदिहार्क उक्तो ऋक्षेषु चन्द्रो जलधिर्हदेषु भवान् तथा राक्षसत्तमेषु पाशेषु नागस्तिमितेषु बन्धः धान्येषु शालिर्द्विपदेषु विप्रः चतुष्पदे गोः श्वपदां मृगेन्द्रः । पुष्पेषु जाती नगरेषु काञ्ची नारीषु रम्भाश्रमिणां गृहस्थः कुशस्थली श्रेष्ठता पुरेषु देशेषु सर्वेषु च मध्यदेशः । फलेषु चूत मुकुलेष्वशोकः सर्वौषधीनां प्रवरा च पथ्या ॥ मूलेषु कन्दः प्रवरो यथोक्तो व्याधिष्वजीर्ण क्षणदाचरेन्द्र । श्वेतेषु प्रवरं यथैव कार्पासिकं प्रावरणेषु यद्वत् ॥ देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, नरकोंका वर्णन ६५ । रौरव आदि नरकोंका हमने तुमसे वर्णन किया है, वे ॥ ४३ । सभी लोक - निन्दित कृतघ्नोंको बारी - बारीसे प्राप्त होते रहते हैं ॥ ४१-४३ ॥ जैसे देवताओंमें श्रीविष्णु, पर्वतोंमें हिमालय, । अस्त्रोंमें सुदर्शन, पक्षियोंमें गरुड़, महान् सर्पोंमें । अनन्तनाग तथा भूतोंमें पृथ्वी श्रेष्ठ है; नदियोंमें गङ्गा, जलमें उत्पन्न होनेवालोंमें कमल, देव - शत्रु - दैत्योंमें ॥४४ महादेवके चरणोंका भक्त और क्षेत्रोंमें जैसे कुरु-। जांगल और तीर्थोंमें पृथूदक है; जलाशयोंमें उत्तर-४५ मानस, पवित्र वनोंमें नन्दनवन, लोकोंमें ब्रह्मलोक, धर्म - कार्यों में सत्य प्रधान है तथा जैसे यज्ञोंमें । अश्वमेध, छूनेयोग्य ( स्पर्शसुखवाले ) पदार्थोंमें पुत्र ॥ ४६ सुखदायक है; तपस्वियोंमें अगस्त्य, आगम शास्त्रोंमें । वेद श्रेष्ठ है; जैसे पुराणोंमें मत्स्यपुराण, संहिताओं में ४७ | स्वयम्भूसंहिता, स्मृतियोंमें मनुस्मृति, तिथियोंमें अमावास्या और विषुवों अर्थात् मेष और तुला । राशिमें सूर्यके संक्रमण संक्रान्तिके अवसरपर किया ॥ ४८ गया दान श्रेष्ठ होता है; ॥ ४४-४८ ॥ जैसे तेजस्वियोंमें सूर्य, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, । जलाशयोंमें समुद्र, अच्छे राक्षसोंमें आप और निश्चेष्ट ॥ ४ ९ करनेवाले पाशोंमें नागपाश श्रेष्ठ है एवं जैसे धानोंमें शालि, दो पैरवालोंमें ब्राह्मण, चौपायोंमें गाय, जंगली जानवरोंमें सिंह, फूलोंमें जाती ( चमेली ), नगरोंमें ॥ ५० काञ्ची, नारियोंमें रम्भा और आश्रमियोंमें गृहस्थ श्रेष्ठ हैं; जैसे सप्तपुरियोंमें द्वारका, समस्त देशोंमें मध्यदेश, ५१ फलोंमें आम, मुकुलोंमें अशोक और जड़ी - बूटियों में हरीतकी सर्वश्रेष्ठ है; हे निशाचर! जैसे मूलोंमें कन्द, रोगोंमें अपच, श्वेत वस्तुओंमें दुग्ध और ५२ । वस्त्रोंमें रूईके कपड़े श्रेष्ठ हैं ॥ ४ ९ -५२ ॥

पृष्ठ 76

वामन पुराण, पृष्ठ 76 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६६ कलासु मुख्या गणितज्ञता च विज्ञानमुख्येषु यथेन्द्रजालम् शाकेषु मुख्या त्वपि काकमाची रसेषु मुख्यं लवणं यथैव तुङ्गेषु तालो नलिनीषु पम्पा वनौकसेष्वेव च ऋक्षराजः महीरुहेष्वेव यथा वटश्च यथा हरो ज्ञानवतां वरिष्ठः यथा सतीनां हिमवत्सुता यथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा यथा वृषाणामपि नीलवर्णो यथैव सर्वेष्वपि दुःसहेषु दुर्गेषु रौद्रेषु निशाचरेश नृपातनं वैतरणी प्रधाना पापीयसां कृतघ्नः सर्वेषु पापेषु निशाचरेन्द्र ब्रह्मघ्नगोघ्नादिषु निष्कृतिर्हि विद्येत नैवास्य तु दुष्टचारिणः न निष्कृतिश्चास्ति कृतघ्नवृत्तैः सुहृत्कृतं नाशयतोऽब्दकोटिभिः श्रीवामनपुराण [ अध्याय १३ निशाचर! जैसे कलाओंमें गणितका जानना, । विज्ञानोंमें इन्द्रजाल, शाकोंमें मकोय, रसोंमें नमक, ॥५३ ऊँचे पेड़ोंमें ताड़, कमल - सरोवरोंमें पंपासर, बनैले । जीवोंमें भालू, वृक्षोंमें हैं; जैसे सतियोंमें ॥ ५४ गौओंमें काली गाय, । सभी दुःसह कठिन । वैतरणी प्रधान है, वट, ज्ञानियोंमें महादेव वरिष्ठ हिमालयकी पुत्री पार्वती, बैलोंमें नील रंगका बैल, एवं भयंकर नरकोंमें नृपातन उसी प्रकार हे निशाचरेश! ॥ ५५ पापियोंमें कृतघ्न प्रधानतम पापी होता है । ब्रह्म-हत्या एवं गोहत्या आदि पापोंकी निष्कृति तो । हो जाती है, पर दुराचारी पापी एवं मित्र-। द्रोही कृतघ्नका करोड़ों वर्षोंमें भी निस्तार ॥ ५६ | नहीं होता ॥ ५३–५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १२ ॥

तेरहवाँ अध्याय सुकेशिके प्रश्नके उत्तरमें ऋषियोंका जम्बू द्वीपकी स्थिति और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन सुकेशिरुवाच

भवद्भिरुदिता घोरा पुष्करद्वीपसंस्थितिः ।

जम्बूद्वीपस्य तु संस्थानं कथयन्तु महर्षयः ॥ १

ऋषय ऊचुः

जम्बूद्वीपस्य संस्थानं कथ्यमानं निशामय ।

नवभेदं सुविस्तीर्ण स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ॥ २

मध्ये विलावृतो वर्षो भद्राश्वः पूर्वतोऽद्भुतः ।

पूर्व उत्तरतश्चापि हिरण्यो राक्षसेश्वर ॥ ३

पूर्वदक्षिणतश्चापि किंनरो वर्ष उच्यते ।

भारतो दक्षिणे प्रोक्तो हरिर्दक्षिणपश्चिमे ॥ ४

पश्चिमे केतुमालश्च रम्यकः पश्चिमोत्तरे ।

उत्तरे च कुरुर्वर्षः कल्पवृक्षसमावृतः ॥ ५

सुकेशीने कहा- आदरणीय ऋषियो! आपलोगोंने पुष्करद्वीपके भयंकर अवस्थानका वर्णन किया, अब आप-लोग ( कृपाकर ) जम्बूद्वीपकी स्थितिका वर्णन करें ॥ १ ॥

ऋषियोंने कहा - राक्षसेश्वर! ( अब ) तुम हमलोगोंसे जम्बूद्वीपकी स्थितिका वर्णन सुनो । यह द्वीप अत्यन्त विशाल है और नव भागों में विभक्त है । यह स्वर्ग एवं मोक्ष - फलको देनेवाला है । जम्बूद्वीपके बीचमें इलावृतवर्ष, । पूर्वमें अद्भुत भद्राश्ववर्ष तथा पूर्वोत्तरमें हिरण्यवर्ष है । पूर्व - दक्षिणमें किन्नरवर्ष, दक्षिणमें भारतवर्ष तथा दक्षिण-पश्चिममें हरिवर्ष बताया गया है । इसके पश्चिममें केतुमालवर्ष, पश्चिमोत्तरमें रम्यकवर्ष और उत्तरमें कल्पवृक्षसे । समादृत कुरुवर्ष है ॥२-५ ॥

पृष्ठ 77

वामन पुराण, पृष्ठ 77 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १३ ] सुकेशिके प्रश्नके उत्तरमें ऋषियोंका

पुण्या रम्या नवैवैते वर्षाः शालकटंकट ।

इलावृताद्या ये चाष्टौ वर्षमुक्त्वैव भारतम् ॥

न तेष्वस्ति युगावस्था जरामृत्युभयं न च ।

तेषां स्वाभाविका सिद्धिः सुखप्राया ह्ययत्नतः ।

विपर्ययो न तेष्वस्ति नोत्तमाधममध्यमाः ॥

यदेतद् भारतं वर्षं नवद्वीपं निशाचर ।

सागरान्तरिताः सर्वे अगम्याश्च परस्परम् ॥

इन्द्रद्वीपः कसेरुमांस्ताम्रवर्णो गभस्तिमान् ।

नागद्वीपः कटाहश्च सिंहलो वारुणस्तथा ॥

अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः ।

कुमाराख्यः परिख्यातो द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः ॥

पूर्वे किराता यस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्थिताः ।

आन्ध्रा दक्षिणतो वीर तुरुष्कास्त्वपि चोत्तरे ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्तरवासिनः ।

इज्यायुद्धवणिज्याद्यैः कर्मभिः कृतपावनाः ॥

तेषां संव्यवहारश्च एभिः कर्मभिरिष्यते ।

स्वर्गापवर्गप्राप्तिश्च पुण्यं पापं तथैव च ॥

महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमान् ऋक्षपर्वतः ।

विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः ॥

तथान्ये शतसाहस्त्रा भूधरा मध्यवासिनः ।

विस्तारोच्छ्रायिणो रम्या विपुलाः शुभसानवः ॥

कोलाहलः स वैभ्राजो मन्दरो दर्दुराचलः ।

वातंधमो वैद्युतश्च मैनाकः सरसस्तथा ॥

तुङ्गप्रस्थो नागगिरिस्तथा गोवर्धनाचलः ।

उज्जायनः पुष्पगिरिरर्बुदो रैवतस्तथा ॥

ऋष्यमूकः सगोमन्तश्चित्रकूटः कृतस्मरः ।

श्रीपर्वतः कोङ्कणश्च शतशोऽन्येऽपि पर्वताः ॥

तैर्विमिश्रा जनपदा म्लेच्छा आर्याश्च भागशः ।

तैः पीयन्ते सरिच्छ्रेष्ठा यास्ताः सम्यनिशामय ॥

सरस्वती पञ्चरूपा कालिन्दी सहिरण्वती ।

शतद्रुश्चन्द्रिका नीला वितस्तैरावती कुहूः ॥

मधुरा देविका चैव उशीरा धातकी रसा ।

गोमती धूतपापा च बाहुदा सदृषद्वती ॥

निश्चीरा गण्डकी चित्रा कौशिकी च वधूसरा ।

सरयूश्च सलौहित्या हिमवत्पादनिःसृताः ॥

वेदस्मृतिर्वेदवती वृत्रघ्नी सिन्धुरेव च ।

पर्णाशा नन्दिनी चैव पावनी च मही तथा ॥

जम्मू - द्वीपकी और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन ६७ ( सुकेशि! ) ये नव पवित्र और रमणीय वर्ष हैं । ६ भारतवर्षके अतिरिक्त इलावृतादि आठ वर्षोंमें युगावस्था तथा जरामृत्युका भय नहीं होता । उन वर्षोंमें बिना प्रयत्नके स्वभावतः बड़ी - बड़ी सिद्धियाँ मिलती हैं । उनमें ७ उत्तम, मध्यम, अधम आदिका किसी प्रकारका कोई भेद नहीं है । निशाचर! इस भारतवर्षके भी नव उपद्वीप हैं । ८ ये सभी द्वीप समुद्रोंसे घिरे हैं और परस्पर अगम्य हैं । भारतवर्षके नव उपद्वीपोंके नाम इस प्रकार हैं- इन्द्रद्वीप, ९ कसेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, कटाह, सिंहल और वारुण । नवाँ मुख्य यह कुमारद्वीप भारत - सागरसे १० लगा हुआ दक्षिणसे उत्तरकी ओर फैला है ॥ ६-१० ॥ वीर! भारतवर्षके पूर्वकी सीमापर किरात, पश्चिममें ११ यवन, दक्षिणमें आन्ध्र तथा उत्तरमें तुरुष्कलोग निवास करते हैं । इसके बीचमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रलोग रहते हैं । यज्ञ, युद्ध एवं वाणिज्य आदि कर्मोंके १२ द्वारा वे सभी पवित्र हो गये हैं । उनका व्यवहार, स्वर्ग और अपवर्ग ( मोक्ष ) की प्राप्ति तथा पाप एवं पुण्य १३ इन्हीं ( यज्ञादि ) कर्मोंद्वारा होते हैं । इस वर्षमें महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य एवं पारियात्र १४ । नामवाले सात मुख्य कुल पर्वत हैं ॥ ११–१४ ॥ इसके मध्यमें अन्य लाखों पर्वत हैं जो अत्यन्त १५ विस्तृत, उत्तुङ्ग ( ऊँचे ) रम्य एवं सुन्दर शिखरोंसे सुशोभित हैं । यहाँ कोलाहल, वैभ्राज, मन्दरगिरि, दर्दुर, १६ वातंधम, वैद्युत, मैनाक, सरस, तुङ्गप्रस्थ, नागगिरि, गोवर्धन, उज्जायन ( गिरिनार ), पुष्पगिरि, अर्बुद ( आबू ), १७ रैवत, ऋष्यमूक, गोमन्त ( गोवाका पर्वत ), चित्रकूट, कृतस्मर, श्रीपर्वत, कोङ्कण तथा अन्य सैकड़ों पर्वत भी १८ विराज रहे हैं ॥ १५–१८ ॥ उनसे संयुक्त आर्यों और म्लेच्छोंके विभागोंके १ ९ । अनुसार जनपद हैं । यहाँके निवासी जिन उत्तम नदियोंके जल पीते हैं उनका वर्णन भलीभाँति सुनो । पाँच रूपकी २० सरस्वती, कालिन्दी ( यमुना ), हिरण्वती, सतलज, चन्द्रिका, नीला, वितस्ता, ऐरावती, कुहू, मधुरा, देविका, उशीरा, २१ धातकी, रसा, गोमती, धूतपापा, बाहुदा, दृषद्वती, निश्चीरा, गण्डकी, चित्रा, कौशिकी, वधूसरा, सरयू तथा लौहित्या -२२ | ये नदियाँ हिमालयकी तलहटीसे निकली हैं ॥ १ ९ –२२ ॥ २३ वेदस्मृति, वेदवती, वृत्रघ्नी, सिन्धु, पर्णाशा, नन्दिनी,

पृष्ठ 78

वामन पुराण, पृष्ठ 78 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६८

पारा चर्मण्वती लूपी विदिशा वेणुमत्यपि ।

सिप्रा ह्यवन्ती च तथा पारियात्राश्रयाः स्मृताः ॥

शोणो महानदश्चैव नर्मदा सुरसा कृपा ।

मन्दाकिनी दशार्णा च चित्रकूटापवाहिका ॥

चित्रोत्पला वै तमसा करमोदा पिशाचिका ।

तथान्या पिप्पलश्रोणी विपाशा वञ्जुलावती ॥

सत्सन्तजा शुक्तिमती मञ्जिष्ठा कृत्तिमा वसुः ।

ऋक्षपादप्रसूता च तथान्या बालुवाहिनी ॥

शिवा पयोष्णी निर्विन्ध्या तापी सनिषधावती ।

वेणा वैतरणी चैव सिनीबाहुः कुमुद्वती ॥

तोया चैव महागौरी दुर्गन्धा वाशिला तथा ।

विन्ध्यपादप्रसूताश्च नद्यः पुण्यजलाः शुभाः ॥

गोदावरी भीमरथी कृष्णा वेणा सरस्वती ।

तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा बाह्या कावेरिरेव च ॥

दुग्धोदा नलिनी रेवा वारिसेना कलस्वना । एतास्त्वपि महानद्यः सह्यपादविनिर्गताः कृतमाला ताम्रपर्णी वञ्जुला चोत्पलावती । सिनी चैव सुदामा च शुक्तिमत्प्रभवास्त्विमाः सर्वाः पुण्याः सरस्वत्यः पापप्रशमनास्तथा । जगतो मातरः सर्वाः सर्वाः सागरयोषितः अन्याः सहस्त्रशश्चात्र क्षुद्रनद्यो हि राक्षस सदाकालवहाश्चान्याः प्रावृकालवहास्तथा उद्ड़्मध्योद्भवा देशाः पिबन्ति स्वेच्छया शुभाः मत्स्याः कुशट्टा: कुणिकुण्डलाश्च पाञ्चालकाश्याः सह कोसलाभिः वृकाः शबरकौवीराः सभूलिङ्गा जनास्त्विमे । शकाश्चैव समशका मध्यदेश्या जनास्त्विमे वाहीका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः अपरान्तास्तथा शूद्राः पह्नवाश्च सखेटकाः गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रकाः शातद्रवा ललित्थाश्च पारावतसमूषकाः माठरोदकधाराश्च कैकेया दशमास्तथा क्षत्रियाः प्रातिवैश्याश्च वैश्यशूद्रकुलानि च काम्बोजा दरदाश्चैव बर्बरा ह्यङ्गलौकिकाः चीनाश्चैव तुषाराश्च बहुधा बाह्यतोदराः आत्रेयाः सभरद्वाजाः प्रस्थलाश्च दशेरकाः लम्पकास्तावका रामाः शूलिकास्तङ्गणैः सह श्रीवामनपुराण [ अध्याय १३ पावनी, मही, पारा, चर्मण्वती, लूपी, विदिशा, वेणुमती, २४ सिप्रा तथा अवन्ती – ये नदियाँ पारियात्र - पर्वतसे निकली हुई हैं । महानद, शोण, नर्मदा, सुरसा, कृपा, मन्दाकिनी, २५ दशार्णा, चित्रकूटा, अपवाहिका, चित्रोत्पला, तमसा, करमोदा, पिशाचिका, पिप्पलश्रोणी, विपाशा, वञ्जुलावती, २६ सत्सन्तजा, शुक्तिमती, मञ्जिष्ठा, कृत्तिमा, वसु और बालुवाहिनी – ये नदियाँ तथा दूसरी जो बालुका बहानेवाली २७ हैं, ऋक्षपर्वतकी तलहटीसे निकली हुई हैं ॥ २३-२७ ॥ शिवा, पयोष्णी ( पैनगंगा ), निर्विन्ध्या ( कालीसिंध ), २८ तापी, निषधावती, वेणा, वैतरणी, सिनीबाहु, कुमुद्वती, तोया, महागौरी, दुर्गन्धा तथा वाशिला - ये पवित्र २ ९ जलवाली कल्याणकारिणी नदियाँ विन्ध्यपर्वतसे निकली हुई हैं । गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा, वेणा, सरस्वती, ३० तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा, बाह्या, कावेरी, दुग्धोदा, नलिनी, रेवा ( नर्मदा ), वारिसेना तथा कलस्वना – ये महानदियाँ ॥ ३१ सह्यपर्वतके पाद ( नीचे ) - से निकलती हैं ॥ २८-३१ ॥ कृतमाला, ताम्रपर्णी, वञ्जुला, उत्पलावती, सिनी ॥ ३२ तथा सुदामा – ये नदियाँ शुक्तिमान् पर्वतसे निकली हुई हैं । ये सभी नदियाँ पवित्र, पापोंका प्रशमन करनेवाली, ॥ ३३ जगत्‌की माताएँ तथा सागरकी पत्नियाँ हैं । राक्षस! । इनके अतिरिक्त भारतमें अन्य हजारों छोटी नदियाँ भी । बहती हैं । इनमें कुछ तो सदैव प्रवाहित होनेवाली हैं । ॥ ३४ उत्तर एवं मध्यके देशोंके निवासी इन पवित्र नदियोंके । जलको स्वेच्छया पान करते हैं । मत्स्य, कुशट्ट, कुणि, || ३५ कुण्डल, पाञ्चाल, काशी, कोसल, वृक, शबर, कौवीर, भूलिङ्ग, शक तथा मशक जातियोंके मनुष्य मध्यदेशमें ॥ ३६ रहते

॥ ३७

। शूद्र, ॥ ३८ मद्रक,

हैं ॥ ३२–३६ ॥

वाह्लीक, वाटधान, आभीर, कालतोयक, अपरान्त, पह्नव खेटक, गान्धार, यवन, सिन्धु, सौवीर, शातद्रव, ललित्थ, पारावत, मूषक, माठर, ॥ ३ ९ उदकधार, कैकेय, दशम, क्षत्रिय, प्रातिवैश्य तथा वैश्य । एवं शूद्रोंके कुल, काम्बोज, दरद, बर्बर, अङ्गलौकिक, ॥ ४० चीन, तुषार, बहुधा, बाह्यतोदर, आत्रेय, भरद्वाज, । ॥ ४ ९ । प्रस्थल, दशेरक, लम्पक, तावक, राम, शूलिक, तङ्गण,

पृष्ठ 79

वामन पुराण, पृष्ठ 79 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय १३ ] सुकेशिके प्रश्नके उत्तरमें ऋषियोंका औरसाश्चालिभद्राश्च किरातानां च जातयः तामसाः क्रममासाश्च सुपार्श्वाः पुण्ड्रकास्तथा कुलूताः कुहुका ऊर्णास्तूणीपादाः सकुक्कुटाः माण्डव्या मालवीयाश्च उत्तरापथवासिनः अङ्गा वङ्गा मुद्गरवास्त्वन्तर्गिरिबहिर्गिराः तथा प्रवङ्गा वाङ्गेया मांसादा बलदन्तिकाः ब्रह्मोत्तरा प्राविजया भार्गवाः केशवर्वराः प्राग्ज्योतिषाश्च शूद्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तकाः माला मगधगोनन्दाः प्राच्या जनपदास्त्विमे पुण्ड्राश्च केरलाश्चैव चौडा: कुल्याश्च राक्षस जातुषा मूषिकादाश्च कुमारादा महाशकाः महाराष्ट्रा माहिषिकाः कालिङ्गाश्चैव सर्वशः आभीराः सह नैषीका आरण्याः शबराश्च ये वलिन्ध्या विन्ध्यमौलेया वैदर्भा दण्डकैः सह पौरिकाः सौशिकाश्चैव अश्मका भोगवर्द्धनाः वैषिकाः कुन्दला आन्ध्रा उद्भिदा नलकारकाः दाक्षिणात्या जनपदास्त्विमे शालकटङ्कट शूर्पारका कारिवना दुर्गास्तालीकटैः सह पुलीयाः ससिनीलाश्च तापसास्तामसास्तथा कारस्करास्तु रमिनो नासिक्यान्तरनर्मदाः भारकच्छा समाहेयाः सह सारस्वतैरपि वात्सेयाश्च सुराष्ट्राश्च आवन्त्याश्चार्बुदैः सह इत्येते पश्चिमामाशां स्थिता जानपदा जनाः कारुषाश्चैकलव्याश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह उत्तमर्णा दशार्णाश्च भोजाः किंकवरैः सह तोशलाः कोशलाश्चैव त्रैपुराश्चैल्लिकास्तथा तुरुसास्तुम्बराश्चैव वहनाः नैषधैः सह अनूपास्तुण्डिकेराश्च वीतहोत्रास्त्ववन्तयः सुकेशे विन्ध्यमूलस्थास्त्विमे जनपदाः स्मृताः अथो देशान् प्रवक्ष्यामः पर्वताश्रयिणस्तु ये निराहारा हंसमार्गाः कुपथास्तङ्गणाः खशाः कुथप्रावरणाश्चैव ऊर्णाः पुण्याः सहुहुकाः त्रिगर्ताश्च किराताश्च तोमराः शिशिराद्रिकाः इमे तवोक्ता विषयाः सुविस्तराद् द्वि कुमारे रजनीचरेश एतेषु देशेषु च देशधर्मान् संकीर्त्यमानाञ्शृणु तत्त्वतो हि जम्मू- द्वीपकी स्थिति और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन ६ ९ । औरस, अलिभद्र, किरातोंकी जातियाँ, तामस, क्रममास, ॥ ४२ सुपार्श्व, पुण्ड्रक, कुलूत, कुहुक, ऊर्ण, तूणीपाद, । कुक्कुट, माण्डव्य एवं मालवीय – ये जातियाँ उत्तर ॥ ४३ भारतमें निवास करती हैं ॥ ३७ – ४३ ॥ । अङ्ग ( भागलपुर ), वंग एवं मुद्गरव ( मुंगेर ), ॥ ४४ अन्तर्गिरि, बहिर्गिर, प्रवङ्ग, वाङ्गेय, मांसाद, बलदन्तिक, । ब्रह्मोत्तर, प्राविजय, भार्गव, केशवर्वर, प्राग्ज्योतिष, शूद्र, ॥ ४५ । विदेह, ताम्रलिप्तक, माला, मगध एवं गोनन्द – ये ॥ ४६ पूर्वके जनपद हैं । हे राक्षस! शालकटंकट! पुण्ड्र, । केरल, चौड, कुल्य, जातुष, मूषिकाद, कुमाराद, ॥ ४७ महाशक, महाराष्ट्र, माहिषिक, कालिङ्ग ( उड़ीसा ), । आभीर, नैषीक, आरण्य, शबर, वलिन्ध्य, विन्ध्यमौलेय, ॥ ४८ वैदर्भ, दण्डक, पौरिक, सौशिक, अश्मक, भोगवर्द्धन, ॥ वैषिक, कुन्दल, अन्ध्र, उद्भिद एवं नलकारक – ये ॥ ४ ९ । दक्षिणके जनपद हैं ॥ ४४–४९ ॥ । सुकेशि! शूर्पारक ( बम्बईका क्षेत्र ), कारिवन, ॥ ५० दुर्ग, तालीकट, पुलीय, ससिनील, तापस, तामस, । कारस्कर, रमी, नासिक्य, अन्तर, नर्मद, भारकच्छ, ॥ ५१ । माहेय, सारस्वत, वात्सेय, सुराष्ट्र, आवन्त्य एवं अर्बुद -॥ ५२ ये पश्चिम दिशामें स्थित जनपदोंके निवासी हैं ॥ कारूष, एकलव्य, मेकल, उत्कल, उत्तमर्ण, दशार्ण, ॥ ५३ भोज, किंकवर, तोशल, कोशल, त्रैपुर, ऐल्लिक, । ॥ ५४ तुरुस, तुम्बर, वहन, नैषध, अनूप, तुण्डिकेर, वीतहोत्र । एवं अवन्ती - ये सभी जनपद विन्ध्याचलके मूलमें ॥ ५५ ( उपत्यका – तराईमें ) स्थित हैं ॥ ५०-५५ ॥ । अच्छा, अब हम पर्वताश्रित प्रदेशोंके नामोंका ॥ ५६ वर्णन करेंगे । उनके नाम इस प्रकार हैं – निराहार, । हंसमार्ग, कुपथ, तंगण, खश, कुथप्रावरण, ऊर्ण, पुण्य, ॥ ५७ हूहुक, त्रिगर्त, किरात, तोमर एवं शिशिराद्रिक । निशाचर! । तुमसे कुमारद्वीपके इन देशोंका विस्तारसे हमलोगोंने वर्णन किया । अब हम इन देशोंमें वर्तमान देश - धर्मोका ॥ ५८ । यथार्थतः वर्णन करेंगे, उसे सुनो ॥ ५६–५८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १३ ॥

* मनुस्मृति ( ८।४१ ) में भी जाति - जनपदादि धर्म मान्य हैं । इन्हें विस्तारसे समझनेके लिये ' जातिभास्कर ' आदि देखना चाहिये ।

पृष्ठ 80

वामन पुराण, पृष्ठ 80 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चौदहवाँ अध्याय दशाङ्ग - धर्म, आश्रम - धर्म और सदाचार - स्वरूपका वर्णन ऋषय ऊचुः

अहिंसा सत्यमस्तेयं दानं क्षान्तिर्दमः शमः ।

अकार्पण्यं च शौचं च तपश्च रजनीचर ॥

दशाङ्गो राक्षसश्रेष्ठ धर्मोऽसौ सार्ववर्णिकः ।

ब्राह्मणस्यापि विहिता चातुराश्रम्यकल्पना ॥

सुकेशिरुवाच

विप्राणां चातुराश्रम्यं विस्तरान्मे तपोधनाः ।

आचक्षध्वं न मे तृप्तिः शृण्वतः प्रतिपद्यते ॥

ऋषय ऊचुः

कृतोपनयनः सम्यग् ब्रह्मचारी गुरौ वसेत् ।

तत्र धर्मोऽस्य यस्तं च कथ्यमानं निशामय ॥

स्वाध्यायोऽथाग्निशुश्रूषा स्नानं भिक्षाटनं तथा ।

गुरोर्निवेद्य तच्चाद्यमनुज्ञातेन सर्वदा ॥

गुरोः कर्माणि सोद्योगः सम्यक्प्रीत्युपपादनम् ।

तेनाहूतः पठेच्चैव तत्परो नान्यमानसः ॥

एकं द्वौ सकलान् वापि वेदान् प्राप्य गुरोर्मुखात् ।

अनुज्ञातो वरं दत्त्वा गुरवे दक्षिणां ततः ॥

गार्हस्थ्याश्रमकामस्तु गार्हस्थ्याश्रममावसेत् ।

वानप्रस्थाश्रमं वाऽपि चतुर्थं स्वेच्छयात्मनः ॥

तत्रैव वा गुरोर्गेहे द्विजो निष्ठामवाप्नुयात् ।

गुरोरभावे तत्पुत्रे तच्छिष्ये तत्सुतं विना ॥

शुश्रूषन् निरभिमानो ब्रह्मचर्याश्रमं वसेत् । एवं जयति मृत्युं स द्विजः शालकटङ्कट । ऋषिगण बोले- राक्षस श्रेष्ठ! अहिंसा, सत्य, अस्तेय ( चोरी न करना ), दान, क्षमा, दम ( इन्द्रिय-१ निग्रह ), शम अकार्पण्य, शौच एवं तप- धर्मके ये दसों अङ्ग सभी वर्णोंके लिये उपदिष्ट हैं; ब्राह्मणों के लिये तो चार आश्रमोंका और भी विधान विहित २ किया गया है॥१-२ ॥ सुकेशि बोला- तपोधनो! ब्राह्मणोंके लिये विहित चारों आश्रमोंके नियम आदिको आपलोग विस्तारसे कहें । मुझे उसे सुनते हुए तृप्ति नहीं हो रही है - मैं और ३ भी सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

ऋषिगण बोले- सुकेशि! ब्रह्मचारी ब्राह्मण भलीभाँति उपनयन - संस्कार कराकर गुरुके गृहपर निवास करे । ४ वहाँके जो कर्तव्य हैं, उन्हें बतलाया जा रहा है, तुम उन्हें सुनो । उनके कर्तव्य हैं – स्वाध्याय, दैनिक हवन, स्नान, भिक्षा माँगना और उसे गुरुको निवेदित करके ५ तथा उनसे आज्ञा प्राप्त कर भोजन करना, गुरुके कार्य-हेतु उद्यत रहना, सम्यक् रूपसे गुरुमें भक्ति रखना, उनके बुलानेपर तत्पर एवं एकाग्रचित्त होकर पढ़ना ६ ( - ये ब्राह्मण ब्रह्मचारीके धर्म हैं ) । गुरुके मुखसे एक, दो या सभी वेदोंका अध्ययन कर गुरुको धन तथा दक्षिणा दे करके उनसे आज्ञा प्राप्त कर गृहस्थाश्रममें ७ जानेका इच्छुक ( शिष्य ) गृहस्थ आश्रममें प्रवेश करे अथवा अपनी इच्छाके अनुसार वानप्रस्थ या संन्यासका ८ । अवलम्बन करे ॥ ४–८ ॥ अथवा ब्राह्मण ब्रह्मचारी वहीं गुरुके घरमें ब्रह्मचर्यकी ९ निष्ठा प्राप्त करे अर्थात् जीवनपर्यन्त ब्रह्मचारी रहे । गुरुके अभावमें उनके पुत्र एवं पुत्र न हो तो उनके शिष्यके समीप निवास करे । राक्षस सुकेशि! अभिमानरहित तथा शुश्रूषा करते हुए ब्रह्मचर्याश्रममें रहे । इस प्रकार अनुष्ठान १० । करनेवाला द्विज मृत्युको जीत लेता है । हे निशाचर!