वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 201–210

वेदार्थ पारिजात - १ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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देवार्थपारिजात: १७४ to सावयवत्वं किमवयवसंयोगित्वम् ( १ ), अवयवसमवायित्वम् ( २ ), अवयवजन्यत्वम् ( ३ ), समवेतद्रव्यत्वस् ( ४ ), सावयमबुद्धिविषयत्वं वा ( ५ ) । तत्र न प्रथमः, आकाशादावनैकान्त्यात् । न द्वितीयः सामान्यादौ व्यभिचारात् । न तृतीयः साध्याविशिष्टत्वात् । न चतुर्थः, विकल्पासहत्वात् । तस्य समवायसम्बन्धमान्नवद् द्रव्यत्वे गगनादी व्यभिचारः, तस्यापि गुणादिसमवायस्वद्रव्यत्वयोः सम्भवात् समवेतद्रव्यत्वे साध्याविशिष्टत्वात्, अन्यसमवेतत्वेऽप्यन्यपदार्थेष्ववयवेषु समवायस्य साधनीयत्वात् । एवं सावयवत्वा निरुक्त्या मावयवत्वेन कार्यत्वासिद्धया हेत्वसिद्धिश्रव्यादिति चेन्न समवेत-द्रव्यत्वस्य सावयवत्वोपपत्त्या मावयवत्वेन क्रियावस्वेनावान्तर महत्वेन वा कार्यत्वानुमानस्य सुकरत्वेन हेतुसिद्धेर्निष्प्रत्यूह-त्वात् । न च विरुद्ध हेतुः साध्यविपर्ययव्याप्तेरभावात् । नाप्यनैकान्तिकः, पक्षादन्यत्र वृत्तेरदर्शनात् । न वा कालात्यया-पदिष्टः, बाधकानुपलम्भात् नापि । मत्प्रतिपक्षः, तत्प्रतिभटादर्शनात् । ननु भूधरसागरादिकमकर्तृकम्, शरीराजन्यत्वात्, गगनवद् इत्यस्त्येव सत्प्रतिपक्षानुमानमिति चेन्न, अप्रयोज-कत्वात् । तथाहि -- शरीराजन्यत्वं यदि कर्त्रजन्यत्वव्यभिचारि स्यात् तर्हि किं स्यादिति व्यभिचारशङ्कानिवर्तकतकभावेन कार्य हैं इस तरह के अनुमानों में ईश्वर की मिद्धि की जा सकती है । यह पर कार्यत्व हेतु सिद्ध नहीं माना जा सकता, क्योंकि धर आदि की सावयवता के कारण उनकी कार्यसा मारनी हो पड़ेगी ' यह है कि जो पदार्थ भाव वाले होते हैं, वे सब पैदा होने वाले ही होते हैं और पैदा होने वाले पदार्थो का कोई न कोई कर्ता भी अवश्य होता है । पर्यंत, समुह, सूर्य, चन्द्र आदि संपूर्ण विश्व के वे पदार्थ, बिना तने वाला कोई है या नहीं ऐसा संदेह होता: $ निश्चित ही अवयव आहे है और अवयव वाले होने के कारण किसी के अपायें हुए भी है । जगत् में तो उनका कोई बनाने वाला है नहीं, अतः ईश्वर हो उनका बनाने वाला है यह सिद्ध हो गया । पूर्व करता है कि यह यत्व क्या है? यह योगित्य है या है, वनजन्यान है, सम-तद्रव्यस्य मै अथवा साध्यवदुद्धिविषयत्व है? इनमें से प्रथम अवयवसंयोगित्व को आयल नहीं पारा का समा, क्योंकि ऐसा होने पर हेतु व्याभिचार दल से दूषित हो जायना | शाकाण व रति है, अतः जो कार्य भी नहीं पड़ा जा यह मकता और सकता, क्योंकि ऐसा कार्य नहीं हैं, तो उसे ईश्वर में नहीं का जाल भी सावयवत्व नहीं माना जा मानने पर सम्पादि में भरोषा न्यादि में फार्यता - पाव में भी कि पहल है । aana-अन्यस्य भी सामपन्न नहीं कहलाता, क्योंकि यह देश माध्य ( कार्य ) के समान ही है । समवेत में भी सावयवस्त्र नहीं कहा या सकता, क्योकि यहाँ पर भी जाने दिये गये विकल्प का कोई उसर नहीं बनता । समाद्रव्य से यदि केवल समवाय सम्बन्ध वाले द्रव्य को for ura तो गगनादि में काशिवार होगा, क्योंकि आकाश में भी शब्द गुण समवाय सम्बन्ध से रहता है और द्रव्यत्व भी, अत: वह समवाय वाला द्रव तो हो गया, किन्तु में कार्य शाप नहीं मानते । इसलिये व्यभिचार होगा । अब यदि केवल सपनेस द्रव्य का रस ग्रहण किया जाता है वह भी ष्ण के शान की हो जायगा, क्योकि अन्य में समवेत होने पर भी अन्य पदार्थ के रूप में कल्पित अवयवों में समवाय को अभी सिद्ध करना ही पड़ेगा | सावयववुद्धिविषयता भी स rarara नहीं माना जा सकता, क्योंकि जैन दार्शनिकों के द्वारा स्वीकृत आमा सारयव बुद्धि का विषय तो है, किन्तु उसमें कार्य नहीं माना जाता । अत: व्यभिचार होगा | इस प्रकार याबाबल की व्याख्या न हो पान के rates हेतु से कार्य की सिद्धि भी निश्चित ही नहीं होगी, तब हेतु को aff को बाप कैसे रोक सकते हैं? इसका उत्तर यह है कि समवेत से सावयवत्व को उपपत्ति बन सकती है, अतः सावयवत्व, क्रियावाद अप अवान्तर महत्त्व आदि से कार्यव का अनुमान सरलता से हो जाने से हेतु की सिद्धि में कोई बाधा नहीं है । यह हेतु fear भी नहीं है, क्योंकि आप से उलटी इसकी व्याति नहीं है । अनेकान्तिक ( व्यभिचारी ) भी नहीं है, क्योंकि पक्ष के feeta res इसकी स्थिति नहीं हैं । यह कालात्ययापविष्ट ( ऋषि ) भी नहीं है, क्योकि इसका कोई बाधक उपलब्ध नहीं होता । यह हेतु गत्प्रतिपक्ष श्री नहीं है, क्योंकि इसका कोई प्रतिपक्षी हेतु परिष्ट नहीं है । पूर्वपक्ष का यह कहना कि ' भूवर, सागर प्रभृति अकृत्रिम है, क्योंकि आकाश आदि की तरह मे भी रोग से उत्पन्न नहीं हुए हैं, इस तरह से आपके अनुमान का हेतु सत्प्रतिपक्ष है ', यह कथन इसलिये गलत है कि यह अप्रयोजक है । अर्थात् अनुकूल तर्क

पृष्ठ 202

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१७२ देवार्थपारिजातः व्याप्त्यनिश्चयेन तस्याकिञ्चित्करत्वात् । अजन्यत्वस्यैवाकर्तृकत्वसाधनसमर्थतया शरीरविशेषणस्य व्यर्थत्वाच्च । न चाजन्य-त्वमेवास्तु विशेषणत्वमिति वाच्यम्, व्यभिचारावारकस्य विशेषणत्वासिद्धेः । ननु यत्र यत्र सकर्तृकत्वं तत्र तत्र शरीरजन्यत्वमिति शरीरजन्यत्वस्य साध्यव्यापकत्वेन कार्यत्वाधिकरणे भूधर-सागराङ्कुरादौ तदभावेन साधनाव्यापकत्वाच्च कार्यत्वहेतोरनु सोपाधिकत्वमिति चेत्र, साधकानुमानेऽनुकूलतर्कसम्भवेन कार्यत्वहेतोः सोपाधिकत्वासम्भवात् । कर्तृकं स्यात्ता कार्यपपि न स्यात् । नहि कारणकलापमवधीर्य कार्य सम्भवति, सर्वस्यैव कारणचकस्य कर्तृविशेषोपहितमर्यादत्वात् । कर्तृत्वं चेतरकारकाप्रयोज्यत्वे सति सकलकारकप्रयोक्तृत्वलक्षणं ज्ञान-चिकीर्षा - प्रयत्नाधारत्वमेव । तथा च कर्तृत्वव्यावृत्तेस्तदुपहितसमस्तका रकव्यावृत्तावकारणककार्योत्पादप्रसङ्गः । नहि सम-वधायकं ज्ञानादिमन्तं कर्तारमन्तरेण मृद्दण्डपकचीवरादयस्तन्तुतुरीवेमादयो वा स्वयमेव समवहिता भूत्वा घटं पटं बोत्पादयितुं प्रभवन्ति । तस्माद्यद्यकर्तृकं स्यात् तदा कार्यमेव न स्यात् । कार्य कर्तृजन्यमिति तु प्रत्यक्षसिद्धम् । अतोऽनुकूलतर्केण व्याप्सि-निश्चये भूधरादावपि कर्तुकत्वस्य साध्यस्य सस्वेन तत्र शरीरजन्यत्वस्यासत्त्वेन साध्याव्यापकत्वेनोपाधित्वासम्भवात् । तदुक्तमुदयनाचार्येण-अनुकूलेन तर्केण सनाये सति साधने । साध्यव्यापकताभङ्गात् पक्षे नोपाधिसम्भवः ॥ इति । ( चार शंका के वितर्क ) से रहित है, क्योंकि शरीराजन्यत्व यदि कर्मजन्यत्व का व्यभिचारी हो बाम, वर्षात् शरीर से पैदा न होने वाला भी किसी से पैदा होनेवाला मान लिया जाय, तो इसमें क्या आपति होगी? इस व्यभिचार शंका का परिहार करनेवाले तर्क के अभाव में शरीराजन्यत्व को कर्मजन्यत्व से व्याधि का निश्चय न हो पाने से उक्त सत्प्रतिपक्ष अनुमान अकिकिर ही माना जायगा । केवल अजन्यत्व हो मकत्व के सावन में समर्थ है तो फिर उसके विशेषण के रूप में शरीर को जोड़ता व्यर्थ है । पूर्वपक्षीयदि कहे कि अच्छा है तब केवल जन्यत्व हेतु से ही भूवरादि ही शर्यत सिद्ध हो जायगी, तो इसका उत्तर यह है कि इस हेतु में असिद्ध हेत्वाभास है, अर्थात् भूधरादि की अजन्यता किसी हेतु से सिद्ध नहीं है । असिद्धि के निवारण के लिये ही शरीर विशेषण के रूप में जोड़ा जाता है, तो यह कथन भी इसलिये गलत है कि को गांववार का विचारक नहीं हो सकता, उसकी विशेषणता पिठ नहीं की जा सकती । पुनः प्रश्न उठता है कि जहाँ जहाँ मकर्तृकता है, यहाँ वहाँ शरीरणता रहती है, बर्ण जो पेवा होने वाली यस्तु है, यह शरीर से ही पैदा होती है, अतः यह हेतु साध्य में व्यापक है, किन्तु कापीय के अधिकरण सुपर, सागर, अंकुर प्रभृति ने दवाशेरपत्यता के न रहने से वह साधन ( हेतु ) में व्यान्क नहीं है, अत: कार्यत्व हेतु सोपाधिक क्यों न माना जाय? तरह है कि अनुमान में अनुकूल तर्क के रहने के कारण कार्यश्य हेतु को सोपाधिक नहीं कहा जा सकता । वह तर्फ यह है कि यदि ये कक है तो कार्य भी नहीं होंगे । कारण कलाप की उपेक्षा करके कोई कार्य नहीं हो सकता । काम समूह की यह है कि कोई न कोई कर्ता वहाँ अवश्य रहता है । अन्य कोई कारक वार्ता का प्रयोजक नहीं नापा यात कर्ता हो सकल कारकपत का प्रयोग है, क्योंकि इसी में ज्ञान, fa ( करने की इच्छा ), प्रयत्न यदि देखे जाते हैं । इस सह से यहाँ से व्यावृति चान की गई हो उससे सम्बद्ध वन्छ कारकचक्र की भी चावृति हो जाने से वहाँ पर बिना कारण के ही कार्य की उत्पति माननी फोगी । ऐस देखा नहीं जाता कि शापवान arif f के बिना गृद, दण्ड, चक्र, नीवर प्रभृति बचवा तुरी, वेमा प्रभृति स्वयं ही मिलकर पट पट वाह कार्यों को उत्पन्न करते हों । इसलिये कर्ता के न मानने पर यह कार्य भी नहीं होगा । कार्यकर्ता के हो होता है, यह प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है । जतः अनुकूल तर्क से व्याति का निश्चय हो जाने पर भूधर प्रभृति में भी सक रूप साध्य की सत्ता होने से और शरीरखत्य की सत्ता न होने से यहाँ साध्य में बव्यापकता के कारण उपाधि बनती ही नहीं । जैसा कि आचार्य उदयन में कहा है " नुकुल अर्थात् व्यभिचार शंका के निवर्तक तसे समर्पित हेतु के द्वारा साध्य व्यापकता का भंग हो जाने के कारण पक्ष में उपाधि की किसी भी प्रकार की संभावना नहीं है । "

पृष्ठ 203

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वैवाथपारिजातः III एतेन - ' अङ्कुरादौ सकर्तृकत्वरूप साध्यसन्देहेन साध्यव्यापकत्वसंशयेऽपि शरीरजन्यत्वस्य सन्दिग्धोपाधित्वं दुर्वारमेव । न चोपाधिसन्देहरहितो व्यभिचारसन्देहः, स च न प्रतिबन्धकः सन्दिग्धसाध्यस्यैव पक्षत्वादिति वाच्यम्, पक्ष " तत्समयोर्व्यभिचारसंशयस्यापि प्रतिबन्धकत्वात् । अत एवानुकूलतर्कविरहदशायां पक्षॆतरत्वं सन्दिग्धोपाधिरित्युक्तिः शिष्टानाम् ' इत्यपि परास्तम्, पूर्वोक्तरीत्या कार्यत्वेन कर्तृत्वेनानुकूलतर्कसके कार्यरतस्य हेतोः सकर्तृकत्वसाध्यव्याप्यत्वनिश्चयेन साध्य-व्याप्यव्यापाधौ साध्याव्यापकत्वमित्रात् । अथवा भूधरादिकं कर्मजन्यं शरीराजन्यत्वादा शिवदित्युपाध्याभावात् साध्याभावानुमाने प्रागभावाप्रतियोगित्व-स्योपाधित्वेन साध्याभावसाधकत्वेन न प्रकृतानुमानस्यानुपाधिकत्व भङ्गः । यत्राकाशादी कर्शजन्यं तत्र प्रागभावाप्रतियोगि-त्वम्, यत्राङ्करादौ शरीराजन्यत्वं तत्र न प्रागभावाप्रतियोगित्वमिति स्पष्टं सोपाधिकत्वं तस्य । न च यदीश्वरः कर्ता स्वार्त्तार्ह शरीरी स्यादित्यादिप्रतिकूलतर्कोऽप्यस्त्येवेति वाच्यम्, तत्सिद्धयसिद्धिभ्यां व्याघातात् । आगमादेरीश्वरमिद्धौ तद्विरोधादेव प्रतिकूलतर्कनिराकरणम् । तदसिद्धौ तु आश्रयासिद्धेस्तस्याकिञ्चित्करत्वम् । केचित्तु एक अङ्कुरः कृतिजन्यः कार्यत्वाद्घटवदित्यनुमानेन पक्षतावच्छेदेन, पक्षतावच्छेदकसामानाधिकरण्येन वा साध्यसाधने न क्वापि दोषः । सर्गाद्यकाद्विद्यणुकप्रयोजनकं कर्म प्रयत्नजन्यं कर्मत्वाद् गुरुत्ववत् । पतनाभावः पतनप्रति-बन्धकप्रयत्नप्रयुक्तः, धृतित्वात्, पक्षिपतनाभाववत् । ब्रह्माण्डनाशः प्रयत्नजन्यः, नाशत्वात्, घटनाशवत् । उक्त प्रतिपादन से यह उक्ति भी परास्त हो जाती है कि ' अंकुरादि में सह रूप साध्य के संदिग्ध रहने से समय की area में भी हो जाने पर शरीरजवस्त्र की संदिग्ध उपाधिता को कौन रोक सकता है? व्यविचार का सह उपाधि के सह रहित है, वह नहीं होना, क्योंकि संधि स्वध्य को ही पका बनाया बाया यह कहना गलत है कि गक्ष ओर सपक्ष में व्यभिचार का संशय भी प्रतिबन्धक हो जाता है । इसलिये अनुकुल तर्क के न रहने पर क्षेतरता की संदिग्धी-पावित निष्ठ जनों के द्वारा प्रतिपादित है क्योंकि पूर्वोक्त रीति से कार्ययोजना के रूप में अनुकूल तर्क की बता के कारण कार्य हेतु की कर्तृकता का साध्य की व्याप्यल का निश्चय हो जाने से साध्य के व्याप्य में अव्यापकता के कारण उपादि में साध्य को वव्यापकता का नित्रय नहीं हो सकेगा । अथवा भूवर नाहि कर्तृजन्य नहीं है, क्योंकि काश वादि वह वीर है, इस अनुदान में उपाधि के अपात्र के कारण उसके साध्य के अभाव का अनुमान करने पर प्रामापारतयोगिता की उपविता के कारण साध्यभाव की मागता यहीं बन सफरी, अतः त्रास अनुमान की सुवाधिता संग हो जायगी । वाणनादि के यहां कर्मव्यता है, वहाँ पर लवभागागतियोगिता भी है, अंकुरात्रि में यहां वीरात्यता है, वहां पर प्रायया की यदियोगिता नहीं है । अतः इसमें दोषाचा स्पष्ट है । यह हमा श्री ठीक नहीं है कि ' यदि ईश्वर कर्ता हो तो उनको भी शरीदी होता नाहिये, हयादि प्रतिकूल वर्क को भी तो सत्ता है ही ', क्योंकि यह तर्क ईश्वर की लिठि और सिद्धि के विकासे व्याहत हो जाता है । बागम से ईश्वर की दिले हो जाने पर आगम के विरोध के कारण ही प्रतिकूलतर्क का निराकरण होगा । अब यदि ईश्वर सिद्ध नहीं है, वो कायामिति के कारण उस तर्क कर्थ हो जाना । कुछ लोगों का कहना कि अंकुर कृतिजन्य है, क्योंकि यह भी घट के समान कार्य है, इस अनुभाव से पारच्छेद काछेदक जिसने पक्ष है, उन सभी में से अथवा पक्षतावच्छेवक की सामानाधिकरण्यता ( अर्थात् किसी भी एक पक्ष में था कुछ पक्षों में ) $ साध्य को सिद्ध करने में कहीं भी दोष नहीं आवेगा । निम्न अनुमानों से भी यही प्रतिपादित होता है । सर्प के आदि काल में स्थित sue का प्रयोजक कर्म प्रयत्नपूर्वक हुआ है, क्योंकि गुरुत्व के समान वह भी कर्म है, पतन का aere पतन के प्रति प्रयत्न के कारण है, क्योंकि पक्षी के पतन के प्रभाव की तरह यह भी वृति ( स्थिति ) पर आवृत है, ब्रह्माण्ड का नाश प्रयत्न जन्य है, क्योंकि घटनाश की तरह ही यह भी नाश है ।

पृष्ठ 204

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१७४ वेदार्थपारिजातः क्षितेः पक्षत्वे तु क्षितित्वावच्छेदकावच्छेदेन साध्यसाधने परमाणी वाध:, क्षितित्वसामानाधिकरण्येन तत्त्वे तु घटा सिद्धसाधनम् अङ्कुरस्य पक्षत्वे तुभयथापि न दोषः क्वाप्यङ्कुरे नित्यत्वस्य जीवीयकृतिजन्यत्वस्य चाभावात् । अत्रानुकूलतर्कस्वरूपं तु यदि कार्यस्व कृतिजन्यत्वव्यभिचारि स्यात् तदा कृतिजन्यत्वावच्छेदकं न स्यादिति । न च प्रकृता-नुकूलतर्कः किं प्रमाणक इति वाच्यम्, कृतित्वेन कार्यत्वेन व कार्यकारणभावस्यैव प्रमाणत्वात् । अत्र यद्यपि कार्यं प्रति कर्ता कारणमिति स्वीकारे कर्तृत्वं कारणतावच्छेदकम् । तच्च कृतिमत्वम् । कृतिमत्त्वच्च कृतिरेव । सा च नानेति गौरवम्, कृतेः कारणत्वे तु कृतित्वस्य कारणतावच्छेदकत्वम् । तच नानाकृतिष्वेकमेवेति लाघ-वात् कृतेः कारणतास्वीकारः । सा च कृतिर्यत्किञ्चिदात्मसमवेता, कृतित्वादस्मदादिकृतिवद् इत्यनुमानेन तादृशकृत्याश्रयीभूतः कश्चिदात्मा सिद्धयति । स च नास्मदादिरितीश्वरः सिद्धयति । तथापि नित्यायाः परमेश्वरीयकृतेर्जगज्जनकत्वे तदुत्पादिन्या-चिकीर्षायास्तदुत्पादनोपयोगिनो ज्ञानस्यानावश्यकत्वेना सिद्ध्या सार्वज्ञासिद्धथापत्त्या कर्तुरेव कारणत्वाङ्गीकारो युक्तः । न च गौरवम्, फलमुखगौरवस्यादोषाघायकत्वात् । दिनकरदृष्ट्या तु कार्यं विशेष्यतासम्बन्धावच्छिन्न कृतिनिष्ठजनकतानिरूपितसमवायसम्बन्धावच्छिन्नजन्य ताजालि, प्रागभावप्रतियोगित्वाद् इत्येवानुमानम् । न च ध्वंसे पक्षतावच्छेदकजन्यताश्रये विशेष्यतासम्बन्धावविकृतिनिष्ठजनकता निरूपितसमवायसम्बन्धावच्छिन्नजन्यत्वस्याभावेन बाध इति वाच्यम्, ध्वंसव्यावृत्तसत्त्वविशिष्टजन्यलस्य पक्षतावच्छेदकत्वोप ईश्वर को सिद्ध करने वाले यदि पृथ्वों को पक्ष बनाकर उसमे ईश्यरकर्तृत्य द्धि करें, जहां - त्री पृथियार है, वहीं सब जगत् यदि वैश्व सिद्ध करें, पृथिवों के परमाणु में पृथिवी तो है, किन्तु नैयायिक के मत से परमाणु के निर से उनमें ईश्वरकर्तृस्त्र रूप साध्य नहीं है, यतः नाव होना । यदि पृथिवीत्व जहाँ हे में की पार्थिव पदार्थ में feeder रूप साध्य की सिद्धि करें, तो पार्थिव घटादि में पहले से हो वह सिद्ध है । इसलिये साधा दोष होगा । अंकुर को पक्ष बकर उसी में कर्तृव्यत्य का साध्य की सिद्धि करना चाहिये, क्योंकि कोई भी अंकुर दिल नहीं है और न ही जीव को कृति से जन्म है । यहां अनुकूल तर्क का रूप वह होगा कि यदि कार्य कृतिजन्यत्व का व्यभिचारी हो तो वह कृति अछेदक होगा । प्रकृत अनुकूल तर्क में क्या प्रमाण है? इस प्रश्न के उलर में इतिस्व और कार्यथ के कार्यकारणभाव को ही प्रमाण केक में उपस्थित किया जा सकता है । अर्थात् पा कार्य होता है वह फिला व किसी का कृति होता ही है । जैसे कि घटादि कार्य हैं, वे कुकर की कृति ॥ यहाँ पर यद्यपि कार्य के प्रति कर्ता के कारण कामे पर कर्तृत्व को कारणता का अवच्छेदक ( नियामक विशेषण ) पड़ेगा और वह कर्तृत्व होमालियाकता । हसिपीला लप इति ही है और वह है भिन्न - भिन्न प्रकार इसलिए इसके कारणतावचन मार्की में गौरव होगा, क्योंकि कारणता के ना अनेक हो गये! इस पेक्षा कार्य के प्रति स्वकृतिका नगणना मानने पर इस ताका कृतित्व हो होगा । यह कृतित्व नाना कृतियों ( नि - भिन्नों ) में विद्यात्य रूप से एक की है, इफ्फी सामने से लाभ होगा, अतः कांस को ही कारण मानना चाहिये । यह कलि ( प ) किशी व किडी आत्मा ( जीव ) में समास से रहती है, क्योंकि यह भी अस्मादिक कृति की तरठ की ही कात है, इस अनुमान से लक्ष्य कृति का आश्रीत कोई आत्मा सिद्ध हो जाता है । यह आत्मा हम नहीं हो सकते, दस प्रकार ईश्वर सिद्ध तो हो जाता है, किन्तु ईश्वर की पित्य कृति में जगत को कारणता मानने में उस कृति की उत्पादिका विकीर्षा और उस चिकीर्षा के उत्पादन में सहायक ज्ञान की आवश्यकता न होने के कारण चिकीर्षा और ज्ञान की सिद्ध न होने से सर्वज्ञ को सिद्धि न होना, यह बहुत बड़ी आपत्ति होगी, अतः कृति को कारण न मान कर कर्ता को ही कारण सानना उचित है । इसमें गौरव दोष नहीं होगा, क्योंकि फलोम्यू गौरव को दोष कोटि मैं नहीं रखा गया है । farer के मत में अनुमान का स्वरूप इस प्रकार है - कार्य विशेष्यता सम्बन्ध में अवच्छिन्न कविनिष्ठ जनता से विकि पजगाम समय से कारि युक्त है, क्योंकि यह प्रागभाव का प्रतियोगी है । यह कहना कि उफ अनुमान में बाषित हो जायगा, क्योंकि स यद्यपि पक्षतावच्छेदक जन्यता का आश्रय है, तो भी उसमें विशेष्यता सम्बन्ध से अवच्छिन्न कृतिनिष्ठ जनकला से निरूपित समय सम्बन्ध से अवच्छिन्न जन्यता का अभाव है । अर्थात् दण्ड के मारने से जो घड़े का नाश होता है, उसमें कार्य तो हैं, किन्तु विशेष्यता सम्बन्ध से किसी व्यक्ति के प्रयत्न में रहने वाली जो जनकता, उस जनक ar से fre पित समवाय

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बेवार्थपारिजातः १७६ गादोषात् । न चैवमपि प्रागभावप्रतियोगिनि ध्वंसे हेतुसत्वेऽपि साध्याभावाद् व्यभिचार इति वाच्यम्, हेतावपि सत्व-वैषिष्टयस्य विशे r णेन तद्वारणात् । जन्यत्वमात्रस्य पक्षतावच्छेदकत्वे कृतिजन्यत्वमात्रस्य साध्यत्वे तु हेनावपि सत्त्व-fries, ra ञ्च ध्वंसेगीश्वरीयकृतिजन्यत्वस्य निराबाधनया कार्यमा कृतिजन्यत्वोपपत्तिः । न चै हृविरादि-गोपगमदीयकृतिजन्यत्वमादाय सिद्धसाधनोति वाच्यम् अदृष्टाद्वारकत्वे सतीति कृतिजन्यनाया विशेषणीयत्वात् । न च स्वोपादानगोचरापरोक्षज्ञानविकीर्षाकृतिजन्यमित्येव साध्यं कुतो न स्यादिति वाच्यम्, कार्यमार्ग प्रति कृतेरेवान्वयव्यतिरेकतया हेतुत्वे कृतिजनकयोज्ञ निचिकीर्षया रन्यथासिद्धत्वेनैतत्त्रितयजन्यत्वस्य तत्र बाधात् । दृष्टान्तपक्ष-साधारणस्य स्वत्वस्यैकस्याभावेन तद्घटितस्वोपादानेत्यादिसाध्यस्यासम्भवात् । कृतित्वापेक्षयोपादानगोचरकृतित्वस्य गौरवेण जनकतावच्छेदकत्वाच्च । नतु चैवं नित्यकृतिमदीश्वर सिद्धावपि तत्र नित्यज्ञानेच्छयोरसिद्धिः । न च कृत्या तथानुमानं सम्भवति, नित्यायाः कृतेः कारणानपेक्षत्वेन तदयोगादिति चेन्न जानाति 1 इच्छति, अथ करोतीति रीत्या जनकृत्या जीवेषु ज्ञानेच्छयोरनुमानेन सिद्धेः । परमेश्वरे तु ' यः सर्वज्ञः स सर्ववित् ' इति श्रुत्वा ज्ञानेच्छयोः सिद्धत्वात् । अन्ये तु विनिगमनाविरहात् कृतित्वेन कृतेरिव ज्ञानत्वेच्छात्वेन च ज्ञानेच्छयोरपि हेतुत्लाङ्गीकारेण ज्ञानजन्यत्वे-च्छाजन्यत्वयोरपि साध्यत्वमङ्गीकुर्वन्ति । सम्बन्ध वाली जन्यता का अमाव है, क्योंकि नैयायिक के मत में अभाव Frer सम्बन्ध से रहता है, समवाय सम्बन्ध में नहीं । यतः घट के गाव में जनकता से निरूपित समवाय सम्बन्ध से विशिष्ट जन्यता नहीं है । यह उक्ति इस लिये गलत कि उक्त अनुमान में इस दक्षेप की निवृत्ति के दिये से सत्वविशिष्ट जन्यता की पक्षतावच्छेदक माना जायगा, अर्थात् पक्षता का नियामक माना जाता है | इतने पर भी आग के तियोगी ब्वंश ( घट के विनाश ) में हेतु में प्रागमः प्रतियोगित्वरूप हेतु तो है, किन्तु प्रकार हो जायगा कि हेतु मैं भी स्व के सम्वन्ध को ना नहीं है, इसलिये यभिचार हो सकता है, किन्तु उसका परिहार का विशेषण के रूप में जोड़ दिया गायगा । जन्यत्वमान की पागच्छेत में और कृतिजन्यत्वमात्र की नाक में हेतु में सस्त्र के महिष्य को वशकता नहीं है । वर्षात् केवल पैदा होने वाली वस्तु हो किसी के प्रक्ल से पैदा होनेवाली मानने पर वंश ( रितान ) श्री ईश्वर के प्रयत्न ही डा. कमल कार्यमात्र प्रयत्न से जन्न होते है, इस बात के सिद्ध होने में कोई दावा नहीं है । हन लोगों के मन में जाने वाले यज्ञ के दोष न्यों में हमारे भय से पैदा होना पहले से सिद्ध ही है, इसलिये सियाधनता दोब करना भी ठीक नहीं, क्योंकि कम से जन्य रूपी साप में परलोक में होने वाले फलों का वो हार न हो, ऐसा विशेषण देने से पत्र हमें उन फलों का द्वार होने से सिद्धानता नहीं रहेगी । वस्तु के उपादान कारण का प्रत्यक्ष ज्ञान उसको जताने की इच्छा और अपने प्रयत्न से बनने वाले को ही साध्य क्वों न कहा जाय? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि कार्यमात्र के प्रति जल की की अन्य और व्यतिरेक से कारणता सिद्ध होती है कृति के जनक शाह और चिकीर्या को कारणता यन्यथासिद्ध है, अतः तानों से अन्यता वार्षित हो जाती है । हृष्टान्त और पक्ष में मान रूप में विद्यामान स्वत्व की एकता के अभाव में तदुदित स्वोपादान इत्यादि साध्य की स्थिति ही नहीं बनती । केवल प्रयत्न को कारण न मारकर उपादान विपयक प्रयत्न को कारण बानने में गौरव भी होगा, वतः उपादान विषय वटित प्रयत्न में रहने बाले धर्म कृतित्व को जमकता ( कारणता ) का नियामक नहीं माना वा सकता । यहाँ पर प्रश्न उठता है कि ऐसा मानने पर दिव्य इति से युक्त ईश्वर श्री सिद्धि हो जाने पर भी उनमें नित्य ज्ञान और नित्य इच्छा की सिद्धि को नहीं हो सके । कृति से भी अनुमान नहीं होगा, safe free कृति कारण की अपेक्षा नहीं रखती, अतः उसका ज्ञान और इच्छा से कोई योग नहीं बनेगा । इसका उत्तर यह है कि ' व्यक्ति पहले जानता है, बाद में इच्छा करता है, तब किसी कार्य में se होता है इस साधारण नियम के अनुसार जहाँ पर जन्य कृति हैं, उन जीवों में ज्ञान और इच्छा की भी मिद्धि अनुमान से हो जाती है । परमेश्वर में ' वह सर्वज्ञ है, सर्ववित् है ' इस श्रुति के प्रमाण से ज्ञान और इच्छा की सिद्धि होती है । अन्य विद्वान् वि fan के अभाव में कृतित्व हेतु में कृति की तरह ज्ञानस्य और इच्छाल से ज्ञान और इच्छा को भी हेतुता मानते हैं और ज्ञानजन्यत्व तथा इच्छाजन्यता को साधना कोटि में रखते हैं ।

पृष्ठ 206

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१७६ वेदार्थपारिजातः प्राञ्चस्तु — कर्तृजन्यत्वसाधनेन तदन्तर्भावितनित्यज्ञानेच्छाकृतीनां सिद्धया न प्रमाणान्तरमन्वेषणीयम् । फलमुखं गौरवं न दोषावहमित्युक्तमेव । ननु कर्तृत्वेन कार्यत्वेन कार्यकारणभावोऽनुकूलतर्क उक्तस्तत्र किं मानमिति चेन्न, अन्वयव्यतिरेकयोस्तत्र मानत्वात् । न चान्वयव्यतिरेकाभ्यां घटत्वाद्यवच्छिन्नं प्रति कुलालादित्वेनैव हेतुत्वादेतादृशकार्यकारणभावे मानाभाव इति वाच्यम्, घटत्वपटत्वादिभेदेनानन्तकार्य कारणभावकल्पनापेक्षया कार्यत्वावच्छिन्नं प्रति कर्तुत्वेन हेतुत्वकल्पनस्यौचित्यात् । ' यद्विशेषयोः कार्यकारणभावोऽसति बाधके तत्सामान्ययोरपि ' इति न्यायेन कार्यकर्तृत्वाभ्यां सामान्यकार्यकारणभावस्था-वश्यकत्वात् । न च स न्यायोऽपि निर्मूल इति वाच्यम्, तस्य लाघवमूलकत्वात् । तथाहि — कार्यत्वावच्छिन्नाभावे तत्र क-भावकूटस्य प्रयोजकत्वे गौरवम् । कर्तुत्वावच्छिन्नाभावस्यैकस्य प्रयोजकत्वे लाघवमिति । न च स कर्तृत्वावच्छिन्नस्य कार्यत्वावच्छिन्नं प्रति कारणतावच्छेदकत्वेऽपि लाघवादेव कर्तृत्वावच्छिन्नाभावस्यैकस्यैव कार्यसामान्याभावप्रयोजकत्वं कल्पनीयमिति वाच्यम्, कारणतावच्छेकधर्मावच्छिन्नाभावस्यैव कार्यतावच्छेदकावच्छिन्नाभावप्रयोजकतानियमात् । केचित्तु -- घटत्वावच्छिन्नं प्रति कर्तुः कारणतया सर्गाद्यकालिकं घटादिकं पक्षीकृत्य घटत्वादिहेतुना सकर्तृत्व-साधने जीवानां बाधादीश्वरसिद्धि वदन्ति । यत्तु कैश्चित् --- घटादिकुलालादिचेष्टयोरन्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्यस्वावच्छिन्नं प्रति चेष्टात्वादिना हेतुत्वादङ्कुरा-द्युत्पत्तेः पूर्व चेष्टानुरोधेनेश्वरस्य नित्यशरीरमपि सिद्धयतीत्युच्यते तन्न तादृगन्वयव्यतिरेकाभ्यां क्रियात्वेनैव हेतुत्वात्, चेष्टात्वेन हेतुत्वे मानाभावात् । प्राचीन नैयायिकों का कहना है कि कर्तृजन्यत्व की साध्यता में नित्य ज्ञान, इच्छा और कृति का भी अन्तर्भाव रहता है, अतः इनकी सिद्धि के लिये अलग से प्रमाण खोजने की जरूरत नहीं है । फलोन्मुख गौरव दोष नहीं माना जाता, यह कहा जा चुका है । कर्तृत्व और कार्य से कार्यकारणभाव अनुकूल तर्क है, इसमें क्या प्रमाण है? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि अन्वय और व्यतिरेक ही इसमें प्रमाण है । अन्वय और व्यतिरेक से तो घटत्वावच्छिन्न के प्रति कुलालत्वादि की हेतुता बनती है, अतः इस तरह का कार्यकारणभाव उसमें प्रमाण नहीं हो सकता । इसका उत्तर यही है कि घटत्व- पटत्व, व्यादि के भेद से अनन्त कार्यकारण की कल्पना करने की अपेक्षा कार्य के प्रति कर्तृव के रूप में हेतुत्व की कल्पना ही उचित मानी जायगी, अर्थात् घट का कर्ता कुम्भकार, पट का कर्ता जुलाहा, मकान का कर्ता राजमिस्त्री, इस तरह भिन्न - भिन्न कार्यों के भिन्न - भिन्न कर्ता ने की atarra का कर्ता होता ही है, ऐसा मानने में ही सरलता है । ' वो विष्ट वस्तुओं का कार्यकारणभाव नियम बाधक के अभाव में समान रूप से भी माना जाता है ' इस न्याय के अनुसार कार्यत्व और कर्तृव में सामान्य कार्यकारणभाव बावश्यक रूप से मानना पड़ता है । इस न्याय को निर्मुल नहीं कह सकते, क्योकि वाचन हो इसका मूल है । जैसा कि कार्यस्यावच्मि के अभाव में सभी कर्ताओं के अभाव को प्रयोजक मानने में गौरव होगा और केवल एक कर्तुत्वावचि के अभाव को प्रयोजक सामने में area होगा | कर्तृत्वावच्छिन्न को कार्य के प्रति कारणतावच्छेदकता न होने पर भी लापण वश एकमात्र कर्तृत्वावछिन्न के अभाव की हो कार्यसामान्य की arentunate कल्पित कर की जाय? इसका उत्तर यह है कि कारणतावच्छेदक धर्म से अवचित अभाव की ही कार्यथावच्छेदक से अच्छिन्न अभाव की प्रयोजकता नियमतः मानी जाती है, अन्य की नहीं । कुछ लोग पान के प्रति कर्ता की कारणता को देख कर सृष्टि के आदि काल के घट को पक्ष बनाकर घटत्वादि हेतु से सकल को सिद्ध करने पर वहाँ पर कर्ता के रूप में जीवों का बाघ देखकर ईश्वर को सिद्धि करते हैं । तात्पर्य यह है कि कल्प के बाद होने वाली सृष्टि के प्रारम्भ में भी पदादि तो जरूर पैदा हुए, उनको पैदा करने वाला भी कोई चाहिये । जीव उस समय उनको पैदा नहीं कर सकते, अतः ईश्वर ही उनका पैदा करने वाला है । इस तरह से ईश्वर सिद्ध हो जाता है । इसके कुछ लोगों का यह कहना है कि घटादि और कुलालादि की चेष्टाएं अम्बय बोर व्यतिरेक से कार्य के प्रतिष्टत्व आदि के रूप में हेतु है, अतः अंकुरादि की उत्पत्ति के पहले चेष्टा को मानने के कारण ईश्वर के नित्य शरीर की भी सिद्धि

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वैवार्थपारिवाल: १७७ अन्ये तु चेष्टात्वेन हेतुत्वादोश्वर नित्यशरीरमिद्धावपि न क्षतिः परमाणूनां तच्छरीरले बाबाभावात् । तथा चेश्वरकृतिजन्यचेष्टावद्भिः परमाणुरूपारीरैस्तत्तत्कार्याणामुत्पत्तिः । न चान्त्यावयविले सति चेष्ठानत्वमिति तत्र शरीर-लक्षणासम्भवात् कथं शरीरत्वमिति वाच्यम्, सत्यन्तस्य शरीरलक्षणेऽप्रवेशेन तन्निर्वाहात् । न चानन्तपरमाणूनां शरीरत्व-कल्पने गौरवाल्लाघवेन तस्यातिरित्यसिद्धिरिति वाच्यम्, तच्छरीरस्य महस्वेऽभग्नस्य पाषाणादी प्रवेशासम्भवेन पाषाणान्त-वर्तिक्रारी रोल्पादकतानुपपत्तेः, अणुत्वे दूरस्थकर्मोत्पादकत्वानुपपत्तेरिति वदन्ति । परे तु - ' कार्यत्वेनानित्यत्वानुमाने घटादिगु लिङ्गस्य राष्साहचर्यं दृष्टगिति तद्विशिष्टस्यैव तस्य सव्यत्वे रूपाभाव-वति वायावनित्यत्वासिद्धिः । तत्सिद्धी वा रूपस्यापि सिद्धिः स्यात् । न च तद्युक्तम्, प्रत्यक्षबाधात् । यदि तु साहचर्यमात्र न प्रयोजकं किन्तु व्याप्तिरेव प्रयोजिका, सा च कार्यत्वानित्यत्वयोरेवेति वायावपि तत्सिद्धी रूपासिद्धिचेति, तर्हि प्रकृतेऽपि कर्तृत्वप्रगोजकं ज्ञानेच्छाप्रगत्तवस्त्रमेव । शरीरित्वस्य तु साहचर्यमात्रमिति नेवरे शरीरित्यमिद्धिः । अन्यथा दृष्टान्तीयाशेष-धर्मसिद्धि: पक्ष स्यात् । तथा च घटदृष्टान्तेन जलेऽनित्यत्वसाथ पृथ्वोत्वादिकमपि मयंत् । अपि च नेष्टामन्तरा प्र मात्रेण कुलालाचे कार्यकरणे गामर्थ्याभावेन चेष्टाश्रयस्य सहकारित्वं भवतु नाम, प्रयत्नमात्रेणैव सर्वकरणरामर्थस्य परमे-स्वरस्य कुतस्तदपेक्षा? परिचिनापरिच्छिन्नपक्षाकडूपणासङ्गोऽसि ' इति । हाजगी, क्योंकि शरीर के बिना चेक नहीं बना । किन्तु यह बात है, क्योंकि उक्त बम्वच और व्यतिरेक क्रिपात्वरूप से ही हेतु की सिद्धि हैं. ही रेष्टात्पेन हेतुना में कोई प्रमाणन है । } अन्याओं का कता न देना की सिद्धि होने पर भी हिस को कोई हानि नहीं है क्योकि परमाणुओं को ईश्वर का शी चाल को में कोई नाम नहीं है । इस तरह की कृषि प्रयत्न ) से उसके गरया सरीर में केटा होइन उन लगों की उत्पति भाची पापणी । अत्यावश्वी की चेष्टायता से शरीर का लक्षण नाश जाता है, यह हमें नहीं घटता तो परमाणुओं में कंवर का घर से काया है? परमाणुओं में श्रेष्ठ है नहीं और जिसमें वेष्ट हो तथा जो अन्त्य हो, जया की कार कहते हैं । इसका उत्तर यह है कि केवल चेष्टावत्त्र ही शरीर का लक्षण माना जाता है, उसमें ' अन्याय ' को नहीं जान जाता । अन्त पद यणुओं की शरीरत्व कल्पना में गौरव होने से लाघव के कारण इनके अतिरिक्त ही किये एक वस्तु की शरीक मित्र होता है. यह उक्ति ठीक नहीं है, क्योंकि शरीर का महत्व परिक्षण मानने पर दिया टूटे उसका परवाना में प्रत्क्ष हो नहीं बकता, इस परिस्थिति में पाषाण के भीतर रहने वा मेहरू के शरीर की उत्पति कैसे समय हो सकती हैं? बणु परिमाण मानने पर दूरस्थ कर्म को उत्पक्ष करने की क्षमता नहीं हो पहली । दूसरे विद्वानों का कहना है कि कार्य अनित्यत्व अनुमान कसे पर बाद में far का रूपसाहचर्य देखा जाता है, अतः रूपविशिष्ट कार्य की अनुमति माग पद रूपाभाववान् वायु में नियत सिद्धि नहीं होगी । वनिता को सिद्धि मानने पर रूप की भी सिद्धि उसमें माननी पड़ेगी । किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि वहीं पर ही प्रत्यक्ष का नाथ है । आहमें मान की प्रयोजकता नहीं मानी जाती, किन्तु व्याप्ति की हो त्योजकता मानी जाती है । यह व्याति केवल कार्य और afteree की ही है, अत: वायु में भी अस्थित्व को सिद्धि हो जायगी और रूप को सिद्धि नहीं हगी । ऐसा कहने पर तो अत स्थल में भी कर्तृत्व का प्रयोगक ज्ञान, इच्छा, प्रयत्नवस्व ही है, अर्थात् ज्ञानवान्, कान और प्रयत्नवान् हो कर्ता हो सकता है | शरीरत्व का केवल साहचर्य मात्र है, अतः ईश्वर में शरीरित्व की सिद्धि नहीं होगी । अन्यथा दृष्टान्त के सभी वर्षों की सिद्धि पक्ष में मानवी पड़ेगी । इस तरह से घट के दृष्टान्त से जल में वानित्यता सिद्ध करने पर उसमें पृथिवीत्व आदि धर्मों की भी सिद्धि होने लगेगी । दूसरी बात यह है कि चेष्टा के बिना प्रयत्नमात्र से कुम्हार आदि की कार्य करने की सामर्थ्य नहीं देखी जाती, अतः वहीं पर चेष्टाय शरीर की सहकारिता मानी जा सकती है, किन्तु प्रयत्नमात्र से सब कुछ कर सकने में समर्थ परमेश्वर को शरीर की अपेक्षा क्यों रहेगी? परिच्छिनता और अपरिचिता के पक्ष में उठाये गये दोष भी यहाँ प्रसक्त होंगे । २३

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१७८ पारिजातः अपरे तु — ' ज्ञानादिनत्वस्येव मशरीरत्वस्यापि कुलालादिषु दृष्टत्वादशरोरेषु मुक्तत्पसु कर्तृत्वादर्शनाच्च परेशस्य कर्तृत्वेन सशरं त्वमवश्यमङ्गकर्तव्यम् लोके या दर्शनात् । अन्यथा ज्ञानादिमत्त्वमपि न सिद्धयेत् । यदि तु समर्थत्वा-दीश्वरस्य चेष्टामन्तराषि कर्तृलसिद्धिः तदा विकी पप्रयत्नावत्सरात्रि ज्ञानमात्रेणैव तत्सिद्धयापत्तिः 1 परिच्छिन्ना परिच्छिन्न-पक्षादूषणमपि न स्यात् । अन्यथानुपपत्तिबलात् सिद्धयत् शरीरं यावनानुपपत्तिपरिहारस्तावद्रूपमेव सिद्धयति, पक्षधर्मता-वलादपरिच्छिन्ननित्यशरीरस्यैव सिद्धिश्च । परिच्छेदानित्यत्वाद्यनुपपत्तयस्तु शरीरसिद्धयसिद्धिभ्यां व्याहता एव । सिद्धौ साधक-मानविरुद्धत्वात्, असिद्धायाश्रसिद्धश्च तासामाभाससमानयागक्षेमत्वात् । अन्यथा ज्ञानस्याप्यनित्यत्वनियमेनेश्वरज्ञानस्या-प्यनित त्वापत्तः ' इत्यपि वदन्ति । यदपि - ईश्वरस्य कर्तृत्वेन शरीरित्वसादने ईश्वर सिद्धावाश्रयासिद्धिः तत्सिद्धी व धर्मिग्राहकमानेनाशरी रत्व-स्येव सिद्धत्वेन तद्वाध: ' इति, तन्त्र, धर्मग्राहकमानस्य शरीरत्वासाधकत्वात् । न च कार्यलिङ्गकमनुमानमेव धर्मिग्राहकं तेन कर्ता परं सिद्धति नान्यदिति वाच्यम्, कर्तृत्यनिर्वाहकानां ज्ञानेच्छाप्रयत्नानामिव सशरीरत्वस्यापि तत एव सिद्धेः । लोके तथा ज्ञानेच्छा प्रयत्नवतामेव कर्तृत्वं दृष्टं न तद्रहितानाम्, शरीरस्यापि तत्समानयोगक्षेमत्वेन ज्ञानेच्छाप्रयत्नशरीरवतामेव लोके कर्तृत्वदर्शनेन तद्वत एवेश्वरस्यापि सिद्धेः । ननु तर्हि महत्त्वेनोद्भूतरूपत्वेन च वाक्षुषत्वमपि स्यादिति चेन्न, लौकिकप्रत्यक्षाविषयत्वेन तददोषात् । देवादीना-मिन्द्रादीनां विग्रहवतामप्यचाक्षुषत्वश्रवणात् । तथा च देवदेवस्य परमेश्वरस्य सुतरामचाक्षुषत्वोपपत्तिः, शङ्कानां तत्सिद्वधु-अन्य आचार्य यह कहते कि कुम्हार आदि शाम, इच्छा वाले होने के साथ शरीर वाले भी देखे गये हैं और बिना शरीर वाले मुक्त जो कर्ता नहीं देखे जाते । अतः परमेश्वर को कर्ता मानने पर शरीर वाला भी अवश्य मानना पड़ेगा । लोक में यही देखा जाता है । अन्यथा ईश्वर की ज्ञानाविपत्ता भी सिद्ध हो सकेगी । यदि समर्थ होने से ईश्वर में बिना चेष्टा के भो कल की सिद्धि मानी जाती है, तो वह जिला श्री ज्ञानमात्र में हो उसमें कर्तृल की सिद्धि हो सकेंगी । इस तरह से परिच्छ और पक्ष में ये दूषण भी यहां नहीं होगे araangraft के बल से शरीर की उसी रूप में तिि सकती है कि कि अनुपपति का परिहार हो सके । पक्षधर्मता की मन से भी अपरिच्छिन्न नित्य शरीर को हो सिद्धि होगी । परिच्छेद को अनियता आदि भी अनुपातियों वगेर की सिद्धि और असिद्धि से ही षित हो जानो क्याकि अगर को frfa aree sain के विरुद्ध पड़ेगी और में मायवासिद्धि ह कारण उनका आभाम ( दिव्या कन ) की शा स्थिति गागना पड़ेगी । जगवा ज्ञान से पी अनित्यता का विषय नान की पर वर के ज्ञान में भी अस्यता की आपति होने लगेगी । में के कारण शरीरिल की सिद्धि करने में मिलन हो सकेगा फलतः श्रवामिहो area होगा " यदि ईश्वर की ही जाती है तो व ग्राहक प्रमाण में ही सिद्ध हो अतः यह इसलिये गलत है धि का ग्राहक प्रमाण सिद्ध न कर सका अनुमान से धर्मो का ग्राहक होता है, अन्य नहीं, इस केवल कर्ता की सिद्धि यह है अन्य किसी की नहीं, यह कथन भी इसलिये गलत है कि कल के जाम, इच्छा, प्रयत्न का ही सरह सशरीरत्व को सिद्धि भी उसी से हो जायगी । लोक में जैसे ज्ञान, इच्छा, प्रयत्नवान् व्यक्ति में हो कर्तृत्व देखा जाता है, इनसे रहित में नहीं, उसी तरह से शरीर की भी स्थिति इन्हीं ने तरह की है, अतः ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न से युक्त शरीरयाले व्यक्ति में ही लोक में कर्तृव के देखे जाने से ईश्वर में भी ये मानने पड़ते । इस तरह से तो ईश्वर का शरीर भी उद्भूत रूप वाला और महत् परिमाण वाला ही होगा, फिर तो वह गाँव में दिखाई भी देना चाहिये, ऐसी शंका व्यर्थ है, क्योंकि fear aifee प्रत्यक्ष का विषय नहीं है । इन्द्र आदि देवता शरीर वाले के तब भी वे हम लोगों को जाँखों से नहीं दिखाई देते । इस तरह से देवताओं के श्री देव परमेश्वर का आँखों से न दिखाई देना तो सुदरी सिद्ध हो जायगा । ईश्वर की शरीरादि विषयक शंकाएँ उसकी सिद्धि के उपरान्त हो उठाई गई है, अतः ईश्वर की शरीरता को सिद्धि

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वेदार्थपारिजातः १७६ त्तरकालिकत्वेन तत्सिद्ध्यनवसरपराहतत्वाच्च । नन्वङ्करादौ शरीरिण: कर्तुरनुपलम्भेन कार्यस्थ शरीरिकर्तृपूर्वकत्वनियमो न सिद्धयतीति चेन्न, तत्रापि पूर्वोक्तयुक्तिभिः शरीरिकर्तृकत्वस्यैवानुमीयमानः वेनादोषात् । ' सर्वतः पाणिपातं तत्सर्वनोऽक्षिशिरोमुखम् ' ( श्रीमद्भग ० १३ । १३ ) इति शास्त्रेणापि परमेशशरीरसिद्धेश्व । यद्यपि सावयवत्वेन कार्यत्वं कार्यत्वेन चानित्यत्वानुमानं शीरमात्रस्य सम्भवति । सावयवत्वस्य कार्यत्वाप्रयोज कत्वे जगतोऽप्यकार्यत्त्वापत्त्या कार्यस्वेन च हेतुना प्रपञ्चस्य सकर्तृकत्वासिद्धया परमेशसिद्धिरपि दुर्लभैत्र स्यात् । परमेशशरीर-स्यापरिच्छिन्नत्वोक्त्या व्यापकत्वेनान्याननकाशप्रसङ्गः । स्थानानवरोधकत्वे तु सावयवत्वानुपपत्तिः । व्यापकत्वे महत्त्वे च सत्युद्भूतरूपादिमत्वेऽपि चक्षुराद्यग्राह्यत्वमपि निर्युकि मेव | पार्थिवरूपस्यानित्यत्वेऽपि कारणगतत्वेन पायस परमाणुरूपस्य नित्यत्ववत्का रणगतेन परमेशज्ञानस्य नित्यत्वमुपपद्यते, न तथा शीग्स्य नित्यत्वव्यापकः किञ्चिदामाणमुपलभ्यते । नहि धर्मिग्राह्कमानवलादेव सर्व सिद्धयति, तथा वे ज्ञाननित्यत्वादे: पर्यनुयोगानुपपत्तेः । ईश्वरम्य सत्यसङ्कल्पत्वेन ज्ञानादीना-मात्मसङ्कल्पवलादेव सर्वमिद्धेस्तदर्थं शरीरत्वकल्पनं निषेव । जीवानां शरीरावच्छेदेनेव ज्ञानेच्छादीनामुत्पत्तिनियमा-ज्छरीरमावश्यकम् । ईश्वरस्य तु ज्ञानेच्छाप्रयत्नानां नित्यत्वसिद्धौ तैरेव कार्गोत्पत्ती कृतमस्य शरीरग्रहणेन । पाणिपादो जबनो ग्रहीतव्यः स शृणोत्यकर्ण: " ( ० ० ३११ ९ ). " अकायमवणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्ध " ( वा ० सं ०४०१८ ) इत्यादिमन्त्रनिषेवात् । शुद्धमिति कारणशरीरनिषेध | यकायमिति शरीर निषेधः । अत्रणपस्नादिरमिति स्थूल-शरीरनिषेधः | ' अप्राणी ह्यमनाः शुभ्रः ( मु ० २० २१ २ ) इति च सूक्ष्मशरीरनिषेधः । में इनमें अम्यति श्रिई है, अत: मेस मुक्त है । अंकुरादि के शरीर वाले कर्ता नहीं मिलते, पलिये शरीर गाय को दावा कर्ता होता है, यह बात सिद्ध कीं हा तक नहीं, उस पहले की अने दुक्तियों से शी ती मेरे अनुमान के द्वारा सिद्ध कर चुए हैं । " बह आभगवन् स ओके ‌तौर वाय है और उसके भागों तक शिट और मुँह है " पद्गीता पे से भी के शरीर को सिद्धि हो जाता है । यक्षापमान के लिये समयवत्व में कार्य का और कार्य में अनित्यत्व अनुपान सकता है सावज को कार्यल का प्रयोगकण माममे परे जातु की मां अकार्यता को मानना पागोटलबार्य हेतु में अ की सकर्तृकला की सिद्धि न होने पर परमेश्वर की मी कहिल हो जाय । इसका जल यह है कि परमेश्वर केशरी को अच्छन मानने में उस है आशयकता के कारण तुमसे किसी शंका के लिये अवसर ही नहीं, यदि यह कहा कि ईश्वर का शरीर स्थान को नहीं घेरता तो उसकी सत्यता कैसे मानी जा सकती है | सब यह व्यापक है महत्व विशिष्ट और उद्भुत रूपादि से भी युक्त है, वरनमा चक्षुरादि से अग्राह्य कहना भी युक्तिहीन ही है । पार्थिक रूप के अगला होने पर भी कारणगत वर्तीय परमाणु रूप कीनिया के समय कारणगत परमेण के ज्ञान की नित्यता भी मानी जा सकती है, इस तरह से शरीर की नित्यता और व्यापकता में कोई प्रमाण रही है । के ग्राहक प्रमाण के बल से ही सब कुछ सिद्ध नहीं हो जाता । सो अवस्था में तो शाम को मिलता की आपति भी स्वीकार कर लेगी । ईश्वर तो सह सं ce है । वह अपने संक्रुप के चल से ही ज्ञानादि सभी गुणों की सिद्धि कर पकते हैं तो उनके लिये शरीर की कल्पना करणा व्यर्थ है । जीव में शरीर के रहने पर ही ज्ञान, इच्छा आदि की उत्पत्ति होती है, अत: उनके दिये शरीर आवश्यक है । ईश्वर के ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न आदि की नित्यता की सिद्धि हो जाने पर उन्हीं से जगत् रूपी कार्य की सिद्धि हो जाने से इसके शरीर - ग्रहण की कोई आवयक नहीं रह जाती । " वह परमेश्वर बिला पैर के भी दौड़ता है, बिना के सां ग्रहण करता है, बिना आँख के भी देखा है और कान न रहने पर भी सुनता है ", " उस शुद्ध, पापों से अस्पृष्ट, शरीर मे हित, विकारहीन, कूटस्थ भगवान् का ध्यान करो " इत्यादि मन्त्र परमेश्वर के शरीर का निषेध करते हैं । यहाँ पर द्वितीय श्रुति में स्थित शुद्ध पद कारण शरीर का निषेध करता है, अकाय पद सूक्ष्म शरीर को और अक्षण तथा अस्ताविर पक्ष स्थूल शरीर के निषेधक है । " वह परमेश्वर प्राण और मन से रहित है, अत एव शुद्ध है " यह मुण्डक श्रुति भी परमेश्वर के सूक्ष्म शरीर का निषेध करती है ।

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१८० वार्थपारिजातः न चोकप्रमाणनां प्राकृतशरीरनिपेध एव तात्पर्यमिति वाच्यम्, तथात्वे व्रणादेरपि प्राकृतस्यैव निषेधापतेः । ' न तम्य कार्य करणञ्च विच " ( श्वे ० उ ० ६६८ ) इत्येनापि स्थूलसूक्ष्मशरीरयोनिषेधः । न च सूक्ष्मशरीराभावेऽपि स्थूदेह जनपद दृष्टविरोधात् । न च लोकदृष्ट्यनुसारेण तत्साधने तद्विरोधोपेक्षा युज्यते, अर्धजन्तीयन्नायापतेः । देहादि-रहितस्थापि तस्य कार्यक्षमत्रश्रवणेनापि न परेशस्य शरीराहमेला, " अवाणिपादी जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्य-कर्ण: " ( श्वे ० उ ० ३।१ ९ । इति श्रुतेः । न च " सर्वतः पाणिपादं तत् " ( श्वे ० उ ० ३३१६, श्रीम ० १३/१३ ) इति श्रुति-स्मृतिविरोध, समष्टिस्थूलप्रपञ्चाभिमानिनां विराट्स्वरूपस्य व्यष्टिपाणिपादादिभिरेव पाणिपादादिमत्वोपपत्त्या पूर्वोकश्रुति-विरुद्धदेहेन्द्रियादिकल्पनात्पपत्तेरिति यद्यपि लापतुं युक्म्, तथापि " ब्रह्म देवेभ्यो विजिग्ये " ( केन ० उ ० ३११ ); " नमो हिरण्यबाहवे " ( बा ० सं ० १६/१७ ); " नमोऽस्तु नीलग्रीवाय " ( वा ० सं ० १६६८ ), " हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश: ' ( छा ० उ ० १२६ ६ ); “ अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ’ ( 7० सू ० १११/२० ) इत्यादिमन्त्र ब्राह्मण - ब्रह्मसूत्रतदनुगुणपुराणेतिहासवचनैश्च परमेश्वरस्य दिव्य-शरीरसिधिर्भवत्येव । हिरण्पश्मश्रुत्वहिरण्यकेशत्वविशिष्टस्य ज्योतिर्मयस्येशशरीरस्य यथा सूर्यमण्डलस्थत्वं तथैव दक्षिणाक्षि-स्थमपि तव ( छान्दोग्ये ) उकमेवेत्यनितरसाधारण्यमपि तस्य सिद्धयत्येव । वाल्मीकिरीत्या वाल्मीकीय रामायणेन श्रीरामस्य सदेहस्यैव साकेतगमनं सिद्धयति । तथाहि--पितामहवचः श्रुत्वा विनिश्वित्य महामतिः । विवेश वैष्णवं तेजः सशरीः सहानुजः ॥ इति । ( वा ० रा ० उ ० का ० ११०११२ ) एवं श्रीकृष्णस्योत्तरागर्भस्थपरीक्षितरक्षणार्थमुत्तरागप्रवेशः श्रीमद्भागवत्तेनैव सिद्धयति । तथाहि-यह नहीं कहा जा सकता कि इन श्रुतियों में पासेश्वर के प्राकृत शरीर का वध किया गया है, क्योंकि ऐसा मान लेने पर निषेध मी प्राकृत व्रण आदि का हो मानना पड़ेगा, जो कि सिद्धान्ततः ठीक नहीं है । " उस परमेश्वर में कार्य और करण की स्थिति नहीं मे इस श्वेताश्वतर श्रुति से भी परमेश में स्थूल और सूक्ष्म शरीर का निषेध सिद्ध होता है । सूक्ष्म शरीर के अभाव में स्थूल देह उत्पन्न ही नहीं हो सकता । ली दृष्टि के अनुसार किसी वस्तु को सिद्धि करने पर उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि कहीं पर लोकदृष्टि को प्रमाण मानता और कहीं पर नहीं, यह तो अर्थक्रातीय ' व्याय का अनुसरण हुआ । ' अपाणिपाद: ' इत्यादि अभी हाल में तों के नुसार जब देहादि में रहित होने पर भ परमेश्वर सब कार्य करने में समर्थ है, तो उसको शरीर की कांक्षा नहीं रहेगी । ऐसा मानने पर " वह परमाला सब पोसे हाथ - पैर बाला है " इस श्वेताघवसर श्रुति और भीता जगत का विरोध भी नहीं होगा, क्योंकि समष्टिगत स्थूल वर्षी जमिमानी विद् स्वरूप की क्षिगत हाथ - पैर वाले शरीर की सागाव ली की तो उक्त श्रुति के विरुद्ध आदि की को उपपत्ति नहीं होगी यह कहा था सकता है तो भी ऊपर मूल में उबूबूत मन्त्र, आहाण, ब्रह्मसूत्र के वचनों से तथा तदनुसारी पुराण, इतिहास आदि के वचनों से भी परमेश्वर के दिव्य शरीर की विद्धि हो हो जाती है । रितु हिरण्यकेश यादि से शुरू ज्योतिर्मय ईश्वर शरीर की से सूर्यमण्डल में स्थिति है, उसी उन्ह की स्थिति दक्षिण पेत्र में भी छान्दोग्य श्रुति में हो प्रतिपादित है, अतः उस असामान्य विशेषता भी सिद्ध हो जाती है । मीकि रामायण में वाल्मीकि ने श्रीराम का सह सात मन वर्णित किया - " पितामह के चयन को सुनकर महामति श्रीराम ने कुछ सोचा और उसके बाद अपने फाहे साप ने सशरीर वैष्णव तेज में प्रविष्ट हो गये । इसी तरह से श्रीमद्भगवत से भी उत्तरा के गर्भ में स्थित परीक्षित की रक्षा के लिये भगवान् श्रण का उत्तरा के गर्म में प्रवेश सिद्ध होता है । जैसे कि भगवान श्रीकृष्ण मे मेरी माता के उसके करण में जाने पर वह धारण करके मेरे ( परीक्षित के ) उस शरीर की रक्षा की, जो कि अश्वत्थामा के अस्त्रों से क्षत - विक्षत हो चुप था और जो कौरव एवं पाण्डव अंश १. कोई व्यक्ति आधी मुर्गी अंडा देने के लिये बचा ले और आधी खाने के लिये रख के ऐसा हो नहीं सकता । इसी प्रकार लोक में देखी हुई आधी बात माने और आधी न माने, यह हो नहीं सकता ।