वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 1–10
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 1–10
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1st: 11 वेदशास्त्रानुसन्धान ग्रन्थमालायाः प्रथमं पुष्पम् वेदार्थ पारिजातः खण्डः १..... प्रणेतारः अनन्तश्रीस्वामिकरपात्रमहाराजाः भाषानुवादकः पं ० व्रजवल्लभद्विवेदी दर्शनाचार्य: सम्पादकमण्डलम् ब्रह्मश्री पं ० पट्टाभिरामशास्त्री विद्यासागरः पं ० मार्कण्डेय ब्रह्मचारी मोमांगाचार्य पं ० गजाननशास्त्री मुसलगांवकरः प्रकाशक : श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थानम्, कलकत्ता सञ्चालकः वेदशास्त्रानुसन्धान केन्द्रम्, केदारघाट, वाराणसी प्रथमं संस्करणम् २१०० प्रतयः रामनवमी, २०३६
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प्रकाशक श्रीराधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान १४ नेताजी सुभाष रोड, कलकत्ता मूल्य ( दो भाग ) सामान्य सस्करण १८०.०० विशिष्ट संस्करण ३००.०० पुनर्मुद्रण का अधिकार वेदशास्त्रानुसन्धान केन्द्र, केदारघाट, वाराणसी के अधीन है पुस्तक - प्राप्ति स्थान १. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान, मार्फत श्री हनुमानप्रसाद धानुका, १४, नेताजी सुभाष रोड, कलकत्ता ७००००१ २. राधाकृष्ण धातुका प्रकाशन संस्थान, वृन्दावनविहारी भवन, मिश्रपोखरा, वाराणसी । ३. श्री स्वामी सदानन्द सरस्वती ( वेदान्ती जी ), धर्मसंघ शिक्षामंडल, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी । ४. श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान, मार्फत एस. पी. जैन, ८१ सुन्दर नगर, नई दिल्ली | मुद्रक तारा प्रिंटिंग वर्क्स वाराणसी
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VEDAŠISTRA RESEARCH CENTRE SERIES No. 1 VEDARTHA - PIRIJITA Vol. I By ANANTAIR! KAKAPITRI SVIMI Hindi Translation by Pt. VRAJ VALLABH DWIVEDI, Daruncarya Editorial Board BrahmaIrî Pt. PATTABHI RAMA SHASTRI, Vidyasagara Pt. MARAKANDEYA BRAHMACARI Mimamsacarya Pt. GAJANANA SHASTRI Fublishers SRI RADHA KRISHNA DHANUKA PRAKASHAN SANSTHAN, CA Sañenlaka VEDAŠASTRA RESEARCH CENTRE, KEDARGHAT, VARAN VARANASI FIRST EDITION 2100 Copies
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अनन्तश्रीविभूषित जगद्गुरु शङ्कराचार्यवर्य पुरीपीठाधीश्वर श्री निरञ्जनदेव तीर्थ जी महाराज का वक्तव्य वेद भगवान् अधिकारानुसार प्राणी मात्र के कल्याणकारक हैं । वे अनादि, अनन्त और अपौरुषेय हैं । अतः पुरुषाश्रितभ्रम, प्रमाद, करणापाटव, विप्रलिप्सा आदि पुरुषसाधारण दोषों से रहित हैं । कोई भी व्यक्ति यदि कोई ग्रन्थ लिखता है, तो वह उसमें निहित सामग्री का ज्ञान प्रमाणान्तरों से करता है, किन्तु वैदिक सामग्री का ज्ञान किसी भी प्रमाणान्तर से हो सकता नहीं । सन्ध्यावन्दन, याग, होम आदि उपात्तदुरितक्षय तथा स्वर्गादि के साधन हैं, इत्यादि बातें किसी भी पुरुष को किसी भी प्रकार से ज्ञात नहीं हो सकतीं । जब ज्ञात नहीं हो सकती, तो कोई पुरुष इन बातों को लिख कैसे सकता है? अतः वेदों में पुरुष सम्बन्ध के गन्ध की भी आशंका की सम्भावना ही नहीं है । वेदों का तात्पर्य ब्राह्मण भाग, ६ अङ्ग, ६ शास्त्र एवं पुराणेतिहास आदि के द्वारा ही जाना जा सकता है । आचार्य भगवत्पाद ही नहीं, अपितु श्रीमद रामानुजाचार्य आदि वैष्णव आचार्यों का भी यही मत है । आचार्य बेङ्कट माधव ( सायण से भी प्राचीन ), सायण - माधव, उव्वट, महीधर आदि सभी की यह स्पष्ट घोषणा है । किन्तु डा ० आफ्रेक्ट, बेवर, मेक्ससूलर, याकोबी, कीथ, विन्टरनित्ज, desires आदि कुछ पाश्चात्य विद्वानों और तदनुयायी लोकमान्य तिलक, डा ० कैलासचन्द्र, डा ० पी ० वी ० काणे, स्वामी दयानन्द आदि कुछ भारतीय विद्वानों ने भी वेदों के सम्बन्ध में मनमानी की है । अनन्त श्री स्वामीजी महाराज ने उन सबका यथार्थ उत्तर देकर यह ' वेदार्थपारिजात ' सुविज्ञ पाठकों को सुलभ कराने का स्वर्णमय अवसर दिया है । आशा है इससे सारा संसार उपकृत होगा । निरञ्जनदेव नो
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समर्पण aati वस्तु हे स्वामिन् तुभ्यमेव समर्प्यते ' यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः जिस आचरण के द्वारा इस लोक और परलोक में भी कल्याण हो उनी का नाम धर्म है । उस धर्म का मूल वेद है, ' वेदोऽखिलो धर्ममूलम् ' । वेदों की रक्षा करना ही धर्म की सबसे बड़ी रक्षा है । इतर मतावलम्बियों द्वारा मनातन धर्म के मुलभूत वेदों पर निरन्तर प्रहार किये जाते रहे हैं । समय - समय पर तत्कालीन मनीषियों द्वारा उन आक्षेपों और प्रहारों का यथार्थ खण्डन भी किया जाता रहा है । किन्तु इधर कुछ शताब्दियों से इतर धर्मावलम्बियों एवं पाश्चात्यों द्वारा किये गये बेबुनियाद आक्षेपों का उत्तर नहीं हो पाया था । चूँकि उन आक्षेपों का उत्तर तो वही देने में समर्थ हो सकता है, जो समस्त वेद - वेदान्त का पूर्ण ज्ञाता हो । ऐसे महामनीषियों का तो कई शताब्दियों पश्चात् ही धर्म - रक्षार्थ आविर्भाव होता है । श्री स्वामी करपात्री जी महाराज ने उन आक्षेपों का युक्तियुक्त निराकरण करके वेद पर भाष्य करने का अनुपम सत्प्रयास किया है । श्री स्वामी महाराज को तपश्चरण के द्वारा हृदय-ग्रन्थि का भेदन होने से समस्त ज्ञान - विज्ञान करामलकवत् भासित हैं । सम्पूर्ण शास्त्रों के चूड़ान्त सिद्धान्तों का ज्ञानवारिधि समुद्वेलित हो रहा है । धार्मिक, दार्शनिक, राजनैतिक, सामाजिक, पौराणिक, तान्त्रिक आदि साहित्यों पर श्रीचरणों ने अनेक सद्ग्रन्थ लिखे हैं । तत्तत् विषयों के मार्मिक विलक्षण विवेचन से आपकी अलौकिक प्रतिभा स्पष्ट प्रतिभासित होती है | आपके प्रवचन सुनने से तो ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उस समय समस्त वेद - वेदाङ्ग आदि शास्त्र अहमहमिकया उपस्थित होकर प्रेरित कर रहे हों । यह सुस्पष्ट हो है कि ' तस्मिन् विज्ञाते सर्व विज्ञातं भवति । ब्रह्मज्ञान द्वारा समस्त विषयों के अलौकिक ज्ञान से यह प्रतिफलित होता है कि श्री स्वामीजी महाराज उस कोटि तक पहुँचे हुए हैं । आपने धर्म - रक्षार्थ प्रचुर साहित्य का सृजन किया है, अनेकों संस्थाएं स्थापित की हैं और धर्म रक्षार्थ अपरिगणित आन्दोलन किये हैं । जेल यात्रा से आपने उस युक्ति को चरितार्थ किया कि धर्म - रक्षार्थ श्री रामचन्द्र के सुकोमल चरण कमलों में दण्डक वन के कटक चुभे तो उनके भक्तों की आंखों में भी कंटक चुभे तो विशेषता नहीं । आपके जीवन का प्रत्येक क्षण वैदिक सनातन धर्म की रक्षा के लिये समर्पित है । शास्त्रों में गर्वतोमुखी प्रतिभा सम्पन्न विश्व कल्याण की भावना से भावित हृदय वाले महामनीषियों द्वारा ही ऐसे सत्प्रयास सम्भव हो सकते है । आज से करीब चालीस वर्ष पूर्व श्री स्वामीजी महाराज का हमारे ऊपर अनुग्रह हुआ था । मेरे पूज्य पिताजी स्व ० श्री राधाकृष्णजी धानुका की श्री स्वामीजी के चरणों में अन्त तक अनन्य श्रद्धा बनी रही । श्री स्वामीजी महाराज के कार्यकलापों में सहयोग देना ही वेन कर्तव्य समझते थे । यही कारण है कि उनके पर लोक गमन के उपरान्त भी श्री स्वामीजी द्वारा रचित वेद- भाग्य भूमिका के प्रथम खण्ड का प्रकाशन श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान के द्वारा सम्पन्न हो रहा है । इनका कारण श्री स्वामीजी महाराज की हमारे परिवार पर महती अनुकम्पा ही है । यत् किंचित् सम्भव हो सका है, यह सब इनकी कृपा - कटान का ही फल है । श्री चरणों की सेवा का सुवनर हमें प्राप्त होता है, तो हम अपना सौभाग्य ही समझते हैं । अतः श्री कृष्ण धातुका प्रकाशन संस्थान के द्वारा प्रकाशित वेद भाष्य का प्रथम खण्ड ' त्वदीयं वस्तु हे स्वामि तुभ्यमेव समय के अनुसार विनम्र भाव से श्री स्वामीजी को ही समर्पित करता हूँ । हनुमानप्रसाद धानुका अध्यक्ष श्री राधाकृष्ण धातुका प्रकाशन संस्थान, कलकत्ता ।
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प्रकाशकीय परिचय वेद भारतीय राष्ट्र की ही नहीं, सारे विश्व की महान निधि हैं । भारतीय जन अनन्त काल से इनको परम पवित्र अपौरुषेय शास्त्र के रूप में मानते हैं । वेदार्थ समझने के लिये प्राचीन काल से ही महर्षि यास्काचार्य तथा उनके अनुयायी सायणाचार्य प्रभृति द्वारा रचित वेद भाष्य भारतीय आस्तिक जनों के आधार रहे हैं । परन्तु कुछ देशी एवं विदेशी लोगों द्वारा समय - समय पर वेदों के प्रति अपना पाण्डित्य प्रदर्शन करने का कुत्सित प्रयास किया गया है. जिसके कारण वेदों के अर्थ का अनर्थ, आक्षेप एवं शंकाएँ उत्पन्न होती हैं । , अनाचार - अत्याचार के अधिक बढ़ जाने पर तो भगवान् स्वयं अवतार लेते हैं, किन्तु बीच - बीच में छोटी-मोटी अव्यवस्थाओं को दूर करने के लिये वे सन्त महात्माओं के रूप में भी अवतीर्ण होते हैं । समग्र वेदराशि और वेदार्थ के प्रति श्रद्धालु जनों के मन को कलुषित कर देने वाली अब तक की उक्त परिस्थिति के परिहार के लिये हमारे बीच अनन्तश्रीविभूषित परिव्राजकसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज अवतीर्ण हुए हैं । श्रद्धालु आस्तिक जनों के कल्याण के लिये वे नूतन वेद भाष्य की रचना में संलग्न हैं । यजुर्वेद का भाष्य पूरा हो चुका है और अब वे ऋग्वेद का भाष्य लिख रहे हैं । प्रस्तुत ग्रन्थ उसी भाष्य का भूमिकाभाग है । यह लगभग दो हजार पृष्ठों का ग्रन्थ है, जो दो खण्डों में पूरा होगा । इस सम्पूर्ण भूमिका - भाग का प्रकाशन ' श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान ' के द्वारा सम्पन्न हो रहा है । इस प्रकाशन संस्थान के संस्थापक श्री हनुमानप्रसाद जी धानुका ने यह शुभ कार्य अपने पूज्य पिता स्व ० श्री राधाकृष्ण जी धानुका की पुण्य स्मृति में सम्पन्न कराया है । श्री राधाकृष्ण जी धानुका एक उच्च कोटि के साधक भगवद्भक्त एवं तपोनिष्ठ व्यक्ति थे । उनका जीवन दूसरों के लिये प्रेरणादायक एवं महान आदर्शों का प्रतीक था । अतः हम संक्षेप में यहाँ उनका जीवन परिचय प्रस्तुत करते हैं, जिससे पाठकगण लाभान्वित हो सकें । श्री राधाकृष्णजी धानुका का जीवन परिचय संसृति के अजस्र प्रवाह में इस भूतल पर अनेक सन्त महात्मा भगवद्भक्तों का आविर्भाव होता रहा है । उनमें से अधिकांश के नाम भी विस्मृति के गह्वर में विलीन हो गये । जिनका वर्तमान में इतिहास के पृष्ठों पर आंशिक जीवनवृत्त उपलब्ध है, उन पर दृष्टि डालने से यह प्रतीत होता है कि वे तो कृतकृत्य हुए ही, उनके समकालीन लोग भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे । तदनन्तर उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर अंकित साधनप्रणाली और जीवनवृत्त के अवलोकन से अनेक लोगों का जीवन आलोकित होता रहता है । इन्हीं भगवदभक्तों में स्व ० श्रीराधाकृष्णजी धानुका का पुनीत जीवनचरित्र भी विशेष प्रेरणा का स्रोत रहा है । धानुकाजी का जीवन वस्तुतः एक महान आदर्श का प्रतीक था । श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त सनातन धर्म पर बुद्ध निष्ठा, अनिमित्ता भागवती भक्ति, अभावग्रस्त मानवों की अप्रकट रूप से सेवा - ये विविध गुण उनके जीवन में परम पवित्र त्रिवेणी संगम के समान विद्यमान थे । श्री धानुकाजी की साधना जीवन के प्रथम चरण में ही प्रारम्भ हो गई थी । तभी से सांसारिक व्यवहारकार्यों में अरुचि, भगवदभजन में आसक्ति उत्तरोत्तर वृद्धिगत होने से चालीस वर्ष को तरुण अवस्था में ही भगवद्भावरूपी समुद्र की उत्तुंग तरंगों ने सांसारिक बन्धन रूपी श्रृंखला को खण्ड - लण्ड कर डाला । तभी से संसार के कोलाहल से निवृत्त होकर किसा निराले स्थान में साधना - जीवन के ध्येय ज्ञेय की प्राप्ति के लिये वृन्दावनवास को ' यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुरानन्दसच्चिद्धनतामुपैति के आधार पर सर्वोत्तम मान्यता दी । तीर्थवास के नियमानुसार अहोरात्र का सम्पूर्ण कार्यक्रम भगवत् सम्बन्धी क्रियाकलापों में व्यतीत होने लगा । देह निर्वाह के लिये एक समय फलाहार, उषा काल में जागरण, त्रिकाल सन्ध्योपासन, देवषि - तर्पण, देवपूजन, नित्य होम आदि धर्मशास्रोत कर्मयोगपरायणता तथा श्रीमद्भागवती कथा, श्री बिहारीजी का दर्शन, कीर्तनादि भक्तियोग का
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} अवलम्बन करके सम्पूर्ण जीवन ऋषि - मुनियों के समान यापन किया । श्री राधाकृष्णजी धानुका की धर्मशास्त्रों के प्रति दृढ़ निष्ठा के कारण ही पूज्यपाद स्वामी श्रीकरपात्री जी महाराज में अटूट श्रद्धा उत्पन्न हुई और उन्होंने स्वामी जी के कार्यकलापों में सहयोग एवं उनका अनुसरण करना ही अपना पावन कर्तव्य समझा । श्रीस्वामीजी की आज्ञा से रमणरेती वृन्दावन में धर्मसंघ शिक्षा मण्डल द्वारा संचालित धर्मसंघ विद्यालय की स्थापना की, जिसमें करीब २० विद्यार्थियों की निःशुल्क भोजन, आवास और शिक्षण की व्यवस्था चल रही है । विद्यालय के सन्निकट ही दण्डी संन्यासी आश्रम का निर्माण भी करवाया है, जिसमें उनके लिये भिक्षा एवं आवास की व्यवस्था है । सन् १ ९ ४२ में अपनी जन्मभूमि फतेहपुर ( राजस्थान ) में अखिल भारतीय धर्मसंघ का द्वितीय महाधिवेशन बड़े समारोह से सम्पन्न कराने का गौरव भी श्री राधा-कृष्णजी धानुका को ही मुख्य रूप से प्राप्त है । इस प्रकार श्रीस्वामीजी महाराज के चरणों में इनका जीवन पर्यन्त अनुपम श्रद्धाभाव बना रहा । यही कारण है कि श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान द्वारा श्री स्वामीजी महाराज की इस अपूर्व कृति वेदभाष्यभूमिका के प्रथम खण्ड का प्रकाशन सम्भव हुआ । श्री धानुकाजी के हृदय में वाराणसी के प्रति भी महती श्रद्धा थी । उन्होंने काशी क्षेत्र में वृन्दावनबिहारीभवन नाम से एक अतिथिशाला का निर्माण करवाया । श्री धानुकाजी का जन्म फतेहपुर ( राजस्थान ) में वि ० सं ० १ ९ ४६ कार्तिक शुक्ल द्वितीया को तथा गोलोकवास में वृन्दावन वि ० सं ० २०३१ ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को हुआ । इस तरह नौरासी वर्ष की पूर्ण अवस्था प्राप्त कर भगवद् भजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । चालीस वर्ष के वृन्दावनवास में तो आपके जीवन का प्रत्येक क्षण भगवत् सेवा में समर्पित रहा । शमात्र भी लौकिक वार्ता उन्हें सह्य नहीं होती थी । वे सदा शास्त्रविधि द्वारा निर्दिष्ट कर्मानुष्ठान में संलग्न रहे । बाह्याडम्बर, मान - प्रतिष्ठा आदि तो उनका स्पर्श भी नहीं कर पाये थे । मारल्य, सौजन्य आदि शीलगुणों से जीवन भरपूर था । वृन्दावनविहारी के चरणकमलों के मकरन्द का रसास्वादन करते हुए आपने अपनी साधना को लोकनेत्रों में अलक्ष्य एवं अत्यन्त संगोपित रखकर श्रीकृष्ण रसभाव से भावितमति होकर अपने जीवन को कृतकृत्य एवं अनुकरणीय बनाया | श्रीराधाकृष्णजी धानुका के भजन का ही प्रभाव है कि वर्तमान समय में सुसम्पन्न होते हुए भी उनका पुत्रपौत्रादि परिवार परम धार्मिक है, एवं श्रीस्वामीजी का पूर्ण भक्त है । श्री धानुकाजी के अनुसार ही अपनी परम्परा को अक्षुण्ण बनाये हुए है | अतः किसी कवि ने कहा है कि-कुलं पवित्रं जननी कृतार्थं वसुन्धरा पुण्यवती च तेन । अपारमच्चित्सुखसागरेऽस्मिन् लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः ॥ dearer केन्द्र, वाराणमी
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श्रीहरिः कृतज्ञता ज्ञापन इस महान् ग्रन्थ के प्रणयन में प्रारम्भ से लेकर आजतक जिन महानुभावों ने जिस रूप में सहयोग प्रदान किया है, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना हम परमावश्यक समझते हैं । वैसे तो यह कार्य स्वयं जगन्नियन्ता परमेश्वर का ही है. अतः जिन लोगों ने भी अपना बहुमूल्य योगदान इसमें दिया है, उन्होंने शाश्वत धर्मगोप्ता भगवान् विश्वनाथ की ही कृपा से उनकी सेवा की है । क्योंकि इस कार्य से भारतीय हृदयरूप संस्कृति और सनातन धर्म अनुप्राणित हुए हैं । इसलिये उन महानुभावों का स्मरण करना हमारा आवश्यक कर्तव्य हो गया है । श्री पं ० पट्टाभिरामजी शास्त्री ( विद्यासागर ) जिन्होंने इस भूमिका भाग की प्रस्तावना लिखी तथा समय समय पर इस सम्माननीय ग्रन्थ के सम्पादन में अपना बहुमूल्य सहयोग प्रदान किया, तथा पं ० श्री मार्कण्डेय जी ब्रह्मचारी जिन्होंने श्री पूज्यपाद स्वामी श्रीकरपात्री जी महाराज के लेखों की प्रतिलिपि करने, स्थल निर्देश करने, उन्हें अन्वेषण करके उद्धरणों को मूलग्रन्थ से मिलाकर पूर्णरूप से मूल ग्रन्थों के अनुरूप करने, विशृङ्खलित वाक्यों को शृङ्खलाबद्ध करने आदि कार्यों में प्रारम्भ से ही जो परिश्रम किया है, तथा पं ० श्री व्रजवल्लभ जी द्विवेदी जिन्होंने अधिकांश भूमिका भाग का हिन्दी भाषा में अनुवाद किया है और साथ ही ग्रन्थ के सम्पादन में भी जो अपूर्व भूमिका निभाई है, इनके अतिरिक्त श्री पं ० गजानन शास्त्री मुसलगांवकर जिन्होंने ग्रन्थ में कई स्थलों का हिन्दी भाषानुवाद किया है, इन लोगों के प्रति भी हम अपनी कृतज्ञताज्ञापन करते हैं । इसमें यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि अनन्तश्री जगद्गुरु शङ्कराचार्य पुरी गोवर्धनपीठाधीश्वर श्री स्वामी निरञ्जनदेव तीर्थजी महाराज के प्रति भी साष्टाङ्ग प्रणिपात पूर्वक हम कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं, जिन्होंने ग्रन्थ के हिन्दीभाषान्तरित दार्शनिक भागों का विशेषरूप से संशोधन किया और विषमस्थल पर टिप्पणी भी की । इसी परिवेश में इस ग्रन्थ के प्रकाशक श्री हनुमानप्रसाद जी धानुका के लिए भी हम कृतज्ञता प्रकाशन करते हैं, जिन्होंने अपने पूज्य पिताजी ( साम्प्रत गोलोकवासी ) की पुण्य स्मृति में श्री राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन संस्थान की ओर से इस सम्पूर्ण भूमिका भाग के प्रकाशन से उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करना चाहते हैं । साथ ही श्री राधेश्यामजी खेमका, जो श्री स्वामी करपात्री जी महाराज के पूर्ण कृपापात्र हैं, तथा श्रीस्वामीजी के कार्यों में निरन्तर ही यथाशक्ति सहयोग दान करते रहते हैं और इस ग्रन्थ के आदि से अन्त तक सम्पादन और प्रकाशन की व्यवस्था करके प्रशंसनीय कार्य किया है, उनके प्रति भी हम कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं । इनके अतिरिक्त हम अपने अन्य सहयोगियों ( श्री चीमनलालजी अग्रवाल, लाला लछमनदास जी, बाबुलाल जी गडीवाला तथा श्री विद्याभास्कर पण्डित सीताराम कविराज प्रभृति सज्जनों ) के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं. जिन्होंने समय समय पर वेदशास्त्रानुसन्धान केन्द्र के लिये अपनी सेवाएं अर्पित की हैं । अन्त में तारा यन्त्रालय स्वामी श्री रमाशङ्कर जी, ईक्ष्यशोधक श्री हरिवंश त्रिपाठी शास्त्री, विश्वविद्यालय प्रकाशन के अध्यक्ष श्री पुरुषोत्तमदास जी मोदी, वाइन्डर निगम के प्रति भी हम कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं, जिन लोगों ने कि अदम्य उल्लास के साथ अति लगन से शीघ्र और शुद्धमुद्रणादि कार्य सुसम्पन्न किये हैं । शेप में हम भगवान् अकारणकरुण करुणावरुणालय भूतभावन विश्वनाथ के चरणों में सादर सविनय प्रणाम निवेदन करते हुए उनसे प्रार्थना करते हैं कि सभी सहयोगी इसी प्रकार भविष्य में भी वेदशास्त्रानुसन्धान केन्द्र के कार्यो में सहयोग देते रहेंगे और यह केन्द्र सतत अपने अध्यवसाय में अग्रसर होता रहेगा । शीघ्र ही भूमिका भाग का द्वितीय खण्ड भी पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत होगा । तदनन्तर वेदभाष्यों का प्रकाशन आरम्भ होगा । निवेदक स्वामी नन्दनन्दनानन्द सरस्वती मन्त्री, वेदशास्त्रानुसन्धान केन्द्र केदारघाट, वाराणसी ।
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प्रस्तावना अथेदानीं ' वेदार्थपारिजात ' नामा वेदभाष्यग्रन्थोऽनुसन्धातॄणां तस्वविमर्शकानां चिन्तकानां चाध्ययनाय प्रकाशपथमानीयते । अस्य ग्रन्थस्य प्रणेतारोऽनन्तश्री विभूषिताः सर्वतन्त्र स्वतन्त्राः सनातनधर्मसमुज्जीवकाः प्रातः-स्मरणीयाः पुण्यश्लोकाच श्रीकरपात्रस्वामिश्रीचरणाः । तत्रायं वेदभाष्यभूमिकायाः स्वामिचरणविरचितायाः प्रथमो भागः । अस्य द्वितीयो भागो भाव्यं चाश्वेव भागशः पाठकानां करकमतान्यलङ्करिष्यति । स्वामिचरणानां विषये नाधिकमहं विवक्षामि | लोकविश्रुतास्ते त्यागशीला अपि ' ह्रासदर्शनतो ह्रास: ' इति न्यायेनानुकलं क्षीयमाणस्य सनातनधर्मस्य समुज्जीवनाय प्रतिश्वासं यतमाना आ व हितवतः आ च कुमारिकायाः, नेकवारं भारतभूमिमां परिश्रम्यानितरसाधारणी शैलोमास्थाय लोककल्याणाय समुपदिशन्तो लोकाना मनांध्यावर्जयन्तश्च तान् सनातन-सुखान् विवोति न तिरोहितमिदं समेषां भारतनिवासिनाम् । ' धर्मो विश्वस्य जगत: प्रतिष्ठा ' इति प्रमाणानुसारेण जगतः स्थितिर्धर्ममूलेति कथनं पिष्टपेषणम् । तत्राप्यस्माकं भारतमतिचिरन्तनादेव काला धर्मनिष्ठं सद्विश्वस्य जगतो गुरुस्थानेऽवर्तत इति मनुरब्रवीत् । तत्राप्य-स्मदेशं सुमहत्प्रसादरूपेण परिकल्प्य तत्र दृष्टिविधेया ॥ प्रासादनिर्माणाय इष्टकानां सिकलानां स्तुह्याः सुवायाश्चा-वश्यकतेति लोकसिद्धः पन्थाः । तत्र च स्तुही विशिष्टा सामान्या चेति द्विविधा समाश्रीयते प्रासादनिर्मातृभिः, तथैव कन्दमूलफलाशिनश्चिरन्तना अपि द्वितीय तृतीयं च पुरुषार्थमिष्टकास्थाने परिगृह्य धर्म सामान्यता विशेषतश्च स्नुहरूपेण परिकल्प्य विशेषस्तुह्मा इष्टकाः संयाज्याभ्रंलिहा तिनिर्माय ताः सुदृढाभिः शिलाभिराच्छाच दाढर्याय सामान्यस्तुह्या भित्तीरनुलिप्य मोक्षसुवया सम्भूष्यातिमनोहरं प्रासादं सम्पाद्य तत्र सुखेन निवसितुमस्मभ्यं प्रादुरिति वर्णन मन्ये नातिशयोक्तये कल्पेत इति । एतेनार्थकामप्रधानेभ्यो देशान्तरेभ्यो भारतस्य वैलक्षण्यं सिध्यति, भारतस्य धर्मसंवलितार्थ कामप्रधानत्वात् । स्नुहीस्थानापन्नस्य धर्मस्य मूलं वेद:, ' वेदोऽखिलो धर्ममूलम् ' इति स्मरणात् । धर्ममूलं वेद तन्मूलकस्मृति-पुराणेतिहासवपस्याणि च भारतादपास्य भारतं पश्यामो यदि वहि देशान्तरेभ्योऽस्य किं वैलक्षण्यं प्रसिद्ध दिति विचिन्तनीयमेकैकेन भारतभुवि जनिमातस्थुपा मानवेन । भारतमातुः प्राणा वेदा: । प्राणष्वपगतेषु शववदवस्थिते भारते वसन्तो वयं देशान्तरेभ्योऽस्य वैलक्षण्यं कथमिव सम्पादयितुं शक्नुम इति चिरं विभावनीयं सर्वण मानवेन । क्षनेत्र सर्वं जगद् विध्वंसयितुं समर्थान्याणविकान्यस्त्राणि शस्त्राणि नैकविवानि यानानि च निर्माय भरतपूरयितुं सुमतयो विज्ञानिनः कामं भारते भवेयुः, नेतावता भारतस्य वैशिष्ट्य ' सम्पादितं स्यात्, देशान्तरेष्वपि तथाविधानां सत्वात् । ज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानमित्यस्ति श्रेधा विभागः । ज्ञानविज्ञानयोः सातिशयत्वम्, प्रज्ञानस्य च निरतिशयत्वमिति fafe चिरन्तना अस्मदीया निरतिशयस्य प्रज्ञानस्यावाप्तये यत्नशीला अभवन् । सातिशयान् पदार्थातवाप्यापि मानवः किं कर्तुं शक्नुयात् कथं वा मनसः शान्तिमवाप्नुयात्, ततोऽप्यतिशयितवस्तुनः प्राप्तये लोलुप एव मानवः स्यात् । ' अयं तु परमो धर्मो यद् योगेनात्मदर्शनम् ' इत्युक्त्यनुसारेणात्मदर्शनमपि धर्मत्वेनानुसन्दधानाश्चिरन्तना-स्तुरीयपुरुषार्थादपि धर्मस्य ज्यायस्त्वं निश्चित्य तन्मूलभूतस्य वेदस्य परिरक्षणे बद्धश्रद्धा अभवन् । वेदस्य परिरक्षण नाम तदध्ययनं तदध्यापनञ्च । अध्ययनाध्यापनाभ्यामेव वेदः परिरक्षितो भवति । शब्दप्रधानः खलु वेदः । स चायं शब्दसमूहों गुरमुसोच्ारणान्कारमहाज्ञ्यनरेतैवानं शक्यत इति सम्प्रदायः । सम्प्रदायश्चाविच्छिन्नगुरुशिष्य-पारम्पर्येण विद्याप्राप्तिः । अत एव स्वाध्यायाध्ययनं चतुविधेषु उत्पत्याप्तिविकृतिसंस्कृतिरूपेषु कर्मसु आप्तिसंस्कार कर्मेति मीमांसका आचक्षते । एवमस्यां विद्यायां प्राप्तायामध्येतुरात्मनि कश्चनातिशयविशेषो जायते । यथानियमं खलु वेदा अध्येतव्याः । केवलं पुस्तकमवलोक्य पठनं वाचनं वाध्ययनं न परिगण्यते । तत्र कथमिव तादृशसंस्काराहित-स्याध्यापकस्य वाग् वितथा भवेत्? स्वाध्यायाध्ययनं तपः । तपसा च निग्रहानुग्रहशक्ती समुत्पद्येते । नियमाननति-
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६ } ऋम्याधातवेदेन पुरुषेणाभिमन्त्र्य प्रदत्तं भस्म शिशुनां बालानां तां प्रवयां च साधारणान् उदरादीन् व्यावोन् अपाकरोतीति जनपदेष्वस उदन्यप्रवास | पुरा जनपदेषु ग्रामटिकासु च मर्वामु नव वा भिकन आसन् । सादृशाधीतवेदा एव जनतायाः शरणमासत् । यथा शब्दसमूहप्राप्त नियमास्तथेव तदर्थग्रहणेऽपि सम्प्रदायः । सम्प्रदायोऽयं न श्रद्धाविजृम्भितः । वेदार्थनिर्णयेऽपि मन्त्य के नियमा मीमांसकर्वेदान्तिभिरन्यैश्च यास्कप्रभृतिभिर्महर्षिभिः प्रवर्तिताः । यथा जा राज्ञः प्रासाद वे विधान्यभेद्यानि दुर्गाणि भवन्ति तथैव भगवतो वेदपुरुषस्य त anadia, सन्त्यनेकानि शिक्षा-व्याकरणादीनि दुर्गाण महर्षिभिस्तपसा प्रकल्पितानि । न केवल मिदमेव तीर्त्वापीमानि दुर्गाणि न्यायाब्धिरूपं दुर्गम, ताकि केसरिभिः प्रकल्पितं तर्काकूपारदुर्गम्, पुराणाख्यं महासमुद्रम्, धर्मशास्त्ररूपाणि विपिनानि dea वेदार्थाधिगमाधिकारी भवति । तदिदमुक्तम्-' पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । देदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुदश ॥ ' इति । दुर्गमेतादृशेषु सत्स्वपि दुर्गषु, राजानं विध्वंसयितुं कथमपि प्रासादं प्रविशन्त्येव रिपवः । तथैव वेदपुरुषं मूलतः समुच्छेतुमदीया एव बौद्धा भूत्वा वेदबाह्या वेदपुरुष हन्तुमारभन्त । यत्र देवा भवन्ति तत्र भवेयुरसुरा अपि । देवासुरसङ्ग्रामोऽतचिरन्तनः । सत्स्वेव परिपन्थिषु स्यायतस्वमवगतं भवेत् । नीतिपतेनिर्णयाय वादिप्रतिवादिनोरुभयोः कथमावश्यकं भवति । वेदपुरुषं बौद्धराक्रम्यमाणं विलोक्य कार्तिकेया भट्टपादरूपेण शङ्करख भगवत्पादरूपेण जगत्यवतीणीं । बौद्ध धर्ममूल शब्दसमूहं वेदमेव समुच्छेत्तुमारभन्त । तदिदं मूल भट्टपादा भगवत्पादाश्च परिरक्षित-वन्तः । कालगत्यनुसारेण वेदाध्ययनतदर्थावगमसम्प्रदायः पुनरपि भारते किञ्चिदिव प्रवर्तते स्म । अस्य सम्प्रदायस्य परिपोषकाः श्रीमद्भुदयनाचार्य - सर्वमन्त्रस्वतस्त्रावाचस्पति मिश्र - श्रीमदप्पयदीक्षितेन्द्रप्रभृतयो महामनीषिणः । सर्वोऽपि दार्श-निक: पृथगेक वेदाविरोधेन पन्थानं परिकल्प्य मच्छति । गच्छन् मध्येमार्ग परैः प्रक्षिप्यमाणान् कण्टकान् प्रस्तरखण्डान् वा दूरीकृत्य स्वीयं दर्शनसम्बद्ध मार्ग निष्कण्टकं विदधाति । तथापि स्वयूथ्यैः वेदमार्गानुसारिभिः प्रक्षिप्यमाणान् वान् तत्परवर्तिनी युक्तिभिरुत्सारयन्ति । एवमास्तिकदर्शनेषु प्रतिदर्शनं खण्डनमण्डने स्तः । एकेनापरं दर्शनं खण्डितमिति तस्यानुपादेयत्वं नान्यो मन्यते । मिथो विरुद्ध सिद्धास्तावलम्बिनोऽपोम एकीभूय नास्तिकदर्शनानि ' वयं पचोत्तरं शतम् ' इति न्यायेन तम्मतखण्डने मिलिता भवन्ति । प्रस्तुतग्रन्थस्य दार्शनिकभूमिकाभागे विषयोऽयं विस्तरेण विशदीकृतः । एषा नीतिदर्शनिकानाम् । एवमास्तिक नास्तिकदर्शनानां स्थितौ सत्यां सम्प्रति भारते सत्रिकृष्टकाले नूतनं किश्चिन्मतमाविर्भूतम् । मतमिदमतिभयङ्करम् । नास्तिकास्तु सुलोच्छेदाय प्रवृत्ताः, नवीनमतावलम्बिनस्त्विमे मुलस्यैकं भागं परिगृह्णन्ति, भागान्तरं च कर्तयन्ति, अण्डस्यैको भागो भक्षणाय भागान्तरं च प्रसवायेति यथा । पलितकेशायाः श्रुतंर्मातुः केशाना-मे भागं हता भागान्तरगतान् केशान लुञ्छन्ति । जरसा समाकान्ता माता श्रुतिः किं करोतु? द्रुपदतनयायाः केशाः श्रुतेमतुः केशाकर्षण सम्पति वयं पश्यामः । न केवलमिदमेव श्रुतिमातरमनुसरन्ती प्रवृत्ता युवती मीमांसेत सर्वजनप्रसिद्धम । तस्या युवत्याः शीलभङ्गी न लज्जन्ते । श्रुतेः परिरक्षणाय चिरतः सुमहत महिला कृतं विचारात्मक प्रयोगात्मकं न । अपारे वेदात्मनि जलमिव तिमिङ्गला इव दुष्प्रवेशे त्रिपिने सिंहा एव निःसाध्वसं सचरन्तश्चिरन्तना वैदिकसाहित्यं समुपवू हितवन्तः 1 श्रीपगाणा मध्यवारयन वन सारं परिगृह्य स्मृती:, तद्विचाराय पशूनान विन मनीषिणः पर्येषु । वैधयाना वत्स्वपि freefres व्याकरणादिषु अनेके गाना मीमांसका प्रनिताः । न्यावानां सम्यगिनतव्यमिति सर्वसम्मतः पक्षः । सर्वमिव समवेक्ष्य वेदार्थनिर्णाय पतितव्यम् । -तत्र एव संहिता वेदा:, ब्राह्मणभागो न वेदः, मन्त्रान् विरच्य संहितायां संयोज्य तद्विनियोगाय नूतनानि कर्माणि परिकल्पितवन्तः प्राश्वः साधारणरूपेणावी अस्निहोत्रं दर्शपूर्णमासी चातुर्मास्यान्येवानुष्ठीयमानाभ्यासन् safe a कर्माणि सात्विकानि, अनन्तरं तामसकर्मणां योजनम्, तेपामाडम्बरेणानुष्टानं द्रव्यसङ्ग्रहायेत्यादि प्रलपन्त