वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 211–220
वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 211–220
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बेदापारिजातः द्वीपखविप्लुष्टति मदङ्कं सनानवीजं कुरुपाण्डवानाम् । गोप कुक्षिगत आत्तवको मातुश्च यः शरणं गताः ॥ ( श्री ० भा ० १०१११६ ) या व पाषाणस्तम्भान्नृसिंहस्याविभवः । तथाहि--' सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषित व्याप्तिश्च भूतेष्वखिषु चात्मनः । दृश्यतादनमुद्वहन् स्नम्भे भाषां न भूगं १ भानुषम् ॥ ( श्री ० सी ० ७१८१८ ) विष्णुशिवारिरुपाणाञ्च सर्वत्रैवापासकमानानुभो जायते । दर्शनञ्च तेषां भवत्यतिचापि सम्पते । कुण्ट गोलोकसाः वकैलासमणिट्टीपादिषु सपरिकरस्य सशरीग्स्य भगवतोऽवस्थानं शास्त्रेषु वर्णितमेन । हनुमतो गरुडर में वज्रसंह-जब वज्राप्रतिहतत्वच रामायणभारतादिपु राष्टमेव | योगतत्यादिशास्त्रेषु निर्माणकायानां सिद्धानामपि वर्णनं वृष्य । सगणमेवनेनापि जशनपराहित्यं गोविन्दभगवत्या दोन रसहृदयतन्त्रे रसेश्वरदर्शने व स्पष्टमेव । देवानामिन्द्रा-श्रीपति मनुयाद्यपेक्षयत्वं श्रूयते । " अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति " ( ० ० ६३१ ), “ अपाम सोमवमृता असून " ( ऋ ० ८४८३ ) इत्यादिश्रुतिभिर्देवानाममृतत्यमणिमादिशक्तिमत्त्वं युगपत्नेषु ज्योतिष्टोमादियज्ञेषु सन्निधानश्च सम्पद्यते । लोहमयकुड्यादिव्यवहितेऽपि देशेऽनायासेन सन्निधानम्भवात् सर्वसाधारणशरीरापेक्षया तच्छरीराणां लक्षण्यसिद्धिः । भूरादिस्वलोकान्तानां प्रलयेऽपि भृग्वादीनां महर्लोकनिवासिनामवस्थानं ब्रह्मलोकस्य प्रलयकालपर्यन्ताव-स्थादित्वं श्रूयते तदानन्तग्रह्माण्डाधिपतेर्भगवतो देवदेवस्य सर्वेश्वरस्थातलीलाविग्रहस्य तदीयलोकस्य सपरिकरस्य fired कुतः शङ्खावकाशोऽपि? व्यासस्य कृपया सञ्जयस्यापि स्थूल सूक्ष्म सन्निकृष्ट विप्रकृष्टदर्शित्वं जातम्, किमुत व्यासरूपाणिनादियोगसिद्धस्य? का एकमात्र पौष वण क । " भागात में ही पत्थर के खंभे से भूहि भगवान् प्रादुर्भाव का भी वर्णन है । जैसे कि - " अपने सेवक ( प्रज्ञाब ) श्री वाणों को सत्य सिद्ध करने के दिये और सभी प्राणियों में अपनी व्याप्ति को बताने के लिये उस सभा में वर्तमान स्तम्भ में से ऐसा अनोखा रूप धारण किये भगवान प्रकट हुए, जो कि न तो पूरा मृग रूप था और न मनुष्य का ही । " अर्थात् आधा मनुष्य का आधा सिंह का शरीर भगवान ने धारण किया । के विष्णु शिव नादि के अनेक रूपों का अनुभव उनके फलों को होता है । मक्तिभाव की उत्कृष्टता में उनका दर्श भी होता है । बैकुण्ठ, गणेश वास, कैलास गांणदीप प्रभृति में अपने भृत्यवर्ग के साथ राम्ररीर भगवान् का निवास शास्त्रों में श्री हनुमान और गरुत का गा के समान दृढ और बज्र से भी नष्ट न होने वाला शरीर रामायण, महाभारत आदि में स्वच्छ वर्णित है । योग और सम्मान के ग्रथों में अनेक शरीर निर्माण कर लेने वाले सिद्धों का भी वर्णन मिलता है । रतराव पारद के सेवन सेरी में जारा और मृत्यु का मान गोविन्द भगवत्पाद के रसहृदयतन्त्र नामक ग्रन्थ में तथा रसेश्वर दर्शन ( सर्वदर्शनसंग्रह स्थित ) में श्री शक्ति है । इन्द्र आदि का लता काय देवताओं का शरीर भी श्रुतियों में धनुष्य देह की अपेक्षा अमर पाया गया है | " चातुर्मास्य यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले का पुष्ण अक्षय होता है ", " हम सोम पीकर अमर हो ज f व " इत्यादि श्रुतियों से प्रतीत होता है कि देवता गण मृत्यु से अतीत अणिमादि विद्वियों से अनेक शरीर मनाकर सम्पन्न हो जाते हैं और ये ज्योतिष प्रभृति अनेक अनुष्ठानों में एक साथ ही उपस्थित हो सकती है । लौह की बनी हुई दीवाल जैसे व्यवहित प्रदेश में भी इनका देह जनायास पहुँच सकता है । अत: सर्व साधारण शरीर की अपेक्षा में विलक्षणता माननी ही पड़ती है । भूने लेकर स्वर्गलोक पर्यंत लोकों के कम हो जाने पर श्री मृगु आदि महर्लोक निवासी महर्षियों की ओर ब्रह्मलोक पर्यन्त लोकों की अवस्थिति प्रथम काल पर्यन्त मानी गई है, ऐसी अवस्था में अनन्त ब्रह्माण्डों के अधिपति भगवान् देवों के देव सर्वेश्वर के लीलाविग्रह की और उसके सपरिकर लीलालोक की नित्यता में ter को अवसर भी कहाँ है? व्यास की कृपा से जब संजय भी स्थूल, सूक्ष्म, सन्निकृष्ट, ( समीप ) विप्रकृष्ट ( वर ) वस्तु को देखने में समर्थ हो गये, तो अणिमादि सिद्धियों से युक्त व्याग से मह के विषय में क्या सन्देह हो सकता है?
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१८२ वेदार्थपारिजातः " तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते " ( छा ० उ ० ८ | १ | ६ ) | यद्यत्कृतकं तत्त-नित्यमिति तर्ककृतयाज्जया श्रुत्या देवादिप्राप्यस्यामृतत्वस्यापेक्षिकत्वेऽकर्मफलस्य स्वेच्छामरस्य भगवद्विग्रहस्य तद्धामादे-चापेक्षिकत्वादिकं मन्तव्यम् | सावयवत्वेन कार्यत्वं तेन चानित्यत्वानुमानं शास्त्रविरुद्धत्वादाभास समानयोग-क्षेममेव । अत एव नरशिरःकपालं शुचि, प्राण्यङ्गत्वात् शङ्खशुक्तिकादिवत्; नरमूत्र पवित्रम् सूत्रत्वात् गोमूत्रवत् परस्त्री गभ्या, स्त्रीत्वात् स्वस्त्रीवत् - इत्याद्यनुमानानि यथा शास्त्रविरुद्धत्वादप्रमाणानि तर्थवेश्वर विग्रहाणामनित्यत्वादि-साधकानुमानमपि, अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत् । प्रकृतिभ्यः परं यच तदचिन्यस्य लक्षणम् ॥ ( म ० भा ० भी ० प ० ५/१२ ) इत्यादिपुराणवचनेभ्यः । न च पूर्वोक्तनिरवयवाकायत्वादिबोधकवचनविरोधः, रूपमेदेन तदुपपत्तेः । यथा -- " हे बाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तञ्चैवामूर्तच " ( बू ० उ ० २२३ | १ ) इति श्रुत्या ब्रह्मणो मूर्तीमूर्तभेदेन रूपद्वेविध्यं ज्ञायते तथैव परमेश्वरस्य निर्गुण निराकारसगुण निराकार - सगुण साकारभेदेन रूपश्रयव्यवस्थाप्युपपद्यत । जीवस्यापि स्वतोऽदेव देवत्वं कर्ममूलकं भवति, ' अशरीरं वावसन्तं नैनं प्रियाप्रिये स्पृशत: ' ( छा ० उ ० ८/१२/१ ) इत्यादिश्रुतेः । तथैव पोश्वराय स्वताशेषविशेषा-तीतस्य निर्गुणत्वे निराकारत्वे व सत्यप्यचिन्त्यानिर्वाच्यया दिव्यशक्त्या अनन्तकल्याणगुणाकरणादिकन्दर्पदर्पदलन-पटुतमश्रीविग्रहवत्वञ्च नानुपपन्नम् । भगवत्स्वरूपसत्वापेक्षया किञ्चिन्न्यूजसत्ताकत्वेन सप्तप्तसत्ताकत्वाभावनाद्वितीय-त्वादिकमपि भगवतो न विरुद्धयत । यथा ' राजराजः साक्षान्मन्मथमन्मथः, सूर्यस्यापि भवेत्सूर्यः अनेनः प्रभोः प्रभुः ' " जैसे यहाँ पर कम से संचित इस लोक का सुख क्षीण हो जाता है, उसी तरह पुण्ष में ति परलोक के सुख क. भी क्षय हो जाता है " यह श्रुति ' जो जो कृतक है, वह वह अनित्य हैं ' इस तर्क के सहारे देवादि के द्वारा अनुलको कापेक्षिकता को बताती हुई स्वेच्छामय भगवद्विग्रह और उसके धाम के कर्मसापेक्षता के अभाव में उनकी निरपेक्ष अमृता का पतिपादन ही है । सावयवत्व से atra का और कार्यत्व से अनित्यत्व का अनुमान शास्त्रविरुद्ध होने से आभास के समान ही माना जायगा । दिये " मनुष्य का sure fear है, क्योंकि शंख, शुक्ति आदि की तरह वह भी प्राणी का अंग है ", " मनुष्य का मूत्र नियोकि कामुकी तरह सूत्र है ", " रस्त्री है, क्योंकि यह भी अपनी स्त्री के समान स्त्री है " तरह के अनुमान जैसे शास्त्र विरुद्ध होने में प्रामाणिक नहीं माने जाने, उसी तरह ईश्वर के शरीर को अनित्य बताने वाले नुन भी प्रामाणिक नहीं माने जाते । जो HTET after लोकिक दृष्टि से समझ में न जाने वाले हैं, उनको तर्क कोशिश नहीं अपनी चाहिये । जो स्वभाव प्रकृति से परे हैं, उसी को अचिन्त्य कहा जाता है " इत्यादि पुराण वचन इसी बात को सिद्ध करते हैं । इस तरह से परमेश्वर के निरवयवत्व और अशरीरत्व की प्रतिपादक पूर्वोद्धृत श्रुतियों का विरोध इसलिये नहीं होगा कि स्वहा भेद से उन दोनों तरह की afat का उप urat fe या जा सकेगा | जैसे कि " ब्रह्म के दो हैं, एक मूर्त बीर इस अमूर्त ' इस पुति में ब्रह्म के भूर्त और अमूर्त ये दो रूप बताये गये हैं, उसी तरह से परमेश्वर के निर्गुण - निराकार, सगुण - निराकार और सगुण - साकार इन विविध रूपों की व्यवस्था मानी जाती हैं । जीव की स्वतः देह से रहित ही है, किन्तु कर्मों के कारण उसका देह से सम्बन्ध हो जाता है, " जब इसका शरीर से सम्बन्ध का भान छूट जाता है तब इसको सुख और दुःख विकृत नहीं कर पाते " यह श्रुति इसमें प्रमाण है । इसी तरह से परमेश्वर के स्वतः समस्त विशेषणों से प्रतीत होने के कारण निर्गुण - निराकार होने पर भी अचिन्त्य, अनिर्वाच्य दिव्य शक्ति के कारण अनन्त कल्याण गुणों के खजाने और अनन्त कोटि कामदेवों के दर्प को दलन करने में समर्थ श्रीविग्रह ( शरीर ) मानने में कोई बाधा नहीं होगी । भगवान् के स्वरूप की सत्ता की अपेक्षा किसी दूसरे की सत्ता कुछ न्यून ही होगी । अतः समान सत्ता के अभाव में भगवान् के अद्वितीयत्व में कोई विरोध नहीं उठ पायेगा | जैसे ' राजाओं का राजा ', ' साक्षात् मन्मथ का भी मन्मथ ' ( कामदेव के मन को भी अपने सौन्दर्य से मथित कर देने वाला ), " वह प्रभु सूर्य का भी सूर्य और अग्नि का भी अग्नि और स्वामियों का भी स्वामी है " इत्यादि प्रयोग देखे जाते हैं, उसी तरह से " सत्य का भी सत्य " इत्यादि प्रयोगों को देखकर सत्य का भेद मान लिया जाता है और सत्य का भी सत्य परमार्थसत्
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वेदार्थपारिजातः १८३ इत्यादयः प्रयोगा दृश्यन्नं, तथैत्र ' सत्यस्य सत्यम् ' इत्यादिप्रयोगदर्शनेन सत्त्वभेदाभ्युपगमेन सत्यसत्यस्य परमार्थसतोऽद्वैतस्य भगवतोऽद्वितीयत्वमेव । यत्तु तत्र तत्र भगवच्छराणामुत्पत्तिदृश्यते, तत्वाविर्भावाभिप्रायेणैव वेदितव्यम्, नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमि ततम् । तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ॥ देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं पाविर्भवति सा यदा । उत्पन्नेति तदा लोके मा नित्याऽप्यभिधीयते || इति मार्कण्डेयपुराणोकः । ( अ ० ८१०० ४७१४८ ) यथा शीतयांगेन जलस्यैव हिमकरणादिरूपत्वं भवति, तथैव दिव्यलीलाशक्त्या सच्चिदानन्दघनस्यैव श्रीकृष्णादिरूपेण प्राकट्यम् । तथा मर्षवादव्यचाग्नेर्वाहकत्व काशकत्यविशिष्टाग्निरूपेण व्यक्तिः, तथैव जगदुत्पतस्थितिलयलीलस्य भगवत एव भक्तानुग्रहदशात् तत्तद्विग्रहवत्वेन प्रादुर्भाव ।
तवत्र-सकृद्यदङ्गप्रतिमान्तराहितां मनोमयों भागवतीं ददौ गतिम् ।
स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभिव्युदस्तमा योऽन्तोहि किं पुनः ॥
( श्रीमद्भागवत ० १० / १२ / २ ९ ) सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः | अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि हयुपनिषदृशाम् || इति । ( मद्भागवत ० १०/१३/५४ ) अत्र प्रथमोऽवासुरबदनप्रविस्य भगवतो नित्यात्मसुखानुभूत्यभिव्युदस्तमायत्वमुकम् । द्वितीये तु ब्रह्मणाऽ-नुभूयमानानां वत्सवत्पपादिरूपेणाभिव्यन्यमान भगवत्स्वरूपाणां सत्यज्ञानानन्तानन्दघनत्वमुक्तम् । यदुक्तम् -'निराकारम्य साकार देहो नोपपद्यते इति, तन्मन्दम्, निराकाराणामेव जीवानां देहवत्वदर्शनात् । न्याय-वंशेषिक - सांख्य - योगादिमते व्यापकानां निराकाराणां ज्ञानवतां ज्ञानरूपाणां वा निराकारत्वमेव । शैववैष्णवानामणुरूपाणां चिकणानामपि निराकारत्वमेव । तथैव निराकारस्य देहवत्त्वं न नोपपद्यते । किञ्च सृष्टिरेव साकारा निराकारा-अतीय माना जाता है । कहीं - कहीं पर जो भगवान् के शरीरों की उत्पत्ति देखी गई हैं, वह केवल आविर्भाव ( प्राकट्य ) पं अभिप्राय से है, जैसा कि मार्कडेपूण के इस मन में कहा गया है -- " सारे जगत् की प्रतिरूप वह भगवती नित्य है उसी से यह सारा जगत् व्यास | तो भी यह अंक प्रकार से प्रकट होती है, उसको तुम मुझसे सुनो । जब वह भगवती देवों के कार्यों को पूरा करने के लिये प्रकट होती है, तब लोक में यह जत्पन हुई, ऐसा कहा जाता है, यद्यपि वह है नित्य ही । " जैसे शीत के रोग से जल ही लिम ( अ ), करका ( आला ) आदि का रूप घर लेता है, उसी तरह से दिव्य लीलाशक्ति से सचिदानन्दश्वर ही श्रीकृष्ण आदि के रूप में प्रकट होते हैं । जैसे लकड़ियों को आपस में रगड़ने से दाहकत्व, प्रकाशकत्व आदि गुणों से युक्त aft की होती है, उसी मच्छ से जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय की लीला करने वाले भगवान् ही भक्तो पर अनुग्रह करके किये श्रीराम, श्रीकृष्ण यादि का रूप धारण कर प्रकट होते हैं । श्रीमद्भागवत के वो श्लोक इस प्रसंग में ऊपर सूत्र में उद्धृत किये गये हैं । प्रथम श्लोक में अघासुर के मुँह में प्रविष्ट भगवान् को माया बताया गया है, क्योंकि उनको नित्य आत्मसुख की अनुभूति बनी रहती है । दूसरे श्लोक में ब्रह्मा के द्वारा देखे जा रहे गोवल्ल गोष आदि के रूप में भक्त भगवत्स्वरूपों की सत्य, ज्ञान, अनन्त आनन्दघनता बताई गई है । निराकार का शाकार देह नहीं हो सकता, यह कहना इसलिये गलत है कि निराकार जीवों का देह प्रत्यक्ष सिद्ध है | न्याय, वैशेषिक ator, योग आदि सभी दार्शनिकों के मत में are fr राकार, ज्ञानवात् अथवा ज्ञानस्वरूप आत्मा निराकार ही माना गया है । और वैष्णवों के मत में अणुरूप चिदात्मा भी निराकार हो है । उसी तरह निराकार की देहवत्ता क्यों न उपपस हो सकेगी? दूसरी बात यह साकार सृष्टि भी तो निराकार से ही पैदा होती है । गन्धरहित जल से गन्ध वाली पृथिवी, नीरस अग्नि से रसवात् जल
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१८४ देवोत्पद्यते । निर्गन्धं जलम् गन्धवती पृथिवी भवति, नीरसं तेजः, सरसं जलं भवति नीरूपो बायू रुगवत्तेजो भवति, निःस्पर्शमाकाशं स्पर्शवान् वायुर्भवति । " अजायमानो बहुधा विजायते " ( वा ० सं ० ३१११ ९ ) इति श्रुते । किञ्च येन तेषां तेषां जीवानां कर्मवशादनन्तानि शरीराणि निर्माण प्रदीयन्ते तेन स्वशरीरं निर्मातुं न पार्यत इति का बायोयुक्तिः? ननु परमेश्वरस्य जगन्निर्माणि प्रवृत्तिः स्वार्था परार्थी वा? नाद्यः अवातसमस्तकामस्य तदनुपपतेः । न द्वितीयः, करुणया परार्थप्रवृत्तौ सुखिनामेव प्राणिनां सृष्टिप्रसङ्गात् । दुःखवलानां निर्माण करुणाविरोधात् । स्वार्थनैरपेक्ष्येण परदुःख-ग्रहाणेच्छाया एव कारण्यादिति चेन्न, सृज्यमानप्राणिकृतसुकृतदुष्कृतपरिपाकविशेषात् सकरुणस्यापि विजमसृष्टिनिर्माण प्रवृत्ति-सम्भवात् । न चैनं स्वातन्त्र्यभङ्गापत्तिः स्वाङ्गं स्वव्यवधायके न भवतीति न्यायेन तन्निर्वाहात् । श्रुतिप्रमाणकत्वेऽपि नान्योन्याश्रयता, विकल्पासहत्वात् । तथाहि -- उत्पत्तौ शो वा परस्पराश्रयः? नाद्यः, यागमस्येश्वराधोनोल तिकत्वेऽपि परमेश्वरस्य नित्यत्वेनोत्पत्तेरनुपपत्तेः । न द्वितीयः परमेश्वरस्यागमाधानज्ञप्ति - त्वेऽपि तस्यान्यतोऽवगमात् । तस्माद अक्कुन्तनु - भुवनादीनां कर्तृत्वादेव भगवतः सर्वशत्यं सर्वकरणसमर्थत्वं च विज्ञायते । यथान्तर्भादित प्रभावितान एव दीपः प्रादुर्भवति तथैवान्तर्भावितसर्वशत्व एवं विश्वकर्ता परमेश्वरः पिवति । कुमाइयों यथो-पादानोपकरणसम्प्रदानप्रथाजनाभिज्ञा भवन्ति तथैव परमाणुचतुष्टयक्षेत्रज्ञतत्समवापिदिवि एवं विवार्ता परमेनः । होता है, रूपरहित वायु में रूपवात् तेज होता है, स्पर्शरहित नाफात के स्पर्शनान् वायु पैदा हो जाता है । " यह अत्मा पलाना ही अनेक रूपों में पैदा होता है " यह श्रुति का भी स्पष्ट कम है । यह बात भी है कि जो ईश्वर मन पोवों के कर्म के अनुसार उमन्त शरीरों का निर्माण कर उन जीवों को प्रदान करता है, क्या यह अपने शरीर के निर्माण में नहीं हो सकता? क्या बाका ऐसा पथन पक्ति होगा? प्रश्न है कि परमेश्वर की जगत् के निर्माण में प्रवृत्ति स्वार्थ के लिये है या परार्थ के लिये? परमेश्वर को पर कुछ प्राप्त है, अतः उसकी स्वार्थ के लिये प्रवृत्ति नहीं हो सकती । परार्थ से श्री प्रवृत्ति नहीं होगी, करण से यदि वह होली प्राणियों की ही सृष्टि करना चाहिये । दुःखमिश्रित जीवों के निर्माण में करना कहाँ रहो? तिना सार्थ की अपेक्षा के के दुःख को दूर करने की इच्छा हो तो कष्णा कहलाती है । इसका उत्तर यह है -सृभ्यमान प्राणियों के सुक्त और दुष्कृत कर्मो के पारपण ( फल देने के लिये तत्पर ) के कारण कारुणिक होते हुए भी परमेश्वर को विपक्ष सृष्टि का निर्माण करना पड़ता है । ३७ त ह से तो परमेश्वर को स्वतन्त्रता भंग हो जायगी? इसका उत्तर है कि अपना ही अंग अपना श्रावधानकारक नहीं जाना जाता अर्थात् ये सुकृतदुष्कृत भगवान् के ही अंग हैं, इसलिये उनके बीच में आने पर भी परमेश की ताकि प्रकार से भी भंग नहीं होती । भूति को परमेश्वर की सत्ता में प्रमाण मानने पर वन्योन्याचा दोष भी नहीं होगा, क्योंकि भागे दिये जाने वाले विकल्प सा यहाँ कोई उत्तर नहीं है । जैसे कि यह परस्पराजय दोष उत्पत्ति में होगा या ज्ञप्ति में? यह उत्सति में नहीं होगा, क्योंकि व्यागम की उत्पत्ति ईश्वराधीन मानने पर परमेश्वर की नित्यता के कारण अपत्ति नहीं बनेगी । द्वितीय पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि परमेश्वर की आगमाधीन शति होने पर भी अनुमान वादि अन्य द्वारों से भी वह हो सकती है । इसलिये अंकुर, शरीर, भुवन ( चतुर्दश दोष ) आदि के कत होने के कारण ही भगवान् सर्वज्ञ हैं और सभी पदार्थों की रचना करने में समर्थ भी है, यह समझना सरल है । जैसे अपने भीतर के प्रकाशपुंज को प्रकट करता हुआ ही दीपक जलता है, उसी तरह से अपने भीतर वर्तमान सर्वज्ञता की अभिव्यक्ति से ही परमेश्वर विश्वकर्ता के रूप में प्रकट होते हैं । घट के कर्ता कुलक fte जैसे उपादान, उपकरण, सम्प्रदान, प्रयोजन आदि से परिचित रहते हैं, उसी तरह से चार प्रकार के परमाणु, क्षेत्रज्ञ ( जीव ) और उसमें समवाय सम्बन्ध से रहने वाले धर्म, अधर्म आदि की जानकारी रहने से ही परमेश्वर को इस विश्व का कर्ता माना जाता है ।
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वेदार्थपारिजातः १८५ ननु विश्वस्य सर्वज्ञपूर्वकत्वासाधने दृष्टान्तासिया व्याप्तिग्रहासिद्धिः, विज्ञातृपूर्वकत्वसाधने तु सिद्धसाधनता । किञ्च, बालोन्मत्तादयो न स्वकार्याणामपि प्रयोजनादिवेदिनः निरभिप्रायाणामेव तेषां प्रवृत्तेर्दर्शनात् । बुद्धिमत्पूर्वकत्वं तु विश्वस्यानीश्वरवादिनो मीमांसका अपि मन्यन्ते । तेषामपि कार्यजातस्य कर्मत्वात् कर्मणाञ्च जीवकारणत्वोपपत्तेः । असर्वज्ञपूर्वकत्वेनैव घटादावुत्पत्तिमत्त्वस्य व्याप्त्युपलब्ध्या विरुद्धता चेति कथमन्तर्भावितसर्वज्ञत्व विश्वकर्तृसिद्धिरिति चेन्न, उपलब्धिमत्पूर्वकत्वदिषय - वेऽप्यनुमानस्य तद्विशेषसर्वज्ञपूर्वकत्वविषयसिद्धिसम्भवात् । न च कथमन्यविषयकानुमानेनान्यसिद्धि-रिति वाच्यम्, सामान्यमात्रव्याप्तावप्यन्तर्भावितविशेषस्यैव सामान्यस्य पक्षधर्मतावशेन साध्यधर्मिण्यनुमानात् इतरथा सर्वानुमानोच्छेदप्रसङ्गात् । अत एव वयनुमानमपि न वह्निसामान्यमात्रविषयम्, तस्य प्रागेव सिद्धत्वात् । नापि तद्विशिष्ट पर्वतविषयम्, वह्नित्वसामान्यस्य तत्सम्बन्धाभावेन तद्विशेषणत्वानुपपत्तेः । तथाले गोत्वसमवायाद् यथा पावलेयादयो गावो भवन्ति तथैव वह्नित्वमनागात् पर्वतोऽपि वह्निः प्रसज्यं । यदि तु वह्नित्वेन पर्वतस्य संयुक्तसमवायसम्बन्धोऽस्तीत्युच्येत, तदा तु नातिसंयुकर्षाविशेषसम्बन्धः शवयज्ञान इति वह्निविशेषस्याप्यनुमानमायातमेव । एवमेवेन्द्रियानुमानेऽपि ज्ञेयम् । यद्यपि लोके नेन्द्रियकरणिका काचित् क्रियोपलभ्यते, हिदादपतु कुठारादिसाधना एव । रूपाद्युपलब्धिलक्षणास्तु क्रिया न कुठारादिसाधनः सम्भवन्ति, तथापि क्रियात्वसामान्यस्य करणमात्राधीनत्वव्याप्त्या पक्षधर्मतावशादिन्दिपलक्षणकरण विशेषः सिद्धयति । तथैव प्रकृते बुद्धिमत्पूर्वकत्वकार्यत्वसामान्यव्याप्त्या सर्वज्ञपूर्वकत्व विशेषसिद्धिः । अन्यथा सामान्यस्यापि प्रश्न होता है कि जगत् सर्वक्ष ईश्वर से ही रखा जाता है, ऐसे यदि विश्व की सर्वज्ञपूर्वता विद्ध की जाती है और उसको अनुमान से विट्ट कारवा में तो उसमें दृष्टान्त न मिले व्यक्ति सिद्ध महीं होगा, पथ नैष को हुए चारने के लिए यषि विश्व का जानकार द्वारा रात्रि करना है के सिवा होगी । दूसरी बार नाग्फ उन्मत्त यादि अपने कार्य का भी प्रयोजन नहीं पा क्योंकि पिता दिनी अभिनय के ही उनकी प्रवृत्ति केशी तो है | वो काय भीभावक भी विश्व की च त्रुडिपूर्वक ही मानते हैं । उसके मल में भी कोई भी कार्य किती क्रिया से ही होगा और पाप का कारण कोई जीव ही हो सकता है । पहापि में उपमित्य की व्याप्तिज्ञपुर्वकरणको नही मिलती है, अतः सर्वक्ष को साथ व्याप्ति विरुद्ध हेत्वाभाव से ग्रस्त है ऐसी अवस्था में सर्वशा विणकर्ता को Fefs से होगी? इसका उत्तर इस प्रकार है - अनुमान विषय की उपलब्धि से जाति दान पाने पर भी उपलो विशेष रूप सर्वेशता की सिद्धि हो सकती है । पर्यात् अनुमान से तो हम पलमा कर्ता की ही सिद्धि करणे, किन्तु दिना विशेष के कोई सामान्य होता नहीं । इसलिये सर्वेशरूप विशेष की सिद्धि स्वतः हो जाएगी । सामान्य विषयक अनुमान से विशेष वाव्य को विद्धि कैसे होगी? उत्तर है कि सामान्य मात्र की व्याप्ति में भी विशेषों से गुरु माप को ही पक्षधर्मता भाली जाती है, अत: साध्य वर्गों में सामान्य के साथ विशेष का भी अनुमान से ज्ञान हो सकता है । ऐसा न मानने पर सभी अनुमाव उचित हो जायेंगे । इसलिये ब्रह्नि का अनुमान भी केवल सामान्यमान विषयक नहीं होगा, कि यह तो पहले से ही सिद्ध है । वह्निरिशिष्ट पर्वत भी नहीं है, क्योंकि वह्निल सामान्य से उसका सम्बन्ध न होने से यह पर्वत का विशेषण म बन सकेगा । यदेि ऐसा मान लिया जाय तो जे गोरव के सम्बन्ध से काली - पीली फादि सभी गायें होती है, उसी लख से बॉल सामन्य के सम्बन्ध से पर्यंत मी वह्नि माना जाना लगेगा । यदि यह कहा जाय कि त्वि का पर्वत से संयुक्तरामाय संबन्ध है, तो इस परिस्थिति में अब तक पर्वत के साथ यहि विशेष का सम्बन्ध प्रतीत नहीं होगा, तब तक इसका ज्ञान नहीं हो सकता, पत: वह्नि विशेष का अनुमान हो ही गया । इसी तरह से इन्द्रिय के अनुमान के विषय में भी समनमा चाहिये । यद्यपि लोक में साक्षात् इन्द्रियों से कोई क्रिया नहीं देखी जाती, केदन क्रिया कुठार ( कुल्हाड़ी ) से होती है । रूपादि की ज्ञान रूप क्रियाएँ कु orr से नहीं होती, तो भी जहाँ - जहाँ क्रिया होती है, नहीं वहाँ उनका कोई असाधारण कारण होता ही हैं, इस नियम से पक्षधर्मता के बल मे इन्द्रियरूप असाधारण कारण की सिद्धि होती है । इसी तरह जितने कार्य होते हैं के किसी बुढिया के द्वारा हो होते है, इस सामान्य नियम से ही जगत् के कर्ता सर्वज्ञ ईश्वर रूप विशेष कर्ता की शिद्धि हो जायगी । अन्यथा यापक रूप में अभिमत सामान्य की भी सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि विशेष रहित सामान्य २४
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१८६ वेदार्थपारिजातः व्यापकाभिमतस्याप्यसिद्धिः, निर्विशेषस्य तस्यासम्भवात् । न चान्यां विशेषस्तत्र सम्भवति, अदृष्टादिविशेषानभिज्ञस्यासर्वज्ञ-स्याधिष्ठानत्वानुपपत्तेः । न च साध्यदृष्टान्तयोर्ध मं विकल्पादुत्कर्षापकर्षानुयोगी युक्तः, सर्वानुमानसाधारण्येनानुमानमात्रप्रामाण्य-प्रतिषेधहेतुत्वात् । न च सकल क्षेत्रज्ञसमवायिधर्माधर्मज्ञानकारणाभावेन कथमीश्वरस्य तज्ज्ञानमुत्पद्यत इति वाच्यम्, तज्ज्ञान-प्रयत्नचिकीर्षायां नित्यत्वाभ्युपगमेन कारणापेक्षाऽयोगात् । लोकेऽनित्यस्यैव धानस्य दर्शनात् कथं नित्यज्ञानाभ्युपगम इति चेत्, तर्हि जलादिपरमाणवोऽपि न रूपादिमन्तः प्रसज्येरन् पार्थिवानां रूपादीनां कारणानामुपलब्धेः जलादिषु च तेषा-मकार्यत्वात् । हिमकरकादो रूपादिर्शनात् कार्यद्रव्यगतानाञ्च तेषां कारणगुणक्रमेण भावाज्जलीयानामपि परमाणूनां रूपादिमत्ता ज्ञायते । सदा कारणतया च तद्गतानि रूपादीनि नित्यानीति चेत्, तहींहापि कार्यत्वेनाचेतनोपादानत्वेन वा समस्तज्ञानानुमानात्, तस्य च कारणतया नित्यत्वसिद्धेः समानत्वात् । न चैवमपि संयोगसमवायसम्बन्धाभावात् परमेश्वरः कथं परपुरुषसमवेतौ धर्माधर्मावधितिष्ठतीति वाच्यम्, संयुक्तसंयोगिसमवायसम्बन्धे तदाधिष्ठातृत्वसम्भवेनादोषात् । न च तानुकसम्बन्धे मानाभाव इति वाच्यम्, ' ईश्वर: क्षेत्रज्ञ ' संयुक्तः, मूर्तद्रव्यसंयोगित्वात् यथा घट: ' इत्यनुमानस्यैव तत्र मानत्वात् । यथा मूर्तद्रव्यसंयोगी घट: क्षेत्रज्ञसंयुक्तो भवति, तथैव मूर्तद्रव्यपृथिव्यादिपरमाणुचतुष्टय प्रयोजकत्वादीश्वरस्यापि मूर्तद्रव्यसंयोगित्वेन क्षेत्रज्ञसंयोगिसमवायसम्बन्धेनेश्वरः परात्म-समवेत धर्माधर्मावधितिष्ठति । संयोगोऽप्यन्दतरोभयकर्मसंयोगानां तत्कारणानामभावादजन्य एव । धर्माधर्मयो कहीं भी मिलता ही नहीं । दूसरी कोई विशेषता वहीं मन नहीं सकती, अट ( धर्म ) बादि विशेषताओं से अनभिज्ञ असर्वज्ञ, उनका अधिष्ठान नहीं हो सकता । यह कहना गलत है कि साध्य और दृष्टान्त में धर्म के भेद के कारण उत्कर्ष और अपकर्ष का विचार हो सकता है, क्योंकि यह बात सभी अनुमानो में सामान्य रूप से लागू होती है, अतः सभी अनुमानों के प्रामाण्य का निषेध होने लगेगा । यह पूछना भी गलत है कि सफल क्षेत्र में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले धर्म और अधर्म के ज्ञान का कोई कारण न होने से ईश्वर को सबके धर्मा का ज्ञान से होगा? क्योंकि ईश्वर के ज्ञान, प्रयत्न, चिकोष नियमाने जाते हैं, अत: उनके लिये कारण की खोज अनावश्यक है । लोक में तो ज्ञान अनित्य ही केला जाता है, तब नित्य ज्ञान का स्वाकांत कैसे मानी जा सकती है? इसका उत्तर यह है कि ऐसा मानने पर तो जऋषि के परमाणु भो रूपादि से मुक्त न बन सकेंगे, क्योंकि पार्थिव परमाणु हो पृथ्वी के रूपादि के कारण हैं, वे जलादि में अपने कार्य को नहीं पैदा कर सकते । जल से पैदा होने वाले सर्फ, ओले प्रभृति में रूपादि दे जाते हैं और कार्य में इनकी स्थिति कारण में स्थिति के आधार पर ही हो सकता है, इस अनुमान से लोग परमाणु में भी रूपादि का ज्ञान होता है । यदि मलादिप माणु-गत रूपादि में सदैव कारणता विद्यमान है, इसलिये उनमें रहने वाले रूपादि नित्य हैं, तो उसी तरह से यहां भी कार्य हेतु से अथव अपादानत्व हेतु से समस्त ज्ञान का अनुमान कर लेना सरल होगा और कारण होने से उसकी नित्यता मी स्वतः सिद्ध हो जायगी । इतने पर भी ईश्वर दूसरे जीवों में रहने वादे को पिना जाने कैसे आधार बनाता है? क्योंकि दूसरों की आत्मा में रहने वाले धर्म का ईश्वर के साथ संयोग, समवाय आदि कोई सम्बन्ध तो है नहीं, ऐसा शका नहीं करना चाहिये । कारण --- संयुक्त संयोगी समवाय सम्बन्ध दूसरों की आत्मा में रहने वाले धर्मों के साथ Fer हो । उन्हों का आधार बनाकर ईश्वर के फल देने में कोई दोष नहीं है | इस तरह के सम्बन्ध में क्या प्रमाण है, यह कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि घर जैसे रूपवान् द्रव्य का संयोगी है वैसे ईश्वर भी रूपवान् द्रव्य का संयोगी होने के कारण जीव से भी संयुक्त है हो । यह अनुमान हो उसमें प्रमाण है । जिस रूपवान् द्रव्य के साथ संयोग वाला घड़ा जीव से संयुक्त है, वैसे ही रूपवान् द्रव्य पृथिवी आादि वार परमाणुओं का प्रयोजक होने के कारण ईश्वर भो रूपवान् द्र का संयोगी है । अतः रूपवान् द्रव्य संयोगी होने के कारण घड़े में जैसे जीव का संयोगी सिद्ध है, वैसे ही रूपवान् द्रव संयोग होने के कारण ईश्वर में भी जीव का संयोग सिद्ध हो ही जायमा । तब परमाणु से संयुक्त ईश्वर, ईश्वर से संयुक्त जीव, उस जीव में ( समवाय सम्बन्ध से ) रहने वाले धर्माधर्म, इस प्रकार ईश्वर का संयुक्तसंयोगी समवाय सम्बन्ध से जीव में रहने वाले धर्माधर्म के साथ भी सम्बन्ध हो ही गया, अत: उन्हें जानकर उनके आधार पर विविध प्रकार के सुख - दुःख वाले जीवों को ईश्वर पैदा करता है, ऐसा मानने में कोई दोष नहीं है | संयोग भी एक दूसरे और दोनों के कर्मों के संयोगों का और उनके कारण न होने से यहाँ पैदा होने वाला न
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वेदार्थपारिजातः $ 29 कार्यारम्भाभिमुख्येनैव प्रवृत्तिः । सा च देशकालादिवदीश्वर प्रयत्नमप्यपेक्षते । न च स्वधर्मागृहीतानां परमाणूनां परसमवेत-धर्माधर्मयोश्च कथमीश्वरः प्रेरक इति वाच्यम्, स्वधर्मानुपगृहीतस्य विषयस्य विषविद्याविदेव परेशेन तत्प्रेरणसम्भवात् । ज्ञानादीनां नित्यत्वेन शरीरनैरपेक्ष्येणैव सर्वकार्यकरणसामर्थ्यमपि तेन सूपपादम् । तन्मात्रादेव परमानदृष्टादीनां प्रवृत्तौ तनुभूरुहादिकार्योपपत्तेः । ननु नेश्वरः कर्ता, प्रयोजनाभावात् अनित्वमीश्वरविज्ञानं विज्ञानत्वात् -- इत्यादिप्रत्यनुमानानि बाधकानोति चेन्न, धमिप्रसिद्ध प्रसिद्धिभ्यां विरोधादाश्रयासिद्धेः । न च बुद्धिमत्कर्तृकत्वमन्तराऽप्यज्ञातरूपाणामिन्द्रियमनसां विज्ञानोत्पत्तिं प्रति जनकत्वाद् वत्सविवृद्धिनिमित्ततयाऽचेतनस्य क्षीरस्य स्वातन्त्र्येण प्रवृत्तेः प्रयत्नमन्तरा वनविटपिना मुत्पाददर्शनाच्च व्यभिचार इति वाच्यम्, तेषां पक्षकुक्षिनिक्षेपेणादोषात् । न च शशशृङ्गस्येवानुपलब्धिविरोधानेश्वरसिद्धिरिति वाच्यम्, अपरोक्षदर्शनानर्हतया परेशस्य तदविरोधात् । अन्यथा सर्वानुमानोच्छेदप्रसङ्गः । शशीयशृङ्कस्य तु गवादिगतस्येव दर्शनानर्हस्या-नुपलब्धिनिराकृतस्य साधनानर्हत्वमेव । न च पक्षेण व्यभिचारः तस्य सर्वत्र सुलभत्वात् । ' नित्येतरत्सर्व सर्वज्ञपूर्वकम्, उत्पत्तिमत्त्वात्, अचेतनोपादानत्वाच्च, यन्नैवं तन्नैवं यथा परमाण्वादि ' इत्यनुमानेनापि परेश सिद्धिः । यदि चेतनाधिष्ठितानि यत्र क्वचन स्थितानि कारणानि कार्य जनयेयुः, तदा न देशकालप्रतिनियतकार्यमुप-लभ्येत । हेदुसमवधानसापेक्षतया में प्रत्येकं कारणैर्जन्यत इति चेत्, तदर्थमेव समवधायकस्य चेतनास्यानिवार्यतया सिद्धेः । मान कर स्वाभाविक ही मानना पड़ेगा | धर्म और अधर्म की प्रवृत्ति कार्यारम्भ की अभिमुखता के लिये ही होती है । देश और काल को तरह इसमें भी ईश्वर के प्रयत्न की अपेक्षा रहती है । अपने धर्म रूप से ज्ञात परमाणु और दूसरों में रहने वाले धर्माधर्म का ईश्वर कैसे प्रेरक हो गाता है? उत्तर है कि विषविद्या का जानने वाला ( स्पेस ) जेते अपने धर्म के रूप से अगृहीत विष का प्रेरक गुंता है उसी त है परमेश्वर में भी यह संभव है । ज्ञानादि की बिल्ला के कारण ही ईश्क शरीर विरका च्व्ह कर हो सभी कार्यो को करने मैं समर्थ है । इतने में ही परमाणु, अदृष्ट आदि की प्रवर्तकता के कारण शरीर, वृक्ष जादि कार्यों की उत्पति वंशव ही राक्षेकं । ईश्वर नहीं है, क्योंकि संसार के बनाने में उसका कोई प्रयोजन नहीं है, ईश्वर का विज्ञान अनित्व है, क्योंकि वह भी विज्ञान है, इस तरह के वीस अनुमान ईश्वर के कर्तृत्व और ज्ञान के लमित्य में बाधक होंगे. यह कहना भी इसलिये ठीक नहीं है कि उक्त अनुमानों में धर्मी को प्रसिद्ध जाने पर विरोध तथा अप्रसिद्ध मागने पर माश्रसिद्धि होगा । बुद्धिमान कर्ता के बिना भी अज्ञात स्वरूप वाले इन्द्रिय एवं मन विज्ञान की उत्पत्ति में कारण होते हैं, बछड़े की वृद्धि के लिये बचेतन क्षीर ( दूध ) को भी स्वतन्त्र प्रवृत्ति होती है, प्रयत्न के जिला भी बन के वृक्षों की उत्पत्ति देखी जाती है. अतः आपके अनुमान में व्यभिचार बोष होगा " यह कथन भी इसलिये ठीक नहीं है शि ये सब पक्ष के पेट में ही समाविष्ट है । अर्थात् तुमको भी पक्ष मान कर इनमें भी इस ईश्वरकर्तृत्व रूप साध्य की सिद्धि पर हैं । पराग के समान ईश्वर का अभाव न मानने पर अनुपलब्धि प्रभाग का विरोध होगा, यह कथन भी गलत है, क्योंकि परमेश्वर को हम प्रत्यक्ष देख नहीं सकते, अतः यहाँ पर अनुपलब्धि का विरोध नहीं होगा । अम्यथा सभी अनुमान उन् हो जायेंगे । शम् ( खरगोश के सींग ) की तो अनुपलब्धि इसलिये मान ली जाती है कि यदि वह होता तो पार नादि के सोंग के समान उपलब्ध होता, अतः शराग के दृष्टान्त मे हम ईश्वर का असर सिद्ध नहीं कर सकते । पक्ष के साथ व्यभिचार भी नहीं है, क्योंकि पक्ष तो सर्वच बन सकता है । नित्य पदार्थ के अतिरिक्त सभी पदार्थ सर्वज्ञ से उत्पन्न हुए हैं, क्योंकि वे उत्पत्ति हैं और अवेतन उपादान कारण वाले हैं, जो उत्पत्ति बाले और अचेतन उपादान वाले नहीं हैं वे उत्पत्ति वाले भी नहीं है, जैसे कि परमाणु इस अनुमान से भी परमेश्वर की सिद्धि होती है । यदि चेतन से अनविष्टित जहाँ कहीं स्थित कारण कार्य को पैदा करने लगे तो देश और काल की व्यवस्था कार्य के साथ नहीं रहने पावेगी | कारण को कार्य की उत्पत्ति के लिये हेतु के सान्निध्य की अपेक्षा रहती है । इसीलिये चाहे जो कार्य चाहे जिस कारण से अथवा चाहे जिस देश - काल में उत्पन्न नहीं होता, ऐसा मान लेने पर तो चेतन का सांनिध्य मानना भी अनिवार्य रूप से
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वेदार्थपारिजाः न च कादाचित्कादृष्टपरिपाकवशात् तदुपपतिः, तस्याचेतनत्वेन समवधायकत्वासम्भवात् । न च तत्र तत्रावस्थितानि दण्ड-चक्र - चीवर मृत्तिकादीन्यदृष्टवशादेव कुलालनैरपेक्ष्येण सन्निधीयन्ते, सन्निहितानि वा कार्यस्येते । अत्र मीमांसका अन्ये च प्रत्यवतिष्ठन्ते - उपादानादिज्ञोऽपि कुम्भकारः कुम्भचिकीर्षुर्भवति कदाचिदन्यदा न भवति । चिकीर्षुरप्यलस तयाऽप्रयतमानो न करोति कुम्भमिति ज्ञानेच्छाकृतिगमुदायजन्य: कार्योत्पादः कथं जानावाद भवति? तथात्वे केवलादग्नेरपि धूमात्पत्तिः स्यात् । न च लाकोत्तरस्पेशस्य ज्ञानमसहायमेन सर्वज्ञनम्, तथात्वे स्वरूपा-विशयस्यैव ज्ञानानपेक्षस्यापि विग्धोत्पादकत्वसम्भवेन ज्ञावस्यापि नरर्थकाप्रसङ्गात् । न च तथापि नासहायादेकस्मात् after कार्यमुत्पद्यत इति वाच्यम्, धर्माधर्मपरमाणूनां साहाय्यसद्भावात् । न चाविनाता न प्रवर्तन्त इति ज्ञानापेक्षापि भवत्विति वाच्यम्, तत्र हेत्वभावात् । कुम्भादिकार्येषु तथा दर्शनादिति चेत्, तर्हि तद्वदेव चिकीर्षाप्रयत्नयोरप्यपेक्षणीयत्वा-पातात् । तत्रापि ज्ञानं चिकीर्षाविशेपे, चिकोर्षा च प्रयत्नभेद उपयुज्यते प्रयत्नापरपर्यायायाः कृतेरेव साक्षात्कार्योदय-हेतुत्वात् । नहि बह्निमन्तरेण तुषक्षेपफूत्कारमात्रेण सिद्धयत्योदनः । यदि तावप्यङ्गीकिये, तदापि तो नित्यानित्यो वा? नित्य कृतमस्य ज्ञानेन चिकीर्षाप्रयत्नोत्पादानुपयोगिना, तयोनित्यतया स्वोत्पादनानपेक्षणाद् ज्ञानस्य साक्षात्कार्या aara | चिकीर्षापि निरधिकैव, निष्पादितकिये कर्मण्यविशेषायिन्याः साधनत्वायोगात् । यद्यनित्य तौ तदापि कारणं वाच्यम् । न च परेशनित्यज्ञानमेव तन्मूलमिति वाच्यम्, आत्ममन: संयोगविशेषसमवायिकारणयोनिको प्रयत्नयोस्तदन्तरा ज्ञानमात्रादुत्पत्तौ तण्डुलमन्तरापि मण्डोत्पत्तिप्रसङ्गात् । न च मुक्तात्ममनोभिः संयोगा अपि सन्येवेति तैचिकीर्षाप्रियत्नप्रचयो जन्ते तत्तत्कार्यानुकूल इति वाच्यम्, विकल्पानुपपत्तेः । अनधिष्टितानां तेषां संयोगानां चिकीर्षाप्रियत्नजनने तैरेव व्यभि आवश्यक हो जाता है । कस्मात् दृष्ट के परिपाक से भी उसकी उत्पत्ति मान लेना युक्तियुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि अचेतन अदृष्ट कभी समय नहीं हो सकता । बलम बल पड़ी हुई दण्ड, चक्र, चीवर, मृत्तिका प्रभृति सामग्री केवल अदृष्ट के कारण बिना कुम्पकार की सहायता के इकट्ठो नहीं हो जाती और संनिहित रहने पर भी कार्य उत्पन्न नहीं कर सकती । यहाँ पर मीमांसक, सांख्य, बौद्ध, जैन आदि ईश्वर को न मानने वाले दार्शनिकों का कहना है कि पूरी साधन सामग्री की पूरी तरह जानकारी रखता हुआ भी कि कुम्हार कभी घट बनाना चाहता है, कभी नहीं । बनाने की इच्छा होते हुए भी कभी बलस्यवश घट नहीं बनाता | अतः कार्य की उत्पत्ति में ज्ञान, इच्छा और कृति की सामूहिक कारणता है, केवल ज्ञान से यह कैसे उत्पन्न हो सकता है? केवल शाम से ही घड़े की उत्पति मान लेने पर तो केवल अग्नि से भी धूम को उत्पत्ति होगी, गोले इन्धन की आवश्यकता नहीं रहेगी । यह कहना कि ईश्वर लोकोत्तर है, उसका ज्ञान ही बिना किसी की सहायता के सब कुछ करने में समर्थ है, ऐसा मानने पर को ज्ञान की भी अपेक्षा के बिना यह स्वरूपातिशय से हो विश्व की उत्पत्ति में समर्थ हो जायगा, ऐसी अवस्था में ज्ञान की भी मावश्यकता है? क्योंकि लोकोत्तर विशिष्ट स्वरूप वाले ईश्वर से ही सब कुछ पैदा हो ही जायगा | विना सहायकों के कोई भी अकेला कुछ कर नहीं सकता, यदि आप ऐसा कहें तो उस अवस्था में धर्म, अधर्म और परमाणुत्रों को सहायक माना जा सकता है । बिना ज्ञान के प्रवृति न होने से ज्ञान की भी अपेक्षा रहेगी, किन्तु आपके इस कथन में कोई कारण नहीं दिखलाया गया है । कुस्मादि कार्यों में देखा गया है कि ज्ञान के आधार पर ही उसमें कुम्भकार को प्रवृति होती है, तो इसी तरह से ज्ञान के समान विकीष और प्रयत्न भी लोक में अपेक्षित रहते हैं । इनमें भी ज्ञान का चिकीर्षा विशेष में और चिकीर्षा का प्रयत्न भेद के रूप आख्यान हो सकता है, कार्य की सिद्धि में तो सीधा उपयोग प्रयत्न शब्द से कही जाने वाली कृति का ही होता है । बिना वह्नि के चूल्हे में तुष डालने और फूक मारने से भाव नहीं पक जाता । यदि चिकीर्षा और प्रयत्न को भी अंगीकार किया जाता है, तो यह बताना पड़ेगा कि ये नित्य है या अभिस्य? यदि ये नित्य है तो चिकीर्षा और प्रयत्न के उत्पादन में अनुपयोगी ज्ञान की अपेक्षा ही क्या है, क्योंकि विशीष और प्रयत्न के नित्य होने से अपनी उत्पत्ति में वे किसी की अपेक्षा न रखेंगे । ज्ञान साक्षात् किसी कार्य का अंग होता नहीं । इन दोनों में भी विकोष निरबैंक हैं, क्योंकि क्रिया के द्वारा निष्पादित कार्य में यह कोई विशेषता नहीं ला सकती । इसलिये उसे कारण मानना ठीक नहीं | यदि ये दोनों अनित्य है । अर्थात् पैदा होने वाली है, तो इनका कारण बताना पड़ेगा | परमेश्वर का दिव्य ज्ञान इलका कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि चिकीर्षा और प्रयत्न दोनों आत्मा और मन के संयोगविशेष रूप असमवायि करण से ही पैदा होते हैं, इस संयोग के ि ar व्यानमात्र से इनकी
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वेदार्थपारिजातः १८६ चार 1 अधिष्ठितानां तत्त्वेऽधिष्ठानार्थ प्रयत्नान्तरापेक्षा, तदर्थञ्च चिकीर्षान्तरजन्मनान्येन प्रयत्नेनाधिष्ठानमपेक्षितम् । तथा चानवस्थानम् । ल च चिकीर्षाप्रयत्नप्रवाहस्यानादित्वान्नानवस्थादोष इति वाच्यम्, जगदुपसञ्जिहीर्षोः परमेश्वरस्य क्षेत्रज्ञेषु प्रतिबन्धनिवृत्तेर्धर्माधर्मनिचयेषूपरते जगति परमाण्ववस्थामापन्ने निर्व्यापारस्य कियन्तं कार्ल स्थित्वा पुनरपि जगञ्चिकीर्षोरपेक्षितयोश्चिकीर्षाप्रयत्नयोः कथमुत्पत्तिः? न तदानीं चिकीर्षान्तर प्रयत्नान्तरं वास्ति, येन मनमां तत्संयोगानामधिष्ठानं स्यात् । न च सवितृप्रकाशवदीश्वरस्य ज्ञानमात्रमिच्छामा प्रयत्न-मात्र या तत्तद्भावभेदोपधानात्तद्विषणं भवतीति युक्तम्, परस्पराश्रयत्वात् । तत्तद्भावोपधाने तत्तद्विषयत्वं तत्तद्विषयत्वे च सति तत्तदुपधानम् | उपधीयमानानधिष्ठाने तदुपधानस्य कार्यस्यानुत्पाद:, तस्य चाधिष्ठानादुत्पत्तेः । नहि पक्षधमंताबला-द्विचारासह विशेष f र्मण्यृपसंहिते । नहि स्वयमनुपपद्यमानमन्यस्योपपादनायालम् । न चाति विशेषे कथमानुमानिकस्य सामान्यस्य सिद्धिरिति वाच्यम् असम्भावितं तादृशं विशेषमास्थाय क्षित्यादी बुद्धिमत्कर्तृकत्वसामान्यस्याप्यसिद्धेः । न चैवं सर्वानुमानोच्छेद:, सम्भवद्विशेपविषयत्वादितरेषाम् । नहि पर्वतवह्निविशेषोऽनुद्भूत-रूपस्पर्शो का तेजसो रूपोपलब्धिसाधनं न सम्भवति, कारणानां विचित्ररूपसंस्थानसामर्थ्यानां तत्र तत्रोपलब्वेः । अपि च त एवाचेतनापादाना उत्पत्तिमन्तो बुद्धिमत्पूर्वका भवन्ति ये बुद्धिमदन्वयव्यतिरेकानुविधायिभावभावाः प्रमाणेनोपधाः, यथा शय्याप्रासादादयः । न तनुभुवनादयः, तथाऽनुपलम्भात् । न च घटादेस्तथोपलम्भाद् गगनादेरनुलति-उत्पत्ति मानने पर चावल के बिना भी माँड पैदा होने लगेगा | मुक्त आत्माओं के मन से संयोग मानकर उससे चिकीर्षा और प्रयत्न की उत्पत्ति यदि मानी जाय, तो आगे दिये विकल्प का कोई उत्तर न बन सकेगा । उक्त संयोग बिना किसी अधिष्ठान के यदि विकीर्या और प्रयत्न को उत्पन्न करते हैं तो उन्हों से व्यभिचार होगा । बब यदि अधिष्ठान होकर उनको उत्पन्न करते हैं, तो के लिये दूसरे प्रयण की अपेक्षा होगी और उसमें लिये चिकीर्षा के बाद पैदा होने वाले अन्य प्रयत्न के अधिष्ठान की अपेक्षा होगी । इस तरह से अनवस्था हो जायगी । चिकीर्षा और प्रयत्न के प्रवाह को अनादि मानकर इसका परिहार नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर को तब जगत् का संहार करने की इच्छा होती है, तब धर्म और अधर्म के व्यापार के उपरत हो जाने से जीवों के प्रतिवन्य निवृस हां जाते हैं और जगत् परमाणु अवस्था में स्थिर हो जाता है । उस समय कुछ समय के लिये निर्व्यापार रूप में स्थित परमेश्वर की जब पुन: जगत् के निर्माण को इच्छा होती है, तो चिकीर्षा और प्रयत्न की उत्पत्ति कैसे होगी? उस समय कोई दूसरी विशेष अथवा प्रयत्न तो है नहीं, जिससे कि यन का और उसके संयोगों का अधिष्ठान न सके । सूर्य के प्रकाश के समान ईश्वर का ज्ञानमात्र, इच्छामान अथवा प्रलमात्र उन - उन भावों में उदित होकर उन उन विषयों के रूप में परिणत हो जाते हैं, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वहाँ पर भी परम्परा दोष होगा, क्योंकि उस - उस भाव के अपमान होने पर तत्तद्विषयकत्व और उस विषय के होने पर तदुपधान माना जायगा । उपधीयमान के अधिष्ठान न होने पर सदुपहित कार्य का उलार नहीं होगा, क्योंकि उसकी उत्पत्ति अधिष्ठात से ही होती है | पक्षधर्मता के बल से समझ में न आनेवाली कोई विशेषता धर्मो में नहीं सिद्ध की जा सकती । जो स्वयं हो युक्तियुक्त नहीं है, वह दूसरे को युक्तियुक्त कैसे सिद्ध कर सकता है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि विशेष के arra में अनुमानिक सामान्य की सिद्धि कैसे की जा सकती है, क्योंकि ऐसा मानने पर इसी तरह के किसी असंभावित विशेष का ara य लेकर मित्यादि के बुद्धिमत्कर्तृकत्व रूपी सामान्य की भी असिद्धि हो जायगी । इस तरह से सभी अनुमानों का उच्छेद भी नहीं होगा, क्योंकि उनके लिये विशेष विषय की संभावना बनी रहेगी । पर्वत में विद्यमान वह्निविशेष रूप और स्पर्श के अनुकूल होने पर भी तेज के रूप की उपलब्धि का साधन न हो, ऐसी प्रात नहीं है । कारणों की विचित्ररूपता, विचित्रसंस्थान और विचित्र सामर्थ्य भिन्न - भिन्न स्थलों में सर्वत्र पाई जाती है । एक बात यह भी हैं कि वे ही अचेतन उपादान कारण अपनी उत्पत्ति में बुद्धि की अपेक्षा रखते हैं, furere are प्रासाद आदि । तनु, भुवन आदि के विषय में ऐसा नहीं देखा जाता । और अनुत्पत्तिमान् गगनादि में नहीं देखा जाता, उत्पत्तिमादि और और व्यतिरेक बुद्धिमत्व के साथ बनता है, जैसे कि शय्या उत्पत्तिमान घटादि में यह अन्वयव्यतिरेक देखा जाता है
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१६० वेदार्थपारिजातः मलस्तथानुपलम्भाद् उत्पत्तिमत्त्वस्य घटादौ तन्वादौ च तुल्यत्वात् तथात्वमिति वाच्यम्, मृद्विकारस्य घटादेर्मनुष्यकार्यत्वा-पलब्धावपि शक्रमूर्ध्नस्तदसिद्धिवत्तन्वादेस्तदसिद्धेः । यथा मृद्विकारत्वसंस्थानयोः समानत्वेऽपि मनुष्य निर्माणान्वयव्यति-रेकानुविधानादर्शनात्र शक्रमूर्ध्ना मनुष्यकार्यत्वम्, तथैव तन्वादेर्बुद्धिमदन्वयव्यतिरेकानुविधायिभावाभावादर्शनान्न बुद्धिमत्पूर्वकत्वसिद्धिः । न चैवं योऽसौ धूमविशेषो वह्निभावाभावानुविधायिभावाभाव उपलब्धः स सर्वो वह्निपूर्वोऽनु न गिरिशिखरवर्ती तथेति कथं ततो वह्नयनुमानम्, सामान्यविषयत्वे तु कार्यकारणभावावधारणस्येहापि साम्यसेवेति वाच्यम्, तथात्वे शक्रमूनऽपि मनुष्यकार्यत्वापत्तेः । यदि तु मनुष्यकार्यघटादिभ्यः शक्रमूर्ध्ना विशेपसम्भवान्न तथात्वम्, तदा तु प्रासादादिभ्यस्तनुभुवनादीनामपि वैशेष्यमस्त्येवेति समानम् । नन्वेवं धूमविशेषाणां वयन्वय-व्यतिरेकानुविधायिनां पर्वतधूमात् स्वरूपेण विशेषः हेतुसमवधानं त्वदृष्टविशेषात् सम्भवत्येव ततश्च कार्यनियमसिद्धेः । न खलु नियतप्रकारसामर्थ्येभ्यः कारणेभ्यः कार्यमनियमेनोत्पत्तुमर्हति । अन्यथा कर्तृचैतन्येऽप्ययं दुर्वारः प्रसङ्गः, तस्यापि कारणसामर्थ्यानुरोधेन नियोजकत्वात् । न च चेतनमन्तरेण कुम्भादिकारणानि न प्रवर्तन्त इति पृथिव्यादिकारणैरपि न प्रवर्तितव्यम् । कुम्भादिकारणापेक्षया त्वयापि तनुभुवनादिकारणस्य वैलक्षण्याभ्युपगमात् । तथा तनुपृथिव्यादिकारणानि देहबतः प्रयत्नं नापेक्षन्ते स्वप्रवृत्ति प्रति तथैव चेतनप्रयत्नमपि नापेक्षिष्यन्ते किन्त्वदृष्टपरिपाकवत् क्षेत्रज्ञसंयोगादेव प्रवर्त्स्यन्तीति कि तदभिज्ञेश्वरकल्पनया? तनुभुवनादिपूत्पत्तिमत्त्वमात्रं त्वप्रयोजकस्, विशेषप्रयुक्तत्वाद्युपजीवित्येन स्वाभाविक प्रतिबन्धत्ये ( अनोपाधिक-सम्बन्ध ) -वैकल्यात् । तादृक्सम्बन्धतश्च हेतोरनुमानाङ्गत्वम्, अन्यथोपाध्यायदर्शनादेरपि शिष्याद्यनुमापकत्वापातात् । सत्रु ( पर ) आदि में समान है, बतः सभी स्थानों पर मित्र की अपेक्षा रहेगी ही ऐसी बात नहीं है, क्योंकि मिट्टी से बनने वाले पदादि में मनुष्य को कार्यता यद्यपि उपलब्ध होती है, तो भी इन्द्र के मस्तक के समान सतु कादि में भी मनुष्य की कार्यला सिद्ध नहीं की पा सकती । जैसे कि मिट्टी का विकार और इन्द्र का संस्थान समान ही है, किन्तु शन ( इन्द्र ) के सिर के साथ मनुष्य के निर्माण का अन्वयव्यतिरेक नहीं देखा जाता, इसलिये वह मनुष्य का कार्य नहीं हो सकता, उसी तरह से तनु यादि के साथ बुद्धिमान् मनुष्य का अन्वयव्यतिरेक नहीं बन पाता, इसलिये इनकी भी बुद्धिप्रत्पूर्वकता नहीं सिद्ध की जा गणती । प्रश्न है कि ऐसा पर यह जो घृतविशेष वह्नि के रहने पर ही रहने वाला और वह्नि के न रहने पर न रहने वाले स्वमार बाट वा जात के जी रसोई आदि का घूम वह्निपुर्वक अर्थात् यम से पैदा होने पाला और सदा उसी के साथ रहने बाला गये हो मान लिया जाय, किन्तु पर्वत शिखरवर्ती धूम तो इसका नहीं है, अत: उससे बह्नि का अनुमान कैसे होगा? यदि इसको सामान्य विषयक माया आय तो कार्यकारणभाव का निश्चय यहाँ भी समान रूप से हो सकता है । उत्तर है कि ऐसा भागने पर हल के सिर की भी पुष्कार्यता सिंह की जा सकती है, अर्थात् इन्द्र के सिर को भी मनुष्य बना लेगा । यदि मनुष्य के कार्य प्रर्यादि को अपेक्षा कद्र के मस्तक में विशेषता होने से ऐसा नहीं हो सकता, तो इसका उत्तर है कि ऐसी अवस्था में प्रादाददि से भी तो त, भुबन यादि की विशेषता है ही । वह्नि के साथ देखे गये अन्वयव्यतिरेक वाले धूमविशेषों की पर्वत स्थित घुम से इस तरह की विशेषता सिद्ध नहीं हैं, हेतु का समवधान तो ट के कारण हो हो सकता है, इससे कार्य नियम भी सिद्ध हो जायगा । ऐसा नहीं हो user fr प्रकार के सामर्थ्य वाले कारणों से कार्य अनियल रूप से उत्पन्न हो । अन्यथा कर्ता के चैतन्य में भी यह मव्यवस्था अनिवार्य हो जायगी, क्योंकि उसकी भी नियमन कारण की सामर्थ्य के अनुसार होने लगेगा | ऐसा नहीं माना जा सकता कि वेतन के बिना कुम्मादि के कारण प्रवृत्त नहीं होते हैं, तो पृथिवी आदि के कारणों की भी प्रवृत्ति बिना चेतन के नहीं होनी चाहिये । आपने भी कुम्भावि के कारणों की अपेक्षा नु सुवगादि के कारणों में वैहक्षण माना है । जैसे तनु, पृथिवी प्रभूति के कारण अपने प्रवृत्ति के लिये देहवान् के प्रयत्न की अपेक्षा नहीं रखते, उसी तरह से वेतन के प्रयत्न की भी उनको अपेक्षा नहीं रहेगी । किन्तु अहह के परिभाषा के कारण क्षेत्रज्ञ का संयोग होने पर उनकी प्रवृत्ति हो जायगी । इस प्रकार यहाँ पर अहहादि के ज्ञाता सर्वज्ञ ईश्वर की कल्पना क्यों की जाय? तनु, भुवन आदि में केवल उत्पत्तिमत्स्य की प्रयोजकता नहीं मानी जा सकती, अर्थात् उत्पत्तिमान होने के कारण ही चेतन-कर्तृता नहीं मानी जाती, क्योंकि इसमें विशेष प्रयुक्तत्व जैसी उपाधि की सापेक्षता के कारण स्वाभाविक प्रतिबन्ध, अर्थात् अनोपाधिक